Sunday, April 24, 2016

रंग-रेखाओं में ध्वनित संस्कृति छन्द


 भाषाई भिन्नता और परिवेष की असमानता होते हुए भी राम भारतीय संस्कृति में भावों के सुन्दर छन्द सरीखे है। यह है तभी तो कार्बी रामायण के राम आदिवासी रूप में लोक संवेदनाओं का उजास बिखेरते हैं तो वन में रहते वह कबिलाई संस्कृति के संवाहक भी कला में बनते हैं। इण्डोनेषिया, थाइलैण्ड, बर्मा आदि सुदूर देषों में राम की लीला है। फैजाबाद में अयोध्या शोध संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कला षिविर में बतौर कला समीक्षक भाग लेते यह जैसे गहरे से अनुभूत किया। देष के विभिन्न प्रांतों से आए 15 कलाकारों ने अयोध्या के राजा और स्थापत्य को केन्द्र में रखते हुए कलाकृतियों का सृजन किया। 
शिविर में मुम्बई के शार्दूल कदम ने अपनी कलाकृति में राम-सीता के जनजातीय स्वरूप के साथ ही अयोध्या के स्थापत्य की व्यंजना में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत गूड़ी पर्व को भी याद किया। अरण्य प्रवास के उनके चित्र रूपक में राम और सीता के पुष्प आभूषण अलग से ध्यान खींचते हैं। बड़ौदा के राहुल मुखर्जी वृहद विषयों का एक तरह से कैनवस रूपान्तरण करते हैं। उनके चित्र रूप गोठ हैं। उनके एक चित्र का आधार रामायण के सातों काण्डो से जुड़े प्रसंग है। दूसरे चित्र में रघुवंष की व्यंजना भी कुछ ऐसी ही है। गुवाहाटी के दिलीप तामुली ने असम के आदिवासी इलाकों में रची-बसी कार्बी रामायण के राम को अपने चित्र का आधार बनाते आदिवासी राम के चरित्र चित्रण को श्वेत-ष्याम में रचा। उनका चित्र ‘सबिन अलून’ माने राम का गाना है। हेलेन बाला ब्रह्मा भुवनेष्वर की हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता है, रेखाओं की ओपती लय और टैक्सचर। अपने एक चित्र में हेलेन ने स्वर्णमृग को उकेरा है। ओडि़सा की सुप्रसिद्ध सम्बलपुरी साड़ी के रंगो को कैनवस पाष्र्व बनाते उन्होंने स्वर्णमृग के बहाने रामायण को आख्यायित किया है। 
भोपाल की अपर्णा अनिल ने राम और अयोध्या के राजाओं की प्रतीक और बिम्बों में रेखीय व्याख्या की है। कैनवस में गहरा नीला रंग और उनमें रेखाओं में रचे तीर-धनूष के सुनहरेपन में उन्होंने राम की मर्यादापुरूषोतम छवि की जैसे दृष्य व्याख्या की है। उनके सृजित चित्र में बरते रंग अयोध्या के शासकों के साथ ही राम की असीम उदात्तता और घट-घट में व्याप्त उनके आदर्ष को जैसे व्याख्यायित करते हैं। मुझे लगता है, रंगो की उत्सवधर्मिता में अपने चित्रों में वह रेखाओं का जैसे छन्द रचती है। 
मुम्बई के डगलस जाॅन ने अपने कैनवस में अयोध्या नगरी और सरयू का सांतरा चितराम किया है। उनके चित्र में अयोध्या के प्रमुख स्थानों, मंदिरों, हिन्दु और मुगल स्थापत्य के साथ ही सरयू नदी को प्रतीक रूप में उकेरा गया है। दूसरे चित्र में चित्त को आकर्षित करते राम की मोहक छवि है। बहुत सारे गहरे रंग पर धीरे-धीरे परछाई स्वरूप में वह वह उन्हें इस कदर हल्का कर टैक्सचर का हिस्सा बना देते हैं कि उनकी सिरजी आकृतियों से औचक अपनापा होने लगता है। कोलकत्ता के दिप्तिष घोष दस्तीदार के चित्र देखने की हमारी बंधी-बंधाई सोच से जैसे हमें विलग करते हैं। दूर-लघू परिप्रेक्ष्य (परस्पेक्टिव) में वह चरित्रों को सर्वथा नए ढंग से हमारे समक्ष उद्घाटित करते हैं। उनके एक चित्र में धनुष-बाण लिए राम है तो दूसरे में सेतुबंध के दौरान मदद करने वाली गिलहरी को लिए राम है। दोनों में ही रेखाओं की लय अंवेरते उन्होंने राम के चरित्र और घटना विषेष के भावों की गहराई को छूआ है। 
पटना के मिलन दास ने लोक में व्याप्त राम-सीता को अपने तई कैनवस मं जिया है। टैक्सचर में बिहार की जनजातीय कलाओं, खासकर मिथिला कला का परिवेष रचते उन्होंने लिपियों की भाव सर्जना में राम लीला को ही जैसे उकेरा है। पीले, हरे, लाल, नीले, सफेद रंगो को कैनवस पर पोतने की बजाय वह जैसे बिखेरते हैं। रंग लय के साथ टैक्सचर में बुने राम और सीता और पाष्र्व में अक्षरों की बुनघट। लोक में गुंजरित रामकथा जैसे उनके कैनवस पर चलायमान है। उनकी कलाकृति बिहार की सुप्रसिद्ध कला मधुबनी  का समकालीनता में जैसे पुनराविष्कार है।
जयपुर के विनय शर्मा ने इस बार कला षिविर में सर्वथा नवीन प्रयोग किया। अयोध्या स्थित नया घाट में सरयू नदी के भीड़-भाड़ रहित एक तट को उन्होंने अपने कैनवस का हिस्सा बनाया। श्रीमदभागवत के नवें स्कन्ध में आए अयोध्या के चित्रण को आधार बनाते उन्होंने अपने दूसरे चित्र में सूर्यवंषी राजाओं की परम्परा, यज्ञ से जुड़ी भारतीय संस्कृति और अयोध्या के स्थापत्य अलंकरण को बिम्ब और प्रतीक में रखते हुए रंगो का जैसे छन्द रचा है। लखनऊ के अवधेष मिश्र ने लव-कुष द्वारा पकड़े गए अष्वमेघ यज्ञ के घोड़े को कैनवस पर जीवंत किया है। नीले, लाल, हरे, पीले, भूरे रंगों के घोल में रेखाओं की लय रचते अवधेष ने घोड़े के बहाने जीवन की गति और राम से जुड़ी आदर्ष की भारतीय संवेदना को अपने कैनवस पर जैसे मुखर किया है। उनके दूसरे चित्र में अयोध्या का षिल्प केन्द्र में है। इमारतों की बारीकी में जाते उन्होंने वृत्त में स्थापत्य प्रतीक मछली को भी कैनवस पर बुना है।
अवधेष के चित्रों में स्थान, परिवेष से जुड़ी संवेदना उनके बरते रंगों और रेखाओं में ऐसे ही ध्वनित होती है। चेन्नई के षिवा बालन ने अपने कैनवस पर अयोध्या के कनक भवन की भव्यता को उकेरा तो दिल्ली के एम.के. पुरी ने अयोध्या से भारतीय जन-जीवन के जुड़ाव के आलोक में राम के घट-घट में व्याप्त होने की दृष्य सर्जना की। लखनऊ के राजेन्द्र प्रसाद ने समाधिस्थ राम का चित्रांकन किया है। राम है पर तापस स्वरूप में। रंग और रेखाओं का उनका पाष्र्व तप की भारतीय संस्कृति का आख्यान स्वरूपा है।
बहरहाल, कला षिविर में सिरजे राम और अयोध्या के स्थापत्य विषयक चित्रों में रंगाच्छादन और मौलिक दृष्य प्रभाव कुछ इस तरह से है कि कला में रूप तत्वों का सांगीतिक आस्वाद होता है। भिन्न प्रांत पर राममय भारतीय संस्कृति को कलाकारों ने रंग और रेखाओं में  गहरे से जिया है। यह है तभी समालीनता की लय के बावजूद लगभग सभी चित्रों में पारम्परिक भारतीय चित्र शैलियांे की दीठ भी है और है, लोक कलाओं का अलंकरण। 


