Friday, October 26, 2018

छायांकन की सूझ से हो पर्यटन का विपणन

तुर्की के बीचोबीच बसे कैपाडोसिया शहर में इस वर्ष के आरंभिक छह महिनों में 66 लाख से अधिक पर्यटकों ने पर्यटन किया है। असल में कैपाडोसिया के प्राकृतिक और कलात्मक सौंदर्य का एक बेहतरीन छायाचित्र तुर्की के कायरेनियान में रहने वाले छायाकार अल्तुग गलिप ने लिया था और उसे इंस्टाग्राम पर डाल दिया। यह लोगों को इस कदर भाया कि कैपाडोसिया औचक विष्व पर्यटकों की नजर में आ गया। तुर्की की राजधानी इस्तांबुल से कोई एक घंटे की दूरी पर बसे कैपाडोसिया को 499 ईसापूर्व में पहाड़ो को काटकर बसाया गया था। इसमें बेषक यह शहर अपने निर्माण की खूबसूरती लिए है परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यहां यह है कि एक सुंदर छायाचित्र के कारण पर्यटकों में यह इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि 6 माह में 66 लाख पर्यटक वहां पर्यटन के लिए पहुंच गए।
पर्यटन उद्योग का मूल आधार पर्यटक ही हैं। किसी स्थान पर जितने अधिक पर्यटक पहुंचते हैं, उस स्थान का जीवन स्तर उतना ही उच्च से उच्चतर होता चला जाता है। बहुत से देषों की अर्थव्यवस्था का तो आधार ही इस रूप में आज पर्यटन ही है। पर इधर पर्यटन स्थलों का विपणन वहां उपलब्ध सुविधाओं के पैकेज रूप में हो रहा है। यह ठीक है इससे पर्यटक आकृष्ट होते हैं परन्तु पर्यटन आमंत्रण का मूल मंत्र तो स्थान-विषेष के सुंदर छायाचित्र ही है। तूर्की का कैपाडोसिया शहर इसी का ताजा उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि ऐसे स्थान और नहीं है, और भी बहुतेरे हैं परन्तु पर्यटकीय दीठ से आमंत्रण भरे उनके छायाचित्र कहां इस तरह से प्रकाष में आ पाते हैं। पर्यटन स्थल सुंदर हो, यह जरूरी है परन्तु इतना ही जरूरी यह भी है कि उसका छायांकन भी बेहद सधे रूप में खूबसूरती से संजोया जाए। 
भारतीय पर्यटन की बात करें तो एक से एक बढ़कर हमारे यहां पर्यटन आकर्षण है। स्थानांे की विविधता है। वहां का रमणीय वातावरण है परन्तु उनके जो छायाचित्र वेब पोर्टल पर या फिर पर्यटन विपणन के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं, उनकी बड़ी सीमा यह है कि वहां नवीनता नहीं है। कष्मीर की हसीन वादियां पर्यटन आमंत्रण के छायाचित्रों में है परन्तु डल झील की सांझ और षिकारों से छनकर आती रोषनी केी सुरम्य छटा बहुत कम देखने को मिलती है। ऐतिहासिक स्थानों की खूबसूरती के भी वही छायाचित्र बरसों से उपयोग में लिए जा रहे हैं, जो आज से कोई दषकों पूर्व संजोए गए थे। मुझे लगता है, पर्यटन स्थलों में समय के साथ बहुतेरा बदलाव आता है। वहां का परिवेष बदलता है, संस्कृति में परिवर्तन हेाता है-यह सब यदि विषिष्ट दृष्टि से छायांकन में संजोकर उसे पर्यटन विपणन का माध्यम बनाया जाए तो इसके बेहद अच्छे परिणाम पर्यटन वृद्धि के रूप में सामने आ सकते हैं।
छायाकला दृष्य-रूपों की मौन मुखराभिव्यक्ति है। इसमें देखना ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि दृष्य के भीतर निहित सौन्दर्य की दीठ भी महत्वपूर्ण होती है। यह छायाकला ही है जिसमें अंतर्मन संवेदना के जरिये छायाकार बहुतेरी बार दृष्य मंे निहित सौन्दर्य को कईं गुना अधिक सघनता से मुखरित कर देता है। पर्यटन स्थलों में जो कुछ दिख रहा होता है, वही महत्वपूर्ण नहीं होता है। महत्वपूर्ण उस स्थान का इतिहास होता है, वहां की प्रकृति होती है, वहां का परिवेष होता है और महत्वपूर्ण वहां की धरा की वह विषेषता होती है जो ओर स्थानों से जुदा होती है। छायांकन में यदि इन सभी को सहेजा जाता है, तभी उन छायाचित्रों की सार्थकता है।...और इसके लिए संवेदन दीठ का होना जरूरी है। इस दृष्टि से होना यह भी चाहिए कि पर्यटन स्थलों के छायांकन के लिए छायांकन कला की गहरी सूझ वाले छायाकारों से उनकी फोटोग्राफी करायी जाए। उनका फिल्मांकन करवाया जाए। 
