Wednesday, February 21, 2018

संविधान की आठवी अनुसूची में सम्मिलित हो मातृभाषा राजस्थानी

यूनेस्को ने 21 फरवरी का दिन अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की हुई है। उद्देष्य है, विष्व मे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। पर विडम्बना है, संविधान की 8 वीं अनुसूची मंे सम्मिलत भाषाओं में हमारी अपनी मातृभाषा राजस्थानी नहीं है। बावजूद इसके कि इसका समृद्ध प्राचीन साहित्य है, विष्व की  किसी भी भाषा से कही अधिक समृद्ध शब्द कोष है, देष के बड़े भु-भाग पर रहने वालों की यह भाषा है। दुनियाभर में राजस्थानी के अपने लिखे से पहुंचने वाले ‘ंधरती धोरा री’ के महाकवि कन्हैयालाल सेठिया, साहित्य के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित हुए प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा ‘बिज्जी’ आदि अपनी मातृभाषा की संवैधानिक मान्यता की उम्मीद में ही इस लोक से विदा हो गए पर मान्यता है कि अभी तक नहीं मिली।
बहरहाल, जनहित के विषयों के पैरोकार, अभिभाषक मित्र सूर्यप्रताप सिह राजावत ने हाल ही प्रधानमंत्री कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी चाही है कि राजस्थान विधानसभा में 2003 में राजस्थानी को मान्यता दिए जाने के प्रस्ताव को पारित कर भिजवाए जाने और इसके बाद 24 जुलाई 2014 को केन्द्रीय संस्कृति मंत्री चन्द्रकुमारी कटोच द्वारा राजस्थानी को आठवी सूची मे सम्मिलित करने के लिए प्रधानमंत्री को लिखे पत्र पर क्या कार्यवाही की गयी है। आरटीआई का जवाब तो खैर, देर-सवेद आयेगा ही परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि करोड़ों राजस्थानियों की मातृभाषा को आखिर क्योंकर मान्यता के अपने सांस्कृतिक अधिकार की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है।
मुझे लगता है, संस्कृति की विविधता की हमारी थाती तभी बची रह सकती है जब हम अपनी आंचलिक भाषाओं को बचा लें। केन्या के उपन्यासकार, भाषाविद् न्गुगीवा थ्योगो की किताब ‘डिकोलाइजिंग द माइंड’ में भाषा की राजनीति पर विषद् विमर्ष है। पुस्तक हमें बताती है कि कैसे भाषा के जरिए गुलाम बनाया जाता हैे। भाषा व्यापक जन-समुदाय की सामुहिक स्मृति होती है। यदि वह आपकी अपनी नहीं है तो आप एक समय के बाद अपने अतीत के गौरव को सदा के लिए खों देंगे। मुझे लगता है, राजस्थानी को यदि समय रहते संवैधानि मान्यता नही मिलती है तो  राजस्थान की संस्कृति की स्मृति से भी हम वंचित हो सकते हैं। तब हो सकता है, स्मृति वंचित समाज में जीने को हम मजबूर हो जायें। उपनिषदों में कहा गया है कि अपनी भाषा के बगैर न सत्य को, न असत्य को, न पाप को, न पुण्य को , न अच्छे और न बुरे को, न सद्गुण, न अवगुण को-किसी को नहीं पहचाना जा सकता है। अपनी भाषा में ही हम अपने आत्म को पहचान सकते है। जान सकते हैं। इसलिए जरूरी है हम अपनी बोलियों, मातृभाषाओं और उसकी विविधता को सहेंजे। 
मैं हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी में भी लिखता हूं। याद पड़ता है एक दफा कमलेष्वर जब बीकानेर आए तो उनसे लम्बा संवाद बोलियांे पर हुआ। बाद में उनके साथ को सहेजते मैने संस्मरणनुमा कुछ उन पर लिखा।  सहज ही वह अपनी मातृभाषा राजस्थानी में लिखा गया। राजस्थानी भाषा अकादमी की पत्रिका में जब वह प्रकाषित हुआ तो मैने हिंदी में उसका कुछ अनुवाद और मुल छपा उन्हें डाक से भेज दिया। थोड़े दिनों बाद कमलेष्वर का पत्र हस्तगत हुआ, उन्होंने लिखा था, ‘तुम्हारे द्वारा ‘‘जागती जोत’’ में छपा-लिखा हुआ बहुत आत्मीय आलेख-संस्मरण मिला।  पढ़ता हूं तो राजस्थानी समझ में आती है। आखिर हिंदी को रक्त- संस्कार तो राजस्थानी , शौर सैनी और ब्रज ने ही दिया है। हिंदी तो भाषा नहीं, भाषा मण्डल है! मैं स्वयं ब्रजभाषी हूं - मैनें वृहद शुभ और भविष्य के लिए अपनी मातृभाषा को खड़ी बोली हिंदी के लिए समर्पित किया है...सांस्कृतिक समन्वय के लिए, देष और राष्ट्र के उत्थान के लिए यह बलिदान जरूरी होते हैं...पर अपनी मातृ-भाषाओं -बोलियों के विसर्जन से हिंदी प्रगाढ़ और शक्तिषाली नहीं होगी, हमें अपनी मातृभाषाओं को जीवित रखना पड़ेगा, जहां से हिंदी की शब्द संपदा सम्पन्न होगी। यह बिटिया- बेटे को ब्याहने वाला रिष्ता है- जो नाती- पोतों में हमें अपनी निरंतरता देता है।’ उनके इस कहन के आलोक में ही यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हिंदी की संपन्नता बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं से है। जो लोग राजस्थानी की मान्यता के विरोधी हैं, उन्हें इस बात को समझ लेना चाहिए कि राजस्थानी की मान्यता से किसी और भाषा का अहित नहीं होने वाला है और जो लोग बोलियों के नाम पर राजस्थानी की मान्यता पर प्रष्न उठाते हैं, उन्हें भी भी भाषाविद्ों की इस बात को नहीं भुलना चाहिए कि किसी भी भाषा की जितनी अधिक बोलियां होती है, वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध मानी जाती है। राजस्थानी के साथ यही है। 
विष्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगौर ने राजस्थानी के दूहे सुनकर कभी कहा था, ‘‘रवीन्द्र गीतांजली लिख सकता है, डिंगल जैसे दूहे नहीं।’ भाषाषास्त्री सुनीति कुमार चटर्जी, आषुतोष मुखर्जी राजस्थानी भाषा के समृद्ध कोष और इसकी शानदार परम्परा के कायल होते समय-समय पर राजस्थानी की मान्यता की हिमायत करते रहे हैं। यही नहीं भाषाओ के विकास क्रम के अंतर्गत राजस्थानी का प्रार्दुभाव अपभ्रंष में, अपभ्रंष की उत्पत्ति प्राकृत तथा प्राकृत का प्रारंभ संस्कृत और वैदिक संस्कृत की कोख में परिलक्षित होता है। इन सबके बावजूद राजस्थानी को मान्यता नहीं मिलना क्या समय की भारी विडंबना नहीं है?
राजस्थान विधानसभा में वर्ष 1956 से ही राजस्थानी को राज-काज और षिक्षा की भाषा के रूप में मान्यता के प्रयास हो रहे हैं परन्तु इन प्रयासों को अमलीजामा पहनाने की दिषा में कोई समर्थ स्वर नहीं होने के कारण यह भाषा राजनीति की निरंतर षिकार होती रही है। राज्य विधानसभा में पहली बार 16 मई 1956 को विधायक सम्भुसिंह सहाड़ा ने राजस्थानी भाषा प्रोत्साहन के लिए जो अषासकीय संकल्प रखा उसमें राजस्थान की पाठषालाओं में राजस्थानी भाषा और तत्संबंधी बोलियों की षिक्षा देने पर जोर देने हेतु तकड़ा तर्क दिया गया था। संकल्प में कहा गया था कि बच्चे घरों मंे अपने माता-पिता के साथ जिस भाषा में बात करते हैं, उसी मंे षिक्षा दी जानी चाहिए, इसी से वे पाठ्यपुस्तकों में वर्णित बातों को प्रभावी रूप में ग्रहण कर पांएगे। इसके बाद 2003 में राज्य विधानसभा ने राजस्थान की मान्यता का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भिजवा दिया। तब से आज इतने वर्ष हो गए हैं, राजस्थानी मान्यता की बाट ही जो रही है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि लगभग 1 हजार ई. से 1 हजार 500 ई. के समय के परिपे्रक्ष्य को ध्यान में रखकर जिस भाषा के बारे में गुजराती भाषा एवं साहित्य के मर्मज्ञ स्व. झवेरचन्द मेघाणी ने यह लिखा कि व्यापक बोलचाल की भाषा राजस्थानी है और इसी की पुत्रियां फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी का नाम धारण कर स्वतंत्र भाषाएं बनी। उस भाषा की संवैधानिक स्वीकृति के बारे में निरंतर प्रष्न उठाए जा रहे हैं।
एक प्रष्न यह हो सकता है कि संविधान की मान्यता के बगैर क्या कोई भाषा अपना अस्तित्व बनाकर नहीं रह सकती। यह सच है कि भाषा सरकारें नहीं बनाती, वे लोग बनाते हैं जो इसका प्रयोग करते हैं परन्तु इसका व्यवहार में प्रयोग तो तब होगा न जब यह षिक्षा का माध्यम बनेगी, जब राजकाज, विधानसभाओं, अदालतों में इस भाषा का प्रयोग उचित समझाा जाएगा। और यह सब तब होगा जब सरकार इसे मान्यता प्रदान करेगी। इन पंक्तियों के लेखक जैसे बहुत से हैं जिनका आरंभिक परिवेष राजस्थानी का रहा है, आज भी घर में हम राजस्थानी में बात करते हैं परन्तु बच्चों से हिन्दी में बात करने के लिए मजबूर हैं। कारण यह है कि वे ठीक से विद्यालय में हिन्दी या अंग्रेजी यदि नहीं बोल पाएंगे तो जिस भाषा में वे षिक्षा ले रहे हैं, उन्हें बोलने वाले दूसरे बच्चों के साथ उन्हें हीन भावना जो महसूस होगी। राजस्थान में ही गांवो, छोटे शहरों से राजधानियां और बड़े शहरों में आए अधिकाषं राजस्थानी बोलने वालों के साथ यही हो रहा है। उन्हें अपनी भाषा से लगाव है, प्यार है परन्तु इस बात की लगातार गम भी है कि उनके बाद इस भाषा को उनके बच्चे नहीं बोलंेगे, व्यवहार में नहीं लंेगे। क्या ऐसा तब संभव होता जब उन बच्चों को भी राजस्थानी में ही पढ़ने का मौका मिलता?
भाषा निरंतर प्रयोग से समृद्ध होती है परन्तु राजस्थानी का यह दुर्भाग्य है कि प्रतिवर्ष गांवों, सुदूर ढ़ाणियों से अपनी मेहनत से पढ़-लिखकर शहर में आकर नौकरी करने वाले राजस्थानी भाषी मजबूरन अपनी दूसरी पीढ़ी के साथ राजस्थानी में संवाद नहीं कर पाते हैं, ऐसे दौर में कब तक राजस्थानी गांवो के अलावा शहरों में बची रहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। राजस्थानी की मान्यता को क्यों इस नजरिए से नहीं देखा जा रहा? क्यों राजस्थानी भाषा के बाद जो भाषाएं विकसित हुई उन्हें मान्यता मिल गयी परन्तु राजस्थानी आज भी मान्यता की बाट जो रही है? क्यों बोलियों के नाम पर राजस्थानी के साथ यह अन्याय हो रहा है? हकीकत यह है कि राजस्थानी की मान्यता इसके अधिकाधिक लोक प्रयोग के लिए जरूरी है, इसलिए भी कि इसी से मुद्रण और प्रकाषन, पठन-पाठन और बोलने की आदत का इसका अधिक विकास होगा और यही इस भाषा की आज की जरूरत है। इसी से राजस्थानी के समृद्ध प्राचीन साहित्य को भी अंवेरा जा सकेगा।
बहरहाल, संविधान की मूल अवधारणा लोकतांत्रिक प्रस्थापना में है। संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अगर एक हिस्से की भाषा कोई है तो उसको बचाया जाए। राजस्थानी 9 करोड़ लोगों की भाषा है, इसे बचाना, इसकी मान्यता, संरक्षण इसलिए जरूरी है। वर्ष 1959 में भाषाविद् जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने ‘भारत का भाषा सर्वेक्षण’ पुस्तक में राजस्थान की भाषा राजस्थानी बताते स्पष्ट कहा है-‘‘मारवाड़ी के रूप में, राजस्थानी का व्यवहार समस्त भारतवर्ष में पाया जाता है। ‘पंजाबी के ठीक दक्षिण में लगभग 1 करोड़ साढ़े बयासी लाख राजस्थानी भाषा-भाषियों का क्षेत्र है जो इंगलैण्ड तथा वेल्स की आधाी जनसंख्या के बराबर है। जिस प्रकार पंजाबी उत्तर-पष्चिम में मध्य देष की प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है, उसी प्रकार राजस्थानी उसके दक्षिण-पष्चिम में प्रसारित भाषा का प्रतिनिधित्व करती है।’’
ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण का यह कार्य तब किया था जब भारतीय संविधान बना भी नहीं था, बाद में अंग्रेजी से यह पुस्तक हिन्दी में अनुवादित होकर प्रकाषित हुई। वर्ष  1967 से लेकर अब तक बहुत सारी भाषाएं संविधान की 8 वीं अनुसूची में जोड़ी गयी है। यह सच में विडम्बना की बात है कि जिस भाषा की लिपि से आधुनिक देवनागरी और दूसरी अन्य भाषाओं की लिपियां बनी है और जिसका अपना व्याकरण और विष्व के विषालतम शब्दकोषों में से एक जिसका शब्दकोष है, ऐसी भाषा को संविधान की 8 वीं अनुसूची में जुड़ने का अभी भी इन्तजार है।
राजस्थानी की मान्यता में किसी का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है। इसका अर्थ इतना ही है कि इससे वर्षो पुरानी इस भाषा का संरक्षण हो सकेगा। ऐसे दौर में जब मातृभाषाओं पर विष्वभर में संकट चल रहा है, इस दिषा में गंभीर चिंतन कर त्वरित कार्यवाही की जानी समय की आवष्यकता भी है। इसलिए भी कि भाषा, साहित्य और संस्कृति से व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है। राजस्थानी की मान्यता भाषा के प्रयोग को व्यापक स्तर पर प्रयोग की स्वीकृति देती है। इसी दीठ से क्या हमारी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलनी चाहिए!

