Sunday, June 25, 2017

जिसका मन रंगरेज

कलाओं में अव्वल तो हिन्दी में अच्छी पुस्तके है ही बहुत कम, और जो है उनमें अधिकतर सैद्धान्तिक और अकादमिक घेरे में आबद्ध ऐसी है जिन्हे पढते मन रंजित नही होता। या कहे उन्हें पढ़कर कलाओं से किसी प्रकार का हेत पैदा नही होता। इस दृष्टि से कलाकार और कला समीक्षक देव प्रकाष चैधरी की सद्य प्रकाषित पुस्तक ‘जिसका मन रंगरेज‘ लीक से हटकर कही जा सकती है। सुप्रसिद्ध कलाकार अपर्णा कौर की कला पर केन्द्रित यह ऐसी पुस्तक है जिसमें शब्दों के सांगीतिक भावों का सुमधुर केनवास रचा गया है। पुस्तक में ठोड़-ठोड़ देव प्रकाष के शब्दों की मोहक काव्य व्यंजना में मन रंगो के आलोक से नहाता है तो रेखाओं की लय में आबद्ध होते कलाओं  के सर्वांग से साक्षात भी होता है। अपर्णा कोर के रंगरेज मन की थाह लेते जरा उनके शब्द देखें, ‘‘गुरूनानक के हाथ/ रंगो की एक दोपहर में/खोलते है संसार के द्वार। यही नही वह अपर्णा कोर के बहाने रंगो की प्रार्थना का अमूर्तन भी हममें बसाते है तो झूठ के अंधेरे और सच की धूप के साथ अपनी परछाई और दूसरे की छाया के मध्य कलाओं के लिए बनी जगह की भी अनायास पाठक को तलाष करवा देते है।
‘जिसका मन रंगरेज‘ की बडी विषेषता यह भी है कि इसमें शब्दांडम्बर नही है। थोडे़ शब्द परन्तु अर्धसघनता। वह भी ऐसी कि पुस्तक पढने के बाद  भी कलाकार की कला से जुडी संवेदना को पाठक निरंतर अनुभूत करता रहता है। एक और बडी खासियत इस पुस्तक की यह भी है कि इसमें कविता और चित्रकला का सांगोपांग सहकार है। जरा इन पंक्तियों को देखे, ‘रंगों का पडा़ेस/रिष्तों की महक/गमले की गुलदाउदी में/उतर आया है आसमान।’ 
बहरहाल, पुस्तक अपर्णा कोर की कला यात्रा की बहुत सी अनछूई बाते भी पाठकों से साझा करती है। मसलन बचपन से ही अमृता शेरगिल अर्पणा की पसंदीदा कलाकार रही हैं और महज 9 साल की उम्र में उन्होंने अमृता शेरगिल की पेंटिंग बनाई। यह भी है कि वह जिंदगी को प्रकृति की सबसे खूबसूरत कविता मानती है और अरावली के पहाड़ उन्हे भाते है। और यह भी कि 2010 में जब काॅमनवेल्थ खेल आयोजन हुआ तो अपर्णा ने खेलगांव में सिरीफोर्ट आॅडिटोरियम के आस-पास सड़कों के किनारे दषकों से खडे पेडो की गिनती करती थी और उन्हे परवाह इस बात की थी कि उन पेडो की हरियाली से दिल्ली सदा के लिए महरूम हो जायेगी। उन पर रहने वाले पक्षियों के घोसलें उजड़ जाएंगे। इसके लिए बाकायदा उन्होंने आंदोलन किया। सोनी-महिवाल की प्रेम कहानी से अपार प्यार, कागज की कष्ती बनाने से लेकर केनवास पर आकारों की प्राण प्रतिष्ठा, स्कल्पचर, इंस्टालेषन आदि के अंतर्गत अपर्णा कोर के कला सरोकारों की रोचक दास्तां को पुस्तक में देव प्रकाष ने बखूबी संजोया है।
देव प्रकाष ने पुस्तक में अपर्णा की कलाकृतियों और उनके निहितार्थ को भी गहरे से छूआ है। वह लिखते है, ‘इनके (अर्पणा कौर की कलाकृतियों में) रंगो में कोई घमासान मचा हुआ नही दिखता। कही रंगो का स्पर्ष बहुत हल्का है, मानों रंग किसी सिद्ध आवाज की तरह लगभग गायब हो रहे है।’ वह अपर्णा की कलाकृति ‘ट्रि आॅफ डिजायर’ के बहाने प्रकृति से उनके जुडाव और रंग-रेखाओं को बरतने की मौलिक दीठ भी देते है। स्वयं अपर्णा के शब्दों में, ‘पेंटिंग का मतलब सिर्फ केनवास पर पेंट लगाना भर नही है। यह जीवन का पूरा दर्षनषास्त्र है।’ और इस दर्षनषास्त्र के पन्ने ही देवप्रकाष चैधरी ने ‘जिसका मन रंगरेज’ में अपर्णा से किए एक साक्षात्कार में खुलवाए है। इन खुले पन्नों में वृन्दावन में रहने वाली विधवाओं के जीवन पर बनाई ‘विंडोज‘ श्रंखला की दास्तां है, कबीर श्रंखला और स्ट्रीट आर्ट यानी दीवारों पर किए रिलीफ वर्क के उनके कार्य के साथ ही बहुतेरी दूसरी बातों के साथ उनकी कला में प्रतीकात्मक रूप में आई कैंची से जुडा आख्यान भी पाठक को पृथक से आंदोलित करता है।
अपर्णा की बहुत सारी कलाकृतियों से अलंकृत ‘जिसका मन रंगरेज‘ ऐसी कला पुस्तक है जो कलाकार के बहाने हमे कलाओं की सूक्ष्म सूझ से सम्पन्न करती है। काले, लाल, पीले, हरे और नीले रंगो की प्रार्थना सरीखे शब्दों में इस पुस्तक में रेखाओं का उजास ध्वनित होता है। कहें, पुस्तक पढ़कर मन कलाओं का रसिक ही नही बनता बल्कि रंग-रेखाओं को सुनने-देखने के लिए संस्कारित भी होता है। देवप्रकाष चैधरी के ही पुस्तक में बरते शब्दों में कहूं तो हिंदी में कला पुस्तकों की एकरसता को जीते पाठकों के मध्य ‘मेरा मन रंगरेज’ से ‘...औचक चुप्पी का दरवाजा टूटा है।’   
-दैनिक नवज्योति, रविवारीय परिशिष्ट 25 जून, 2017 

Thursday, May 18, 2017

सुन्दर समाज की नींव तैयार करते हैं कला संग्रहालय


संग्रहालय ज्ञान के अनुपम भंडार होते हैं। ऐसे जिनसे किसी देष या स्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के बारे में जाना जा सकता है। मुझे लगता है, अतीत में प्रवेष करने, उसमें झांकने की दीठ कहीं है तो वह संग्रहालयों में ही है। यह है तभी तो देष आजाद होने के कुछ ही समय बाद 1949 में कोलकता के कला सम्मेलन में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (नेषनल गैलरी आॅफ माॅर्डन आर्ट) की आवष्यकता महसूस की गई और 1954 में फिर इसकी स्थापना नई दिल्ली स्थित जयपुर हाऊस में हुई। आज इस कला संग्रहालय में 18 हजार से अधिक कलाकृतियों का अनूठा संग्रह है और निरंतर इसमें वृद्धि ही हो रही है। बाद में इसकी दो और शाखाएं भी मुम्बई और बैंगलुरू में खुली। देष के 150 वर्षों की सांस्कृतिक धरोहर को अंवेरे यह संग्रहालय भारतीय संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण है।
ष्अभी बहुत समय नहीं हुआ, लखनऊ स्थित डाॅ. शकुन्तला मिश्र राष्ट्रीय पुनर्वास विष्वविद्यालय ने अपने यहां करीब 5 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में 18 करोड़ रूपये की लागत से ‘समकालीन कला संग्रहालय’ स्थापना की घोषणा की है। किसी विष्वविद्यालय में इस तरह की शुरूआत की पहल बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए कि वहीं से नई पीढ़ी को भविष्य के संस्कार मिलते हैं। यह सही है, षिक्षण से अर्जित ज्ञान असीम होता है। पर इतना ही सच यह भी है कि षिक्षण के साथ यदि कलाओं के संस्कार भी मिले तो एक सुन्दर समाज की रचना स्वयमेव हो जाती है। 
मुझे लगता है, विष्वविद्यालयों में तमाम तरह की विधाओं के ज्ञान के साथ कलाओं के सौंदर्य बीज भी बोए जाने चाहिए। संग्रहालय एक तरह से अतीत का वातायन ही होते है। ऐसा वातायन जहां से हमारी विरासत में झांककर हम भविष्य की अपनी दृष्टि में बढ़त कर सकते हैं। कुछ समय पहले समकालीन कला पर आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी मंे बोलने के लिए डाॅ. शंकुतला मिश्र राष्ट्रीय पुनर्वास विष्वविद्यालय जाना हुआ था। कुलपति डाॅ. निषीथ राय और संगीत एवं कला संकाय के अध्यक्ष व देष के ख्यातनाम मूर्तिकार डाॅ. राजीव नयन ने तभी विष्वविद्यालय में स्थापित किए जाने वाले आधुनिक कला संग्रहालय की पूरी रूपरेखा बताई। सुखद लगा, यह जानकर कि वह अपने यहां ओपन एरिया गार्डन के साथ प्रिंट, मूर्तिकला और चित्रकला का ऐसा अनुपम भंडार करने जा रहे हैं जिसमें दृष्टिबाधित बच्चे भी कलाओं का स्पर्ष कर उन्हें भीतर से महसूस कर सके। ऐसा अगर होता है तो यह अपने आप में अनूठी कला संग्रह सर्जना होगी। विष्वविद्यालय में वाणिज्य सहित दूसरे विषयों के भी बहुत से संकाय है परन्तु यह देखना सुखद था कि मुख्य परिसर में देष के ख्यातनाम कलाकारों द्वारा सर्जित मूर्तियां, संस्थापन और कलाकृतियां  के प्रदर्षन से सौंदर्य का अनूठा कला संसार मन को मोहता है।
बहरहाल, कुछ बरस पहले केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के आमंत्रण पर एक व्याख्यान के लिए बनारस जाना हुआ था। तभी बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय प्रांगण में स्थित भारत कला भवन भी जाना हुआ था। तभी एषिया के उस सबसे बड़े विष्वविद्यालय संग्रहालय से साक्षात् हुआ था। सुप्रसिद्ध कलाविद् राय कृष्णदास ने भारत कला भवन की स्थापना की और आज इसमें 12 वीं से 20 शती तक के चित्र और मूर्तियों का अनूठा संग्रह है। पर यह विडम्बना ही है कि इसके बाद किसी विष्वविद्यालय में कला संग्रहालय के लिए इस तरह से कभी कोई विचार नहीं हुआ। इस दृष्टि से लखनऊ की पहल अनुकरणीय है।
होना यह भी चाहिए कि देष के तमाम प्रांतों के प्रमुख विष्वविद्यालय अपने यहां पर पृथक से क्षेत्र-विषेष में सृजित कलाओं की एक दीर्घा अपने यहां विकसित करें। ऐसा यदि होता है तो न केवल स्थान-विषेष की कलाओं के महत्ती पहलुओं को संरक्षित किया जा सकता है बल्कि विष्वविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों की सौंदर्य सूझ भी इससे स्वतः विकसित होगी। कला संग्रहालयों की स्थापना में यह भी ध्यान में रखा जाए कि वहां कला के शास्त्रीय रूपों के साथ ही परम्परा और लोक के बीज भी हों। राजस्थान में रियासतों के एकीकरण से पहले लगभग सभी प्रांतों में राजा-महाराजाओं ने अपने तई संग्रहालयों की स्थापना की थी। यह सही है इनमें पुरा वस्तुओं का अनुपम भंडार है परन्तु अधिकतर संग्रहालयों में राजसी वैभव की ही महिमा का अधिक गान है। राजा-महाराजा कैसे रहते थे, उनके द्वारा उपयोग मे ंली गई वस्तुएं, वस्त्र, अस्त्र-षस्त्र आदि इनमें अधिक हैं।  हां, कुछेक निजी स्तर के प्रयासों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसी संदर्भ में देष के चर्चित कलाकार विनय शर्मा ने अपने तई इधर अपने यहां जो निजी संग्रहालय विकसित किया है, वह भी अनुकरणीय है। विनय का निजी संग्रहालय कलाओं की दृष्टि से बेहद संपन्न है। पुरखों की सहेजी वस्तुओं के साथ ही पुराने समय की बहियां, भोजपत्र, चित्रकलाओं के आधार और छायांकन के सौंदर्य के साथ ही संगीत, नृत्य और आधुनिक ध्वनि यंत्र रेडियो के इतिहास को उन्होंने अपने निजी संग्रहालय में करीने से जुनून की हद तक जाकर संजोया है। मुझे लगता है, इस तरह के प्रयासों को राजकीय स्तर पर तरजीह दी जानी चाहिए ताकि जो कुछ हमारे अतीत का हमारे पास है, उसे संजोया जा सके।
संग्रहालय हमारी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास से रू-ब-रू होने के महत्ती स्त्रेात है। उनका होना अपने आप में सौंदर्य से संपन्न होना ही है। समकालीन कलाओं में प्रदर्षन के हदभात आग्रह से उपजी अर्थहीन छवियों के इस दौर में विष्वविद्यालयों, षिक्षण संस्थाओं में यदि कला संग्रहालयों की स्थापना होती है और निजी स्तर पर ऐसे प्रयासों को संरक्षण मिलता है तो सुन्द समाज की नींव अपने आप ही तैयार हो सकेगी।