कैमरा कोरा यंत्र ही है, यदि उससे स्थानों की संवेदना के चितराम सामने नहीं आए। पर कैमरा कला का माध्यम हो सकता है, बषर्ते उसे बरतने वाला सधा हुआ हो। यथार्थ दृष्य की बजाय कैमरे की आंख का संवेदन रूपान्तरण अधिक महत्वपूर्ण होता है और यही पर्यटन स्थलों के लिए जरूरी भी होता है कि उन्हें देखने के लिए छायाचित्रों के जरिए उत्सुकता जगे। विषय-वस्तु के साथ स्थानों की हलचल, परिवर्तनों की आहट और तमाम परिवेष की संवेदना, क्षण की अपूर्वता और उसमंे निहित गति को कैमरा तभी संजो सकता है, जब उसे बरतने वाला कलाकार हो। इसीलिए मैं कहता हूं कि छायांकन कला है। ऐसी जिससे बहुतेरी बार साधारण दृष्य भी कला दीठ से असाधरण प्रतीत होने लगते हैं।
दृष्य संयोजन की गहरी सूझ इसके लिए जरूरी है। माने धोरे हैं तो उनकी लहरें और रेत पर पदचिन्हों, ढलती सांझ या उगते सूर्य के साथ कैद इस तरह से किया जाए कि दृष्य अद्भुत लगे। समन्दर है तो कैसे वह मौन मंे भी देखने वाले से संवाद करे, ऐतिहासिक इमारत है तो कैसे वहां अतीत झिलमिलाए और प्राकृतिक कोई पार्क है तो कैसे उसकी विषेषताएं देखने वालों को चमत्कृत करे, उसके सौंदर्य से मुग्ध करे। यह सब होता है तभी पर्यटन के लिए स्थान विषेष के लिए हम आकर्षण पैदा कर सकते हैं। स्वाभाविक ही है कि इसके लिए कैमरे को बरतने वाली आंख किसी कलाकार की होनी चाहिए। अभी कुछ समय पहले ही नालन्दा जाना हुआ। साथ में छायाचित्रकार मित्र शैलेन्द्र भी था। नालन्दा के मूल स्थल को हर कोई कैमरे से पकड़ता है परन्तु शैलेन्द्र ने वहां छोटे-छोटे बने प्राचीन मंदिरों का अद्ुत दृष्य अपने कैमरे में संजोया था। उनका यह चित्र जब मीडिया में प्रसारित हुआ तो बहुतों ने नालन्दा के उस नव्य रूप को देखने के लिए मंषा बनाई। ऐसा ही तब भी हुआ जब किसी सांस्कृतिक संध्या के  नृत्य कार्यक्रम को छायाकार मित्र महेष स्वामी ने अपने कैमरे से अंवेरा। छाया-प्रकाष के संयोजन के साथ कृत्रिम धूंए के साथ पद संचलन की युगल भंगिमाएं कैमरे में उसने इस तरह से संजोयी कि मन किया उस दृष्य को फिर से देखें और निरंतर जीएं। मेरे अध्ययन कक्ष में लगे इस चित्र से मैं बहुत दूर तक कुछ गुनता-बुनता विचार की यात्रा करने चला जाता हूं। छायांकन कला यही करती है, दृष्य को सदा के लिए आपमें बसा देती है।
पर्यटन दीठ से स्थान विषेष के वास्तु सौन्दर्य की सूक्ष्म अभिव्यंजना छायांकन ही बेहतर ढंग से कर सकती है। बीकानेर हजार हवेलियों वाला शहर माना जाता है, परन्तु पर्यटन मानचित्र में इसकी यह पहचान नहीं है। छायाकार मित्र मनीष पारीक और ओम मिश्रा के कुछ चित्र एक दफा बीकानेर की हवेलियों और वहां के बाजार की हलचल के देखे तो लगा, फिर से मुझे अपने शहर को उस रूप में देखने जाना चाहिए। यह उदाहरण है, पर्यटन में इससे सीख ली जा सकती है। स्थानों को बंधी-बंधाई छवि से मुक्त करते छायाकारों के जरिए नवीन आकर्षण मंें उन्हें पेष किया जा सकता है। इसका यदि सोषल मीडिया के जरिए प्रभावी विपणन होता है तो इसके दूरगामी परिणाम पर्यटन विकास के रूप में सामने आ सकते हैं।  स्थान विषेश की संस्कृति कैसे बरसों-बरस अपनी निरंतरता बनाये रखती है, कैसे वह संस्कारित होती है और कैसे उसमें कलाओं की अनुगूंज को सुना जा सकता है, इसे छायाचित्रों के जरिए ही गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि छायांकन कला के महत्व को पर्यटन की दृष्टि से परोटा जाए।
