Monday, November 9, 2015

स्मृतियों का वातायन


पिताजी नहीं है! मन इसे अभी भी स्वीकार नहीं कर रहा। उनकी गुनगनाहट कान अभी भी अनुभूत कर रहे हैं। हमने उन्हें कभी ठाले बैठे नहीं देखा। हर वक्त वह किसी न किसी काम में ही लगे रहते। अपने नहीं-अधिकतर दूसरों के काम में। खाली बैठना उन्हें पसंद नहीं था। सोचता हूं, उन्होंने जिस साफगोई, सुफियाना फक्कड़पन को जिया उस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। मैं डायरी लिखता हूं। बहुत से पन्ने उन पर ही लिखे हुए हैं। क्यों नहीं वे ही किसी शक्ल में बाहर आ जाएं। कभी लगता है, उनकी स्मृति संजोते कुछ ऐसा करूं जो किसी ने नहीं किया है पर यह भी जानता हूं, पिताजी इस तरह के किसी भी दिखावे, ताम-झाम को पंसद नहीं करते थे। और फिर पिता किन्हीं डायरीनुमा लेखन में या फिर स्मृतियों के दीप में ही क्यों रहें, वह तो सदा मेरे पास है। रहेंगे। हां मुझे लगता है, स्मृतियों को लिखने का यह राग दरअसल उनके तर्पण प्रयास है! ऐसा तर्पण जो शांति प्रदान कर सके। उनकी आत्मा को जिनके लिए किया जाए और आपके उस मन के लिए भी जो यादों के गलियारे से बाहर आना ही नहीं चाहता।
बहरहाल, पिताजी नहीं है तो बीकानेर जाना औचक कुछ अधिक हो गया है। पहले ऐसा नहीं था। पर अब न जाने क्यो ंबीकानेर बारम्बार जाने का जोग बन रहा है। घर पहुंचता हूंू तो भूल जाता हूं, पिताजी नहीं है। इन्तजार करता हंू, वह आएंगे और कहेंगे, ‘यह ले स्कूटर की चाबी। पैट्रोल फूल करवा दिया है। टायर में हवा और सब दुरस्त है। जहां चाहो वहां ले जाना।’ पर देखता हूं, सफेद रंग का स्कूटर पूरी तरह से मिट्टी में भर गंया है। उनके जाने के बाद कौन उसकी सार-संभाल मेरे लिए करता!
अभी एक दस दिन पहले बीकानेर में ही था। सुबह रोज उठता तो अजीब सा खालीपन मन को कचोटता। पिताजी अलसुबह उठ जाते। दूध लाते और इधर कुछ वर्षों में तो हम जब बीकानेर पहुंचते तो सुबह की चाय भी ख्ुाद बना पिलाते। मैं गौर करता बच्चों के साथ मुझे आया देख वह आत्मिक सुकून को जैसे पा लेते। उनका मन करता, घर बहुत दिन तक ऐसे ही भरा-भरा रहे। चाहते बहू अरूणा को भी जयपुर से आने के बाद कोई काम घर में  नहीं करना पड़े। हां, वह घूंघट के हिमायती थे परन्तु बहू को बेटी से भी बढ़कर मानते। यही कारण था कि हम जब पहुंचते तो अपनी तरफ से यह प्रयास करते कि अरूणा को कुछ भी करना नहीं पड़े। सर्दी के मौसम मंे तो वह चाहते अरूणा और बच्चे बिस्तर से बाहर ही नहीं निकले। कहते, ‘अरे! बाहर बहुत सर्दी है। घूसे रहो रजाई में। कोई काम नहीं है, क्यों बाहर आ रहे हो।’
बचपन के दिनों को याद करता हूं। पिताजी में पिछले 15 वर्षों में हदभांत बदलाव आ गया था। विष्वास नहीं होता, रोबदार, कड़क मिजाज के मेरे पिता इतना अधिक बदल गए थे कि कोई उनके पुराने दिनों को याद कर कह नहीं सकता कि यह वही भूरजी हैं जिनसे गली-मोहल्ला तक कभी थर-थर कांपा करता था। जस्सूर गेट के हमारे पुस्तैनी घर में जब हम रहते थे। पिताजी का पूरी गली में इस कदर रोब था कि जब वह गली में प्रवेष करते तो जानबूझकर खंखारा करते। उनके इस खंखारे पर ही तमाम गली के लोग इधर-उधर हो जाया करते थे। उनके आते ही घर में जैसे कर्फ्यू लग जाता। हमसे वह कभी सामान्य सी बातचीत भी नहीं किया करते थे। मम्मी से भी उन्हें बतियाते हमने कभी नहीं देखा। उनके कक्ष में भी जाने की हमारी हिम्मत नहीं होती थी। पर इधर उनमें जबरदस्त बदलाव आ गया था। घर-परिवार की हर जरूरत का ध्यान रखते वह बीते वर्षों में इस बात का अपने तई निरंतर प्रयास करते थे कि उनकी वजह से किसी का जरा भी दिल न दुखे। इससे बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा कि धर्मनगर द्वार वाले हमारे घर का पूरा गली-मोहल्ला उनका फैन हो गया था। पड़ौस मे रहने वाला 26-27 वर्षीय मुकुल श्रीमाली तो उनका खास मित्र बन गया था। और भी गली-मोहल्ले के बच्चों के वह सर्वाधिक प्रिय पात्र थे। याद है, उनका जब अवसान हुआ तो पूरी गली के लोग आंसूओं से भीग रहे थे। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा को अनुभूत कर तब मन मे ंअवर्णनीय आनंद की अनुभूति हुई थी।
पिताजी मजबूत कद-काठी के, बड़ी-बड़ी करीने से संवारी मूंछे रखने वाले रोबदार व्यक्तित्व के धनी थे। बचन में जब समझ विकसित नहीं हुई थी, अक्सर मन में एक प्रष्न उमड़ता रहता था कि पिताजी सुबह-सुबह मूंछों पर पट्टी क्यों बांध लेते हैं? स्नान करने के बाद पूजाघर में मूछों पर पट्टी बांध वह भैंरूजी का ध्यान किया करते थे। यह पट्टी तभी खुलती थी जब वे खाना खाने बैठते थे। उनका रोब कुछ ऐसा था कि हम तीनों भाई-बहिन इधर-उधर दुबके रहते। उनके सामने जाने से डरते थे। बहुत बाद में जब समझ विकसित हुई तब जाकर पता चला कि यह पट्टी मूंछो को करीने से रखने के लिए बांधी जाती थी। जब तक पिताजी थे, मूंछो के प्रति उनका लगाव ऐसे ही रहा। उन्होंने कभी बाल काले नहीं किए, सफेद होती जा रही मूंछो को रंगा नहीं। हां, कपड़ों और चाल-ढाल में अपनी स्वाभाविक अकड़ को उन्होंने कभी नहीं बिसरासया। बगैर प्रेस किए, सलवटों के कपड़े पहने उन्हें कभी नहीं देखा। रहते वह टीप-टाॅप थे परन्तु बनावटीपन न उनके स्वभाव में था न ही वह पंसद करते थे। 
इधर कोई दो दषक से वह हम लोगों से अत्यधिक घुल मिल गए थे। मम्मी को ब्रेस्ट कैंसर जब हुआ तो मैंने देखा, वह चुपके-चुपके आंसू बहाते थे। पर जितना ध्यान उन्होंने मम्मी का रखा, हममें से कोई रखने का सोच भी नहीं सकता। अक्सर वह कहते, ‘मेरी चिंता मत कर। तु अपनी मम्मी को जयपुर ले जा। वहीं रख।’ मैं कहता, आप भी चलो। त्वरित वह कहते, ‘मैं इस घर को छोड़ नहीं सकता।’ पर जानता हूं, मम्मी के बगैर वह एक दिन भी नहीं रह सकते थे। मम्मी जब जयपुर होती तो फोन पर रोज उनसे बात करती। वह कभी फोन पर नहीं कहते कि अब बहुत दिन हो गए, बीकानेर आ जाओ। मम्मी को बहुत बुरा लगता परन्तु हम जानते थे, पिताजी मन से चाहते थे कि मम्मी बीकानेर आ जाए परन्तु उनके मन में यह भी रहता कि इसका मन यदि बेटे के पास है तो उसके मन को क्यों मना करूं। मम्मी को भी पिताजी कि चिन्ता लगी रहती। वह जानती थी कि अपने आप वह न तो दूध लेंगे न ठीक से खाना खाएंगे सो वह कुछ समय बिताकर ही पिताजी के पास लौट जाती। अब सुनिए, बीकानेर घर नहीं छोड़ने की दास्तां। असल में पिताजी को बड़े भईया मनोज की चिंता रहती। भतीजी मुक्ता को सुबह रोज वह बस छोड़कर आते। यह दायित्व किसी ने उन्हें दिया नहीं, स्वयं ही ओढ़ लिया था सो अगर जयपुर चले जाए तो उसे छोड़ना नागा हो जाए। कभी इस दायित्व से वह झुंझलाते भी परन्तु जो दायित्व ले लिया सा ले लिया इसलिए वह जयपुर नहीं आते थे। यह उनके स्वभाव में था, वह अपने आप दायित्व ओढ़ लिया करते थे। छोटी बहन अनुराधा और उसके पुत्र माधव से भी उन्हें अतिरिक्त लगाव था। वह इन्तजार करते, अनु आए तो उससे ढ़ेरो मन की बातें करे। अनु भी उनका विषेष ध्यान रखती।
बाद के दिनों में धार्मिक पुस्तकों के प्रति वह अत्यधिक अनुरक्त हो गए थे। उनके कमरे में रखी ढ़ेरां पुस्तकों को जब खंगाला तो पाया, वह पुस्तकें गौर से पढ़ते। उन पर अण्डर लाईन करते और उनको गहरे से गुनते थे। धर्म और दान-पुण्य के प्रति भी उनकी आस्था अत्यधिक हो गई थी। मम्मी को कहते, ‘जिसको जो दान देना है। मनभर कर दे दो। इस जीवन का कोई पता नहीं है। आज हैं, कल नहीं रहेंगे।’ अपने पास रखे सामान को भी वह लोगों को बुला-बुलाकर बांटते रहते। यहां तक कि अपने पास जमा ढेरांे सूट, नए सिलाए कपड़े भी उन्होंने बुला-बुलाकर मित्रों को दे दिए।
बहरहाल, पिताजी अंदर-बाहर एक जैसे थे। ताउम्र वह दूसरों के काम भी बहुत आए। उनके साथ के मित्रों से अब संवाद होता है तो पता चलता है, अपने आपको बाद में शहर में खास मुकाम पर स्थापित करने वाले बहुतेरे उनके घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे। कुछ बाद तक रहे भी परन्तु यह भी देखा कि उनका भोलापन सब जानते थे, इसलिए जब जरूरत हुई-उनसे काम निकलवाया। कुछ बड़े कथित बड़े कद की हस्तियां ऐसी भी थी जिन्होंने उनको जमकर छला पर उन्हें इससे कभी कोई वास्ता नहीं रहा। कोई अच्छा है या बुरा-इसका मापदंड पिताजी के पास स्पष्ट था। वह अच्छा जो उनको सामने मान दे। वह बुरा जो उन्हें देखकर भी नमस्कार नहीं करे। उन्हें कोई दोस्त प्रणाम कर देता, कोई मित्र कह देता यार तुम्हारा रोब अभी भी कायम है तो उनके चेहरे पर अद्भुत चमक आ जाती। उनकी रोबदार मूंछे जैसे शान से खिल-खिला पड़ती। 
यादें इतनी है कि लिखूंगा तो उसका सिरा कहीं पकड़ ही नहीं पाऊंगा। पर यह सच है, उनका जीवन खुली किताब था। हर कोई उसे पढ़ सकता था। यह भी सच है कि उनने जो जिया, वह हम जैसे कथित समझ रखने वाले चाहकर भी जी नहीं सकते। जितना उनके पास था, उसे ईष्वर का दिया बहुत अधिक मानते थे। बहुत अधिक चाहतें उनकी कभी रही ही नहीं। भैंरूजी उनके ईष्ट थे और संजोग देखिए, उनके मंदिर में ही उन्होंने अंतिम सांस ली।
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नहीं सीख पाया जीने की वह कला...  