Tuesday, April 11, 2017

शब्दों की उज्ज्वल दीठ ‘एकान्त का मानचित्र’

कवि, कथाकार और नाटयषास्त्र मर्मज्ञ संगीता गुन्देचा की यह पुस्तक सर्वथा भिन्न दृष्टि की कविता और कहानियां का मौलिक दस्तावेज है। संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं में रची बसी इस संग्रह की कहानियां दार्षनिकता के रंग में शब्दों का अनूठा उजास लिए है। छन्दों में बिखरी गद्य की लय संगीता गुन्देला की 16 कहानियों में यहां है तो दृष्यालेख सरीखी कविताओं में जीवनानुभूतियों की अनूठी रागात्मकता है। अंतर्मन अनुभूतियों के साथ मनोवैज्ञानिक भावों में रची-बसी संगीता की कहानियों में ध्वनित शब्द ही नही वह अदेखा, अपढ़ा भी पाठक अनुभूत कर सकता है, जिसे शब्दों के बीच का मौन कहते है। 
भाषायी रूढ़ता से परे अंर्तमन संवेदनाओं के आलोक में अदेखे छंद को अंवेरती इस संग्रह की कहानियां प्रयोगधर्मिता के साथ शब्दों के जिस भाव में ले जाती है, वह पाठकों को लुभाता है। कहें उनकी इस संग्रह की कहानियों में समय का मौन बजरिए शब्द मुखरित हुआ है। मसलन संग्रह की ‘छन्द’ कहानी को ही लें। कहानी नहीं एक तरह से यह शब्द गीत है। ऐसा जिसमें भाषिक विवेचना के केन्द्र में मनोभावों का सागर रचा गया है। दुनियाभर की भाषाओं की अन्व्तिि में अपने होने, उस क्षण को अनुभूत करने की यात्रा का कहानी मार्मिक विवेचन है जो हममें अनायास घट कर औचक दूर हो जाता है। संगीता गुंदेचा की कहानियां की यही विषेषता है, वहां जीवनानुभूतियों की क्षण विवेचना है। गहरी संवेदना के साथ शब्दों का अपूर्व उजास वहां है। एक कहानी की पंक्तियां देखे, ‘वहां का आकाष, वहीं का आकाष था, यहां का पानी वहीं का।’
एकांत का मानचित्र,-संगीता गुंदेचा 
(कहानिया एवं कविताएं)
सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
मूल्य : २५० रूपये, प्रथम संस्करण २०१६
बहरहाल, एकांत का अर्थ प्रायः अकेलेपन से लिया जाता है परन्तु कथाकार संगीता गुंदेचा की कहानियां पढंेगें तो यह भी पाएंगे वहां एकंात आत्म से जुड़ी संवेदना की सूक्ष्म व्यंजना है। यह है तभी तो उनकी कहानियां अपने आप से संवाद के अनूठे राग में अंतर्मन संवेदनाओं से साक्षात् कराती है। इनमें भीतर झांकने की दीठ है। कहानिकाकार के अंतर उजास में पाठक इन कहानियों में समय के अनूठे संदर्भ तलाष सकता है। इसलिए कि संग्रह की लगभग सभी कहानियां मन के आंतरिक कानों को छूती हममें गहरे से बसती है-उस समय के लिए ही नहीं जब हमें उन्हें पढ़ रहे होते हैं बल्कि उसके बाद भी वे निरंतर मन में घटती हमें मथती है। संग्रही की डायरीनुमा कुछ कहानियां इस दृष्टि से विरल है कि वहां शब्द नहीं शब्द के भीतर के शब्द की कथा है। ‘निषानेबाज’ कहानी कुछ इसी तरह की है। आख्यान सरीखी यह कथा ऐसी है जिसमें कहानी के भीतर कहानियों का आकाष है। ऐसे ही ‘कथाकार’, ‘डायरी’, ‘गुमषुदा’ आदि ऐसी कहानियां है जो मन को बांचती, बंचवाती पात्रों की व्यथा-कथा के मर्म उघाड़ती हममें सदा के लिए बस जाती है। उनकी कहानियां में शब्द ही नहीं वह अदेखा-अपढ़ा भी अनुभूत किया जा सकता है जो हमारे परिवेष का हिस्सा तो है परन्तु उस ओर हमारा कभी ध्यान नहीं जाता है। शायद इसलिए कि इस तकनीक आक्रांत समय में हम अकेले तो बहुतेरी बार होते हैं परन्तु एकांत को नहीं जीते।...तो यह कहानियां इसीलिए ‘एकांत का मानचित्र’ बनाती है।
आस-पास की घटनाओं, संवेदनाओं के मर्म से साक्षात कराती संग्रह की संगीत गुंदेचा की कहानियां ही नहीं कविताए भी पाठक को सर्वथा नई दीठ से संस्कारित करती है। संग्रह की ‘भस्म से जागता है महाकाल’, ‘वह मेघदूत पढती है/जहां दिनों के बीतने का हिसाब/फूलों से किया जाता है।’ कविताएं पढते आख्यानों की हमारी परम्परा जैसे आधुनिकता में पुनराविस्कृत होने लगती है। गोधूली बेला की  उनकी अप्रतीम शब्द व्यंजना देखें, ‘पक्षियों की टोली, आकाष में उडते-उडते शब्द बन जाती है।’ ऐसे ही शब्द भीतर के शब्द को ध्वनित करती उनकी श्राप कविता की पंक्तियां देखें, ‘..प्रार्थनाएं/मौन को समर्पित हैं/जिसमें पड़ी हुई दरारों से झांकते हैं देवगण/क्या वे उन वारांगनाओं की तरह है/जो खेल से मन उचट जाने पर/कभी कभी झांक लिया करती हैं-/अपने गवाक्षों से बाहर।’
 संगीता गुंदेचा का गद्य और पद्य इसलिए भी लुभाता है कि वहां लिखे की परम्परा की बजाय कहानी-कविता की नई राह तलाषी गई है। वह शब्द ब्रह्म में परम्पराओं को गहरे से खंगालती है। ‘छटपटाहट’ कविता में लोगों की आकांक्षाओं की उनकी दार्षनिक व्यंजना देखें, ‘..मंदिरों के गर्भगृह खाली हैं/देवताओं को सोख लिया है/लोगों की भटकती आकांक्षाओं ने।’ 
उनकी कविताएं अर्थगर्भित शब्द की उज्ज्वल दीठ है। ‘संभव’ कविता को पढ़ते  शब्द के ओज में जीवन से जुड़ संवेदनाओं के राग में एक तरह से हम बंध जाते हैं। कविता नहीं, जीवन के सच और तमाम कहे और कहे जा सकने को जैसे संगीता ने अपने भावों में समेट लिया है, यह कहते, ‘..मौत एक दिन आएगी/लील लेगी वह सारे कहे हुए को/लौटते हुए उसके पैरों के निषां में/संभव है छूट जाए/न कहे जा सके की आकृति/मानचित्र एकान्त का।’
‘एकान्त का मानचित्र’ रस की वह गागर है जिसमें अंतर्मन संवेदनाओं के सागर को समेटा गया है। हिंदी में इधर आई पुस्तकों में यह सर्वथा भिन्न पर अनूठी रागात्मकता लिए ऐसी पुस्तक है जिसे पढंगे तो मन करेंगा गुनें, गुनते ही रहें।
- वागर्थ, अप्रैल 2017  में प्रकाशित समीक्षा 

Tuesday, February 28, 2017

समकालीन कला



केन्द्रीय ललित कला अकादेमी ने 'समकालीन कला' के एक अंक के अतिथि संपादन का दायित्व आपके इस मित्र को दिया था। यह अंक ४९ है.

आभारी हूं, मेरे आग्रह को स्वीकार करते नर्मदा के अनथक यात्री अमृतलाल वेगड़, प्रिय कवि, गद्यकार गीत चतुर्वेदी, कलाकार एवं लेखक देव प्रकाश चौधरी, सुप्रसिद्ध ध्रुवपद गायिका डॉ. मधुभट्ट तैलंग, भाषा शास्त्री देवर्षि कलानाथ शास्त्री, ख्यातिलब्ध कला अध्येता श्रीकृष्ण जुगनू, 'कला दीर्घा' के संपादक अवधेश मिश्र, स्तम्भकार पंकज चतुर्वेदी, राजस्थानी—हिन्दी के ख्यात लेखक अतुल कनक, राजस्थान ललित कला अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. भवानीशंकर शर्मा, कलाकार और कवि कुमार अनुपम,कलाकार विनय शर्मा आदि ने मेरे लिए लिखा।



अंक की सामग्री कलाओं के अंत:संबंधों पर ही अधिक केन्द्रित है। आवरण सुप्रसिद्ध कलाकार हिम्मतशाह का है। 

अमर उजाला, रविवारीय 7  फरवरी 2017 


दैनिक नवज्योति, रविवारीय 19 फरवरी 2017 

Monday, January 2, 2017

बचेगा वही जो रचेगा

भोर का उजास मन को गढ़ता है, कुछ रचने के लिए। पक्षियों की चहचहाट से मन उल्लसित होता बहुतेरी बार आकाष बन जाता है।...और धीरे-धीरे फैलता उजास प्रेरित करता है-नया कुछ करने के लिए। इसीलिए कहूं प्रकृति को सुनें और मन ही  मन गुनें। लगेगा आपके भीतर कोई गा रहा है। यह जो गान है, वही तो अनाहत नाद है। अंर्तध्वनि का प्रतीक! यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद के रूप में बज पड़ता है। अनाहद नाद का मूल स्त्रोत हमारी अनुभूति ही तो है। प्रकृति को महसूस करने की हमारी दृष्टि। भावात्मक होने से अव्यक्त यानी अविगत है यह। इसीलिए यह अव्यक्त है। कहा भी तो गया है, ‘अविगत गति कछु कहति न आवै।...’
जनसत्ता, २ जनवरी 2017 
संगीत के इतिहास लेखक सांबमूर्ति कहते हैं, ‘अनाहत नाद से ही निनादित है यह विष्व।’ सच ही तो कहते हैं सांब! बारिश जब होती है तो मोर बोलते हैं। कोयल गाती है। चिड़ियाएं चहचहाती हैं। प्रकृति तब बहुतेरी बार मौन में भी संगीत का आस्वाद कराती है। साहित्य, संगीत, नृत्य की कलाएं प्रकृति के इन गुणों से ही तो पल्लवित-पुष्पित होती है।
कोई कह रहा था, एकांत नहीं सुहाता। अकेलापन काटने को दौड़ता है। इसका अर्थ उसने एकांत को जाना ही नहीं। एकांत माने एक-आप। अपने से संवाद। पर विचारेें, कभी अपने से संवाद का एकांत होता है! नही ंना? इस तकनीक आक्रांत समय में तो हम अपने से दूर और दूर हुए जा रहे हैं।...और इसी से सर्जना से भी हो रहे हैं विलग। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं का जन्म आपके भीतर के एकांत से होता है। एकांत प्रकृति से प्रेरणा ग्रहण करता है। इसीलिए कभी यह भी जरूरी है कि आप अपने आप से भी मिलें। 
हमारे यहां कलाएं शरण्य ही नहीं हैं, आश्रय भी हैं। अपने आपको अभिव्यक्त करने का माध्यम। इनमें तैरा जा सकता है। सच्ची कला आपको वहां ले जाती है जहां आप पहले कभी न गए हों।...भले कईं बार वह जानी-पहचानी जगह पर भी ले जाती है परन्तु तब उस स्थान को अप्रत्याशित ढंग से देखने के लिए वह आपको विचलित भी करती है। 
लो वह जो पुराना था, बीत रहा है। नया साल प्रारंभ हो गया है। अनवरत चलती है समय की घड़ी। काल चक्र के पहियों पर किसका जोर! समय घड़ी के सूईयों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं बीते ने बहुत कुछ दिया है तो हमसे बहुत कुछ लिया भी है। इस नये वर्ष में संकल्प लें कि भीतर के मौन को स्वर देंगे। विचारेंगे, जो आज है वह कल नहीं होगा। तब क्या यह जो आज है वह क्या हमारी परम्परा नहीं बन जाएगा! मन इस परम्परा में ही है। चित्रकारों की चित्रकृतियों की परम्परा में, नृत्य की, नाट्य की, संगीत की हमारी परम्परा में। हम जितना उन परम्पराओं में जाते हैं, उतना ही पुनर्नवा होते हैं। अंदर का हमारा जो रीता है, वह भरता है। यह परम्परा ही है जो अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती है। सामाजिक जीवन को इसी से तो निरंतरता मिलती है। 
रोज नया सूर्य उगता है। एमिली डिकिन्सन की बेहद खूबसूरत सी एक कविता है, ‘दिस इज माई लेटर टू दी वल्र्ड..’। वह कहती हैं मैं कविता नहीं कर रही। यह तो बहुत जरूरी, निहायत जरूरी चिट्ठी है मेरी-दुनिया के नाम...जिसे लिखे बिना मैं रह नहीं सकती-भले दुनिया उसे समझे न समझे, भले दुनिया को उसे पढ़ने की फुरसत हो, न हो।’ एमिली कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही है। कह क्या रही है, हममें जैसे प्रवेश कर रही है। यही तो संप्रेषण की उसकी कला है। सच्ची कला कल्पना और अनुभूति का ही तो संयोजन है। एक तरह से कल्पना प्रवण भावुकता के दौर में आए एक संवेदनशील मस्तिष्क की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति। 
इस मूल्यमूढ़ समय में नए माध्यमों में हमारी अपनी पहचान और भीतर की खोज का उन्मेष जगाती हैं कलाएं। इसलिए कि वे समयातीत हैं। यह कलाएं ही हैं जिनके सरोकार उत्तरोतर विराट् और व्यापक होने की सामथ्र्य रखते हैं। परम्परा के पोषण और परस्परता में वे निरंतर फलती है, सांमजस्य भाव पैदा करते। विग्रह के लिए वहां कोई अवकाष नहीं है। आत्म को व्यक्त करने का माध्यम हैं कलाएं। 
आईए, बीते वक्त की तमाम कड़वाहटों को भुलाते, अच्छाईयों को याद करते साहित्य, संगीत, नृत्य और चित्र कृतियों की कलाओं मे रमें। उन्हें अपने भीतर की सर्जना से रचें। हर दिन नया आसमान छूएं। अपना नया आकाश बनाएं।...बचेगा वही जो रचेगा। यह आकाश ही तो है जिसमें कुछ नहीं रहता और सब भरा रहता है।

