Wednesday, September 26, 2018

सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के साथ नये पर्यटन क्षेत्रों का हो समुचित विकास


केन्द्र सरकार द्वारा देश में इस बार 16 से 27 सितम्बर तक राज्य सरकारों के सहयोग से पर्यटन पर्व की  पहल की गयी। इसके तहत पर्यटन के लाभों पर ध्यान केन्द्रित करने, देश की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने औरसभी के लिए पर्यटनके सिद्धान्त को मजबूत करने पर जोर दिया गया। यह सही है, ऐसे आयोजनों से पर्यटन प्रोत्साहन होता है, कुछ समय के लिए पर्यटकों का आगमन भी बढ़ता है परन्तु मूल बात यह है कि पर्यटन उद्योग के विकास के साथ इधर जो चुनौतियाॅं जुड़ी है, जो समस्याएं उभर रही है-उन पर कितना हम गंभीर हैं। पर्यटन विपणन का तमाम जोर देश में इस बात को लेकर है कि पर्यटकों की संख्या में अधिकाधिक वृद्धि हो। यह ठीक है, पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की वृद्धि ही पर्यटन उद्योग का उद्देष्य है। आखिर विदेशी मुद्रा प्राप्ति और सकल घरेलू आय में इसी से वृद्धि हो सकती है परन्तु पर्यटन क्षेत्र में इस बात को भी देखे जाने की जरूरत है कि स्थान विषेष पर पर्यटकों के बढ़ते दबाव से कहीं वहां का वातावरण तो प्रभावित नहीं होने लगा है।

अभी हाल के एक समाचार के अनुसार जापान में पर्यटकों का दबाव इतना अधिक हो गया है कि उससे वहां अत्यधिक गर्मी और पर्यावरण पर संकट गहरा गया है। रिकियो यूनिवर्सिटी कॉलेज आॅफ टूरिज्म के प्रोफेसर तोरू अजुमा का कहना है कि पर्यटकों की भीड़, गाड़ियों की संख्या, बढ़ती गर्मी और प्रदूषण दुनिया के लिए आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती होगी। भारत में ही देखें,  कुछ समय पहले शिमला में हालात यह हो गए थे कि वहां के प्रशासन को बाकायदा मीडिया में प्रसारित करना पड़ा कि पानी की इस कदर कमी वहां हो गयी है कि अब और पर्यटक शिमला नहीं आएं। नैनीताल, कुल्लू-मनाली, डलहौजी, जैसलमेर, पुष्कर, खजुराहो आदि पर्यटन के अधिक दबाव और असंतुलित पर्यटन के कारण आज सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। प्रचलित पर्यटन स्थलों पर वाहनों से इस कदर जाम होने लगे हैं कि आम आदमी की दिनचर्या उससे गहरे से प्रभावित हो रही है। होटलों में, वहां के स्विमिंग पूल में बेतहाशा पानी के उपयोग से पेयजल की कमी से भी बहुत से पर्यटन स्थल इस समय इस कदर जूझ रहे हैं कि आने वाले समय के बारे में सोच के ही सिहरन होती है। हम पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों के आगमन के बढ़ते आंकड़ों से इस कदर खुश हो रहे हैं कि पर्यटकों के दबाव से होने वाली दूसरी समस्याओं पर हमारा ध्यान ही नहीं जा रहा है।

