Thursday, May 7, 2015

दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोई


उत्सुकता व्यक्ति को अन्वेषक बनाती है। अभी कुछ ऐसा हुआ कि दादू दयाल की वाणियां कहीं से हाथ लग गई। फिर तो ढूंढ-ढूंढकर उनके बारे में पढ़ा। लगा, कबीर की वाणियां फक्कड़पन लिए है और दादू वाणी दया-करूणा से ओत-प्रोत। दादू की निकटता का भान कहां था! कभी-कभी ऐसा ही होता है, जो आपके पास होता है-वही नजरों से न जाने क्यों दूर होता है। देशभर में घुम्मकड़ी की पर जयपुर के निकट दादू पालका भैराणा कभी नहीं जाना हुआ। कुछ दिन पहले जाना हुआ तो लगा, तीर्थ को गहरे से जिया है। जयपुर से कोई 60-70 किलोमीटर दूर। अजमेर के रास्ते आध घंटे और फिर दाहिने की सड़क पर मुड़कर एक घंटे से कुछ अधिक की यात्रा के बाद भैराणा पहुंच जाते हैं। विवेकानंद केन्द्र में बच्चों से बतियाना सुखद था। औचक भैराणा का बड़ा सा पहाड़ देखता हूं। आसमान झांकता हूं तो चांद दिखता है, दूसरी और सूरज भी! उत्सुक मन अपने को रोक नहीं पाता। वहीं षिविर में आए छात्र रामकिषोर को साथ ले पहाड़ पर बने मंदिर की ओर चल देता हूं। ठौड़-ठौड़ दादू वाणी मंडी है। कुछ देर मंदिर में हारमोनियम-ढोलक संग दादू वाणी सुनता हूं, ‘दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोई/वेद पुरान पुस्तक पढ़े, प्रेम बिना क्या होई।’ कानों में रस घोलती वाणी। 
मन जिज्ञासु दादू के और करीब जाना चाहता है सो पहाड़ चढता हूं। देखता हूं, रास्तेभर पीठाचार्यों की चरण पादूकाएं स्थापित हैं। लगभग चोटी पर दादू के पद दर्षन हुए। ऊपर एक संकरी सी गुफा। अंधेरी, पर दूर कहीं किसी छोर से रोषनी आ रही थी-प्रकाष पुंज सरीखी। मोर पांख का झाड़ू भी पड़ा है। बाहर पहाड़ पर बनी इमारत का बड़ा हाॅल-गुफा का परिवेष ढकता हुआ-बारादरी सरीखा। एक रास्ता और दिखता है, पहाड़ पर और ऊंचाई पर जाने को आमंत्रित करता। पहाड़ चढ़ते एक चट्टान देख वहीं ठहर गया। हवा में झुलती सी चट्टान। पास गए तो पादूकाओं को भी पाया। पता चला, कुछेक पत्थरों पर टिकी है चट्टान, जैसे पादूकाओं की छत बन गई है। कुछ सीढि़यां पर आगे पहाड़ ही पहाड़।...चढ़ा तो बढ़ा। पहाड़ से नीचे झांका। दूर तक उजाड़। मन बोला, ‘अरे दादू, आप यहां!’ धरती पर मंदिर। आसमान यानी पहाड़ पर समाधी।...और फिर पाताल यानी नीचे तलहटी में छतरी। सच! भैराणा अद्भुत धाम है।
तुलसीदासजी ने संतो को चंदन-तरू सदृष कहा है। वह जो पात्र-अपात्र का विचार न करके अपनी सुगन्ध सबको बांटते रहते हैं। दादू ऐसे ही थे। अनुभूतियों से उपजे ज्ञान की सुगन्ध को उन्होंने बगैर किसी भेद सबको बांटा। और हां, विष्व के ऐसे संत जो मृत देह को भी किसी के काम आने के निमित्त कर गए। दादू वाणी है, ‘दादू मरणा तहां भला, जहां पषु पक्षी खाय।’ दादू ने अंतिम समय अपने षिष्यों से कहा ‘न मुझे जलाना, न गाड़ना और न ही जल में प्रवाहित करना।’ उनके शरीर को भैराणा में प्रतीक स्वरूप अग्नि दिखा छोड़ दिया गया। भूखे पषु पक्षियों के लिए। सोचता हूं, देह दान की सोच का आधार दादू ने ही हमें दिया। मित्र कौषलेन्द्रदास के पिता श्री उमाषंकरजी से बाद में भेंट हुई तो उनने भी बताया ‘दादू जीवा भक्षता, सहज मोक्ष हो जाय।’ माने जीवों के भक्षण के लिए जो देह काम आए वही सहज मोक्ष को पाती है।
दादू ने कोई 20 हजार के करीब पद लिखे पर  बताते हैं, उपलब्ध 3 हजार के करीब ही हैं। भैराणा पहाड़ की सीढि़यां उतरते दादू पंथ पर विचारता हूं। दादू ने कभी नहीं चाहा कि उनको लेकर कोई पंथ बने। उनका मानना था, पृथ्वी आकाश सूर्य चन्द्रमा तथा देवता आदि एक पंथ में नहीं रहते तो किसी पंथ का अनुयायी बनकर क्यों रहा जाय? पर लोग कहां मानने वाले। उनके अनुयायियों ने दादू पंथ प्रारंभ कर दिया। पंथ ऐसे ही बनते हैं। 
भैराणा से लौट रहा था पर लगा, निर्जन पथ पर दादू साथ थे। दादू के अंतिम वास पहाड़ चढ़ा और उतरा तो उनकी वाणी की गहराई में उतरता चला गया। उतरना-चढ़ना ही तो है! उतरे वह जो चढ़े। ऐसे ही शायद मौन के गर्भ में सृजन का उत्स होता है। भैराणा से लौटना आसान नहीं है। मन अभी भी वहीं है। दृष्टि बोलती है तो शब्द झरते हैं। शब्द भी तो वही सार्थक है जो निःषब्द को इंगित हो। दादू की वाणी ऐसी ही है। निःषब्द को इंगित। मन विचार रहा है, ‘दादू पाती प्रेम की, विरला बांचै कोइ, वेद-पुरान पुस्तक पढे, प्रेम बिना क्या होई।’
-लोकप्रिय दैनिक "न्यूज़ टुडे" में प्रकाशित, 7 मई 2015 