Thursday, December 29, 2016

उच्च शिक्षा शिक्षण

राजस्थान में राज्यपाल और विष्वविद्यालयों के कुलाधिपति श्री कल्याण सिंह की पहल पर कुछ समय पहले सरकारी विष्वविद्यालयों में कुलपति चयन मेें पारदर्षिता लाने के लिए विज्ञापन प्रकाषित कर उसके जरिए पात्र आवेदकों से आवेदन आमंत्रित करने के संबंध में दिषा निर्देष जारी हुए थे। इसके अंतर्गत अब संबंधित विष्वविद्यालय के लिए गठित कुलपति चयन समिति कुलपति पद के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी कर योग्य अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित करती है। यह निष्चित ही महत्वपूर्ण कदम है परन्तु विष्वविद्यालय षिक्षण प्रक्रिया में षिक्षकों की नियुक्ति एवं कुलपति चयन में रूढ़ हो चुके नियमों को बदले जाने की भी बहुत से स्तरों पर जरूरत है।
थोड़ा अतीत में जाएं। जब देष आजाद हुआ था, देष में विभिन्न मंत्रालयों का गठन किया गया था। तब षिक्षा को संस्कृति से जोड़ते हुए केन्द्र सरकार ने ‘षिक्षा और संस्कृति मंत्रालय’ का गठन किया था। बाद में इसमें विज्ञान को भी जोड़ दिया गया और मंत्रालय का नाम हुआ, ‘षिक्षा विज्ञान और संस्कृति मंत्रालय’। देष में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस मंत्रालय मंे मानवीय विषयों और संसाधन को जोड़़ते हुए इसे नाम दिया, ‘मानव संसाधन मंत्रालय’। अभी तक मंत्रालय का नाम यही चला आ रहा है। षिक्षा से संबंधित महकहमे का नामकरण सरकार चाहे जो करे परन्तु सवाल यह है कि क्या वास्तव में हमारे यहां षिक्षण से जुड़े सरोकारों पर नीतिगत कोई ठोस पहल हुई है? उच्च षिक्षा की वर्तमान व्यवस्था से क्या बेहतर मानव संसाधन समाज को मिल पा रहे हैं? यह सही है, उच्च स्तर पर समय-समय पर षिक्षा से जुड़े निर्णय होते रहे हैं परन्तु यह ऐसे होते हैं जिनमें या तो पाठ्यक्रम में बदलाव से जुड़ी बात होती है या फिर परीक्षाओं को कराए जाने या नहीं कराए जाने, उनके मूल्यांकन से जुड़ी ही बातें होती है। षिक्षकों के चयन में योग्यताओं के आधार से जुड़े निर्णयों में भी कभी पीएच.डी. को मान्य करने और कभी उसके स्थान पर केवल नेट, स्लेट या फिर संबंधित किसी वर्ष तक के अभ्यर्थियों के लिए चयन में किसी प्रकार की छूट से आगे कभी कोई निर्णय आज तक किसी भी सरकार में नहीं हुआ है। सवाल यह है कि क्या विष्वविद्यालयों या उच्च षिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले प्रोफेसर या कुलपति की योग्यता क्या केवल औपचारिक स्नातकोत्तर डिग्री, पीएच.डी या फिर नेट, स्लेट ही होनी चाहिए? 
बाकी विषयों के अध्यय-अध्यापन को छोड़ दें। केवल भाषा, साहित्य और संस्कृति की ही बात करें तो बहुत पहले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का लिखा जे़हन में इस समय कौंध रहा है, ‘भाषा और साहित्य के संबंध में उल्लेखनीय शोध कार्य अधिकांष विष्वविद्यालयों के बाहर ही हुए हैं।’ माने विष्वविद्यालयों में इस दिषा में उल्लेखनीय कुछ नहीं हुआ है। यह बात द्विवेजी ही नहीं, समय स्वयं जैसे कह रहा है। भाषा और साहित्य से जुड़ा अधिकतर शोध उन लेखकों ने किया है जो किसी विष्वविद्यालय में पढ़ाने से नहीं जुड़े रहे हैं। ऐसे भी बहुत हैं जिनके पास औपचारिक षिक्षा की डिग्री तक नहीं है। उदाहरण बहुत सारे दिए जा सकते हैं पर एक ही शायद बहुत होगा। संसार का अद्वितीय हिंदी थिसारस वृहत समांतर कोष अरविंद कुमार ने तैयार किया है। किसी भी दूसरी भाषा में ऐसा शब्दकोष और थिसारस नहीं मिलेगा जिसमें शीर्षकों एवं उपषीर्षकों में अद्भुत भाषाई संपदा को अंवेरा गया हो। अरविंद कुमार फिल्म पत्रिका ‘माधुरी’, ‘सर्वोत्तम रिडर्स डाइजेस्ट’ और दिल्ली प्रेस पत्रिका समूह की ‘सरिता’ के संपादन और फुटकर लेखन से जुड़े रहे हैं परन्तु उन्होंने अनूठा कार्य हिंदी में अपने तई किया है। वही क्यों राहुल सांकृत्याययन, अज्ञेय, मनोहरष्याम जोषी आदि की एक वृहद श्रृंखला है जिन्हें पाठ्यक्रमों में पढ़ा जाता है और जिन्होंने हमारी भाषा को संपन्न और सृदृढ किया है। राहुल सांकृत्यायन के पास तो औपचारिक डिग्री तक नहीं थी।
यह सही है, षिक्षा की बुनियाद में आरंभ में षिक्षण के लिए निर्धारित शैक्षिक योग्यता प्राप्त षिक्षक ही अधिक कारगर होता है। चूंकि तब सिखाने के लिए कुछ निर्धारित मानकों, पद्धति से ही षिक्षा की बुनियाद तैयार होती है परन्तु उच्च षिक्षा में यह जरूरी नहीं है। पर हम ब्रिटिष काल की पारम्परिक षिक्षा पद्धति की रूढ़ियां से आज भी इस कदर ग्रस्त हैं कि वहां पढ़े हुए का अंत में कोई बहुत अधिक लाभ व्यक्ति को नहीं मिलता है। मसलन किसी भी विषय में स्नातक भले वह तृतीय श्रेणी से उत्तीर्ण हो अथवा सर्वोच्च अंक प्राप्त कर उत्तीर्ण, दोनों ही सर्वोच्च भारतीय प्रषासनिक सेवा में सफल हो सकते हैं। माने सफलता का मापदंड न तो विषय है और न ही अधिक अंक। यही बात दूसरे व्यवसायों में भी है। सदा वरीयता सूची में आने वाला हमारे यहां क्लर्क पद पर मिल सकता है और सदा सर्वदा औसत अंक लाने वाला सफतम अधिकारी। कारण यही है कि, एक समय के बाद हमारे यहां डिग्री की उपादेयता औपचारिक प्रतिस्पद्र्धी परीक्षा में प्रवेष भर के लिए रह जाती है। संगीत, नृत्य, चित्रकला का क्षेत्र देख लीजिए, अधिकतर सफल वहां वे लोग नहीं है जो विष्वविद्यालय की बड़ी डिग्रीयां प्राप्त हैं बल्कि वे हैं जो आत्मदीक्षित हैं। भले बाद में उन्हें वही विष्वविद्यालय जिन्होंने सामान्य डिग्री भर नहीं दी, उन्हें डाॅक्टरेट, डी-लिट जैसी मानद उपाधियाॅं देते हैं।  
राहुल सांकृत्यायन 36 भाषाओं के जानकार प्रकाण्ड विद्वान थे। तिब्बत और श्रीलंका से दुर्लभ ग्रंथो को खच्चरों पर लादकर वह भारत लाए और उनका विषद् विश्लेषण, व्याख्या का महत्ती कार्य किया। राहुलजी के पास औपचारिक डिग्री नहीं थी पर उनकी लिखी पुस्तक ‘मध्य एषिया का इतिहास’ को आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया था। यह तब की बात है जब पंडित जवाहरलाल नेहरू देष के प्रधानमंत्री थे। वह उनकी विद्वता से बेहद प्रभावित थे सो उन्होंने तत्कालीन षिक्षा मंत्री हिमायु कबीर को कहा कि राहुलजी की सेवाएं हमारे यहां प्रोफसर के रूप में उच्च षिक्षा में ली जाए। हिमायु कबीर थे पारम्परिक ब्रिटिष षिक्षा पद्धति के हिमायती। सो उन्होंने औपचारिक डिग्री के अभाव में उनकी सेवांए प्रोफसेर के रूप में लिए जाने से साफ इन्कार कर दिया। यह बात अलग है कि उन्हीें राहुल सांकृत्यायन को उन्हीें दिनों श्रीलंका स्थित अनुराधापुर विष्वविद्यालय ने अपने यहां प्रोफसर के रूप में नियुक्त कर लिया। सोवियत सरकार ने भी आग्रह कर उन्हें अपने विष्वविद्यालयें में पढ़ाने के लिए बुलाया। पर हमारे यहां पढ़ाने के लिए तब भी और अब भी औपचारिक स्नोतकोत्तर डिग्री, नेट-स्लेट जरूरी है। यह ठीक है, सैद्धान्तिक स्तर पर पढ़ाने के लिए किसी तरह का नियुक्ति पैमाना होना भी चाहिए परन्तु व्यावहारिक स्तर पर क्या संबंधित विषय का विषिष्ट ज्ञान क्या पढ़ाने की एक योग्यता नहीं हो सकती? 
यह बात इसलिए कि इस समय जो तरीका उच्च षिक्षा और विष्वविद्यालयी षिक्षण के लिए चयन प्रक्रिया का है वह इतना रूढ़ है कि उसमें पुस्तकों से हुबहु नकल कर पीएच.डी. करने वाले, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पत्रवाचन और आईएसएसएन नम्बर की निकलने वाली अनाप-षनाप पत्रिकाओं में निर्धारित राषि का भुगतान कर शोध पत्र छपवाने वाले बहुतेरे असिस्टेंट, एसोसिएट और प्रोफसर बन जाते हैं। याद है, कुछ साल पहले भारत सरकार की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में इन पंक्तियों के लेखक की एक शोधपरक आवरण कथा प्रकाषित हुई थी। कुछ समय बाद वही आवरण कथा हुबहु पत्रिका में किसी शोधार्थी ने अपने नाम से प्रकाषित करा ली। पता चला तो त्वरित मैंने संपादक को पत्र लिखा। बाद में उस शोधार्थी ने बहुत गिड़गिड़ाते हुए माफी मांगी और कहा, ‘सर आप अपनी षिकायत वापस ले ले। मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा।‘ लबोलुआज यह कि उच्च षिक्षा में षिक्षक पद पर आवेदन के लिए दूसरों के लिखे को अपने नाम से प्रकाषित करवा निर्धारित योग्यता के काॅलम को बहुत से स्तरों पर पूरा कर दिया जाता है। बहुत कम स्तरों पर यह पता चल पाता है कि वह कार्य किसी ओर की मेहनत को अपने नाम किया होता है। उच्च षिक्षण में नियुक्ति का पैमाना यदि इसी तरह शोधपत्र प्रकाषन, सम्मेलन में पत्रवाचन रहेगा तो स्वतः समझा जा सकता है कि उसका परिणाम क्या हो सकता है, होता रहा है।
बहरहाल, विद्यालयी षिक्षा से उच्च षिक्षा की बुनियाद तैयार होती है। पर बुनियाद तैयार होने के बाद षिक्षक वही पर्याप्त नहीं है जो निष्चित शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने के बाद पढ़ाने के क्षेत्र में आता है। वह भी जरूरी है पर अधिक उपयोगी शिक्षक वह है जो संबंधित विषय के सरोकारों से सीधे जुड़ा है। माने पाठकों में लोकप्रिय ख्यात लेखक, चिंतक और लब्धप्रतिष्ठि पत्रकार, सपंादक यदि पढ़ाने के सरोकारों में आता है तो वह विद्यार्थियों को अधिक बेहतर ढंग से ज्ञान का संप्रेषण कर सकता है। विद्यार्थियों में सोचने-समझने की शक्ति का विकास संबंधित ज्ञान से व्यावहारिक रूप में जुड़ा वही व्यक्ति अधिक कर सकता है जो उस विषय को गहराई से जीता रहा है। वह नेट, स्लेट और पीएच.डी. करने वाला अभ्यर्थी भी हो सकता है। इसलिए जरूरी है, नियुक्ति मानदंड ऐसे हों जिनसे अर्से से चली आ रही उच्च षिक्षा मंे षिक्षक नियुक्ति की रूढ़ियों से जड़ हो रहे मूल्यों को बदला जा सके। 
व्यापक समझ की व्यावहारिकी और सैद्धान्तिकी दोनों का दायरा और दोनांे का हिस्सा अलग-अलग होता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उच्च षिक्षा षिक्षण का मानदंड पूरी तरह से किसी एक विचार यानी केवल संबधित विषय की आधिकारिता और कार्य पर ही आधारित हो। वहां सैद्धान्तिक स्तर पर किसी प्रकार की षिक्षण योग्यता भी निर्धारित होनी चाहिए परन्तु षिक्षक चयन प्रक्रिया में कुछ हिस्सा उस व्यावहारिकी का भी होना चाहिए जिससे विद्यार्थियो को सैद्धान्तिक के साथ संबंधित विषय का व्यावहारिक ज्ञान भी मिल सके। अगर ऐसा होता है तो उच्च षिक्षा प्राप्त मानव संसाधन का देष और समाज के लिए वास्तव में बेहतर उपयोग हो सकता है। पर जरूरत इस बात की है कि बरसों से चली आ रही परम्पराओं और नियम-कानूनों में बदलाव की कोई सार्थक पहल हो।

