Tuesday, September 15, 2015

नमन हिन्दी। नमन!


एक मोटे अनुमान के अनुसार देष में 42 प्रतिषत आबादी हिन्दी भाषी है। देष में सर्वाधिक अखबार हिन्दी के निकलते हैं। सर्वाधिक फिल्में हिन्दी की बनती है और विज्ञापन और मीडिया में बरती जाने वाली भाषा का मूल आधार भी हिन्दी ही है। इस सबके बावजूद जब हिन्दी भाषा के संरक्षण और विकास पर चिंता जाहिर की जाती है तो लगता है, कुछ है-जिससे हिन्दी के गौरव को ठेस पहुंच रही है। यह कुछ क्या है? जब भी इस पर विचार करता हूं, जेहन में बहुत सी यादें कौंध-कौंध जाती है।
देशभर में कला-संस्कृति, पर्यटन और मीडिया विषयक व्याख्यान के लिए जाना होता रहता है। हिन्दी में लिखता हूं, हिन्दी में सोचता हूं सो स्वाभाविक ही है कि जहां कहीं जाता हूं, हिन्दी में ही संवाद करता हूूं परन्तु अपने गौरव के परिवेष से बाहर झांकता हूं तो ताम-झाम और अनर्गल चकाचैंध में अपने को दोयम दर्जे में घिरा भी बहुतेरी बार पाता हूं। शायद इसलिए कि हमने खुद ही संपन्नता का पूरा का पूरा बोध अंग्रेजी भाषा को अपने तई सौंप दिया है। तमाम बड़े आयोजनों, संगोष्ठियों का मूल भले भारतीय संगीत, नृत्य, नाट्य हो परन्तु वहां संवाद की भाषा जानबूझकर अंग्रेजी चुनी जाती है। बड़ा कारण यह भी है कि जो कुछ बड़े स्तर पर क्रियान्वित होता है-उसका आधार अंग्रेजी भाषा ही है। 
अभी बहुत समय नहीं हुआ, उदयपुर में पर्यटन पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक सत्र की अध्यक्षता का निमंत्रण मिला था। सुखद लगा। देषभर से पर्यटन विषेषज्ञ एक मंच पर उपस्थित थे। आयोजन से कुछ समय पहले तमाम लोगों से वार्तालाप हिन्दी में ही हुआ पर जब कार्यक्रम की शुरूआत हुई तो संयोजक ने अंग्रेजी का दामन थाम लिया। यह तो अच्छा था कि आयोजन के मुख्य अतिथि संसदीय सलाहकार बोर्ड के सदस्य श्री रघुनंदन शर्मा थे-जिन्होंने अपने उद्बोधन हिन्दी में प्रारंभ किया और बाकायदा उनने हिन्दी में अपने को बखूबी संप्रेषित भी किया। चूंकि ऊपर से हिन्दी मे संवाद की पहल हुई सो बाद में तमाम मंच हिन्दी की लय में अपनापे की तलाष का आकाष बनता चला गया। बल्कि तमाम वह जो अंग्रेजी में बोल रहे थे उन्होंने न केवल हिन्दी में बोला बल्कि यह बताने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी कि उनकी हिन्दी बेहतरीन है। पर विडम्बना यह भी है कि यह वह लोग थे जो आमतौर पर हिन्दीभाषी हैं और सामान्य संवाद की उनकी भाषा हिन्दी ही है परन्तु सभा-सम्मेलन में अंग्रेजी में अपने को संप्रेषित कर ही वह अपने को धन्य समझते रहे हैं।
बहरहाल, अंग्रेजी में संवाद बुरा नहीं है। भाषा कोई भी हो, कहां बुरी होती है परन्तु जब उसके जरिए आप अपने को स्थापित करने के प्रयास में हो तो जरूर स्थिति सोचनीय हो सकती है। इस समय यही हो रहा है। देषभर में उच्च स्तर पर अंग्रेजी का बोलबाला है। व्यक्तिगत मैं यह भी पाता हूूं कि इस बोलबाले में ही हिन्दी की बेचारगी की बात की जाती है। पर यह पूरा सच नहीं हे। यह सच है, अंग्रेजी में भाषिक व्यंजना तो बहुतेरे बेहतरीन करते हैं परन्तु वहां विचार अमूमलन गौण होता है। अंग्रेजी के बोलबाले की एक और भी वजह है, तमाम जो कुछ आपका नही ंहै, वह सूचना और संचार प्रौद्योगिकी से आपका हो गया है। गूगल और दूसरे सर्च इंजन पर जानेभर की जरूरत है, अंग्रेजी में सब कुछ तैयार मिल जाएगा और फिर उसके लिए अलग से कुछ तैयारी की जरूरत नहीं है। पर्यटन संगोष्ठी के एक सत्र की अध्यक्षता जब कर रहा था तो इसे षिद्दत से महसूस किया। पर्यटन षिक्षा से जुड़े विद्वतजन और शोधार्थी जो प्रस्तुत कर रहे थे वह आकर्षक, ताम-झाम भरा था परन्तु वहां पर नया कुछ  नहीं था। केरल के पर्यटन विकास को आदर्ष रूप में प्रस्तुत करने की घिसी-पीटी सोच से जुड़ा एक शोध पत्र था, एक शोध पत्र होटल उद्योग में कार्मिकों के प्रबंधन से जुड़ा था, एक में पर्यटन और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों का मायाजाल था और ऐसे ही कुछ और भी थे जिनमें शोध निष्कर्ष कुछ निकाला नहीं जा सकता था। स्पष्ट था, जो कुछ प्रस्तुत किया गया वह इन्टरनेट की मदद से तैयार कर ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’ सरीखा ही था। अंग्रेजी इसीलिए धड़ल्ले से चल रही है। पर अब तो यूनिकोड में भी आप सर्च इंजनों पर कुछ तलाषेंगे तो बहुत कुछ पा जाएंगे पर इसका अभ्यास अभी बहुत से स्तरों पर है नहीं।
बहरहाल, लौटता हूं फिर से संगोष्ठह की चर्चा पर। वहां जो अनुभूत किया वह  किसी एक संगोष्ठी का सच नहीं है। तमाम बड़ी संगोष्ठियों का आज का सच यही है। वहां जो कुछ प्रस्तुत होता है, अंग्रेजी में होता है। यहां तक कि जो हिन्दी माध्यम से पढ़कर आए हैं-वह अपने आपको अंग्रेजी में प्रस्तुत कर गौरवान्वित करते हैं। बल्कि अंग्रेजी में अपने को संप्रेषित कर वह अपने को लगातार धन्य करते हैं। यह बात इसलिए कि मेरे एक मित्र है जो राजस्थान से ही है परन्तु इन दिनों भारत सरकार के एक बडे संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर जुड़े हैं। एक संगोष्ठी में उनके साथ था। संयोग देखिए, मैंने अपने को हिन्दी में संप्रेषित किया- उपस्थितजनों को बहुत अच्छा लगा। और सबके सब जो अंग्रेजी बोल रहे थे, हिन्दी में लौट आए। बल्कि कहूं उन्हें सहज लगा, अपनी भाषा में बतियाना। जब सारा माहौल हिन्दी का हो गया, उन्होंने भी बोलना प्रारंभ किया। कहा, ‘मैं प्रयास करता हूं, हिन्दी में बोलने का।’ घोर अचरज हुआ। जो हिन्दी भाषी है, घर की भाषा जिनकी हिन्दी है, वह यह कहे कि प्रयास करता हूं हिन्दी में बोलने का। ऐसा ही हो रहा है। इसलिए कि हिन्दी भाषी ऐसे अंग्रेजीदां लेागों ने जो कुछ पाया, उसका बड़ा आधार वह अंग्रेजी भाषा शायद रही जिसमें मौलिक सोच और चिंतन नहीं होते हुए भी बहुत कुछ पाया जा सकता है।
देषभर में घुम्मकड़ी करते, विषेष रूप से कला-संस्कृति और पर्यटन पर व्याख्यान के लिए जाना निंरतर होता है। स्वीकार करता हूं, पहले-पहले अपने को संप्रेषित करने के लिए अंग्रेजी मे ही ंतैयार किया। बहुत से स्थानों पर बोलकर धन्य भी हुआ पर धीरे-धीरे लगा, अपनी भाषा में जितना सहज रहता हूं, मौलिक चिंतन को व्यक्त कर पाता हूं उतना अंग्रेजी में नहीं सो तय कर लिया-अपने आपको सदा हिन्दी में ही व्यंजित करूंगा। यही करता रहा हूं और सदा अपने को गौरवान्वित भी महसूस किया। इसलिए कि जब कभी हिन्दी में प्रारंभ किया, तमाम माहौल अपने आप ही हिन्दी का होता चला गया। 
याद है, दिल्ली से ललित कला अकादमी की ओर से ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर चंडीगढ में आयोजित राष्ट्रीय कला सप्ताह में भाग लेने और संवाद करने का निमंत्रण मिला था। संशय मंे पड़ गया। संशय इस बात को लेकर था कि संवाद हिन्दी में करना है या अंग्रेजी में। चंडीगढ़ ललित कला अकादमी की मेजबानी में आयोजित समारोह के निमंत्रण पत्र से लेकर तमाम संवाद, औपचारिकताएं अंग्रेजी में ही हो रही थीं। यूं भी केन्द्रित विषय में हिन्दी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। सो मेरा संशय भी वाजिब ही कहूंगा। पहुंचने पर चंडीगढ़ ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और देश के जाने माने छायाकार दिवान मन्ना ने गर्मजोशी से अंग्रेजी में ही स्वागत किया। होटल में कुछ और भी प्रतिभागी थे, सबके सब अंग्रेजीदां। हिन्दी वहां भी कहीं नजर नही आ रही थी। दूसरे दिन एक कला की एक प्रतिष्ठित पत्रिका के तब के संपादक राहुल भट्टाचार्य ने अंग्रेजी में संयोजन की अपनी शुरूआत में ही जता दिया कि हिन्दी का वहां कोई स्थान नहीं है। कलाकार  विभा गहरोत्रा ने भी उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से मोहर लगायी। अब बारी मेरी थी। जानबूझकर हिन्दी में बोला। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। हाॅल खचाखच भरा था और तमाम लोग मुझे समझ रहे थे। यह बात इसलिए लगी कि बाद में प्रष्नों का जो दौर प्रारंभ हुआ, उसमें सब के सब बजाय मेरे अंग्रेजी बोलने वाले मित्रों से आधुनिक तकनीक और कला पर सवाल पूछने के मुझसे ही बहुत कुछ जानने को उत्सुक थे। ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर हिन्दी में दिए तर्क और कला संवेदना की व्याख्या को समझते हुए भी विडम्बना यह थी कि राहुल और विभा मंच पर अंत तक अंग्रेजी पर ही अडे रहे, मैं हिन्दी पर। प्रष्नो ंकी बोछार अंग्रेजी में ही हुई, निरंतर होती रही परन्तु मैं हिन्दी में जवाब दर जवाब देता रहा। सुकुन भी हुआ कि मुझे सुनने को अंत तक वहां आए लोग उत्सुक रहे और उन्होंने मेरे तर्क और दिए जवाबों से संतुष्टि भी जताई। बाद में उनकी सराहना और मीडिया के रूख से यह भी लगा कि मेरी हिन्दी वहां चल गई थी-अच्छे से।
इस परिप्रेक्ष्य में मुझे यह भी लगता है कि भारत में अभी भी पर्यटन, कलाएं और संस्कृति जनरुचि का विषय शायद इसीलिए नहीं बन पायी है कि यहां पर अव्वल तो कला के सार्वजनिक आयोजन ही नहीं होते और जो होते हैं, उनमें हिन्दी कहीं नही होती जबकि इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आज भी आम जन की भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी में कला आलोचना और संगीत, नृत्य, नाट्य पर बेहतरीन सामग्री के नहीं होने का जो रोना रोया जाता है, उसका एक बड़ा कारण क्या यही नहीं है कि हमारे यहां जो कुछ नवीन होता है, उसमें हिन्दी का कहीं कोई स्थान ही नहीं रखा जाता। जो कुछ छपता है, अंग्रेजी में। जो कुछ प्रस्तुत किया जाता है अंग्रेजी में। हिन्दी की शायद वहां जरूरत ही नहीं महसूस की जाती। हिन्दी को फिर क्यों दोष दिया जाए! 
बहुतेरे हिन्दी की बेचारगी पर अफसोस जताते हैं परन्तु मुझे अपनी हिन्दी कभी बेचारी नहीं लगती। इसलिए कि मेरे चिंतन का आधार यही भाषा है। इसलिए भी कि मुझे विचार का आलोक इसी से मिलता है और इसलिए भी कि हिन्दी ने ही मुझे सब कुछ दिया है। मुझे पता है, मेरे हिन्दीभाषी बहुतेरे मित्र अंग्रेजी का सहारा इसलिए लेते हैं कि उनके पास उस भाषा के अलावा अपने को व्यंजित करने का खास कोई विचार नहीं है। अंग्रेजी का महत्व बहुत से स्तरों पर इसीलिए शायद है कि इसके जरिए आप अपने को स्थापित करने की जुगत बिठा सकते हैं। पर हिन्दी हमारी संस्कृति है और इसी से हम अपने आपको जड़ों से जोड़े रख सकते हैं। जड़ो से विलग होकर दीर्घ समय तक कोई अपने को खड़ा नहीं रख सकता है। इसीलिए मुझे गर्व है, मैं हिन्दी में बतियाता हूं, हिन्दी पढ़ता हूं और अपने को बेहतरीन ढंग से संप्रेषित करने के लिए इस भाषा को चुनता रहा हूं। अपनी भाषा हिन्दी का मैं आभारी हूं। नमन हिन्दी। नमन! 


