Tuesday, September 11, 2018

सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के लिए भी हो कार्य

यह चिंताजनक है कि विष्व में जो बड़े अपराध पिछले कुछ वर्षों में विषेष रूप से उभर कर सामने आये हैं। उनमें सांस्कृतिक विरासत की तस्करी धीरे-धीरे प्रमुख होता जा रहा है। यूनेस्को के अनुसार ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के बाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा अपराध आज सांस्कृतिक विरासत की तस्करी है। 
भारत विविधताओं की धरती है और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से अत्यधिक सम्पन्न भी है परन्तु यह विडम्बना ही है कि धरोहर संरक्षण के प्रति बहुत से स्तरों पर जो सजगता नजर आनी चाहिए, वह लुप्त प्रायः है। यह सही है, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा पुरामहत्व के स्थलों और वहां की सांस्कृतिक संपति के संरक्षण का कार्य निरंतर किया जा रहा है परन्तु देष मंे अभी भी बहुत से ऐसे अल्पज्ञात स्थल हैं जिनका ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व तो है परन्तु वे सरकारी और सामाजिक चेतना की दृष्टि से उपेक्षित प्रायः हैं। सांस्कृतिक संपदा को तस्करी के जरिए देष से बाहर भेजने वालों से भी अधिक खतरा इस बात का है कि हम अपने ऐसे स्थलों के सांस्कृतिक मूल्यों को नहीं पहचानकर सदा के लिए उनसे दूर होते जा रहे हैं।
बहुत से स्थान जो सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से बहुज्ञात हैं परन्तु उनके आस-पास के स्थलों पर हमारा ध्यान नहीं है। हाल ही में बिहार संग्रहालय में एक व्याख्यान के लिए जाना हुआ। इसी बहाने नालन्दा और राजगीर जाने का भी संयोग हो गया। यह सर्वविदित है कि सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से बिहार के यह क्षेत्र अत्यधिक समृद्ध है। नालन्दा के रास्ते में पड़़़ने वाले छोटे-छोटे गांवों और वहाँ की मूर्ति कला धरोहर में इसे साक्षात अनुभूत भी किया। पर यह जानकर दुख भी हुआ कि सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न वहां के बहुत सारे स्थलों से मन्दिरों की मूल मूर्तियां धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। बहुत से सार्वजनिक स्थलों पर से तो मूल प्राचीन मूर्तियों से हूबहू वैसी ही नयी मूर्तियों की अदला-बदली कर दी गयी है। इसकी बड़ी वजह सांस्कृतिक विरासत की तस्करी तो है ही साथ ही इसके प्रति वृहद स्तर पर आमजन की चेतना नहीं होना भी है। इसी कारण तस्कर स्थानीय मूर्तिकारों से प्राचीन मूर्तियों की नकल करवाते हैं और जब मूर्तियां बन जाती है तो कब असल गायब हो जाती है, पता ही नहीं चलता। मुझे लगता है, इस संदर्भ में यदि वृहद स्तर पर सर्वे करवाया जाए तो हमारे यहां से सांस्कृतिक विरासत तस्करी के बड़े गिराहों का पर्दाफास हो।
पर्यटन के विकास में इस बात को भी देखे जाने की जरूरत है कि कैसे स्थान-विषेष में सांस्कृतिक विरासत के प्रति आम जन में प्रभावी वातावरण बनाया जाए। ज्ञात स्थलों के पर्यटन स्थलों के साथ ही वहां के आस-पास के ऐसे अल्पज्ञात स्थलों के लोगों में यह समझ खासतौर से विकसित किए जाने की जरूरत है कि कैसे वे अपनी धरोहर को बचा सकते हैं। बाकायदा इसके लिए प्रोत्साहन अभियान चलाए जाएं तो इसके बेहतर परिणाम हमारे संग्रहालयों को मिलने वाली बेषकीमती पुरा संपदा के रूप में हमारे सामने आ सकते हैं।
बहरहाल, सांस्कृतिक विरासत की तस्करी से देष अतीत की हमारी गौरवमयी संस्कृति से निरंतर महरूम हो रहा है। परन्तु इस संदर्भ का एक बड़ा सच यह भी है कि बहुत सारे स्थानों पर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न धरोहरें इसकारण से भी हमसे दूर होती हा रही है कि वहां पर उनके संरक्षण की कोई जागरूकता नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न होते हुए भी बहुत सारे स्थानों के विरासत स्थल, वहां की मूर्तियां, वहां के षिल्प और कलाएं दुर्दषा झेलती स्वतः ही काल-कवलित हो रही है। मुझे लगता है, सांस्कृतिक विरासत के प्रति सचेत नहीं होना अतीत से विमुख होना है।...और जो समाज अतीत के बगैर भविष्य की राह पकड़ता है, वह बहुत लम्बे समय तक अपने अस्तित्व को बचाकर नहीं रख सकता है। अतीत भविष्य की एक तरह से रोषनी है और संस्कृति जीवन का ऐसा राग है जो व्यक्ति को निरन्तर यांत्रिक होने से बचाता है। वहीं समाज सदियों तक अपना होने को बचाये रख सकता है जो परम्परा में आधुनिकता ओढ़ता है। सांस्कृतिक चेतना इसलिए भी जरूरी है कि इसी से भविष्य सुगम होता है और मनुष्य मानसिक रूप से भी सम्पन्न होता है। 
देश  के जाने माने कलाकार और कला षिक्षा में विरासत संरक्षण के पैरोकार डाॅ. जयकृष्ण अग्रवाल ने हाल ही में लखनऊ के रवीन्द्रालय पर बनी 81 फीट लम्बी और 9 फीट चैड़ी टेराकोटा की उस विष्व प्रसिद्ध कला कृति की ओर सोषल मीडिया के जरिये ध्यान दिलाया है जो सामाजिक उपेक्षा के चलते झाड़ियों और वहाँ उग आई घास में कहीं लोप होती जा रही है। विष्व कवि रवीन्दनाथ टैगोर के कथानक पर भारत के प्रमुख कलाकार स्व. के.जी. सुब्रमण्यम द्वारा 1963 में सृजित यह कलाकृति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक भारतीय कला का प्रतिनिधत्व करती है। पर इसे समझक कौन? जयकृष्णजी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा इस कलाकृति के साथ ही ऐसी और कलाकृतियों और उनके स्थलों को संसूचित कर संरक्षित करने पर जोर दिया है। सोषल मीडिया में उनकी इस मुहिम को युवा कलाकार भूपेन्द्र अस्थाना सहित कई और कलाकारों ने आगे बढ़ाया है परन्तु सवाल यह है कि वृहद स्तर पर क्या इस संदर्भ में सरकार को कोई नीति नहीं बनानी चाहिए। यह बात इसलिए कि देषभर में ऐसी बहुत सी सांस्कृतिक धरोहरे हैं जो उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व लगभग खोती जा रही है। ऐसे बहुत से स्थान हैं, जो घोर उपेक्षा के चलते अतीत हो गए हैं या फिर ऐसा होने की राह पर हैं। 
मध्यप्रदेष के मुरैना क्षेत्र में, चैसठ यौगिनी मंदिर बना हुआ है। ब्रिटिष वास्तुकार लुटियन ने इसे देखकर ही कभी भारतीय संसद भवन के निर्माण की कल्पना की थी। कोई वहां पर जाए तो अचरज करेगा कि हमारा संसद भवन हुबहू चैसठ योगिनी मंदिर का प्रतिरूप है। लुटियन ने उससे प्रेरणा ली परन्तु वर्तमान यही कहता है कि संसद भवन की परिकल्पना उसी की थी...ऐसे बहुत से और भी स्थान हैं जो विष्व में आधुनिक निर्माण की भारतीय प्रेरणा है परन्तु वहां भारतीय संस्कृति के होने के चिन्ह अब नजर नहीं आते।  भारतीय संसद भवन की प्रेरणा रहा चैसठ योगिनी का मूल मंदिर और वहां के कुछ संस्कृत षिलालेख, चट्टानों पर अतीत से जुड़ी संदर्भों की दास्तां सुनाती लिपि और सदियों पुराने वहां के और भी सांस्कृतिक संदर्भ घोर अपेक्षा के कारण विदेषी जनों के लिए तो प्रेरणा बन गए परन्तु अपने ही घर में घरबारे हैं। मुझे लगता है, इस दृष्टि से व्यापक स्तर पर चिंतन की जरूरत है कि कैसे हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को तस्करों से तो बचाए हीं साथ ही जो कुछ हमारे पास उपेक्षित है-उसको सहेजतने का भी वृहद स्तर पर हम जतन करें। निष्चित ही सामाजिक भागीदारी इसमंे जरूरी है परन्तु सरकारी स्तर पर विज्ञ कलाकारों, धरोहर सरंक्षण मंे रूचि रखने वाले, लेखकों को सम्मिलित कर इस दिषा में किसी नीति पर कार्य किया जाता है तो उसके दूरगामी परिणाम आ सकते हैं।
राजस्थान की ही बात करें तो यहां अलवर जिले में स्थित नीलकण्ठ महादेव मन्दिर और उसके पास कोई दो-तीन किलोमीटर तक प्राचीन मूर्तियों का जैसे खजाना बिखरा पड़ा है। कहते हैं मंदिर में भगवान षिव का जो लिंग है वह भी नीलम का है। बौद्ध और जैन प्रतिमाओं का भी यह क्षेत्र एक प्रकार से गढ़ है। परन्तु यहां भी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का कोई धणी-धोरी नजर नहीं आता है। जालौर में परमार कालीन संस्कृत पाठषाला, बूंदी के शैल चित्र, जयपुर के पास महाभारत कालीन कहे जाने वाले विराटनगर की चट्टानों और मूर्तिषिल्प, षिलालेखों आदि बहुत सारी सांस्कृतिक धरोहर इसीलिए उपेक्षित है कि उसके बारे में सूक्ष्म समझ का अभाव है। ऐसे स्थलों से यदि तस्करी भी किसी स्तर पर होती है तो किसे पता है! जरूरत इस बात की है कि के सूक्ष्म सांस्कृतिक सोच रखते हुए इस सबके संरक्षण पर वृहद स्तर पर ध्यान दिया जाए। जयकृष्णजी जैसे कलाकारों की सेवाएं इस दिषा में सरकार लेकर किसी नीति पर कार्य करती है तो उसके अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं। पहल तो हो।