Wednesday, December 14, 2016

बाजार पोषित कला का यह छाया-छवि दौर

सम् और कृति से बना है संस्कृित। अभिप्राय है, संषोधन अथवा उत्तम करने का कार्य। सम् माने ठीक प्रकार से और कृति यानी करना। इसीलिए कहें, संस्कृति कोई भी बुरी नहीं होती। भले वह पाष्चात्य हो या फिर भारतीय। पर इधर देष में आर्थिक उदारीकरण के बाद उपभोक्तावाद का नया दौर प्रारंभ हुआ, उसने जैसे संस्कृति को भी बाजारीकरण के मोल से जोड़ दिया है। मुझे लगता है, अब सब कुछ जो हमारे इस संसार में सुन्दर है वह सौन्दर्य के भाव से नहीं बल्कि मूल्य से आंका जाने लगा है। कला, साहित्य और संस्कृति भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। देषभर में कलाकृतियों का बाजार बन गया है। ऐसे लोग जिन्हें कला का क ख ग भी नहीं पता, वह कला आयोजनों के प्रमुख और कला पारखी बन गए हैं। कलाकृतियां  आनन्दानुभूति की बजाय बाजार विक्रय की वस्तु जो हो गई है। यही हाल संगीत और नृत्य कलाओं का भी हुआ। संगीत, नृत्य की प्रस्तुतियों में पोषाक और तड़क-भड़क के साथ कोरियोग्राफी में चमक-दम के नूतन का अधुनातन रचा जाने लगा। संगीत में रागदारी और नृत्य में थिरकन का लोप हो गया।  प्रस्तुतियों में उन्हीं की भागीदारी अधिक होने लगी है जो रंजन की बजाय मूल्यों के भंजन में अधिक विष्वास रखते हैं। 
कला में बाजार का आलम यह हो गया है कि निजी कलादीर्घाएं ही नहीं मध्यमवर्ग का एक तबका भी इसीलिए सोने और चांदी की कीमती धातुओं की तरह ही कलाकृतियांे को अपने घर का हिस्सा बनाने लगा है। यह सोचकर कि अभी खरीद  लेते हैं और जब फलां कलाकार की कलाकृतियां का मूल्य बढ़ेगा या वह इस संसार में नहीं रहेगा तो उसे बेच देंगे। माने कला भी निवेष की वस्तु ओ गई। इसका कलाकारों को लाभ भी हुआ। कुछेक कलाकारों को उनकी कला के अच्छे-खासे दाम मिलने लग गए। रातों-रात गरीबी से अमरी के ठाठ में भी बहुत से कलाकार आ गए परन्तु जो बाजार से जुड़ न सके, उसकी समझ को भुना न सके वे फिर भी हासिए पर ही रहे। हां, इस सबका एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि कलाएं आम जन से धीरे-धीरे दूर होती चली गई हैं। या कहें अभिजात्य होती जन सरोकारों से उनकी दूरी हो गई है। 
कहने को लिटरेरी फेस्टिवल, आर्ट समिट जैसे आयोजनों की शुरूआत इसीलिए हुई है कि इनके जरिए साहित्य और कलाओं में लोगों की अधिकाधिक भागीदारी की जा सके परन्तु यह आयोजन भी बाजार पोषित व्यवस्था के हिस्से बन कर ही रह गए हैं। जयपुर में लिटरेरि फेस्टिवल प्रारंभ होने के दो-एक बरस तक तो ठीक-ठाक रहा परन्तु शनैःषनैः वह भी व्यावसायिकता का षिकार हो गया। उत्सव में हिंदी और राजस्थानी तथा दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों की उपस्थिति होती है परन्तु उनसे अधिक शोर और प्रचार अंग्रेजीदां उन लेखकांे को मिलता है, जिन्हें बाजार या कहें उनके प्रकाषक अधिक बिक्री के लिए पोषित करता है। यही हाल आर्ट समिट जैसे आयोजनों का है। वहां देषज कलाकारों की कला की कोई पूछ नहीं है जबकि लोक कलाओं का सहारा अपने संस्थापन में लेने वाले बडे़ बाजार पोषित कलाकारों की चांदी है। ऐसे में कुछ लोगों के पास अपनी कला की बजाय अपने आपको दिखाने का सिगूफा ही बचा रह जाता है। ऐसे आयोजनों की मीडिया कवरेज देखेंगे तो यह भी पाएंगे कि वहां कला की सूक्ष्म सूझ की बजाय अपने आपको प्रदर्षित करने वालों को ही अधिक स्थान मिलता है। संस्थापन के नाम पर चाहे जो करने वाले या फिर अष्लीलता को प्रचार हथकंडा मान परोसने वालों को मीडिया भी तव्वजो अधिक देता है। इसीलिए कलाकृतियों में रंग, तान और रेखाओं की बजाय अपने आपको रंगने वाले, गुलाल बिखेरकर चाहे जैसे उसे अपने तई व्याख्यायित करने वालों को अधिक प्रचार मिल जाता है।  माने जो कला का प्राकृतिक सहज सौन्दर्य है, उसकी बजाय चमक-दमक ही इस समय प्रमुख हो गयी है। 
बहरहाल, एक समय था जब गान में गायक और वादक श्रोता के राग-अनुराग की सोचते हुए अपने को साधते थे। प्रस्तुति से पहले रियाज पर ध्यान दिया जाता था परन्तु अब स्थितियां बदल गई है। अब आप किसी संगीत सभा मंे जाएंगे तो पाएंगे कलाकार महोदय प्रस्तुति से पहले तबले की थाप और यंत्रचलित तानपुरे की ध्वनि पर खांसने के अभ्यास को ही अपने ध्यानाकर्षण का जरिया बनाए हुए हैं। बाद की उनकी प्रस्तुति में भी स्वयं की बजाय सह गायक-गायिकाएं आलापते हैं। भीड़ भी इस बात पर जुटती है कि कलाकार के साथ चमक-दमक कितनी है। याद है, भारत भवन, भोपाल में एक व्याखान के लिए जाना हुआ था। जिस होटल में ठहराया गया था वहीं एक नामी-गिरामी अपने ही शहर के वादक भी ठहरे हुए थे। उनकी भी प्रस्तुति थी परन्तु उससे पहले उन्होंने अपने बालों को रंगा, मैकअप किया और आपको प्रस्तुति की स्टाईलिष पोषाक में फीट करने में कोई तीन-चार घंटे लगाए। गोया कलाकार की बजाय उसके लटके-झटके और उसका ताम-झाम ही प्रधान हो गया है। नृत्य के साथ भी यही हो रहा है। वहां थिरकन और भाव-भंगिमाओं की सहज प्रस्तुति की बजाय कोरियोग्राफी की सज्जा प्रधान हो रही है। वह समय बीत गया जब साधारण सी पोषाक पहने, बीड़ी पीने के बाद उस्ताद बिस्मिला खां की शहनाई बजने लगती तो लोग उनके वादन से विभोर हो पूरी-पूरी रात उन्हें सुनते। उनकी शहनाई मन को सुकून देती लोगों के दिलों पर छा जाती। 
पर समय का सच यही है कि हर चमकने वाली चीज हीरा है। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। परिवार में एक शादी समारोह में जाना हुआ था। देखा, बहुत से निकट के परिजनों ने बाकायदा कोरियोग्राफर से फिल्मों में किए जाने वाले नृत्य के लटके-झटके सीखे हुए थे। पत्नी ने टोकते हुए कहा, आप न तो सीखते हो न हमें सीखाने का कोई जतन करते हो। मैंने त्वरित कहा, किसने कहां मुझे नृत्य नहीं आता। मैं भी नाच सकता हूं। सबके आग्रह पर मैंने भी अपनी चमकदार प्रस्तुति दी। मैंने कुछ नहीं किया। हाथ और पैरों की नृत्य से जुड़ी भंगिमाएं कुछ इस तरह से कर स्थिर खड़ा हो गया जिससे छायाकार मेरी उन भंगिमाओं की भिन्न कोणों से छवियां ले सकें। भौचक्के होते मेरे परिजनों ने कहा, यह कौनसा नृत्य हुआ! मैंने तुरंत कहा, यह ‘फोटोग्राफी डांस’ है। सच ही था, तमाम दूसरों से मेरा वह नृत्य भारी था। जब छायाचित्रों का आस्वाद कैमरे से किया गया तो उसमें  भरत नाट्यम, कथक, कथकली और फिल्मों में होने वाले तमाम नृत्यों के मेरे ऐसे दृष्य थे जिनसे कोई कह नहीं सकता कि मैं नृत्य नहीं जानता। संगीत, नृत्य और चित्रकला का आज का सच क्या यही नहीं है! प्रस्तुतियां भले मन को रंजित नहीं करे, उनकी छाया-छवियां तो मन को भाती ही है। 

Monday, December 12, 2016

नर्मदा सौन्दर्य के अविराम चितराम

अमृत लाल वेगड़जी नर्मदा के अनथक पदयात्री तो हैं पर रेखाओं की लय में वह दृश्य संवेदनाओं का भी मोहक भव रचते हैं। नर्मदा की उनकी पदयात्रा को उनके शब्दों से ही नहीं बांचा जा सकता, रेखाओं में उकेरे उजास से भी अनुभूत किया जा सकता है। उनकी पेपर कोलाज कलाकृतियां भी नर्मदा के तीरे ले जाती अदभुत रंग लोक से साक्षात् कराती है। नर्मदा यात्रा और उनके कलाकर्म पर 'नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो!' पर यह आलेख ...