Tuesday, March 8, 2016

सांस्कृतिक नीति के लिए हो चिंतन


लोकतंत्र की परम्परा और उसकी विशिष्टता जनभागीदारी की सतत तलाश है और यह किसी भी समाज में कला, संस्कृति और साहित्य के स्वस्थ मूल्यों से ही हो सकती है। सोचता हूं, कलाओं का मूल आधार संस्कृति ही तो है। जीवन से जुड़े संस्कारों की नींव भी संस्कृति ही तैयार करती है। 
ऐसे दौर मे जब जीवन मूल्यों का ह्ास हो रहा है, यह जरूरी है कि संस्कृति से जुड़े सरोकारों पर हम विचारें। संस्कृति को जीवन के व्यापक संदर्भों से जोडने की पहल हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हो। स्वाभाविक ही है कि दूसरे कार्यों में इससे अपने आप ही शुरूआत हो जाएगी। सरकारी अकादमियां और संस्थाएं सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का कार्य कथित रूप में करती भी है परन्तु उनकी प्राथमिकताओं में संस्कृति से जुड़े पहलुओं का स्थूल रूप भर है। यानी साहित्य अकादेमी साहित्य के लिए, संगीत नाटक अकादेमी संगीत, नृत्य और नाट्य के लिए, ललित कला अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए कार्य करती है परन्तु संस्कृति इनसे ही नहीं है। संस्कृति समुदाय के आचरण से है। संस्कृति मनुष्य का व्यवहार और जीवन जीने का ढंग है। जैसे बीज हम बोएंगे-फल वैसा ही मिलेगा। सांस्कृतिक आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ जीवन को पोषित करती है। स्वाभाविक ही है कि इसके लिए सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही कार्य हो सकता है। 
संस्कृति और सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार प्राथमिकता रखते हुए इस ओर पहल करे तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। संस्कृति मूल्यों की सृष्टा और संपोषक है। साहित्य और कला अकादमियों के गठन और वहां पर अध्यक्ष, सदस्यों के मनोनयन या फिर किसी तरह के साहित्य, कला उत्सव करने से संस्कृति पोषित नहीं होती। साहित्य और कला के साधनों और सुविधाओं का विकास तो एक बात है परन्तु इससे भी बडी जरूरत यह है कि कलाएं अभिजात या फिर सीमित वर्ग तक की पहुंच के साथ तमाम जनता तक पहुंचे। स्वस्थ और दीर्घकालीन नीति यदि संस्कृति की बनती है तो उसमें साहित्य और कलाओं का ही नहीं व्यक्ति की सोच बदलने तक की ताकत है। यह बड़ी बात है पर पहली आवश्यकता तो अभी यही है कि प्रदेश की अपनी सांस्कृतिक नीति हो, ऐसी जिसमें साहित्य और कलाएं व्यापक संदर्भों से जुडे। 
साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं में जो मठाधीश लोग हैं, उनकी बजाय सर्जन के सरोकारों से जुडे मूल लोगों को जोडते हुए, उनसे परामर्श करते हुए राज्य की सांस्कृतिक नीति बनायी जाए। ऐसी सांस्कृतिक नीति जिसमें मायड भाषा राजस्थानी के लिए कार्य हो, जिसमें संगीत, नृत्य चित्रकला और खासतौर से लोक कलाओं का जमीनी स्तर पर संरक्षण हो। संस्कृति की जीवंतता किससे  है? अंतर्विरोधों की पहचान से ही तो! अच्छे-बुरे की समझ से। इसलिए जरूरी यही है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हुए हम एक सुनियोजित सांस्कृतिक नीति के तहत सांस्कृतिक हों। संस्कृति जिससे जीवंत हो जीवाश्म न बने। आखिरकार तमाम हमारी कलाओं और दर्शन पर संस्कृति का ही तो प्रभाव रहता है। वह समृद्ध होगी तो हम भी समृद्ध-जीवंत रहेंगे। 
यह बात याद रखे जाने की है कि सभ्यताएं बदलती है पर संस्कृति चिरंतन है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, नाट्य आदि का नैतिकता से संबंध हो या न हो परन्तु विचार से निष्चय ही है। विचार के लिए हमें सांस्कृतिक होना पड़ेगा। पाठ्यपुस्तकों से संस्कारित करने का राग भले हम कितना ही अलापें परन्तु कोई भी विचार संस्कृति से जुड़कर ही संस्कारों का वाहक हो सकता है। इसीलिए जरूरी है, संस्कारों के लिए सांस्कृतिक नीति बने। 
हमारी संस्कृति ‘मनुर्भव’ में है। यानी मनुष्य बनें, में। मनुष्य बनने का संस्कार, ऊर्जा का स्त्रोत संस्कृति ही है। संस्कृति अपने व्यापक रूप में समाज की तमाम कलाओं, साहितय, ज्ञान, विचारधारा, सामाजिक, धार्मिक-प्रथाओं, कानून एवं क्षमताओं के साथ आदतों का मिला-जुला रूप ही तो है। इसी से व्यक्ति वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के आदर्ष निर्मित करता है। संस्कृति व्यक्ति नहीं, समाज की संपति है। हां, उसके स्वरूप-निर्माण और विकास में प्रत्येक व्यक्ति का कम या अधिक योगदान अवष्य रहता है। इसी कारण वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है या कहें हरेक की भागीदारी इसमें जरूरी है। इसीलिए कहें वही सत्ता सार्थक है जिसमें संस्कृति की सोच हो। संस्कृति में निवेष भविष्य का संचय है। मानवीयता के लिए निवेष है। समाजगत अपेक्षाओं की पूर्ति संस्कृति में निवेष के जरिए ही संभव है। कोई भी लोकतंत्र परिष्कृत तभी माना जाता है जब वहां प्रष्नवाचक संवाद हो। भौतिक जरूरतों के लिए ही नहीं, संस्कृति के लिए भी संवाद वहां हो। विडम्बना यह है कि संस्कृति के प्रष्न पर हम सभी मौन हैं। जबकि लोकतंत्र की मजबूती स्वतंत्र विचारों से हैं, बासी विचारों से नहीं। नवीन स्थापनाएं संस्कृति की समझ से ही हो सकती है।
अमेरिका में राज्य सीधे भले ही संस्कृति में निवेष नहीं करता पर काॅरपोरेट क्षेत्र को कर में छूट देकर संस्कृति में निवेष के लिए प्रोत्साहित करता है। ऐसा हमारे यहां भी हो सकता है। सांस्कृतिक नीति बनाई जाए, उसमें ऐसे प्रावधान किए जाएं कि आम आदमी की भागीदारी से हमारी संस्कृति पल्लवित-पुष्पित हों। यह भी ध्यान रखा जाए कि संस्कृति के लिए कार्य हो पर उसमें सरकारीकरण या किसी विषेष विचारधारा की दखल नहीं हो। केवल और केवल संस्कृति से जुड़ा विचार हो। शास्त्रीयता हो परन्तु उसमें लोक के बीज भी हों। सभी जन उसमें अपने लिए ‘स्पेस’ देखते अपनी भागीदारी स्वयं तय करें। सरकार का काम प्रोत्साहन देना भर हो। इसी से व्यापक रूप में हम संस्कृति से जुड़े सरोकारों से सराबोर हो सकेंगे। यह बात याद रखने की है कि संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है। यहां कोई है, रह रहा है या भविष्य में भी रहेगा तो केवल और केवल अपने बूते। कोई यहां अपनी पीठ आप ठोकता भी है तो उसे स्वयं के अधिकारों की लड़ाई चाहकर भी बना नहीं सकता। आखिर, यही तो है सच्चा लोकतंत्र! इस लोकतंत्र को मजबूत करते राज्य की सांस्कृतिक नीति तैयार किए जाने पर क्या विचार होगा?