पर्यटन प्रचार का जो साहित्य प्रचार और प्रसारण केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर  होता है उसमें चिर-परिचित स्थानों पर ही अधिक जोर रहता है। पर्यटन विपणन का हाल भी यही है कि हम जाने-पहचाने स्थानों से इतर पर्यटन स्थलों के विकास या वहां पर्यटकीय दृष्टि से संभावनाओं पर विचार ही नहीं करते। इसी कारण देश के अधिकांष जाने-माने पर्यटन स्थल इस समय पर्यटकों के अधिक दबाव से ग्रस्त बहुत सारी और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हुए जा रहे हैं।  जितना पर्यटकों के पहुंचने से वहां फायदा होता है उससे कहीं अधिक जरूरत उन स्थानों की सार-संभाल की होने लगी है। अत्यधिक दबाव से पर्यटन का जो लाभ स्थानों पर होना चाहिए वह नहीं हो रहा उलटे पर्यटन अर्थव्यवस्था में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान के निदेशक मित्र संदीप कुलश्रेष्ठ ने कुछ समय पहले अपने संस्थान द्वारा देशभर के पर्यटन स्थलों पर स्वच्छ पर्यटन की चलाई मुहिम में दिखाए जाने वाली एक विडियो फिल्म दिखाई। हालांकि इसमें स्वच्छता के लिए किए प्रयासों का सांगोपांग चितराम है परन्तु गंदगी से बेहाल हो रहे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की वह तस्वीर इसमें इस कदर डरावनी है कि लगता है पर्यटन के अत्यधिक दबाव से बहुत से स्थल कचरे का ढ़ेर बनते जा रहे है। सुखद है, स्वच्छ भारत, स्वच्छ पर्यटन जैसी मुहिम से कुछ सकारात्मक हुआ है।

बहरहाल, जरूरत इस बात की है कि पर्यटन दबाव से ग्रसित स्थानों का विकल्प तलाश जाए। अल्पज्ञात परन्तु पर्यटन संभावना वाले स्थानों को चिन्हित कर वहां पर्यटन का प्रसार किया जाए। राजस्थान की ही बात करें। राजस्थान में बहुत से ऐसे अल्पज्ञात स्थल हैं जहां पर अपार पर्यटन संभावनाएं मौजूद है। राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मित्र अजयसिंह राठौड़ ने राजस्थान के 200 से अधिक पक्षियों के छायाचित्र अपने कैमरे से संजोया है। वन्यजीवों के दुर्लभ क्षण क्षणों की छायाकारी उन्होंने की है। राजस्थान के अल्पज्ञात स्थलों को भी उन्होंने अपने कैमरे से संजोया है। उनके छायांकन आधार पर ही प्रदेश के नए पर्यटन स्थलों को पर्यटन नक्शे पर लाने का कार्य किया जाए तो बहुत कुछ महत्वपूर्ण हो सकता है। याद है, अपने कैमरे की दीठ से एक दफा राजस्थान के ऐसे किले, महलों, गुफाओं, नदियों और झरनों के पास वह ले गये जो इस नाचीज़ घुम्मकड़ के लिए भी अदेखे थे। लगा, देशभर का भ्रमण कर लिया पर अपने राजस्थान में तो अभी भी बहुत से स्थानों को जिया ही नहीं है। यह भी कि राजस्थान में बहुत कुछ अभी भी ऐसा है जिसे पर्यटन की दृष्टि से समझा और सहेजा ही नहीं गया है। मसलन झालावाड़ की बौद्ध गुफाएं, पांडवो के अज्ञातवास के स्थल विराटनगर की अप्रतीम चट्टानें, चम्बल नदी का वह क्षेत्र जहां पर जल का सागर ही नहीं है बल्कि बहुत सारे पानी के जीवों का सुरम्य लोक है, बूंदी की चित्रशाला, सवाईमाधोपुर का 12 वीं सदी के इतिहास को जीता खंडार किला, बांरा के शाहबाद, शेरगढ़ फोर्ट, करौली के तिमनगढ़ आदि बहुत से ऐसे स्थल जो पर्यटन के नक्शे पर नहीं है, परन्तु पर्यटन की अपार संभावनाएं वहां मौजूद है।