Sunday, August 23, 2015

कविताओं में अंवेरा शब्दों का अमृत-कुंड

ऐसे दौर में जब कविताओं से लय लोप हो रही हो और नकलीपन और निर्जीव वाग्मिता में कविता महज शब्दों का शोर बनती जा रही हो, कवि, चिंतक नंदकिशोर आचार्यजी का होना आश्वस्त  करता है। परम्परा बोध के बगैर आधुनिक दीठ और सांस्कृतिक शून्यता के इस कविता समय में आचार्य जी की कविताएं हमें जैसे उबारती है। कविता की उनकी यह पंक्तियां देखें-‘न सही/तुम्हारे में/मैं कहीं/अंधेरों में सही/दृश्य  से थक कर/जब-जब मुॅंदेगी आॅंखें/पाओगी मुझको वहीं।‘
कविता हालात की बयानबाजी नहीं है। घटनाओं की परिधि में शब्दों का सम्मोहक आवरण भी वह नहीं है। अंतर्मन संवेदनाओं का सुवास है कविता। इस दीठ से आचार्य की कविताएं कलात्मक अनुशासन  में विचार, भाव और रूप का विरल साहचर्य हैं। कविता कहन की उनकी भंगिमा में भाव-संवलित दृश्यात्मकता  मन को मोहती है, ‘यह डबडबा रहा है/आकाश  में जो जल‘ या फिर ‘खुद में खिलाना ही पेड़ होना है-/केवल हरा होना नहीं‘ या फिर ‘कितनी भी घनी हो/बारिश /कहीं कोई कोना/रह जाता है सूखा’ और ‘सूखा है तो क्या/रूंख है वह/इतना तो बनता है न/बारिश  का सम्मान‘ जैसी संग्रह की ढेरों व्यंजनाओं में नंदकिशोर आचार्य एकांत के क्षणों में उपजे चिंतन के कविता दृश्यलेख हमारे समक्ष रखते हैं। और यही क्यों, ‘सूर जनता है/गुंगापन’ सरीखी व्यंजना में वह मौन को भी स्वर देते हममें कवि रूप में जैसे गहरे से जैसे बस जाते हैं। मुझे लगता है, उनकी कविताएं सांस्कृतिक संदर्भों का विरल पाठ है। 
कविता संग्रह : आकाश भटका हुआ 
कवि :             नंदकिशोर आचार्य 
प्रकाशक : वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिखर,
                शिवबाड़ी रोड, बीकानेर -334001 

‘आकाश भटका हुआ’ संग्रह की कविताओं में विचार है, चिंतन का नया आकाष है पर आरोपित होता नहीं, हममें गूंजता जैसे आलोक का नया सिरा पकड़ाता हुआ। प्रकृति साहचर्य जनित एकांत के अनूठे राग में घुली शब्द व्यंजना देखें, ‘अनुरणन है जिस का /सारा आकाश /उस पुकार की/गुमशुदा लय हूं‘। आचार्य की कविताओं में प्रकृति से जुड़े ऐसे ही अनूठे आख्यान है-मौलिक दीठ लिए। दार्शनिक बोध में यहां वह मौसम को जीवन से जोड़ते हैं तो कभी मूक आकाश को अपने गूंगेपन से अभिहित करते धरती के संग सूरज के होने में सौन्दर्य, कोमलता की तलाश करते हैं। उनकी कविता शब्दों के अमृत कुण्ड में ले जाती है, ‘तुम भी भला क्या करती/डंक है केवल तुम्हारे पास/जहरीले/मेरे पास है/शब्दों का अमृत-कुंड’।
आचार्य जी के पास कविता का अपना मुहावरा है। अंतर्मन संवेदनाओं की लय में वह ‘सूनेपन के बसाव’, ‘किसी को नहीं निवेदित/है जो/ऐसी प्रार्थना हूं मैं‘ जैसी मर्मस्पर्षी पंक्तियांे में कविता की स्वच्छ मनोभूमि का सहज सौन्दर्यबोध कराते हैं। 
‘आकाश भटका हुआ’ संग्रह कविता में खोई हुई लय का गान है। उस प्रकृति की लय का जिससे हम हैं, उस पेड़ की लय का जिससे हरे हैं हम, उस पक्षी की लय का जो हममें अभी भी बैठा कहीं गा रहा है।  और हां, यह कविताएं उस शीला, धूप, हवा के प्रति कृतज्ञता का गान भी है जो हमें किसीन किसी रूप में कुछ अनायास देती है। जीवनानुभूतियों को अनुभव की कसौटी पर कसते-परखते आचार्य अपनी कविताओं में अभिप्रायों के लूंठे आख्यान हमारे समक्ष रखते हैं, ‘आकाश  भटका हुआ’ को पढ़ते यह अहसास बार-बार होता है।

Wednesday, July 29, 2015

राजस्थानी कवितायें



राजस्थानी  कविताओं का  "दुनिया इन दिनों" पत्रिका

 के ताजा अंक में कवि, आलोचक मित्र नीरज दइया 

ने अनुवाद किया है. अनुवाद में उन्होंने मूल को गहरे 

से जिया है. सोचा, उनके इस जतन को आपसे भी 

साझा किया जाना चाहिए...