Saturday, January 13, 2018

संस्कृति की जीवंतता में उत्सवधर्मिता का नाद


उतसवधर्मिता का नाद - कला मेला 
राजस्थान ललित कला अकादमी का एक वार्षिक आयोजन है, ‘कला मेला’। वर्षों से यह होता आ रहा है। पर पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो इस मेले से उत्साह, उमंग नदारद रही है। करना है, इसलिए किए जाने की औपचारिकता की एकरसता में कला मेले के सांस्कृतिक सरोकार कभी वृहद स्तर पर सामने  आए हों, ऐसा लगा नहीं। कलाकारों को अकादमी स्टाॅल आंवटित करती है, कला प्रदर्षनी का आयोजन होता है और उद्घाटन-समापन समारोहों के साथ ही तमाम औपचारिकताआंें में सब कुछ संपन्न हो जाता है। पर इस बार ललित कला अकादमी का ‘कला मेला’ विरल था। संस्कृति के साझे सरोकारों में जीवन के उल्लास, उत्सवधर्मिता से पूरी तरह से जुड़ा हुआ। रवीन्द्र मंच पर आयोजित मेले के पांच दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। 
कहने को जयपुर में एषिया का सबसे बड़ा प्रचारित ‘जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल’ भी वर्ष 2006 से होता आ रहा है। आरंभ के कुछ वर्ष यह फेस्टिवल साहित्य की संवेदना से लबरेज था भी परन्तु शनैःषनैः अब यह बाजार और व्यावसायिकता से ग्रसित होता पष्चिम की भौंडी नकल और फिल्मी हस्तियों को एकत्र कर युवा पीढ़ी को भरमाने का एक जरिया भर रह गया है। ऐसे में राजस्थान ललित कला अकादमी का पांच दिवसीय कला मेला इस बार उत्सवधर्मिता जगाता जैसे एक बड़ा संदेष देने वाला था। संदेष यह कि कलाएं मानवीय अनुभूतियों का सौन्दर्य रूपान्तरण है। कला-साहित्य से जुड़े आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ इन्हीं के जरिए जीवन को पोषित करती है। ऐसा यदि नही ंहोता है तो फिर मेले या उत्सव के बहाने किसी भी प्रकार के आयोजन की कोई सार्थकता नहीं है।
सांस्कृतिक संध्या 
मुझे लगता है, कला या साहित्य से जुड़ा कोई भी मेला-डत्सव वही सार्थक है जिसमें भारतीय संस्कृति और हमारी अपनापे की संस्कृति का समावेष हो। वहां औपचारिकताओं की भरमार नहीं हो। वही जिसमें एकरसता नहीं हो और वही जिससे संस्कृति जीवंत रहे जीवाश्म न बने। आनंदकुमार स्वामी स्थापित करते हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है।’ इस दीठ से इस बार का कला मेला अब तक के हो रहे कला मेलों से अपने आप मे ंनवीन था। कैनवस पर कलाकारों की कलाकृतियों का रूपहला संसार मेले में था तो संस्थापन (इंस्टालेषन) की भी बेहतरीन प्रस्तुतियां उसमें थी। कला षिविर में कलाकारों ने वहीं कलाकृतियां सृजित की तो संगीत और नाट्य की भी लगभग रोज ही प्रस्तुतियां हुई। पहली बार कलाओं के भिन्न आयामों, यहां तक की कला षिक्षा और कला के अंतःसंबंधो पर संगीत, नृत्य, नाट्य, वाद्य, साहित्य आदि तमाम कलाओं पर संवादों का भी यह मेला संवाहक बना। 
राजस्थान ललित कला अकादमी में अध्यक्ष का मनोनयन भी इस बार लगता है, राज्य सरकार ने गहरी सूझ से किया है। अकादमी अध्यक्ष डाॅ. अष्विन एम. दलवी यू ंतो ‘सुरबहार’ जैसे विरल भारतीय वाद्य के देष के जान-माने कलाकार है ंपरन्तु दृष्य कलाओं से भी उनके गहरे सरोकार हैं। राग-रागिनियों पर चित्र की परम्पराओं के साथ ही संगीत के दृष्य सरोकारों की उन्हं गहरी समझ है। सितार, तबला और दूसरे वाद्य यंत्रों के साथ ही नृत्य, चित्रकलाओं में भी वह रमे हुए हैं। 
कलाओं के अन्तः संबंधों पर संवाद 
इसीलिए इस बार के कला मेले में उनने एक बड़ी पहल यह भी की कि विभिन्न संवाद कार्यक्रमों में से एक ‘कलाओं के अंतःसंबंध’ पर भी रखा। भरनाट्यम की देष की ख्यात कलाकार संध्या पुरेचा, सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक चेतन जोषी, लब्धप्रतिष्ठि रंगकर्मी, संेसर बोर्ड सदस्य अषोक बांठिया, बतौर संगीत साधक अष्विन एम.दलवी, जाने-माने चित्रकार जय झरोटिया के साथ ही कला आलोचक रूप में इस पंक्तियों के लेखक ने इस सत्र में षिरकत की। यह शायद पहला अवसर था जब राजस्थान ललित कला अकादमी ने ‘कला मेले’ में इस तरह की संस्कृति की संवेदन पहल की। संवाद और भी हुए जिनमें कला षिक्षा पर एक महत्ती सत्र हुआ तो भारतीय कला दृष्टि, भारतीय कला की चिंतन परंपरा और सौंदर्य मानदंड, जयपुर की कला परंपरा और नगर नियोजन पर भी सार्थक संवाद-चर्चाएं हुई। महत्ती यह भी था कि इन चर्चाओं के बहाने कलाओं के मानवीय सराकारों पर विषद् विमर्ष की अकादमी के जरिए एक तरह से राह खुली। संगीत की आलाचारी के दौरान सुनने वाले के जेहन में बनने वाले आकारों का चित्रण भी कैलीग्राफी कैम्प के दौरान मेले में हुआ। माने इस बार का कला मेला इस मायने में जीवंत था कि इसमें किसी एक कला नहीं बल्कि कलाओं के अंतर्गुम्फन को भी बहुत से स्तरों पर स्वर दिया गया था। मेले में प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाट्य मंचन और संस्कृति के दूसरे उपादानों की बडी विषेषता यह भी थी कि पहले दिन आने वाले दर्षकों ने मौखिक प्रचार कुछ इस तरह से किया कि लगभग प्रतिदिन ही कला मेला लोगों की आवा-जाही से गुलजार रहा।
मेले में सुप्रशिद्ध कार्टूनिस्ट सुधीर गोस्वामी का सृजन 
बहरहाल, ‘मेला’ शब्द उत्सव और उमंग से जुड़ा है। वहां यदि औपचारिकता और एकरसता रहेगी तो कभी भी वह जनोत्सव नहीं बन सकेगा। अकादमी के मेले ने इस बार जनोत्सव का रूप लिया, इसलिए कि जनता ने स्वतःप्रेरित इसमें भाग लिया। भीड़ ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में भी कम नहीं रहती। पर गौर करें, बाजार की चकाचैंध में ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में भीड़ होती नहीं, जुटाई जाती है। इसके विभिनन सत्रों में अधिकतर उच्च शिक्षण संस्थाओं, तकनीकी संस्थानों के विद्यार्थी और स्वयंसेवक यूनिफाॅर्म में दिखते हैं। बाकायदा इसके लिए शिक्षण संस्थान प्रमुखों को उन्हें भेजे जाने के लिए नूंत दी जाती है। इसके लिए पास बनाए जाते हैं। मेला बाजार आयोजक जानते है, उनका खरीदार बुद्धिजीवी साहित्यकार, पाठक नहीं होकर उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत यह नई पीढ़ी ही है! इसीलिए काॅरपोरेट कंपनियों के साथ ब्रिटिश एयरवेज, ब्रिटिश काउन्सिल प्रायोजक रूप में वहां प्रमुखता से नई पीढ़ी को आकर्षित करने में अपने स्टाॅल प्रमुखता से लगाते हैं। 
कला की जीवंत प्रस्तुतियां 
दरअसल ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ साहित्योत्सव नहीं अंग्रेजी में लिखी किताबों का एक तरह से हाट बाजार है। ग्लेमर की दुनिया से जोड़ अंग्रेजी पुस्तके किस तरह से बेची जा सकती है, यह इस आयोजन से सीखा जा सकता है। जयपुर अंग्रेजी दां शहर नहीं है, पर अग्रेजी पुस्तकों की बिक्री के बड़े बाजार की संभावना को देखते हुए ही इसे ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ के लिए शायद चुना गया है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में यह आयोजन होता है, स्वाभाविक ही है हिन्दी के सत्र नहीं होंगे तो हो-हुल्ला होगा। सो अंग्रेजी शीर्षक ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ में बेचारी हिन्दी के भी चंद सत्र रोज होते ही हैं। पर माहौल और शिरकत करने वाले लेखकों की बेचारगी हर कोई भांप सकता है। कहने को हिन्दी या राजस्थानी के सत्र होते हैं पर उनमें सकुचाए से बैठे लेखकों को देखकर यह भी लगता है, वे किसी पांच सितारा होटल संस्कृति के माहौल से ही गदगद हैं। गोया, वहां पहुंचना ही उनकी बड़ी उपलब्धि हो गई है इसलिए भाषा की उपलब्धि से उनका कहां कोई सरोकार हो सकता है। विदेशी भाषाओं के लेखक अपने देश की संस्कृति, अपने लेखन की विशेषताओं को इस ऐषिया के बड़े कहे जाने वाले आयोजन में रेखांकित करते हैं और इस सबके साथ ‘कहीं नहीं ठहरती भारतीय संस्कृति’ का अंदाजे बंया भी अपने अपने अंदाज से कर मीडिया में स्थान भी पाते ही हैं। इस लिहाज से आयोजन की सार्थकता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता!
अपनी कला संग कलाविद  राम जैसवाल 
इस समग्र परिप्रेक्ष्य में राजस्थान ललित कला अकादमी की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि बगैर किसी काॅरपोरेट सहयोग, इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के ‘कला मेला’ ने लोकप्रियता के भी नए मुकाम बनाए। कलाएं अतीत, वर्तमान और भविष्य की दृष्टि को पुनर्नवा करती है। और हां, देखने और सुनने का संस्कार भी कहीं ठीक से मिलता है तो वह कलाएं ही हैं। विष्णु दिग्म्बर पलुस्कर ने कभी कहा था, ‘हमें तानसेन नहीं कानसेन बनाने हैं।’ इसमें निहित भाव पर जाएंगे तो यह भी पाएंगे कि कलाओ और साहित्य के उत्सव, मेले भले कलाकार नही ंबनाएं परन्तु कला रसिक या पाठक यदि तैयार करती है तभी उनकी सार्थकता है। आप क्या कहेंगे!