Monday, April 27, 2015

पैसे की माया नोच रही जमीनो की काया

--गोरखपुर से कुशीनगर यात्रा --

साहित्य अकादेमी के सचिव श्रीनिवासराव  दूरभाष पर निमंत्रण देते हैं, ‘अकादेमी ने इस बार उत्तरपूर्वी एवं उत्तर लेखक सम्मेलन का दो दिवसीय आयोजन गोरखपुर में किया है। इसमें आपको कविता पाठ करना है। आप स्वीकृति भेजिए ताकि बाकी सभी व्यवस्थाएं कर सकूं।’ अंधा क्या चाहे? दो आंखे। जयपुर से दिल्ली और फिर दिल्ली से लखनऊ तक की हवाई यात्रा के बाद गोरखपुर के लिए ट्रेन या फिर बस ही साधन है। ट्रेन में पहले से आरक्षण करवा लिया था सो दिक्कत हुई नहीं। 
आयोजन स्थल पर असम, मणीपुर, त्रिपुरा, अरूणाचल से आए लेखकों संग बतियाया तो शीनकाफनिजाम साहब और गोविन्द मिश्र से यात्राओं और उनके लिखे पर निरंतर संवाद भी होता रहा। उन्होंने कुछ समय पहले तिस्ता यात्रा की चर्चा छेड़ी तो गंेगटोक से की देहरादून और नेपाल बोर्डर तक की यात्रा जेहन में फिर से ताजा हो गई। बुध महापरिनिर्वाण स्थल कुषीनगर जाने की चाह थी पर राह नहीं मिल रही थी। वहीं गोरखपुर विष्वविद्यालय में छायाकार मित्र फीरोज से टैक्सी कराने को कहा तो उसने मेरी बात हवा में उड़ा दी। कहा, ‘क्यों टैक्सी में पैसे बर्बाद करते हैं। बस पकडि़ये, आराम से पहुंचा देगी।’ माना नहीं और टैक्सी कर लेता हूं। ड्राईवर दूसरे दिन सुबह होटल से लेने का कहता है पर आता ही नहीं। पता चलता है, उसे कोई और दूर की तगड़ी सवारी मिल गई सो वहां चला गया। दूसरी टैक्सी कराने को कहता है तो डपटकर देता हूं। बस पकड़ता हूं। फीरोज बहुत याद आता है, कुषीनगर बस से ही जो जा रहा हूं! हिचकोले खाती बस गोरखपुर शहर को तेजी से छोड़ती मिलट्री ऐरिया में वार मेमोरियल क्षेत्र से आगे पहुंच गई है। औचक खिड़की से बाहर देखता हूं, सघन पेड़ों का झुरमुट। जहां तक निगाह जाए, पेड़ ही पेड़। सिकुड़ी सड़क पर उत्तर प्रदेष परिवहन निगम की बस और दोनों और इसी तरह पेड़ों का झुरमुट।  
गोरखपुर से जब चला था तब इस तरह के दृष्य की मन मंे कल्पना नहीं थी। एक के साथ एक आसमान छूने की होड़ में खड़े पेड़। कुछ देर तक बस पेड़ों के उस सघन जंगल के बीच से ही गुजरती रही। पर यह कुछ समय का ही सुकून था। थोड़े अंतराल में यह दृष्य लोप हो गया।  खिड़की से खेत और घास-फूस के छप्पर की बनी दुकानें नजर आने लगी।...बंजर जमीन और कुछ-कुछ देर में कुछ पक्का निर्माण कार्य भी चल रहा है। बिल्डरों के विज्ञापन। एक जगह बोर्ड लगा है, ‘प्लाॅट बिकाऊ है।’ पेड़ यहां पूरी तरह से नदारद। यह हरितिमा को रोंद कोंक्रीट के जंगल का आगाज है। पहले देख पेड़ों का झुरमुट शायद इसलिए बच गया कि वह वन क्षेत्र था। वन क्षेत्र का आवासीय रूपान्तरण नहीं हो सकता। पर खेतों का आवास परिवर्तन कौन रोके? सही है, आबादी बढ़ गयी है-रहने को जमीन कम पड़ रही है परन्तु इससे भी बड़ा सच यह है कि हरियाली लीलने फायदे का निवेष जमीनों में ही दिखाया जा रहा है। पैसो की माया जमीनों की काया नोंचने में लगी है। कृषि भूमि इसी से तेजी से आवासीय में रूपान्तरित होती जा रही है। देखता हूं, खेत हैं परन्तु लुखे। आवासीय प्रयोजन से बिकने को तैयार। मन बुझ जाता है।  
सुबह गोरखपुर में ओलावृष्टि की आपदा से फसलों की खराबी के समाचार ही अखबारों में पढ़े थे परन्तु खेतों की जमीन पर ‘प्लाट बिकाऊ’ की आपदा तो इससे भी भारी है। प्रकृति से भारी कोप तो मनुष्य का है। उसे तो अपनी पैसा उगाती बांसूरी की पड़ी है, बांस से उसे क्या! बांस नहीं रहे तो न रहे, अभी तो बांसूरी बज ही रही है। यह बांसूरी नहीं बजेगी तो कुछ और बजा लेंगे। सोचते-सोचते घबराहट बढ़ जाती है। कबूतर की तरह आंखे मुंद विचार के उगे इस संकट से अपने को बचाने का प्रयास करता हूं। डर भरी झपकी ले लेता हूं। टूटी सड़क पर बस झटका खाती है तो आंखे खोल सड़क की ओर देखता हूं। चैड़ी फोरलेन की सड़क। हम हाईवे पर है। यह मार्ग बिहार होते हुए दूर आसाम की ओर जाता है। उत्तर से उत्तरपूर्व की ओर। 
देखता हूं, बस की अपनी  अलग दुनिया है। मेरे सामने की सीट पर कोई सालेक भर का बच्चा अपनी मां की गोद में खड़ा खिड़की के पार झांक रहा है। तेजी से भागते पेड़ों, साथ चलती कारों, ट्रकों को कभी आगे तो कभी पीछे छूटते देख वह अचरज से किलकिला रहा है। उसके उड़ते बाल, कौतुक भरी मासूम निगाहें और मां की गोद में पूर्ण सुरक्षा का संतुष्ट भाव आनंदित करने वाला है। कुछ देर उसको खिड़की से पार भागते दृष्यों का आनंद लेते देख खुद भी आनंदित होता हंू। औचक बस रूकती है। लपककर एक लड़का चढ़ जाता है। पीछे-पीछे एक लड़की भी है। दोनों विद्यार्थी लग रहे हैं। सोचता हूं, काॅलेज से शायद घर लौट रहे हैं। धीरे हुई बस फिर से भागने लगी। मन में विचार आया, टैक्सी करता तो सफर यूं आबाद होता! मन यूं रंजित होता! 
बस में निगाह दौड़ता हूं। कोई उंघ रहा है, कोई मोबाईल से गीत सुन रहा है तो कोई दीन-दुनिया से दूर अपने सहयात्री से बातों में मषगूल है। सफर की यह  अलग ही दुनिया है। चेहरे जाने-पहचाने से लगते हैं पर सबके सब अनजाने। खिड़की के पार निगाह जाती है, चैंकता हूं। दाहिने ओर खेत पर बौने पेड़ों का समूह। शाखाओं में फैले हुए पर बैठे हुए। ऊंचाई नदारद। तना रहित हरे पेड़। ऐसे जैसे परस्पर बतिया रहे हों। प्रकृति की अदीठी कृतियां! ऐसे पेड़ पहले कहां देखे। देखता हूं, यहां ऐसे ही पेड़ हैं। दूर खेतों में अंतराल अंतराल में पेड़ों ने मिल अपने समूह जैसे बना रखे हैं-बतियाने के लिए। बस रूक गई है। 
‘लो कुषीनगर आ गया। आपको यहीं उतरना है।’ कहते हुए बस कंडक्टर मेरी ओर मुड़ता है। मैं ठीक उसके पीछे की सीट पर बैठा हूं। अपना बैग संभालते हुए उतरकर सड़क के दाहिने ओर उस पार कुषीनगर की ओर जाती सड़क की ओर हो लेता हूं।
-"न्यूज़ टुडे" 23-4-2015