कहा भी जाता है कि जो कार्य हजार शब्द नहीं कर सकते वह एक फोटोग्राफ कह देता है। मुझे लगता है, यह छायांकन कला ही है जो सुदर को सुंदरतम करने का कार्य करती है। पर्यटन स्थलों के संदर्भ में तो यह कला संजीवनी है। यानी इसके जरिए पर्यटन स्थलों का बेहद आक्रामक प्रचार किया जा सकता है। उन स्थानों का भी, जो धीरे-धीरे अतीत बनने की ओर अग्रसर है। खण्डहर होते किलो, शहरों, मंदिरों के वैभव को उनके यथार्थ में भी छायाकार इस खूबसूरती से अंवेर लेता है कि वे स्थान देखने की उत्सुकता मन में जंगने लगती है। बहुतेरी बार यह भी होता है कि स्थान इतने सुंदर नहीं होते जितना छायाकार अपनी आंख से उसे दिखा देता है। छायांकन में वह यथार्थ भी देखा जा सकता है जो आमतौर पर हमारी नंगी आंखे देख नहीं पाती है। गति का क्षणाषं भी छायांकन कला के जरिए सदा के लिए सहेजा जा सकता है। 
कहते हैं, अमेरिका में घोड़ों की दौड़ में दिलचस्पी रखनेवाले धनाढ्य वर्ग में इस बात को लेकर एक दफा चर्चा हुई कि घोड़े जब दौड़ते हैं, तो एकाध क्षण की स्थिति ऐसी आती है, जब उनके चारों पैर हवा में होते हैं। पर इस तथ्य की वास्तविकता का पता कैसे चले? इसी संदर्भ में कैलिफोर्निया के गवर्नर लीलेंड स्टेंफोर्ड ने 1872 में यह पता लगाने के लिए प्रयोग शुरू किया। माध्यम था, कैमरा। सैनफ्रांसिस्को के फोटोग्राफर एडवर्ड मेब्रिज को इसकी जिम्मेवारी सौंपी गयी। मेब्रिज ने कोशिश की, पर सफलता नहीं मिली। नहीं जो चित्र लिये गये वह इतने धुंधले और अस्पष्ट थे की कुछ अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। कोई पांच वर्ष के बाद उन्होंने एक इंजीनियर की मदद से एक नया प्रयोग किया। इसके तहत 24 कैमरों को एक पंक्ति में सेट किया गया और सभी को बिजली के तार से जोड़ दिया गया. बटन दबाने पर उनमें बिजली सप्लाइ होती थी, जिससे प्रत्येक कैमरे के शटर उसी क्रम में खुलते और बंद होते थे। इसके बाद बटन दबाते ही घोड़े के गति के साथ-साथ विद्युत प्रवाहित होने के कारण सभी कैमरे एक के बाद एक स्पष्ट छायाचित्र लेने में सफल हो सके. इसीलिए कैमरे उस क्षणांश को पकड़ने में कामयाब हो सके जब घोड़े के चारों पैर हवा में थे। 
पर्यटन के अभी जो नए रूप सामने आ रहे हैं, उनमें इसी तरह के छायाचित्र यदि संजोए जाते हैं तो उनका विषेष प्रभाव पर्यटन आकर्षण में हो सकता है। कैमरा तो अब इस कदर तकनीक से लैस हो गया है कि हम उसके जरिए सूक्ष्म से सूक्ष्म को भी विराट में और विराट को भी सूक्ष्म सौंदर्य से संजो सकते हैं। बहुत से स्थानों पर कोई खास समय या मौसम ऐसा होता है जब वह स्थान अप्रतीम सौंदर्य को अंवेरता है। ऐसे समय में उस स्थान-विषेष की छायाकारी यदि की जाती है और उसे पर्यटन विपणन के तहत उपयोग में लिया जाता है तो उस स्थान विषेष पर अपार पर्यटकों को आमंत्रित किया जा सकता है। 