Sunday, December 24, 2017

अर्थ-लय का गुंजन – ‘दीठ रै पार’

  

         दैनिक नवज्योति, रविवारीय में कविता संग्रह 'दीठ रै पार' पर सुप्रशिद्ध कवि, आलोचक डॉ. आईदान सिंह भाटी ने लिखा है।         उनके शब्द ओज से नहाते ही साहित्य को जिया है. आभार सहित उनके लिखे को यहाँ साझा कर रहा हूँ.

डॉ॰ राजेश कुमार व्यास आधुनिक राजस्थानी भाषा के  समर्थ और कला-पारखी कवि है, जिनकी कविताएँ अपनी अर्थवता और रूप-विधान के सौन्दर्य को प्रकट करती है | उनके इस कविता संग्रह  ‘दीठ रै पार’ में उनकी चार मनगतों के रूप सामने आते हैं जो, जूण जातरा, अंतस रो उजास, रंगोसुखन और सुर री देही के रूप में रचे गए हैं | वे शब्द-मितव्ययी कवि हैं और अपनी बात को ‘अर्थ की विरल छटाओं’ के रूप में अभिव्यक्ति देते हैं | उनके इससे पहले वाले कविता-संग्रह ‘कविता देवै दीठ’ में भी इसी तरह की अनुगूंजें थी |
  इस कविता-संग्रह  के ‘जूण जातरा’ खण्ड में वे अपनी मनगत के मौन को ‘भोर के उजास’ और उसके रंगों में नृत्य-रत शब्दों में देखते हैं, जहां मन भाषा के पार चला जाता है | उनकी कविता अदीठ-संगीत के चित्रों में बसती है, जहां बालू के टीले हैं, उस पर मंडराती तितलियाँ हैं, विरल रेगिस्तानी फूलों की छटाएँ हैं और विरल घन-घटाओं की बरसती बरसातें हैं |  प्रीत, पहचान के रास्ते तलाशती कविताओं में जीवन के संघर्षों और मातृभाषा-प्रेम की अनुगूंजें पाठक को मन और दृष्टि के पार ‘इतिहास की जेवड़ी’ तक ले जाती है, जहाँ मानवीय-चालाकियों के अंधकार के बीच प्रकाश की एक किरण कौंधती है | ये कविताएँ ‘दीठ रै पार’ छिपे हुए ‘साच’ को तलाशने का एक जतन है, राजस्थानी भाषा की ‘आफळ’ है –
दीठ रै पार / भींत्यां लुकोड़ै / साच नैं / जोवण री / आफळ है सबद |
रोज नीं आवै / पण / जद भी आवै / कुण? कद? कियां? जैड़ा
सवालां रा लावै पड़ूतर /सबद भांगै भींत / कूड़ नै पाधरो करता /
चलावै कवि-/ सबद-बाण /इणी ढाळै रचीजै / अबखै बगत कविता | (पेज-21)
कवि समय की अबोली-ध्वनियों को सुनने का आग्रह करते हुए, अकालों की विभीषिका और ओळूं की आत्मीयता के शब्द-बिम्ब उकेरता है –
अकाळ:एक 
आंख की कांकड़ है / रोही रो सूनपण / बंजड़ खेत देख / इणगी-उणगी /
मुंडो लुकांवतो फिरै / अड़वो | (पेज-27)
छिंया: दो (पापा री ओळूं)
घर है / भींत्यां है / इंट्यां सूं चिण्योड़ा / घणकरा आळा है / पण
मांय पसर् योड़ा / जाळा है | (पेज-31)
इस संग्रह के ‘अंतस रो उजास’ खण्ड में ‘झाझरको’, ‘सोन चिड़कली’, रूंख, नदी, नाव और सूरज के प्रतीकों से जीवन के रूप-बिम्ब रचता है, जिसमें पहचान की पगडंडिया गुम होती निशान-सीढ़ियों और इच्छाओं की रंगीनियों के बीच मुक्ति के मार्ग खोजती है | अंततः कवि अपना जीवन सार कहता है –
कला है --/  जीवन | / जीवतै मरणो स्थापत्य / मर’र  जीवणो शिल्प | /
अदीठ मांय भी / बचसी वै ही / जका रचसी | (पेज-44)
अरदास और महापरिनिर्वाण शीर्षक कविताएँ जीवनगत सौन्दर्य-दृष्टि, वैचारिता और आध्यात्मिक राहों की बारीकियों को बिम्बित करती है |
   रंगोसुखन और सुर री देही खण्ड की कविताएँ कवि के मन में बसे कला-चिंतक की सौन्दर्य-दृष्टि है, जो सूने मन्दिर, अनन्त आकाश, कैनवस, कांकड़, काळी कांठळ, बादल और चित्रकारों-संगीतकारों के माध्यम से अपनी अन्तस-दीठ का पसराव किया है |  रंगोंसुखन ( एस.एच. रज्जा रै चित्रां सूं अेकमेक हुवतै थकां) कविता में कवि रंगों और रेखाओं के बीच ‘धा-छंद’ की ध्वनियाँ सुनता है और एम्.बालमुरलीकृष्ण व किशोरी अमोणकर को सुनते हुए गहराती रात, तैरते बादल और बरसते उजास को देखता है | कलाओं के अंतर्संबंधो को रचती ये कविताएँ पाठक को शब्दों के पार ले जाती है और एक रूहानी आलोक रचती हैं |  किशोरी अमोणकर को सुनते हुए कविताओं वे चारों ओर उजास की सृष्टि देखते हैं, मन में मूसलाधार बरखा बरसती है, कानों में पवित्र प्रार्थनाएं गूंजने लगती हैं, गहराती रात देह के बिछोह की साख भरती है, स्वर अपनी सुधबुध भूल जाते हैं , इन्तजारती आँखें चलने लगती हैं आदि रूप-चित्रों और छवियों से पाठक को सम्मोहन के जाल में उलझा कर  रूहानी-जगत में ले जाते हैं |
    डॉ॰ राजेश कुमार व्यास का यह काव्य-जगत शब्द की लघिमा-शक्ति से बना है | वे शब्द-लाघव के कुशल कारीगर हैं | बिम्बों और प्रतीकों द्वारा अपनी बात कहने और रूपक रचने में उन्हें महारत हासिल है | कैनवस कविता में इस रूपक को देखें –
कैनवस है / बैंवती नदी / आभो जठै रचै
घाटी,डूंगर / अर जंगळ रो मून | (पेज-68)

 आधुनिक राजस्थानी कविता में डॉ॰ राजेश कुमार व्यास अपने  जीवनगत सौन्दर्य-बोध, चिन्तन-दृष्टि और शब्द की अर्थ-लय को अनुगुंजित करनेवाले विरल कवियों में से एक हैं | राजस्थानी के पश्चिमी भाषारूप की खूबसूरती उनकी कविताओं से रस बन कर टपकती है | उनकी कविताएँ रंगोसुखन और सुर के खूबसूरत झकोरे हैं |

Friday, November 3, 2017

लोक संस्कृति का उजास बिखेरती वह विरल गायिका


अल्लाह जिलाई बाई  का गाया ‘पधारो म्हारे देस...’ जितनी बार सुनेंगे, मन करेगा सुनें। सुनते ही  रहें। उनके गान में राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगती है। स्वरों में लोक का माधुर्य ऐसा, जिसे सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है।...
मधुर और श्रृंगारिक राग है मांड। आरोह-अवरोह में वक्र सम्पूर्ण राग। संगीत की विष्णु नारायण भातखंडे की परम्परा की मानें तो मांड राग बिलावल थाट में आता है परन्तु सुनते हैं तो मांड का लोक संगीत मिश्र राग में ध्वनित होता लगेगा। स्व. अल्लाह जिलाई बाई का ‘पधारो म्हारे देस...’ तो मांड का पर्याय ही हो गया है। उनके स्वर माधुर्य में जितनी बार सुनेंगे, मन करेगा सुनें। सुनते ही  रहें। 
अल्लाह जिलाई बाई ने वर्षों तक लोक संगीत की भारतीय पंरपरा को न केवल संजोकर रखा बल्कि राजस्थानी लोकसंगीत को भी एक नया आयाम दिया। उन्हें संगीत विरासत में मिला। पांच वर्ष की अल्पायु में ही अल्लाह जिलाई अपनी मां के साथ बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिहं के दरबार में गायन हेतु जाने लगी। जब उनकी मां दरबार में गाती तो वह खूब ध्यान से मां के गाए गीत सुनती। इन्हें फिर वह गुनगुनाती भी। ऐसे ही उनकी गुनगुनाहट को एक दिन उस्ताद हुसैन खां ने सुन लिया। फिर क्या था हुसैन साहब ने उन्हें अपनी षिष्या बना लिया। हुसैन खां से 8 वर्ष की उम्र से ही विधिवत संगीत की तालिम लेते अल्लाह जिलाई ने अल्प अवधि के दौरान ही गायन की बारीकियों को ग्रहण कर लिया। हुसैन साहब की जल्द ही मृत्यु हो गयी परन्तु उनसे जो अल्लाह जिलाई ने सीखा उसे ता उम्र अपने तई संजोकर रखा। संगीत तालीम के अंतर्गत बाद में बीकानेर राजघराने की ओर से राजघराने के प्रतिष्ठित गुणीजन खाना (संगीत तालीम का केंद्र) में उन्हें भर्ती करवा दिया गया। गुणीजन खाने के अंतर्गत बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज से अल्लाह जिलाई ने कत्थक की शिक्षा भी प्राप्त की। लच्छू महाराज, अमीर खां, शमशुद्दीन आदि का भी उन्हें इस दौरान निरंतर सानिध्य प्राप्त हुआ। हालांकि वे नृत्यांगना नहीं थी परंतु नृत्य उनसे कभी दूर भी नही रहा। जिस अंदाज से वह गाती उसमें आरोह-अवरोह का अंदाज वह शायद अपने भीतर की नृत्यांगना से लेती थी। यही कारण था कि उनकी खनकदार आवाज के साथ स्वतः ही ताल शुरू हो जाता था। 
ठुमरी दादरा, ख्याल तथा पारंपरिक राजस्थानी गायन में अल्लाह जिलाई बाई जैसे लोक का उजास रचती थी। शास्त्रीय आधार पर गांठ, चैताला, उडी, झूमरा आदि कठिन तालों में भी वह गाती तो जैसे स्वरो ंका आकाष बनता। राजस्थानी प्रेमाख्यान, महेन्द्र मूमल, रतन राणा सांवरिया की पाल, ढांेला मारू आदि माड गीतों में अल्लाह जिलाई बाई ने अपने सधे स्वर का जो जादू बिखेरा वह आज भी दिल में घर करता है। गायकी में फिरत ओर धुमावदार तानों भरी गूंजती खनकती आवाज की अल्लाह जिलाई बाई अद्भुत संगीत साधिका थी। 
राजस्थानी लोकसंगीत की विभिन्न परंपराओं को अपने कंठों में समेटे अल्लाह जिलाई बाई ने दादरा, ठूमरी, कजरी, व होली के गीतों को भी जैसे जिया। राग देस, सारंग, आाशा खमाज, जैजैवंती, सोरठ, झिंझोटी तथा अन्य विविध रागों को कुशलता से अपने सुरों में साधते उन्होंने जो भी गाया, उसे मन से जिया। ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारा देस..’, ‘बाई सा रा बीरा म्हाने पिहरिये ले चालो सा...’, आदि माड गीतों की उनकी खनकती आवाज आज भी फ़िजा में जैसे रस घोलती है।
अल्लाह जिलाई बाई ने न केवल राजस्थानी लोकसंगीत को ख्याति दिलाई बल्कि लोक गायन परंपरा को भी शास्त्रीय गायन की ही तरह उच्च स्थान दिलाया। वर्ष 1987 में लंदन में ‘वल्र्ड कोर्ट सिंगर कांफें्रस’ में भारत का प्रतिनिधित्व करते अल्लाह जिलाई बाई ने दुनिया भर के इकट्ठा हुए संगीतकारों में यह साबित किया कि राजस्थान का लोक संगीत मिट्टी की सौंधी महक लिए ऐसा है जिसे कभी बिसराया नहीं जा सकता। याद पड़ता है, लोकगीतों की माड गायन परंपरा के संबंध में अल्लाह जिलाई बाई से इस लेखक ने एक मुलाकात में पूछा था तो उन्होनें कहा था, ‘माड दूहों की ही अलंकृति है।’ 
अल्लाहजिलाई बाई ‘पधारो म्हारे देस...’गाती तो पावणों की मेजबानी की राजस्थानी संस्कृति के दृष्य चितराम भी अनायास आंखों के सामने घुमने लगते हैं। उनके गाए ‘सुपनो,’ ‘हेलो, ‘जल्ला’, ’ओळ्यू’, ‘कलाली’, ‘कुरंजा’ गीतों को सुनेंगे तो राजस्थान की संस्कृति के अनूठे चितराम, परम्पराएं भी आंखों के सामने जैसे तैरने लगेगी। उनके स्वरों में लोक का माधुर्य सुना ही नहीं जा सकता, सुनते हुए देखा भी जा सकता है। 
बीकानेर टाऊन हाल में अपने अंतिम कार्यक्रम में अल्लाह जिलाई बाई ने ‘केसरिया बालम’, ‘गोरबंध’, ‘मूमल’, तथा ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है’ जैसे गीत, गजल प्रस्तुत करते अपनी बेहतरीन गायकी का ढलती उम्र में भी अहसास दिलाया था। 90 वर्ष की आयु में 3 नवंबर 1992, अल्लाह जिलाई बाई ने हम सबसे सदा के लिए विदा ले ली परंतु ‘पधारो म्हारे देस...’ के उनके सुर क्या कभी हमसे जुदा होंगे...?
-'राष्ट्रीय सहारा', 3 नवम्बर 2017 