Saturday, May 12, 2018

‘नीर महल’ की ओर


खिड़की के पार यहां दूर तक धूंध है। पहाड़ हैं पर धूंए में कहीं खोए-खोए हुए से। एक पगडंडी दूर कहीं उतर जा रही है। मिलट्री का एक ट्रक भी खड़ा है। हरे वृक्षों का बसेरा है पर अभी तो धुंधलके में जैसे सब ऊंघ रहे हैं। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला के राजकीय विश्राम गृह के जिस कमरे में ठहरा हूं, उसके कमरे की खिड़की से यह सब देख मन में आया, पहाड़ों की धरा हमें जगाती है।...और कहीं होते हैं तो वहां की आपाधापी, भागमभाग और वाहनों के धूंए का राज इस कदर आक्रांत करता है कि मन उन सबसे दूर नींद में कहीं खोना चाहता है। रहता वहीं है पर वहां से भागने, दूर जाने या फिर कुछ देर के लिए अपने आस-पास को भूलने को मन करता है। यह भूलना क्या है? नींद ही तो! माने जो है, उससे दूर जाना। प्रकृति मध्य ऐसा नहीं है। यहां मन जागता है। सोया हुआ भी यहां भीतर को जगाता है। तो कहूं, जाग का मार्ग है प्रकृति। 
जयपुर से दिल्ली का हवाई मार्ग। रात्रि विश्राम राजधानी में और फिर दिल्ली से अलसुबह कोलकत्ता की फ्लाईट और फिर वहां से बदली कर अगरतला पहुंचा तब तक दुपहरी हो गई थी। अगरतला में छोटा सा एअरपोर्ट है। 
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सांझ घिरने को थी।... क्षितिज में लालिमा बिखेरता सूर्य विदा ले रहा था। पानी पर पड़ती सूर्य की जाती किरणों को देखना अद्भुत अनुभव था। हम जहां थे, वहां से दूर तक आंखों में नीर ही नीर बस रहा था।...पर सौन्दर्य का सच केवल यही नहीं था, दूर बीच पानी में खड़ा वह मूक महल भी था जिससे सुनाई दे रहा था जीवन का राग। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 53 किलोमीटर दूर रूद्रसागर झील में थी हमारी बोट। आसमान की परछाई से नीलेपन का अहसास कराता झील का पानी। नाव ‘नीर महल’ की ओर बढ़ रही थी, तभी झील पर किलोल करते प्रवासी पक्षियो का झुण्ड समवेत स्वर में गान करता उड चला। पास बैठे कलाकार मित्र ने तुरंत कैमरा थामा और प्रयास किया कि पक्षी संगत के उस दृष्य को सदा के लिए कैमरे से स्थिर कर संजो ले परन्तु तब तक देर हो चुकी थी।... झील के पानी में परछाई छोड़ता पक्षियो का काफिला दूर कहीं आसमान में जैसे खो गया। 
झील के मध्य बने ‘नीर महल’ की ओर बढ़ते मन ने औचक कहा, प्रकृति ने त्रिपुरा में सौन्दर्य का नीर ही तो बहाया है। यत्र-तत्र-सर्वत्र।...
—शीघ्र प्रकाश्य यात्रा वृतान्त पुस्तक से 