Thursday, April 9, 2015

कलाकारों संग कोहरे में अयोध्या

बहुतेरी बार मन दृश्य साक्षात् से उपजी स्मृतियां और अनुभुतियां की यात्रा करता है।घर पर होते हैं तो कहां इस मन यात्री को जान पाते हैं! जितना घर से बाहर निकलते हैं, मन को भी और अधिक जानने लगते हैं। माने घर से बाहर की हर यात्रा मन की यात्रा है। बाहर न जाएं तो स्वयं अपने मन में झांकने का अवकाश ही न मिले। इसीलिए कहें, जब अपने स्थान को छोड़ दूर कहीं होते हैं तो वह स्थान की ही यात्रा नहीं होती, मन की भी होती है। हर यात्रा स्वयं तक हमें पहुंचाने का मार्ग भी है।...तीन-चार महिने पहले की बात है, इसी मार्ग पर था। कलाकार मित्र और ‘कलादीर्घा’ के संपादक डाॅ. अवधेश्र मिश्र ने फैजाबाद में राष्ट्रीय कला षिविर का संयोजन किया था। दूरभाष पर उनने कहा, आपको आना है, अयोध्या में राम के दर्षन भी कर लेंगे। मुझे लगा, देषभर के कलाकारों के साथ रामजी की अयोध्या देखने का यह सुयोग ही निकल आया है। वहां पहुंचा तो पता चला, सरयू तट पर बसे नगर अयोध्या में सर्दी के दिन देष के दूसरे स्थानों से सर्वथा भिन्न होते हैं। 
कोहरा पहले भी देखा था पर सुबह, दुपहर और सांझ इतनी धूंध पहले कभी नहीं देखी थी। हाथ को हाथ नहीं सूझे। धूप का कहीं कोई नामोनिंषा नहीं। एक रोज कलाकार मित्र विनय शर्मा आग्रह कर सरयू नदी के गुप्तार घाट ले गए। धूंध में सरयू जैसे उंघ रही थी। पटना से आए कलाकार मिलनदास बोले इससे भले तो होटल में थे। पर घुम्मकड़ मन कोहरे लिपटी सरयू में ही जैसे कुछ तलाष रहा था। कैमरा निकाला पर कोहरे में जैसे दृष्य गुम थे। कुछ भी नहीं मिला। वापस जाने की सोची कि कोहरा छंटने लगा। दोपहर के तब कोई 2 बजे होंगे। धूप नहीं निकली पर थोड़े छंटे कोहरे में सरयू में चलती दो नावों का साक्षात् हो गया। दूर मांझी नाव को खे रहा था पर दृष्य अनूठा था। कैमरे से त्वरित छवि को कैद किया। धूंधलेपन में नदी और नाव के संयोग के अनूठेपन को कैमरे ने जी लिया। 
कोहरे में लिपटी अयोध्या की यात्रा को संजोते वह क्षण भी न भूलने वाले थे जब एक रोज विवादास्पद कर दी गई रामजन्म भूमि जाना हुआ। दुपहरी धूंध भरी थी। आगे-आगे पुलिस की पायलेट गाड़ी और पीछे कलाकारों के साथ हम। पता चला, अयोध्या का एक बड़ा हिस्सा हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित कर रखा है। बगैर पुलिस की अनुमति के वहां कोई प्रवेष नहीं कर सकता। हां, लोग रहते हैं पर उनके भी प्रवेष पास बने हुए हैं। चप्पे चप्पे पर केन्द्रिय सैन्य बल तैनात। कहीं कोई युद्ध न छीड़ जाए। मूल स्थान पर प्रवेष के समय एक एक चीज की तलाषी ली गई। और फिर एक तंग कंटिले तारों से निर्मित रास्ते में हम हो लिए। बाहर उत्पाती बंदर जैसे पींजड़े में हमें देख हंस रहे थे। कुछ देर तक उस तंग पींजरेनुमा रास्ते में चलते रहे और फिर राम जन्म भूमि के दर्षन कर लौट आए। लगा, धूंध मौसम की ही नहीं है, मन की भी है। हर कोई सहमा-सहमा सा। छावनी बनी अयोध्या में चुप्पी पसरी हुई। कोहरे का मर्म अब जैसे समझ आ रहा था। मन को मथता हुआ। पर बाद में इस कोहरे को देषभर के आए कलाकारों ने अपनी रंग-रेखाओं से जैसे भगा दिया।  महाराष्ट्र के कलाकार जाॅन डगलस ने धूंध को रंग-रेखाओं से मांडा पर सुहास बहुलकर ने मंदिर में घंटियां पकडे साधु के बरक्स कंटिले तारों को व्यंजित कर जैसे कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया था। 
गोवा से आए हनुमान काम्बली ने रावण वध के दृष्य की आड़ में सामयिक संदर्भों में रेखाओं का आकाष रचा। जयपुर के विनय शर्मा ने सरयू नदी और वहां के घाटों को जेहन में रखते हुए अतीत और वर्तमान को अपने कैनवस पर जिया। बनारस के प्रणामसिंह ने अयोध्या के मंदिरों में साधु-संतों की उपस्थिति को कैनवस पर जी रहे थे तो रंगों के छंद में अवधेष मिश्र ने अयोध्या के महात्म्य को उभारा। भोपाल के युसूफ ने रेखाओं की महीनता में एब्सट्रेक्ट के जरिए मारीच की व्यंजना की। युसूफ रंग पट्टिकाओं में स्थान विषेष ही नहीं वहां के संदर्भों को बेहद संवेदनषीलता से अपनी कला में जीते हैं। ऐसा ही बिहार के मिलनदास के साथ भी है। वह हल्के रंगों में घुले पत्रों की इबारत में अयोध्या के संदर्भ जब उकेरे रहे थे तो एकटक उनके कैनवस को ही निहार रहा था। उन्होंने अयोध्या की प्राचीनता को जैसे हिन्दी, अंग्रेजी और उडि़या भाषा में कैनवस पर ढूंढ निकाला। कोलकता के अमिताभ सेनगुप्ता लिपियों में संवेदना के मर्म जैसे उद्घाटित करते हैं। एक कैनवस पर उन्होंने मर्यादा पुरूषोतम राम को केन्द्र में रखते हुए नीचे मिनिएचर, लोक कला के भी संदर्भ दिए। मध्यप्रदेष से आए प्रो. लक्ष्मीनारायण भावसार, खैरागढ़ से आए महेषचन्द्र शर्मा ने परत दर परत रंगों में अयोध्या की मिट्टी, यहां के घरों और जन-जीवन में व्याप्त रंगों को कैनवस पर जिया। जय झरोटिया रेखाओं में बतिया रहे थे,कैनवस पर उनके हनुमान पहाड़ उठाए जैसे वाल्मिकी रामायण लेाक में ले जा रहे थे। कलाकार यह सब जब कैनवस पर उकेर रहे थे, उनके सृजन सरोकारों पर निरंतर बतियाना भी होता रहा। घटनाओं, इतिहास और मिथकों की कहानियांें में उनके साथ उतरते बहुत से नए संदर्भ भी जैसे लिखने के लिए मिले। लगा, कलाकृतियों में जो कुछ दिखता है, उससे बड़ा सच वह अदृष्य होता है जिसे लेकर मन में हलचल होती है। कोहरे लिपटी सुबह, दुपहरी और हाड़ कंपाती रात के अदृष्यपन में अयोध्या में उभरे रंग और रेखाओं के उजास ने ही यह सब कुछ शायद लिखा दिया।
-न्यूज़ टुडे, 9 अप्रैल, 2015 