Tuesday, March 1, 2016

अदेखे की दृष्य सर्जना

दृष्टिहीन बच्चों के छायांकन की चित्र प्रदर्शनी ‘ध्वनियां’

कलाएं कल्पना और अनुभूति का संयोजन है। आंतरिक चक्षु के समक्ष उद्घाटित होते भले कलाओं को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सके, पर वस्तुगत दृष्टि से जाना जा सकता है। छायांकन को ही लें। प्रकाश-छाया प्रभाव से सृजित इस कला में जो कुछ दृष्टि का सच है, वहीं नहीं संवेदना का मर्म भी उद्घाटित होता है। 
बहरहाल, अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में दृष्टिहीन बच्चों के छायाचित्रों की प्रदर्शनी के बारे में पढ़ा था। लगा, बगैर दृष्टि कैमरे सेे कैसे दृश्य को संजोया जा सकता है! छायाकार मित्र महेश स्वामी एक रोज जिद कर प्रदर्शनी दिखाने ले गए। पहुंचा तब भी अनमनापन था, पर जब छायाचित्रों को देखा तो विश्वास नहीं हुआ। बगैर दृष्टि ध्वनियों ने जो सृजित करवाया, क्या वह इस कदर मोहक हो सकता है!  दृष्टिहीन बच्चों ने कैमरे से जो सिरजा उसमें प्रकृति में पसरे मौन की व्यंजना थी, नदी थी, नाव थी और था प्रकाश से टिमटिमाता लहरमय नीर। दृश्य और भी थे जिनमें कहीं बिखरे सूखे पेड़ की पत्ती, नदी की पाल पर रखी बैंच पर बैठे दो जन और पेड़ो की छांव के साथ प्रकृति की सौरम का छायांकन से रचा सौंदर्य था तो कहीं केवल कदमों की सरसराहट भर भी उनके कैमरे ने कैद की थी। एक छायाचित्र मैदान में बच्चों की खेलकूद भरी मस्ती को इंगित था तो एक में बाजार की हलचल थी। रेत, साईकिल, बरसात और परिवार से जुड़ी ध्वनियों  के आधार पर सृजित छायाचित्र देखने के भिन्न आयामों को जैसे हमारे समक्ष रख रहे थे। अचरज हुआ, आखिर कैसे बगैर दृष्टि के दृश्य संवेदनाओं के ताने-बाने को कैमरे से रचा गया होगा? पर पष्चिम बंगाल के दृष्टिहीन छायाकार अंजन, मिलन, फणी, दुलाल और टिंकू को छायांकन के लिए प्रेरित, दक्ष-प्रषिक्षित किया युवा फिल्म निर्माता, छायाकार और लेखक चन्दन राठौड़ और पद्मजा शर्मा ने। कभी नेत्रहीन छायाकार के बारे में फिल्म देखकर चंदन-पद्मजा के मन में दृष्ठिटीहन बच्चों से छायाकारी कराने का खयाल आया और दोनों ही इसके लिए प्रयास में जुट गए। उनके खयाल को बहुतेरों ने मजाक में उड़ाया तो कुछ को यह नागवार भी लगा। अंततः बंगाल के हुगली के सेवाडाफुली स्थित ‘सोसायटी फाॅर ब्लाइण्डस’ में यह दृष्टिहीन बच्चों को छायांकन के लिए तैयार करने की कार्यषाला हो पाई। लकड़ी के फ्रेम अी अनुभूति, अनुमान से दृष्यों को ध्वनि आधार पर पकड़ने और बहुतेरे ऐसे ही प्रयोग रंग लाए और अल्प समय में दृष्टिहीन बच्चों ने छायांकन कला को अपना लिया।
दृष्टिहीन बच्चों से उनके छायांकन अनुभवों पर संवाद हुआ तो लगा, उन्होंने ध्वनियों की अनुभूति से बाह्य सौंदर्य को आंतरिक चक्षुओं से उकेरा है। यह भी लगा आंख बहुत बार धोखा देती है, आप देखते हुए भी वह नहीं देख पाते जो महत्वपूर्ण होता है। इस दृष्टि से दृष्टिहीन बच्चों की ’ध्वनियां‘ चित्र प्रदर्शनी ने बहुतेरे स्तरों पर यह भी जैसे समझाया कि देखना आंखों से ही नहीं होता, हमारी साफ समझ से भी होता है। आखिर कलात्मक समझ परिवेश के अंतज्र्ञान के साथ समाप्त नहीं होती बल्कि वह इसे एक अर्थपूर्ण आकार देने का प्रयास ही तो करती है। 
मुझे लगता है ’ध्वनियां‘ प्रदर्षनी अनुभूतियों और कल्पनाओं का ऐसा सुरम्य ताना बाना है जिसमें छवियां प्रतिध्वनित हुई है। दृष्टिहीन विद्यार्थियों ने कैमरे के बहाने संवाद किया है- अदेखी प्रकृति से और जीवन से। उस दीठ से जो सदा उनके लिए अदीठ रही है, पर उनके कैमरे से हुए संवाद ने देख नहीं पाने की उनकी स्थाई चुप्पी को छायाचित्रों के जरिए एक तरह से तोड़ा है। आंख नहीं होने पर प्रकृति में बिखरे सौंदर्य और जीवन के सरोकारों से अलग-थलग होने की बाधा को जैसे समाप्त किया है। 
कैमरे ने कुछ अलग नहीं किया है, पर बाह्य जगत, दृश्य के भिन्न आयामों से इन छायाचित्रों के जरिए दृष्टिहीनों को आकाष दिया है। एक संवाद स्थापित हुआ है-ध्वनियों के जरिए दृश्य की अनंतता से। और उससे शायद न देख पाने की इनकी आंतरिक बेचेनी का शमन भी हुआ है। यह है तभी तो दृृष्टिहीन छायाकारों से संवाद में उनके छायांकन कला से जगे भीतर के उत्साह को अनुभूत कर सका। सहज सवाल संवाद में यह भी हुआ कि दृष्टिहीन ये बच्चे कैमरा लिए क्यों उस अदृश्य के पीछे भाग रहे थे जो उनकी आंखे नहीं देख सकती। जवाब मिला, ’कैमरे ने हमारी अनुभूतियों और दृश्य की कल्पनाओं को जीवंत करने का मार्ग दिया है। हम जो कल्पनाएं ध्वनियों के आधार पर करते रहे हैं, अनुभूतियों को संजोते रहे हैं, उन्हें छायाचित्रों के जरिए प्रकट कर रहे हैं। शब्द से जो बंया नहीं कर सकते, छवियां वह शायद बता रही हैै।‘
सच भी है, छायांकन कला की सांकेतिक भाषा है। कल्पना और अनुभूतियों से बाह्य परिवेश को फिर से नए रुप में सृजित करने की। इसके लिए बाहरी आंख की कहां जरुरत है! आंतरिक चक्षु ही पर्याप्त है। दृश्य के लिए समझ का साफ होना जरुरी है। कलाएं समझ को पाक-साफ ही तो करती है। दृष्टि वहां कहां बाधक है!