Saturday, April 7, 2018

आलोक छुए अपनेपन की रंग दीठ

विनय शर्मा  के चित्रों की अपनी ज्यामिति है। रंग-रेखाओं में वृक्ष, चट्टानों और आदिम सभ्यता से जुड़े अवषेषों की मधुर व्यंजना वहां है। उनकी लगभग हर कलाकृति में प्राचीन लिपियों का धुंधलापन दिखेगा। रंगालेप में किसी कथा, प्रसंग, अनुभूति या स्मृति के छंद सरीखी लिपि! विनय के चित्र एकांगी अर्थ आषय लिए नहीं है बल्कि वहां रंगो के अनूठे कथा अभिप्राय है। कह सकते हैं, अमूर्तन में रंगो का आलोक वहां है। रंग संसार की विपुलता नहीं विविधता। सुविन्यस्त रेखाओं में बिखरे रंगो से झांकते मानव मन और प्रकृति से जुड़े आख्यान। रेखाएं जैसे दीठ का आलोक रचती है। 
मसलन एक चित्र है जिसमें अनूठा रंग विभाजन किया गया है। चैकड़ी में बंटे रंग। गोले और पट्टिकाएं। टैक्सचर में उर्दू लिपि। कागज बने कैनवस पर तरेड़ें...पुरातन की अनुभूति कराती। रंगो के अनूठे बिम्ब यहां है। कलाकृति में प्रवेष करेंगे तो पाएंगे वहां पर सूरज, चांद, तारे और हरियाली के आंगन में पसरा जैसे मौन हमसे बतिया रहा है। एक ओर घनीभूत होते रंग किसी अंधेरी सुरंग में जैसे ले जा रहे हैं तो दूसरी ओर छोटे गलियारों से अपनी जगह बनाता उदित होता सूर्य। चमकीली पीली रोषनी के रंग। 
विनय की कलाकृतियों की यही विषेषता है, वह रंगों के होने का जैसे हमसे पाठ बंचावते हैं।  अनुभूतियों की विरल छटाओं में उनके किए रंग विभाजन की ज्यामितिय संरचनाओं में एक साथ गहराती रात की अनुभूति है तो उदित होते सूर्य के उजास का सुकून भी। ऐसा बहुत कम होता है जब एक ही चित्र दिन और रात की ऐसी सुमधुर व्यंजना करता हमें दिखे। विनय की ‘रंग आलोक’ श्रृंखला के चित्र ऐसे ही हैं। वहां प्रकृति और जीवन से जुड़े आख्यानों में हम भावों के अनूठे लोक में पहुंच जाते हैं।  उर्दू अक्षरों की पाष्र्व व्यजना में वह अभिप्रायों का जैसे कोई किवाड़ खोलते हैं। यह ऐसा है जिसमें प्रवेष करते हम रंग-रेखाओं के माधुर्य से ही साक्षात्कार नहीं करते बल्कि प्रकृति और जीवन के रिष्तों से भी रू-ब-रू होते हैं।
इसी श्रृंखला की एक और कलाकृति है, त्रिकोण और गोलेनुमा रंग पट्टिकाओं के नीचे हरे, रक्तिम लाल और पीली चैकियां। पाष्र्व में दरारें। बिंदु-बिंदु नाद। हल्का आसमानी, गहरा नीला, भगवा, हरा, लाल और पीले रंग के घेरे में बसे घेरे। शून्य में ब्रह्माण्ड को उकेरते रंग ध्वनियों की विरल व्यंजना विनय ने इस कलाकृति में की है। मुझे लगता है यह विनय की रेखाओ का रंग अध्यात्म है और संयोग देखिए, ठीक इसके सामने कलाकृति में त्रिभुज में भी रेखाओं की ऐसी ही लय अंवेरते रंगो का उजास जैसे छिड़का गया है। रंगो की इस छटा के नीचे चैकोर रंग पट्टिकाएं और इस समग्र परिवेष में हल्के पीलेपन में उभरी उर्दू लिपि। भाव सामंजस्य की अनूठी व्यंजना। शून्य का अनहद, रंग-नाद।...और इसके बाद की कलाकृति में परिवेष लगभग यही परन्तु रंगो का प्रवाह जैसे फूलों में रूपान्तरित हो गया है। छाया-प्रकाष में हरे, पीले, नीले और लाल में समाहित श्वेत रंग जैसे बहते हुए अपने आप ही पुष्पगुच्छ में रूपान्तरित हो गए हैं।
विनय का यही रंग आलोक उन्हें अपने समकालीनों से जुदा करता है। दार्षनिक भव में ले जाता रंगों का उनका लोक रेखाओं के लावण्य में रंग अध्यात्म सरीखा है।इसी श्रृंखला का एक चित्र चैपड़ सरीखा है। सहज, सरल। रंग परन्तु वह देखने वाले पर हावी नहीं होते। चैपड़ नहीं बल्कि उसकी छाया में हरे, पीले, नीले और रंग की आभा। पाष्र्व में टैक्सचर में उर्दू लिपि। आप इसे देखते हैं और स्मृतियों के जैसे किसी अनूठे लोक में प्रवेष कर जाते हैं। ऐसे ही एक और चित्र है जिसमें विघ्न-विनायक गणेष की व्यंजना है। भित्ति चित्र सरीखी कलाकृति। पाष्र्व में पुरालिपि और श्वेत रेखाओं के उजास में गणेष को चंवर ढुलाती रिद्धि-सिद्धि। मटमेले और जीर्ण-षीर्ण कागद पर संस्कृत भाषा के श्लोक और रंग पट्टिकाएं और छाया सरीखे आवरण में उभरती श्वेत रेखाओं में उकेरे गणेष की यह अनूठी व्यंजना है। चित्र परन्तु अतीत वहां जैसे ध्वनित हो रहा है। ऐसा लगता है किसी पुरानी हवेली के भित्तिचित्र से हम साक्षात् हो रहे हैं। यही विनय शर्मा के वह रंग अभिप्राय हैं जिनमें परिवेष का मर्म ठौड़ ठौड़ उद्घाटित होता सदा के लिए देखने वालों की आंखों में बस जाता है।