अभी कुछ समय पहले ही बिहार संग्रहालय में एक व्याख्यान देने के लिए पटना जाना हुआ। वहां के पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान में मुख्यमंत्री के सलाहकार अंजनीकुमार सिंह आग्रह कर अपने कला संग्रहालयनुमा निवास स्थान  ले गये। पता चला, बिहार जैसे राज्य में उनकी पहल से बहुत कुछ सांस्कृतिक नया हुआ है। उनकी पहल से ही पटना में पृथक से बिहार संग्रहाल की स्थापना की गयी है। कईं एकड़ में बना यह देश का ऐसा संग्रहालय है जो पुरातत्व की वस्तुओं का ही भंडार नहीं है बल्कि बिहार की संस्कृति के जीवंत रूप वहां हैं। अंजनीकुमार सिंह कला-संस्कृति की गहरी सूझ रखते हैं। उन्होंने बिहार के अल्पज्ञात स्थलों का भी विकास पर्यटकीय दृष्टि से किया है। उनके सौजन्य से ही नालन्दा यात्रा के दौरान राजगीर के पास एक स्थल घोड़ा कटोरा जाना हुआ। पहाड़ों के मध्य सुंदर सी झील वहां है और हाल ही में उसके ठीक मध्य में बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना की गयी है। राजगीर से कोई सात किलोमीटर दूर इस स्थान पर पर्यटकों के जाने के लिए कच्चा मार्ग है और वहां पर कोई धूंए के वाहन से नहीं जा सकता। आपको जाना है तो तांगे से या पैदल जाईए। पारिस्थितिकी पर्यटन का यह अप्रतीम केन्द्र है। बताते हैं, कुछ साल पहले अंजनीकुमार सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार सिंह के साथ हेलिकोप्टर में इस स्थान को पहाड़ियों से देखा और उसके पौराणिक, प्राकृतिक महत्व को देखते उसे पर्यटन स्थल रूप में विकसित कर दिया। मुझे लगता है, पर्यटन स्थलों के विकास के लिए इसी तरह की बढ़त की जरूरत है।

कुछ समय पहले मित्रों के साथ अलवर के नीलकंठ महादेव मंदिर जाना हुआ। टहला की पहाड़ी के ऊपर नीलम का शिवलिंग और सुंदर सा एक सरोवर वहां है।...और आस-पास प्राचीन मूर्तियां बिखरी पड़ी है। कुछ ही दूरी पर भगवान महावीर की प्राचीन मूर्ति है तो बौद्ध कालीन अवषेष भी हैं। हम इससे कुछ किलोमीटर और आगे घने जंगल में कांकवाड़ी फोर्ट भी गए। इस किले से दूर तक फैले जंगल, हिरनों की टोली को देखना जैसे अद्भुत लोक की सैर जैसा था। मजे की बात यह कि वन विभाग के अधीन इस किले में पर्यटक के बराबर आते हैं। मुझे लगता है, पर्यटकों के चिर-परिचित स्थानों पर बढ़ते दबाव को ऐसे स्थानों की ओर मोड़ने की जरूरत है। अल्पज्ञात ऐसे स्थानों को यदि विकसित कर इनका समुचित प्रचार-’प्रसार किया जाए तो देष में पर्यटन के लिए संभावनाओं के नए रास्ते खुल सकते हैं।

बहरहाल, पर्यटन से विदेशी मुद्रा की बड़े स्तर पर आवक होती है परन्तु इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि अधिक पर्यटन दबाव से स्थानों पर इस तरह का बोझ नहीं हो जाए कि हम बाद में उन स्थानों को संभाल ही नहीं पाए। पर्यटन प्रबंधन के तहत अल्प ज्ञात परन्तु असीमित संभावनाएं वाले पर्यटन स्थलों की पहचान कर वहां पर्यटन की शुरूआत इस दिशा में महत्ती पहल हो सकती है। इसके लिए  प्रचलित प्रचार-प्रसार नीति की बजाय ऐसी व्यावहारिक प्रचार-प्रसार नीति को अपनाया जाए जिससे हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का भी प्रभावी संरक्षण हो सके। पर्यटन प्रचार की सामग्री सूचनात्मक होने के साथ ही स्थान-विषेष पर पर्यटकों को पहुंचने के लिए प्रेरित करने वाली भी हो। इसके लिए यात्रा वृतान्त लिखने वाले लेखकों की सेवाएं ली जा सकती है। क्यों नहीं यह भी किया जाए कि अल्पज्ञात स्थानों को पर्यटन नक्शे पर लाने के लिए सरकारें उन स्थानों को सुनियोजित सोच के तहत चिन्हित करे और उन स्थानों पर यात्रा संस्मरण लिखने वालों की यात्राएं प्रायोजित करे। एक लेखक ऐसे किसी स्थान पर ठहरता है और अपने अनुभव शब्दों से सहेजता है, उस सामग्री का उपयोग यदि केन्द्र और राज्य सरकारें करती है तो उससे बड़े स्तर पर ऐसे स्थानों पर पर्यटकों को पहुंचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। मुझे लगता है, पर्यटन प्रचार का एक हिस्सा ऐसी यात्राओं के आयोजन का भी होना चाहिए जिसमें पर्यटन लेखक अपने अनुभव सहेजे और बाद में वह मीडिया के जरिए व्यापक पाठक, दर्शक वर्ग तक पहुंचे।
मूल बात है चिर-परिचित पर्यटन स्थलों पर बढ़ते पर्यटन दबाव को नियंत्रित करते हुए वैकल्पिक पर्यटन स्थलों की खोज की जाए। हमारे यहां तो पर्यटन का मूलमंत्र हीचरैवेति...चरैवेतिरहा है। माने चलते रहें, चलते रहें। एक ही स्थान पर यदि ठहर गए तो फिर विकास भी रूक जाएगा। क्यों नहीं इसे समझते नए पर्यटन स्थलों के विकास पर हम ध्यान दें।