Wednesday, February 24, 2016

देखने, सुनने और गुनने का संस्कार देती कलाएं

कलाएं देखने, सुनने और गुनने का संस्कार देती है। खजुराहो नृत्य समारोह में 'कलावार्ता' के अंतर्गत दिए व्याख्यान के केन्द्र में यही सबकुछ साझा किया। 

सुखद लगा, विश्व के बेहतरीन नृत्य आयोजनोें में से एक 'खजुराहो नृत्य महोत्सव' कलाओं के अंर्तसंबंधों का संवाहक बनता जा रहा है। जब बोल रहा था, सुनने वालों में नृत्य से जुड़ी देश की प्रतिभाएं थी, चित्रकार थे, नाट्य कलाकार थे और थे साहित्य की संवेदनाओं से जुड़े वह रचनाकार भी जो कलाओं में सौंदर्य की मेरी अनुभूतियों का रस ले रहे थे। 

...कलाओं के विशाल भव से स्वयं भी तो निरंतर साक्षात् होता वहां अपने को संपन्न पा रहा था। कभी न भुला देने वाली अनुभूतियां सहेजे देह से लौट आया। ...मन की यात्रा तो अविराम है. 


Sunday, February 14, 2016

जीवनगत सरोकारों की बारीक पड़ताल


सुधीर तैलंग काटूर्निस्ट भर नहीं थे, उम्दा इंसान और संस्कृति के रेखीय पोषक भी थे। यह सही है, वह राजनीतिक विषयों को लेकर ही अधिकतर काटूर्न बनाया करते थे पर समाज के विदु्रप को भी वह अपनी पैनी नजर से अपने कार्टूनों में निरंतर उघाड़ते  रहे। याद है, देश में गणेश जी को दूध पिलाने की अफवाह जब तेजी से फैली और सारा देश गणेश मूर्तियों को दूध पिलाने में लगा था, उनका एक कार्टून आया। इसमें लंबोदर गणेश की तोंद बहुत अधिक बड़ी दिखाई दे रही है,। पास में उनका वाहन चूहा हंस रहा है और मदर डेयरी का टेंकर खड़ा दिखाई दे रहा है। वाहन चालक कह रहा है, ‘प्रभू! यह अंतिम टैंकर है।’(माने सारा दूध तो आपको पिला दिया गया है) उनके इस काटूर्न को लेकर अंधश्रद्धालुओं ने बवाल भी खूब मचाया परंतु सुधीर तैलंग ने समाजगत रूढि़यों को उघाड़ते अपनी रेखाओं की धार को कभी कुंद नहीं होने दिया।  
राजनीति के अंदरूनी सच को उनकी रेखाओं ने परत दर परत निरंतर उघाड़ा। उनका एक कार्टून अभी भी जेहन में बसा है। कार्टून क्या, सच को बयां करने का उनका वह अंदाज न भूला देने वाला है । काली रेखाओं से उकेरा कमाण्डों सुरक्षा में खड़ा है और सिंहासन रूपी कुर्सी पर सफेद झक्क कपड़ो में नेताजी विराज रहे है। उनके इस कार्टून का कैप्सन है-‘ब्लेक कमांडो एण्ड व्हाईट ऐलिफेंट’। नेताओं को सफेद हाथी कहने की ऐसी कार्टून व्यंजना के बहु़तेरे दसरे आयामों में उन्होंने देश की राजनीति के अंदरूनी सच को सदा ही अपने व्यंग्य चित्रों से उभारा। उनका कहना भी था, राजनेता जनता के लिए उपयोगी भले नहीं हो परन्तु कार्टून बनाने वालो के लिए काम आने वाले कोई हैं तो वह राजनेता ही है। 
उनसे कभी भेंट का सुयोग नहीं हुआ पर उनके व्यंग्य चित्रों की धार देखने को मन लालायित सदा ही रहा। एक कार्टून संसद का उन्होेंने कभी बनाया था। मानसून सत्र चल रहा है, संसद परी तरह से पानी में ड़ूबी है, नेताजी संसद की छत को फाड़ बाहर निकले है। संसद जैसे गुहार कर रहीं है-बचाओ बचाओ। मुझे लगता है, अच्छे व्यंग्य चित्र यहीं करते है। वे आपको अंदर तक झकझोर देते है। कंधार अपहरण के दौरान पूर्व मंत्री जसवंत सिंह का तालिबानी वेश में बनाया कार्टून हो या फिर मुंबई आतंकवादी हमलों के दौरान बनाये कार्टूनों की उनकी वह श्रृखंला जिसमें सभी देश को, मीडिया को संबोधित करने में व्यस्त है-आतंकवादियों से निपटने की किसी को कोई फुर्सत नहीं है। 
मुझे लगता है वह जो कुछ घटित हो रहा होता  उसी को नहीं बल्कि उसके अंतर्निहित उस सच पर भी जाते जिस पर आमतौर पर ध्यान जाता नहीं है। उनकी रेखाओं मे समय-परिवेश से जुड़ी संवेदनाओं का अंदरूनी राग निरंतर ध्वनित होता रहा है। एक बड़ी विशेषता उनकी रेखाओं की यह भी लगती है कि वहां स्थान विशेष की संस्कृति के परिवेश की छाप खास तौर से नजर आती है। माने किसी राज्य  से जुड़ा कोई कार्टून उन्होंने बनाया है तो उसमें उससे जुड़े परिवेष की सूक्ष्म व्यंजना भी वहां मिलेगी ही। उन पर आरंभ में यह आरोप भी लगा कि वह अंग्रेजी के कमजोर कार्टूनिस्ट है पर बाद में उनकी रेखाओं और सधे कैप्षन इस बात के गवाह भी बने कि विचार से जुडे तीव्रतम संवेग में वह जीवनगत सरोकारों को बारीकी से खंगालते विसंगतियोें पर गहरा प्रहार करने वाले थे। यहीं कारण था कि देखने के बाद भी उनके कार्टून आंखो में सदा के लिए बसते थे। 
सुधीर तैलंग का मानना भी था कि लोकतंत्र में कार्टूनिस्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए कि वह समाज में जो कुछ हो रहा है या फिर होने की आषंका है-उसके लिए पाठकों को जागरूक करता है। यह आसान नहीं है कि प्रतिदिन कोई शानदार विचार आपके दिमाग में आए ही परन्तु कार्टूनिष्ट के पास राजनेता है जो जनता के लिए नहीं पर कार्टूनिस्टों के लिए पूरें दिन कार्य करने को तैयार है। उनके कहे के इस मर्म में कार्टून कला के मर्म को गहरे से समझा जा सकता है। उन्होंने निरंतर कार्टून बनाए। काटूनिष्ट के रूप में इलेस्ट्रेड विकली में उन्होंने काम किया। हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए बरसों उन्होंने कार्टून बनाए। टाइम्स आॅफ इण्डिया और नवभारत टाइम्स भी उनके कार्टूनों से सजता रहा। अपने कार्टूनों में उन्होंने भारतीय राजनीति का जैसे रेखीय व्यंग्य इतिहास लिखा। 
सुधीर तैलंग निरंतर कहते भी रहे, कार्टून की हरेक लाईन का अपना जीवन होता है। हरेक लाईन कुछ कहती है। वह जीवंत होती है। उनके भीतर के उम्दा इंसान को इसी से समझा जा सकता है कि कभी उन्होंने कपिलदेव का सात फुट का व्यंग्य चित्र बनाया था, इसकी निलामी से मिली राशि को उन्होंने बच्चों के फंड में दान कर दिया था। इसी प्रकार भोपाल गैस त्रासदी में हताहत हुए लोगों की राहत के साथ ही उन्होंने राजस्थान के सूखा प्रभावित लोगों के लिए भी अपने कार्टूनों की बिक्री कर राशि जुटाई थी। 
सुधीर तैलंग राजनेताओं की मुखाकृतियों के बहाने उनके भीतर अपनी रेखाओं से जैसे झांकते थे। कार्टून में विचार के संवाहक सुधीर की रेखाओं का सुघड़पन और कंपोजिशन सेंस के साथ ब्रश-स्टोक घटनाओं, स्थितियों का आकाश स्पन्दित करता था। वह नहीं है परन्तु उनकी रेखाएं और उनमें व्यंजित जीवन से जुड़े सरोकारों पर रखी पैनी नजर सदा हमें उनकी याद दिलाती रहेगी।