दृष्टि देती है कविता

अकाल सुनाता है-
अनहद नाद,
कवि तुम भी गाओ-
गीत मनों के।
अलग-अलग है-
सबका अपना-अपना आकाश
पर धरती सभी की एक !
हे मनुष्य !
मत भूल मनुष्यता
कविता देती है-
दृष्टि।
००००

कविता है हथिहार

इससे पहले
कि सूख जाए
सभी हरियल वृक्ष
आकाश से
बरसने लगे अंगारे
तारों की छांह में जाकर
सुसताने लगे सूरज
उजियारा करने लगे प्रयास
अंधेरे में छुप जाने के
इससे पहले कि
दौड़ने लगे
उम्मीदें और आशाएं
सूख जाए आंखों से पानी
आओ !
इस भरोसे के बल रचें कविता
अंत में कविता ही है
अनहोनी में आयुध।
००००

जीवन

जब जगता हूं
तब हो जाता है उजाला
जीवन है- उजाला।

जब होता है अंधेरा
तब आ जाती है नींद
मृत्य है- निद्रा।

जब लिखता हूं
तब हो जाता हूं आकाश
मन है- आकाश।

जब सोता हूं
तब आते हैं स्वपन
आकाश है- सपनें।

जब मंदिर जाता हूं
तब प्रार्थना करता हूं
पछतावा है- प्रार्थना।

जब नहीं हल होती समस्याएं
तब आता है क्रोध
अंतस का भय है- क्रोध।

उजाला, निंद्रा, आकाश,
स्वपन, प्रार्थना, क्रोध-
इन सब को कर के एकत्र
जीता हूं- यह जीवन !
००००

चाय पीते हुए मां

जब पास नहीं होती मां
रहती है वह
आंखों में हमारी।
छुट्टी के दिन
धूप चढ़ने तक
नहीं उठती बहू
कुछ फर्क नहीं पड़ता
मां के
वह उठ जाती है अल-सवेरे
लेकिन नहीं छोड़ती बिछौना
डरती है कि कहीं आवाज ना हो कोई
चाय पीने की तलब होते हुए भी
नहीं जगाती बहू को।
चुप-चाप प्रतीक्षारत
घड़ी में तलाशती
बहू के सवेरे को 
और बहू भीतर संकुचाती
जब उठती है, कहती है-
“आज देर हो गई
आपको चाय नहीं दे सकी,
अभी लाती हूं...”
चाय पीते हुए मां
साफ झूठ बोलती है-
“आज मेरी भी आंख
जरा देरी से ही खुली थी।”
००००

रेत-घड़ी

हवा पौंछती है
धोरों पर अंकित पद-चिह्न
रहता नहीं कुछ भी शेष
रेत-घड़ी 
कण-कण का करती हिसाब
जो बीत गया
कर देती है उसको-

मुक्त !

००००

Tuesday, June 16, 2015

मुअनजोदड़ो



पुरातत्व के संदर्भ आमतौर पर बोझिलता लिए होते हैं। उदासीनता पसराते। पुरातत्व की खुदाई से निकले नतीजों की सभ्यता से जुड़े यात्रा के वर्णन भी  नहीं के बराबर ही हैं। शायद इसलिए कि पुरातत्व की खुदाई से निकले पत्थर, मिट्टी, हड्डियां, धातुएं, इंटे-टीले संभावनाओं की एकरस कहानियां के ‘हो सकता है’ सरीखे निष्कर्ष ही लिए होते हैं।  यह सही है, पुरातत्व की खुदाई भूमि के भीतर छुपी सभ्यता की परतें खोलती है परन्तु उसमें जीवन और संस्कृति का माधुर्य प्रायः नहीं होता है। मुर्दा हुए युग की कहानी से हर किसी को बहुत अधिक वास्ता भी तो नहीं होता! हां, पाकिस्तान में सिंध के लरकाना (शुद्ध रूप लाड़काणा) जिले में कराची से कोई 150 मील उत्तर-पूरब रेत में मोहनजोदड़ो की खुदाई से ही पहले पहल यह जाना गया कि भारत की सभ्यता उतनी ही पुरानी है जितनी की सुमेर-बाबुल और मिश्र की। इसी मोहनजोदड़ो सभ्यता की कहानी को अपनी यात्रा में बेहद रोचक अंदाज में जिया है, ओम थानवीजी ने अपनी यात्रावृतान्त पुस्तक ‘मुअनजोदड़ो’ में। ‘मुअनजोदड़ों’ यात्रा संस्मरणो की बंधी-बंधाई लीक से हटकर है। 


इसलिए कि इसमें यात्रा से जुड़े अनुभव भर ही नहीं है। पुरातत्व से मिली खुदाई की दास्तां में अतीत के गलियारों में ले जाता लेखक आपको अपने संग ले चलता शब्द दर शब्द चलचित्र की मानिंद जैसे युग यात्रा कराता है। टाईम मषीन की मानिंद। आपने इस मषीन में पन्ने बांचने का बटन दबाया नहीं कि पूरा का पूरा अतीत आपकी आंखोें में जैसे तैरने लगेगा। अतीत ही क्यों, वर्तमान से जुड़ा वह समय भी जिसमें बीते समय की आहटें हैं और भविष्य से जुड़ा काल भी और उसके प्रष्न भी। ‘मुअनजोदड़ों’ में ओम थानवी ने व्यक्ति को भीतर की ओर मोड़ने वाले योग के पाठ के साथ खुदाई से मिली मुहरों के संदेष में बुद्ध और महावीर की ध्यान मुद्रा को अनुभूत करते लिखे में  अपने तई जिया है तो सिंधु घाटी की मुहरों में मनचाहे श्लोक ढूंढने की बजाय सभ्यता के दर्षन और उसकी उदात्त कला दृष्टि की पहचान करने का तार्किक आग्रह भी किया है। मुझे लगता है, यह यात्रा का वह दृष्यालेख है, जिसमें इतिहास, साहित्य और पुरातत्व विमर्ष में ध्वनित होता हममें जैसे बसता है। संस्कृति की जड़ों को तलाषने की मौलिक दृष्टि इसमें है तो स्थान, वस्तुओं और व्यक्तियों की दीठ का दार्षनिक भव भी है। 

यह सच है। पुरातत्व की खुदाई से भूमि के भीतर दबी सभ्यता की परतें तो खुलती है परन्तु वह पन्ने नहीं खुलते जिससे आप अपरिचित सभ्यता की सांस्कृतिक कहानी, उस जीवन की रोचकता से जुड़े अनुभवों को साझा कर सकें।  इस दृष्टि से भी ओम थानवी का यात्रावृतान्त विरल है। समय जो बीत गया है, उसके संज्ञान को ‘मुअनजोदड़ों’ में सूत्रबद्ध करते इसमें थानवीजी के यात्री मन ने पुरातन के देखे चिन्हों से आधुनिकता के अक्ष भी तलाषे हैं। 

यह महज संयोग नहीं है कि ‘मुअनजोदड़ो’ की उनकी दीठ देष के सर्वाधिक आधुनिक शहर चंडीगढ़ तक खींची चली आती है और वह अतीत की खुदाई से मिले अवषेषों को उससे जुड़ा पाते हैं। मुअनजोदड़ों में वाहनों से मिले साक्ष्यों का हवाला देते वह सड़क की चैड़ाई और सड़क की ओर सारे घरों की दिखती पीठ, उनके अंदर गलियों में खुलते प्रवेष द्वारों के चिन्ह देखकर लिखते हैं, ‘दिलचस्प संयोग है कि चंडीगढ़ में ठीक यही शैली साठ साल पहले ली कार्बूजिए ने इस्तेमाल की। वहां भी कोई घर मुख्य सड़क पर नहीं खुलता। आपको किसी के घर जाने के लिए पहले मुख्य सड़क से सेक्टर के भीतर दाखिल होना पड़ता है, फिर घर की गली में, फिर घर में।’ देखे से मन के भीतर की उथलपूथल से ही जैसे उनके अंदर कौंघता है, ‘क्या ली कार्बूजिए ने यह सीख मुअनजोदड़ो से ली?’ अंदर का प्रष्न यहीं नही रूकता बल्कि कविता से होता वास्तुकला के संदर्भों से जुड़ जाता है। इस जुड़े में प्रष्न नहीं स्वयं की स्थापना की जैसे अपने तई पड़ताल है, ‘कहते हैं, कविता में से कविता निकलती है। कलाओं की तरह वास्तुकला में भी कोई प्रेरणा चेतन-अवचेतन में ऐसे ही सफर नहीं करती होगी?’