हाल ही में अमेरिका के छायाकार डेविड डाइनेट द्वारा  वहां के  जियन नेषनल पार्क का एक फोटो दुनियाभर में टूरनेट से प्रसारित हुआ।  इसमें जंगल, पहाड़, रेगिस्तान और नदी एक साथ दिखाई दे रहे थे।  अमेरिका का यह नेषनल पार्क 593 वर्गकिलोमीटर में फैला है और वर्जिन नदी यहां लाल और भूरे रंग के बलुआ पत्थरों को काटते हुए बेहद खूबसूरत रूप में दिखाई देती है। पार्क और भी हैं परन्तु अमेरिका के इस नेषनल पार्क का छायाचित्र कुछ इस एंगल से छायाकार ने लिया कि नेट पर इसे देखकर ही बगैर किसी प्रचार के 45 लाख पर्यटक प्रतिवर्ष वहां पहुंचने लगे।
बहरहाल, आॅस्ट्रेलिया का टूरिज्म बोर्ड ‘आस्ट्रेलिया’ नाम से बने इंस्टाग्राम का संचालन करता है। सुंदर, अद्भुत दृष्यों के कैमरे से हुए क्लिक के ‘आस्ट्रेलिया’ इंस्टाग्राम पेज को 32 लाख से अधिक लोग फाॅलो करते हैं। पर्यटन आकर्षण का आज यह महत्ती मंच बन गया है। कुछ समय पहले इस पर आष्ट्रेलिया के ‘कोरल बे’ समुद्री क्षेत्र में सफेद रंग की बड़ी शार्कव्हेल का छायाचित्र ख्यात अंडरवाटर फोटोग्राफर टाॅम केनन ने अपलोड किया था। यह इस मछली के छायाकार द्वारा लिये छायाचित्र का ही कमाल था कि बेषूमार पर्यटक नौकाओं से अब ‘कोरल बे’ समुद्री क्षेत्र में इस मछली को देखने भर को आने के लिए आकृष्ट हो गये हैं।
इटली के वेनिस का ही उदाहरण लें। नदियों पर बनी नहरों पर बसे इस शहर में शाम को पर्यटक नौकायन करते हैं। रूस के फिल्म निर्माता, फोटोग्राफर एवं घुम्मकड़ वादिम शरबाकोव ने एक सांझ को बेहद खूबसूरती से कैद किया। सूरज ढलते समय आसमान पर छाये सिंदूरी, लाल और काले रंग के साथ रोषनी में नौकाओं का उनके कैद दृष्य ने वेनिस की खूबसूरती में जैसे चार चांद लगा दिये। अमेरिका की मषहूर ‘पाॅपूलर फोटोग्राफी’ पत्रिका में छपे वेनिस के उस बेहतरीन छायाचित्र की पाण ही वहां का पर्यटन ग्राफ एक माह में ही तीगुना-चैगूना हो गया। 
भारत में तो पर्यटन स्थलों में विविधता का अपार आकर्षण है। समृद्ध जैव विविधता के साथ ऐतिहासिक धरोहरों, समन्दर, नदियों, पर्वत-पहाड़, दूर तक फैला रेगिस्तान और संस्कृति की विरल छटाएं हमारे यहां है। क्या ही अच्छा हो, नवीन दीठ से इन सबको छायांकन कला के जरिए पर्यटन मंत्रालय फिर से संजोए। स्थानों के लिए पर्यटन लेखकों के साथ कलात्मक सूझ के संवेदनषील छायाकारों की यात्राओं करायी जाए और उससे जो परिणाम हासिल होता है, उसे यदि सुदूर देषों तक पहुंचाया जाए तो वृहद स्तर पर भारतीय पर्यटन का प्रभावी विपणन किया जा सकता है। अभी तो इंस्टाग्राम या ऐसे ही टूरनेट के किसी अन्य माध्यम में भारतीय पर्यटन स्थलों का सौंदर्य मौन ही है।

Sunday, October 14, 2018

अर्थ की विरल छटाओं से साक्षात


परीक्षित सिंह के पास कहन का अपना मुहावरा है। उनकी कविताएं बंधे-बंधाए ढर्रे से परे चिंतन का ऐसा आकाष रचती है जिसमें अर्थ की विरल छटाओं से हम साक्षात् होते हैं। यहां शब्द की अर्थगर्भित भंगिमाएं ऐसी है जिनमें मौन को भी सुना और बांचा जा सकता है।
बहरहाल, उनका सद्य प्रकाषित काव्य संग्रह ‘स्वयं का घुसपैठिया’ अंतर्मन संवेदनाओं का एक तरह से उजास है। इसमें जीवनानुभूतियों के बहाने मन के भीतर की जैसे कवि ने खोज की है। काव्य संग्रह का आस्वाद करते बहुतेरी बार उनका कहन लुभाता है, वह ‘कुटनीति में प्रतीति/ और पीड़ा में क्रीड़ा/हृदय की चित्कार अनंत शांति’ जैसे शब्दों में भविष्य और वर्तमान को कविता की अपनी आंख से देखते हैं हमें जैसे शब्द-षब्द पुनर्नवा करते हैं।