Sunday, February 7, 2016

अन्तःसौन्दर्य का गान

स्वामी संवित सोमगिरी अभियांत्रिकी अध्यापन से बरसों तक जुडे़ रहे हैं पर मन वैराग्य में रमा, सो वेदान्त का अध्ययन व साधना करने सब कुछ छोड़-छाड़ सन्यासी हो गए। वेद-पुराणों के साथ ही भगवद्गीता पर उनकी सूक्ष्म दीठ के प्रकाषित साहित्य ने सदा ही मन मोहा है पर इधर सद्य प्रकाशित उनका काव्य संग्रह ‘प्रणव ने हृदय में गाया’ पढ़ते प्रकृति और जीवन के नए संदर्भों से साक्षात् होता है। 
उपनिषदों के आलोक का हममें वास कराता यह ऐसा संग्रह है जिसमें किसी सन्यासी की अनुभूतियो की अनूठी दीठ है। प्रकृति के विरल अभिप्राय हैं तो संवेदनाओ की वह दार्षनिक व्यंजना भी जिसमें प्रकृति और व्यक्ति के होने की तलाश को नए अर्थ दिए गए हैं। 
प्रकृति और जीवन के बाह्य परिवेष के सौन्दर्य के बहाने भीतर के राग की रस वृष्टि यहां है। यह है तभी तो सोमगिरिजी जी संग्रह में अपने को पूर्णता से भरने का आग्रह करते ‘मुझे आकाष कर’ जैसे शब्दों में वात्सल्य को नए अर्थ देते आंखों में आकाश और क्षितिजों को पलकों में भरने को उद्यत होते हैं। 
‘प्रणव ने हृदय में गाया’ रूपी अपने कविता घर में वह ‘गंगा-मां’ से संवाद करते हैं तो ‘श्रीगुरू-अवतरण’ कविता में शब्दों की जैसे गागर छलकाते  हैं, ‘नर तन थरकर/आये गुरूवर/समरस करने/बाहर-अंदर’। ऐसे ही हृदय के अंतरतम भावों का आकाष रचते सोमगिरिजी ‘ओ सूरज! तुम मुझेमें उगो’, ‘ऐसा दो सुनसान मुझे’, ‘षब्दों! सुनो-मत पहनो पराये वसन’, ‘शिल्पित-संस्कृत’ जैसी शब्द व्यंजना में अंतर्मन संवेदनाओं के मर्म से ठौड़-ठौड़ साक्षात् कराते हैं। संग्रह में प्रकृति  और मानवेतर का अंष-अंष शब्दोद्घाटन है। जो कुछ देखा-सुना और छूआ जा सकता है, वही नहीं बल्कि उससे परे की संवेदना को भी इसमें गहरे से गुना और बुना गया है। प्रकृति के अनूठे अभिप्राय संग्रह में है तो अनुभूति की तीव्रता में मर्मस्पर्षी बिम्बों का अनूठा भव भी रचा गया है। यह है तभी तो इसमें बरते शब्द संवेदना की हमारी आंख बनते बहुत कुछ वह दिखाते है जिसे सामान्यतः हम देख नहीं पाते हैं। 
संग्रह में सोमगिरिजी के काव्य संकेत मन को मथते हैं, शब्द नहीं शब्द से जुड़ी संवेदना इसी कारण औचक, बार-बार हममें बसती है। औचक केनोपनिषद् के पढ़े को फिर से जैसे जीने लगता हूं। केनोपनिषद् में ईष्वर, ब्रह्म, परमात्मा के स्वरूप को गुरू द्वारा समझाने के बाद भी षिष्य की फिर से जिज्ञासा है, ‘उपनिषदं भो ब्रूहीति’-मुझे उपनिषद् कहिए। शब्द जहां पहुंच नहीं पाते, सोमगिरिजी के भाव वहां पहुंच-पहुुंच फिर से कुछ और जानने को प्रेरित करते हैं। मन विचारने लगा है, कविता क्या है? अन्तःसौन्दर्य का गान ही तो। लय में अंवेरा संवेदना राग। तो कहूं, ‘प्रणव ने हृदय में गाया’ इसी की व्यंजना है।