बहरहाल, ओम थानवी के पास कहन का अपना मौलिक अंदाज है। किस्सागोई भी। इस किस्सागोई में वह अपने सफर को रोचक अंदाज में बंया करते हैं। गंतव्य तक पहुंुचने से पहले के बस के सफर की उनका कहन देखें, ‘...यह बस या रेल के सफर में ही मुमकिन है कि बिना किसी परिचय के साथ का मुसाफिर बरसों के परिचित की तरह पेष आए। उन चिकने ‘परिचय-पत्रों’ का आदान-प्रदान किए बगैर, जो चतुर-सुजानों के बटुओं में नोटों के बीच ठुंसे होते हैं। विमान के मुसाफिर तो आंखों में भी नहीं मुस्कुराते, अगर सामने अजनबी खड़ा हो। हवा में उड़ने और जमीन पर चलने का यह बड़ा फर्क है।’ कराची के बाद बस में सिंधी भाषा के बोलबाले में ही वह सिंध से जुड़े बहुत से महत्वपूर्ण तथ्यों पर भी रोषनी डालते हैं। मसलन पूरे भारतीय उप महाद्वीप में मुस्लिम राज सबसे पहले सिंध में कायम हुआ, इस्लाम की स्थापना के थोड़े समय बाद। यही नहीं, अपनी इस यात्रा में वह जातीय अस्मिता से जुड़े ‘सिंधु देस’ के लिए ‘जिए सिंध’ आंदोलन की चर्चा करते हैं तो सफर में मिले सवालों की रोषनी में वह कराची के दंगों के साथ सामयिक संदर्भों की सूक्ष्म सूझ से भी पाठकों को साक्षात् कराते हैं।

बहुत से पाठकों का प्रष्न हो सकता है? मोहनजोदड़ो को ‘मुअनजोदड़ो’ क्यों कहें? यात्रा वृतान्त में इस संबंध में रोचक वर्णन है। बल्कि शब्दों की उनकी गहरी सूझ से भी पाठक औचक यहां रू-ब-रू होते हैं। वह संभावना जताते हैं, ‘कौन जाने मुअन से मोअन होते हुए कब मोहन हो गया हो! वैसे अंगरेजी में ‘मोअन’ ही लिखा जाता है। जैसे ‘उमर’ को वे ‘ओमर’ लिखते हैं, ‘उसामा’ को ‘ओसामा’।’ यह लिखते हुए वह यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि कोई नहीं जानता कि सिंधु घाटी सभ्यता में शहरों के नाम वास्तव में क्या रहे होंगे। 

जब कोई नहीं जानता तो कयास क्यों? कयास की बजाय वह अपनी इस यात्रा के मेजबान गुलाम पीरजादा के कहे, ‘हम ‘मुअनजोदड़ो’ बोलते हैं।’ की गहराई में ले जाते हैं। पर संभावना के शब्द तर्क भी यहां हैं। इन तर्कों में शब्दों की उनकी व्याख्या लुभाती है, जरा देखें, ‘मुआ यानी मृत, जैसे कि कोसते हुए हिन्दी में कहा जाता है-मुए ने जीना मुहाल कर दिया। बहुवचन में मुअन, मुआ का सिंधी प्रयोग है। दड़ा माने टीला। मुअन-जो-दड़ो: मुर्दों का टीला।’ अपने इस तर्क में रांगेय राघव के ‘मुर्दों का टीला’ उपन्यास को भी वह याद करते हैं। उनके इस शब्द विवेचना के आधार पर खुदाई का बहुधा प्रयोग में लाया जाने वाला मोहनजोदड़ो अपने आप ही स्मृति से लोप होने लगता है और ‘मुअनजोदड़ो’ संज्ञा ठीक लगती है। पर इस सब विवेचन में औचक मन में यह भी कौंधता है कि बहुत बार ‘नाम में क्या रखा है।’ की सोच से अर्थ का अनर्थ नहीं हो जाता! 

‘मुअनजोदड़ो’ में ओम थानवी बहुत से स्थानों पर मामूली संदर्भों में भी अंतर्मन संवेदना की गहराई का बोध कराते हैं। मसलन यात्रा के लिए वह जब रवाना हुए तब की स्मृति संजोते लिखा गया है, ‘..रवाना हुआ तब माॅं पाकिस्तान के नाम से चैंकी थी। दफ्तर का जरूरी काम होगा, उसने पूछा। स्वर में दबी आषंकाओं की छाया छूपी न थी। मेरे यह कहने पर कि नहीं, घूमने जा रहा हूं, उसने फिर पूछा-जाना जरूरी होगा?’ यहां तक तो ठीक है परन्तु इसके आगे के वाक्यों में निहित संवेदना से जैसे सब कुछ स्पष्ट हो जाता है, ‘...बुजुर्गों के मन मे जो इलाका इतना दूर चला गया, अभी करीब लौटा नहीं है। भरोसा कभी आसानी ने नहीं लौटता।’ भरोसा नहीं लौटने के इसी संदर्भ का मर्म लाड़काना जा रही बस में स्टीरियो की बढ़ी आवाज से नींद मंे हुए खलल से भी जुड़ा है। वह लिखते हैं, ‘...लेकिन एक दफा इस तरह उड़ी नींद वापस कब आती है। नींद भी भरोसे की तरह है, लौटने के मामले में।’

‘मुअनजोदड़ो’ का यात्रावृत्त ओम थानवी की सूक्ष्म कला दीठ की भी एक तरह से बानगी है। बस में सफर के दौरान आगे चलते ट्रकों की पीठ पर मंडे बेल बुटों, चिप्पियों से की गई पच्चीकारी, उकेरे हुए गौरेया-तोतों के साथ नदी और महुाने के पेड़ों पर पंछी के चित्रों को देखते वह पाठकों को चिंतन की गहराई में ले जाते हैं। यह लिखते, ‘ट्रक-चित्रों की एक और खूबी है: आपको आंखे ही नहीं खुद के वाहन की हैडलाइट खोलनी पड़ती है। इस रोषनी में ही वे चिप्पियां खिलती है। चित्र उनके, रोषनी आपकी! ओवरटेक करने की जल्दबाजी में होंगे तो रोषनी हटते ही चित्र गायब। किसी फन की तरह हुनर में भी यह संप्रेषण की दुतरफा कार्रवाई है। भले सड़क-छाप क्यों न हो!’ 

और यही क्यों पुरावस्तुओं के उल्लेख में भी ‘मुअनजोदड़ो’ देखने का जैसे नया संस्कार देती है। ओम थानवीजी खुदाई से प्राप्त वस्तुओं का उल्लेख उनके वहां होने को अपनी आंखों से देखने के अनुभव भर से नहीं कराते। वह पुरा वस्तुओं से जुड़े संदर्भों के सूक्ष्म विवेचन में स्मृति और इतिहास को सर्वथा नया संदर्भ भी देते हैं। यह सही है, प्राचीन भारत के ही नहीं दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहरों में मुअनजोदड़ो और हड़प्पा को माना गया है। बकौल थानवी, ‘लेकिन मुअनजोदड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। वह सबसे उत्कृष्ट भी है। व्यापक खुदाई यहीं पर संभव हुई। बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियां, चाक पर बने चित्रित भाण्डे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले। सभ्यता का अध्ययन संभव हुआ। उधर हड़प्पा के ज्यादात साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान ‘विकास’ की भेंट चढ गए। खुदाई से पहले हड़प्पा को ठेकेदारों और इंट-चोरों ने खोद डाला था।’ उनके इस लिखे में ही आगे टीलों पर आबाद रहे अतीत के इस शहर की रोचक दास्तां को गहरे से जिया है। पुरातत्व की बोझिलता को परे धकेलते चल-चित्र की मानिंद वह मुअनजोदड़ो की सभ्यता को आज के संदर्भों से अपने यात्रावृत्त मे निरंतर जोड़ते पुरातत्व को एक तरह से सुरूचि संपन्न करने का कार्य भी अनायास ही कर देते हैं। 

मुझे लगता है, अपने लिखे में उन्होंने यात्रा की अनुभूतियों में इतिहास को नहीं, उसके पार झांकने की दीठ भी एक तरह से दी है। कैसे? जरा गौर करें, इन पंक्तियां पर, ‘षहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी को रून-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है। यह सच है कि किसी आंगन की टूटी-फूटी सीढ़ियां अब आपको कहीं ले नहीं जाती, वे आकाष की तरफ जाकर अधूरी ही रह जाती है। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े हाकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झांक रहे हैं।’

प्राचीन सभ्यताओं के खुदाई वाले स्थानों की यात्रा पर जाने पर प्रायः खण्डहर, अवषेषों और इंटों के ढेर के अलावा वहां का उजाड़ मन में अजीब सी उदासी पसरा देता है। इसीलिए जिनकी इतिहास में रूचि है या फिर पुरातत्व से जुड़ाव है, उनको और प्राचीन से जुड़े किसी संदर्भ की आस्था के अतिरेक को छोड़ दे ंतो ऐसे स्थानों पर जाने की यात्रा का मन किसका होगा! पर ‘मुअनजोदड़ो’ के वृतान्त में निहित संवेदना और संदर्भों के जरिए खुलते किस्से-कहानियों को पढ़ते बार-बार यह भी मन में आता है कि यात्रा अतीत को अवंेरती है। बषर्ते आपके पास सभ्यता को अपने तई समझने की दीठ हो। सभ्यता माने संस्कृति से जुड़े संदर्भों की अनुभूति की दीठ। इससे ही शायद गद्य में भी काव्य की संवेदना औचक उपजती है, ‘...न आकाष बदलता है, न धरती। पर कितनी सभ्यताएं, इतिहास और कहानियां बदल गई।...इसे देखकर सुना जा सकता है।... देखना अपनी आंख से देखना है। बाकी सब आंख का झपकना है। जैसे यात्रा अपने पांव चलना है। बाकी सब कदम-ताल है।’ अपने पांव चली इस यात्रा में ओम थानवी अपने राजस्थान को भी ठौड़-ठौड़ याद करते हैं। राजस्थान की रेत के अपनापे को वह इसमें संजोते हैं तो बबूल, ज्यादा ठंड, ज्यादा गर्मी और धूप के मिजाज तक से नाता कराते चले जाते हैं। वह राजस्थान की धूप को पारदर्षी और सिंध की धूप को चैंधियाती अनुभूत करते जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, पोकरण, फलौदी से जुड़े बहुत से संदर्भ भी अंवेरते हैं। जैसलमेर के कुलधरा गांव और उस पर लिखी प्रख्यात चिंतक, कवि नंदकिषोर आचार्य की कविताओं की भी स्मृति भी वह अपने लिखे में दिलाते हैं। 
‘मुअनजोदड़ो’ यात्रावृत्त भर ही नहीं है बल्कि इतिहास, संस्कृति और साहित्य के रिष्तों की एक तरह से पड़ताल है। यह सही है, सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता पर पुरातत्व या इतिहास के लोगो की बजाय साहित्यकारों ने बहुत कुछ लिखा है। पर इस लिखे में कितनी वास्तविकता और कितनी कल्पना है, इसे थानवीजी ने अपने तई गहरे से इसमें व्याख्यायित किया है। मसलन वह डाॅ. वासुदेवषरण अग्रवाल के संस्कृति बोध का कायल होने के बावजूद ‘भारतीय कला’ पुस्तक में दिए मुअनजोदड़ो के उनके ब्योरों को नकारते हैं। भाषा की दृष्टि से डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक को वह अनुपम बताते हैं पर उनकी स्थापनाओं के संदर्भ में स्पष्ट कहते हैं कि वह पुरातत्व से पुष्ट नहीं होती। इसी तरह इतिहासकार रामविलास शर्मा की हड़प्पा सभ्यता की स्थापनाओं को भी वह काल्पनिक बताते है। इस संदर्भ में वह पाकिस्तान में बलूचिस्तान और सूबा सरहद की खुदाई में नौ हजार साल पहले की सिंधु या हड़प्पा सभ्यता के शुरूआती दौर के प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट करते हैं कि खुदाई प्रमाणों में कहीं भी लोहा और आरेदार पहिया नहीं है। और पालतू घोड़ा तो दूर, वहां जगली घोड़े तक के निषान नहीं है। जबकि ये तीनों चीजें ऋग्वेद में अहम है। वह प्रष्न करते हैं, जब तीनों चीजें बाद में विकसित हुई तो इनकी सभ्यता का काल हड़प्पा काल से पुराना कैसे हो सकता है। इसी तरह पुरातत्व से जुड़े संदर्भों को अपने तई दूर तक ले जाते, कल्पनाओं का ताना-बाना कैसे बुना जाता है, इसकी रोचक दास्तां में वह राहुल सांकृत्याययन की उस मजेदार स्थापना की भी चर्चा करते हैं जिसमें वेद के ‘दिव्य सोम’ को ‘भांग’ बताया गया है।