Tuesday, February 20, 2018

संविधान की आठवी अनुसूची में सम्मिलित हो मातृभाषा राजस्थानी

यूनेस्को ने 21 फरवरी का दिन अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की हुई है। उद्देष्य है, विष्व मे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। पर विडम्बना है, संविधान की 8 वीं अनुसूची मंे सम्मिलत भाषाओं में हमारी अपनी मातृभाषा राजस्थानी नहीं है। बावजूद इसके कि इसका समृद्ध प्राचीन साहित्य है, विष्व की  किसी भी भाषा से कही अधिक समृद्ध शब्द कोष है, देष के बड़े भु-भाग पर रहने वालों की यह भाषा है। दुनियाभर में राजस्थानी के अपने लिखे से पहुंचने वाले ‘ंधरती धोरा री’ के महाकवि कन्हैयालाल सेठिया, साहित्य के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित हुए प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा ‘बिज्जी’ आदि अपनी मातृभाषा की संवैधानिक मान्यता की उम्मीद में ही इस लोक से विदा हो गए पर मान्यता है कि अभी तक नहीं मिली।
बहरहाल, जनहित के विषयों के पैरोकार, अभिभाषक मित्र सूर्यप्रताप सिह राजावत ने हाल ही प्रधानमंत्री कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी चाही है कि राजस्थान विधानसभा में 2003 में राजस्थानी को मान्यता दिए जाने के प्रस्ताव को पारित कर भिजवाए जाने और इसके बाद 24 जुलाई 2014 को केन्द्रीय संस्कृति मंत्री चन्द्रकुमारी कटोच द्वारा राजस्थानी को आठवी सूची मे सम्मिलित करने के लिए प्रधानमंत्री को लिखे पत्र पर क्या कार्यवाही की गयी है। आरटीआई का जवाब तो खैर, देर-सवेद आयेगा ही परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि करोड़ों राजस्थानियों की मातृभाषा को आखिर क्योंकर मान्यता के अपने सांस्कृतिक अधिकार की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।
मुझे लगता है, संस्कृति की विविधता की हमारी थाती तभी बची रह सकती है जब हम अपनी आंचलिक भाषाओं को बचा लें। केन्या के उपन्यासकार, भाषाविद् न्गुगीवा थ्योगो की किताब ‘डिकोलाइजिंग द माइंड’ में भाषा की राजनीति पर विषद् विमर्ष है। पुस्तक हमें बताती है कि कैसे भाषा के जरिए गुलाम बनाया जाता हैे। भाषा व्यापक जन-समुदाय की सामुहिक स्मृति होती है। यदि वह आपकी अपनी नहीं है तो आप एक समय के बाद अपने अतीत के गौरव को सदा के लिए खों देंगे। मुझे लगता है, राजस्थानी को यदि समय रहते संवैधानि मान्यता नही मिलती है तो  राजस्थान की संस्कृति की स्मृति से भी हम वंचित हो सकते हैं। तब हो सकता है, स्मृति वंचित समाज में जीने को हम मजबूर हो जायें। उपनिषदों में कहा गया है कि अपनी भाषा के बगैर न सत्य को, न असत्य को, न पाप को, न पुण्य को , न अच्छे और न बुरे को, न सद्गुण, न अवगुण को-किसी को नहीं पहचाना जा सकता है। अपनी भाषा में ही हम अपने आत्म को पहचान सकते है। जान सकते हैं। इसलिए जरूरी है हम अपनी बोलियों, मातृभाषाओं और उसकी विविधता को सहेंजे। 
मैं हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी में भी लिखता हूं। याद पड़ता है एक दफा कमलेष्वर जब बीकानेर आए तो उनसे लम्बा संवाद बोलियांे पर हुआ। बाद में उनके साथ को सहेजते मैने संस्मरणनुमा कुछ उन पर लिखा।  सहज ही वह अपनी मातृभाषा राजस्थानी में लिखा गया। राजस्थानी भाषा अकादमी की पत्रिका में जब वह प्रकाषित हुआ तो मैने हिंदी में उसका कुछ अनुवाद और मुल छपा उन्हें डाक से भेज दिया। थोड़े दिनों बाद कमलेष्वर का पत्र हस्तगत हुआ, उन्होंने लिखा था, ‘तुम्हारे द्वारा ‘‘जागती जोत’’ में छपा-लिखा हुआ बहुत आत्मीय आलेख-संस्मरण मिला।  पढ़ता हूं तो राजस्थानी समझ में आती है। आखिर हिंदी को रक्त- संस्कार तो राजस्थानी , शौर सैनी और ब्रज ने ही दिया है। हिंदी तो भाषा नहीं, भाषा मण्डल है! मैं स्वयं ब्रजभाषी हूं - मैनें वृहद शुभ और भविष्य के लिए अपनी मातृभाषा को खड़ी बोली हिंदी के लिए समर्पित किया है...सांस्कृतिक समन्वय के लिए, देष और राष्ट्र के उत्थान के लिए यह बलिदान जरूरी होते हैं...पर अपनी मातृ-भाषाओं -बोलियों के विसर्जन से हिंदी प्रगाढ़ और शक्तिषाली नहीं होगी, हमें अपनी मातृभाषाओं को जीवित रखना पड़ेगा, जहां से हिंदी की शब्द संपदा सम्पन्न होगी। यह बिटिया- बेटे को ब्याहने वाला रिष्ता है- जो नाती- पोतों में हमें अपनी निरंतरता देता है।’ उनके इस कहन के आलोक में ही यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हिंदी की संपन्नता बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं से है। जो लोग राजस्थानी की मान्यता के विरोधी हैं, उन्हें इस बात को समझ लेना चाहिए कि राजस्थानी की मान्यता से किसी और भाषा का अहित नहीं होने वाला है और जो लोग बोलियों के नाम पर राजस्थानी की मान्यता पर प्रष्न उठाते हैं, उन्हें भी भी भाषाविद्ों की इस बात को नहीं भुलना चाहिए कि किसी भी भाषा की जितनी अधिक बोलियां होती है, वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध मानी जाती है। राजस्थानी के साथ यही है। 
विष्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगौर ने राजस्थानी के दूहे सुनकर कभी कहा था, ‘‘रवीन्द्र गीतांजली लिख सकता है, डिंगल जैसे दूहे नहीं।’ भाषाषास्त्री सुनीति कुमार चटर्जी, आषुतोष मुखर्जी राजस्थानी भाषा के समृद्ध कोष और इसकी शानदार परम्परा के कायल होते समय-समय पर राजस्थानी की मान्यता की हिमायत करते रहे हैं। यही नहीं भाषाओ के विकास क्रम के अंतर्गत राजस्थानी का प्रार्दुभाव अपभ्रंष में, अपभ्रंष की उत्पत्ति प्राकृत तथा प्राकृत का प्रारंभ संस्कृत और वैदिक संस्कृत की कोख में परिलक्षित होता है। इन सबके बावजूद राजस्थानी को मान्यता नहीं मिलना क्या समय की भारी विडंबना नहीं है?