बहुतेरी बार कुहासे बाहर ही नहीं होते, मन के भीतर भी गहरे से छाए होते हैं। छंटने की जिद लिए। पूर्वाग्रह, अपने को स्थापित करने से जुड़े छल, प्रपंच, बनावटीपन के आवरण में यह मानव मन भीतर के कुहासों से ही तो लिपटा होता है। जो इन कुहासों की गर्द में नहीं जकड़ा, समझें वही जीवन जीने की असल कला जानता है। पिता श्री प्रेमस्वरूप व्यास ऐसे ही थे। अंदर-बाहर से खुली किताब। कहीं कोई छुपाव नहीं,  कहीं कोई बनावटीपन या छल-कपट नहीं। जो पसंद आया, खुलकर उसे सराहा, जो नहीं जंचा वहीं उसके खिलाफ मोर्चा खोल जमकर बोल दिया। बगैर इस बात की परवाह किए कि परिणाम क्या होगा!
मित्र लोग मुझे कलाओं से सरोकार रखने वाला लेखक कहते हैं पर पापा को याद करता हूं तो लगता है, कलाओं में रमते, उन्हें अनुभूत करते कागज-कलम से कुछ लिखना ही कला नहीं है। हां, यह प्रक्रिया कलात्मक जरूर हो सकती है पर कला नहीं हो सकती। सच्ची और अर्थपूर्ण कला संगीत नहीं, नृत्य नहीं, चित्र नहीं मनुष्य होने का बोध  है। इसीलिए उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना ही कला है। मुझे लगता है, जीवन इसलिए भी कला है कि इससे ही मनुष्य सौन्दर्य को रच सकता है। बाहरी ही नहीं आंतरिक सौन्दर्य भी। अंतर के सौन्दर्य की रचना दुरूह है, बाहर के सौन्दर्य की रचना आसान। 
देना-पावना चुकाकार  आज ही के दिन एक बरस पहले पिताजी लोकातंरित हो गए। वह सब काम बहुत तेजी से किया करते थे। फूर्ती से। यही फूर्ती उन्होंने जाने में भी दिखाई। जीवन जीने की सच्ची कला उनके पास थी। हम उनके लिए कभी बड़े हुए ही नहीं। घर में वह रहते तो सभी को उनके होने का अहसास बना रहता। सीधे तौर पर वह हमसे बातचीत नहीं करते थे। एक डर सा उनका रहता था पर वह बेवजह कभी डांटते भी नहीं थे। जाने क्या उनके व्यक्तित्व में था कि उनके सामने कुछ भी कहने की हिम्मत कभी होती ही नहीं थी। हम लोग अपनी बात मां के जरिए उन तक पहुंचाते। तब भी जब स्कूल में पढ़ते थे और तब भी जब स्वयं के बच्चे हो गए। यह उनके व्यक्तित्व का जादू था कि उनके सामने सदा ही बच्चे ही बने रहने का मन करता। काल कवलित वह जब हुए तो इसका अहसास किसे था! याद है, दीपावली उनके साथ ही मनाई थी। और उसके चन्द दिनों बाद ही वह बगैर कोई आहट, हम सब से सदा के लिए दूर चले गए। याद है, वह जयपुर से हमारे आने की बाट जोहते। कहते कुछ नहीं पर पूरी तैयारी करके रखते। मम्मी से पूछते, ‘कब रहा है तुम्हारा बेटा? फोन कर दो, बच्चों के साथ अब जाए।खुद जयपुर कभी कभार ही आते। मम्मी जयपुर होती तो कहते, अपनी मां को वहीं रख लो पर हम जानते थे, मम्मी के बगैर उनका भी मन नहीं लगता था। मम्मी को भी उनकी चिंता लगी रहती सो वह भी कुछ दिन रूककर ही उनके कारण वापस लौट जाती। कहते, ‘घूर सूनो कोनी छोड़ सकूं।हम जानते हैं, घर में क्या था पर शायद उनका मन जयपुर में लगता नही ंथा। अपने घर में ही वह रहना चाहते थे। अपने भाईयों से उनका गहरा लगाव था। बड़े भईया मनोज को साथ रखते। रोज सुबह भतीजी मुक्ता को बस छोड़ने की जिम्मेदारी भी उन्होंने औचक अपने आप ही ओढ़ ली और चिरनिद्रा में जाने वाले दिन तक उसे निभाया। वह काम ऐसे ही ओढ़ लेते थे। ठाले बैठे उन्हें कभी नहीं देखा। हरदम कुछ कुछ करते रहना। गुनगुनाते रहना। कुछ बरसो से वह धार्मिक गं्रथो के प्रति गहरे से आसक्त हो गए थे। बल्कि वेद-पुराणों के नोट्स बनाने लगे थे।
हम उनसे सहमते पर नीहार, यशस्वी (पुत्र-पुत्री) से उनकी खूब घूटती थी। जयपुर से बीकानेर आने का कार्यक्रम के बारे में पता चलते ही स्कूटर को साफ-सुथरा कराने के साथ मिस्त्री से उसे चैक करवाकर रखते, पैट्रोल की टंकी फूल। खुद भले साईकिल का इस्तेमाल करते पर चाहते मैं उनके स्कूटर का ही उपयोग करूं। कभी हमसे कुछ लिया नहीं, बल्कि कभी उपहार स्वरूप ही कुछ लेकर आए तो सख्ती से उसे लेने से इन्कार कर दिया। अपनी तरफ से बस सबका करना, चाहत कुछ भी नहीं। अपेक्षा रहित था उनका जीवन।
बहरहाल, इस लोक में मनुष्य जीवन यात्रा के जो तीन अंष कहे जाते हैं, उनमें से एक अंष कला का है। हर व्यक्ति कलाकार है। बषर्ते वह जीवन जीने की कला में रमे। उसमें बसे। पिताजी इस मायने में निष्छल जीवन से जुड़ी इस समय की दुर्लभप्रायः कला से ही तो जुड़े थे। सोचता हूं, उन्होंने ही तो बहुत से अर्थों में जीवन में पसरे कुहासे को हटाने की कला से साक्षात् कराया। उपदेष देकर नहीं-अपने जिए से। अपेक्षा के अंधकार से वह सदा दूर रहे। उनकी सीख स्वाभिमान से जीने की थी। उसूलों पर कायम रहने की है। पेड़ की जड़ पेड़ का जीवन है। फूल-फल के लिए जड़ को मजबूत करना होता है। वह सदा हरी रखनी होती है। जड़ को खोदकर उपर ले आए तो उसका सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। जीवन भी सूख जाता है। मुझे लगता है, जीवन जड़ को बचाते, उसके सौन्दर्य को अंवेरते वह जूझते रहे। संघर्ष करते रहे, कभी उसे बाहर नहीं आने दिया। याद है, उनका नश्वर शरीर पंचभूत में विलीन हो रहा था,  मन में उनके खरेपन, सच्चाई के जीवन और किसी के प्रति दुराग्रह नहीं रखने के उनके सैकड़ों किस्से ही तैर रहे थे। बहुधा वह लोगों को डांट देते पर क्षण बीतता और वह खुद ही भुल जाते कि उन्होंने कुछ कहा है क्या
अब जब वह नहीं है, सौन्दर्य की उनकी जीवन दीठ गहरे से समझ रही है। मनोभाव छुपाना आसान है, व्यक्त करना कष्टप्रद। कष्ट उठाना हर किसी के बस का कहां! पिताजी ने ताउम्र यह कष्ट उठाए। इसलिए कि उन्हें अपने को छुपाना नहीं आता था। अंदर से किसी का बुरा चाहने वाले, सबके लिए कुछ कुछ अच्छा करने की चाह के बावजूद कटुक्ति के वाक्यबाणों से वह सदा दूसरों को अपना दुष्मन बनाते रहे। शायद इसलिए भी कि भाषा का कारू कार्य उनके पास नहीं था। मन के अच्छे भावों को प्रचलित मीठे शब्दों में व्यक्त करना उन्हें नहीं आता था। वाक्यबाणों से अपने अच्छेपन को सदा वह खुद ही धोते रहे। अच्छेपन को कभी साबित नहीं होने दिया। दावपेच, छलकपट से वह कोसों दूर जो थे! कथित बुद्धि के चातुर्य का सौन्दर्य नहीं। चमक दमक की व्यावहारिकता को परे धकेलते वह जिए।  जिसे जब चाहे कुछ भी सुना दिया। जब चाहे डांट दिया। बगैर इस बात की परवाह किए कि इसका परिणाम क्या होगा। मन में किसी के प्रति कोई बैर-भाव नहीं पर सीधे सट सुना देने से उपजी गांठों को सहते विरोध उत्पन्न करते रहे। भले को भला, बुरे को बुरा कहने में कभी कोई हिचक नहीं की।
सोचता हूं, दान हाथ फैलाकर लिया जाता है। त्याग आंखो से दिखाई पड़ता है लेकिन आडम्बरहीन निष्छलता, भीतर की उदात्तता का वैराग्य किसे कहां दिखता है! पिताजी प्रेमस्वरूपजीभूरजीइस मायने में वैरागी थे। छल वह जानते नहीं थे। झूठ चाहकर भी बोल नहीं सकते थे। अपने लिए कभी कोई चाह नहीं थी। दाव-पेच वह जानते नहीं थे।निर्भर वह किसी के रहना नहीं चाहते थे। नपा-तुला सुचिन्तित रहन-सहन। कहीं किसी से कोई अपेक्षा नहीं। दीनता कभी दिखाई नहीं। बल्कि सहानुभूति कोई जताए, यह भी उन्हें सहन नहीं था। पराभव कभी स्वीकार नहीं किया। 
किसी का दिल दुखाने की इच्छा कभी रही नहीं पर खारे बोल रोक पाना भी तो उकने बस में कहां था! अंदर से कभी किसी का बुरा नहीं चाहते हुए भी बहुतेरी बार बल्कि प्रायः ही बुरे व्यक्ति होने की छवि को वह भोगते रहे। सोचता हूं, खारे बोल अच्छी बात नहीं है पर उसके लिए अंदर के अच्छेपन के द्वार बंद कर देना भी तो कल्याणकारी नहीं है। पिताजी अंदर के अच्छेपन का द्वार खोले खारेपन की छवि से सदा ही बेपरवाह ही रहे। शायद इसलिए कि क्रोध से उनका गहरा नाता था। कोई बात मन माफिक नहीं हुई। कहीं कुछ अनैतिक दिखा, त्वरित क्रोध। दुर्वासा सा। 