Thursday, March 26, 2015

जनजातीय कलाओं से साक्षात्


संस्कृति जीवन से जुड़े संस्कारों में निहित है। संस्कृति के मूल में ही सभ्यताओं का नाद है। वैष्वीकरण की बड़ी विडम्बना यह है कि विरासत से जुड़ी जनजातीय कलाओं की हमारी थाती से हम निरंतर दूर भी होते जा रहे हैं। स्वाभाविक ही है कि इससे समूहों की सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्ध जनजातीय परम्पराओं में निहित कलाओं का लोक भी क्षीण हो रहा है। संस्कृति या कहें इतिहास का अनघड़ रूप बगैर किसी छेड़छाड़ के कहीं है तो वह आदिवासी सभ्यता में ही है। अनघड़ पाषाण भी वहां पूजनीय है। रूंख माने पेड़ भी है तो उसकी टहनियां और उससे जुड़े धार्मिक संस्कारों का वहां सुमधुर गान है, पर्वत, नदियां अजस्त्र ऊर्जा के स्त्रोत ही नहीं हैं आदिवासियों का जीवन है।
बहरहाल, देषभर में घुम्मकड़ी की है परन्तु आदिवासी इलाकों के भीतर जाने का सुयोग कभी नहीं हुआ।  हां, आदिम परम्पराओं के अन्वेषण में इधर-उधर भटकते बहुत कुछ मिला तो है परन्तु वह सब सुना हुआ ही गुना लगता है। इधर संयोग हुआ कि मध्यप्रदेष में कुछ समय पहले भोपाल जाना हुआ तो, सुदूर आदिवासी इलाकों की महक को गहरे से अनुभूत किया। बल्कि आदिवासी कलाओं से गहरे से साक्षात् भी हुआ। लगा, आदिवासी इलाकों में पहुंच गया हूं, उनकी परम्पराओं, रिवाजों और संस्कृति की अनूठी गाथाओं में रच-बस गया हूं। ऐसा ही हुआ, जब कुछ समय पहले अस्तित्व में आए मध्यप्रदेष के जनजातीय संग्रहालय जाना हुआ। संग्रहालय क्या, पूरी आदिवासी सभ्यता और संस्कृति से जुड़े चिन्ह ठौड़ ठौड़ वहां मौजूद है। सच है! आदिवासी इलाकों के अंदर तक नहीं गया परन्तु इस संग्रहालय में प्रवेष करना आदिवासियों और उनकी कलाओं तक एक तरह से पहुंचना ही है। जनजातीय जीवन, देषज ज्ञान, परम्परा और सौन्दर्यबोध का चावा स्थल ही तो है मध्यप्रदेष का जनजातीय संग्रहालय।

संग्रहालय में प्रवेष करता हूं और  पाता हूं यह आम संग्रहालयों की भांत नहीं है। अक्सर संग्रहालयों में जाने पर यह अनुभूत किया कि बेशकीमती कलाओं को संजोने वाले यह आलय भी पुरा वस्तुओं के आगार भर बन कर रह गए हैं। कोई बड़ी सी इमारत बना दी और उसमें पुरातन चीजों को करीने से संग्रहित कर रख दिया। लो, हो गया संग्रहालय तैयार। जनजातीय संग्रहालय इस तरह का पारम्परिक संग्रहालय नहीं है। यहां खंड-खंड आदिवासी क्षेत्रों की धरा को जैसे अवतरित किया गया है। कलाकार मित्र हरचंदन सिंह भट्टी ने आदिवासी इलाकों की भौगोलिकता के साथ वहां की बनावट को इसमें एक तरह से जीवंत किया है। आप जैसे ही प्रवेष करेंगे, बांस उगे मिलेंगे। सामने ही तालाब सा कुछ है। और इधर-उधर झोपडि़यां, वटवृक्ष, सिंदूर पूता पाषाण माने लोक देवता, आदिवासियों की निर्मित कलाएं और आदिवासी बच्चों के खेल तक के जीवंत स्कल्पचर यहां है। आदिवासी क्षेत्रों की वर्चुअल सैर ही तो है यह संग्रहालय! कला की आभासी दुनिया। भले आदिवासियों के गांव और उनकी धरती  मूल मंे यहां नहीं है परन्तु हूबहू वैसे ही माॅडल इस कदर आकर्षक है कि यहां की यात्रा करते आपको कहीं यह अहसास नही ंहोगा कि आप जनजातीय क्षेत्रों का भ्रमण नहीं कर रहे हैं।  सांस्कृतिक वैभव, जनजातीय कलाबोध, देवलोक और जनजातीय कलाओं के अद्भुत रूप यहां है। जनजातीय परिवेष में मिट्टी, घास, बांस, लकड़ी, रस्सी और तमाम दूसरी चीजों से सृजित कलाएं यहां जैसे आने वालो से संवाद करती है। यह नहीं कि यहां जो है, वह दिखानेभर को ही है और उनका मूल से नाता नहीं है। यहां जो है उसमें तमाम वस्तुएं वही हैं जो जनजातीय क्षेत्र के समुदाय उपयोग मंे लेते हैं। जैसा जीवन वह जीते हैं, उसी को यहां आदिवासी कलाकारों ने एक तरह से जीवंत किया है।
संग्रहालय में प्रवेष माने षिल्प सौन्दर्य के अनूठो भव से साक्षात्। जनजातीय मौखिक परम्पराओं के बहुविध षिल्प यहां है। सुप्रसिद्ध कलाकार अनिल कुमार से पता चलता है, मध्यप्रदेष मे ंनिवासरत 43 जनजातीय समूहों में से आमंत्रित कर यहां षिल्प रचने का दायित्व उन्हीं को दिया गया। अचरज होता है, आधुनिक षिल्पियों ने नहीं, कोल, बैगा, भारिया, सहरिया, कोरकू, भील और गोण्ड जनजातियों तथा इनकी उपजातियों के अलग-अलग माध्यमों मंे काम करने वाले षिल्पियों ने रचा कला का यह मोहक संसार। शायद यही कारण है कि यहां कहीं किसी बनावट की अनुभूति नही ंहोती है। जो कुछ है सब असल सरीखा ही लगता है। वहां से लौट आया पर मन में आदिवासी क्षेत्र और वहां की संस्कृतियांे हुआ समय का वह संवाद अभी भी कहीं ध्वनित है। इतिहास, अतीत और वर्तमान की दूरियों को कम करता हुआ। 
- लोकप्रिय सांध्य दैनिक "न्यूज़ टुडे", 26 मार्च 2015 


Friday, March 13, 2015

खजुराहो में मानवीय सौन्दर्य...