Wednesday, September 12, 2018

सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के लिए भी हो कार्य

यह चिंताजनक है कि विष्व में जो बड़े अपराध पिछले कुछ वर्षों में विषेष रूप से उभर कर सामने आये हैं। उनमें सांस्कृतिक विरासत की तस्करी धीरे-धीरे प्रमुख होता जा रहा है। यूनेस्को के अनुसार ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के बाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा अपराध आज सांस्कृतिक विरासत की तस्करी है। 
भारत विविधताओं की धरती है और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से अत्यधिक सम्पन्न भी है परन्तु यह विडम्बना ही है कि धरोहर संरक्षण के प्रति बहुत से स्तरों पर जो सजगता नजर आनी चाहिए, वह लुप्त प्रायः है। यह सही है, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा पुरामहत्व के स्थलों और वहां की सांस्कृतिक संपति के संरक्षण का कार्य निरंतर किया जा रहा है परन्तु देष मंे अभी भी बहुत से ऐसे अल्पज्ञात स्थल हैं जिनका ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व तो है परन्तु वे सरकारी और सामाजिक चेतना की दृष्टि से उपेक्षित प्रायः हैं। सांस्कृतिक संपदा को तस्करी के जरिए देष से बाहर भेजने वालों से भी अधिक खतरा इस बात का है कि हम अपने ऐसे स्थलों के सांस्कृतिक मूल्यों को नहीं पहचानकर सदा के लिए उनसे दूर होते जा रहे हैं।
बहुत से स्थान जो सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से बहुज्ञात हैं परन्तु उनके आस-पास के स्थलों पर हमारा ध्यान नहीं है। हाल ही में बिहार संग्रहालय में एक व्याख्यान के लिए जाना हुआ। इसी बहाने नालन्दा और राजगीर जाने का भी संयोग हो गया। यह सर्वविदित है कि सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से बिहार के यह क्षेत्र अत्यधिक समृद्ध है। नालन्दा के रास्ते में पड़़़ने वाले छोटे-छोटे गांवों और वहाँ की मूर्ति कला धरोहर में इसे साक्षात अनुभूत भी किया। पर यह जानकर दुख भी हुआ कि सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न वहां के बहुत सारे स्थलों से मन्दिरों की मूल मूर्तियां धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। बहुत से सार्वजनिक स्थलों पर से तो मूल प्राचीन मूर्तियों से हूबहू वैसी ही नयी मूर्तियों की अदला-बदली कर दी गयी है। इसकी बड़ी वजह सांस्कृतिक विरासत की तस्करी तो है ही साथ ही इसके प्रति वृहद स्तर पर आमजन की चेतना नहीं होना भी है। इसी कारण तस्कर स्थानीय मूर्तिकारों से प्राचीन मूर्तियों की नकल करवाते हैं और जब मूर्तियां बन जाती है तो कब असल गायब हो जाती है, पता ही नहीं चलता। मुझे लगता है, इस संदर्भ में यदि वृहद स्तर पर सर्वे करवाया जाए तो हमारे यहां से सांस्कृतिक विरासत तस्करी के बड़े गिराहों का पर्दाफास हो।