बहरहाल, ओम थानवी ने ‘मुअनजोदड़ो’ को संस्कृति का तीर्थ, कला का आदि-पर्व कहा है। मुअनजोदड़ो के इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व और लोक से जुड़ी संवेदना और स्थानों की अस्मिता को अपने तई सूत्रबद्ध कर पुनर्नवा करते। सूफी फकीर शाहबाज कलंदर के सेवण धाम से गुजरते नुसरत फतह अली खां की कव्वाली ‘झूले झूलेलाल, दम मस्त कलन्दर’ के जरिए पारम्परिक बंदिष को दी गई अलग भंगिमा की अनुभूति में औचक उनके लिखे में शब्द जैसे झरते हैं, ‘मैंने सिर उठाया। शाहबाज कलन्दर की दरगाह की ओर देखा। आंखे बन्द की। पूरी अकीदत के साथ। बस आगे चल दी। मेरा एक मन वहीं छूट गया।’ 
‘मुअनजोदड़ो’ में संवेदना के ऐसे ही दृष्यालेख पन्ने दर पन्ने भरे पड़े हैं। पढ़ंेगे तो पाएंगे, आप भी उनके साथ यात्रा पर हैं।  

Thursday, May 7, 2015

दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोई


उत्सुकता व्यक्ति को अन्वेषक बनाती है। अभी कुछ ऐसा हुआ कि दादू दयाल की वाणियां कहीं से हाथ लग गई। फिर तो ढूंढ-ढूंढकर उनके बारे में पढ़ा। लगा, कबीर की वाणियां फक्कड़पन लिए है और दादू वाणी दया-करूणा से ओत-प्रोत। दादू की निकटता का भान कहां था! कभी-कभी ऐसा ही होता है, जो आपके पास होता है-वही नजरों से न जाने क्यों दूर होता है। देशभर में घुम्मकड़ी की पर जयपुर के निकट दादू पालका भैराणा कभी नहीं जाना हुआ। कुछ दिन पहले जाना हुआ तो लगा, तीर्थ को गहरे से जिया है। जयपुर से कोई 60-70 किलोमीटर दूर। अजमेर के रास्ते आध घंटे और फिर दाहिने की सड़क पर मुड़कर एक घंटे से कुछ अधिक की यात्रा के बाद भैराणा पहुंच जाते हैं। विवेकानंद केन्द्र में बच्चों से बतियाना सुखद था। औचक भैराणा का बड़ा सा पहाड़ देखता हूं। आसमान झांकता हूं तो चांद दिखता है, दूसरी और सूरज भी! उत्सुक मन अपने को रोक नहीं पाता। वहीं षिविर में आए छात्र रामकिषोर को साथ ले पहाड़ पर बने मंदिर की ओर चल देता हूं। ठौड़-ठौड़ दादू वाणी मंडी है। कुछ देर मंदिर में हारमोनियम-ढोलक संग दादू वाणी सुनता हूं, ‘दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोई/वेद पुरान पुस्तक पढ़े, प्रेम बिना क्या होई।’ कानों में रस घोलती वाणी। 
मन जिज्ञासु दादू के और करीब जाना चाहता है सो पहाड़ चढता हूं। देखता हूं, रास्तेभर पीठाचार्यों की चरण पादूकाएं स्थापित हैं। लगभग चोटी पर दादू के पद दर्षन हुए। ऊपर एक संकरी सी गुफा। अंधेरी, पर दूर कहीं किसी छोर से रोषनी आ रही थी-प्रकाष पुंज सरीखी। मोर पांख का झाड़ू भी पड़ा है। बाहर पहाड़ पर बनी इमारत का बड़ा हाॅल-गुफा का परिवेष ढकता हुआ-बारादरी सरीखा। एक रास्ता और दिखता है, पहाड़ पर और ऊंचाई पर जाने को आमंत्रित करता। पहाड़ चढ़ते एक चट्टान देख वहीं ठहर गया। हवा में झुलती सी चट्टान। पास गए तो पादूकाओं को भी पाया। पता चला, कुछेक पत्थरों पर टिकी है चट्टान, जैसे पादूकाओं की छत बन गई है। कुछ सीढि़यां पर आगे पहाड़ ही पहाड़।...चढ़ा तो बढ़ा। पहाड़ से नीचे झांका। दूर तक उजाड़। मन बोला, ‘अरे दादू, आप यहां!’ धरती पर मंदिर। आसमान यानी पहाड़ पर समाधी।...और फिर पाताल यानी नीचे तलहटी में छतरी। सच! भैराणा अद्भुत धाम है।
तुलसीदासजी ने संतो को चंदन-तरू सदृष कहा है। वह जो पात्र-अपात्र का विचार न करके अपनी सुगन्ध सबको बांटते रहते हैं। दादू ऐसे ही थे। अनुभूतियों से उपजे ज्ञान की सुगन्ध को उन्होंने बगैर किसी भेद सबको बांटा। और हां, विष्व के ऐसे संत जो मृत देह को भी किसी के काम आने के निमित्त कर गए। दादू वाणी है, ‘दादू मरणा तहां भला, जहां पषु पक्षी खाय।’ दादू ने अंतिम समय अपने षिष्यों से कहा ‘न मुझे जलाना, न गाड़ना और न ही जल में प्रवाहित करना।’ उनके शरीर को भैराणा में प्रतीक स्वरूप अग्नि दिखा छोड़ दिया गया। भूखे पषु पक्षियों के लिए। सोचता हूं, देह दान की सोच का आधार दादू ने ही हमें दिया। मित्र कौषलेन्द्रदास के पिता श्री उमाषंकरजी से बाद में भेंट हुई तो उनने भी बताया ‘दादू जीवा भक्षता, सहज मोक्ष हो जाय।’ माने जीवों के भक्षण के लिए जो देह काम आए वही सहज मोक्ष को पाती है।
दादू ने कोई 20 हजार के करीब पद लिखे पर  बताते हैं, उपलब्ध 3 हजार के करीब ही हैं। भैराणा पहाड़ की सीढि़यां उतरते दादू पंथ पर विचारता हूं। दादू ने कभी नहीं चाहा कि उनको लेकर कोई पंथ बने। उनका मानना था, पृथ्वी आकाश सूर्य चन्द्रमा तथा देवता आदि एक पंथ में नहीं रहते तो किसी पंथ का अनुयायी बनकर क्यों रहा जाय? पर लोग कहां मानने वाले। उनके अनुयायियों ने दादू पंथ प्रारंभ कर दिया। पंथ ऐसे ही बनते हैं। 
भैराणा से लौट रहा था पर लगा, निर्जन पथ पर दादू साथ थे। दादू के अंतिम वास पहाड़ चढ़ा और उतरा तो उनकी वाणी की गहराई में उतरता चला गया। उतरना-चढ़ना ही तो है! उतरे वह जो चढ़े। ऐसे ही शायद मौन के गर्भ में सृजन का उत्स होता है। भैराणा से लौटना आसान नहीं है। मन अभी भी वहीं है। दृष्टि बोलती है तो शब्द झरते हैं। शब्द भी तो वही सार्थक है जो निःषब्द को इंगित हो। दादू की वाणी ऐसी ही है। निःषब्द को इंगित। मन विचार रहा है, ‘दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोइ, वेद-पुरान पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होई।’
-लोकप्रिय दैनिक "न्यूज़ टुडे" में प्रकाशित, 7 मई 2015 