यह उनके संस्कार थे। और संस्कारों के विरूद्ध बनावटीपन के सौन्दर्य को वह रच नहीं सकते थे। अब जबकि वह नहंी है, लगता है बहुतेरे उन्हें समझ ही नहीं पाए। पर वह जब नहीं रहे, तब यह भी देखा है कि जो उन्हें समझ गए थे, उनकी स्मृतियों को सहेजे उन्हें भूलना ही नहीं चाहते। जो व्यक्त नहीं कर पाए, वह अब व्यक्त कर रहे हैं। मुझे गर्व है कि मैं उनका पुत्र हूं। वह चले गए। सुख-दुख से परे। देना-पावना चुकाकर लोकातंरित हो गए हैं। अफसोस उनकी मृत्यु का नहीं है। यह तो स्वयं उनका वरण थी। आखिर वह यह कैसे सहन करते कि कोई उनकी तिमारदारी करे। कैसे वह यह सहन करते कि कोई उनसे सहानुभूति जताए। इसीलिए कुछ क्षण पहले जिन्होंने उनसे संवाद किया, उन्होंने उन्हें उनके फक्कड़पन के अलमस्त अंदाज में ही देखा। अफसोस इस बात का है कि जीते जी उनके जीवन जीने की उस कला को नहीं सीख पाया जो पास रहकर भरपूर सीख सकता था। पर इसके लिए उनके जैसा बनना पडता। भला यह बनावटीपन से भरे इस जीवन में क्या संभव था!


Sunday, September 27, 2015

नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो



नर्मदा के अनथक यात्री हैं-अमृतलाल वेगड़। नर्मदा उनके लिए नदी नहीं संस्कृति है। याद है, बचपन में उनकी नर्मदा नदी के यात्रावृतान्त को पढ़ा था। जे़हन में बरसों वह बसा रहा। बाद में तो वेगड़जी की नर्मदा परिक्रमा की त्रयी ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’, ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ और ‘अमृतस्य नर्मदा’ को पढ़ा तो लगा नर्मदा उनके भीतर निरंतर घटती रही है। पर इधर उनकी एक बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाषित हुई है, ‘नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो’। सच! यह वेगड़जी द्वारा नर्मदा सौन्दर्य की भरी गागर है। ऐसी जिसमें नर्मदा के सौन्दर्य का सागर पूरी तरह से समाया हुआ है। 
अमृतलाल वेगड़ इस समय के अद्भुत कलाकार हैं। देष की नदियों में पांचवी सबसे बड़ी नर्मदा 1312 किलोमीटर लंबी है। देष की दूसरी तमाम नदियां पष्चिम से पूर्व की ओर बहती बंगाल की खाड़ी में मिलती है, पर नर्मदा पूर्व से पष्चिम की ओर बहती खंभात की खाड़ी में मिलती है। वर्ष 1977 से इस पवित्र नदी की पदयात्रा का सिलसिला वेगड़जी ने प्रारंभ किया था और तभी से उनके भीतर के कलाकार ने रेखाओं और रंगों में यात्रा अनुभूतियों, स्मृतियां, अंतर्मन संवेदनाओं के साथ ही  विभिन्न रंगीन छपे कागजों की कतरनों के नर्मदा के कोलाज भी बनाने प्रारंभ कर दिए थे। नर्मदा के सौन्दर्य की ठौड़-ठौड़ व्यंजना करते वेगड़जी ने इस नदी की संस्कृति को गहरे से जिया है। पर मन की प्यास देखिए, 4 हजार किलोमीटर की नर्मदा पद परिकमा के बाद भी वह ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ में लिखते हैं, ‘कोई वादक बजाने से पहले देर तक अपने साज का सुर मिलाता है, उसी प्रकार इस जनम में तो हम नर्मदा परिक्रमा का सुर ही मिलाते रहे। परिक्रमा तो अगले जनम से करेंगे।’
नर्मदा के अनथक यात्री अमृतलाल वेगड़ ने इस नदी से विष्वभर के लोगों को अपने लिखे और कलाकर्म से साक्षात् कराया है। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ में वेगड़जी लिखते हैं, ‘यात्रा पर निकलते समय हर बार कहता-नर्मदा! तुम संुदर हो, अत्यन्त सुन्दर। अपने सौन्दर्य का थोड़ा-सा प्रसाद मुझे दो ताकि मैं उसे दूसरों तक पहुंचा सकूं। और नर्मदा ने मुझे कभी निराष नहीं किया। हर बार मेरी झोली छलका दी। मैंने अपने जीवन के उत्कृष्ट क्षण नर्मदा-तट पर बिताए हैं। परिक्रमा के दौरान मैंने कितने पहाड़ देखे, कितनी नदियां पार कीं, टूटी-फूटी धर्मषालाओं में रात रहा, ठंड में ठिठुरा, गरमी में झुलसा। खूबसूरत लेकिन कठिन पगडंडियों पर चला। खुला आकाष, हरियाली से लहलहाते खेत, सुरम्य प्रभात, जाने क्या-क्या देखा। कितने सुहाने थे वे दिन-एक से बढ़कर एक!’
वेगड़जी की सद्य प्रकाषित कृति ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ का आस्वाद करते उनके इस कहे साक्षात् भी होता है। इसमें थोड़े शब्द हैं, चित्र और रेखांकन अधिक। नर्मदा तट पर तपस्या करके उसे तपोभूमि बनाने वाले ऋषियों के साथ सुदूर केरल से आकर नर्मदातट पर विद्याध्ययन करने और अत्यन्त मधुर नर्मदाष्टक लिखने वाले आदि शंकाराचार्य को निवेदित इस कृति में ‘एक नदी की सौंदर्ययात्रा’ में वेगड़जी ने शांतिनिकेतन में हुई अपनी षिक्षा-दिक्षा के साथ ही प्रकृति के सौन्दर्य को देखने की दृष्टि देने वाले आचार्य नन्दलाल वसु को षिद्दत से याद किया है। वह लिखते हैं, ‘जब पढ़ाई पूरी करके घर आने लगा तो गुरू के आषीर्वाद लेने गया। चरणस्पर्ष करके बैठा तो उन्होंने कहा, ‘बेटा, जीवन में सफल मत होना, अपना जीवन सार्थक करना।’ वेगड़जी ने यही किया। नर्मदा की परिक्रमा में अपने जीवन की सार्थकता देखते उन्होंने एक साथ नहीं, रूक-रूक कर, खंडो में नर्मदा की यात्रा की। उनके समस्त सृजन का आधार बाद में यही नर्मदा बनी। वह लिखते हैं, ‘नर्मदा ने मेरी कला को नया आयाम दिया। मेरी प्रथम परिक्रमा के समय नर्मदा तट का एक भी गांव डूबा नहीं था। नर्मदा बहुत कुछ वैसी ही थी जैसी सैंकड़ो वर्ष पर्वे थी। मुझे इस बात का संतोष रहेगा कि नर्मदा के उस विलुप्त होते सौंदर्य को मैंने सदा के लिए इन पृष्ठों पर संजोकर रख दिया।’
यह सच है। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ इस दीठ से अपूर्व है। नर्मदा के सौन्दर्य चितराम ही इसमें पन्ने दर पन्ने मंडे हैं। रेखाओं के उजास में इसमें वेगड़जी के नदी मे ंस्नान करती, घाट पर कपड़े बदलती स्त्रियों के मनोरम स्केच हैं। गांव की संस्कृति, वहां के लोगों की बतकही, आस्था के सींचन को ठौड़-ठौड़ उद्घाटित करते नर्मदा से जुड़े जीवन को उन्होंने इसमें अपने कलाकर्म से जैसे जीवंत किया है। और सबसे महत्वपूर्ण यह भी है कि इसमे उनके वह पेपर कोलाज हैं, जिनमे नर्मदा का सौन्दर्य झिलमिलाता हमें उसके होने का जीवंत अहसास कराता है।
वेगड़जी विभिन्न रंगीन छपे कागजों की कतरनों से कोलाज बनाते हैं। आरंभ में सपाट पोस्टर पेपर से उन्होंने कोलाज बनाए परन्तु बाद में ‘नेषनल ज्योग्राफिक’ पत्रिका के रंगीन पृष्ठ ही उनके रंग और रेखाएं होते चले गए। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ के पन्ने उनके इन्हीं पेपर कोलाज की सुरम्यता से लबरेज हैं। अचरज होता है! कैसे छाया-प्रकाष, जल के सूर्य से बदलते रंगों और जीवन से जुड़े सरोकारों की रंग धर्मिता को कैसे वेगड़जी ने कागजों से निर्मित अपनी कला में जीवंत किया है। लगता है, नर्मदा ने उनका इसमें निरंतर साथ दिया है। यह है तभी तो उनके रंगीन पेपर कोलाज में नर्मदा से जुड़ा जीवन गहरे से उद्घाटित होता देखने वाले के मन में जैसे हमेषा के लिए बस जाता है। एक पेपर कोलाज है, पेड़ की छांव उकेरता। मिट्टी और झांकते पेड़ के पत्तों और जमीन पर सूखे बिखरे पत्तों का परिवेष जैसे पूरी तरह से उद्घाटित हो गया है। छांव को पार कर वहां से गुजरते लोगों का पुस्तक का यह अद्भुत चितराम है। ऐसे ही ‘अमरकंटक से यात्रा शुरू’ पेपर कोलाज भी अद्भुत है। इसमें यात्रा की तैयारी की अनुभूति भर नहीं है बल्कि नर्मदा से जुड़ा वह परिवेष भी है जिसमें अभी भी कलाकार का मन बसा है। ‘नमामि देवी नर्मदे’ का स्त्री रेखांकन और बाद में नर्मदा पर दीप दान करती स्त्रियों के चित्र भी रंग-रेखाओं का अद्भुत लोक रचते हैं। ‘अमरकंटक के तीर्थयात्री’ पेपर कोलाज में यात्रा से जुड़े मन की सुमधुर व्यंजना है। और ‘कपिलधारा अमरकंटक’ कोलाज तो अद्भुत है। तेजी से बहते झरने के पानी का श्वेतपन और आस-पास का रंगाकन माधुर्य की सीमा को भी पार करता है। वेगड़जी के पेपर कोलाज की यही विषेषता है। वह अपने इस कलाकर्म में समय को जैसे व्यंजित करते संस्कृति का उसमें छांेक लगाते हैं। ‘नगारावादक’, ‘एक कन्या’, ‘बैगा महिला’, ‘रात में घाट’, एकांत स्नान, ‘विश्राम’, ‘दही मथती नारी’, ‘वानरलीला’, ‘एक शांत पहाड़ी गांव’, आदि बहुतेरे कोलाज ऐसे ही पुस्तक में हैं जो नर्मदा नदी की उनकी यात्रा की जीवंत गवाही सरीखे है। और वह चित्र तो अद्भुत है जिसमें नर्मदा को पैदल पार करते दंपति को उकेरा गया है। पेपर में अपना झोला उठाए दंपति की इस नर्मदा यात्रा के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है। वेगड़जी के पास वह दृष्टि है जिसमे ंवह स्थानों को उसके भुगोल में ही नहीं वहां के संस्कार, संस्कृति में देखने वालों को बंचवाते हैं। पुस्तक में उनके रेखांकन की लय और निहित बारीकी में भी मन अटक अटक जाता है। ‘ओंकारेष्वर’ का रेखा चित्र ऐसा ही है। टापू पर स्थित ओंकारेष्वर को उसकी पूर्णता में उकेरते वह उससे जुड़े परिवेष को इसमें गहरे से व्यंजित करते हैं। यह सच है! प्रकृति को देखने की उनकी कला दृष्टि अपूर्व है। इस कला दृष्टि से उपजे उनके पेपर कोलाज, रेखांकनों पर पन्ने दर पन्ने लिखे जा सकते हैं फिर भी जो कुछ लिखा जाएगा, वह कम ही लगेगा।
बहरहाल, नर्मदा के अनथक यात्री अमृतलाल वेगड़ की कृति ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ का आस्वाद करते मन नहीं भरता। मुझे लगता है, हिन्दी में अपने तरह की यह विरल कृति है। यहां यात्रा के सौन्दर्य का शब्द गान है, रेखाओं का आकाष भर उजास है और है, वह रंगीन चित्रकृतियां जिससे नर्मदा के सौन्दर्य का घूंट घूंट पान किया जा सकता है। नर्मदा को उसकी समग्रता में, दिखाती-बंचाती ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ कला जगत को अमृतलाल वेगड़ का अप्रतीम उपहार है। नर्मदा के सौन्दर्य का वेगड़जी का शब्द कहन देखें, ‘नर्मदा सौन्दर्य की नदी है। वह चलती है उछलती कूदती, बलखाती, चट्टानों को तराषती, पहाड़ों में मार्ग तलाषती, डग-डग पर सौन्दर्य की सृष्टि करती, पग-पग पर सुषमा बिखेरती।’ मुझे लगता है, उनकी कृति में इस शब्द कहन का चित्र सच है। 
अमृतलाल वेगड़ इस समय 87 वर्ष के हैं। नर्मदा की 400 किलोमीटर की पद परिक्रमा उन्होंने की। सहधर्मिणी कान्ता भी 2002 में उनके 75 वें वर्ष में प्रवेष के समय 1250 मिलोमीटर साथ चली। नर्मदा को अपनी पदयात्राओं और कलाकर्म में उन्होंने गहरे से जिया है। ‘नर्मदा तुम कितनी  सुन्दर हो’ कृति में नर्मदा, उसके मोड़, घाट, नदी को पार करते ग्रामीणों, बैगा, गोंड, भील, आग तापते ग्रामीण, ग्रामीण गायक, पडे-पुरोहित, नाई, चक्की पीसती या मूसल चलाती महिलाएं और तमाम नर्मदा यात्रा का परिवेष रेखांकनों और पेपर कोलाज में जैसे हमसे बतियाता है। सौन्दर्य के अविराम चितराम है उनकी यह कृति। बावजूद इसके वेगड़जी इसमें लिखते हैं, ‘नर्मदा के राषि-राषि सौन्दर्य में से अंजुरी भर सौंदर्य ही लरा सका हूं। कोई असीम को कैसे समेट सकता है? इसलिए जो लाया हूंू वह ‘चिड़ी का चोंच भर पानी’ ही है।...‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ की यह व्यंजना गुदगुदा रही है। यह सब लिख दिया है पर मैं फिर से इस कलाकृतिनुमा पुस्तक के पन्ने पलटने लगा हूं। सौन्दर्य का घूंट घूंट आस्वाद कर रहा हूं, करता रहंूगा। अवसर मिले तो आप भी करियेगा।