Sunday, October 29, 2017

अर्थ संभावनाओं का संस्थापन आकाश ‘पूर्णमिदम्’


विद्यासागर उपाध्याय : पूर्णमिदम 
हमारे यहां इन्स्टालेषन माने संस्थापन की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। दूर्गा, गणेष पूजा और फिर विसर्जन, जन्माष्टमी और तमाम हमारे ग्रामीण, आदिवासी परम्पराओं-संस्कारों का ताना-बाना संस्थापनों से भरा पड़ा है। पर इन्स्टाॅलेषन आर्ट में इधर देष में जो कुछ हो रहा है, उसमें विचार प्रायः गौण है। माने संस्थापन के अंतर्गत जो कुछ किया जा रहा है, उसमें चमत्कृत करने, अपने आपको स्थापित करने का आग्रह इस कदर रहता है कि कला का मूल कहीं नजर नहीं आता। इस दीठ से पिछले दिनों जयपुर के रवीन्द्र मंच की कलादीर्घाओं में भारतीय दर्षन और चिंतन से जुड़े स्वरांे में देषके प्रमुख पांच कलाकारों की संस्थापन प्रदर्षनी ‘पूर्णमिदम्’ ने जैसे जड़ता को तोड़ कला में विचार के भारतीय दर्षन से साक्षात् कराया है। 
इषावष्योपनिषद् का शांति मंत्र है, ‘पूर्णमिदम्’। कुम्हार मिटटी से घड़ा बनाता है परन्तु मिट्टी में घड़ा पहले से मौजूद होता है। सत्य यही है, हम सोचते है कि षिल्प के जरिए मिट्टी से कुछ निकाला जाता है परन्तु वह भी अंततः मिट्टी ही हो जाता है। यही पूर्णता है। पूर्ण से पूर्ण निकाल दे ंतब भी पूर्ण ही बचा रहेगा।  सृजन के बाद विसर्जन होगा तभी नया कुछ सृजित हो सकता है। भारतीय परम्परा में जीवन से जुड़े इसी दर्षन की गूंज है। यह महज संयोग ही नहीं है कि इस कला प्रदर्षनी में सभी कलाकारों ने जीवन से जुड़ी संवेदनाओं के भावों को अपने तई कला चिंतन में गहरे से जिया है। ‘पूर्णमिदम्’ में प्रदर्षित कलाकृतियों की एक बड़ी विषेषता दृष्य की अनंत संभावनाओं में अनुभवजन्यता की बढ़त का कला संस्कार भी है।
विनय शर्मा : अतीत का सौन्दर्यान्वेषण 
‘पूर्णमिदम्’ के संस्थापन अंतर्मन में बनने वाली छवियों, आभासी दुनिया और वास्तविकता के बीच संवेदनाअेां को चक्षु देते एक पूल की मानिंद हैं। मुझे लगता है, विचार और जो कुछ हो रहा है उस पर प्रतिक्रियाओं का गहन आत्मान्वेषण इन कलाकृतियो में है। विद्यासागर उपाध्याय का इनस्टाॅलेषन रंगो के उजास में पूर्णता के भारतीय दर्षन को गहरे से जैसे मौन में भी व्याख्यायित कर रहा था। रंग-रेखाओं के भांत-भांत के रूप उन्होंने माउंटबोर्ड पर संजोए।  सूक्ष्म कलाकृतियों का रंग-रूप कोलाज! एक साथ कलाकृतियों के मेल से प्रतीत होता है, एक-दूसरे के होने में ही सभी पूर्ण है परन्तु गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे, हरेक का अपना निज अस्तित्व है। 
विनय शर्मा ने अपने संस्थापन में परम्पराओं के आधुनिक बोध में तिरोहित होते जा रहे जीवन मूल्यों की जैसे बारीक पड़ताल की है। उनका संस्थापन ‘परम्पराओं का सौंदर्यान्वेषण’ समय संदर्भों में तकनीक के मेल से होने वाले बदलावों पर चिंतन का नया स्वर देता है। घरों में, व्यवसाय में कभी हिसाब-किताब के लिए बही लेखन का कार्य होता था। आलमारियांे में पुराने हिसाब-किताब के लेखे-जोखे से भरी बहियां भरी होती थी। कागज और कलम का पूजन होता था।  ‘लाभ-षुभ’ के साथ यह घर, व्यवसाय में यह सोच मौजूद थी कि लाभ हो परन्तु ऐसा जो शुभकारी हो। मंगलदायक हो। इसीलिए लक्ष्मीपूजन यानी धन की पूजा भर जीवन का ध्येय नहीं होता था बल्कि लक्ष्मी के साथ सरस्वती भी घरों में पूजी जाती थी। इसीलिए तो कलम, दवात के भी पूजन की परम्परा थी। पर समय बदला और बही, कलम और दवात तथा ‘लाभ-षुभ’ की सोच के बहाने परिवेषगत जो सौंदर्य था उसका स्थान एक अकेले कम्प्यूटर ने ले लिया। 
गौरीशंकर सोनी : रेखाओं की लय 
तकनीक ने बहुत कुछ आसान कर दिया परन्तु परम्परा के सौंदर्य को लील लिया। इन्हीं सबको प्रदर्षित करता विनय शर्मा का संस्थापन बहुत से स्तरों पर झकझोरता भी है तो परम्पराओं के हमारे सौंदर्यगत परिवेष की नई दीठ भी दे रहा था। विनय ने परिवेषत अतीत होती जा रही चीजों को अपने संस्थापन में नए संदर्भ दिए हैं।  उनके संस्थापन में अतीत स्मृति भर नहीं है बल्कि परम्पराओं का सौंदर्यान्वेषण है। 
गौरीषंकर सोनी का संस्थापन ‘लिनियर ट्रांसफोर्मेषन’ लोक में रची-बसी संवेदनाओं का अनूठा रेखीय आयाम है। आसमान में उड़ती पतंग के संग चलती चरखी की डोर बहुतेरी बार हवा के रूख के साथ भांत-भांत के मोड़ों में अनूठे रूप धारण करती है। अपनें संस्थापन में गौरीषंकर ने चरखी से निकलती डोर के अनंत आकाष में रेखीय आयामों में उभरते रूपाकारों का एक तरह से पुनराविष्कार किया है। गौरीषंकर रंग-रेखाओं में भावों का अनूठा संसार रचते रहे हैं। उनका यह संस्थापन भी रेखाओं की लय अवंेरता मूर्त-अमूर्त को आकाष देता है। दृष्य की  लूंठी सोच में भावों की विरल व्यंजना इस संस्थापन में है। 
मनीष शर्मा : धरोहर 
मनीष शर्मा ने शहरों के वास्तुषिल्प से जुड़े संदर्भों में धरोहरों के निरंतर उजड़ते जाने की व्यथा-कथा को अपने संस्थापन ‘म्यूजियम शाॅप’ में संजोया है। उनके संस्थापन के केन्द्र में हजार हवेलियों का शहर बीकानेर है। हवेलियों के षिल्प सौंदर्य और वास्तु षिल्प से जुड़े सौंदर्य संदर्भो का उनका संस्थापन कहन इसलिए भी लुभाता है कि वहां पर हवेलियों, घरों में छत बनाने के लिए प्रयुक्त ‘टोडी’ और षिकार कर जानवरों को अपने महलों में भुसा भरकर रखी प्रतिकृतियों को माध्यम बनाया है। इन प्रतिकृतियो में पारम्परिक भारतीय लघु चित्रषैलियों, बीकानेर की मथेरण और उस्ता कला का भी मोहक चित्रण मनीष के संस्थापन में अलग से ध्यान खंीच रहा था।
नीरजा पालशेट्टी : क्षणिक रूप से मूर्त 
नीरजा पालीसेट्टी की कलाकृति ‘क्षणिक रूप से मूर्त’ में कागज की ढ़ेर सारी कतरनें और उनसे बने स्तम्भ पर बहुत सारे रखे समाचार पत्र जैसे जीवन चक्र को ही व्यंजित कर रहे थे। यह भी कि कागज के कितने-कितने रूप हो सकते हैं। और यह भी कि विचार संप्रेषण के सषक्त माध्यम के रूप में यह कागज ही है जो अपने यथार्थ में होने और न होने के मध्य भी जीवन से जुड़ी संवेदना को जैसे परिभाषित करता है। जन्म का अंत हो सकता है परन्तु जीवन का नहीं। कागज के जरिए इसी दार्षनिक चिंतन को अपने संस्थापन में नीरजा ने प्रदर्षित किया है। कागज का मूर्त रूप भी यहां है तो अमूर्त भी। सामग्री परिवर्तन की प्रक्रिया के साथ यहां समय की भी सुमधुर व्यंजना है। कागज के कितने-कितने रूपों के बहाने नीरजा का यह संस्थापन वैचारिक उन्मेष लिए देखने वालों के भीतर गहरे से रचता-बसता है।
बहरहाल, विद्यासागर उपाध्याय, विनय शर्मा, गौरीषंकर सोनी, मनीष शर्मा और निधि की कलाकृतियांे से साक्षात् होते यह अहसास भी निंरतर होता है कि वहां आधुनिकता का बोध है, संप्रेषण के लिए तकनीक है परन्तु कलाकारों ने सृजन को माध्यमों के प्रदर्षन की वस्तु मात्र नहीं देखते उनमें संवेदनाओं के जरिए सौंदर्य और अर्थ की अनंत संभावनाओं की तलाष की है।

Monday, October 9, 2017

रम्य रूप

''...दूर जहां तक नजर जाए पानी ही पानी। आसमानी की परछाई ओढ़े नीला पानी।...प्रकृति ने जैसे धरती को उपहार दिया है।...दो बेहद मोहक हरियाली से आच्छादित पहाड़ियां और बीच में बहता नीर। घाट पर जहां बैठा हूं, वहां नाव बंधी है और प्रस्तर खंड को तराश सिरजा धवल हाथी जैसे दूर तक फैले जल को निहार रहा है। सूंड उठाए। यह पहाड़ियों के मध्य बिखरे जल का रम्य रूप है। प्रस्तर निर्मित घाट...एशिया  का मानव निर्मित सबसे बड़ा जलाशय  है यह। पर गौर करता हूं, समुद्र सरीखा है यहां का दृष्य। हवा में बनती पानी की शांत लहरें....दूर तक जाती हुई और फिर से आती हुई।..'' 