संग्रह में भावों का अथाह समन्दर है। वह आकाष भी जिसमें  ‘बहुत सालों से चुपचाप सुन रहा हूं मैं/ तुम्हें/मेरे पुरोहित/इन संस्कृत-ष्लोकों में कुछ दिख जाए/जो भी हो समाहित’ सरीखी दार्षनिक व्यंजना है तो ‘षून्यगत में शून्य/बस एक बिंदु’ जैसे शब्दों के बहाने वर्तमान समय को गहरे से जिया गया है। मुझे लगता है, अनपी इन कविताओं के जरिए वह पाठक को उस लोक में ले जाते हैं जहां  व्यक्ति अपने होने की तलाष करता है। इस दीठ से उनकी यह कविताएं व्यक्ति और उससे जुड़े सरोकारों में जीवन का आंतरिक अन्वेषण भी है। इनमें अपने शहर से जुड़ी स्मृतियों का आलोक यहां है तो संस्कृति की सुरभि भी है।  अपने आपको खोकर, राहें मिटाकर अपनों तक  कैसे जाने की प्रष्नाकुलता में वह जैसे भौतिकता में बदले जीवन मूल्यों की साख भरते हैं तो अह्म से अंतरंग सामीप्य में प्रकाषनमान माॅं के नेत्रों से जैसे सारा जहां पा लेते हैं।  लड़की के प्रेम में उसका आसमान हुआ चेहरा इन कविताओं में झिलमिलता है तो वैराग्य में लिप्त होने में लुप्त होने के विरल भाव भी कविता ने संजोए है।
बहरहाल, यह महज संयोग ही नहीं है कि परीक्षित सिंह की इन कविताओं को पढ़ते हुए ‘पूर्णमिद्म’ के भारतीय दर्षन से भी औचक साक्षात् होता है। हमारे यहां कहा गया है, पूर्ण में से यदि पूर्ण निकाल दिया जाए तो भी पूर्ण ही बचता है। इन कविताओं का स्वर भी कुछ ऐसा ही है कि इनमें शब्द अपनी अर्थगर्भिता में कविता के समाप्त होने के बाद भी हममें बचे रहते हैं। इसीलिए उनकी संग्रह की एक कविता में ‘मेरा शून्य पूरा कर दो’ जैसी मार्मिक व्यंजना में प्रकृति से अनूठा संवाद है। इन कविताओं में वह ‘दर्पण में एक और दर्पण’ और ‘व्योम में चक्रमान एक और व्योम’, ‘सभी रोषनियां साये हैं’, ‘वह कैसा व्यक्ति था/जो अपनी श्रद्धांजलि/स्वयं लिख गया’ जैसे शब्द ओज में भूत, भविष्य और वर्तमान को अपने तई गहरे से अंवेरा गया है। बहुतेरी कविताओं में जीवन से जुड़ी विसंगतियों और विडम्बनाओं का चित्रण तो है परन्तु आषा के वह स्वर भी है जिसमें व्यक्ति तमाम द्वन्दों से बाहर निकल सकता है, बषर्ते अपनी खोज की राह को बंद न करे। एक प्रकार से उनकी कविताएं अंतर की खोज का आह्वान है, जरा गौर करें इन पंक्तियों पर-‘अग्नि की ज्वाला भी/स्वर्णिम फूल है/जिसकी पंखुड़ियां/एक-एक कर खुलती है/जैसे कलियां।’
परीक्षित सिंह के पास कहन का अपना मुहावरा है और अनूठा सौंदर्य बोध भी है। इसमें ‘अंत में बचता है क्या/कुछ भी तो नहीं/थोड़ा-सा प्रेम/कुछ आराधना/बूझती रोषनियां।’ की शब्द व्यंजना में जैसे उन्होंने गागर में सागर भरा है।
‘स्वयं का घुसपैठिया’ संग्रह की कविताओं में अंतर्मन संवेदनाओं के अन्वेषण के बहाने प्रेम, आस्था, दर्षन और अध्यात्म की लूंठी-अलूंठी व्यंजना की गयी है। भाव-चिंतन की गहराईयों में ले जाती यह कविताएं मन के झरोखे में दृष्य का विरल भव रचती है। यह महत्वपूर्ण है कि इन कविताओं में दर्षन की गहराईयां तो है ही, साथ ही मौन का स्वर भी इनमें अंतर उपजे भावों से सुना जा सकता है।  कविताओं के साथ रविन, रंजन बंदोपाध्याय, अरणी चैधुरी के चित्र भी मन को रंजित करने वाले हैं।


Tuesday, September 25, 2018

सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के साथ नये पर्यटन क्षेत्रों का हो समुचित विकास