कलाओं की जीवंत अभिव्यक्ति है खजुराहो। कोई एक कला नहीं .कलाओं का समग्र वहां जो है! शिल्प संयोजन में जीवन से जुड़े सरोकारों की संगत! पाषाण में जीवन की लय! संगीत, नृत्य में ध्वनित होते पाषाण। हाँ, मिथुन मूर्तियां भी वहां है... पर खजुराहो का सच वही नहीं है। सच है कलाओं का मेल। आप मूर्तियां देखते हैं, देखते देखते औचक जहन में तमाम कलाओं का संयोजन, शिल्प पूर्णता को अनुभूत करने लगते हैं। 
छायांकन : राजेश 
बहरहाल, मध्यप्रदेष का संस्कृति विभाग पिछले चार दषकों से निरंतर खजुराहो नृत्य उत्सव का आयोजन करता आ रहा है। इस बार कलाओ ंके अंर्तसंबंधों पर बोलने के लिए आमंत्रित हुआ तो खजुराहो में बिखरे षिल्प वैभव को भी जैसे गहरे से जिया। व्याख्यान से एक दिन पहले अल्लाउद्दीन खां सगंीत अकादमी के निदेषक और मित्र अनिलकुमार से मंदिरों को देखने की चाह जताता हूं तो वह गाड़ी भेज देते हैं। जल्द तैयार होकर 9 बजे ही निकल पड़ता हूं। पूर्वी, पष्चिमी और दक्षिणी समूह में बंटे हैं मंदिर। देखता हूं, दूर मंदिर से सटे तालाब में लोग नहा रहे हैं। गंदे पानी को और गंदा करते हुए। यहां से आगे बढ़ता हूं। मंदिरों के समूह दिख जाते हैं। यह पष्चिमी समूह के मंदिर हैं। खजुराहो का मूल षिल्प वैभव पष्चिमी समूह के इस मंदिर परिसर में ही है। रत्नजडि़त हार सरीखे मंदिर। अलंकृत। मन को मोहते। पहले मंदिर समूह से पृथक पर उनसे जुड़े मातंगेष्वर महादेव हो आता हूं। आदिकाल से पूजित है यह मंदिर!  हर्षवर्धन द्वारा 9 वीं सदी में निर्मित। कहते हैं कभी यहां भगवान राम ने भी पूजा की। अधिस्ठान तक आने के लिए खड़ी सीढि़यां। षिखर वाले इस मंदिर की दरो-दीवार सौन्दर्य प्रतिमाओं से भरी है। ...यहां से आगे पुरातत्व विभाग की खिड़कीसे टिकट ले चंदेल शासको द्वारा बनाए मंदिर समूह परिसर में प्रवेष करता हूं। वराह मंदिर्! बलुआ पत्थरों से निर्मित वराह प्रतिमा पर अलंकृत 672 मूर्तियां। सामने लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव, जगदम्बी, चैसठ योगिनी, चित्रगुप्त, विष्वनाथ आदि मंदिरों  की दीवारों पर उत्कीर्ण षिल्प, सम्मोहित करता है। लगता है, यहां हरेक कला दूसरी से गूंथी है। चित्र-नृत्य में, नृत्य-संगीत में, संगीत-षिल्प में और ऐसे ही स्थापत्य, नाट्य जैसे एक दूसरे से जुड़े देखने वालों से संवाद करते हुए।
मुझे लगता है, खजुराहो में मंदिरों पर उत्कीर्ण मूर्तियां जगत् वस्तु रूप नहीं, आत्मवस्तुरूप है। कहूं, व्यस्टि और समष्टि को जोड़ने वाली एक संधि रेखा। षिल्प क्या है? चक्षु, भाव और बुद्धि की त्रिवेणी ही तो! मानवीय देह, जीवन से जुड़े प्रसंगों का प्रस्तरण रूपान्तरण कहीं है तो वह यहीं है। यहीं। प्रतिमाओं की सुघड़ता...नैरन्तर्य...क्रमबद्धता...संतुलन! अपार्थिव सौन्दर्य। पाषाणों में है संगीत का माधुर्य। नृत्य का उल्लास। षिल्पी ने जैसे नृत्यरत भंगिमाओं में गति का अंकन किया है। लय अंवेरते। स्त्री-पुरूष। एक-दूसरे में समाते। संगत को ध्वनित करते। मानवीय देह के सूक्ष्म सौन्दर्य रूप! चित्त को संस्कारित करती छवियां-श्रृंखलाबद्ध। मन को उद्वेलित कर कलाओं के रस से ओत-प्रोत करती। 
खजुराहो में मूर्तियां नहीं रूप बंध है। कलाओं में बसा है जीवन। स्त्री-पुरूष की देह नहीं-उनके अंग प्रत्यंगों की सौन्दर्य दीठ! औचक संत एकनाथ जेहन में कौंधते हैं, ‘देखणे देखिजे देखणेनी’ माने देखने जैसा है (सुंदर) उसे देखिए। सौन्दर्य का षिल्प मुहावरा ही तो है खजुराहो की यह प्रस्तर प्रतिमाएं। मिथुन मूत्रियां पर वह भारतीय दृष्टि जिसमें कुण्ठाओं, दुराग्रहों के त्याग पर बल है। पष्चिम में शरीर या कहे ंदेह को अध्यात्म प्राप्ति की बाधा माना गया है। हमारे यहां ऐसा नहीं है। हमारे यहां कहा गया है, ‘अनंद ब्रह्णो रूपं तच्य देहे व्यवस्थितम्’ यानी आनंद ही ब्रह्म का रूप है और वह मनुष्य की देह में अवस्थित है। खजुराहो देह का गान है। देह का दृष्यात्मक संगीत! ऐसी मूर्तियां छत्तीसगढ़ में भोरमदेव मंदिर और कोणार्क में भी देखी है।...और भी यत्र-तत्र देखता रहा हूं पर यहां खजुराहो में प्रस्तर सर्वथा नये सौन्दर्य भव से साक्षात् कराते हैं। रेखाओं और घनाव के मघ्य केवल और केवल चेतना की लय जो यहां है! कलाओं के अंर्तसंबंधों की प्रस्तर व्याख्या कहीं है तो वह खजुराहो में ही है। सोचता हूं, खजुराहो को देखना कलाओं के परस्पर संबंधों को एक तरह से समझना ही तो है।
-सांध्य दैनिक "न्यूज़ टुडे" १२ मार्च, २०१५  

Sunday, February 1, 2015

आर. के. लक्ष्मण

आर. के. लक्ष्मण से  वर्ष 2005 में जयपुर में दूरदर्शन के लिए संवाद हुआ था. तभी बहुत कुछ महत्वपूर्ण संजो पाया था. पढ़िए आज के इस "जनसत्ता" में...