Sunday, September 20, 2015

प्रीत घुली आंचलिकता


सत्यनारायण जी अपने लिखे में धोरों की धरा का माधुर्य बंचाते हैं। उनके लिखे अनूठे गद्य और पद्य में ठौड़-ठौड़ आंचलिकता की सौंधी महक है। सद्य प्रकाशित  कविता संग्रह ‘जैसे बचा है जीवन’ को ही लें। प्रीत रंग घुली कविताओं का यह अनूठा कैनवस है। स्मृतियां के वातायन में ले जाता। धोरों का सांगीतिक आस्वाद यहां है। मन करता हैं, लिखे को गुनें। सहेज लें सदा के लिए। 
बिम्ब, प्रतीक और मुहावरों में हृदय का अंतरतम जैसे उद्घाटित होता कवि का सच बहुतसे स्तरो पर आपका-हमारा सच बन जाता है। शब्द संवेदनाओं के मर्म में वह राजस्थान की रेत से हेत कराते हैं। इसीलिए तो तपती रेत, पगथलियों, भोलावण, रोहिड़ा, मोरचंग, फोग, लाय, हेला, कांसे के थाल जैसे बहुतेरे बरते कविता संग्रह के उनके शब्दों में छलकता प्रीत का माधुर्य हममें बस-बस जाता है।
सत्यनारायण जी की कविताएं एक तरह से स्मृतियों का किवाड़ खोलती है। कहन के किसी संदर्भ का द्र्श्यालेख बंचाती हुई। आस्वाद करें कविता की इन पंक्तियां का, 
‘तपती रेत पर
तुम्हारी पगथलियों की छाप
तमाम आंधियों के बावजूद
यों की यों मंडी हुई है
...कभी आओ तो
समन्दर से पूछेंगे इसकी कथा।’ 
और यही क्यों, उनकी कविताएं शब्द के भीतर बसे शब्द से भी अनायास ही साक्ष्यात कराती है. अर्थ गर्भित संवेदनाओं के अनूठे बिम्ब इनमे हैं-
‘मैं धीरे से
उसके कान में फुसफुसाया
वह बोली
और धीरे से
नहीं तो देवता सुन लेंगे..’ 
यहां  लिखने भर के लिए ही नहीं हैं, शब्द। इनमें मौन का वह विराट भी अर्न्तनिहित है जिसमें कुछ नहीं कहते हुए भी सबकुछ खोल के रख दिया जाता है। इसीलिये कहूँ, सत्यनारायण जी की कविताएं अल्प शब्दों में संवेदनाओं का गहरा आकाश रचती है। ‘मैं भेजूंगा/कुरजां के संग/सन्देश, ’‘‘कभी बताओगे/फोग’, ‘धोरों में बहती है/एक नदी/मेरे भीतर हिलोरें लेता है/एक समन्दर’, ‘धोरों पार से सुनायी देता है/एक हेला’ जैसी लूंठी-अलूंठी व्यंजनाओं में सत्यनारायण जी ने अपने इस संग्रह में प्रीत से जुड़े संदर्भों को सर्वथा नया मुहावरा दिया है। 
प्रीत से जुड़ी संवेदनाओं का मार्मिक कहन है, संग्रह की उनकी कविताएं। हां, इनमें गुम हुई प्रीत की तलाश  की आहटें भले शब्द दर शब्द है पर सच यह भी है कि प्रीत के बिछोह में उदासी पसराता सन्नाटा नहीं बुनती उनकी यह कविताएं। प्रीत की सुगंध घुली स्मृतियों में मिट्टी की सौंधी महक इनमें है। यह है तभी तो ‘तपते धोरों के बीच/रोहिड़े के/फूलों की तरह/बचाया है मैंने तुम्हें/अपने भीतर’ और ‘आंख बस/जरा सी झपकी/तुम कब/चली आयी भीतर/चुपचाप’ सरीखे शब्द कहन में वह अपने संप्रेषण का आग्रह नहीं रखते हुए भी चुपके से पाठक के मन में सदा के लिए बस जाते हैं। 


Tuesday, September 15, 2015

नमन हिन्दी। नमन!