"....घर लौटता सूर्य जैसे इन सब पर अपनी किरणों से जादू जगा रहा है। दूर तक पसरा जल...टापू और नीड़ पर लौटते पक्षियों के समूह को देख अनुभूत होता है किसी ओर लोक में हूं। 

सफेद संगमरमर पत्थरों से निर्मित घाटों पर अब सूर्यास्त से अंधेरा पसरने लगा है।...पर यह क्या! चन्द्रमा की धवल चांदनी में जयसमंद का सौन्दर्य और भी जैसे बढने लगा है। चांद की चांदनी में दूध से नहाए हाथी जैसे झील की ओर मुख करते हुए भी मुझसे कुछ और देर वहीं रूकने का आग्रह कर रहे हैं। मैं उनकी बात मान वहीं घाट पर बनी सीढ़ियों पर बैठ जाता हूं। विशाल प्रस्तर खंड को सामने रख सिरजे शिल्पटषिल्प सौन्दर्य पर पड़ती धवल चांदनी और दूर तक फैला झील का नीर। खंड-खंड अखंड! सौन्दर्य की जैसे रूप वृष्टि। ठंडी हवाओं के झोंके मन को विभोर कर रहे हैं। पता ही नहीं चलता, कितने घंटे ऐसे ही वहां बैठे गुजर जाते हैं। 

वन विभाग के विश्रामगृह का चैकीदार मुझे ढूंढते झील के घाट पर आ मुझे झिंझोड़ते हुए कहता है, ‘साब खाना नहीं खाना है?’ मैं कलाई में बंधी घड़ी पर नजर डालता हूं...अरे! रात्रि के 9 बज गए हैं।...उठकर विश्राम गृह की ओर लौट पड़ता हूं।... जयसमंद से विदा लेता हूं, यह कहते हुए-कल सूर्योदय पर फिर आऊंगा इन घाटों पर।"...

-'जनसत्ता', 9 अक्टूबर, 2017 'दुनिया मेरे आगे'

Friday, October 6, 2017

संस्कृति से अपनापा कराती केलीग्राफी कलाकृतियां

कैलीग्राफी यानी अक्षरांकन की दृष्यात्मक दीठ। आमतौर पर यही माना जाता है कि कैलीग्राफी के अंतर्गत अक्षरों को ही उकेरा जाता है परन्तु कलाकृतियों के सृजन का आधार भी यह है। यह सही है, मूलतः कैलीग्राफी में सुंदर अक्षरों को ही उकेरा जाता है परन्तु इससे महत्ती कलाकृतियों भी इधर सृजित हो रही है। 
संकतो का अर्थपूर्ण, सुव्यवस्थित आकार ही तो है कैलीग्राफी।...और यह जब है तो स्वाभाविक ही है कि इसके जरिए अर्थगर्भित कलाकृतियां भी आरंभ से ही सृृजित की जाती रही है।
अर्थ के आग्रह से मुक्त ऐसी ही कलाकृतियां के लिए कोरिया में बाकायदा प्रतिवर्ष आर्ट बिनाले भी होता है। पिछले दो दषको ंसे कोरिया में ‘द वर्ल्ड कैलीग्राफी बिनाले’ का आयोजन हो रहा है। इस बार यह बिनाले 21 अक्टूबर से 19 नवम्बर के दौरान होगा। यह महत्वपूर्ण है कि इस बिनाले में इस बार राजस्थान मूल के सुप्रसिद्ध कलाकार विनय शर्मा की कैलीग्राफी कलाकृतियां भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। 
विनय शर्मा अपनी कलाकृतियों में अतीत का एक तरह से पुनराविष्कार करते हैं। पुरानी बहियां, ताड़पत्र, जन्मपत्रियां और तमाम जो हमारी संस्कृति सं संबद्ध पुराना रहा है, उसे वह अपनी कलाकृतियो ंमें बड़े जतन से सहेजते हैं। इधर उन्होंने कैलीग्राफी कलाकृतियों का भी जो संसार रचा है, उसमें अतीत से अपनापा कराते भारतीय षोडस संस्कारों  के साथ ही संस्कृति से जुड़े बारीक तत्वों को अंवेरा है। प्राचीन अभिलेखों, सुसज्जति पांडुलिपियों, संग्रहालय में संग्रहित पुरावस्तुओं के साथ ही उन्होंने जीवन से जुड़े सांस्कृतिक सरोकारों को अपनी कैलीग्राफी कलाकृतियों में एक तरह से जिया है। उनकी ऐसी कलाकृतियां में भारतीय नृत्य, संगीत, नाट्य और वास्तुकला से संबद्ध संकेताक्षरों में कलाओं के ंअंतःसंबंधों को भी गहरे से जिया गया है।
विनय ने प्राचीन लिपियों की अपनी कैलिग्राफी कलाकृतियों में अतीत का आधुनिकता में एक तरह से पुनराविष्कार किया हैं। उनकी कलाकृतियों में अक्षरांकन के अनूठे दृष्यालेख उभरते हैं। उन्होंने प्रकृति और जीवन से जुड़ी कैलिग्राफी पेंटिंग श्रृंखला बनाई है। इसमें पेड़-पौधों और जीवन से जुड़े सरोकारों की मनोरम व्यंजना हुई है। इसी प्रकार उन्होंने लघु कैनवस पर कुछ समय पहले  कैलिग्राफी पेंटिंग में ही गणेष के बहुविध रूपों को भी प्रदर्षित किया था। षिव के आदि, अनादि स्वरूप, भगवान श्री कृष्ण के पौराणिक आख्यानों को भी उन्होंने कैलीग्राफी की अपनी कला में गहरे से जिया है। 
कोरिया में आयोजित होने जा रहे ‘द वर्ल्ड कैलिग्राफी बिनाले’ में विनय शर्मा भारतीय संस्कृति से जुड़े इसी तरह के आख्यानों आधारित अपनी कैलिग्राफी पेंटिंग का प्रदर्षन करेंगे। विनय शर्मा बताते हैं, ‘कैलीग्राफी अथवा अक्षरांकन  की ही नहीं कलाकृतियों रचने की भी दृश्यात्मक शैली है। प्राचीन काल में कैलीग्राफी के जरिए ही इतिहास का चित्रात्मक प्रदर्षन किया जाता था। अतीत से जुड़े संदर्भों की कैलिग्राफी दृष्य कहन है। ‘द वर्ल्ड कैलिग्राफी बिनाले’ विष्वभर के कैलिग्राफी कलाकारों का साझा मंच है।’
कतर में दोहा एशियाई खेलों के दौरान आयोजित एशियन आर्ट प्रदर्शनी में भी विनय ने इससे पहले भारतीय कला का प्रतिनिधित्व किया था। इंग्लेण्ड, पोलेण्ड, साउथवेल्स सहित देश विदेश में उनकी अनेकों एकल चित्र प्रदर्शिनियां आयोजित होती रही है। यह महत्वूर्ण है कि कोरिया में आयोजित होने जा रहे वर्ल्ड कैलीग्राफी बिनाले में भारतीय संस्कृति से जुड़ी कला विनय के जरिए विष्वभर में पहुंचेंगी।