राजस्थान विधानसभा में वर्ष 1956 से ही राजस्थानी को राज-काज और षिक्षा की भाषा के रूप में मान्यता के प्रयास हो रहे हैं परन्तु इन प्रयासों को अमलीजामा पहनाने की दिषा में कोई समर्थ स्वर नहीं होने के कारण यह भाषा राजनीति की निरंतर षिकार होती रही है। राज्य विधानसभा में पहली बार 16 मई 1956 को विधायक सम्भुसिंह सहाड़ा ने राजस्थानी भाषा प्रोत्साहन के लिए जो अषासकीय संकल्प रखा उसमें राजस्थान की पाठषालाओं में राजस्थानी भाषा और तत्संबंधी बोलियों की षिक्षा देने पर जोर देने हेतु तकड़ा तर्क दिया गया था। संकल्प में कहा गया था कि बच्चे घरों मंे अपने माता-पिता के साथ जिस भाषा में बात करते हैं, उसी मंे षिक्षा दी जानी चाहिए, इसी से वे पाठ्यपुस्तकों में वर्णित बातों को प्रभावी रूप में ग्रहण कर पांएगे। इसके बाद 2003 में राज्य विधानसभा ने राजस्थान की मान्यता का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भिजवा दिया। तब से आज इतने वर्ष हो गए हैं, राजस्थानी मान्यता की बाट ही जो रही है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि लगभग 1 हजार ई. से 1 हजार 500 ई. के समय के परिपे्रक्ष्य को ध्यान में रखकर जिस भाषा के बारे में गुजराती भाषा एवं साहित्य के मर्मज्ञ स्व. झवेरचन्द मेघाणी ने यह लिखा कि व्यापक बोलचाल की भाषा राजस्थानी है और इसी की पुत्रियां फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषाएं बनी। उस भाषा की संवैधानिक स्वीकृति के बारे में निरंतर प्रष्न उठाए जा रहे हैं।
एक प्रष्न यह हो सकता है कि संविधान की मान्यता के बगैर क्या कोई भाषा अपना अस्तित्व बनाकर नहीं रह सकती। यह सच है कि भाषा सरकारें नहीं बनाती, वे लोग बनाते हैं जो इसका प्रयोग करते हैं परन्तु इसका व्यवहार में प्रयोग तो तब होगा न जब यह षिक्षा का माध्यम बनेगी, जब राजकाज, विधानसभाओं, अदालतों में इस भाषा का प्रयोग उचित समझाा जाएगा। और यह सब तब होगा जब सरकार इसे मान्यता प्रदान करेगी। इन पंक्तियों के लेखक जैसे बहुत से हैं जिनका आरंभिक परिवेष राजस्थानी का रहा है, आज भी घर में हम राजस्थानी में बात करते हैं परन्तु बच्चों से हिन्दी में बात करने के लिए मजबूर हैं। कारण यह है कि वे ठीक से विद्यालय में हिन्दी या अंग्रेजी यदि नहीं बोल पाएंगे तो जिस भाषा में वे षिक्षा ले रहे हैं, उन्हें बोलने वाले दूसरे बच्चों के साथ उन्हें हीन भावना जो महसूस होगी। राजस्थान में ही गांवो, छोटे शहरों से राजधानियां और बड़े शहरों में आए अधिकाषं राजस्थानी बोलने वालों के साथ यही हो रहा है। उन्हें अपनी भाषा से लगाव है, प्यार है परन्तु इस बात की लगातार गम भी है कि उनके बाद इस भाषा को उनके बच्चे नहीं बोलंेगे, व्यवहार में नहीं लंेगे। क्या ऐसा तब संभव होता जब उन बच्चों को भी राजस्थानी में ही पढ़ने का मौका मिलता?
भाषा निरंतर प्रयोग से समृद्ध होती है परन्तु राजस्थानी का यह दुर्भाग्य है कि प्रतिवर्ष गांवों, सुदूर ढ़ाणियों से अपनी मेहनत से पढ़-लिखकर शहर में आकर नौकरी करने वाले राजस्थानी भाषी मजबूरन अपनी दूसरी पीढ़ी के साथ राजस्थानी में संवाद नहीं कर पाते हैं, ऐसे दौर में कब तक राजस्थानी गांवो के अलावा शहरों में बची रहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। राजस्थानी की मान्यता को क्यों इस नजरिए से नहीं देखा जा रहा? क्यों राजस्थानी भाषा के बाद जो भाषाएं विकसित हुई उन्हें मान्यता मिल गयी परन्तु राजस्थानी आज भी मान्यता की बाट जो रही है? क्यों बोलियों के नाम पर राजस्थानी के साथ यह अन्याय हो रहा है? हकीकत यह है कि राजस्थानी की मान्यता इसके अधिकाधिक लोक प्रयोग के लिए जरूरी है, इसलिए भी कि इसी से मुद्रण और प्रकाषन, पठन-पाठन और बोलने की आदत का इसका अधिक विकास होगा और यही इस भाषा की आज की जरूरत है। इसी से राजस्थानी के समृद्ध प्राचीन साहित्य को भी अंवेरा जा सकेगा।
बहरहाल, संविधान की मूल अवधारणा लोकतांत्रिक प्रस्थापना में है। संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अगर एक हिस्से की भाषा कोई है तो उसको बचाया जाए। राजस्थानी 9 करोड़ लोगों की भाषा है, इसे बचाना, इसकी मान्यता, संरक्षण इसलिए जरूरी है। वर्ष 1959 में भाषाविद् जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने ‘भारत का भाषा सर्वेक्षण’ पुस्तक में राजस्थान की भाषा राजस्थानी बताते स्पष्ट कहा है-‘‘मारवाड़ी के रूप में, राजस्थानी का व्यवहार समस्त भारतवर्ष में पाया जाता है। ‘पंजाबी के ठीक दक्षिण में लगभग 1 करोड़ साढ़े बयासी लाख राजस्थानी भाषा-भाषियों का क्षेत्र है जो इंगलैण्ड तथा वेल्स की आधाी जनसंख्या के बराबर है। जिस प्रकार पंजाबी उत्तर-पष्चिम में मध्य देष की प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है, उसी प्रकार राजस्थानी उसके दक्षिण-पष्चिम में प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है।’’
ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण का यह कार्य तब किया था जब भारतीय संविधान बना भी नहीं था, बाद में अंग्रेजी से यह पुस्तक हिन्दी में अनुवादित होकर प्रकाषित हुई। वर्ष  1967 से लेकर अब तक बहुत सारी भाषाएं संविधान की 8 वीं अनुसूची में जोड़ी गयी है। यह सच में विडम्बना की बात है कि जिस भाषा की लिपि से आधुनिक देवनागरी और दूसरी अन्य भाषाओं की लिपियां बनी है और जिसका अपना व्याकरण और विष्व के विषालतम शब्दकोषों में से एक जिसका शब्दकोष है, ऐसी भाषा को संविधान की 8 वीं अनुसूची में जुड़ने का अभी भी इन्तजार है।
राजस्थानी की मान्यता में किसी का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है। इसका अर्थ इतना ही है कि इससे वर्षो पुरानी इस भाषा का संरक्षण हो सकेगा। ऐसे दौर में जब मातृभाषाओं पर विष्वभर में संकट चल रहा है, इस दिषा में गंभीर चिंतन कर त्वरित कार्यवाही की जानी समय की आवष्यकता भी है। इसलिए भी कि भाषा, साहित्य और संस्कृति से व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। राजस्थानी की मान्यता भाषा के प्रयोग को व्यापक स्तर पर प्रयोग की स्वीकृति देती है। इसी दीठ से क्या हमारी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलनी चाहिए!