मध्यप्रदेष की जीवनरेखा है-नर्मदा नदी। विष्व की वह प्राचीनतम और एकमात्र नदी जिसकी परिक्रमा की जाती है। कहते हैं, जब हिमालय नहीं था, गंगा-यमुना का मैदान नहीं था, नर्मदा तब भी थी। सौन्दर्य की नदी नर्मदा! तपोभूमि नर्मदा! मध्यप्रदेष और गुजरात को मिला प्रकृति का वरदान नर्मदा! 
नर्मदा के अनथक यात्री हैं-अमृतलाल वेगड़। नर्मदा उनके लिए नदी नहीं संस्कृति है। याद है, बचपन में उनकी नर्मदा नदी के यात्रावृतान्त को पढ़ा था। जे़हन में बरसों वह बसा रहा। बाद में तो वेगड़जी की नर्मदा परिक्रमा की त्रयी ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’, ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ और ‘अमृतस्य नर्मदा’ को पढ़ा तो लगा नर्मदा उनके भीतर निरंतर घटती रही है। पर इधर उनकी एक बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाषित हुई है, ‘नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो’। सच! यह वेगड़जी द्वारा नर्मदा सौन्दर्य की भरी गागर है। ऐसी जिसमें नर्मदा के सौन्दर्य का सागर पूरी तरह से समाया हुआ है। 
अमृतलाल वेगड़ इस समय के अद्भुत कलाकार हैं। देष की नदियों में पांचवी सबसे बड़ी नर्मदा 1312 किलोमीटर लंबी है। देष की दूसरी तमाम नदियां पष्चिम से पूर्व की ओर बहती बंगाल की खाड़ी में मिलती है, पर नर्मदा पूर्व से पष्चिम की ओर बहती खंभात की खाड़ी में मिलती है। वर्ष 1977 से इस पवित्र नदी की पदयात्रा का सिलसिला वेगड़जी ने प्रारंभ किया था और तभी से उनके भीतर के कलाकार ने रेखाओं और रंगों में यात्रा अनुभूतियों, स्मृतियां, अंतर्मन संवेदनाओं के साथ ही  विभिन्न रंगीन छपे कागजों की कतरनों के नर्मदा के कोलाज भी बनाने प्रारंभ कर दिए थे। नर्मदा के सौन्दर्य की ठौड़-ठौड़ व्यंजना करते वेगड़जी ने इस नदी की संस्कृति को गहरे से जिया है। पर मन की प्यास देखिए, 4 हजार किलोमीटर की नर्मदा पद परिकमा के बाद भी वह ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ में लिखते हैं, ‘कोई वादक बजाने से पहले देर तक अपने साज का सुर मिलाता है, उसी प्रकार इस जनम में तो हम नर्मदा परिक्रमा का सुर ही मिलाते रहे। परिक्रमा तो अगले जनम से करेंगे।’
नर्मदा के अनथक यात्री अमृतलाल वेगड़ ने इस नदी से विष्वभर के लोगों को अपने लिखे और कलाकर्म से साक्षात् कराया है। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ में वेगड़जी लिखते हैं, ‘यात्रा पर निकलते समय हर बार कहता-नर्मदा! तुम संुदर हो, अत्यन्त सुन्दर। अपने सौन्दर्य का थोड़ा-सा प्रसाद मुझे दो ताकि मैं उसे दूसरों तक पहुंचा सकूं। और नर्मदा ने मुझे कभी निराष नहीं किया। हर बार मेरी झोली छलका दी। मैंने अपने जीवन के उत्कृष्ट क्षण नर्मदा-तट पर बिताए हैं। परिक्रमा के दौरान मैंने कितने पहाड़ देखे, कितनी नदियां पार कीं, टूटी-फूटी धर्मषालाओं में रात रहा, ठंड में ठिठुरा, गरमी में झुलसा। खूबसूरत लेकिन कठिन पगडंडियों पर चला। खुला आकाष, हरियाली से लहलहाते खेत, सुरम्य प्रभात, जाने क्या-क्या देखा। कितने सुहाने थे वे दिन-एक से बढ़कर एक!’
वेगड़जी की सद्य प्रकाषित कृति ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ का आस्वाद करते उनके इस कहे साक्षात् भी होता है। इसमें थोड़े शब्द हैं, चित्र और रेखांकन अधिक। नर्मदा तट पर तपस्या करके उसे तपोभूमि बनाने वाले ऋषियों के साथ सुदूर केरल से आकर नर्मदातट पर विद्याध्ययन करने और अत्यन्त मधुर नर्मदाष्टक लिखने वाले आदि शंकाराचार्य को निवेदित इस कृति में ‘एक नदी की सौंदर्ययात्रा’ में वेगड़जी ने शांतिनिकेतन में हुई अपनी षिक्षा-दिक्षा के साथ ही प्रकृति के सौन्दर्य को देखने की दृष्टि देने वाले आचार्य नन्दलाल वसु को षिद्दत से याद किया है। वह लिखते हैं, ‘जब पढ़ाई पूरी करके घर आने लगा तो गुरू के आषीर्वाद लेने गया। चरणस्पर्ष करके बैठा तो उन्होंने कहा, ‘बेटा, जीवन में सफल मत होना, अपना जीवन सार्थक करना।’ वेगड़जी ने यही किया। नर्मदा की परिक्रमा में अपने जीवन की सार्थकता देखते उन्होंने एक साथ नहीं, रूक-रूक कर, खंडो में नर्मदा की यात्रा की। उनके समस्त सृजन का आधार बाद में यही नर्मदा बनी। वह लिखते हैं, ‘नर्मदा ने मेरी कला को नया आयाम दिया। मेरी प्रथम परिक्रमा के समय नर्मदा तट का एक भी गांव डूबा नहीं था। नर्मदा बहुत कुछ वैसी ही थी जैसी सैंकड़ो वर्ष पर्वे थी। मुझे इस बात का संतोष रहेगा कि नर्मदा के उस विलुप्त होते सौंदर्य को मैंने सदा के लिए इन पृष्ठों पर संजोकर रख दिया।’
यह सच है। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ इस दीठ से अपूर्व है। नर्मदा के सौन्दर्य चितराम ही इसमें पन्ने दर पन्ने मंडे हैं। रेखाओं के उजास में इसमें वेगड़जी के नदी मे ंस्नान करती, घाट पर कपड़े बदलती स्त्रियों के मनोरम स्केच हैं। गांव की संस्कृति, वहां के लोगों की बतकही, आस्था के सींचन को ठौड़-ठौड़ उद्घाटित करते नर्मदा से जुड़े जीवन को उन्होंने इसमें अपने कलाकर्म से जैसे जीवंत किया है। और सबसे महत्वपूर्ण यह भी है कि इसमे उनके वह पेपर कोलाज हैं, जिनमे नर्मदा का सौन्दर्य झिलमिलाता हमें उसके होने का जीवंत अहसास कराता है।
वेगड़जी विभिन्न रंगीन छपे कागजों की कतरनों से कोलाज बनाते हैं। आरंभ में सपाट पोस्टर पेपर से उन्होंने कोलाज बनाए परन्तु बाद में ‘नेषनल ज्योग्राफिक’ पत्रिका के रंगीन पृष्ठ ही उनके रंग और रेखाएं होते चले गए। ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ के पन्ने उनके इन्हीं पेपर कोलाज की सुरम्यता से लबरेज हैं। अचरज होता है! कैसे छाया-प्रकाष, जल के सूर्य से बदलते रंगों और जीवन से जुड़े सरोकारों की रंग धर्मिता को कैसे वेगड़जी ने कागजों से निर्मित अपनी कला में जीवंत किया है। लगता है, नर्मदा ने उनका इसमें निरंतर साथ दिया है। यह है तभी तो उनके रंगीन पेपर कोलाज में नर्मदा से जुड़ा जीवन गहरे से उद्घाटित होता देखने वाले के मन में जैसे हमेषा के लिए बस जाता है। एक पेपर कोलाज है, पेड़ की छांव उकेरता। मिट्टी और झांकते पेड़ के पत्तों और जमीन पर सूखे बिखरे पत्तों का परिवेष जैसे पूरी तरह से उद्घाटित हो गया है। छांव को पार कर वहां से गुजरते लोगों का पुस्तक का यह अद्भुत चितराम है। ऐसे ही ‘अमरकंटक से यात्रा शुरू’ पेपर कोलाज भी अद्भुत है। इसमें यात्रा की तैयारी की अनुभूति भर नहीं है बल्कि नर्मदा से जुड़ा वह परिवेष भी है जिसमें अभी भी कलाकार का मन बसा है। ‘नमामि देवी नर्मदे’ का स्त्री रेखांकन और बाद में नर्मदा पर दीप दान करती स्त्रियों के चित्र भी रंग-रेखाओं का अद्भुत लोक रचते हैं। ‘अमरकंटक के तीर्थयात्री’ पेपर कोलाज में यात्रा से जुड़े मन की सुमधुर व्यंजना है। और ‘कपिलधारा अमरकंटक’ कोलाज तो अद्भुत है। तेजी से बहते झरने के पानी का श्वेतपन और आस-पास का रंगाकन माधुर्य की सीमा को भी पार करता है। वेगड़जी के पेपर कोलाज की यही विषेषता है। वह अपने इस कलाकर्म में समय को जैसे व्यंजित करते संस्कृति का उसमें छांेक लगाते हैं। ‘नगारावादक’, ‘एक कन्या’, ‘बैगा महिला’, ‘रात में घाट’, एकांत स्नान, ‘विश्राम’, ‘दही मथती नारी’, ‘वानरलीला’, ‘एक शांत पहाड़ी गांव’, आदि बहुतेरे कोलाज ऐसे ही पुस्तक में हैं जो नर्मदा नदी की उनकी यात्रा की जीवंत गवाही सरीखे है। और वह चित्र तो अद्भुत है जिसमें नर्मदा को पैदल पार करते दंपति को उकेरा गया है। पेपर में अपना झोला उठाए दंपति की इस नर्मदा यात्रा के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है। वेगड़जी के पास वह दृष्टि है जिसमे ंवह स्थानों को उसके भुगोल में ही नहीं वहां के संस्कार, संस्कृति में देखने वालों को बंचवाते हैं। पुस्तक में उनके रेखांकन की लय और निहित बारीकी में भी मन अटक अटक जाता है। ‘ओंकारेष्वर’ का रेखा चित्र ऐसा ही है। टापू पर स्थित ओंकारेष्वर को उसकी पूर्णता में उकेरते वह उससे जुड़े परिवेष को इसमें गहरे से व्यंजित करते हैं। यह सच है! प्रकृति को देखने की उनकी कला दृष्टि अपूर्व है। इस कला दृष्टि से उपजे उनके पेपर कोलाज, रेखांकनों पर पन्ने दर पन्ने लिखे जा सकते हैं फिर भी जो कुछ लिखा जाएगा, वह कम ही लगेगा।
बहरहाल, नर्मदा के अनथक यात्री अमृतलाल वेगड़ की कृति ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ का आस्वाद करते मन नहीं भरता। मुझे लगता है, हिन्दी में अपने तरह की यह विरल कृति है। यहां यात्रा के सौन्दर्य का शब्द गान है, रेखाओं का आकाष भर उजास है और है, वह रंगीन चित्रकृतियां जिससे नर्मदा के सौन्दर्य का घूंट घूंट पान किया जा सकता है। नर्मदा को उसकी समग्रता में, दिखाती-बंचाती ‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ कला जगत को अमृतलाल वेगड़ का अप्रतीम उपहार है। नर्मदा के सौन्दर्य का वेगड़जी का शब्द कहन देखें, ‘नर्मदा सौन्दर्य की नदी है। वह चलती है उछलती कूदती, बलखाती, चट्टानों को तराषती, पहाड़ों में मार्ग तलाषती, डग-डग पर सौन्दर्य की सृष्टि करती, पग-पग पर सुषमा बिखेरती।’ मुझे लगता है, उनकी कृति में इस शब्द कहन का चित्र सच है।
अमृतलाल वेगड़ इस समय 87 वर्ष के हैं। नर्मदा की 400 किलोमीटर की पद परिक्रमा उन्होंने की। सहधर्मिणी कान्ता भी 2002 में उनके 75 वें वर्ष में प्रवेष के समय 1250 मिलोमीटर साथ चली। नर्मदा को अपनी पदयात्राओं और कलाकर्म में उन्होंने गहरे से जिया है। ‘नर्मदा तुम कितनी  सुन्दर हो’ कृति में नर्मदा, उसके मोड़, घाट, नदी को पार करते ग्रामीणों, बैगा, गोंड, भील, आग तापते ग्रामीण, ग्रामीण गायक, पडे-पुरोहित, नाई, चक्की पीसती या मूसल चलाती महिलाएं और तमाम नर्मदा यात्रा का परिवेष रेखांकनों और पेपर कोलाज में जैसे हमसे बतियाता है। सौन्दर्य के अविराम चितराम है उनकी यह कृति। बावजूद इसके वेगड़जी इसमें लिखते हैं, ‘नर्मदा के राषि-राषि सौन्दर्य में से अंजुरी भर सौंदर्य ही लरा सका हूं। कोई असीम को कैसे समेट सकता है? इसलिए जो लाया हूंू वह ‘चिड़ी का चोंच भर पानी’ ही है।...‘नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’ की यह व्यंजना गुदगुदा रही है। यह सब लिख दिया है पर मैं फिर से इस कलाकृतिनुमा पुस्तक के पन्ने पलटने लगा हूं। सौन्दर्य का घूंट घूंट आस्वाद कर रहा हूं, करता रहंूगा। अवसर मिले तो आप भी करियेगा।

Saturday, November 19, 2016

सांगीतिक भाव-भाषा का वृहद ग्रंथ ‘लता सुर-गाथा’