Monday, April 27, 2015

पैसे की माया नोच रही जमीनो की काया

--गोरखपुर से कुशीनगर यात्रा --

साहित्य अकादेमी के सचिव श्रीनिवासराव  दूरभाष पर निमंत्रण देते हैं, ‘अकादेमी ने इस बार उत्तरपूर्वी एवं उत्तर लेखक सम्मेलन का दो दिवसीय आयोजन गोरखपुर में किया है। इसमें आपको कविता पाठ करना है। आप स्वीकृति भेजिए ताकि बाकी सभी व्यवस्थाएं कर सकूं।’ अंधा क्या चाहे? दो आंखे। जयपुर से दिल्ली और फिर दिल्ली से लखनऊ तक की हवाई यात्रा के बाद गोरखपुर के लिए ट्रेन या फिर बस ही साधन है। ट्रेन में पहले से आरक्षण करवा लिया था सो दिक्कत हुई नहीं। 
आयोजन स्थल पर असम, मणीपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल से आए लेखकों संग बतियाया तो शीनकाफनिजाम साहब और गोविन्द मिश्र से यात्राओं और उनके लिखे पर निरंतर संवाद भी होता रहा। उन्होंने कुछ समय पहले तिस्ता यात्रा की चर्चा छेड़ी तो गंेगटोक से की देहरादून और नेपाल बोर्डर तक की यात्रा जेहन में फिर से ताजा हो गई। बुध महापरिनिर्वाण स्थल कुषीनगर जाने की चाह थी पर राह नहीं मिल रही थी। वहीं गोरखपुर विष्वविद्यालय में छायाकार मित्र फीरोज से टैक्सी कराने को कहा तो उसने मेरी बात हवा में उड़ा दी। कहा, ‘क्यों टैक्सी में पैसे बर्बाद करते हैं। बस पकडि़ये, आराम से पहुंचा देगी।’ माना नहीं और टैक्सी कर लेता हूं। ड्राईवर दूसरे दिन सुबह होटल से लेने का कहता है पर आता ही नहीं। पता चलता है, उसे कोई और दूर की तगड़ी सवारी मिल गई सो वहां चला गया। दूसरी टैक्सी कराने को कहता है तो डपटकर देता हूं। बस पकड़ता हूं। फीरोज बहुत याद आता है, कुषीनगर बस से ही जो जा रहा हूं! हिचकोले खाती बस गोरखपुर शहर को तेजी से छोड़ती मिलट्री ऐरिया में वार मेमोरियल क्षेत्र से आगे पहुंच गई है। औचक खिड़की से बाहर देखता हूं, सघन पेड़ों का झुरमुट। जहां तक निगाह जाए, पेड़ ही पेड़। सिकुड़ी सड़क पर उत्तर प्रदेष परिवहन निगम की बस और दोनों और इसी तरह पेड़ों का झुरमुट।  
गोरखपुर से जब चला था तब इस तरह के दृष्य की मन मंे कल्पना नहीं थी। एक के साथ एक आसमान छूने की होड़ में खड़े पेड़। कुछ देर तक बस पेड़ों के उस सघन जंगल के बीच से ही गुजरती रही। पर यह कुछ समय का ही सुकून था। थोड़े अंतराल में यह दृष्य लोप हो गया।  खिड़की से खेत और घास-फूस के छप्पर की बनी दुकानें नजर आने लगी।...बंजर जमीन और कुछ-कुछ देर में कुछ पक्का निर्माण कार्य भी चल रहा है। बिल्डरों के विज्ञापन। एक जगह बोर्ड लगा है, ‘प्लाॅट बिकाऊ है।’ पेड़ यहां पूरी तरह से नदारद। यह हरितिमा को रोंद कोंक्रीट के जंगल का आगाज है। पहले देख पेड़ों का झुरमुट शायद इसलिए बच गया कि वह वन क्षेत्र था। वन क्षेत्र का आवासीय रूपान्तरण नहीं हो सकता। पर खेतों का आवास परिवर्तन कौन रोके? सही है, आबादी बढ़ गयी है-रहने को जमीन कम पड़ रही है परन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि हरियाली लीलने फायदे का निवेष जमीनों में ही दिखाया जा रहा है। पैसो की माया जमीनों की काया नोंचने में लगी है। कृषि भूमि इसी से तेजी से आवासीय में रूपान्तरित होती जा रही है। देखता हूं, खेत हैं परन्तु लुखे। आवासीय प्रयोजन से बिकने को तैयार। मन बुझ जाता है।  
सुबह गोरखपुर में ओलावृष्टि की आपदा से फसलों की खराबी के समाचार ही अखबारों में पढ़े थे परन्तु खेतों की जमीन पर ‘प्लाट बिकाऊ’ की आपदा तो इससे भी भारी है। प्रकृति से भारी कोप तो मनुष्य का है। उसे तो अपनी पैसा उगाती बांसूरी की पड़ी है, बांस से उसे क्या! बांस नहीं रहे तो न रहे, अभी तो बांसूरी बज ही रही है। यह बांसूरी नहीं बजेगी तो कुछ और बजा लेंगे। सोचते-सोचते घबराहट बढ़ जाती है। कबूतर की तरह आंखे मुंद विचार के उगे इस संकट से अपने को बचाने का प्रयास करता हूं। डर भरी झपकी ले लेता हूं। टूटी सड़क पर बस झटका खाती है तो आंखे खोल सड़क की ओर देखता हूं। चैड़ी फोरलेन की सड़क। हम हाईवे पर है। यह मार्ग बिहार होते हुए दूर आसाम की ओर जाता है। उत्तर से उत्तरपूर्व की ओर। 
देखता हूं, बस की अपनी  अलग दुनिया है। मेरे सामने की सीट पर कोई सालेक भर का बच्चा अपनी मां की गोद में खड़ा खिड़की के पार झांक रहा है। तेजी से भागते पेड़ों, साथ चलती कारों, ट्रकों को कभी आगे तो कभी पीछे छूटते देख वह अचरज से किलकिला रहा है। उसके उड़ते बाल, कौतुक भरी मासूम निगाहें और मां की गोद में पूर्ण सुरक्षा का संतुष्ट भाव आनंदित करने वाला है। कुछ देर उसको खिड़की से पार भागते दृष्यों का आनंद लेते देख खुद भी आनंदित होता हंू। औचक बस रूकती है। लपककर एक लड़का चढ़ जाता है। पीछे-पीछे एक लड़की भी है। दोनों विद्यार्थी लग रहे हैं। सोचता हूं, काॅलेज से शायद घर लौट रहे हैं। धीरे हुई बस फिर से भागने लगी। मन में विचार आया, टैक्सी करता तो सफर यूं आबाद होता! मन यूं रंजित होता! 
बस में निगाह दौड़ता हूं। कोई उंघ रहा है, कोई मोबाईल से गीत सुन रहा है तो कोई दीन-दुनिया से दूर अपने सहयात्री से बातों में मषगूल है। सफर की यह  अलग ही दुनिया है। चेहरे जाने-पहचाने से लगते हैं पर सबके सब अनजाने। खिड़की के पार निगाह जाती है, चैंकता हूं। दाहिने ओर खेत पर बौने पेड़ों का समूह। शाखाओं में फैले हुए पर बैठे हुए। ऊंचाई नदारद। तना रहित हरे पेड़। ऐसे जैसे परस्पर बतिया रहे हों। प्रकृति की अदीठी कृतियां! ऐसे पेड़ पहले कहां देखे। देखता हूं, यहां ऐसे ही पेड़ हैं। दूर खेतों में अंतराल अंतराल में पेड़ों ने मिल अपने समूह जैसे बना रखे हैं-बतियाने के लिए। बस रूक गई है। 
‘लो कुषीनगर आ गया। आपको यहीं उतरना है।’ कहते हुए बस कंडक्टर मेरी ओर मुड़ता है। मैं ठीक उसके पीछे की सीट पर बैठा हूं। अपना बैग संभालते हुए उतरकर सड़क के दाहिने ओर उस पार कुषीनगर की ओर जाती सड़क की ओर हो लेता हूं।
-"न्यूज़ टुडे" 23-4-2015