Sunday, January 11, 2015

रंग-रेखाओं में बसी अयोध्या

मनु की बसाई नगरी है अयोध्या। मंदिरों का शहर। सरयू नदी के दांए तट पर बसे इसी नगर में पिछले दिनों राष्ट्रीय कला शिविर  का आयोजन हुआ। अयोध्या शोध संस्थान द्वारा आयोजित इस षिविर की बड़ी विषेषता थी, रंग और रेखाओं में उभरा अयोध्या का  सौन्दर्य। अयोध्या ही नहीं, अयोध्या के राम, सीता, हनुमान, लक्ष्मण आदि भी कैनवस पर कलाकारों ने उकेरे। खास बात यह भी कि मूर्त-अमूर्त में अयोध्या की प्राचीनता के साथ आज के संदर्भों को भी कैनवस पर कलाकारों ने बुना। यह भी संयोग ही है कि अयोध्या शोध संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कला शिविर  में देष के प्रमुख स्थानों का प्रतिनिधित्व कलाकारों ने किया। आयोजन की बड़ी विशेषता  यह भी रही कि कलाकारों ने पहले अयोध्या के तमाम स्थलों का भ्रमण किया और फिर उसके आधार पर अपनी संवेदनाओं का ताना-बाना कैनवस पर बुना। षिविर संयोजक डाॅ. अवधेश  मिश्र स्वयं कलाकार हैं शायद इसीलिए कलाकारों की संवेदना और उनकी जरूरत से जुड़े प्रबंधन में वहां कहीं कोई बंधन नहीं था। माने कलाकार जो देखे, जो सोचे उसे अपने भीतर के भावों से उकेरे। षिविर के 15 सदस्यीय कलाकारों ने पहले रामजन्म भूमि स्थल, सरयू नदी, कनक भवन, हनुमान गढ़ी, गुप्तार घाट आदि स्थलों का भ्रमण जब किया तो अचंभित भी थे। इस रूप मंे कि अयोध्या का जो रूप उन्होंने यहां आने से पहले बसाया हुआ था उससे भी कहीं अधिक सुन्दर इसे पाया।

हां, कोहरे में लिपटी सरयू को देखना भी कोई कम अचरज की बात नहीं थी। कोहरा कहां नहीं था, हर ओर-हर छोर था। सर्द सुबह, सर्द दुपहरी और सर्द सांय के बाद हांड कंपाती रात! बावजूद इसके कलाकारों में अयोध्या के भांत भांत के दृष्य आयामों को उकेरने में अत्यधिक जोष था। षिविर जिस स्थल पर था, उस होटल का नाम था ‘षाने अवध’। माने अवध की शान। पर अवध की असल शान तो बाद में कलाकारों ने कैनवस पर उकेरी। महाराष्ट्र से आए सुहास बहुलकर, डगलस जाॅन, गोवा से आए हनुमान काम्बली, गुजरात के जयन्ती राबडि़या, दिल्ली के हेमराज और जय झरोटिया, राजस्थान के विनय शर्मा, भोपाल से आए लक्ष्मीनारायण भावसार, युसूफ, छत्तीसगढ़ से आए महेष चन्द्र शर्मा, बिहार के मिलन दास, प. बंगाल से आए अमिताभसेन गुप्ता, उत्तरप्रदेष के प्रणाम सिंह, राजेन्द्रप्रसाद और डाॅ. अवधेष मिश्र मूर्त-अमूर्त में अयोध्या के अतीत से जुड़े संदर्भों के साथ ही समय के साथ आए बदलाव और सामयिक संदर्भों को कैनवस पर उभारा।

कलाकारों के साथ कला समीक्षक के रूप में इन पंक्तियों के लेखक को भी विरल अनुभव शिविर के दौरान हुए। यह सच है! कैनवस पर कलाकारों की कला को देखना और उस पर लिखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह भी है कि कलाकारों को कैनवस पर काम करते देखा जाए। उनसे निरंतर बतियाया जाए। कला के उनके सरोकारों के चिंतन पक्ष को अंवेरा जाए। और कलाकार की स्वयं की कला के बारे में जो कुछ धारणाएं हैं, उसमें अपनी धारण मिलाते हुए फिर कुछ लिखने को जुटा जाए। इस दीठ से कला शिविर  में कला समीक्षक की उपस्थिति की अपनी भूमिका है। मुझे यह भी लगता है कि कलाकार और कला पर लिखने वालों के मध्य संवाद की कमी की बड़ी पूर्ति इस तरह के षिािवर ही कर सकते हैं। 
कलाकार जब कैनवस पर रोज कुछ उकेर रहे थे, उनके सृजन सरोकारों पर नाचीज बतिया भी रहा था। लगा, अयोध्या से जुड़े धार्मिक, पौराणिक स्थलों के साथ ही वहां से जुड़ी रही घटनाओं, इतिहास और मिथकों की कहानियां कैनवस दर कैनवस उतर रही है। कोई धर्म और आस्था को इनमें जी रहा था तो कोई रूढि़यों से परे इनमें वर्तमान की जीवंतता को तलाश  रहा था। हां, प्रकृति दृष्यों में जिन-जिन स्थानों को कलाकारों ने देखा था, वहां के सदंर्भों के साथ कैनवस पर उसकी छवियां भी कैनवस पर निरंतर उभरी। मसलन शिविर  में गोवा से आए कलाकार हनुमान काम्बली ने रावण वध का मोहक रेखांकन किया है। राम का धनुष और रावण के दस शिर ।
कैनवस पर प्रतीकों में और भी बहुत कुछ था। ऐसे ही महाराष्ट्र के सुहास बहुलकर ने कोप भवन में कैकयी के साथ ही हनुमान गढ़ी और रामजन्म भूमि से जुड़े संदर्भों के साथ पुराणों को समसामयिक संदर्भ दिए। महाराष्ट्र के ही जाॅन डगलस ने अयोध्या में इन दिनों छायी धुंध के संदर्भों में पौराणिक चरित्रों के साथ आम आदमी की मोहक व्यंजना की।  राजस्थान के विनय शर्मा ने सरयू नदी और वहां के घाटों को जेहन में रखते हुए अतीत और वर्तमान को अपने कैनवस पर जिया। उन्होंने शुरवंशियों की नगरी के प्रतीक रूप में अयोध्या को उभारा तो लव कुष द्वारा अष्वमेघ यज्ञ के घोड़ों को पकड़े जाने को भी बिम्ब प्रतिकों में उभारा। बनारस के प्रणामसिंह ने अयोध्या के मंदिरों में साधु-संतों की उपस्थिति और यहां के पौराणिक स्थलों की जीवंतता को कैनवस पर रंगों का छंद बनाते हुए उकेरा। 
डाॅ. अवधेष मिश्र ने गाढ़े रंगों की मूर्त-अमूर्त छवियों में गुप्तार घाट में राम की पादुकाओं की मोहक व्यंजना की तो एक दूसरे चित्र में उन्होंने अयोध्या के महात्म्य को उभारा। अयोध्या की पावनता को उकेरते हुए मंदिरों के परिवेष और श्री राम की खड़ाऊ को प्रतीक रूप मंे रखते हुए लखनउ के राजेन्द्र प्रसाद ने कैनवस पर मोहक छवियां रची। भोपाल से आए कलाकार युसूफ ने रेखाओं की महीनता में एब्सट्रेक्ट के जरिए मारीच की जो व्यंजना की उसमें जैसे सीता के हरण और स्वर्ण मृग का दृष्य आंखों के समक्ष जीवंत हो उठा। युसूफ रंग पट्टिकाओं में स्थान विषेष ही नहीं वहां के संदर्भों को बेहद संवेदनषीलता से अपनी कला में जीते हैं। ऐसा ही बिहार के मिलनदास के साथ भी है। वह हल्के रंगों में घुले पत्रों की इबारत में अयोध्या के संदर्भ जब उकेरे रहे थे तो एकटक उनके कैनवस को ही निहार रहा था। उन्होंने अयोध्या की प्राचीनता को जैसे हिन्दी, अंग्रेजी और उडि़या भाषा में कैनवस पर ढूंढ निकाला। कैनवस पर उनके हनुमान भी थे पर उनके रामायण से जुड़े तमाम संदर्भ भी। पशिम बंगाल से आए अमिताभ सेनगुप्ता की कला भी अद्भुत है। वह लिपियों में संवेदना के मर्म जैसे उद्घाटित करते हैं। एक कैनवस पर उन्होंने मर्यादा पुरूषोतम राम को केन्द्र में रखते हुए नीचे मिनिएचर, लोक कला के भी संदर्भ दिए। मध्यप्रदेष से आए प्रो. लक्ष्मीनारायण भावसार ने सरयू नदी में केवट और साधु संतों की मोहक व्यंजना की तो खैरागढ़ से आए महेषचन्द्र शर्मा ने परत दर परत रंगों में अयोध्या की मिट्टी, यहां के घरों और जन-जीवन में व्याप्त रंगों को कैनवस पर फिर से जिया। उन्होंने जटायु के संदर्भ में रामायण की कथा की दृष्य संवेदना को जिया। 
देशभर से आए कलाकारेां ने पांच दिन तक प्रवास कर अयोध्या के जो रूपाकार गढ़े हैं, वह भविष्य में कला की धरोहर के रूप मंे जाने जाएंगे, बषर्ते अयोध्या शोध संस्थान उनकी सार संभाल भी जतन से करें। इसलिए भी कि देश  के ख्यातिनाम कलाकारों ने इस षिविर में शिरकत  करते हुए अपने तई अयोध्या को कैनवस पर एक तरह से व्याख्यायित ही किया। ऐसे दौर में जब सब कुछ विवादों में डालने का रिवाज सा हो गया हो, यह सुखद है कि कलाओं के जरिए अयोध्या में संवेदना के राग और रंग कैनवस पर कलाकारों ने उकेरे।