केन्द्र सरकार द्वारा देश में इस बार 16 से 27 सितम्बर तक राज्य सरकारों के सहयोग से पर्यटन पर्व की  पहल की गयी। इसके तहत पर्यटन के लाभों पर ध्यान केन्द्रित करने, देश की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने औरसभी के लिए पर्यटनके सिद्धान्त को मजबूत करने पर जोर दिया गया। यह सही है, ऐसे आयोजनों से पर्यटन प्रोत्साहन होता है, कुछ समय के लिए पर्यटकों का आगमन भी बढ़ता है परन्तु मूल बात यह है कि पर्यटन उद्योग के विकास के साथ इधर जो चुनौतियाॅं जुड़ी है, जो समस्याएं उभर रही है-उन पर कितना हम गंभीर हैं। पर्यटन विपणन का तमाम जोर देश में इस बात को लेकर है कि पर्यटकों की संख्या में अधिकाधिक वृद्धि हो। यह ठीक है, पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की वृद्धि ही पर्यटन उद्योग का उद्देष्य है। आखिर विदेशी मुद्रा प्राप्ति और सकल घरेलू आय में इसी से वृद्धि हो सकती है परन्तु पर्यटन क्षेत्र में इस बात को भी देखे जाने की जरूरत है कि स्थान विषेष पर पर्यटकों के बढ़ते दबाव से कहीं वहां का वातावरण तो प्रभावित नहीं होने लगा है।

अभी हाल के एक समाचार के अनुसार जापान में पर्यटकों का दबाव इतना अधिक हो गया है कि उससे वहां अत्यधिक गर्मी और पर्यावरण पर संकट गहरा गया है। रिकियो यूनिवर्सिटी कॉलेज आॅफ टूरिज्म के प्रोफेसर तोरू अजुमा का कहना है कि पर्यटकों की भीड़, गाड़ियों की संख्या, बढ़ती गर्मी और प्रदूषण दुनिया के लिए आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती होगी। भारत में ही देखें,  कुछ समय पहले शिमला में हालात यह हो गए थे कि वहां के प्रशासन को बाकायदा मीडिया में प्रसारित करना पड़ा कि पानी की इस कदर कमी वहां हो गयी है कि अब और पर्यटक शिमला नहीं आएं। नैनीताल, कुल्लू-मनाली, डलहौजी, जैसलमेर, पुष्कर, खजुराहो आदि पर्यटन के अधिक दबाव और असंतुलित पर्यटन के कारण आज सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। प्रचलित पर्यटन स्थलों पर वाहनों से इस कदर जाम होने लगे हैं कि आम आदमी की दिनचर्या उससे गहरे से प्रभावित हो रही है। होटलों में, वहां के स्विमिंग पूल में बेतहाशा पानी के उपयोग से पेयजल की कमी से भी बहुत से पर्यटन स्थल इस समय इस कदर जूझ रहे हैं कि आने वाले समय के बारे में सोच के ही सिहरन होती है। हम पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों के आगमन के बढ़ते आंकड़ों से इस कदर खुश हो रहे हैं कि पर्यटकों के दबाव से होने वाली दूसरी समस्याओं पर हमारा ध्यान ही नहीं जा रहा है।

पर्यटन प्रचार का जो साहित्य प्रचार और प्रसारण केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर  होता है उसमें चिर-परिचित स्थानों पर ही अधिक जोर रहता है। पर्यटन विपणन का हाल भी यही है कि हम जाने-पहचाने स्थानों से इतर पर्यटन स्थलों के विकास या वहां पर्यटकीय दृष्टि से संभावनाओं पर विचार ही नहीं करते। इसी कारण देश के अधिकांष जाने-माने पर्यटन स्थल इस समय पर्यटकों के अधिक दबाव से ग्रस्त बहुत सारी और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हुए जा रहे हैं।  