Friday, January 12, 2018

संस्कृति की जीवंतता में उत्सवधर्मिता का नाद


उतसवधर्मिता का नाद - कला मेला 
राजस्थान ललित कला अकादमी का एक वार्षिक आयोजन है, ‘कला मेला’। वर्षों से यह होता आ रहा है। पर पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो इस मेले से उत्साह, उमंग नदारद रही है। करना है, इसलिए किए जाने की औपचारिकता की एकरसता में कला मेले के सांस्कृतिक सरोकार कभी वृहद स्तर पर सामने  आए हों, ऐसा लगा नहीं। कलाकारों को अकादमी स्टाॅल आंवटित करती है, कला प्रदर्षनी का आयोजन होता है और उद्घाटन-समापन समारोहों के साथ ही तमाम औपचारिकताआंें में सब कुछ संपन्न हो जाता है। पर इस बार ललित कला अकादमी का ‘कला मेला’ विरल था। संस्कृति के साझे सरोकारों में जीवन के उल्लास, उत्सवधर्मिता से पूरी तरह से जुड़ा हुआ। रवीन्द्र मंच पर आयोजित मेले के पांच दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। 
कहने को जयपुर में एषिया का सबसे बड़ा प्रचारित ‘जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल’ भी वर्ष 2006 से होता आ रहा है। आरंभ के कुछ वर्ष यह फेस्टिवल साहित्य की संवेदना से लबरेज था भी परन्तु शनैःषनैः अब यह बाजार और व्यावसायिकता से ग्रसित होता पष्चिम की भौंडी नकल और फिल्मी हस्तियों को एकत्र कर युवा पीढ़ी को भरमाने का एक जरिया भर रह गया है। ऐसे में राजस्थान ललित कला अकादमी का पांच दिवसीय कला मेला इस बार उत्सवधर्मिता जगाता जैसे एक बड़ा संदेष देने वाला था। संदेष यह कि कलाएं मानवीय अनुभूतियों का सौन्दर्य रूपान्तरण है। कला-साहित्य से जुड़े आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ इन्हीं के जरिए जीवन को पोषित करती है। ऐसा यदि नही ंहोता है तो फिर मेले या उत्सव के बहाने किसी भी प्रकार के आयोजन की कोई सार्थकता नहीं है।
सांस्कृतिक संध्या 
मुझे लगता है, कला या साहित्य से जुड़ा कोई भी मेला-डत्सव वही सार्थक है जिसमें भारतीय संस्कृति और हमारी अपनापे की संस्कृति का समावेष हो। वहां औपचारिकताओं की भरमार नहीं हो। वही जिसमें एकरसता नहीं हो और वही जिससे संस्कृति जीवंत रहे जीवाश्म न बने। आनंदकुमार स्वामी स्थापित करते हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है।’ इस दीठ से इस बार का कला मेला अब तक के हो रहे कला मेलों से अपने आप मे ंनवीन था। कैनवस पर कलाकारों की कलाकृतियों का रूपहला संसार मेले में था तो संस्थापन (इंस्टालेषन) की भी बेहतरीन प्रस्तुतियां उसमें थी। कला षिविर में कलाकारों ने वहीं कलाकृतियां सृजित की तो संगीत और नाट्य की भी लगभग रोज ही प्रस्तुतियां हुई। पहली बार कलाओं के भिन्न आयामों, यहां तक की कला षिक्षा और कला के अंतःसंबंधो पर संगीत, नृत्य, नाट्य, वाद्य, साहित्य आदि तमाम कलाओं पर संवादों का भी यह मेला संवाहक बना। 
राजस्थान ललित कला अकादमी में अध्यक्ष का मनोनयन भी इस बार लगता है, राज्य सरकार ने गहरी सूझ से किया है। अकादमी अध्यक्ष डाॅ. अष्विन एम. दलवी यू ंतो ‘सुरबहार’ जैसे विरल भारतीय वाद्य के देष के जान-माने कलाकार है ंपरन्तु दृष्य कलाओं से भी उनके गहरे सरोकार हैं। राग-रागिनियों पर चित्र की परम्पराओं के साथ ही संगीत के दृष्य सरोकारों की उन्हं गहरी समझ है। सितार, तबला और दूसरे वाद्य यंत्रों के साथ ही नृत्य, चित्रकलाओं में भी वह रमे हुए हैं। 
कलाओं के अन्तः संबंधों पर संवाद 
इसीलिए इस बार के कला मेले में उनने एक बड़ी पहल यह भी की कि विभिन्न संवाद कार्यक्रमों में से एक ‘कलाओं के अंतःसंबंध’ पर भी रखा। भरनाट्यम की देष की ख्यात कलाकार संध्या पुरेचा, सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक चेतन जोषी, लब्धप्रतिष्ठि रंगकर्मी, संेसर बोर्ड सदस्य अषोक बांठिया, बतौर संगीत साधक अष्विन एम.दलवी, जाने-माने चित्रकार जय झरोटिया के साथ ही कला आलोचक रूप में इस पंक्तियों के लेखक ने इस सत्र में षिरकत की। यह शायद पहला अवसर था जब राजस्थान ललित कला अकादमी ने ‘कला मेले’ में इस तरह की संस्कृति की संवेदन पहल की। संवाद और भी हुए जिनमें कला षिक्षा पर एक महत्ती सत्र हुआ तो भारतीय कला दृष्टि, भारतीय कला की चिंतन परंपरा और सौंदर्य मानदंड, जयपुर की कला परंपरा और नगर नियोजन पर भी सार्थक संवाद-चर्चाएं हुई। महत्ती यह भी था कि इन चर्चाओं के बहाने कलाओं के मानवीय सराकारों पर विषद् विमर्ष की अकादमी के जरिए एक तरह से राह खुली। संगीत की आलाचारी के दौरान सुनने वाले के जेहन में बनने वाले आकारों का चित्रण भी कैलीग्राफी कैम्प के दौरान मेले में हुआ। माने इस बार का कला मेला इस मायने में जीवंत था कि इसमें किसी एक कला नहीं बल्कि कलाओं के अंतर्गुम्फन को भी बहुत से स्तरों पर स्वर दिया गया था। मेले में प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाट्य मंचन और संस्कृति के दूसरे उपादानों की बडी विषेषता यह भी थी कि पहले दिन आने वाले दर्षकों ने मौखिक प्रचार कुछ इस तरह से किया कि लगभग प्रतिदिन ही कला मेला लोगों की आवा-जाही से गुलजार रहा।
मेले में सुप्रशिद्ध कार्टूनिस्ट सुधीर गोस्वामी का सृजन 
बहरहाल, ‘मेला’ शब्द उत्सव और उमंग से जुड़ा है। वहां यदि औपचारिकता और एकरसता रहेगी तो कभी भी वह जनोत्सव नहीं बन सकेगा। अकादमी के मेले ने इस बार जनोत्सव का रूप लिया, इसलिए कि जनता ने स्वतःप्रेरित इसमें भाग लिया। भीड़ ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में भी कम नहीं रहती। पर गौर करें, बाजार की चकाचैंध में ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में भीड़ होती नहीं, जुटाई जाती है। इसके विभिनन सत्रों में अधिकतर उच्च शिक्षण संस्थाओं, तकनीकी संस्थानों के विद्यार्थी और स्वयंसेवक यूनिफाॅर्म में दिखते हैं। बाकायदा इसके लिए शिक्षण संस्थान प्रमुखों को उन्हें भेजे जाने के लिए नूंत दी जाती है। इसके लिए पास बनाए जाते हैं। मेला बाजार आयोजक जानते है, उनका खरीदार बुद्धिजीवी साहित्यकार, पाठक नहीं होकर उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत यह नई पीढ़ी ही है! इसीलिए काॅरपोरेट कंपनियों के साथ ब्रिटिश एयरवेज, ब्रिटिश काउन्सिल प्रायोजक रूप में वहां प्रमुखता से नई पीढ़ी को आकर्षित करने में अपने स्टाॅल प्रमुखता से लगाते हैं। 
कला की जीवंत प्रस्तुतियां 
दरअसल ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ साहित्योत्सव नहीं अंग्रेजी में लिखी किताबों का एक तरह से हाट बाजार है। ग्लेमर की दुनिया से जोड़ अंग्रेजी पुस्तके किस तरह से बेची जा सकती है, यह इस आयोजन से सीखा जा सकता है। जयपुर अंग्रेजी दां शहर नहीं है, पर अग्रेजी पुस्तकों की बिक्री के बड़े बाजार की संभावना को देखते हुए ही इसे ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ के लिए शायद चुना गया है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में यह आयोजन होता है, स्वाभाविक ही है हिन्दी के सत्र नहीं होंगे तो हो-हुल्ला होगा। सो अंग्रेजी शीर्षक ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ में बेचारी हिन्दी के भी चंद सत्र रोज होते ही हैं। पर माहौल और शिरकत करने वाले लेखकों की बेचारगी हर कोई भांप सकता है। कहने को हिन्दी या राजस्थानी के सत्र होते हैं पर उनमें सकुचाए से बैठे लेखकों को देखकर यह भी लगता है, वे किसी पांच सितारा होटल संस्कृति के माहौल से ही गदगद हैं। गोया, वहां पहुंचना ही उनकी बड़ी उपलब्धि हो गई है इसलिए भाषा की उपलब्धि से उनका कहां कोई सरोकार हो सकता है। विदेशी भाषाओं के लेखक अपने देश की संस्कृति, अपने लेखन की विशेषताओं को इस ऐषिया के बड़े कहे जाने वाले आयोजन में रेखांकित करते हैं और इस सबके साथ ‘कहीं नहीं ठहरती भारतीय संस्कृति’ का अंदाजे बंया भी अपने अपने अंदाज से कर मीडिया में स्थान भी पाते ही हैं। इस लिहाज से आयोजन की सार्थकता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता!
अपनी कला संग कलाविद  राम जैसवाल 
इस समग्र परिप्रेक्ष्य में राजस्थान ललित कला अकादमी की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि बगैर किसी काॅरपोरेट सहयोग, इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के ‘कला मेला’ ने लोकप्रियता के भी नए मुकाम बनाए। कलाएं अतीत, वर्तमान और भविष्य की दृष्टि को पुनर्नवा करती है। और हां, देखने और सुनने का संस्कार भी कहीं ठीक से मिलता है तो वह कलाएं ही हैं। विष्णु दिग्म्बर पलुस्कर ने कभी कहा था, ‘हमें तानसेन नहीं कानसेन बनाने हैं।’ इसमें निहित भाव पर जाएंगे तो यह भी पाएंगे कि कलाओ और साहित्य के उत्सव, मेले भले कलाकार नही ंबनाएं परन्तु कला रसिक या पाठक यदि तैयार करती है तभी उनकी सार्थकता है। आप क्या कहेंगे!