यतीन्द्र मिश्र के पास संगीत की सूक्ष्म सूझ और उसे शब्दों में पिराने की मौलिक दीठ है। संगीत पर लिखे का उनका अपना मुहावरा है। ऐसा जिसमें अंतर्मन संवेदनाओं की लय में वह पढ़े-सुने को गुनते हैं या कहें उसका एक तरह से स्मृति छंद रचते हैं। लता मंगेशकर  के गायन और उनसे हुए संवाद के जरिए उनके जीवन में रमते-बसते इधर उन्होंने सांगीतिक भाव-भाषा का वृहद ग्रंथ "लता सुर—गाथा"  सृजित किया है। लता के गान से जुड़ी अनुभूतियों , उनसे हुए संवाद के साथ ही संगीत की यतीन्द्र की विरल दीठ का एक तरह से यह सौन्दर्यान्वेषण है।
संगीत व सिनेमा अध्येता यतीन्द्र मिश्र ने इस पुस्तक में जीतेजी किवदन्ती बन चुकी महान भारतीय पाष्र्वगायिका लता मंगेषकर की सांगीतिक यात्रा को ही नहीं संजोया है बल्कि एक महान गायिका के भीतर छूपे संवेदन मन की अनजानी परतों को बहुत से स्तरों पर खोला है। लता के गायन और उनके जीवन पर इतना अधिक लिखा जाता रहा है, कि बहुधा वह लिखा दोहराव का षिकार हो गया है। वही बातें, वही सब कुछ जो दूसरों ने लता पर कहा है, से ही पाठक प्रायः रू-ब-रू होते हैं पर ‘लता सुर-गाथा’ इस मायने में भिन्न है। इसमें लता की गायिकी की बारीकियों का सूक्ष्म ब्योरा ही नहीं है बल्कि लता से हुए संवाद के जरिए प्रामाणिकता के अनछूए समय संदर्भों का ताना-बाना भी है। लता के गीतों को सुनते सृजित यतीन्द्र की भाव-भाषा की रूप-सृष्टि यहां है। मुझे लगता है, ‘लता सुर-गाथा’ लता के गान का शब्द में पिरोया स्मृति तीर्थ है। 
यतीन्द्र ने इस पुस्तक में लता मंगेषकर के गायन के साथ ही उनके जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं के आधार पर उनके सदाबहार होने, उनकी महानता को इस पुस्तक में ठौड़-ठौड़ अपने सांगीतिक शब्द राग में संजोया है। सूक्ष्म सूझ से लता के जीवन से जुड़े पहलुओं पर विचारते यतीन्द्र ने पुस्तक में लता के गीतों मे सुरों के अर्थ पर विचार किया है तो उनकी सुर-यात्रा के बहुत से अनछूए हिस्सों को भी वह पाठकों के समक्ष पहली बार लेकर आए हैं। मसलन इस पुस्तक से ही पता चलता है कि रेडियो के लिए लता पहली बार अपने पिता का हाथ पकड़कर गाने के लिए पहुंची थी, यह भी कि उन्होंने पहला जो राग सीखा वह पूरिया धनाश्री था, यह भी कि पहले उनके पिता ने नाम हृदया रखा जो बाद में लता हो गया और यह भी कि गाने से पहले 5 वर्ष तक लता ने फिल्मों में अदाकारा का सफरनामा तय किया और यह भी कि कभी ‘आनन्दघन’ के नाम से मराठी फिल्मों मे ंलता ने संगीत निर्देषन का कार्य भी किया था। पुस्तक में लता के प्रिय भूपाली और मालकोंस राग की की संवाद चर्चा के साथ ही रियाज के लिए सबसे अच्छी राग पहाड़ी को भी गुना और बुना गया है। यूसुफ यानी दिलीप कुमार द्वारा यह कहे जाने पर कि मराठी लोगों के मुंह से तो दाल-भात की महक आती है, वह उर्दू का बघार क्या जानें?’ को सुनकर लता द्वारा गालिब, मीर, मोकिन, जौक, सौदा और दाग़ जैसे शायरों को पढ़ने और बाकायदा मौलवी उस्ताद महबूब से उर्दू सीखने की रोचक दास्तां भी पुस्तक में है तो यतीन्द्र के एक प्रष्न के जवाब में मोक्ष और संगीत में से किसी एक को चुनने पर लता संगीत को चुनती है। यह कहते हुए कि मेरा संगीत ही मुझे अन्ततः जन्म-मृत्यु के खेल से मुक्त करेगा।’ 
‘लता सुर-गाथा’ के आरंभ के 200 पन्ने लता के जीवन और गान पर केन्द्रित यतीन्द्र की विवेचना के हैं। यतीन्द्र ने इन पन्नों में लता के गायन को रूपकों के जरिए सुमधुर शब्द लय में अंवेरा है। पढ़ते यह अहसास भी होता है कि उनकी भाषा पाठक को अंतर से प्रकाषित करती है। वह लिखते हैं, ‘लता ने अपनी सांगीतिक यात्रा में इत्रफरोष का कार्य किया है।’ लता के गाए गीतों के सांगीतिक सूत्रों की तलाष करते पुस्तक में उनकी आवाज के बड़े दायरे के साथ वाद्य के प्रभाव में विकसित होती उनकी गायिकी के स्वरूप को गहरे से गुना और बुना गया है। यतीन्द्र लता के गान में कभी रागों के शुद्ध चेहरे को देखते हैं तो कभी रागों की स्वरावलियों पर जाते उनके उच्चतम स्तरों पर जाते आरोह-अवरोह के सुरीले उतार-चढ़ावों में आम जन की स्वीकृति को भी अनुभूत करते उसे पाठकों से साझा करते हैं।
Daily Navjyoti
‘लता सुर-गाथा’ को पढ़ते हुए यह अहसास भी बारम्बार होता है कि यतीन्द्र मिश्र ने इसमें रूपकों में अपनी भाषा के घर को एक तरह से आबाद किया है। उनकी शब्द व्यंजना देखें, ‘वे एक ही बार में तमाम ऐसे सीमान्तों तक जाकर लौट आती हैं, लगता है जैसे वामन की तरह अपने एक डग से ही पूरी पृथ्वी को नाप लेना चाहती हों।’ इसी तरह एक स्थान पर वह लिखते हैं, ‘अपने सुरीले संसार में एक साथ कईं धु्रवान्तों पर सक्रिय और समय के पा चली जाने वाली जिजीविषा के साथ जगमगाती हुई है लता।’ 
यतीन्द्र पुस्तक में लता के गायन की खूबियों के सूक्ष्म ब्योरों में भी बहुतेरी बार ले जाते हैं। ऐसा करते वह उनकी गायन खूबियों के साथ चहलकदमी करते सितार की हरकतों, जमजमों और मींड़ों का काम देखने के लिए उनके ढ़ेरों गंीतों की याद दिलाते हैं तो लता के सुरों को कथन के बोल व पढ़त से जोड़ते उनके गान की नृत्य भाषा से भी साक्षात् कराते हैं। ‘झनक झनक पायल बाजे’ के बहाने लता रची रागमाला के बारामासा षिल्प को भी उन्होंने इस पुस्तक में अपने तई गहरे से गुना और बुना है। लता के गायन के बारे में चर्चा करते एक जगह वह लिखते हैं, ‘अपनी आवाज को वह तीनों सप्तकों में घुमा सकती है। वे अति मन्द्र से लेकर अति तार तक की यात्रा में इतनी सहजता से कुछ ही क्षणों में गमन कर सकती है, जो उनके कौषील के लिहाज से एक आसान बात ही है। इसके पीछे कुछ तो उनके रियाज का कड़ा अनुषासन दिखता है, तो कहीं यह बात भी समझ में आती है कि उनके गले पर दैवीय कृपा या प्राकृतिक देन ऐसी अवष्य रही है, जो रेकाॅर्डिंग के व्याकरण पर अक्षरषः सटीक ढंग से उभरती है।’
यह सही है, लता का गायन सर्वथा अलहदा है। उसे किसी सीमाओं से नहीं बांधा जा सकता। इसीलिए यतीन्द्र ने इस पुस्तक में उनके गाने के अलहदेपन को ही बंया नहीं किया है बल्कि संगीत की अपनी सूक्ष्म सूझ से उनके गान में अपने तई गुने सांगीतिक अनुभवों की मिठास को भी घोला है। वह लता की गायकी की विषेषताओं की चर्चा करते इस पुस्तक में सिनेमा की अत्यन्त मुखर दुनिया से अलग उनकी आवाज के मौन और एकांत अर्जन को भी खासतौर से रेखांकित करते हैं। पढ़ते हुए जेहन में यह भी आता है कि ‘लता सुर-गाथा’ लता के गायन और जीवन पर गहन शोध, संवाद भर ही नहीं है बल्कि  यह लता की गायिकी से जुड़े द्वैत और अद्वैत के साथ ही शास्त्रीय रागों के आलोक में भाषा का विरल सांस्कृतिक पाठ है।
यतीन्द्र ने सही ही लिखा है कि लता मंगेषकर का जीवन और गायन महाकाव्यात्मक सी लगती महान संगीत यात्रा है। वह लिखते हैं, ‘...वे (लता) अपनी गायिकी के वजूद की बरगद सी सदाषांत छाया के नीचे इतने तरीके का हुनर संजोए हुए हैं, लगता है जेसै किसी बड़ी रंगोली पर चारों दिषाओं की तरफ़ छितराकर छोटे-छोटे कईं मणि दीप जलाए गये हों।’ एक स्थान पर लता के गाए मीरा भजनों की चर्चा करते हुए यतीन्द्र ने लता की गायिकी को मीरा के जीवन से भी जोड़ा है। वह लिखते हैं कि उनका गायन परम्परा से विद्रोह और पुनः उसके साथ संतुलन है। इसी में वह लता के गायन की  स्वयं की दुनिया बनते देखते हैं तो उनके गाए हुए मीरा भजनों में लौकिक और अलौकिक की लुका-छिपी को भी उदाहरणों के जरिए बेहद सहज ढंग से रूपायित करते है। वह लिखते हैं, ‘लता अपने कण्ठ से भक्ति का उतना ही बड़ा अछोर बनाती हैं, जितना कि स्वयं वह कृष्णाभिमुख सन्त गायिका।’
पुस्तक में लता के संगीत की अप्रतिम यात्रा से प्रारंभ बातचीत को यतीन्द्र मिश्र ने 350 के करीब पन्नों में समेटा है। टूकड़ों टूकड़ों में लता से हुआ यह संवाद कोई 6 वर्षों तक चला। लता के गायन के विभिन्न पहलुओं के साथ ही यतीन्द्र ने उनके साथ के गायक-गायिकाओं, उनके जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं और उनके समकाल को गहरे से छूने का प्रयास किया है। यह सच है, सुरों की 640 पृष्ठ की यह वृहद गाथा एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें भारत रत्न लता मंगेषकर की सुर यात्रा के अद्भुत सांगीतिक संसार को शब्दों के जरिए पाठकों के समक्ष एक तरह से जीवंत किया गया है। पुस्तक नहीं यह लता के गाए गीतों के आलोक में रचा यतीन्द्र मिश्र का ऐसा स्मृति छन्द है जिसमें भारत की महान गायिका के जीवन और सृजन का सौन्दर्यान्वेषण किया गया है।
पुस्तक :   लता सुर-गाथा
लेखक :   यतीन्द्र मिश्र
प्रकाषक :  वाणी प्रकाषन, नई दिल्ली - 110002
मूल्य :     695 रू. मात्र, पृष्ठ 640

Thursday, October 27, 2016

अनुभूतियों का ‘रंग अध्यात्म’


अनिल गायकवाड़ की कलाकृति 

तमाम हमारी कलाएं सौन्दर्य का अन्वेषण हैं। दृष्य की संवेदना और अदृष्य के मर्म की तलाष। कहें, मन के भीतर नया कुछ रचने, गढ़ने की अकुलाहट। पर सौंदर्य का प्रकाष तभी है जब अंतर में उजास हो।...और अंतर का उजास भी तभी है जब, कलाओं का हममें वास हो। इसीलिए तो कहें, कलाओं से ही है यह जीवन। कलाकृतियां अपने रूप सौन्दर्य से आकृष्ट ही नहीं करती, सहज मन में अवर्णनीय उमंग भी अनुभूत कराती है।

 चित्रकला की ही बात करूं तो वहां रंग, रंखाएं, टैक्सचर और स्थापत्य मिलकर बिंब और रूपक रचते हैं। अंतर्मन की वेदना, द्वन्द और त्रासदियों से मुक्त करने का मार्ग ही कलाएं नहीं है बल्कि बहुत से स्तरों पर मन के रीतेपन को हर हमें संपन्न भी करती है।

बहरहाल, यह महज संयोग ही नहीं है कि ‘रंग अध्यात्म’ में सम्मिलित कलाकृतियों में रंगो में बरती भाषा, कहन और रेखाओं से सृजित आकाष में एक खास तरह की सांगीतिक संगत है। यहां अनुभूतियों स्मृतियों की संवेदना दीठ है तो सौन्दर्य की अर्थ बहुल ध्वनियां भी हैं। चित्रों की बहुरंगी कलादृष्टि में किसी एक शैली विषेष का जड़त्व नहीं होकर परम्परा में समकालीनता का एक तरह से घोल है। 