पर्यटन के विकास में इस बात को भी देखे जाने की जरूरत है कि कैसे स्थान-विषेष में सांस्कृतिक विरासत के प्रति आम जन में प्रभावी वातावरण बनाया जाए। ज्ञात स्थलों के पर्यटन स्थलों के साथ ही वहां के आस-पास के ऐसे अल्पज्ञात स्थलों के लोगों में यह समझ खासतौर से विकसित किए जाने की जरूरत है कि कैसे वे अपनी धरोहर को बचा सकते हैं। बाकायदा इसके लिए प्रोत्साहन अभियान चलाए जाएं तो इसके बेहतर परिणाम हमारे संग्रहालयों को मिलने वाली बेषकीमती पुरा संपदा के रूप में हमारे सामने आ सकते हैं।
बहरहाल, सांस्कृतिक विरासत की तस्करी से देष अतीत की हमारी गौरवमयी संस्कृति से निरंतर महरूम हो रहा है। परन्तु इस संदर्भ का एक बड़ा सच यह भी है कि बहुत सारे स्थानों पर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न धरोहरें इसकारण से भी हमसे दूर होती हा रही है कि वहां पर उनके संरक्षण की कोई जागरूकता नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न होते हुए भी बहुत सारे स्थानों के विरासत स्थल, वहां की मूर्तियां, वहां के षिल्प और कलाएं दुर्दषा झेलती स्वतः ही काल-कवलित हो रही है। मुझे लगता है, सांस्कृतिक विरासत के प्रति सचेत नहीं होना अतीत से विमुख होना है।...और जो समाज अतीत के बगैर भविष्य की राह पकड़ता है, वह बहुत लम्बे समय तक अपने अस्तित्व को बचाकर नहीं रख सकता है। अतीत भविष्य की एक तरह से रोषनी है और संस्कृति जीवन का ऐसा राग है जो व्यक्ति को निरन्तर यांत्रिक होने से बचाता है। वहीं समाज सदियों तक अपना होने को बचाये रख सकता है जो परम्परा में आधुनिकता ओढ़ता है। सांस्कृतिक चेतना इसलिए भी जरूरी है कि इसी से भविष्य सुगम होता है और मनुष्य मानसिक रूप से भी सम्पन्न होता है। 
देश  के जाने माने कलाकार और कला षिक्षा में विरासत संरक्षण के पैरोकार डाॅ. जयकृष्ण अग्रवाल ने हाल ही में लखनऊ के रवीन्द्रालय पर बनी 81 फीट लम्बी और 9 फीट चैड़ी टेराकोटा की उस विष्व प्रसिद्ध कला कृति की ओर सोषल मीडिया के जरिये ध्यान दिलाया है जो सामाजिक उपेक्षा के चलते झाड़ियों और वहाँ उग आई घास में कहीं लोप होती जा रही है। विष्व कवि रवीन्दनाथ टैगोर के कथानक पर भारत के प्रमुख कलाकार स्व. के.जी. सुब्रमण्यम द्वारा 1963 में सृजित यह कलाकृति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक भारतीय कला का प्रतिनिधत्व करती है। पर इसे समझक कौन? जयकृष्णजी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा इस कलाकृति के साथ ही ऐसी और कलाकृतियों और उनके स्थलों को संसूचित कर संरक्षित करने पर जोर दिया है। सोषल मीडिया में उनकी इस मुहिम को युवा कलाकार भूपेन्द्र अस्थाना सहित कई और कलाकारों ने आगे बढ़ाया है परन्तु सवाल यह है कि वृहद स्तर पर क्या इस संदर्भ में सरकार को कोई नीति नहीं बनानी चाहिए। यह बात इसलिए कि देषभर में ऐसी बहुत सी सांस्कृतिक धरोहरे हैं जो उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व लगभग खोती जा रही है। ऐसे बहुत से स्थान हैं, जो घोर उपेक्षा के चलते अतीत हो गए हैं या फिर ऐसा होने की राह पर हैं। 