Saturday, January 3, 2015

सुर जो सजे



धन्यवाद यतीन्द्र ! 

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिस्ट में कवि,संगीत आलोचक यतीन्द्र मिश्र ने "सुर जो सजे" की समीक्षा की है.
यतीन्द्र ने लिखा है - 

" पुस्तक के बारे में यह भी काबिले गौर है कि संगीत के तमाम सारे तकनिकी पक्षों, तथ्यों एवं उसके बनने के इतिहास को लिखते समय लेखक ने अपने आस्वादक को प्रमुख भूमिका में रखा है, जिससे किताब बोझिल बनने की बजाय एक सहज गति से बढ़ती हुई अपनी सांगीतिक अनुगूंजें पैदा करती चलती है. "

एनबीटी से प्रकाशित इस पुस्तक का  ब्लर्ब है -
'सुर जो सजे' में डॉ राजेश कुमार व्यास ने हिन्दी फिल्म संगीत के बहुत से स्तरों पर अब तक के अकहे इतिहास को संस्मरण-संवाद की अपनी विशिष्ट शैली में संजोया है। इसमें लोकप्रिय फिल्मी गीतों की धुन, उसके लिखे जाने और उसे संगीतबद्ध किए जाने के पीछे की कोई कथा, कोई व्यथा या अन्य कोई घटना-प्रसंग का रोचक वर्णन है। पढते लगेगा, संगीत सर्जना के क्षण आपके समक्ष जीवंत हो उठे हैं। यही इस पुस्तक की बडी विशेषता है। पुस्तक की शुरूआत लता मंगेशकर, मन्ना डे, गीतकार प्रदीप, गुलजार संगीतकार खैयाम, रवि, ओपी नैय्यर के साथ डॉ राजेश कुमार व्यास के हुए संवाद से होती है। फिर शुरू होती है, फिल्मी गीतों से जुडी 'सरगम' की रोचक दास्तां लेखक की संगीत रूचि और पत्रकारिता सफर की 'सुर जो सजे' एक प्रकार से अर्न्तरयात्रा है। पढते लगेगा, आप भी इस पुस्तक का हिस्सा' हैं। यही इसकी विशेषता है।


Saturday, December 27, 2014

दुनिया मेरे आगे

जनसत्ता  का लोकप्रिय स्तम्भ है, "दुनिया मेरे आगे" इस बार शुक्रवार को इसमें नृत्य के एक कार्यक्रम की अनुभूतियों को जो संजोया, वह प्रकाशित हुआ है. आस्वाद करें -