Wednesday, September 27, 2017

संस्कृति से जुड़े सरोकारों की दृष्टि से हो पर्यटन का प्रभावी विपणन

आज विश्व पर्यटन दिवस है। संयुक्त राष्ट्रमहासभा ने वर्ष 2017 के लिए पर्यटन को विकास एक उपकरण का अन्र्तराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। माने पर्यटन को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विकास आदि का प्रमुख आधार मानते हुए कार्य करने पर विष्वभर एक साथ काम करे। ऐसा हुआ भी है और बहुत से देषों की अर्थव्यवस्था आज पूरी तरह से पर्यटन पर ही केन्द्रित है परन्तु मुझे लगता है, जरूरत इस बात की भी है कि पर्यटन आर्थिग गतिविधि बनने के साथ सांस्कृतिक रूप में भी राष्ट्रों के विकास का प्रमख्ुा आधार बने।
किसी स्थान पर पर्यटकों के आगमन का ग्राफ इस बात पर निर्भर करता है कि वहां का वातावरण और सांस्कृतिक परिवेष कैसा है। इस दृष्टि से पर्यटकों के लिए सभी स्तरों पर अनुकूलता है अथवा नहीं। पर वैष्वीकरण के इस दौर में जब इन्टरनेट टूरनेट बन रहा है तो संस्कृतियों की वैविध्यता का बहुत से स्तरों पर ह्ास भी हो रहा है। स्वाभाविक ही है कि इस ओर आज सर्वाधिक ध्यान देने की आज जरूरत है। राजस्थान की ही बात करें, जो कुछ पर्यटन नक्षे पर मौजूद है वह यहां उपलब्ध पर्यटन संभावनाओं का दस प्रतिषत भी नहीं है। इतने विविधतापूर्ण ऐतिहासिक, पुरातात्विक, वास्तुसंपन्न और सांस्कृतिक दृष्टि से भरे-पूरे स्थान यहा ंमौजूद है कि उनमें सनातन भारत की खोज की जा सकती है। मेरे एक मित्र हैं, राजस्थान प्रषासनिक सेवा के अधिकारी अजयसिंह राठौड़। संवेदनषील छायाकार और घुम्मकड़। देषाटन का कोई अवसर नहीं चूकते। उनके पास अपने कैमरे से लिए राजस्थान के अनछूए स्थलों के छायाचित्रों और उनके साथ के अनुभवों का नायाब खजाना है। पर्यटन विकास की बड़ी जरूरत आज यही है कि अनछूए स्थलों के साथ ही संस्कृति से जुड़े सरोकारों की दीठ से उनका विपणन किया जाए।
अभी कुछ समय पहले ही ग्वालियर स्थित भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान में आयोजित पर्यटन लेखन की एक कार्यषाला में बोलने के लिए जाना हुआ। वहां के निदेषक मित्र संदीप कुलश्रेष्ठ ने तभी ग्वालियर से कोई 40-50 किलोमीटर दूर मितावली, गढ़ी पढ़ावली और बटेष्वर मंदिर समूह के बारे में बताया। वहां गया तो पता चला हम जिसे भारतीय संसद को वास्तुकार लुटियन्स की रचना मान रहे हैं मूलतः वह मितालवी के चैंसठ योगिनी षिव मंदिर का हूबहू प्रतिरूप है जबकि इसे पुर्तगाली वास्तु से जोड़ा जा रहा है। विडम्बना यह भी है कि मितालवी आम पर्यटको ंकी पहुंच से अभी भी बहुत दूर है। राजस्थान में कांकवाड़ी दुर्ग, सिंहगढ़, मांडलगढ़, सिवाना, बयाना के किलों, झालावाड़ की बौद्ध गुफाएं, खजुराहो की मानिंद बने नीलकंठ मंदिर और वहां की पुरासंपदा, जालौर की परमारकालीन वास्तु समृद्ध संस्कृत पाठषाला, धौलपुर, बांसवाड़ा के मंदिर षिल्प और प्राकृतिक परिवेष आदि पर भी आम पर्यटक कहां पहुंच पाता है! पर्यटकीय दीठ से ऐसे और भी बहुत से अनएक्सप्लोर स्थलों पर विचारा जाए तो बहुत कुछ पर्यटन का नया राजस्थान उभरकर सामने आएगा। पर इसके लिए सांस्कृतिक सोच से कार्य करने की भी जरूरत है। मेरी चिंता यह भी है कि हम पर्यटन विकास का नारा तो देते हैं परन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से पर्यटन को संपन्न करने का काम नही ंके बराबर कर रहे हैं। इसीलिए बहुत से अल्पज्ञात स्थानों के इतिहास, वहां की संस्कृति से हम निरंतर महरूम भी हो रहे हैं।
राजस्थान में जल स्वावलम्बन अभियान को इस दृष्टि से मैं महत्वपूर्ण मानता हूं। इस अभियान के तहत पुरानी बावड़ियों, तालाबों के जिर्णोद्धार का काम बहुत से स्तरों पर हो रहा है। इस अभियान से पुराने जलस्त्रोतों को नयापन मिला है। प्राचीन बावड़ियों के भी दिन फिरे हैं परन्तु उनके पुनर्निर्माण या फिर जिर्णोद्धार में भी हमारी संस्कृति से जुड़े वास्तु पर ध्यान देना जरूरी है। वास्तुकार मित्र संजीवसिंह ने कुछ दिनों पहले नागौर स्थित बावड़ियों पर इस दृष्टि से कार्य किया है। वह कहते हैं, मरम्मत या जिर्णोद्धार भर ही ध्येय नहीं हो जरूरी यह भी है कि स्थान विषेष की संस्कृति और वास्तुकला का इससे कहीं हनन नहीं हो। यह सच है, वास्तु से ही तो किसी स्थान के मूल सौंदर्य का भान होता है।
बहरहाल, राजस्थान में पर्यटन आकर्षण में विविधता सबसे बड़ी विषेषता है। पर ‘पधारो म्हारे देष...’ की संस्कृति और पर्यटन समृद्धता के अनछूए पहलुओं के विपणन का यहां अभी भी अभाव है। मुझे लगता है, प्रदेष में पर्यटन उद्योग के विकास की ऐसी नीति पर विचार किया जाना जरूरी है जिससे देष मे नहीं बल्कि विेदषों में भी यहां के पर्यटन आकर्षण और संस्कृति का समुचित प्रचार-प्रसार हो। यह सही है, स्वतंत्रता से कुछ समय पहले ही यहां के राजाओं ने पर्यटन को एक आर्थिक साधन के रूप में अपनाते हुए अपने किले महलों के द्वार विदेषी पर्यटकों के लिए खोलने प्रारंभ कर दिए थे। पर आजादी के बाद किले-महलों की सार संभाल के भी टोटे हो गए। यह तो भला हो तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत का जिन्होंने हैरिटेज होटल का विचार दिया। इसी से किले महलों की धरोहर बच पाई और पर्यटन संस्कृति से इसका फिर से जुड़ाव हुआ। पर इस समय जो सबसे बड़ी जरूरत है वह यह है कि हमारी समृद्ध कलाओं, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि के साथ ही ऐसे स्थल जो अभी पर्यटन मानचित्र पर अनदेखी के कारण नहीं आए हैं, उनके जरिए विकास के एक उपकरण के रूप में पर्यटन को अपनाया जाए।
यह गौर करने की बात है कि पर्यटन विपणन की कारगर रणनीति किसी प्रदेष ने अपनाई है तो वह केरल है। विष्व पर्यटन मानचित्र पर तेजी से उभरे केरल का पर्यटन उद्योग न केवल वहां की अर्थव्यवस्था का मूलाधार बन चुका है बल्कि वहां यह सर्वाधिक रोजगार प्रदान करने वाले उद्योग के रूप में भी उभर कर सामने आया है। पर विचारें, क्या है ऐसा केरल मे जो राजस्थान में नहीं है? समुद्र और बर्फ के अलावा सब-कुछ तो है यहां। तो फिर क्यों नहीं राजस्थान भी विष्व पर्यटन मानचित्र पर केरल की तरह उभरे। केरल-हरियाला स्वर्ग के नारे के साथ ही केरल पर्यटन विभाग ने अपनी वेबसाईट के जर्मनी व फ्रेंच संस्करण जारी कर विदेषी सैलानियों की आवष्यकता की पूर्ति की है। खाड़ी देषों में तो केरल के मानसून व वहां के आर्युवेद का इस कदर प्रचार किया गया कि वहां के अधिकांष पर्यटकों के लिए अब केरल ही सर्वाधिक पसंदीदा पर्यटन स्थल बन गया है। 
राजस्थान में भी पर्यटन विपणन के प्रयास हो रहे हैं परन्तु उन प्रयासों का दायरा केरल की तरह आक्रामक नहीं रहा है। सोचें, यह वह प्रदेष है जिसके बारे में कर्नल टाॅड ने कभी कहा था-‘राजस्थान की तुलना में युनान के ऐपो का सौन्दर्य भी हल्का हो जाता है।‘ इस परिप्रेक्ष्य में राज्य की समृद्ध पर्यटन विरासत के अनछूए पहलुओं और वैविध्यता का प्रभावी प्रसार किए जाने की जरूरत है।  प्रदेष मे पर्यटन व होटल उद्योग के प्रोत्साहन के लिए जो कदम उठाए जाते हैं, उनका भी कमजोर पहलू यह है कि उनके बारे में जानकारी जरूरतमंद उद्यमियों व निजी क्षेत्र के संस्थानों तक पहुंचती ही नहीं है। इस समग्र परिपे्रक्ष्य में जरूरी यह है कि सैद्धान्तिक रूप में ही नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप में पर्यटन की योजनाओं व नीतियाॅं का व्यापक स्तर पर क्रियान्वयन किया जाए। इसी से राजस्थान आने वाले वर्षों में पर्यटन समृद्ध राज्य होगा। निष्चित ही तब पर्यटन से यहां होने वाली आय और रोजगार अवसर भी बढ़ेंगे, जिनकी कि आज सर्वाधिक आवष्यकता है।

Sunday, September 24, 2017

'दीठ रै पार' (दृष्टि से भी आगे)




कविताएं अंतस का आलाप है। बहुतेरी बार शब्द के भीतर बसे शब्द के पास भी वे ले जाती हैं। राजस्थानी मेरी मायड़ भाषा है। हाल ही में 'बोधि प्रकाशन' से राजस्थानी का नया कविता संग्रह 'दीठ रै पार' (दृष्टि से भी आगे) प्रकाशित हुआ है। 

इसमें पिछले एक दशक में लिखी कविताएं संग्रहित है। इससे पहले वर्ष 1994 में 'जी रैयो मिनख'  (जी रहा है मनुष्य)  और वर्ष 2012 में 'कविता देवै दीठ' (कविता दृष्टि देती है)  प्रकाशित हुए हैं।  

'दीठ रै पार' संग्रह का आवरण ख्यात कलाकार विनय शर्मा ने तैयार किया है। इस संग्रह की दो कविताएं—
मून
आतम है
मून।
मनगत
दीठ।
कदास
थूं-
बसतो रूं-रूं
मारग
पूग जावती आंख।



अंवेरी नीं छांट

आभो जोवै
बैंवती नदी
गड्डा कैवै
पाणी री कहाणी
रूंख झाड़ै पान
मगसो हुयोड़ो हरो खोलै
मांयरा पोत-
बिरखा हुई
पण
अंवेरी नीं ही छांट।

Sunday, July 16, 2017

श्रावणे पूजयेत शिवम्


चैत्र प्रतिपदा से प्रारंभ नव वर्ष का पांचवा महिना है श्रावण। पावस ऋतु! ऋग्वेद का एक श्लोक है, जिसमें आया है, ‘...वाचंपर्जन्यानिन्वितांप्रमण्डूकाअवादिषु।।’ माने वर्ष पर्यन्त जो जीव मौन व्रत धारण किए होते हैं, इस ऋतु में बोलना प्रारंभ कर देते हैं। ...तो कहें, मौन व्रत के बाद जीवों के नाद से साक्षात् का माह है श्रावण। जो नास्तिक हैं उनके मन में भी यह श्रावण आस्था का वास कराता है। भगवान शिव का प्रिय जो है यह मास! ...श्रावण से बहुत सारी कथाएं जुड़ी हैं। कहते हैं, महादेव को यह इसलिए अत्यधिक प्रिय है कि देवी सती ने दक्ष के यज्ञ में जब योग शक्ति से शरीर त्यागा तो उससे पहले हर जन्म में षिव को ही पाने का प्रण किया था। दूसरे जन्म में वह हिमाचल की पुत्री रूप में जन्मी। युवावस्था में हिमाचल-मैना की बेटी पार्वती ने इसी श्रावण माह में निराहार रहते कठोर तप किया। षिव प्रसन्न हुए और उनसे विवाह किया। बस तभी से यह समय षिव को सदा के लिए प्रिय हो गया। दूसरी कथा षिव के विष पान से जुड़ी है। कहते हैं इसी माह में समुद्र मंथन हुआ। मंथन से 14 प्रकार के तत्व निकले। बाकी सभी तत्व तो देवताओं और राक्षसों ने ग्रहण कर लिए पर हलाहल विष का पान कौन करे? सृष्टि की रक्षा के लिए षिव सारा विष पी गए। उन्होंने इसे कंठ में धारण किया। जहर के संताप से बचाने उन्हें गंगा जल अर्पित किया गया। बस तभी से श्रावण में षिव के विषेष जलाभिषेक की परम्परा भी जुड़ गई। षिव का जलाभिषेक करने के लिए हरिद्वार, काषी और भी कहां से कहां से गंगाजल लिए कांवर यात्रा करते हैं लोगा। कहते हैं कभी कांधे पर कांवर लिए भगवान श्री राम ने भी सुल्तानगंज से जल  लिया और देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया।
वैदिक परम्परा में उद्घोष भी है, ‘श्रावणे पूजयेत शिवम् ’। त्रिगुण स्वामी हैं षिव। सत, रज और तम गुण भाव को जो प्राप्त करता है, वही है त्रिगुणातीत। जन्म-मरण से अपने भक्तों को मुक्त ही तो करते हैं षिव। इसीलिए श्रावण में षिव पूजन का अर्थ है, मन को साधना। यह मन ही मोक्ष और बंधन का सबसे बड़ा कारक है। कहते हैं, साधना की सबसे बड़ी बाधा चन्द्रमा है। इसी से चित्त अस्थिर रहता है। पर षिव ने अपने मस्तक पर चन्द्रमा को धारण किया हुआ है। सो जो षिव का पूजन करे, उसकी साधना पूर्ण हो जाए। जिसने षिव को साध लिया, समझिए मन को भी उसी ने साधा है। 
श्रावण मंे ही मरकंडू ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ने लम्बी आयु पाने के लिए घोर तप किया। काल के काल महाकाल प्रसन्न हुए और मार्कण्डेय ने मृत्यु को पराजित किया। श्रवण में कथा यह भी आती है कि श्रावण में षिव पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए और वहां उनका स्वागत जलाभिषेक से हुआ। इसलिए श्रावण में षिव के जलाभिषेक का खास महत्व है। बिल्वाष्टकम में षिव पर चढ़ाए जाने वाले बेल पत्रों का रोचक वर्णन है। तीन पत्तियां एक साथ जुड़ी होती है माने षिव के तीन रूपों का ही उनमें वास है-सृजन, पालन और संहार। तीन गुणों की भी यह द्योतक है-सत, रज और तम। तीन ध्वनियों अ,उ,म् से उत्पन्न एक नाद ऊॅं की भी यह द्योतक है और त्रिपुरारी षिव भी तो त्रिनेत्र वाले त्रिषुल धारी हैं। स्वयं वेद स्वरूप हैं षिव। इसीलिए तो कहा गया है, ‘वेदः षिवः, षिवः वेदः’ माने वेद ही षिव है और षिव ही वेद है। 
भगवान षिव के बारे में जब भी विचारता हूं, मन त्वरित उनकी अर्चना को ही उद्यत हो उठता है। ऐसे ही हैं भोले भंडारी। याद है, स्वामी श्री रामसुखदासजी षिव के भस्मलेपन पर बड़ी रोचक कथा सुनाया करते थे। कहते, एक बार षिव कहीं जा रहे थे। देखा कुछ लोग एक शव को ‘राम नाम सत है’ का नाद करते हुए श्मषान ले जा रहे थे। षिव को लगा, अरे वाह! इस शव में राम का वास है। भोले भंडारी शवयात्रा के साथ हो लिए। श्मषान पहुंचे तो देखा, लोगों ने शव दाह किया। कुछ समय वहां रूके और फिर सब अपने-अपने घर चल दिए। षिव वहीं रूक गए। पूरी तरह से जब मुर्दा जल गया तो षिव ने सोचा, इसमें ही राम बसे हुए हैं सो उन्होंने जले हुए शव की भस्म का लेपन कर लिया। बस तभी से षिव भस्म रमाने वाले हो गए। पंचाक्षर स्त्रोत है, ‘नागेन्द्रहराय त्रिलोचनाय, मस्मांगरागाय महेष्वराय।’
आईए, षिव के प्रिय मास श्रावण में हम भी षिव की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न करें। जल्द प्रसन्न होने वाले देवों के देव हैं महादेव। आषुतोष। काल के भी काल-महाकाल। निपट भोले-भोलेनाथ। रुद्रह्योपनिषद् में षिव के बारे में कहा गया है कि सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित है और सभी देवता रुद्र की आत्मा है। इसीलिए कहा गया है, ‘रुतम्-दुःखम्,द्रावयति-नाषयतीतिरुद्रः।’ यानी भगवान षिव सभी दुखों को नष्ट कर देते हैं। श्रावण में षिव की अर्चना करेंगे तो धरित्रि पर भी सभी दुःखों का शमन होगा। आईए हम षिव के बहाने अपने आपको साधें। चित्त की अस्थिरता को साधने का ही तो पावन पर्व है श्रावण मास।