जितना पर्यटकों के पहुंचने से वहां फायदा होता है उससे कहीं अधिक जरूरत उन स्थानों की सार-संभाल की होने लगी है। अत्यधिक दबाव से पर्यटन का जो लाभ स्थानों पर होना चाहिए वह नहीं हो रहा उलटे पर्यटन अर्थव्यवस्था में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान के निदेशक मित्र संदीप कुलश्रेष्ठ ने कुछ समय पहले अपने संस्थान द्वारा देशभर के पर्यटन स्थलों पर स्वच्छ पर्यटन की चलाई मुहिम में दिखाए जाने वाली एक विडियो फिल्म दिखाई। हालांकि इसमें स्वच्छता के लिए किए प्रयासों का सांगोपांग चितराम है परन्तु गंदगी से बेहाल हो रहे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की वह तस्वीर इसमें इस कदर डरावनी है कि लगता है पर्यटन के अत्यधिक दबाव से बहुत से स्थल कचरे का ढ़ेर बनते जा रहे है। सुखद है, स्वच्छ भारत, स्वच्छ पर्यटन जैसी मुहिम से कुछ सकारात्मक हुआ है।

बहरहाल, जरूरत इस बात की है कि पर्यटन दबाव से ग्रसित स्थानों का विकल्प तलाश जाए। अल्पज्ञात परन्तु पर्यटन संभावना वाले स्थानों को चिन्हित कर वहां पर्यटन का प्रसार किया जाए। राजस्थान की ही बात करें। राजस्थान में बहुत से ऐसे अल्पज्ञात स्थल हैं जहां पर अपार पर्यटन संभावनाएं मौजूद है। राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मित्र अजयसिंह राठौड़ ने राजस्थान के 200 से अधिक पक्षियों के छायाचित्र अपने कैमरे से संजोया है। वन्यजीवों के दुर्लभ क्षण क्षणों की छायाकारी उन्होंने की है। राजस्थान के अल्पज्ञात स्थलों को भी उन्होंने अपने कैमरे से संजोया है। उनके छायांकन आधार पर ही प्रदेश के नए पर्यटन स्थलों को पर्यटन नक्शे पर लाने का कार्य किया जाए तो बहुत कुछ महत्वपूर्ण हो सकता है। याद है, अपने कैमरे की दीठ से एक दफा राजस्थान के ऐसे किले, महलों, गुफाओं, नदियों और झरनों के पास वह ले गये जो इस नाचीज़ घुम्मकड़ के लिए भी अदेखे थे। लगा, देशभर का भ्रमण कर लिया पर अपने राजस्थान में तो अभी भी बहुत से स्थानों को जिया ही नहीं है। यह भी कि राजस्थान में बहुत कुछ अभी भी ऐसा है जिसे पर्यटन की दृष्टि से समझा और सहेजा ही नहीं गया है। मसलन झालावाड़ की बौद्ध गुफाएं, पांडवो के अज्ञातवास के स्थल विराटनगर की अप्रतीम चट्टानें, चम्बल नदी का वह क्षेत्र जहां पर जल का सागर ही नहीं है बल्कि बहुत सारे पानी के जीवों का सुरम्य लोक है, बूंदी की चित्रशाला, सवाईमाधोपुर का 12 वीं सदी के इतिहास को जीता खंडार किला, बांरा के शाहबाद, शेरगढ़ फोर्ट, करौली के तिमनगढ़ आदि बहुत से ऐसे स्थल जो पर्यटन के नक्शे पर नहीं है, परन्तु पर्यटन की अपार संभावनाएं वहां मौजूद है।

अभी कुछ समय पहले ही बिहार संग्रहालय में एक व्याख्यान देने के लिए पटना जाना हुआ। वहां के पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान में मुख्यमंत्री के सलाहकार अंजनीकुमार सिंह आग्रह कर अपने कला संग्रहालयनुमा निवास स्थान  ले गये। पता चला, बिहार जैसे राज्य में उनकी पहल से बहुत कुछ सांस्कृतिक नया हुआ है। उनकी पहल से ही पटना में पृथक से बिहार संग्रहाल की स्थापना की गयी है। कईं एकड़ में बना यह देश का ऐसा संग्रहालय है जो पुरातत्व की वस्तुओं का ही भंडार नहीं है बल्कि बिहार की संस्कृति के जीवंत रूप वहां हैं। अंजनीकुमार सिंह कला-संस्कृति की गहरी सूझ रखते हैं। उन्होंने बिहार के अल्पज्ञात स्थलों का भी विकास पर्यटकीय दृष्टि से किया है। उनके सौजन्य से ही नालन्दा यात्रा के दौरान राजगीर के पास एक स्थल घोड़ा कटोरा जाना हुआ। पहाड़ों के मध्य सुंदर सी झील वहां है और हाल ही में उसके ठीक मध्य में बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना की गयी है। राजगीर से कोई सात किलोमीटर दूर इस स्थान पर पर्यटकों के जाने के लिए