एक मोटे अनुमान के अनुसार देष में 42 प्रतिषत आबादी हिन्दी भाषी है। देष में सर्वाधिक अखबार हिन्दी के निकलते हैं। सर्वाधिक फिल्में हिन्दी की बनती है और विज्ञापन और मीडिया में बरती जाने वाली भाषा का मूल आधार भी हिन्दी ही है। इस सबके बावजूद जब हिन्दी भाषा के संरक्षण और विकास पर चिंता जाहिर की जाती है तो लगता है, कुछ है-जिससे हिन्दी के गौरव को ठेस पहुंच रही है। यह कुछ क्या है? जब भी इस पर विचार करता हूं, जेहन में बहुत सी यादें कौंध-कौंध जाती है।
देशभर में कला-संस्कृति, पर्यटन और मीडिया विषयक व्याख्यान के लिए जाना होता रहता है। हिन्दी में लिखता हूं, हिन्दी में सोचता हूं सो स्वाभाविक ही है कि जहां कहीं जाता हूं, हिन्दी में ही संवाद करता हूूं परन्तु अपने गौरव के परिवेष से बाहर झांकता हूं तो ताम-झाम और अनर्गल चकाचैंध में अपने को दोयम दर्जे में घिरा भी बहुतेरी बार पाता हूं। शायद इसलिए कि हमने खुद ही संपन्नता का पूरा का पूरा बोध अंग्रेजी भाषा को अपने तई सौंप दिया है। तमाम बड़े आयोजनों, संगोष्ठियों का मूल भले भारतीय संगीत, नृत्य, नाट्य हो परन्तु वहां संवाद की भाषा जानबूझकर अंग्रेजी चुनी जाती है। बड़ा कारण यह भी है कि जो कुछ बड़े स्तर पर क्रियान्वित होता है-उसका आधार अंग्रेजी भाषा ही है। 
अभी बहुत समय नहीं हुआ, उदयपुर में पर्यटन पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक सत्र की अध्यक्षता का निमंत्रण मिला था। सुखद लगा। देषभर से पर्यटन विषेषज्ञ एक मंच पर उपस्थित थे। आयोजन से कुछ समय पहले तमाम लोगों से वार्तालाप हिन्दी में ही हुआ पर जब कार्यक्रम की शुरूआत हुई तो संयोजक ने अंग्रेजी का दामन थाम लिया। यह तो अच्छा था कि आयोजन के मुख्य अतिथि संसदीय सलाहकार बोर्ड के सदस्य श्री रघुनंदन शर्मा थे-जिन्होंने अपने उद्बोधन हिन्दी में प्रारंभ किया और बाकायदा उनने हिन्दी में अपने को बखूबी संप्रेषित भी किया। चूंकि ऊपर से हिन्दी मे संवाद की पहल हुई सो बाद में तमाम मंच हिन्दी की लय में अपनापे की तलाष का आकाष बनता चला गया। बल्कि तमाम वह जो अंग्रेजी में बोल रहे थे उन्होंने न केवल हिन्दी में बोला बल्कि यह बताने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी कि उनकी हिन्दी बेहतरीन है। पर विडम्बना यह भी है कि यह वह लोग थे जो आमतौर पर हिन्दीभाषी हैं और सामान्य संवाद की उनकी भाषा हिन्दी ही है परन्तु सभा-सम्मेलन में अंग्रेजी में अपने को संप्रेषित कर ही वह अपने को धन्य समझते रहे हैं।
बहरहाल, अंग्रेजी में संवाद बुरा नहीं है। भाषा कोई भी हो, कहां बुरी होती है परन्तु जब उसके जरिए आप अपने को स्थापित करने के प्रयास में हो तो जरूर स्थिति सोचनीय हो सकती है। इस समय यही हो रहा है। देषभर में उच्च स्तर पर अंग्रेजी का बोलबाला है। व्यक्तिगत मैं यह भी पाता हूूं कि इस बोलबाले में ही हिन्दी की बेचारगी की बात की जाती है। पर यह पूरा सच नहीं हे। यह सच है, अंग्रेजी में भाषिक व्यंजना तो बहुतेरे बेहतरीन करते हैं परन्तु वहां विचार अमूमलन गौण होता है। अंग्रेजी के बोलबाले की एक और भी वजह है, तमाम जो कुछ आपका नही ंहै, वह सूचना और संचार प्रौद्योगिकी से आपका हो गया है। गूगल और दूसरे सर्च इंजन पर जानेभर की जरूरत है, अंग्रेजी में सब कुछ तैयार मिल जाएगा और फिर उसके लिए अलग से कुछ तैयारी की जरूरत नहीं है। पर्यटन संगोष्ठी के एक सत्र की अध्यक्षता जब कर रहा था तो इसे षिद्दत से महसूस किया। पर्यटन षिक्षा से जुड़े विद्वतजन और शोधार्थी जो प्रस्तुत कर रहे थे वह आकर्षक, ताम-झाम भरा था परन्तु वहां पर नया कुछ  नहीं था। केरल के पर्यटन विकास को आदर्ष रूप में प्रस्तुत करने की घिसी-पीटी सोच से जुड़ा एक शोध पत्र था, एक शोध पत्र होटल उद्योग में कार्मिकों के प्रबंधन से जुड़ा था, एक में पर्यटन और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों का मायाजाल था और ऐसे ही कुछ और भी थे जिनमें शोध निष्कर्ष कुछ निकाला नहीं जा सकता था। स्पष्ट था, जो कुछ प्रस्तुत किया गया वह इन्टरनेट की मदद से तैयार कर ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’ सरीखा ही था। अंग्रेजी इसीलिए धड़ल्ले से चल रही है। पर अब तो यूनिकोड में भी आप सर्च इंजनों पर कुछ तलाषेंगे तो बहुत कुछ पा जाएंगे पर इसका अभ्यास अभी बहुत से स्तरों पर है नहीं।
बहरहाल, लौटता हूं फिर से संगोष्ठह की चर्चा पर। वहां जो अनुभूत किया वह  किसी एक संगोष्ठी का सच नहीं है। तमाम बड़ी संगोष्ठियों का आज का सच यही है। वहां जो कुछ प्रस्तुत होता है, अंग्रेजी में होता है। यहां तक कि जो हिन्दी माध्यम से पढ़कर आए हैं-वह अपने आपको अंग्रेजी में प्रस्तुत कर गौरवान्वित करते हैं। बल्कि अंग्रेजी में अपने को संप्रेषित कर वह अपने को लगातार धन्य करते हैं। यह बात इसलिए कि मेरे एक मित्र है जो राजस्थान से ही है परन्तु इन दिनों भारत सरकार के एक बडे संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर जुड़े हैं। एक संगोष्ठी में उनके साथ था। संयोग देखिए, मैंने अपने को हिन्दी में संप्रेषित किया- उपस्थितजनों को बहुत अच्छा लगा। और सबके सब जो अंग्रेजी बोल रहे थे, हिन्दी में लौट आए। बल्कि कहूं उन्हें सहज लगा, अपनी भाषा में बतियाना। जब सारा माहौल हिन्दी का हो गया, उन्होंने भी बोलना प्रारंभ किया। कहा, ‘मैं प्रयास करता हूं, हिन्दी में बोलने का।’ घोर अचरज हुआ। जो हिन्दी भाषी है, घर की भाषा जिनकी हिन्दी है, वह यह कहे कि प्रयास करता हूं हिन्दी में बोलने का। ऐसा ही हो रहा है। इसलिए कि हिन्दी भाषी ऐसे अंग्रेजीदां लेागों ने जो कुछ पाया, उसका बड़ा आधार वह अंग्रेजी भाषा शायद रही जिसमें मौलिक सोच और चिंतन नहीं होते हुए भी बहुत कुछ पाया जा सकता है।
देषभर में घुम्मकड़ी करते, विषेष रूप से कला-संस्कृति और पर्यटन पर व्याख्यान के लिए जाना निंरतर होता है। स्वीकार करता हूं, पहले-पहले अपने को संप्रेषित करने के लिए अंग्रेजी मे ही ंतैयार किया। बहुत से स्थानों पर बोलकर धन्य भी हुआ पर धीरे-धीरे लगा, अपनी भाषा में जितना सहज रहता हूं, मौलिक चिंतन को व्यक्त कर पाता हूं उतना अंग्रेजी में नहीं सो तय कर लिया-अपने आपको सदा हिन्दी में ही व्यंजित करूंगा। यही करता रहा हूं और सदा अपने को गौरवान्वित भी महसूस किया। इसलिए कि जब कभी हिन्दी में प्रारंभ किया, तमाम माहौल अपने आप ही हिन्दी का होता चला गया। 
याद है, दिल्ली से ललित कला अकादमी की ओर से ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर चंडीगढ में आयोजित राष्ट्रीय कला सप्ताह में भाग लेने और संवाद करने का निमंत्रण मिला था। संशय मंे पड़ गया। संशय इस बात को लेकर था कि संवाद हिन्दी में करना है या अंग्रेजी में। चंडीगढ़ ललित कला अकादमी की मेजबानी में आयोजित समारोह के निमंत्रण पत्र से लेकर तमाम संवाद, औपचारिकताएं अंग्रेजी में ही हो रही थीं। यूं भी केन्द्रित विषय में हिन्दी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। सो मेरा संशय भी वाजिब ही कहूंगा। पहुंचने पर चंडीगढ़ ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और देश के जाने माने छायाकार दिवान मन्ना ने गर्मजोशी से अंग्रेजी में ही स्वागत किया। होटल में कुछ और भी प्रतिभागी थे, सबके सब अंग्रेजीदां। हिन्दी वहां भी कहीं नजर नही आ रही थी। दूसरे दिन एक कला की एक प्रतिष्ठित पत्रिका के तब के संपादक राहुल भट्टाचार्य ने अंग्रेजी में संयोजन की अपनी शुरूआत में ही जता दिया कि हिन्दी का वहां कोई स्थान नहीं है। कलाकार  विभा गहरोत्रा ने भी उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से मोहर लगायी। अब बारी मेरी थी। जानबूझकर हिन्दी में बोला। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। हाॅल खचाखच भरा था और तमाम लोग मुझे समझ रहे थे। यह बात इसलिए लगी कि बाद में प्रष्नों का जो दौर प्रारंभ हुआ, उसमें सब के सब बजाय मेरे अंग्रेजी बोलने वाले मित्रों से आधुनिक तकनीक और कला पर सवाल पूछने के मुझसे ही बहुत कुछ जानने को उत्सुक थे। ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर हिन्दी में दिए तर्क और कला संवेदना की व्याख्या को समझते हुए भी विडम्बना यह थी कि राहुल और विभा मंच पर अंत तक अंग्रेजी पर ही अडे रहे, मैं हिन्दी पर। प्रष्नो ंकी बोछार अंग्रेजी में ही हुई, निरंतर होती रही परन्तु मैं हिन्दी में जवाब दर जवाब देता रहा। सुकुन भी हुआ कि मुझे सुनने को अंत तक वहां आए लोग उत्सुक रहे और उन्होंने मेरे तर्क और दिए जवाबों से संतुष्टि भी जताई। बाद में उनकी सराहना और मीडिया के रूख से यह भी लगा कि मेरी हिन्दी वहां चल गई थी-अच्छे से।
इस परिप्रेक्ष्य में मुझे यह भी लगता है कि भारत में अभी भी पर्यटन, कलाएं और संस्कृति जनरुचि का विषय शायद इसीलिए नहीं बन पायी है कि यहां पर अव्वल तो कला के सार्वजनिक आयोजन ही नहीं होते और जो होते हैं, उनमें हिन्दी कहीं नही होती जबकि इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आज भी आम जन की भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी में कला आलोचना और संगीत, नृत्य, नाट्य पर बेहतरीन सामग्री के नहीं होने का जो रोना रोया जाता है, उसका एक बड़ा कारण क्या यही नहीं है कि हमारे यहां जो कुछ नवीन होता है, उसमें हिन्दी का कहीं कोई स्थान ही नहीं रखा जाता। जो कुछ छपता है, अंग्रेजी में। जो कुछ प्रस्तुत किया जाता है अंग्रेजी में। हिन्दी की शायद वहां जरूरत ही नहीं महसूस की जाती। हिन्दी को फिर क्यों दोष दिया जाए! 
बहुतेरे हिन्दी की बेचारगी पर अफसोस जताते हैं परन्तु मुझे अपनी हिन्दी कभी बेचारी नहीं लगती। इसलिए कि मेरे चिंतन का आधार यही भाषा है। इसलिए भी कि मुझे विचार का आलोक इसी से मिलता है और इसलिए भी कि हिन्दी ने ही मुझे सब कुछ दिया है। मुझे पता है, मेरे हिन्दीभाषी बहुतेरे मित्र अंग्रेजी का सहारा इसलिए लेते हैं कि उनके पास उस भाषा के अलावा अपने को व्यंजित करने का खास कोई विचार नहीं है। अंग्रेजी का महत्व बहुत से स्तरों पर इसीलिए शायद है कि इसके जरिए आप अपने को स्थापित करने की जुगत बिठा सकते हैं। पर हिन्दी हमारी संस्कृति है और इसी से हम अपने आपको जड़ों से जोड़े रख सकते हैं। जड़ो से विलग होकर दीर्घ समय तक कोई अपने को खड़ा नहीं रख सकता है। इसीलिए मुझे गर्व है, मैं हिन्दी में बतियाता हूं, हिन्दी पढ़ता हूं और अपने को बेहतरीन ढंग से संप्रेषित करने के लिए इस भाषा को चुनता रहा हूं। अपनी भाषा हिन्दी का मैं आभारी हूं। नमन हिन्दी। नमन! 