कविता संग्रह: प्रणव ने हृदय में गाया
कवि: स्वामी संवित् सोमगिरि
प्रकाषक: मानव प्रबोधन न्यास, शिवबाड़ी, बीकानेर
मूल्य: एक सौ पचास, पृष्ठ: 128


Saturday, January 9, 2016

प्रकृति सौन्दर्य में घुली किस्सागोई


यात्राएं  घुम्मकड़ी के सौन्दर्य से ही साक्षात् नहीं कराती, स्थान-विषेष से जुड़ी संवेदना का राग भी हमें सुनाती है, मन को मथते हुए। कथाकार मधु कांकरिया का यात्रा-वृतान्त ‘बादलों में बारूद’ सुदूर आदिवासी इलाकों मे की गई यात्राओं का पत्रकारीय कोलाज है तो भ्रमण से जुड़ी संवेदनाओं में आत्म की खोज सरीखा भी है। इस यात्रा वृतान्त में जनजातीय इलाकों की छान-बीन है तो पहाड़, झरनों के सौन्दर्य का वह पाष्र्व भी है जिसमें सिसकती जिन्दकी का दर्द भी चुपके से बयां हुआ है। मधु कांकरिया के यात्रा लेखे की यह विषेषता है कि वह चिर-परिचित स्थानों में भी बहुतेरा वह अदेखा बंया होता है, जिस पर आमतौर पर नजर जाती नहीं है। मसलन उनके यात्रावृतान्त में रांची से 132 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुमला जिले के विषुनपुर प्रखंड और वहां से भी और अंदर की उनकी यात्रा में प्रकृति में धुले अकूत सौन्दर्य से तो साक्षात्कार होता ही है, आदिवासी जीवन और उनके संघर्ष की व्यथा-कथा से भी हम रू-ब-रू होते हैं। अपनी इस यात्रा में वह लुट रहे जंगल की पीड़ की शब्द व्यंजना करती है तो वहां रहने वाले और सदियो से शोषित आदिवासियों के अनुभवों की आंख को अपनी आंख भी बनाती है। आदिम जनजाति बिरसिया के ‘सुक्का दा’ के साथ की यात्रा में उनके जरिए वह आदिवासी परम्पराओं और जीवन से जुड़े बहुत से प्रसंगों को सभ्य समाज से जोड़ती है। इस दौरान लेखिका की चिंतन से जुड़ी मनकही से भी पाठक साक्षात् होते हैं। इस मनकही में जंगल के हसीन सफर में देषातीत और कालातीत होती मधु कांकरिया प्रकृति के पूर्णतत्व के अपने अहसास को बहुतेरी बार पाठकीय अहसास भी बना देती है। रांची से विषुनपुर के सफर में लेखिका खूबसूरत झारखंड के जंगलो की ओर जाने को प्रेरित भी करती है। लिखती है, ‘नजरों की छोर तक बिखरा हरियाला सौन्दर्य और ऊपर केसरिया होता आकाष!’ 
मधु कांकरिया ने अपनी इस घुम्मकडी में बहुतेरी ऐसी परम्पराओं को भी जीया है, जिनसे शहरी समाज का नाता शायद कभी पडता नही है। मसलन रांची से विशुनपुर, की यात्रा के अंतर्गत प्यास लगने पर चेचू बनाकर पानी पीने की परम्परा। आदिवासी क्षेत्रों में कम पानी की नदी में गंदगी के चलते जब लेखिका पानी पीने में संकोच करती है तो साथ चल रहे आदिम जन जाति बिरसिया के सुक्का दा कहते है, रूकिये आपके लिए चेचू बना देते है। चेचू यानी देशी फिल्टर। नदी किनारें की गीली रेत को खोदकर गढ्ढा बनाना और फिर उसमें जल भर देना। थोडी देर में पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है और स्वच्छ जल ऊपर तैरने लगाता है। यही चेचू है। 
बहरहाल, पुस्तक में ‘जंगलों की ओर’ तथा ‘पहाड़, पलामू और आग’ ऐसे यात्रावृत्त हैं जो रिपोर्ताज सरीखे हैं। इन्हें पढ़ते जनजातियों के बीच कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए वहां पहुंचे और पिछले कोई तीन दषक से वहां काम करने वाले अषोक राय से अषोक भगत बने व्यक्ति के जीवन की मानवीयता से भी पाठक साक्षात् होते हैं तो दूसरी ओर झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ के पीपूल्स वार के कमांडर रणधीर भगत से पत्रकार के रूप में भेंट का भी साहसिक दास्तां भी यहां है। चरित्र, स्थानों और वहां के जन जीवन को लेखिका ने अपने इन वृतान्तों में गहरे से जिया है। आदिम जनजातियों के जीवन से जुड़ी प्रथाओं की भी मोहक व्यंजना यहां है। मसलन यात्रा के एक रोचक प्रसंग में यह भी पता चलता है कि पलामू की महिलाओं में कुछ अधेड़ों या वृद्धाओं के चेहरे पर गोदने के तीन निषान होते हैं। दो गालों पर और तीसरा माथे पर। कहते हैं, इनके पूर्वज तीन युद्ध हार गए थे और इसी के प्रायष्चीत इन्होंने अभी तक तीन गोदना गोदवा रखे हैं। इसी यात्रा में डायन प्रथा का वह सभी लेखिका सामने लाती है जिसमे जमीन हड़पने के लिए औरत को डायन घोषित कर मरवा दिया जाता है। आदिवासी जीवन की रूढि़यां, अंधविष्वास और उनके जीवन के संघर्ष के बारे में अपने यात्रावृतान्त में लेखिका सहज बंया करती है।
मधु कांकरिया के पास स्थानों और वहां से जुड़े संदर्भों को लिखे में परोटने की सौंदर्य दीठ है। ‘बादलों में बारूद’ उनकी इस दीठ की ही मोहक व्यंजना है। उनकी इस घुम्मकड़ी में इतिहास से संवाद है पर वह ‘आत्म की खो’ सरीखा है। ‘सपना-साना हाथ जोडि...’ में हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा के स्वर्गीय सौन्दर्य को बंया करते लेखिका पहाडि़यों के दर्द को भी चुपके से बंया करती है। पहाड़ों के संकरे रास्तों पर लगी चेतावनियों के निहितार्थ जीव से जुड़ी संवेदनाओं के राग में ही वह प्रकृति की उदात्तता में इस कदर घुलती दिखाई देती है कि शब्द जैसे औचक ही झरे पाठक के पास पहुंचते हैं, ‘मेरे पांव झन-झन करने लगे। पर मन वंृदावन हो रहा था। भीतर जैसे देवता जाग गए थे।’ ऐसे ही काठमांडू में बुद्ध एअरलाइंस की ‘माउन्टेन फ्लाइट’ में वह लिखती है, ‘ऊंचाइयां सारी क्षुद्रताओं को मिटा देती है। विमान में उड़ते हम सभी यात्री भी प्रकृति के अनुपम करिष्मे हिमालय पर सम्माहित थे, न भारत पर, न नेपाल पर। समय और सृष्टि के परे ले जाते हुए गन सौंदर्य से भरपूर उन दुर्लभ लम्हों को देखकर मन मचला कि किसी करिष्मे से विमान के शीषे टूट जाएं और मैं हाथ बढ़ाकर छू लूं बर्फ के इन छोटे-छोटे पर्वतों को।’
मुझे लगता है, यह प्रकृति ही है जो मन कीे इन काल्पनिक अनुभूतियांे के आकाष में उड़ा ले जाता है। नागरकोट से पोखरा की बढ़ते लेखिका रेवा झील के सौंदर्य को तो बंया करती है परन्तु नेपाल की उथल-पुथल भरी अराजकता और प्रतिरोध के साथ काठमांडू की मंहगाई और दहषत में डालने वाली आधुनिकता को भी स्वर देती है। 
‘बादलों मे बारूद’ षिलांग यात्रा की वह रोचक दास्तां है जिसमें लेखिका वहां की दोपहर को ‘महबूब’ की संज्ञा देती है तो परी देष की चकाचक से भी उसे अभिहित करती है। यात्रा मंे षिलांग की संस्कृति, प्राकृतिक सौनदर्य और परम्पराओं का गान तो है परन्तु महत्वपूर्ण पक्ष इस यात्रा का वह है जिसमें लेखिका उसे कष्मीर के बाद सबसे असुरक्षित इलाका पाती है। चेरापूंजी से नेहू पहुंच वहां अपने पुत्र के दोस्त के घर बिताई रात में पूर्वोत्तर के आतंक के उस साए से भी साक्षात् कराती है जिसमें नौजवान बेहतर दुनिया का स्वप्न संजोए आंतकवादी संगठनों मे ंसम्मिलित होते हैं और फिर माटी होकर बाहर निकलते हैं। ‘हाइन्यूट्रेप नेषनल लिबरेषन काउंसिल’ और मिलट्री के मध्य हुई गोलीबारी में ही वह पुत्र के दोस्त के पिता को सांत्वना देती है, ‘धरती बीज नहीं चोरती है, देखिएगा वे फिर लौट आएंगे। धरती को सजाएंगे।’ पर जवाब मिलता है, ‘-और फिर मारे जाएंगे।’ 
‘जाल, जहाज और मछुआरे’ में सुदंरवन की सुदंर सुबह, दिरूबा रात है तो शहर बनते गांवो की दास्तां भी है। जहाज मे की गई इस यात्रा है में स्मृतियों के सिरहाने लेखिका अपने मन की गहराईयो में ले जाती अनंत जिजीविषा से ऊर्जस्वित मछुआरों के जीवन की मार्मिक व्यंजना करती है। ऐसे ही आधुनिकता से आक्रात पर परम्परा के प्रति सम्मोहित चेन्नई और लेह-लद्दाख की उनकी यात्रा मंे लेखिका के ही शब्दों मे कहूं तो ‘विचारों की थपकियां’ सरीखी हैं। ‘देष मंे विदेष’ चेन्नई यात्रा में हिंदी के देषनिकाले की अनुभूतियोें को लेखिका ने संजोया है तो संस्कृत की तासीर में रची-बसी तमिल भाषा और दिखावे से दूर जीवन के मर्म का अनुभव-भव है। ‘बुद्ध, बारूद और पहाड़’ में नौ दिनों की वह यात्रा है जिसमें तिब्बत से आए शरणार्थियों के आजाद तिब्बत के स्वप्न और बुद्ध की नगरी से लोप बुद्धतत्व की मार्मिक व्यंजना है। ऐसा ही कुछ आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली कालड़ी का ‘देखती चली गई’ का पत्रकारीय सरीखा यात्रा वृत्त है। इसमे दक्षिण भारत मंे वेदों और वेद पाठषालाओं के प्रति भक्ति के आकर्षण के साथ ही वेदांत की पकड़ी राह का वह कटू सत्य भी है जिसमें, लेखिका कहती है ‘वेद विद्यार्थी हों, बौद्ध भिक्षुक हों, जैन साधु हों, पादरी हों-बचपन सदैव ही निषाने पर रहा है।’
बहरहाल, मधु कांकारिया के इस यात्रावृतान्त की बड़ी विषेषता है, उनकी किस्सागोई और प्रकृति सौन्दर्य की कूंत। वह लिखती है, ‘...मैं बार-बार इन जंगलों, पर्वतों और प्रकृति के बीच आती हूं? या सिर्फ प्रकृति के प्रति एक नैसर्गिक लगाव के चलत या अपनी आत्मा में लगे महानगरीय कीचड़ को धोने?’ मैं समझता हूं, इस शब्द व्यंजना में ही उनके लिखे को गहरे से समझा जा सकता है। ‘बादलों में बारूद’ यात्रावृतान्त है, पर ऐसा जिसमें स्थान और भौगोलिकता से परे जाकर लेखिका ने प्राकृतिक सौन्दर्य से जुड़ी मन संवेदना के बरक्स जीवन से जुड़ी वेदना और संघर्ष को भी अपने अनुभव का भव दिया है।
-समकालीन भारतीय साहित्य, नवम्बर-दिसंबर 2016