श्याम सुन्दर शर्मा की कलाकृतियां अतीत और वर्तमान को पुनर्नवा करती रेखाओं का ‘रंग-अध्यात्म’ है। परम्परा में रंगो का विचार स्थापत्य यहां है तो सामयिकता के अर्थगर्भित संदर्भ भी इनमें हैं। रेखाओ की जकड़न से मुक्त, फलक पर विलग होते हल्के-गहरे रंगों में अंतर्मन अनुभूतियों का आकाष उनके चित्रो में हैं। कैलीग्राफी में वह पुराण ग्रंथों, चीजों को अपने तई परोटते रंगो का एक तरह से छन्द रचते हैं। इन चित्रो में कहीं अंधेरे-उजाले में उभरती छायाओं के बहाने दृष्य का अदृष्य और अदृष्य का दृष्य रूपान्तरण भी हैं। आंतरिक जगत की व्यंजना में रंगो के उजास, एक खास तरह की लय में उनकी कलाकृतियां दार्षनिक गहराईयों में ले जाती गहरे ध्यान के लिए प्रेरित करती है। मुझे लगता है, यही इन कलाकृतियों की बड़ी विषेषता है कि इन्हें देखते मन संस्कारित होता है।
श्याम शर्मा की कलाकृति 

अनील गायकवाड़ प्रकृति को अपने तई रंगो में रूपान्तरित करते हैं। उनकी कलाकृतियां का अपना मुहावरा है। इस मुहावरे में रंगो का जैसे ‘स्मृति छंद’ रचा गया है। फलक पर विलग होते रंगाकार और उनमें व्यंजित खेत-खलिहान की उर्वरता। परिवेष का मर्म। रंग दर रंग परतें। कहीं कोई ठहराव नहीं...रंगो की शास्त्रीय व्यंजना। देखते औचक यह भी लगता है, जो कुछ प्रत्यक्ष दिखता है, वही पूर्ण नहीं है। उससे परे भी चिंतन और अनुभूतियों से जुड़ा बहुत कुछ वहां है। रंगो का द्वैत। कहूं, एकान्त का रंग प्रवाह। अन्तध्र्वनियों में अनुभूतियों का आकाष यहां है। दृष्यालेख सरीखी उनकी कलाकृतियों को देखते औचक यह भी खयाल आता है कि रंगों के बहाने आत्मान्वेषण की उनकी उत्सुकता इनमें व्यंजित हुई है।
सुप्रिया की कलाकृति 

सुप्रिया की कलाकृतियों के केन्द्र में स्त्री आकृतियां हैं पर इनको रूपायित करते वह सामाजिक अवधारणाओं को एक तरह से व्याख्यायित करती है। पाष्र्व रंग छटाओं, अभिप्रायों में रोजमर्रा के जीवन से संवाद सुप्रिया के चित्रों में है तो स्त्री जीवंतता, उसकी अखूट ऊर्जा का सुमधुर अंकन भी। अपने होने के उत्सव का गान इन कलाकृतियो में है तो स्त्री स्वतंत्रता और उसकी अंतर्मन प्रकृति का वैचारिक द्वन्द भी इनमें है। कलाकृतियों में बरते रंग परिवेष से संवाद करते अपने समय के सच को जैसे गहरे से व्यंजित करते हैं। यहां परम्परा का पुनर्निमाण या कहूं पुनर्ननवीकरण है।

गजराज चानन की कलाकृतियां में पारम्परिक मिनिएचर की एप्रोच है। स्त्री-पुरूषों की आकृतियों में रेखाओं की लय और निहित गत्यात्मक प्रवाह है पर आधुनिकता की आहट भी इनमें है। ग्रामीण जीवन की समकालीनता में उनकी कलाकृतियां लोक का उजास लिए है। रेखाओं की सांगीतिक लय यहां है पर मोबाईल से संवाद के बहाने इन कलाकृतियों में समय संवेदना को भी गहरे से जीया गया है।  उनके उकेरे चरित्रों के पाष्र्व परिवेष में मांडणों और दूसरे अलंकारों के साथ लोक कलाओं का एक तरह से उजास है। छवियों की मोहक व्यंजना है उनके चित्र, परिवेष में परिवर्तन की अनुगूंज लिए।

कलाकृति : उत्तम चापते 
उत्तम चापटे की कलाकृतियां से रू-ब-रू होते लगता है, कैनवस पर वह रंग पोतते नहीं बल्कि फैलाते हैं। इसीलिए किसी एक रंग को भी उन्होंने कैनवस पर बरता है तो उसकी बहुलता में अंतर्मन संवेदनाओं का अनूठा भव निर्मित होता वहां प्रतीत होता है। कहूं, अंतराल पर उठती रंग सतहों में दृष्य और मनःस्थितियों का सूक्ष्म अंकन वहां है।  रंगो की सुनहरी दीठ और अनूठा लालित्य यहां है। किसी एक रंग में अपने को व्यंजित करते वह उसके बहुआयामों को उद्घाटित करते हैं। देखने वालो ंको अनुभूतियों का वह जैसे दृष्य पाठ बंचाते हैं। यह करते औचक वह कैनवस पर जैसे कुछ उघाड़ते हैं।
गजराज की कलाकृति 
इस उघड़ेपन में उभरता रंग और उससे जुड़ी संवेदना देखने की हमारी एकरसता को तोड़ती उस क्षण का गुणगान करती है। मुझे लगता है, तमाम कलाकृतियां मूर्त-अमूर्त में शुद्ध रंगो का एक तरह से सांगीतिक गठन है। अनगढ़ भावों की जीवंतता इनमें है। रंगो की चमक इनमें है, पर हरेक कलाकृति की अपनी वह लय भी है जिसे अनुभूत करने के बाद भी मन उसे फिर से देखने-गुनने को संस्कारित होता है। 

सभी में एक खास तरह की गीतात्मकता है, इसीलिए यह तमाम चित्र देखने के समय का ही सच भर नहीं है बल्कि उसके बाद भी अर्थ बहुलता की तलाष को प्रेरित करते कलाओं से हमारा नाता और सघन करते हैं।


Monday, September 12, 2016

उत्सवधर्मिता का आकाश


कलाएं अतीत, वर्तमान और भविष्य को पुनर्नवा करती है। और हां, वैयक्तिक मुझे लगता है, देखने और सुनने का संस्कार भी कहीं ठीक से मिलता है तो वह कलाएं ही हैं। जवाहर कला केन्द्र की कलादीर्घाओं में अक्सर जाना होता है। कुछ समय पहले चतुर्दिक कला दीर्घा में ‘कला चर्चा’ समूह के 26 कलाकारों की कलाकृतियों का आस्वाद सर्वथा नया अनुभव देने वाला था। भिन्न कला माध्यमों में कलाकारों ने जो सिरजा था, उसमें ठौड़-ठौड़ उत्सवधर्मिता को जैसे गहरे से जिया गया था। रंग-रेखाओं में कलाकारों ने प्रकृति को गुना और बुना था। और हां, कैनवस के साथ दूसरे माध्यमों  में भी जीवनानुभूतियों की व्यंजना कलाकरों ने इस प्रदर्षनी में की थी। एक खास बात यह भी नजर आई कि बहुत सी कलाकृतियों में लोक का आलोक था। माने स्थान-विषेष की लोक संस्कृति से जुड़े सरोकारों को भी कलाकारों ने अपने तई इस प्रदर्षनी में अंवेरा था। 
आमतौर पर समूह प्रदर्षनियांे में विषय विविधता के साथ रंग छटाओं की अनुभूतियां मन को रंजित करती बहुत कुछ नया देती है पर प्रायः सोचकर भी कलाकृतियों या कलाकारों पर चाहकर भी लिख नहीं पाता हूं। शायद इसलिए कि किसी कलाकार की कुछेक कलाकृतियों से उसके सृजन को समग्रता में नहीं कूंता जा सकता। पर ‘कला चर्चा’ के कलाकारों के उकेरे चित्रों को देखते बार-बार मन करता रहा कुछ लिखूं...पर चाह की राह कहां! याद आया, कभी सुप्रसिद्ध साहित्यकार विद्यानिवास मिश्रजी को अपना कविता संग्रह ‘झरने लगते हैं शब्द’ भेंट किया था। कुछ समय बाद उनका पत्र आया था जिसमें उन्होंने कुछेक कविताओं पर अपनी राय दी थी पर फिर यह भी लिखा था, ‘कविता घूंट घूंट आस्वाद का विषय है सो कर रहा हूं।’ ‘कला चर्चा’ समूह की कला प्रदर्षनी का आस्वाद करते हुए और बाद में भी कलाकृतियों पर विचारते विद्यानिवासजी के लिखे शब्द ही ज़हन में गूंजते रहे। कलाकृतियां भी घूंट घूंट आस्वाद के लिए ही होती है। ‘कला चर्चा’ के कलाकारों की कलाकृतियों में बरता रंग, परिवेष और रेखाओं की लय अभी भी मन में बसी है। बहुत सी में परिपक्वता की राह भी दिखाई दे रही थी पर महत्वपूर्ण यह भी था कि फूल-पत्तियों, आकृतिमूलकता में सृजन की राह पर आगे बढ़ते कलाकारों में सृजन में नया मुहावरा बनाने की उत्सवधर्मिता हूंस को गहरे से अनुभूत किया। माने तमाम नए कलाकारों ने जो कुछ सिरजा उसमें जीवन से जुड़े सृजन पलों के प्रति आभार झलक रहा था, रंग और रेखाएं जैसे इसकी गवाही दे रही थी।
छायांकन सौजन्य : ललित भारतीय 
बहरहाल, ‘कला चर्चा’ के अंतर्गत कलाकारों ने कैनवस पर भी बहुत कुछ सिरजा था पर कैनवस से परे भी कला का मोहक संसार वहां झिलमिला रहा था। अदिति अग्रवाल ने पक्षियों के छोड़े पंखों पर कल्पनाओं का ताना-बाना बुनते रंग रेखाओं का नया आकाष रचा था तो अजीत कुमार के छायांकन में दृष्य में निहित संवेदनाओं की घट-घट सौरम थी। ममता रोकना के चित्रो में लोक संस्कृति से जुड़ा जीवनानुराग खासतौर से दाय आया तो संजय कांति सेठ के मोबाईल छायाचित्रों में उभरी दृष्यानुभूतियां अभी भी मन मे ंबसी है। तमाम कलाकारों की कला साधना पर जाऊंगा तो न जाने कितने और पन्ने भर जाएंगे, इसलिए इतना ही कि समूह कला प्रदर्षनियो में वैविध्यता के साथ रंग-रेखाओं के राग का सर्वथा नया उजास कलाकारों ने अपने तई रचा था। मुझे लगता है, कलाओं से साक्षात् भी अपनी तरह की साधना है। आपने कोई चित्र देखा है, मूर्ति का आस्वाद किया है, नृत्य की भंगिमाओं को जिया है-तत्काल कुछ भाव मन में आते हैं-उसके प्रति। कुछ समय बाद फिर से आस्वाद करंेगे तो कुछ और सौन्दर्य भाव अलग ढंग से मन में जगेंगे। जितनी बार देखेंगे मन उतना ही मथेगा? ‘कला चर्चा’ की कलाकृतियों के बारे में भी कुछ ऐसा ही भव मन में निर्मित हो रहा है। एक और खास बात इस प्रदर्षनी के चित्रो ंकी साझा की जानी चाहिए कि इसमें संगीत, नृत्य और नाट्य से जुड़ी संवेदनाओं का भी ठौड़-ठौड़ वास था। शायद यही वह कारण था कि चित्रों का आस्वाद करते उत्सवधर्मिता की हमारी संस्कृति के बारे में भी मन बारम्बार जा रहा था।
प्रदर्षनी स्थल पर ही एक रोज वडोदरा के वरिष्ठ कलाकार अजीत वर्मा की सैंड कास्टिंग देखते लगा, वह मिट्टी-कंक्रीट में देखने का सर्वथा नया अनुभव-भव निर्मित करते हैं। उनकी षिल्प दीठ का आस्वाद करते मन रह-रह कर रामकिंकर बैज की कलाकृतियों को भी याद करता रहा। सैंड को दृष्य की अनंत संभावनाओं में रूपान्तरित करते अजीत वर्मा जी जैसे कला के उस आकाष में ले जाते है जहां जीवन को देखने का नजरिया औचक बदल जाता है। ऐसे ही नवल सिंह चैहान के रेखाचित्रों के आस्वाद के वह क्षण भी सुखद थे जिनमें गत्यात्मक प्रवाह की उनकी रेखाओं में परिवेष के साथ उकेरे पोट्रेट्स में चेहरे के भावों को गहरे से जिया गया था। डाॅ. वीरबाला भावसर के सैंड आर्ट डेमो के साथ ही हरिषंकर भालोटिया की कैलिग्राफी का आस्वाद भी तो अब तक कहां भूला हूं।
ऐसे दौर में जब कलाओं पर संवाद गौण प्रायः हो रहा है, यह महत्वपूर्ण है कि ‘कला चर्चा’ समूह ने कलाओ में विमर्ष की राह खोली है। संयोजक द्वय डाॅ. ममता रोकना और ताराचंद शर्मा स्वयं कलाकार हैं, सो उनके आग्रह पर समूह के कलाकारों से अनौपचारिक संवाद जब हुआ तो यह जानकर सुखद लगा कि समूह के देषभर के कलाकारो ंमें नया कुछ रचने की ही नहीं बल्कि कलाओं से जुड़ी अनुभूतियों पर जानने की भी अखूट ललक है। संवाद में कलकारों से कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा षिल्प के साथ ही कलाओं के अंतःसंबंधों पर अपनी अनुभूतियों को साझा करते, कलाकारों द्वारा जिरजे कला आकाष पर जाते यह भी लगा यह कलाएं ही है तो मन को रंजित करती हमें अंदर से संपन्न करती है। ‘कला चर्चा’ कलाकृतियों में नया कुछ रचने की दीठ से ही नहीं कलाओं मंे संवादधर्मिता को भी इसी तरह भविष्य में आगे बढ़ाएगी, इस उम्मीद के साथ...स्वस्तिकामना।