Sunday, August 23, 2015

कविताओं में अंवेरा शब्दों का अमृत-कुंड

ऐसे दौर में जब कविताओं से लय लोप हो रही हो और नकलीपन और निर्जीव वाग्मिता में कविता महज शब्दों का शोर बनती जा रही हो, कवि, चिंतक नंदकिशोर आचार्यजी का होना आश्वस्त  करता है। परम्परा बोध के बगैर आधुनिक दीठ और सांस्कृतिक शून्यता के इस कविता समय में आचार्य जी की कविताएं हमें जैसे उबारती है। कविता की उनकी यह पंक्तियां देखें-‘न सही/तुम्हारे में/मैं कहीं/अंधेरों में सही/दृश्य  से थक कर/जब-जब मुॅंदेगी आॅंखें/पाओगी मुझको वहीं।‘
कविता हालात की बयानबाजी नहीं है। घटनाओं की परिधि में शब्दों का सम्मोहक आवरण भी वह नहीं है। अंतर्मन संवेदनाओं का सुवास है कविता। इस दीठ से आचार्य की कविताएं कलात्मक अनुशासन  में विचार, भाव और रूप का विरल साहचर्य हैं। कविता कहन की उनकी भंगिमा में भाव-संवलित दृश्यात्मकता  मन को मोहती है, ‘यह डबडबा रहा है/आकाश  में जो जल‘ या फिर ‘खुद में खिलाना ही पेड़ होना है-/केवल हरा होना नहीं‘ या फिर ‘कितनी भी घनी हो/बारिश /कहीं कोई कोना/रह जाता है सूखा’ और ‘सूखा है तो क्या/रूंख है वह/इतना तो बनता है न/बारिश  का सम्मान‘ जैसी संग्रह की ढेरों व्यंजनाओं में नंदकिशोर आचार्य एकांत के क्षणों में उपजे चिंतन के कविता दृश्यलेख हमारे समक्ष रखते हैं। और यही क्यों, ‘सूर जनता है/गुंगापन’ सरीखी व्यंजना में वह मौन को भी स्वर देते हममें कवि रूप में जैसे गहरे से जैसे बस जाते हैं। मुझे लगता है, उनकी कविताएं सांस्कृतिक संदर्भों का विरल पाठ है। 
कविता संग्रह : आकाश भटका हुआ 
कवि :             नंदकिशोर आचार्य 
प्रकाशक : वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिखर,
                शिवबाड़ी रोड, बीकानेर -334001 

‘आकाश भटका हुआ’ संग्रह की कविताओं में विचार है, चिंतन का नया आकाष है पर आरोपित होता नहीं, हममें गूंजता जैसे आलोक का नया सिरा पकड़ाता हुआ। प्रकृति साहचर्य जनित एकांत के अनूठे राग में घुली शब्द व्यंजना देखें, ‘अनुरणन है जिस का /सारा आकाश /उस पुकार की/गुमशुदा लय हूं‘। आचार्य की कविताओं में प्रकृति से जुड़े ऐसे ही अनूठे आख्यान है-मौलिक दीठ लिए। दार्शनिक बोध में यहां वह मौसम को जीवन से जोड़ते हैं तो कभी मूक आकाश को अपने गूंगेपन से अभिहित करते धरती के संग सूरज के होने में सौन्दर्य, कोमलता की तलाश करते हैं। उनकी कविता शब्दों के अमृत कुण्ड में ले जाती है, ‘तुम भी भला क्या करती/डंक है केवल तुम्हारे पास/जहरीले/मेरे पास है/शब्दों का अमृत-कुंड’।
आचार्य जी के पास कविता का अपना मुहावरा है। अंतर्मन संवेदनाओं की लय में वह ‘सूनेपन के बसाव’, ‘किसी को नहीं निवेदित/है जो/ऐसी प्रार्थना हूं मैं‘ जैसी मर्मस्पर्षी पंक्तियांे में कविता की स्वच्छ मनोभूमि का सहज सौन्दर्यबोध कराते हैं। 
‘आकाश भटका हुआ’ संग्रह कविता में खोई हुई लय का गान है। उस प्रकृति की लय का जिससे हम हैं, उस पेड़ की लय का जिससे हरे हैं हम, उस पक्षी की लय का जो हममें अभी भी बैठा कहीं गा रहा है।  और हां, यह कविताएं उस शीला, धूप, हवा के प्रति कृतज्ञता का गान भी है जो हमें किसीन किसी रूप में कुछ अनायास देती है। जीवनानुभूतियों को अनुभव की कसौटी पर कसते-परखते आचार्य अपनी कविताओं में अभिप्रायों के लूंठे आख्यान हमारे समक्ष रखते हैं, ‘आकाश  भटका हुआ’ को पढ़ते यह अहसास बार-बार होता है।

Wednesday, July 29, 2015

राजस्थानी कवितायें



राजस्थानी  कविताओं का  "दुनिया इन दिनों" पत्रिका

 के ताजा अंक में कवि, आलोचक मित्र नीरज दइया 

ने अनुवाद किया है. अनुवाद में उन्होंने मूल को गहरे 

से जिया है. सोचा, उनके इस जतन को आपसे भी 

साझा किया जाना चाहिए...



दृष्टि देती है कविता

अकाल सुनाता है-
अनहद नाद,
कवि तुम भी गाओ-
गीत मनों के।
अलग-अलग है-
सबका अपना-अपना आकाश
पर धरती सभी की एक !
हे मनुष्य !
मत भूल मनुष्यता
कविता देती है-
दृष्टि।
००००

कविता है हथिहार

इससे पहले
कि सूख जाए
सभी हरियल वृक्ष
आकाश से
बरसने लगे अंगारे
तारों की छांह में जाकर
सुसताने लगे सूरज
उजियारा करने लगे प्रयास
अंधेरे में छुप जाने के
इससे पहले कि
दौड़ने लगे
उम्मीदें और आशाएं
सूख जाए आंखों से पानी
आओ !
इस भरोसे के बल रचें कविता
अंत में कविता ही है
अनहोनी में आयुध।
००००

जीवन

जब जगता हूं
तब हो जाता है उजाला
जीवन है- उजाला।

जब होता है अंधेरा
तब आ जाती है नींद
मृत्य है- निद्रा।

जब लिखता हूं
तब हो जाता हूं आकाश
मन है- आकाश।

जब सोता हूं
तब आते हैं स्वपन
आकाश है- सपनें।

जब मंदिर जाता हूं
तब प्रार्थना करता हूं
पछतावा है- प्रार्थना।

जब नहीं हल होती समस्याएं
तब आता है क्रोध
अंतस का भय है- क्रोध।

उजाला, निंद्रा, आकाश,
स्वपन, प्रार्थना, क्रोध-
इन सब को कर के एकत्र
जीता हूं- यह जीवन !
००००

चाय पीते हुए मां

जब पास नहीं होती मां
रहती है वह
आंखों में हमारी।
छुट्टी के दिन
धूप चढ़ने तक
नहीं उठती बहू
कुछ फर्क नहीं पड़ता
मां के
वह उठ जाती है अल-सवेरे
लेकिन नहीं छोड़ती बिछौना
डरती है कि कहीं आवाज ना हो कोई
चाय पीने की तलब होते हुए भी
नहीं जगाती बहू को।
चुप-चाप प्रतीक्षारत
घड़ी में तलाशती
बहू के सवेरे को 
और बहू भीतर संकुचाती
जब उठती है, कहती है-
“आज देर हो गई
आपको चाय नहीं दे सकी,
अभी लाती हूं...”
चाय पीते हुए मां
साफ झूठ बोलती है-
“आज मेरी भी आंख
जरा देरी से ही खुली थी।”
००००

रेत-घड़ी

हवा पौंछती है
धोरों पर अंकित पद-चिह्न
रहता नहीं कुछ भी शेष
रेत-घड़ी 
कण-कण का करती हिसाब
जो बीत गया
कर देती है उसको-

मुक्त !