मध्यप्रदेष के मुरैना क्षेत्र में, चैसठ यौगिनी मंदिर बना हुआ है। ब्रिटिष वास्तुकार लुटियन ने इसे देखकर ही कभी भारतीय संसद भवन के निर्माण की कल्पना की थी। कोई वहां पर जाए तो अचरज करेगा कि हमारा संसद भवन हुबहू चैसठ योगिनी मंदिर का प्रतिरूप है। लुटियन ने उससे प्रेरणा ली परन्तु वर्तमान यही कहता है कि संसद भवन की परिकल्पना उसी की थी...ऐसे बहुत से और भी स्थान हैं जो विष्व में आधुनिक निर्माण की भारतीय प्रेरणा है परन्तु वहां भारतीय संस्कृति के होने के चिन्ह अब नजर नहीं आते।  भारतीय संसद भवन की प्रेरणा रहा चैसठ योगिनी का मूल मंदिर और वहां के कुछ संस्कृत षिलालेख, चट्टानों पर अतीत से जुड़ी संदर्भों की दास्तां सुनाती लिपि और सदियों पुराने वहां के और भी सांस्कृतिक संदर्भ घोर अपेक्षा के कारण विदेषी जनों के लिए तो प्रेरणा बन गए परन्तु अपने ही घर में घरबारे हैं। मुझे लगता है, इस दृष्टि से व्यापक स्तर पर चिंतन की जरूरत है कि कैसे हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को तस्करों से तो बचाए हीं साथ ही जो कुछ हमारे पास उपेक्षित है-उसको सहेजतने का भी वृहद स्तर पर हम जतन करें। निष्चित ही सामाजिक भागीदारी इसमंे जरूरी है परन्तु सरकारी स्तर पर विज्ञ कलाकारों, धरोहर सरंक्षण मंे रूचि रखने वाले, लेखकों को सम्मिलित कर इस दिषा में किसी नीति पर कार्य किया जाता है तो उसके दूरगामी परिणाम आ सकते हैं।
राजस्थान की ही बात करें तो यहां अलवर जिले में स्थित नीलकण्ठ महादेव मन्दिर और उसके पास कोई दो-तीन किलोमीटर तक प्राचीन मूर्तियों का जैसे खजाना बिखरा पड़ा है। कहते हैं मंदिर में भगवान षिव का जो लिंग है वह भी नीलम का है। बौद्ध और जैन प्रतिमाओं का भी यह क्षेत्र एक प्रकार से गढ़ है। परन्तु यहां भी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का कोई धणी-धोरी नजर नहीं आता है। जालौर में परमार कालीन संस्कृत पाठषाला, बूंदी के शैल चित्र, जयपुर के पास महाभारत कालीन कहे जाने वाले विराटनगर की चट्टानों और मूर्तिषिल्प, षिलालेखों आदि बहुत सारी सांस्कृतिक धरोहर इसीलिए उपेक्षित है कि उसके बारे में सूक्ष्म समझ का अभाव है। ऐसे स्थलों से यदि तस्करी भी किसी स्तर पर होती है तो किसे पता है! जरूरत इस बात की है कि के सूक्ष्म सांस्कृतिक सोच रखते हुए इस सबके संरक्षण पर वृहद स्तर पर ध्यान दिया जाए। जयकृष्णजी जैसे कलाकारों की सेवाएं इस दिषा में सरकार लेकर किसी नीति पर कार्य करती है तो उसके अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं। पहल तो हो।