Saturday, December 23, 2017

अर्थ-लय का गुंजन – ‘दीठ रै पार’

  

         दैनिक नवज्योति, रविवारीय में कविता संग्रह 'दीठ रै पार' पर सुप्रशिद्ध कवि, आलोचक डॉ. आईदान सिंह भाटी ने लिखा है।         उनके शब्द ओज से नहाते ही साहित्य को जिया है. आभार सहित उनके लिखे को यहाँ साझा कर रहा हूँ.

डॉ॰ राजेश कुमार व्यास आधुनिक राजस्थानी भाषा के  समर्थ और कला-पारखी कवि है, जिनकी कविताएँ अपनी अर्थवता और रूप-विधान के सौन्दर्य को प्रकट करती है | उनके इस कविता संग्रह  ‘दीठ रै पार’ में उनकी चार मनगतों के रूप सामने आते हैं जो, जूण जातरा, अंतस रो उजास, रंगोसुखन और सुर री देही के रूप में रचे गए हैं | वे शब्द-मितव्ययी कवि हैं और अपनी बात को ‘अर्थ की विरल छटाओं’ के रूप में अभिव्यक्ति देते हैं | उनके इससे पहले वाले कविता-संग्रह ‘कविता देवै दीठ’ में भी इसी तरह की अनुगूंजें थी |
  इस कविता-संग्रह  के ‘जूण जातरा’ खण्ड में वे अपनी मनगत के मौन को ‘भोर के उजास’ और उसके रंगों में नृत्य-रत शब्दों में देखते हैं, जहां मन भाषा के पार चला जाता है | उनकी कविता अदीठ-संगीत के चित्रों में बसती है, जहां बालू के टीले हैं, उस पर मंडराती तितलियाँ हैं, विरल रेगिस्तानी फूलों की छटाएँ हैं और विरल घन-घटाओं की बरसती बरसातें हैं |  प्रीत, पहचान के रास्ते तलाशती कविताओं में जीवन के संघर्षों और मातृभाषा-प्रेम की अनुगूंजें पाठक को मन और दृष्टि के पार ‘इतिहास की जेवड़ी’ तक ले जाती है, जहाँ मानवीय-चालाकियों के अंधकार के बीच प्रकाश की एक किरण कौंधती है | ये कविताएँ ‘दीठ रै पार’ छिपे हुए ‘साच’ को तलाशने का एक जतन है, राजस्थानी भाषा की ‘आफळ’ है –
दीठ रै पार / भींत्यां लुकोड़ै / साच नैं / जोवण री / आफळ है सबद |
रोज नीं आवै / पण / जद भी आवै / कुण? कद? कियां? जैड़ा
सवालां रा लावै पड़ूतर /सबद भांगै भींत / कूड़ नै पाधरो करता /
चलावै कवि-/ सबद-बाण /इणी ढाळै रचीजै / अबखै बगत कविता | (पेज-21)
कवि समय की अबोली-ध्वनियों को सुनने का आग्रह करते हुए, अकालों की विभीषिका और ओळूं की आत्मीयता के शब्द-बिम्ब उकेरता है –
अकाळ:एक 
आंख की कांकड़ है / रोही रो सूनपण / बंजड़ खेत देख / इणगी-उणगी /
मुंडो लुकांवतो फिरै / अड़वो | (पेज-27)
छिंया: दो (पापा री ओळूं)
घर है / भींत्यां है / इंट्यां सूं चिण्योड़ा / घणकरा आळा है / पण
मांय पसर् योड़ा / जाळा है | (पेज-31)
इस संग्रह के ‘अंतस रो उजास’ खण्ड में ‘झाझरको’, ‘सोन चिड़कली’, रूंख, नदी, नाव और सूरज के प्रतीकों से जीवन के रूप-बिम्ब रचता है, जिसमें पहचान की पगडंडिया गुम होती निशान-सीढ़ियों और इच्छाओं की रंगीनियों के बीच मुक्ति के मार्ग खोजती है | अंततः कवि अपना जीवन सार कहता है –
कला है --/  जीवन | / जीवतै मरणो स्थापत्य / मर’र  जीवणो शिल्प | /
अदीठ मांय भी / बचसी वै ही / जका रचसी | (पेज-44)
अरदास और महापरिनिर्वाण शीर्षक कविताएँ जीवनगत सौन्दर्य-दृष्टि, वैचारिता और आध्यात्मिक राहों की बारीकियों को बिम्बित करती है |
   रंगोसुखन और सुर री देही खण्ड की कविताएँ कवि के मन में बसे कला-चिंतक की सौन्दर्य-दृष्टि है, जो सूने मन्दिर, अनन्त आकाश, कैनवस, कांकड़, काळी कांठळ, बादल और चित्रकारों-संगीतकारों के माध्यम से अपनी अन्तस-दीठ का पसराव किया है |  रंगोंसुखन ( एस.एच. रज्जा रै चित्रां सूं अेकमेक हुवतै थकां) कविता में कवि रंगों और रेखाओं के बीच ‘धा-छंद’ की ध्वनियाँ सुनता है और एम्.बालमुरलीकृष्ण व किशोरी अमोणकर को सुनते हुए गहराती रात, तैरते बादल और बरसते उजास को देखता है | कलाओं के अंतर्संबंधो को रचती ये कविताएँ पाठक को शब्दों के पार ले जाती है और एक रूहानी आलोक रचती हैं |  किशोरी अमोणकर को सुनते हुए कविताओं वे चारों ओर उजास की सृष्टि देखते हैं, मन में मूसलाधार बरखा बरसती है, कानों में पवित्र प्रार्थनाएं गूंजने लगती हैं, गहराती रात देह के बिछोह की साख भरती है, स्वर अपनी सुधबुध भूल जाते हैं , इन्तजारती आँखें चलने लगती हैं आदि रूप-चित्रों और छवियों से पाठक को सम्मोहन के जाल में उलझा कर  रूहानी-जगत में ले जाते हैं |
    डॉ॰ राजेश कुमार व्यास का यह काव्य-जगत शब्द की लघिमा-शक्ति से बना है | वे शब्द-लाघव के कुशल कारीगर हैं | बिम्बों और प्रतीकों द्वारा अपनी बात कहने और रूपक रचने में उन्हें महारत हासिल है | कैनवस कविता में इस रूपक को देखें –
कैनवस है / बैंवती नदी / आभो जठै रचै
घाटी,डूंगर / अर जंगळ रो मून | (पेज-68)