००००

Tuesday, June 16, 2015

मुअनजोदड़ो



पुरातत्व के संदर्भ आमतौर पर बोझिलता लिए होते हैं। उदासीनता पसराते। पुरातत्व की खुदाई से निकले नतीजों की सभ्यता से जुड़े यात्रा के वर्णन भी  नहीं के बराबर ही हैं। शायद इसलिए कि पुरातत्व की खुदाई से निकले पत्थर, मिट्टी, हड्डियां, धातुएं, इंटे-टीले संभावनाओं की एकरस कहानियां के ‘हो सकता है’ सरीखे निष्कर्ष ही लिए होते हैं।  यह सही है, पुरातत्व की खुदाई भूमि के भीतर छुपी सभ्यता की परतें खोलती है परन्तु उसमें जीवन और संस्कृति का माधुर्य प्रायः नहीं होता है। मुर्दा हुए युग की कहानी से हर किसी को बहुत अधिक वास्ता भी तो नहीं होता! हां, पाकिस्तान में सिंध के लरकाना (शुद्ध रूप लाड़काणा) जिले में कराची से कोई 150 मील उत्तर-पूरब रेत में मोहनजोदड़ो की खुदाई से ही पहले पहल यह जाना गया कि भारत की सभ्यता उतनी ही पुरानी है जितनी की सुमेर-बाबुल और मिश्र की। इसी मोहनजोदड़ो सभ्यता की कहानी को अपनी यात्रा में बेहद रोचक अंदाज में जिया है, ओम थानवीजी ने अपनी यात्रावृतान्त पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ में। ‘मुअनजोदड़ों’ यात्रा संस्मरणो की बंधी-बंधाई लीक से हटकर है। 


इसलिए कि इसमें यात्रा से जुड़े अनुभव भर ही नहीं है। पुरातत्व से मिली खुदाई की दास्तां में अतीत के गलियारों में ले जाता लेखक आपको अपने संग ले चलता शब्द दर शब्द चलचित्र की मानिंद जैसे युग यात्रा कराता है। टाईम मषीन की मानिंद। आपने इस मषीन में पन्ने बांचने का बटन दबाया नहीं कि पूरा का पूरा अतीत आपकी आंखोें में जैसे तैरने लगेगा। अतीत ही क्यों, वर्तमान से जुड़ा वह समय भी जिसमें बीते समय की आहटें हैं और भविष्य से जुड़ा काल भी और उसके प्रष्न भी। ‘मुअनजोदड़ों’ में ओम थानवी ने व्यक्ति को भीतर की ओर मोड़ने वाले योग के पाठ के साथ खुदाई से मिली मुहरों के संदेष में बुद्ध और महावीर की ध्यान मुद्रा को अनुभूत करते लिखे में  अपने तई जिया है तो सिंधु घाटी की मुहरों में मनचाहे श्लोक ढूंढने की बजाय सभ्यता के दर्षन और उसकी उदात्त कला दृष्टि की पहचान करने का तार्किक आग्रह भी किया है। मुझे लगता है, यह यात्रा का वह दृष्यालेख है, जिसमें इतिहास, साहित्य और पुरातत्व विमर्ष में ध्वनित होता हममें जैसे बसता है। संस्कृति की जड़ों को तलाषने की मौलिक दृष्टि इसमें है तो स्थान, वस्तुओं और व्यक्तियों की दीठ का दार्षनिक भव भी है। 

यह सच है। पुरातत्व की खुदाई से भूमि के भीतर दबी सभ्यता की परतें तो खुलती है परन्तु वह पन्ने नहीं खुलते जिससे आप अपरिचित सभ्यता की सांस्कृतिक कहानी, उस जीवन की रोचकता से जुड़े अनुभवों को साझा कर सकें।  इस दृष्टि से भी ओम थानवी का यात्रावृतान्त विरल है। समय जो बीत गया है, उसके संज्ञान को ‘मुअनजोदड़ों’ में सूत्रबद्ध करते इसमें थानवीजी के यात्री मन ने पुरातन के देखे चिन्हों से आधुनिकता के अक्ष भी तलाषे हैं। 

यह महज संयोग नहीं है कि ‘मुअनजोदड़ो’ की उनकी दीठ देष के सर्वाधिक आधुनिक शहर चंडीगढ़ तक खींची चली आती है और वह अतीत की खुदाई से मिले अवषेषों को उससे जुड़ा पाते हैं। मुअनजोदड़ों में वाहनों से मिले साक्ष्यों का हवाला देते वह सड़क की चैड़ाई और सड़क की ओर सारे घरों की दिखती पीठ, उनके अंदर गलियों में खुलते प्रवेष द्वारों के चिन्ह देखकर लिखते हैं, ‘दिलचस्प संयोग है कि चंडीगढ़ में ठीक यही शैली साठ साल पहले ली कार्बूजिए ने इस्तेमाल की। वहां भी कोई घर मुख्य सड़क पर नहीं खुलता। आपको किसी के घर जाने के लिए पहले मुख्य सड़क से सेक्टर के भीतर दाखिल होना पड़ता है, फिर घर की गली में, फिर घर में।’ देखे से मन के भीतर की उथलपूथल से ही जैसे उनके अंदर कौंघता है, ‘क्या ली कार्बूजिए ने यह सीख मुअनजोदड़ो से ली?’ अंदर का प्रष्न यहीं नही रूकता बल्कि कविता से होता वास्तुकला के संदर्भों से जुड़ जाता है। इस जुड़े में प्रष्न नहीं स्वयं की स्थापना की जैसे अपने तई पड़ताल है, ‘कहते हैं, कविता में से कविता निकलती है। कलाओं की तरह वास्तुकला में भी कोई प्रेरणा चेतन-अवचेतन में ऐसे ही सफर नहीं करती होगी?’

बहरहाल, ओम थानवी के पास कहन का अपना मौलिक अंदाज है। किस्सागोई भी। इस किस्सागोई में वह अपने सफर को रोचक अंदाज में बंया करते हैं। गंतव्य तक पहुंुचने से पहले के बस के सफर की उनका कहन देखें, ‘...यह बस या रेल के सफर में ही मुमकिन है कि बिना किसी परिचय के साथ का मुसाफिर बरसों के परिचित की तरह पेष आए। उन चिकने ‘परिचय-पत्रों’ का आदान-प्रदान किए बगैर, जो चतुर-सुजानों के बटुओं में नोटों के बीच ठुंसे होते हैं। विमान के मुसाफिर तो आंखों में भी नहीं मुस्कुराते, अगर सामने अजनबी खड़ा हो। हवा में उड़ने और जमीन पर चलने का यह बड़ा फर्क है।’ कराची के बाद बस में सिंधी भाषा के बोलबाले में ही वह सिंध से जुड़े बहुत से महत्वपूर्ण तथ्यों पर भी रोषनी डालते हैं। मसलन पूरे भारतीय उप महाद्वीप में मुस्लिम राज सबसे पहले सिंध में कायम हुआ, इस्लाम की स्थापना के थोड़े समय बाद। यही नहीं, अपनी इस यात्रा में वह जातीय अस्मिता से जुड़े ‘सिंधु देस’ के लिए ‘जिए सिंध’ आंदोलन की चर्चा करते हैं तो सफर में मिले सवालों की रोषनी में वह कराची के दंगों के साथ सामयिक संदर्भों की सूक्ष्म सूझ से भी पाठकों को साक्षात् कराते हैं।

बहुत से पाठकों का प्रष्न हो सकता है? मोहनजोदड़ो को ‘मुअनजोदड़ो’ क्यों कहें? यात्रा वृतान्त में इस संबंध में रोचक वर्णन है। बल्कि शब्दों की उनकी गहरी सूझ से भी पाठक औचक यहां रू-ब-रू होते हैं। वह संभावना जताते हैं, ‘कौन जाने मुअन से मोअन होते हुए कब मोहन हो गया हो! वैसे अंगरेजी में ‘मोअन’ ही लिखा जाता है। जैसे ‘उमर’ को वे ‘ओमर’ लिखते हैं, ‘उसामा’ को ‘ओसामा’।’ यह लिखते हुए वह यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि कोई नहीं जानता कि सिंधु घाटी सभ्यता में शहरों के नाम वास्तव में क्या रहे होंगे। 

जब कोई नहीं जानता तो कयास क्यों? कयास की बजाय वह अपनी इस यात्रा के मेजबान गुलाम पीरजादा के कहे, ‘हम ‘मुअनजोदड़ो’ बोलते हैं।’ की गहराई में ले जाते हैं। पर संभावना के शब्द तर्क भी यहां हैं। इन तर्कों में शब्दों की उनकी व्याख्या लुभाती है, जरा देखें, ‘मुआ यानी मृत, जैसे कि कोसते हुए हिन्दी में कहा जाता है-मुए ने जीना मुहाल कर दिया। बहुवचन में मुअन, मुआ का सिंधी प्रयोग है। दड़ा माने टीला। मुअन-जो-दड़ो: मुर्दों का टीला।’ अपने इस तर्क में रांगेय राघव के ‘मुर्दों का टीला’ उपन्यास को भी वह याद करते हैं। उनके इस शब्द विवेचना के आधार पर खुदाई का बहुधा प्रयोग में लाया जाने वाला मोहनजोदड़ो अपने आप ही स्मृति से लोप होने लगता है और ‘मुअनजोदड़ो’ संज्ञा ठीक लगती है। पर इस सब विवेचन में औचक मन में यह भी कौंधता है कि बहुत बार ‘नाम में क्या रखा है।’ की सोच से अर्थ का अनर्थ नहीं हो जाता! 