Sunday, May 13, 2018

‘नीर महल’ की ओर


खिड़की के पार यहां दूर तक धूंध है। पहाड़ हैं पर धूंए में कहीं खोए-खोए हुए से। एक पगडंडी दूर कहीं उतर जा रही है। मिलट्री का एक ट्रक भी खड़ा है। हरे वृक्षों का बसेरा है पर अभी तो धुंधलके में जैसे सब ऊंघ रहे हैं। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला के राजकीय विश्राम गृह के जिस कमरे में ठहरा हूं, उसके कमरे की खिड़की से यह सब देख मन में आया, पहाड़ों की धरा हमें जगाती है।...और कहीं होते हैं तो वहां की आपाधापी, भागमभाग और वाहनों के धूंए का राज इस कदर आक्रांत करता है कि मन उन सबसे दूर नींद में कहीं खोना चाहता है। रहता वहीं है पर वहां से भागने, दूर जाने या फिर कुछ देर के लिए अपने आस-पास को भूलने को मन करता है। यह भूलना क्या है? नींद ही तो! माने जो है, उससे दूर जाना। प्रकृति मध्य ऐसा नहीं है। यहां मन जागता है। सोया हुआ भी यहां भीतर को जगाता है। तो कहूं, जाग का मार्ग है प्रकृति। 
जयपुर से दिल्ली का हवाई मार्ग। रात्रि विश्राम राजधानी में और फिर दिल्ली से अलसुबह कोलकत्ता की फ्लाईट और फिर वहां से बदली कर अगरतला पहुंचा तब तक दुपहरी हो गई थी। अगरतला में छोटा सा एअरपोर्ट है। 
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सांझ घिरने को थी।... क्षितिज में लालिमा बिखेरता सूर्य विदा ले रहा था। पानी पर पड़ती सूर्य की जाती किरणों को देखना अद्भुत अनुभव था। हम जहां थे, वहां से दूर तक आंखों में नीर ही नीर बस रहा था।...पर सौन्दर्य का सच केवल यही नहीं था, दूर बीच पानी में खड़ा वह मूक महल भी था जिससे सुनाई दे रहा था जीवन का राग। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 53 किलोमीटर दूर रूद्रसागर झील में थी हमारी बोट। आसमान की परछाई से नीलेपन का अहसास कराता झील का पानी। नाव ‘नीर महल’ की ओर बढ़ रही थी, तभी झील पर किलोल करते प्रवासी पक्षियो का झुण्ड समवेत स्वर में गान करता उड चला। पास बैठे कलाकार मित्र ने तुरंत कैमरा थामा और प्रयास किया कि पक्षी संगत के उस दृष्य को सदा के लिए कैमरे से स्थिर कर संजो ले परन्तु तब तक देर हो चुकी थी।... झील के पानी में परछाई छोड़ता पक्षियो का काफिला दूर कहीं आसमान में जैसे खो गया। 
झील के मध्य बने ‘नीर महल’ की ओर बढ़ते मन ने औचक कहा, प्रकृति ने त्रिपुरा में सौन्दर्य का नीर ही तो बहाया है। यत्र-तत्र-सर्वत्र।...
—शीघ्र प्रकाश्य यात्रा वृतान्त पुस्तक से 