 आधुनिक राजस्थानी कविता में डॉ॰ राजेश कुमार व्यास अपने  जीवनगत सौन्दर्य-बोध, चिन्तन-दृष्टि और शब्द की अर्थ-लय को अनुगुंजित करनेवाले विरल कवियों में से एक हैं | राजस्थानी के पश्चिमी भाषारूप की खूबसूरती उनकी कविताओं से रस बन कर टपकती है | उनकी कविताएँ रंगोसुखन और सुर के खूबसूरत झकोरे हैं |

Thursday, November 2, 2017

लोक संस्कृति का उजास बिखेरती वह विरल गायिका


अल्लाह जिलाई बाई  का गाया ‘पधारो म्हारे देस...’ जितनी बार सुनेंगे, मन करेगा सुनें। सुनते ही  रहें। उनके गान में राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगती है। स्वरों में लोक का माधुर्य ऐसा, जिसे सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है।...
मधुर और श्रृंगारिक राग है मांड। आरोह-अवरोह में वक्र सम्पूर्ण राग। संगीत की विष्णु नारायण भातखंडे की परम्परा की मानें तो मांड राग बिलावल थाट में आता है परन्तु सुनते हैं तो मांड का लोक संगीत मिश्र राग में ध्वनित होता लगेगा। स्व. अल्लाह जिलाई बाई का ‘पधारो म्हारे देस...’ तो मांड का पर्याय ही हो गया है। उनके स्वर माधुर्य में जितनी बार सुनेंगे, मन करेगा सुनें। सुनते ही  रहें। 
अल्लाह जिलाई बाई ने वर्षों तक लोक संगीत की भारतीय पंरपरा को न केवल संजोकर रखा बल्कि राजस्थानी लोकसंगीत को भी एक नया आयाम दिया। उन्हें संगीत विरासत में मिला। पांच वर्ष की अल्पायु में ही अल्लाह जिलाई अपनी मां के साथ बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिहं के दरबार में गायन हेतु जाने लगी। जब उनकी मां दरबार में गाती तो वह खूब ध्यान से मां के गाए गीत सुनती। इन्हें फिर वह गुनगुनाती भी। ऐसे ही उनकी गुनगुनाहट को एक दिन उस्ताद हुसैन खां ने सुन लिया। फिर क्या था हुसैन साहब ने उन्हें अपनी षिष्या बना लिया। हुसैन खां से 8 वर्ष की उम्र से ही विधिवत संगीत की तालिम लेते अल्लाह जिलाई ने अल्प अवधि के दौरान ही गायन की बारीकियों को ग्रहण कर लिया। हुसैन साहब की जल्द ही मृत्यु हो गयी परन्तु उनसे जो अल्लाह जिलाई ने सीखा उसे ता उम्र अपने तई संजोकर रखा। संगीत तालीम के अंतर्गत बाद में बीकानेर राजघराने की ओर से राजघराने के प्रतिष्ठित गुणीजन खाना (संगीत तालीम का केंद्र) में उन्हें भर्ती करवा दिया गया। गुणीजन खाने के अंतर्गत बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज से अल्लाह जिलाई ने कत्थक की शिक्षा भी प्राप्त की। लच्छू महाराज, अमीर खां, शमशुद्दीन आदि का भी उन्हें इस दौरान निरंतर सानिध्य प्राप्त हुआ। हालांकि वे नृत्यांगना नहीं थी परंतु नृत्य उनसे कभी दूर भी नही रहा। जिस अंदाज से वह गाती उसमें आरोह-अवरोह का अंदाज वह शायद अपने भीतर की नृत्यांगना से लेती थी। यही कारण था कि उनकी खनकदार आवाज के साथ स्वतः ही ताल शुरू हो जाता था। 
ठुमरी दादरा, ख्याल तथा पारंपरिक राजस्थानी गायन में अल्लाह जिलाई बाई जैसे लोक का उजास रचती थी। शास्त्रीय आधार पर गांठ, चैताला, उडी, झूमरा आदि कठिन तालों में भी वह गाती तो जैसे स्वरो ंका आकाष बनता। राजस्थानी प्रेमाख्यान, महेन्द्र मूमल, रतन राणा सांवरिया की पाल, ढांेला मारू आदि माड गीतों में अल्लाह जिलाई बाई ने अपने सधे स्वर का जो जादू बिखेरा वह आज भी दिल में घर करता है। गायकी में फिरत ओर धुमावदार तानों भरी गूंजती खनकती आवाज की अल्लाह जिलाई बाई अद्भुत संगीत साधिका थी। 
राजस्थानी लोकसंगीत की विभिन्न परंपराओं को अपने कंठों में समेटे अल्लाह जिलाई बाई ने दादरा, ठूमरी, कजरी, व होली के गीतों को भी जैसे जिया। राग देस, सारंग, आाशा खमाज, जैजैवंती, सोरठ, झिंझोटी तथा अन्य विविध रागों को कुशलता से अपने सुरों में साधते उन्होंने जो भी गाया, उसे मन से जिया। ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारा देस..’, ‘बाई सा रा बीरा म्हाने पिहरिये ले चालो सा...’, आदि माड गीतों की उनकी खनकती आवाज आज भी फ़िजा में जैसे रस घोलती है।
अल्लाह जिलाई बाई ने न केवल राजस्थानी लोकसंगीत को ख्याति दिलाई बल्कि लोक गायन परंपरा को भी शास्त्रीय गायन की ही तरह उच्च स्थान दिलाया। वर्ष 1987 में लंदन में ‘वल्र्ड कोर्ट सिंगर कांफें्रस’ में भारत का प्रतिनिधित्व करते अल्लाह जिलाई बाई ने दुनिया भर के इकट्ठा हुए संगीतकारों में यह साबित किया कि राजस्थान का लोक संगीत मिट्टी की सौंधी महक लिए ऐसा है जिसे कभी बिसराया नहीं जा सकता। याद पड़ता है, लोकगीतों की माड गायन परंपरा के संबंध में अल्लाह जिलाई बाई से इस लेखक ने एक मुलाकात में पूछा था तो उन्होनें कहा था, ‘माड दूहों की ही अलंकृति है।’ 
अल्लाहजिलाई बाई ‘पधारो म्हारे देस...’गाती तो पावणों की मेजबानी की राजस्थानी संस्कृति के दृष्य चितराम भी अनायास आंखों के सामने घुमने लगते हैं। उनके गाए ‘सुपनो,’ ‘हेलो, ‘जल्ला’, ’ओळ्यू’, ‘कलाली’, ‘कुरंजा’ गीतों को सुनेंगे तो राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगेगी। उनके स्वरों में लोक का माधुर्य सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है। 
बीकानेर टाऊन हाल में अपने अंतिम कार्यक्रम में अल्लाह जिलाई बाई ने ‘केसरिया बालम’, ‘गोरबंध’, ‘मूमल’, तथा ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है’ जैसे गीत, गजल प्रस्तुत करते अपनी बेहतरीन गायकी का ढलती उम्र में भी अहसास दिलाया था। 90 वर्ष की आयु में 3 नवंबर 1992, अल्लाह जिलाई बाई ने हम सबसे सदा के लिए विदा ले ली परंतु ‘पधारो म्हारे देस...’ के उनके सुर क्या कभी हमसे जुदा होंगे...?
-'राष्ट्रीय सहारा', 3 नवम्बर 2017