‘मुअनजोदड़ो’ में ओम थानवी बहुत से स्थानों पर मामूली संदर्भों में भी अंतर्मन संवेदना की गहराई का बोध कराते हैं। मसलन यात्रा के लिए वह जब रवाना हुए तब की स्मृति संजोते लिखा गया है, ‘..रवाना हुआ तब माॅं पाकिस्तान के नाम से चैंकी थी। दफ्तर का जरूरी काम होगा, उसने पूछा। स्वर में दबी आषंकाओं की छाया छूपी न थी। मेरे यह कहने पर कि नहीं, घूमने जा रहा हूं, उसने फिर पूछा-जाना जरूरी होगा?’ यहां तक तो ठीक है परन्तु इसके आगे के वाक्यों में निहित संवेदना से जैसे सब कुछ स्पष्ट हो जाता है, ‘...बुजुर्गों के मन मे जो इलाका इतना दूर चला गया, अभी करीब लौटा नहीं है। भरोसा कभी आसानी ने नहीं लौटता।’ भरोसा नहीं लौटने के इसी संदर्भ का मर्म लाड़काना जा रही बस में स्टीरियो की बढ़ी आवाज से नींद मंे हुए खलल से भी जुड़ा है। वह लिखते हैं, ‘...लेकिन एक दफा इस तरह उड़ी नींद वापस कब आती है। नींद भी भरोसे की तरह है, लौटने के मामले में।’

‘मुअनजोदड़ो’ का यात्रावृत्त ओम थानवी की सूक्ष्म कला दीठ की भी एक तरह से बानगी है। बस में सफर के दौरान आगे चलते ट्रकों की पीठ पर मंडे बेल बुटों, चिप्पियों से की गई पच्चीकारी, उकेरे हुए गौरेया-तोतों के साथ नदी और महुाने के पेड़ों पर पंछी के चित्रों को देखते वह पाठकों को चिंतन की गहराई में ले जाते हैं। यह लिखते, ‘ट्रक-चित्रों की एक और खूबी है: आपको आंखे ही नहीं खुद के वाहन की हैडलाइट खोलनी पड़ती है। इस रोषनी में ही वे चिप्पियां खिलती है। चित्र उनके, रोषनी आपकी! ओवरटेक करने की जल्दबाजी में होंगे तो रोषनी हटते ही चित्र गायब। किसी फन की तरह हुनर में भी यह संप्रेषण की दुतरफा कार्रवाई है। भले सड़क-छाप क्यों न हो!’ 

और यही क्यों पुरावस्तुओं के उल्लेख में भी ‘मुअनजोदड़ो’ देखने का जैसे नया संस्कार देती है। ओम थानवीजी खुदाई से प्राप्त वस्तुओं का उल्लेख उनके वहां होने को अपनी आंखों से देखने के अनुभव भर से नहीं कराते। वह पुरा वस्तुओं से जुड़े संदर्भों के सूक्ष्म विवेचन में स्मृति और इतिहास को सर्वथा नया संदर्भ भी देते हैं। यह सही है, प्राचीन भारत के ही नहीं दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहरों में मुअनजोदड़ो और हड़प्पा को माना गया है। बकौल थानवी, ‘लेकिन मुअनजोदड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। वह सबसे उत्कृष्ट भी है। व्यापक खुदाई यहीं पर संभव हुई। बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियां, चाक पर बने चित्रित भाण्डे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले। सभ्यता का अध्ययन संभव हुआ। उधर हड़प्पा के ज्यादात साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान ‘विकास’ की भेंट चढ गए। खुदाई से पहले हड़प्पा को ठेकेदारों और इंट-चोरों ने खोद डाला था।’ उनके इस लिखे में ही आगे टीलों पर आबाद रहे अतीत के इस शहर की रोचक दास्तां को गहरे से जिया है। पुरातत्व की बोझिलता को परे धकेलते चल-चित्र की मानिंद वह मुअनजोदड़ो की सभ्यता को आज के संदर्भों से अपने यात्रावृत्त मे निरंतर जोड़ते पुरातत्व को एक तरह से सुरूचि संपन्न करने का कार्य भी अनायास ही कर देते हैं। 

मुझे लगता है, अपने लिखे में उन्होंने यात्रा की अनुभूतियों में इतिहास को नहीं, उसके पार झांकने की दीठ भी एक तरह से दी है। कैसे? जरा गौर करें, इन पंक्तियां पर, ‘षहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी को रून-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है। यह सच है कि किसी आंगन की टूटी-फूटी सीढ़ियां अब आपको कहीं ले नहीं जाती, वे आकाष की तरफ जाकर अधूरी ही रह जाती है। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े हाकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झांक रहे हैं।’

प्राचीन सभ्यताओं के खुदाई वाले स्थानों की यात्रा पर जाने पर प्रायः खण्डहर, अवषेषों और इंटों के ढेर के अलावा वहां का उजाड़ मन में अजीब सी उदासी पसरा देता है। इसीलिए जिनकी इतिहास में रूचि है या फिर पुरातत्व से जुड़ाव है, उनको और प्राचीन से जुड़े किसी संदर्भ की आस्था के अतिरेक को छोड़ दे ंतो ऐसे स्थानों पर जाने की यात्रा का मन किसका होगा! पर ‘मुअनजोदड़ो’ के वृतान्त में निहित संवेदना और संदर्भों के जरिए खुलते किस्से-कहानियों को पढ़ते बार-बार यह भी मन में आता है कि यात्रा अतीत को अवंेरती है। बषर्ते आपके पास सभ्यता को अपने तई समझने की दीठ हो। सभ्यता माने संस्कृति से जुड़े संदर्भों की अनुभूति की दीठ। इससे ही शायद गद्य में भी काव्य की संवेदना औचक उपजती है, ‘...न आकाष बदलता है, न धरती। पर कितनी सभ्यताएं, इतिहास और कहानियां बदल गई।...इसे देखकर सुना जा सकता है।... देखना अपनी आंख से देखना है। बाकी सब आंख का झपकना है। जैसे यात्रा अपने पांव चलना है। बाकी सब कदम-ताल है।’ अपने पांव चली इस यात्रा में ओम थानवी अपने राजस्थान को भी ठौड़-ठौड़ याद करते हैं। राजस्थान की रेत के अपनापे को वह इसमें संजोते हैं तो बबूल, ज्यादा ठंड, ज्यादा गर्मी और धूप के मिजाज तक से नाता कराते चले जाते हैं। वह राजस्थान की धूप को पारदर्षी और सिंध की धूप को चैंधियाती अनुभूत करते जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, पोकरण, फलौदी से जुड़े बहुत से संदर्भ भी अंवेरते हैं। जैसलमेर के कुलधरा गांव और उस पर लिखी प्रख्यात चिंतक, कवि नंदकिषोर आचार्य की कविताओं की भी स्मृति भी वह अपने लिखे में दिलाते हैं। 
‘मुअनजोदड़ो’ यात्रावृत्त भर ही नहीं है बल्कि इतिहास, संस्कृति और साहित्य के रिष्तों की एक तरह से पड़ताल है। यह सही है, सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता पर पुरातत्व या इतिहास के लोगो की बजाय साहित्यकारों ने बहुत कुछ लिखा है। पर इस लिखे में कितनी वास्तविकता और कितनी कल्पना है, इसे थानवीजी ने अपने तई गहरे से इसमें व्याख्यायित किया है। मसलन वह डाॅ. वासुदेवषरण अग्रवाल के संस्कृति बोध का कायल होने के बावजूद ‘भारतीय कला’ पुस्तक में दिए मुअनजोदड़ो के उनके ब्योरों को नकारते हैं। भाषा की दृष्टि से डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक को वह अनुपम बताते हैं पर उनकी स्थापनाओं के संदर्भ में स्पष्ट कहते हैं कि वह पुरातत्व से पुष्ट नहीं होती। इसी तरह इतिहासकार रामविलास शर्मा की हड़प्पा सभ्यता की स्थापनाओं को भी वह काल्पनिक बताते है। इस संदर्भ में वह पाकिस्तान में बलूचिस्तान और सूबा सरहद की खुदाई में नौ हजार साल पहले की सिंधु या हड़प्पा सभ्यता के शुरूआती दौर के प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट करते हैं कि खुदाई प्रमाणों में कहीं भी लोहा और आरेदार पहिया नहीं है। और पालतू घोड़ा तो दूर, वहां जगली घोड़े तक के निषान नहीं है। जबकि ये तीनों चीजें ऋग्वेद में अहम है। वह प्रष्न करते हैं, जब तीनों चीजें बाद में विकसित हुई तो इनकी सभ्यता का काल हड़प्पा काल से पुराना कैसे हो सकता है। इसी तरह पुरातत्व से जुड़े संदर्भों को अपने तई दूर तक ले जाते, कल्पनाओं का ताना-बाना कैसे बुना जाता है, इसकी रोचक दास्तां में वह राहुल सांकृत्याययन की उस मजेदार स्थापना की भी चर्चा करते हैं जिसमें वेद के ‘दिव्य सोम’ को ‘भांग’ बताया गया है।

बहरहाल, ओम थानवी ने ‘मुअनजोदड़ो’ को संस्कृति का तीर्थ, कला का आदि-पर्व कहा है। मुअनजोदड़ो के इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व और लोक से जुड़ी संवेदना और स्थानों की अस्मिता को अपने तई सूत्रबद्ध कर पुनर्नवा करते। सूफी फकीर शाहबाज कलंदर के सेवण धाम से गुजरते नुसरत फतह अली खां की कव्वाली ‘झूले झूलेलाल, दम मस्त कलन्दर’ के जरिए पारम्परिक बंदिष को दी गई अलग भंगिमा की अनुभूति में औचक उनके लिखे में शब्द जैसे झरते हैं, ‘मैंने सिर उठाया। शाहबाज कलन्दर की दरगाह की ओर देखा। आंखे बन्द की। पूरी अकीदत के साथ। बस आगे चल दी। मेरा एक मन वहीं छूट गया।’ 
‘मुअनजोदड़ो’ में संवेदना के ऐसे ही दृष्यालेख पन्ने दर पन्ने भरे पड़े हैं। पढ़ंेगे तो पाएंगे, आप भी उनके साथ यात्रा पर हैं।