Sunday, April 8, 2018

आलोक छुए अपनेपन की रंग दीठ

विनय शर्मा  के चित्रों की अपनी ज्यामिति है। रंग-रेखाओं में वृक्ष, चट्टानों और आदिम सभ्यता से जुड़े अवषेषों की मधुर व्यंजना वहां है। उनकी लगभग हर कलाकृति में प्राचीन लिपियों का धुंधलापन दिखेगा। रंगालेप में किसी कथा, प्रसंग, अनुभूति या स्मृति के छंद सरीखी लिपि! विनय के चित्र एकांगी अर्थ आषय लिए नहीं है बल्कि वहां रंगो के अनूठे कथा अभिप्राय है। कह सकते हैं, अमूर्तन में रंगो का आलोक वहां है। रंग संसार की विपुलता नहीं विविधता। सुविन्यस्त रेखाओं में बिखरे रंगो से झांकते मानव मन और प्रकृति से जुड़े आख्यान। रेखाएं जैसे दीठ का आलोक रचती है। 
मसलन एक चित्र है जिसमें अनूठा रंग विभाजन किया गया है। चैकड़ी में बंटे रंग। गोले और पट्टिकाएं। टैक्सचर में उर्दू लिपि। कागज बने कैनवस पर तरेड़ें...पुरातन की अनुभूति कराती। रंगो के अनूठे बिम्ब यहां है। कलाकृति में प्रवेष करेंगे तो पाएंगे वहां पर सूरज, चांद, तारे और हरियाली के आंगन में पसरा जैसे मौन हमसे बतिया रहा है। एक ओर घनीभूत होते रंग किसी अंधेरी सुरंग में जैसे ले जा रहे हैं तो दूसरी ओर छोटे गलियारों से अपनी जगह बनाता उदित होता सूर्य। चमकीली पीली रोषनी के रंग। 
विनय की कलाकृतियों की यही विषेषता है, वह रंगों के होने का जैसे हमसे पाठ बंचावते हैं।  अनुभूतियों की विरल छटाओं में उनके किए रंग विभाजन की ज्यामितिय संरचनाओं में एक साथ गहराती रात की अनुभूति है तो उदित होते सूर्य के उजास का सुकून भी। ऐसा बहुत कम होता है जब एक ही चित्र दिन और रात की ऐसी सुमधुर व्यंजना करता हमें दिखे। विनय की ‘रंग आलोक’ श्रृंखला के चित्र ऐसे ही हैं। वहां प्रकृति और जीवन से जुड़े आख्यानों में हम भावों के अनूठे लोक में पहुंच जाते हैं।  उर्दू अक्षरों की पाष्र्व व्यजना में वह अभिप्रायों का जैसे कोई किवाड़ खोलते हैं। यह ऐसा है जिसमें प्रवेष करते हम रंग-रेखाओं के माधुर्य से ही साक्षात्कार नहीं करते बल्कि प्रकृति और जीवन के रिष्तों से भी रू-ब-रू होते हैं।
इसी श्रृंखला की एक और कलाकृति है, त्रिकोण और गोलेनुमा रंग पट्टिकाओं के नीचे हरे, रक्तिम लाल और पीली चैकियां। पाष्र्व में दरारें। बिंदु-बिंदु नाद। हल्का आसमानी, गहरा नीला, भगवा, हरा, लाल और पीले रंग के घेरे में बसे घेरे। शून्य में ब्रह्माण्ड को उकेरते रंग ध्वनियों की विरल व्यंजना विनय ने इस कलाकृति में की है। मुझे लगता है यह विनय की रेखाओ का रंग अध्यात्म है और संयोग देखिए, ठीक इसके सामने कलाकृति में त्रिभुज में भी रेखाओं की ऐसी ही लय अंवेरते रंगो का उजास जैसे छिड़का गया है। रंगो की इस छटा के नीचे चैकोर रंग पट्टिकाएं और इस समग्र परिवेष में हल्के पीलेपन में उभरी उर्दू लिपि। भाव सामंजस्य की अनूठी व्यंजना। शून्य का अनहद, रंग-नाद।...और इसके बाद की कलाकृति में परिवेष लगभग यही परन्तु रंगो का प्रवाह जैसे फूलों में रूपान्तरित हो गया है। छाया-प्रकाष में हरे, पीले, नीले और लाल में समाहित श्वेत रंग जैसे बहते हुए अपने आप ही पुष्पगुच्छ में रूपान्तरित हो गए हैं।
विनय का यही रंग आलोक उन्हें अपने समकालीनों से जुदा करता है। दार्षनिक भव में ले जाता रंगों का उनका लोक रेखाओं के लावण्य में रंग अध्यात्म सरीखा है।इसी श्रृंखला का एक चित्र चैपड़ सरीखा है। सहज, सरल। रंग परन्तु वह देखने वाले पर हावी नहीं होते। चैपड़ नहीं बल्कि उसकी छाया में हरे, पीले, नीले और रंग की आभा। पाष्र्व में टैक्सचर में उर्दू लिपि। आप इसे देखते हैं और स्मृतियों के जैसे किसी अनूठे लोक में प्रवेष कर जाते हैं। ऐसे ही एक और चित्र है जिसमें विघ्न-विनायक गणेष की व्यंजना है। भित्ति चित्र सरीखी कलाकृति। पाष्र्व में पुरालिपि और श्वेत रेखाओं के उजास में गणेष को चंवर ढुलाती रिद्धि-सिद्धि। मटमेले और जीर्ण-षीर्ण कागद पर संस्कृत भाषा के श्लोक और रंग पट्टिकाएं और छाया सरीखे आवरण में उभरती श्वेत रेखाओं में उकेरे गणेष की यह अनूठी व्यंजना है। चित्र परन्तु अतीत वहां जैसे ध्वनित हो रहा है। ऐसा लगता है किसी पुरानी हवेली के भित्तिचित्र से हम साक्षात् हो रहे हैं। यही विनय शर्मा के वह रंग अभिप्राय हैं जिनमें परिवेष का मर्म ठौड़ ठौड़ उद्घाटित होता सदा के लिए देखने वालों की आंखों में बस जाता है।