Thursday, November 27, 2014

देश की वह सितारा


सितारा देवी 
सच है! चमकता सितारा आसमां पर ही नहीं होता जमीं पर भी होता हैं। और सितारा देवी से बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा। देश में कथक के लोकप्रियकरण की नींव जिनने रखी, उनमें सितारा देवी अग्रणी रही। कथक की गतियों, बोलों और पढ़न्त का जो स्पेस वह रचती थी, वह अद्भुत था। आप उनके नृत्य की पुरानी कोई रिकाॅर्डिंग देख लीजिए, पाएंगे शास्त्रीयता को अंवेरते, परम्परा को सहेजते और सामयिकता की जीवंत करते सितारा देवी नृत्य में अवर्णनीय उत्साह, उमंग और ऊर्जा को जैसे ध्वनित करती। 
 मुझे लगता है, अंग-प्रत्यंग-उपांग में कथक को संवारने और लय के भांत के भांत के रूपक रचने का कार्य किसी ने हमारे यहां किया है तो वह सितारा देवी ही है। शास्त्र के साथ लोक की अनूठी संवेदना उनके पास थी। नृत्य में कहन का विरल लयात्मक अंदाज उनके पास था। उनके नृत्य में स्थापत्य की विविधता थी। कृष्ण लीलाओं की उनकी कथक प्रस्तुतियां को ही लें। देखते लगेगा, किसी एक कलाकार ने कृष्ण से जुड़े तमाम आख्यानों को अकेले अपने बूते भीतर की अपनी ऊर्जा से जीवंत किया है। याद करें, उनके ‘कालिया मर्दन’ नृत्य को। लगेगा, दृष्टि, शिर, ग्रीवा से वह कथा में निहित कहन को जैसे साक्षात् साकार कर रही है।  और यही क्यों, सूरदास की रचना ‘ठुमक चलत रामचन्द्र’ भी अद्भुत! यह सही है, अंत तक वह प्रस्तुति देती रही और इधर वय का असर भी साफ दिखने लगा था। पर चेहरे का उनका ओज और भाव-भंगिमाओं में निहित उत्साह से यह भी लगता कि वही ऐसी कलाकार हैं जो नृत्य के रूपाकारों में जीवन की उदात्ता को ढलती हुई उम्र्र में भी इस कदर खूबसूरती से रच सकती है। 
बहरहाल, दीपावली के दिन कोलकता में 1920 को यह महान नृत्यांगना जन्मी। पिता ने नामकरण किया धनलक्ष्मी। प्यार का नाम हुआ धन्नो। पर यही धन्नों बाद में कथक की प्रस्तुतियों से इस कदर चमकी कि पिता ने उन्हें सितारा कहना आरंभ कर दिया।  नृत्य में कहन के सौन्दर्य के बीज सितारा देवी में उनके अपने पिता सुखदेव महाराज ने ही बोये। वह संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, नाट्यशास्त्र मर्मज्ञ और बनारस घराने के प्रसिद्ध कथक नर्तक, कथाकार थे। कथक में पंडित सुखदेव महाराज ने ही धार्मिक तत्वों की कभी नींव रखी थी। सितारा देवी ने कथक में शास्त्रीय ताने-बाने को बरकार रखते हुए भी परिवेश से जुड़ी संवेदना और समय के साथ हो रहे परिवर्तनों से उसे निरंतर समृद्ध किया। संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, पद्मश्री के बाद भारत सरकार ने जब उन्हें पद्मभूषण देना चाहा तो सितारा देवी ने उसे ठुकरा दिया। उनकी  चाह ‘भारत रत्न’ की थी।...और मुझे लगता है, इसकी वह असल हकदार थी भी। आखिर क्यों नहीं ‘भारत रत्न’ उन्हें नहीं दिया जाता जिन्होंने संगीत, नृत्य, चित्रकला में अपने अप्रतिम योगदान के जरिए भारतीय संस्कृति की जड़ों को सींचने का कार्य किया है! 



Friday, November 21, 2014

उत्सवधर्मिता से जुड़ा कला पर्व


आर्ट समिट का  शुभारम्भ अनुप्रिया ने की सामुहिक उत्साह की सुमधुर व्यंजना 
जयपुर पिछले कुछ दिनों लगातार कलाओं के रंगों से सराबोर रहा। इस मंगलवार को ‘जयपुर आर्ट समिट’ का समापन हो गया पर उसके रंग अभी भी फीजा में जैसे बिखरे पड़े हैं।  उत्सवधर्मिता की दीठ से कला का यह आयोजन किसी मेले और पर्व सरीखा ही था।

 पिछले वर्ष इसकी शुरूआत चंद कलाकारों की पहल से हुई थी और इस वर्ष यह सच में परवान चढ़ा। कोई काॅरपोट घराना नहीं, मुनाफे के बाजार का प्रयोजन नहीं, सरकार का बड़ा साथ नहीं फिर भी अच्छे उद्देश्य के लिए स्थानीय कलाकारों का मेल कैसे किसी दुरूह आयोजन को अंजाम दे सकता है-‘आर्ट समिट’ इसका उदाहरण है।  

बहुत से स्तरों पर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से यह कहीं अधिक सफल, सहज और आम जन की कला संवेदनाओं में रंग भरने वाला था। इस मायने में भी कि बाजार के रंगों से परे यहां संवेदना के सुर ध्वनित हो रहे थे। बाहर से आए कलाकार अंदर से प्रफुल्लित थे, कलाओं का आस्वाद करने वाली भीड़ के अंदर कहीं कोई बोझ नहीं था। फुर्सत थी और उत्सवधर्मिता का गान भी हर ओर, हर छोर था। हां, सस्ते प्रचार हथकंडे के लिए कला के नाम पर आस्था पर प्रहार करते अनर्गल प्रयोग के कलाकार की विकृत मानसिकता को छोड़ आयोजन काबिले तारीफ था।
जवाहर कला केंद्र में एक संस्थापन यह भी 
बहरहाल, एक निजी होटल में ‘आर्ट समिट’ के शुभारंभ की वह सुबह सुहानी जिसमें वायलिन पर राग बसंत की स्वरलहरियां छिड़ी। पता नहीं क्यों, वायलिन के सुर सदा ही एकाकीपन को व्यंजित करते मन के भीतर की व्यथा को बाहर निकालते ही प्रतीत होते रहे हैं। पर जैसे-जैसे वायलिन के सुरों का कारवां आगे बढ़ा, लगा वातावरण में बासंती रंगों को ध्वनित करते अनुप्रिया ने सामुहिक उत्साह की सुमधुर व्यंजना की है। 

देश-विदेश के एक दर्जन कलाकारों ने कला के इस पर्व में मूर्त-अमूर्त में कैनवस पर रंग-रेखाएं उकेरी तो कलादीर्घाओं में प्रदर्शित कलाकृतियां से कला के अतीत, वर्तमान और भविष्य की आहटें जैसे ध्वनित हो रही थी।  लगा, स्थानीय विषयों के साथ वैश्विक सरोकार तेजी से कला में बढ़े हैं। हां, संस्थापन में गंभीरता के साथ अनर्गल की भी भरमार कम नहीं देखने को मिली। कला फिल्मों की दीठ से आयोजन विश्व के बेहतरीन आयोजनों में शुमार किया जा सकता है। श्वेत-श्याम छायाचित्रों की प्रक्रिया के बहाने छायांकन के सौन्दर्य में रमे जीवन के स्पन्दन की हिमांशु व्यास की वृत्तचित्र व्यंजना अद्भुत थी। मन को मथने वाली। विनय शर्मा ने संस्थापन को नाटकीय रूप में रखा। पन्नों निर्मित पोषाक का उनका विचरण दर्शकांे के लिए कौतुक जगाने वाला था। हां, कला संवाद के अंतर्गत वक्ताओं ने क्या कुछ कहा, उनके सरोकारों पर उदासीनता ही अंत तक पसरी रही। 
कला संस्कृति विभाग के प्रमुख शासन सचिव शैलेन्द्र अग्रवाल ने आयोजन के शुभारंभ के दिन कला प्रोत्साहन के लिए सभी को मिलकर प्रयास की बात कही थी। सच भी है! सरकार, उद्यमी, कलाकार और आम जन यदि स्वयं पहल करे तो क्या नहीं हो सकता। ‘आर्ट समिट’ से बेहतर इसका और उदाहरण क्या होगा!