Tuesday, August 30, 2016

छायाचित्रों की कलाधर्मिता में रचा प्रकृति का रंगाकाश


कलाएं मन को रंजित करती है। शायद इसलिए कि वे हमारी संवेदना को चक्षु देती है। यथार्थ को सर्वथा नई दीठ से देने का एक प्रकार से संस्कार भी कलाएं ही देती है। छायांकन की ही बात करें। ब्रितानी सैरा चित्रकार टर्नर ने कैमरे के आविष्कार के समय कहा था कि फोटोग्राफी के आगमन का अर्थ है, कला का अंत। पर कला स्वरूपों की सृजन प्रक्रिया का आज छायांकन प्रमुख आधार है। न्यु मीडिया का तो प्रमुख आधार ही आज फोटोग्राफी ही है।
मुझे लगता है, छायांकन दृष्य संवेदना में अनुभव का सर्वथा नवीन भव निर्मित करती है। संवेदना से उपजी यह वह सर्जना है जिसमें देखने का हमारा ढंग बदल जाता है। दृष्य में निहित बाहरी ही नहीं बल्कि आंतरिक सौन्दर्य की भी दीठ इसमें निहित है। अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में छायाकार महेश स्वामी की छायाचित्र कला की एक सर्वथा भिन्न दृष्टि की प्रदर्षनी  का आस्वाद किया। लगा, दृष्य के साफ-सुथरेपन के साथ प्रकृति में घुले रंगो का उन्होंने बजरिए तकनीक सर्वथा नया आकाष रचा। कोई कह रहा था, खींचे गए छायाचित्रों से छेड़-छाड़ कर छायाकार ने दृष्यों को अपना निजत्व देते अधिक सुन्दर बनाने का प्रयास किया है। पर इसमें बुरा भी क्या है? तकनीक साधन है, साध्य नहीं। 
कैमरे से लिए गए छायाचित्रों को कलाकृतियो मेें रूपान्तरित करते यदि प्रयोगधर्मिता का ताना-बाना बुना जाए तो इसमें बुरा भी क्या है। और फिर कैमरे से लिए गए चित्रों में यदि हूबहू जो कुछ दिख रहा है वही दर्षकों का सच बनता है तो इसमे ंफिर कला क्या है? कला तो संवेदना की वह आंख ही है जिसमें छायाकार अपने तई दृष्यों को अंवेरता, उसे अपनी सूक्ष्म सूझ से रूपान्तरित करता है। एक समय में पिकासो, मातीस, सेजां, साल्वो आदि ने फोटोग्राफी से निरंतर प्रभावित होते स्वयं की कला के संप्रेषण माध्यम में इसका उपयोग किया भी तो है। और फिर यह भी तो सच है, छायाकंन मे ंयदि यथार्थ का ही अंकन होता है तो उसमे फिर कला कहां है? छायाकार यदि कलाकार है तो वह दृष्य में निहित उस सौन्दर्य से भी हमारा साक्षात् करा देता है, जो नंगी आंखों से चाहकर भी हम देख नहीं पाते। इसमें यदि प्रयोगधर्मिता का सहारा कलाकार लेता है तो यह तो जड़त्व को तोड़ने की सृजनधर्मिता ही हुई ना। इसी की तो कला में दरकार है।
छायाकार महेश स्वामी 
बहरहाल, महेष स्वामी की छायाचित्र प्रदर्षनी ‘दर्पण’ पर लौटता हूं। इस बार के उनके छायाचित्र देखने के हमारे चले आ रहे ढंग की लीक को तोड़ने वाले हैं। कहूं, एक खास तरह की एकांतिका उनके इस बार के छायाचित्रों में व्याप्त है। लॉन में पड़ी कुर्सियॉं, साईकिल और कूलर, गमले और यहां तक की दरवाजों तक के अकेलेपन के बावजूद उनमें रमी फूल-पत्तियों की गुनगुनाहट की सूक्ष्म अंर्तदृष्टि में इन छायाचित्रों में समय के अवकाष को गहरे से पकड़ा गया है। यह भी महज संयोग नहीं है कि प्रयोगधर्मिता लिए उनके छायाचित्रों में पेड़ों के हरेपन के बहाने दैनिन्दिनी उपयोग की वस्तुओं की छवियों को एक खास तरह का अर्थ दिया गया है। यह सही है, तकनीक के प्रयोग से महेष ने अपने इन छायाचित्रों को कैनवस पर सृजित कलाकृतियों सरीखा रूपाकार दिया है परन्तु महत्वपूर्ण इस सृजन का वह पक्ष है कि जिसमें प्रकृति से जुड़ी उनकी संवेदना को पंख लगे हैं।
उनके छायाचित्रों में गमलों में उगे पौधों, फूलों में निहित सौन्दर्य को असल में रूपक की तरह इस्तेमाल किया गया है। इसलिए कि कैमरे से जो कुछ आंख ने देखा, वही भर यहां सत्य नहीं है-उससे परे वह संवेदना भी है जिसमें प्रकृति को अपने तई गुना और बुना जाता है। छायांकन-कला की यह वह नवीन प्रयोगधर्मिता है जिसमें छाया-प्रकाष की कलात्मक सूझ के साथ रंग और रूप के मनः स्केच एक तरह से उकेरे गए हैं। मसलन पेड़ों से छाई हरियाली के हरेपन को, पतझड़ के पीलेपन को और सूर्ख गुलाब और दूसरे फूलों के रंगो को चुराते महेष ने अपने कैमरे की छवि की दृष्यात्मकता को सर्वथा नया आयाम दिया है। यह है तभी तो उनकी कैमरे से उकेरी छवियां यहां रंग-रूप का नया आकाष रचती देखने वालों में बसती है।
उनकी छायाचित्र प्रदर्षनी में प्रकृति एक तरह से वह दर्पण ही तो है जिसमें जीवन से जुड़े बिम्ब झिलमिलाते हैं। इनमें उभरे हल्के हरे, नीले, लाल, भूरे, काले रंगों का और रूप का अद्भुत उजास है। यह अनायास ही नहीं है कि उनकी इस श्रृंखला के छायाचित्रों को देखते हुए औचक वॉन गॉग की कलाकृतियों की याद आती है तो पिकासो के कला प्रयोग भी ज़हन में कौंधते हैं। कुछ इस तरह से कि प्रदर्षनी में देखने के बाद भी उनकी छाया-छवियां मन में सदा के लिए बसी रहती है। मुझे लगता है, महेष ने अपने इन छायाचित्रो ंमें अनुभूतियों को स्केचेज की अपनी प्रयोगधर्मिता में इस कदर सरल, सहज कैमरे से रूपान्तरित किया गया है कि कोने में पड़ी साईकिल, कार, सन्नाटे में पसरी कोई बेल, करीने से रखे हुए गमलों का लाल रंग और पक्षियों के लिए रखा पानी सदा के लिए हममें बस जाता है। इस छायाचित्र श्रृंखला का वह फोटोग्राफ तो अद्भुत है जिसमें खाली पड़ी कुर्सियों की के मौन को पीले उगे फूल स्वर दे रहे हैं। ऐसे ही एक फोटोग्राफ में बेल में उगे फूल जैसे देखने वाले से संवाद करते हैं तो दूसरे एक में हरे पत्ते और बारिष से नहाया आंगन जैसे मुस्करा रहा है। उड़ते पक्षियों की परछाई, एक स्थान पर एकत्र हरे तोते, पानी का रखा पात्र पर उसमें झांकती पेड़ की शाखाएं आदि की बिम्ब-प्रतीक व्यंजना के इन फोटोग्राफ्स में छायांकन कला के जरिए महेष स्वामी ने जैसे प्रकृति का रंगाकाष रचा है। जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं बल्कि उससे भी अधिक मन की अनुभूतियों को सहेजती, छाया-कला प्रदर्षनी के फोटोग्राफ दरअसल मौन में प्रकृति की गुनगुनाट सुनाती कलाकृतियां ही तो है।

Sunday, August 14, 2016

खुली किताब : यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'


यादवेंद्र शर्मा चंद्र से संवाद (1989)

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' राजस्थान के ऐसे साहित्यकार थे जिनके जीवन का कर्म और मर्म लिखना और बस लिखना ही था। लिखते बहुत से लोग हैं परन्तु चन्द्रजी जैसे विरले हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन या यूं कहें आजीविका मात्र लेखन के सहारे ही गुजारी। हिंदी और राजस्थानी में उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, संस्मरण आदि सभी विधाओं में उन्होंने विपुल सृजन किया। 

उनके सान्निध्य और दिए गए स्नेह की बहुत सी यादें हैं। याद करूंगा तो न जाने कितने पन्ने भर जाएंगे! यह १९८९ की बात है, जब उनका एक बड़ा साक्षात्कार मेंने किया और वह प्रकाशन विभाग की पत्रिका 'आजकल' में छपा था। बाद में उनके साथ 'राजस्थानी की कालजयी कहानियां' के संपादन का सुयोग भी मिला। नई धारा, इण्डिया टूडे, नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, नवज्योति आदि के लिए निरंतर मैंने उनके साक्षात्कार किए। 'जागती जोत' के लिए मित्र नीरज दईया के आग्रह पर कभी मैंने राजस्थानी में उनका बड़ा साक्षात्कार किया। इतना कुछ उनके बारे में सहेजा, संजोया है कि पूरी एक किताब प्रकाशित हो जाए। याद पड़ता है, उनकी साक्षात्कार की एक किताब का शीर्षक ही है, 'खुली किताब'। मुझे लगता है, चन्द्रजी भी सबके लिए खुली किताब थे।
उनसे पहली भेंट का किस्सा भी उनके बड़पन्न को बंया करने वाला है। याद है, तब कॉलेज में पढ़ता था और 'ब्लिट्ज' के लिए पत्रकारिता करता था। उनके उपन्यास की समीक्षा मैंने इसमें एक दफा की। शायद वह उनका लिखा राजस्थानी परिवेश का'रक्तकथा' उपन्यास ही था। समीक्षा में अपने होने को गहरे से जताते मैंने अनावश्यक अश्लील शब्दों, कथा विस्तार और शब्दावली आदि जुमलों से जैसे उसकी भरपूर खिंचाई की थी। सच में तो यह आसमान पर पत्थर फेंकने जैसा ही था। तय था, चन्द्रजी कभी मिलेंगे तो खबर लेंगे पर हुआ बिल्कुल उलट। एक रोज़ चन्द्रजी घर के बाहर से आवाज लगा रहे थे, 'यह राजेशजी का ही घर है?' मैं लपककर पहुंचा। वह शायद चेहरे से मुझे नहीं जानते थे पर जब मिले तो तुरंत कहा, 'तुम्हारे यहां चाय पीने आया हूं।' बातों ही बातों में वह मेरी लिखी समीक्षा पर आ गए परन्तु स्वर बिल्कुल संयत। बोले, 'अच्छी लिखी है पर अतिशयोक्ति से की है तुमने समीक्षा।' मैं जानता था, वह सही कह रहे हैं परन्तु बाद में उन्होंने इस बात को भी हवा में उड़ा दिया। यह तो बहुत बाद में पता चला सम्पादक उनके निकट के मित्र थे। चाहते तो वह सदा के लिए मेरा लिखना "ब्लिट्ज" से छुड़वा सकते थे। पर यह उनका बड़पन्न था कि उन्होंने संपादक श्री नौटियालजी से मेरी तारीफ की।....ऐसे बहुत से और भी किस्से हैं, जो उनकी उदात्तता के हैं। वह साफ मन के थे। बहुत प्यार देने वाले। 
जब भी बीकानेर जाता हूं, लौटता हूं तो चन्द्रजी के नहीं होने के खालीपन को लेकर ही लौटता हूं। इतना प्यार अब कौन दे? और शायद उन्होंने बिगाड़ भी दिया था कि जितना नेह वह देते थे, उतने से कम में अब पार नहीं पड़ती। नमन, चन्द्रजी। नमन!