Thursday, April 9, 2015

कलाकारों संग कोहरे में अयोध्या

बहुतेरी बार मन दृश्य साक्षात् से उपजी स्मृतियां और अनुभुतियां की यात्रा करता है।घर पर होते हैं तो कहां इस मन यात्री को जान पाते हैं! जितना घर से बाहर निकलते हैं, मन को भी और अधिक जानने लगते हैं। माने घर से बाहर की हर यात्रा मन की यात्रा है। बाहर न जाएं तो स्वयं अपने मन में झांकने का अवकाश ही न मिले। इसीलिए कहें, जब अपने स्थान को छोड़ दूर कहीं होते हैं तो वह स्थान की ही यात्रा नहीं होती, मन की भी होती है। हर यात्रा स्वयं तक हमें पहुंचाने का मार्ग भी है।...तीन-चार महिने पहले की बात है, इसी मार्ग पर था। कलाकार मित्र और ‘कलादीर्घा’ के संपादक डाॅ. अवधेश्र मिश्र ने फैजाबाद में राष्ट्रीय कला षिविर का संयोजन किया था। दूरभाष पर उनने कहा, आपको आना है, अयोध्या में राम के दर्षन भी कर लेंगे। मुझे लगा, देषभर के कलाकारों के साथ रामजी की अयोध्या देखने का यह सुयोग ही निकल आया है। वहां पहुंचा तो पता चला, सरयू तट पर बसे नगर अयोध्या में सर्दी के दिन देष के दूसरे स्थानों से सर्वथा भिन्न होते हैं। 
कोहरा पहले भी देखा था पर सुबह, दुपहर और सांझ इतनी धूंध पहले कभी नहीं देखी थी। हाथ को हाथ नहीं सूझे। धूप का कहीं कोई नामोनिंषा नहीं। एक रोज कलाकार मित्र विनय शर्मा आग्रह कर सरयू नदी के गुप्तार घाट ले गए। धूंध में सरयू जैसे उंघ रही थी। पटना से आए कलाकार मिलनदास बोले इससे भले तो होटल में थे। पर घुम्मकड़ मन कोहरे लिपटी सरयू में ही जैसे कुछ तलाष रहा था। कैमरा निकाला पर कोहरे में जैसे दृष्य गुम थे। कुछ भी नहीं मिला। वापस जाने की सोची कि कोहरा छंटने लगा। दोपहर के तब कोई 2 बजे होंगे। धूप नहीं निकली पर थोड़े छंटे कोहरे में सरयू में चलती दो नावों का साक्षात् हो गया। दूर मांझी नाव को खे रहा था पर दृष्य अनूठा था। कैमरे से त्वरित छवि को कैद किया। धूंधलेपन में नदी और नाव के संयोग के अनूठेपन को कैमरे ने जी लिया। 
कोहरे में लिपटी अयोध्या की यात्रा को संजोते वह क्षण भी न भूलने वाले थे जब एक रोज विवादास्पद कर दी गई रामजन्म भूमि जाना हुआ। दुपहरी धूंध भरी थी। आगे-आगे पुलिस की पायलेट गाड़ी और पीछे कलाकारों के साथ हम। पता चला, अयोध्या का एक बड़ा हिस्सा हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित कर रखा है। बगैर पुलिस की अनुमति के वहां कोई प्रवेष नहीं कर सकता। हां, लोग रहते हैं पर उनके भी प्रवेष पास बने हुए हैं। चप्पे चप्पे पर केन्द्रिय सैन्य बल तैनात। कहीं कोई युद्ध न छीड़ जाए। मूल स्थान पर प्रवेष के समय एक एक चीज की तलाषी ली गई। और फिर एक तंग कंटिले तारों से निर्मित रास्ते में हम हो लिए। बाहर उत्पाती बंदर जैसे पींजड़े में हमें देख हंस रहे थे। कुछ देर तक उस तंग पींजरेनुमा रास्ते में चलते रहे और फिर राम जन्म भूमि के दर्षन कर लौट आए। लगा, धूंध मौसम की ही नहीं है, मन की भी है। हर कोई सहमा-सहमा सा। छावनी बनी अयोध्या में चुप्पी पसरी हुई। कोहरे का मर्म अब जैसे समझ आ रहा था। मन को मथता हुआ। पर बाद में इस कोहरे को देषभर के आए कलाकारों ने अपनी रंग-रेखाओं से जैसे भगा दिया।  महाराष्ट्र के कलाकार जाॅन डगलस ने धूंध को रंग-रेखाओं से मांडा पर सुहास बहुलकर ने मंदिर में घंटियां पकडे साधु के बरक्स कंटिले तारों को व्यंजित कर जैसे कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया था। 
गोवा से आए हनुमान काम्बली ने रावण वध के दृष्य की आड़ में सामयिक संदर्भों में रेखाओं का आकाष रचा। जयपुर के विनय शर्मा ने सरयू नदी और वहां के घाटों को जेहन में रखते हुए अतीत और वर्तमान को अपने कैनवस पर जिया। बनारस के प्रणामसिंह ने अयोध्या के मंदिरों में साधु-संतों की उपस्थिति को कैनवस पर जी रहे थे तो रंगों के छंद में अवधेष मिश्र ने अयोध्या के महात्म्य को उभारा। भोपाल के युसूफ ने रेखाओं की महीनता में एब्सट्रेक्ट के जरिए मारीच की व्यंजना की। युसूफ रंग पट्टिकाओं में स्थान विषेष ही नहीं वहां के संदर्भों को बेहद संवेदनषीलता से अपनी कला में जीते हैं। ऐसा ही बिहार के मिलनदास के साथ भी है। वह हल्के रंगों में घुले पत्रों की इबारत में अयोध्या के संदर्भ जब उकेरे रहे थे तो एकटक उनके कैनवस को ही निहार रहा था। उन्होंने अयोध्या की प्राचीनता को जैसे हिन्दी, अंग्रेजी और उडि़या भाषा में कैनवस पर ढूंढ निकाला। कोलकता के अमिताभ सेनगुप्ता लिपियों में संवेदना के मर्म जैसे उद्घाटित करते हैं। एक कैनवस पर उन्होंने मर्यादा पुरूषोतम राम को केन्द्र में रखते हुए नीचे मिनिएचर, लोक कला के भी संदर्भ दिए। मध्यप्रदेष से आए प्रो. लक्ष्मीनारायण भावसार, खैरागढ़ से आए महेषचन्द्र शर्मा ने परत दर परत रंगों में अयोध्या की मिट्टी, यहां के घरों और जन-जीवन में व्याप्त रंगों को कैनवस पर जिया। जय झरोटिया रेखाओं में बतिया रहे थे,कैनवस पर उनके हनुमान पहाड़ उठाए जैसे वाल्मिकी रामायण लेाक में ले जा रहे थे। कलाकार यह सब जब कैनवस पर उकेर रहे थे, उनके सृजन सरोकारों पर निरंतर बतियाना भी होता रहा। घटनाओं, इतिहास और मिथकों की कहानियांें में उनके साथ उतरते बहुत से नए संदर्भ भी जैसे लिखने के लिए मिले। लगा, कलाकृतियों में जो कुछ दिखता है, उससे बड़ा सच वह अदृष्य होता है जिसे लेकर मन में हलचल होती है। कोहरे लिपटी सुबह, दुपहरी और हाड़ कंपाती रात के अदृष्यपन में अयोध्या में उभरे रंग और रेखाओं के उजास ने ही यह सब कुछ शायद लिखा दिया।
-न्यूज़ टुडे, 9 अप्रैल, 2015 


Thursday, March 26, 2015

जनजातीय कलाओं से साक्षात्


संस्कृति जीवन से जुड़े संस्कारों में निहित है। संस्कृति के मूल में ही सभ्यताओं का नाद है। वैष्वीकरण की बड़ी विडम्बना यह है कि विरासत से जुड़ी जनजातीय कलाओं की हमारी थाती से हम निरंतर दूर भी होते जा रहे हैं। स्वाभाविक ही है कि इससे समूहों की सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्ध जनजातीय परम्पराओं में निहित कलाओं का लोक भी क्षीण हो रहा है। संस्कृति या कहें इतिहास का अनघड़ रूप बगैर किसी छेड़छाड़ के कहीं है तो वह आदिवासी सभ्यता में ही है। अनघड़ पाषाण भी वहां पूजनीय है। रूंख माने पेड़ भी है तो उसकी टहनियां और उससे जुड़े धार्मिक संस्कारों का वहां सुमधुर गान है, पर्वत, नदियां अजस्त्र ऊर्जा के स्त्रोत ही नहीं हैं आदिवासियों का जीवन है।
बहरहाल, देषभर में घुम्मकड़ी की है परन्तु आदिवासी इलाकों के भीतर जाने का सुयोग कभी नहीं हुआ।  हां, आदिम परम्पराओं के अन्वेषण में इधर-उधर भटकते बहुत कुछ मिला तो है परन्तु वह सब सुना हुआ ही गुना लगता है। इधर संयोग हुआ कि मध्यप्रदेष में कुछ समय पहले भोपाल जाना हुआ तो, सुदूर आदिवासी इलाकों की महक को गहरे से अनुभूत किया। बल्कि आदिवासी कलाओं से गहरे से साक्षात् भी हुआ। लगा, आदिवासी इलाकों में पहुंच गया हूं, उनकी परम्पराओं, रिवाजों और संस्कृति की अनूठी गाथाओं में रच-बस गया हूं। ऐसा ही हुआ, जब कुछ समय पहले अस्तित्व में आए मध्यप्रदेष के जनजातीय संग्रहालय जाना हुआ। संग्रहालय क्या, पूरी आदिवासी सभ्यता और संस्कृति से जुड़े चिन्ह ठौड़ ठौड़ वहां मौजूद है। सच है! आदिवासी इलाकों के अंदर तक नहीं गया परन्तु इस संग्रहालय में प्रवेष करना आदिवासियों और उनकी कलाओं तक एक तरह से पहुंचना ही है। जनजातीय जीवन, देषज ज्ञान, परम्परा और सौन्दर्यबोध का चावा स्थल ही तो है मध्यप्रदेष का जनजातीय संग्रहालय।