Sunday, June 25, 2017

जिसका मन रंगरेज

कलाओं में अव्वल तो हिन्दी में अच्छी पुस्तके है ही बहुत कम, और जो है उनमें अधिकतर सैद्धान्तिक और अकादमिक घेरे में आबद्ध ऐसी है जिन्हे पढते मन रंजित नही होता। या कहे उन्हें पढ़कर कलाओं से किसी प्रकार का हेत पैदा नही होता। इस दृष्टि से कलाकार और कला समीक्षक देव प्रकाष चैधरी की सद्य प्रकाषित पुस्तक ‘जिसका मन रंगरेज‘ लीक से हटकर कही जा सकती है। सुप्रसिद्ध कलाकार अपर्णा कौर की कला पर केन्द्रित यह ऐसी पुस्तक है जिसमें शब्दों के सांगीतिक भावों का सुमधुर केनवास रचा गया है। पुस्तक में ठोड़-ठोड़ देव प्रकाष के शब्दों की मोहक काव्य व्यंजना में मन रंगो के आलोक से नहाता है तो रेखाओं की लय में आबद्ध होते कलाओं  के सर्वांग से साक्षात भी होता है। अपर्णा कोर के रंगरेज मन की थाह लेते जरा उनके शब्द देखें, ‘‘गुरूनानक के हाथ/ रंगो की एक दोपहर में/खोलते है संसार के द्वार। यही नही वह अपर्णा कोर के बहाने रंगो की प्रार्थना का अमूर्तन भी हममें बसाते है तो झूठ के अंधेरे और सच की धूप के साथ अपनी परछाई और दूसरे की छाया के मध्य कलाओं के लिए बनी जगह की भी अनायास पाठक को तलाष करवा देते है।
‘जिसका मन रंगरेज‘ की बडी विषेषता यह भी है कि इसमें शब्दांडम्बर नही है। थोडे़ शब्द परन्तु अर्धसघनता। वह भी ऐसी कि पुस्तक पढने के बाद  भी कलाकार की कला से जुडी संवेदना को पाठक निरंतर अनुभूत करता रहता है। एक और बडी खासियत इस पुस्तक की यह भी है कि इसमें कविता और चित्रकला का सांगोपांग सहकार है। जरा इन पंक्तियों को देखे, ‘रंगों का पडा़ेस/रिष्तों की महक/गमले की गुलदाउदी में/उतर आया है आसमान।’ 
बहरहाल, पुस्तक अपर्णा कोर की कला यात्रा की बहुत सी अनछूई बाते भी पाठकों से साझा करती है। मसलन बचपन से ही अमृता शेरगिल अर्पणा की पसंदीदा कलाकार रही हैं और महज 9 साल की उम्र में उन्होंने अमृता शेरगिल की पेंटिंग बनाई। यह भी है कि वह जिंदगी को प्रकृति की सबसे खूबसूरत कविता मानती है और अरावली के पहाड़ उन्हे भाते है। और यह भी कि 2010 में जब काॅमनवेल्थ खेल आयोजन हुआ तो अपर्णा ने खेलगांव में सिरीफोर्ट आॅडिटोरियम के आस-पास सड़कों के किनारे दषकों से खडे पेडो की गिनती करती थी और उन्हे परवाह इस बात की थी कि उन पेडो की हरियाली से दिल्ली सदा के लिए महरूम हो जायेगी। उन पर रहने वाले पक्षियों के घोसलें उजड़ जाएंगे। इसके लिए बाकायदा उन्होंने आंदोलन किया। सोनी-महिवाल की प्रेम कहानी से अपार प्यार, कागज की कष्ती बनाने से लेकर केनवास पर आकारों की प्राण प्रतिष्ठा, स्कल्पचर, इंस्टालेषन आदि के अंतर्गत अपर्णा कोर के कला सरोकारों की रोचक दास्तां को पुस्तक में देव प्रकाष ने बखूबी संजोया है।
देव प्रकाष ने पुस्तक में अपर्णा की कलाकृतियों और उनके निहितार्थ को भी गहरे से छूआ है। वह लिखते है, ‘इनके (अर्पणा कौर की कलाकृतियों में) रंगो में कोई घमासान मचा हुआ नही दिखता। कही रंगो का स्पर्ष बहुत हल्का है, मानों रंग किसी सिद्ध आवाज की तरह लगभग गायब हो रहे है।’ वह अपर्णा की कलाकृति ‘ट्रि आॅफ डिजायर’ के बहाने प्रकृति से उनके जुडाव और रंग-रेखाओं को बरतने की मौलिक दीठ भी देते है। स्वयं अपर्णा के शब्दों में, ‘पेंटिंग का मतलब सिर्फ केनवास पर पेंट लगाना भर नही है। यह जीवन का पूरा दर्षनषास्त्र है।’ और इस दर्षनषास्त्र के पन्ने ही देवप्रकाष चैधरी ने ‘जिसका मन रंगरेज’ में अपर्णा से किए एक साक्षात्कार में खुलवाए है। इन खुले पन्नों में वृन्दावन में रहने वाली विधवाओं के जीवन पर बनाई ‘विंडोज‘ श्रंखला की दास्तां है, कबीर श्रंखला और स्ट्रीट आर्ट यानी दीवारों पर किए रिलीफ वर्क के उनके कार्य के साथ ही बहुतेरी दूसरी बातों के साथ उनकी कला में प्रतीकात्मक रूप में आई कैंची से जुडा आख्यान भी पाठक को पृथक से आंदोलित करता है।
अपर्णा की बहुत सारी कलाकृतियों से अलंकृत ‘जिसका मन रंगरेज‘ ऐसी कला पुस्तक है जो कलाकार के बहाने हमे कलाओं की सूक्ष्म सूझ से सम्पन्न करती है। काले, लाल, पीले, हरे और नीले रंगो की प्रार्थना सरीखे शब्दों में इस पुस्तक में रेखाओं का उजास ध्वनित होता है। कहें, पुस्तक पढ़कर मन कलाओं का रसिक ही नही बनता बल्कि रंग-रेखाओं को सुनने-देखने के लिए संस्कारित भी होता है। देवप्रकाष चैधरी के ही पुस्तक में बरते शब्दों में कहूं तो हिंदी में कला पुस्तकों की एकरसता को जीते पाठकों के मध्य ‘मेरा मन रंगरेज’ से ‘...औचक चुप्पी का दरवाजा टूटा है।’   
-दैनिक नवज्योति, रविवारीय परिशिष्ट 25 जून, 2017 