Sunday, November 29, 2015

अनुभूतियों का सौन्दर्यान्वेषण

राजस्थान की राजधानी जयपुर में कलाओं पर "जयरंगम" का आयोज़न महत्ती पहल है.  कला प्रदर्शनी, आर्ट कैंप के अलावा आम जन को कलाओं से जोड़ने के लिए "संवाद" जैसे कार्यक्रम भविष्य की उम्मीद जगाते हैं. कलाओं पर अंतः संबंधों पर एक सत्र में संवाद रखा गया. इस नाचीज़ ने उस स्तर का संयोज़न किया। सुखद लगा, इसलिए कि उसमे कत्थक नृत्यांगना रीमा गोयल, प्रख्यात रंगकर्मी, निर्देशक रंजीत कपूर, युवा चित्रकार अमित कल्ला, बीससूत्री कार्यक्रम की अध्यक्ष और लेखिका ज्योतिकिरण, दैनिक भास्कर के विकास सिंह, ख्यात कलाकार विद्यासागर उपाध्याय के संग कलाओं के सरोकारों पर महत्ती चर्चा हो सकी. कलाओं के अंतर्संबंधों पर विमर्श की राह खुली।
बहरहाल, जयरंगम में और भी नित्य नए आयोज़न कलाओ पर हुए.

"जयरंगम आर्ट स्ट्रोककैटलॉग 
आयोज़कों के आग्रह पर "जयरंगम आर्ट स्ट्रोक" का कैटलॉग लिखने का फायदा यह भी हुआ कि कला प्रदर्शनी के लिए आयी कलाकृतियों का घूँट-घूँट आस्वाद हुआ. मुझे लगता है सौ से अधिक पृष्ठ का कैटलॉग भी जयपुर के कलाकारों की कला का महत्ती दस्तावेज बन गया है. आवरण कलाकार मित्र विनय शर्मा सृजित है.