संग्रहालय में प्रवेष करता हूं और  पाता हूं यह आम संग्रहालयों की भांत नहीं है। अक्सर संग्रहालयों में जाने पर यह अनुभूत किया कि बेशकीमती कलाओं को संजोने वाले यह आलय भी पुरा वस्तुओं के आगार भर बन कर रह गए हैं। कोई बड़ी सी इमारत बना दी और उसमें पुरातन चीजों को करीने से संग्रहित कर रख दिया। लो, हो गया संग्रहालय तैयार। जनजातीय संग्रहालय इस तरह का पारम्परिक संग्रहालय नहीं है। यहां खंड-खंड आदिवासी क्षेत्रों की धरा को जैसे अवतरित किया गया है। कलाकार मित्र हरचंदन सिंह भट्टी ने आदिवासी इलाकों की भौगोलिकता के साथ वहां की बनावट को इसमें एक तरह से जीवंत किया है। आप जैसे ही प्रवेष करेंगे, बांस उगे मिलेंगे। सामने ही तालाब सा कुछ है। और इधर-उधर झोपडि़यां, वटवृक्ष, सिंदूर पूता पाषाण माने लोक देवता, आदिवासियों की निर्मित कलाएं और आदिवासी बच्चों के खेल तक के जीवंत स्कल्पचर यहां है। आदिवासी क्षेत्रों की वर्चुअल सैर ही तो है यह संग्रहालय! कला की आभासी दुनिया। भले आदिवासियों के गांव और उनकी धरती  मूल मंे यहां नहीं है परन्तु हूबहू वैसे ही माॅडल इस कदर आकर्षक है कि यहां की यात्रा करते आपको कहीं यह अहसास नही ंहोगा कि आप जनजातीय क्षेत्रों का भ्रमण नहीं कर रहे हैं।  सांस्कृतिक वैभव, जनजातीय कलाबोध, देवलोक और जनजातीय कलाओं के अद्भुत रूप यहां है। जनजातीय परिवेष में मिट्टी, घास, बांस, लकड़ी, रस्सी और तमाम दूसरी चीजों से सृजित कलाएं यहां जैसे आने वालो से संवाद करती है। यह नहीं कि यहां जो है, वह दिखानेभर को ही है और उनका मूल से नाता नहीं है। यहां जो है उसमें तमाम वस्तुएं वही हैं जो जनजातीय क्षेत्र के समुदाय उपयोग मंे लेते हैं। जैसा जीवन वह जीते हैं, उसी को यहां आदिवासी कलाकारों ने एक तरह से जीवंत किया है।
संग्रहालय में प्रवेष माने षिल्प सौन्दर्य के अनूठो भव से साक्षात्। जनजातीय मौखिक परम्पराओं के बहुविध षिल्प यहां है। सुप्रसिद्ध कलाकार अनिल कुमार से पता चलता है, मध्यप्रदेष मे ंनिवासरत 43 जनजातीय समूहों में से आमंत्रित कर यहां षिल्प रचने का दायित्व उन्हीं को दिया गया। अचरज होता है, आधुनिक षिल्पियों ने नहीं, कोल, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू, भील और गोण्ड जनजातियों तथा इनकी उपजातियों के अलग-अलग माध्यमों मंे काम करने वाले षिल्पियों ने रचा कला का यह मोहक संसार। शायद यही कारण है कि यहां कहीं किसी बनावट की अनुभूति नही ंहोती है। जो कुछ है सब असल सरीखा ही लगता है। वहां से लौट आया पर मन में आदिवासी क्षेत्र और वहां की संस्कृतियांे हुआ समय का वह संवाद अभी भी कहीं ध्वनित है। इतिहास, अतीत और वर्तमान की दूरियों को कम करता हुआ। 
- लोकप्रिय सांध्य दैनिक "न्यूज़ टुडे", 26 मार्च 2015 


Friday, March 13, 2015

खजुराहो में मानवीय सौन्दर्य...

कलाओं की जीवंत अभिव्यक्ति है खजुराहो। कोई एक कला नहीं .कलाओं का समग्र वहां जो है! शिल्प संयोजन में जीवन से जुड़े सरोकारों की संगत! पाषाण में जीवन की लय! संगीत, नृत्य में ध्वनित होते पाषाण। हाँ, मिथुन मूर्तियां भी वहां है... पर खजुराहो का सच वही नहीं है। सच है कलाओं का मेल। आप मूर्तियां देखते हैं, देखते देखते औचक जहन में तमाम कलाओं का संयोजन, शिल्प पूर्णता को अनुभूत करने लगते हैं। 
छायांकन : राजेश 
बहरहाल, मध्यप्रदेष का संस्कृति विभाग पिछले चार दषकों से निरंतर खजुराहो नृत्य उत्सव का आयोजन करता आ रहा है। इस बार कलाओ ंके अंर्तसंबंधों पर बोलने के लिए आमंत्रित हुआ तो खजुराहो में बिखरे षिल्प वैभव को भी जैसे गहरे से जिया। व्याख्यान से एक दिन पहले अल्लाउद्दीन खां सगंीत अकादमी के निदेषक और मित्र अनिलकुमार से मंदिरों को देखने की चाह जताता हूं तो वह गाड़ी भेज देते हैं। जल्द तैयार होकर 9 बजे ही निकल पड़ता हूं। पूर्वी, पष्चिमी और दक्षिणी समूह में बंटे हैं मंदिर। देखता हूं, दूर मंदिर से सटे तालाब में लोग नहा रहे हैं। गंदे पानी को और गंदा करते हुए। यहां से आगे बढ़ता हूं। मंदिरों के समूह दिख जाते हैं। यह पष्चिमी समूह के मंदिर हैं। खजुराहो का मूल षिल्प वैभव पष्चिमी समूह के इस मंदिर परिसर में ही है। रत्नजडि़त हार सरीखे मंदिर। अलंकृत। मन को मोहते। पहले मंदिर समूह से पृथक पर उनसे जुड़े मातंगेष्वर महादेव हो आता हूं। आदिकाल से पूजित है यह मंदिर!  हर्षवर्धन द्वारा 9 वीं सदी में निर्मित। कहते हैं कभी यहां भगवान राम ने भी पूजा की। अधिस्ठान तक आने के लिए खड़ी सीढि़यां। षिखर वाले इस मंदिर की दरो-दीवार सौन्दर्य प्रतिमाओं से भरी है। ...यहां से आगे पुरातत्व विभाग की खिड़कीसे टिकट ले चंदेल शासको द्वारा बनाए मंदिर समूह परिसर में प्रवेष करता हूं। वराह मंदिर्! बलुआ पत्थरों से निर्मित वराह प्रतिमा पर अलंकृत 672 मूर्तियां। सामने लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव, जगदम्बी, चैसठ योगिनी, चित्रगुप्त, विष्वनाथ आदि मंदिरों  की दीवारों पर उत्कीर्ण षिल्प, सम्मोहित करता है। लगता है, यहां हरेक कला दूसरी से गूंथी है। चित्र-नृत्य में, नृत्य-संगीत में, संगीत-षिल्प में और ऐसे ही स्थापत्य, नाट्य जैसे एक दूसरे से जुड़े देखने वालों से संवाद करते हुए।
मुझे लगता है, खजुराहो में मंदिरों पर उत्कीर्ण मूर्तियां जगत् वस्तु रूप नहीं, आत्मवस्तुरूप है। कहूं, व्यस्टि और समष्टि को जोड़ने वाली एक संधि रेखा। षिल्प क्या है? चक्षु, भाव और बुद्धि की त्रिवेणी ही तो! मानवीय देह, जीवन से जुड़े प्रसंगों का प्रस्तरण रूपान्तरण कहीं है तो वह यहीं है। यहीं। प्रतिमाओं की सुघड़ता...नैरन्तर्य...क्रमबद्धता...संतुलन! अपार्थिव सौन्दर्य। पाषाणों में है संगीत का माधुर्य। नृत्य का उल्लास। षिल्पी ने जैसे नृत्यरत भंगिमाओं में गति का अंकन किया है। लय अंवेरते। स्त्री-पुरूष। एक-दूसरे में समाते। संगत को ध्वनित करते। मानवीय देह के सूक्ष्म सौन्दर्य रूप! चित्त को संस्कारित करती छवियां-श्रृंखलाबद्ध। मन को उद्वेलित कर कलाओं के रस से ओत-प्रोत करती। 
खजुराहो में मूर्तियां नहीं रूप बंध है। कलाओं में बसा है जीवन। स्त्री-पुरूष की देह नहीं-उनके अंग प्रत्यंगों की सौन्दर्य दीठ! औचक संत एकनाथ जेहन में कौंधते हैं, ‘देखणे देखिजे देखणेनी’ माने देखने जैसा है (सुंदर) उसे देखिए। सौन्दर्य का षिल्प मुहावरा ही तो है खजुराहो की यह प्रस्तर प्रतिमाएं। मिथुन मूत्रियां पर वह भारतीय दृष्टि जिसमें कुण्ठाओं, दुराग्रहों के त्याग पर बल है। पष्चिम में शरीर या कहे ंदेह को अध्यात्म प्राप्ति की बाधा माना गया है। हमारे यहां ऐसा नहीं है। हमारे यहां कहा गया है, ‘अनंद ब्रह्णो रूपं तच्य देहे व्यवस्थितम्’ यानी आनंद ही ब्रह्म का रूप है और वह मनुष्य की देह में अवस्थित है। खजुराहो देह का गान है। देह का दृष्यात्मक संगीत! ऐसी मूर्तियां छत्तीसगढ़ में भोरमदेव मंदिर और कोणार्क में भी देखी है।...और भी यत्र-तत्र देखता रहा हूं पर यहां खजुराहो में प्रस्तर सर्वथा नये सौन्दर्य भव से साक्षात् कराते हैं। रेखाओं और घनाव के मघ्य केवल और केवल चेतना की लय जो यहां है! कलाओं के अंर्तसंबंधों की प्रस्तर व्याख्या कहीं है तो वह खजुराहो में ही है। सोचता हूं, खजुराहो को देखना कलाओं के परस्पर संबंधों को एक तरह से समझना ही तो है।
-सांध्य दैनिक "न्यूज़ टुडे" १२ मार्च, २०१५  

Sunday, February 1, 2015

आर. के. लक्ष्मण

आर. के. लक्ष्मण से  वर्ष 2005 में जयपुर में दूरदर्शन के लिए संवाद हुआ था. तभी बहुत कुछ महत्वपूर्ण संजो पाया था. पढ़िए आज के इस "जनसत्ता" में...