Thursday, May 18, 2017

सुन्दर समाज की नींव तैयार करते हैं कला संग्रहालय


संग्रहालय ज्ञान के अनुपम भंडार होते हैं। ऐसे जिनसे किसी देष या स्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के बारे में जाना जा सकता है। मुझे लगता है, अतीत में प्रवेष करने, उसमें झांकने की दीठ कहीं है तो वह संग्रहालयों में ही है। यह है तभी तो देष आजाद होने के कुछ ही समय बाद 1949 में कोलकता के कला सम्मेलन में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (नेषनल गैलरी आॅफ माॅर्डन आर्ट) की आवष्यकता महसूस की गई और 1954 में फिर इसकी स्थापना नई दिल्ली स्थित जयपुर हाऊस में हुई। आज इस कला संग्रहालय में 18 हजार से अधिक कलाकृतियों का अनूठा संग्रह है और निरंतर इसमें वृद्धि ही हो रही है। बाद में इसकी दो और शाखाएं भी मुम्बई और बैंगलुरू में खुली। देष के 150 वर्षों की सांस्कृतिक धरोहर को अंवेरे यह संग्रहालय भारतीय संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण है।
ष्अभी बहुत समय नहीं हुआ, लखनऊ स्थित डाॅ. शकुन्तला मिश्र राष्ट्रीय पुनर्वास विष्वविद्यालय ने अपने यहां करीब 5 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में 18 करोड़ रूपये की लागत से ‘समकालीन कला संग्रहालय’ स्थापना की घोषणा की है। किसी विष्वविद्यालय में इस तरह की शुरूआत की पहल बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए कि वहीं से नई पीढ़ी को भविष्य के संस्कार मिलते हैं। यह सही है, षिक्षण से अर्जित ज्ञान असीम होता है। पर इतना ही सच यह भी है कि षिक्षण के साथ यदि कलाओं के संस्कार भी मिले तो एक सुन्दर समाज की रचना स्वयमेव हो जाती है। 
मुझे लगता है, विष्वविद्यालयों में तमाम तरह की विधाओं के ज्ञान के साथ कलाओं के सौंदर्य बीज भी बोए जाने चाहिए। संग्रहालय एक तरह से अतीत का वातायन ही होते है। ऐसा वातायन जहां से हमारी विरासत में झांककर हम भविष्य की अपनी दृष्टि में बढ़त कर सकते हैं। कुछ समय पहले समकालीन कला पर आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी मंे बोलने के लिए डाॅ. शंकुतला मिश्र राष्ट्रीय पुनर्वास विष्वविद्यालय जाना हुआ था। कुलपति डाॅ. निषीथ राय और संगीत एवं कला संकाय के अध्यक्ष व देष के ख्यातनाम मूर्तिकार डाॅ. राजीव नयन ने तभी विष्वविद्यालय में स्थापित किए जाने वाले आधुनिक कला संग्रहालय की पूरी रूपरेखा बताई। सुखद लगा, यह जानकर कि वह अपने यहां ओपन एरिया गार्डन के साथ प्रिंट, मूर्तिकला और चित्रकला का ऐसा अनुपम भंडार करने जा रहे हैं जिसमें दृष्टिबाधित बच्चे भी कलाओं का स्पर्ष कर उन्हें भीतर से महसूस कर सके। ऐसा अगर होता है तो यह अपने आप में अनूठी कला संग्रह सर्जना होगी। विष्वविद्यालय में वाणिज्य सहित दूसरे विषयों के भी बहुत से संकाय है परन्तु यह देखना सुखद था कि मुख्य परिसर में देष के ख्यातनाम कलाकारों द्वारा सर्जित मूर्तियां, संस्थापन और कलाकृतियां  के प्रदर्षन से सौंदर्य का अनूठा कला संसार मन को मोहता है।
बहरहाल, कुछ बरस पहले केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के आमंत्रण पर एक व्याख्यान के लिए बनारस जाना हुआ था। तभी बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय प्रांगण में स्थित भारत कला भवन भी जाना हुआ था। तभी एषिया के उस सबसे बड़े विष्वविद्यालय संग्रहालय से साक्षात् हुआ था। सुप्रसिद्ध कलाविद् राय कृष्णदास ने भारत कला भवन की स्थापना की और आज इसमें 12 वीं से 20 शती तक के चित्र और मूर्तियों का अनूठा संग्रह है। पर यह विडम्बना ही है कि इसके बाद किसी विष्वविद्यालय में कला संग्रहालय के लिए इस तरह से कभी कोई विचार नहीं हुआ। इस दृष्टि से लखनऊ की पहल अनुकरणीय है।
होना यह भी चाहिए कि देष के तमाम प्रांतों के प्रमुख विष्वविद्यालय अपने यहां पर पृथक से क्षेत्र-विषेष में सृजित कलाओं की एक दीर्घा अपने यहां विकसित करें। ऐसा यदि होता है तो न केवल स्थान-विषेष की कलाओं के महत्ती पहलुओं को संरक्षित किया जा सकता है बल्कि विष्वविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों की सौंदर्य सूझ भी इससे स्वतः विकसित होगी। कला संग्रहालयों की स्थापना में यह भी ध्यान में रखा जाए कि वहां कला के शास्त्रीय रूपों के साथ ही परम्परा और लोक के बीज भी हों। राजस्थान में रियासतों के एकीकरण से पहले लगभग सभी प्रांतों में राजा-महाराजाओं ने अपने तई संग्रहालयों की स्थापना की थी। यह सही है इनमें पुरा वस्तुओं का अनुपम भंडार है परन्तु अधिकतर संग्रहालयों में राजसी वैभव की ही महिमा का अधिक गान है। राजा-महाराजा कैसे रहते थे, उनके द्वारा उपयोग मे ंली गई वस्तुएं, वस्त्र, अस्त्र-षस्त्र आदि इनमें अधिक हैं।  हां, कुछेक निजी स्तर के प्रयासों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसी संदर्भ में देष के चर्चित कलाकार विनय शर्मा ने अपने तई इधर अपने यहां जो निजी संग्रहालय विकसित किया है, वह भी अनुकरणीय है। विनय का निजी संग्रहालय कलाओं की दृष्टि से बेहद संपन्न है। पुरखों की सहेजी वस्तुओं के साथ ही पुराने समय की बहियां, भोजपत्र, चित्रकलाओं के आधार और छायांकन के सौंदर्य के साथ ही संगीत, नृत्य और आधुनिक ध्वनि यंत्र रेडियो के इतिहास को उन्होंने अपने निजी संग्रहालय में करीने से जुनून की हद तक जाकर संजोया है। मुझे लगता है, इस तरह के प्रयासों को राजकीय स्तर पर तरजीह दी जानी चाहिए ताकि जो कुछ हमारे अतीत का हमारे पास है, उसे संजोया जा सके।
संग्रहालय हमारी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास से रू-ब-रू होने के महत्ती स्त्रेात है। उनका होना अपने आप में सौंदर्य से संपन्न होना ही है। समकालीन कलाओं में प्रदर्षन के हदभात आग्रह से उपजी अर्थहीन छवियों के इस दौर में विष्वविद्यालयों, षिक्षण संस्थाओं में यदि कला संग्रहालयों की स्थापना होती है और निजी स्तर पर ऐसे प्रयासों को संरक्षण मिलता है तो सुन्द समाज की नींव अपने आप ही तैयार हो सकेगी।

Tuesday, April 11, 2017

शब्दों की उज्ज्वल दीठ ‘एकान्त का मानचित्र’

कवि, कथाकार और नाटयषास्त्र मर्मज्ञ संगीता गुन्देचा की यह पुस्तक सर्वथा भिन्न दृष्टि की कविता और कहानियां का मौलिक दस्तावेज है। संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं में रची बसी इस संग्रह की कहानियां दार्षनिकता के रंग में शब्दों का अनूठा उजास लिए है। छन्दों में बिखरी गद्य की लय संगीता गुन्देला की 16 कहानियों में यहां है तो दृष्यालेख सरीखी कविताओं में जीवनानुभूतियों की अनूठी रागात्मकता है। अंतर्मन अनुभूतियों के साथ मनोवैज्ञानिक भावों में रची-बसी संगीता की कहानियों में ध्वनित शब्द ही नही वह अदेखा, अपढ़ा भी पाठक अनुभूत कर सकता है, जिसे शब्दों के बीच का मौन कहते है। 
भाषायी रूढ़ता से परे अंर्तमन संवेदनाओं के आलोक में अदेखे छंद को अंवेरती इस संग्रह की कहानियां प्रयोगधर्मिता के साथ शब्दों के जिस भाव में ले जाती है, वह पाठकों को लुभाता है। कहें उनकी इस संग्रह की कहानियों में समय का मौन बजरिए शब्द मुखरित हुआ है। मसलन संग्रह की ‘छन्द’ कहानी को ही लें। कहानी नहीं एक तरह से यह शब्द गीत है। ऐसा जिसमें भाषिक विवेचना के केन्द्र में मनोभावों का सागर रचा गया है। दुनियाभर की भाषाओं की अन्व्तिि में अपने होने, उस क्षण को अनुभूत करने की यात्रा का कहानी मार्मिक विवेचन है जो हममें अनायास घट कर औचक दूर हो जाता है। संगीता गुंदेचा की कहानियां की यही विषेषता है, वहां जीवनानुभूतियों की क्षण विवेचना है। गहरी संवेदना के साथ शब्दों का अपूर्व उजास वहां है। एक कहानी की पंक्तियां देखे, ‘वहां का आकाष, वहीं का आकाष था, यहां का पानी वहीं का।’
एकांत का मानचित्र,-संगीता गुंदेचा 
(कहानिया एवं कविताएं)
सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
मूल्य : २५० रूपये, प्रथम संस्करण २०१६
बहरहाल, एकांत का अर्थ प्रायः अकेलेपन से लिया जाता है परन्तु कथाकार संगीता गुंदेचा की कहानियां पढंेगें तो यह भी पाएंगे वहां एकंात आत्म से जुड़ी संवेदना की सूक्ष्म व्यंजना है। यह है तभी तो उनकी कहानियां अपने आप से संवाद के अनूठे राग में अंतर्मन संवेदनाओं से साक्षात् कराती है। इनमें भीतर झांकने की दीठ है। कहानिकाकार के अंतर उजास में पाठक इन कहानियों में समय के अनूठे संदर्भ तलाष सकता है। इसलिए कि संग्रह की लगभग सभी कहानियां मन के आंतरिक कानों को छूती हममें गहरे से बसती है-उस समय के लिए ही नहीं जब हमें उन्हें पढ़ रहे होते हैं बल्कि उसके बाद भी वे निरंतर मन में घटती हमें मथती है। संग्रही की डायरीनुमा कुछ कहानियां इस दृष्टि से विरल है कि वहां शब्द नहीं शब्द के भीतर के शब्द की कथा है। ‘निषानेबाज’ कहानी कुछ इसी तरह की है। आख्यान सरीखी यह कथा ऐसी है जिसमें कहानी के भीतर कहानियों का आकाष है। ऐसे ही ‘कथाकार’, ‘डायरी’, ‘गुमषुदा’ आदि ऐसी कहानियां है जो मन को बांचती, बंचवाती पात्रों की व्यथा-कथा के मर्म उघाड़ती हममें सदा के लिए बस जाती है। उनकी कहानियां में शब्द ही नहीं वह अदेखा-अपढ़ा भी अनुभूत किया जा सकता है जो हमारे परिवेष का हिस्सा तो है परन्तु उस ओर हमारा कभी ध्यान नहीं जाता है। शायद इसलिए कि इस तकनीक आक्रांत समय में हम अकेले तो बहुतेरी बार होते हैं परन्तु एकांत को नहीं जीते।...तो यह कहानियां इसीलिए ‘एकांत का मानचित्र’ बनाती है।
आस-पास की घटनाओं, संवेदनाओं के मर्म से साक्षात कराती संग्रह की संगीत गुंदेचा की कहानियां ही नहीं कविताए भी पाठक को सर्वथा नई दीठ से संस्कारित करती है। संग्रह की ‘भस्म से जागता है महाकाल’, ‘वह मेघदूत पढती है/जहां दिनों के बीतने का हिसाब/फूलों से किया जाता है।’ कविताएं पढते आख्यानों की हमारी परम्परा जैसे आधुनिकता में पुनराविस्कृत होने लगती है। गोधूली बेला की  उनकी अप्रतीम शब्द व्यंजना देखें, ‘पक्षियों की टोली, आकाष में उडते-उडते शब्द बन जाती है।’ ऐसे ही शब्द भीतर के शब्द को ध्वनित करती उनकी श्राप कविता की पंक्तियां देखें, ‘..प्रार्थनाएं/मौन को समर्पित हैं/जिसमें पड़ी हुई दरारों से झांकते हैं देवगण/क्या वे उन वारांगनाओं की तरह है/जो खेल से मन उचट जाने पर/कभी कभी झांक लिया करती हैं-/अपने गवाक्षों से बाहर।’
 संगीता गुंदेचा का गद्य और पद्य इसलिए भी लुभाता है कि वहां लिखे की परम्परा की बजाय कहानी-कविता की नई राह तलाषी गई है। वह शब्द ब्रह्म में परम्पराओं को गहरे से खंगालती है। ‘छटपटाहट’ कविता में लोगों की आकांक्षाओं की उनकी दार्षनिक व्यंजना देखें, ‘..मंदिरों के गर्भगृह खाली हैं/देवताओं को सोख लिया है/लोगों की भटकती आकांक्षाओं ने।’ 
उनकी कविताएं अर्थगर्भित शब्द की उज्ज्वल दीठ है। ‘संभव’ कविता को पढ़ते  शब्द के ओज में जीवन से जुड़ संवेदनाओं के राग में एक तरह से हम बंध जाते हैं। कविता नहीं, जीवन के सच और तमाम कहे और कहे जा सकने को जैसे संगीता ने अपने भावों में समेट लिया है, यह कहते, ‘..मौत एक दिन आएगी/लील लेगी वह सारे कहे हुए को/लौटते हुए उसके पैरों के निषां में/संभव है छूट जाए/न कहे जा सके की आकृति/मानचित्र एकान्त का।’
‘एकान्त का मानचित्र’ रस की वह गागर है जिसमें अंतर्मन संवेदनाओं के सागर को समेटा गया है। हिंदी में इधर आई पुस्तकों में यह सर्वथा भिन्न पर अनूठी रागात्मकता लिए ऐसी पुस्तक है जिसे पढंगे तो मन करेंगा गुनें, गुनते ही रहें।
- वागर्थ, अप्रैल 2017  में प्रकाशित समीक्षा