कच्चा मार्ग है और वहां पर कोई धूंए के वाहन से नहीं जा सकता। आपको जाना है तो तांगे से या पैदल जाईए। पारिस्थितिकी पर्यटन का यह अप्रतीम केन्द्र है। बताते हैं, कुछ साल पहले अंजनीकुमार सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार सिंह के साथ हेलिकोप्टर में इस स्थान को पहाड़ियों से देखा और उसके पौराणिक, प्राकृतिक महत्व को देखते उसे पर्यटन स्थल रूप में विकसित कर दिया। मुझे लगता है, पर्यटन स्थलों के विकास के लिए इसी तरह की बढ़त की जरूरत है।

कुछ समय पहले मित्रों के साथ अलवर के नीलकंठ महादेव मंदिर जाना हुआ। टहला की पहाड़ी के ऊपर नीलम का शिवलिंग और सुंदर सा एक सरोवर वहां है।...और आस-पास प्राचीन मूर्तियां बिखरी पड़ी है। कुछ ही दूरी पर भगवान महावीर की प्राचीन मूर्ति है तो बौद्ध कालीन अवषेष भी हैं। हम इससे कुछ किलोमीटर और आगे घने जंगल में कांकवाड़ी फोर्ट भी गए। इस किले से दूर तक फैले जंगल, हिरनों की टोली को देखना जैसे अद्भुत लोक की सैर जैसा था। मजे की बात यह कि वन विभाग के अधीन इस किले में पर्यटक के बराबर आते हैं। मुझे लगता है, पर्यटकों के चिर-परिचित स्थानों पर बढ़ते दबाव को ऐसे स्थानों की ओर मोड़ने की जरूरत है। अल्पज्ञात ऐसे स्थानों को यदि विकसित कर इनका समुचित प्रचार-’प्रसार किया जाए तो देष में पर्यटन के लिए संभावनाओं के नए रास्ते खुल सकते हैं।

बहरहाल, पर्यटन से विदेशी मुद्रा की बड़े स्तर पर आवक होती है परन्तु इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि अधिक पर्यटन दबाव से स्थानों पर इस तरह का बोझ नहीं हो जाए कि हम बाद में उन स्थानों को संभाल ही नहीं पाए। पर्यटन प्रबंधन के तहत अल्प ज्ञात परन्तु असीमित संभावनाएं वाले पर्यटन स्थलों की पहचान कर वहां पर्यटन की शुरूआत इस दिशा में महत्ती पहल हो सकती है। इसके लिए  प्रचलित प्रचार-प्रसार नीति की बजाय ऐसी व्यावहारिक प्रचार-प्रसार नीति को अपनाया जाए जिससे हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का भी प्रभावी संरक्षण हो सके। पर्यटन प्रचार की सामग्री सूचनात्मक होने के साथ ही स्थान-विषेष पर पर्यटकों को पहुंचने के लिए प्रेरित करने वाली भी हो। इसके लिए यात्रा वृतान्त लिखने वाले लेखकों की सेवाएं ली जा सकती है। क्यों नहीं यह भी किया जाए कि अल्पज्ञात स्थानों को पर्यटन नक्शे पर लाने के लिए सरकारें उन स्थानों को सुनियोजित सोच के तहत चिन्हित करे और उन स्थानों पर यात्रा संस्मरण लिखने वालों की यात्राएं प्रायोजित करे। एक लेखक ऐसे किसी स्थान पर ठहरता है और अपने अनुभव शब्दों से सहेजता है, उस सामग्री का उपयोग यदि केन्द्र और राज्य सरकारें करती है तो उससे बड़े स्तर पर ऐसे स्थानों पर पर्यटकों को पहुंचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। मुझे लगता है, पर्यटन प्रचार का एक हिस्सा ऐसी यात्राओं के आयोजन का भी होना चाहिए जिसमें पर्यटन लेखक अपने अनुभव सहेजे और बाद में वह मीडिया के जरिए व्यापक पाठक, दर्शक वर्ग तक पहुंचे।
मूल बात है चिर-परिचित पर्यटन स्थलों पर बढ़ते पर्यटन दबाव को नियंत्रित करते हुए वैकल्पिक पर्यटन स्थलों की खोज की जाए। हमारे यहां तो पर्यटन का मूलमंत्र हीचरैवेति...चरैवेतिरहा है। माने चलते रहें, चलते रहें। एक ही स्थान पर यदि ठहर गए तो फिर विकास भी रूक जाएगा। क्यों नहीं इसे समझते नए पर्यटन स्थलों के विकास पर हम ध्यान दें।