"जयरंगम आर्ट स्ट्रोक" के लिए लिखे कैटलॉग की कुछ बानगी मित्रों की आग्रह पर यहाँ -

चित्रकला मन की भाषा है। संवेदनाओं से रचा आकाश! अनुभूतियों के गान में वहां स्मृतियां झिलमिलाती है। वैष्विक स्तर पर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी ने कलाकारों के स्थानिक भेद को भले बहुत से स्तरों पर समाप्त कर दिया है परन्तु रंग बरतने की तकनीक, रूप विन्यास और माध्यम से प्रकट होने वाले बोध से यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजस्थान की कला के इस दौर में बहुत कुछ महत्वपूर्ण भी निकलकर सामने आ रहा है। स्वाभाविक ही है कि कला का यह दौर मूल्यांकन की मांग भी करता है। तरह-तरह की छवियों में कला का जो नया सौन्दर्यषास्त्र विकसित हो रहा है उसमें पारम्परिक रूपो के साथ प्रयोगधर्मिता का अपनापा है। 
बहरहाल, कलाकृतियों के अपने तई अर्थ ढूंढने लगा तो लगा, नए कलाकार अर्थ के आग्रह से मुक्त होते हुए भी लोक संवेदना से जुड़े हुए हैं। मसलन अदिती अग्रवाल ने चारकोल में सूखे रूंख में जीवन से जुड़ी विसंगतियों को तो उभारा है परन्तु अष्व के बहाने जीवन गति का भी संकेत किया है। अमित हारित ने एक्रेलिक में पीले और हरे पाष्र्व में बारीक रेखांकन में लोक कलाओं से अनुप्रेरित आकृतियों की सुरम्य दीठ दी है तो रंगो के उत्सवधर्मी लोक में स्मृतियों का गान कराती सरीखी है अमित कल्ला की कलाकृतियां। चटख रंगों में पारम्परिकता का छंद रचती भीमसिंह हाडा की दमयन्ती और राजस्थानी परिवेष बयां करती महिला का चित्र और गौरीषंकर सोनी की गाढ़े रंगों के सांचों से उभरती, हवा में लटकी सरीखी मानवाकृतियों में छाया-प्रकाष के जरिए संवेदनाओं का गहरा आकाष बुना गया है। लाखन सिंह जाट, सुरेन्द्र जांगीड़, संजय वर्मा, पवन शर्मा, आषीष श्रृंगी, मुकुल मिश्रा, मनीष शर्मा, मुकेष शर्मा, श्वेत गोयल, मदन मीणा, हंसराज कुमावत, दीपक खंडेलवाल की कलाकृतियां प्रयोगधर्मिता के ताने-बाने में परम्परा की अपने तई सौन्दर्य सर्जना करती है। इन कलाकृतियों में अनुभूतियों का संवेग रेखाओं की नियंत्रित गति और रंगो के सुमधुर संयोजन से गहरे से व्यंजित हुआ है। यह महज संयोग ही नहीं है कि इन कलाकारों की कलाधर्मिता सांस्कृतिक सक्रियता में कला की बंधी-बंधायी अवधारणात्मक सीमाओं से बहुत से स्तरों पर मुक्त है। भवानीषंकर शर्मा की कलाकृतियों में कैनवस पर धूप में छाया सरीखी मानवाकृतियों से औचक उभरते रंग अनुभूतियों का अनुठा भव हमारे समक्ष रखते हैं। हर षिव शर्मा दृष्यानुभूतियों में रंग संवेदना का जैसे ताना-बाना बुनते हैं। स्त्री देह की लोच में घुलते रंगो के जरिए वह बीते किसी क्षण के भाव को गहरे से व्यंजित करते हैं।
लालचंद मारोठिया पेड़-पौधों, जीवाष्म और प्रकृति के नाना रूपों की सर्वथा नयी दीठ हमें देते हैं। किषोर सिंह और जगमोहन माथोडि़या की कला में संवेदनाओं का झीना राग है पर रंग अंवेदते वह परम्परा से जुड़ा छन्द भी अंवेरते हैं। भुवनेष जैमिनी, एल.एन. नागा, अषोक गौड़, अर्जुन प्रजापति के षिल्प में मूर्त-अमूर्त में देह का गान है तो भावों की मिठास भी। आकृतियों के गढ़न की गीतात्मक लय में इन कलाकरों ने सौंदर्य की अनूठी षिल्प सर्जना की है। ऐसे ही लोचन उपाध्याय ‘पावर आॅफ क्लाॅथ’ में भिन्न वस्तुओं से फूलों के गुलदस्ते सरीखी रूपाकृति में मोहक छन्द हमारे समक्ष रखते हैं तो सुरभि सोनी ने ‘तरंग’ और ‘सनफिल्ड’ कलाकृति में बिखरे रंग और रेखाओं की ओप आकृष्ट करती है। मीनाक्षी कासलीवाल शैल चित्रों की मानिंद धुमिल होते रूप में रंग संवेदना के साथ ही घेरे अंदर घेरे की रेखीय लय में अर्थ के नए गवाक्ष हमारे समक्ष जैसे खोलती है। डाॅ. अर्चना जोषी के रंग समृद्ध कैनवस में आकृतियों की ओप अलग से ध्यान खींचती है तो मिक्स मीडिया में मिनू श्रीवास्तव ने काले, लाल, हरे, नीले रंगो के चटखपन के साथ ही छाया-प्रकाषीय के रेखीय आयामों में समय की सांगोपांग व्यंजना की है। आर.बी. गौतम की मानवीय संरचनाएं जीवन में हो रहे बदलावों के साथ आधुनिकता की समय संवेदना सरीखी है तो एस.शाकीर अली ने मिनिएचर में इतिहास और लोक से जुड़ी संवेदना को जैसे अपनी कला में जीवंत किया है। षिखा राजोरिया ने बच्चों की उल्लासधर्मिता में आनंदानुभूति के क्षणों को कैनवस पर सपनों की उड़ान में रूपान्तरित किया है तो सोहन जाखड़ ने मिक्स मीडिया में ‘सैलर’ श्रृंखला में बच्चों के खिलौने और मानवीय आवष्यकता से जुड़ी वस्तुओं की उपयोगिता के रंगो से अनूठे अर्थ उकेरे हैं।
चिंतन उपाध्याय का संस्थापन बुनावट के जरिए जीवनगति को व्यंजित करता आधुनिकता का आकाष रचता कल्पना की मौलिक दीठ लिए है। सुधीर वर्मा ने रेखाओं के गत्यात्मक प्रवाह में नायिका भेद के साथ अष्व से जुड़े संदर्भों में रंगों का माधुर्य रचा है तो सुप्रिय शर्मा ने रेखाओं की बारीक लय में पषु-पक्षियों के साथ जीवन से जुड़ी लय को मैथिली लोक कला से आधुनिकता की संवेदना में जैसे रूपान्तरित किया है।
विद्यासागर उपाध्याय रंगो के अप्रितम चितेरे हैं। उनका अमूर्तन गत्यात्मक प्रवाह लिए है। रंग-रेखाओं के बिम्ब कोलाज में उनका कैनवस दृष्यों का चलयमान भाव लिए हमारे समक्ष जैसे उद्घाटित होता है। वीरबाला भावसार रेत से हेत कराती अपनी कलाकृतियों में स्मृतियों का पाठ बंचाती है। सुनीत घिल्डियाल की एक कलाकृति में रेखाओं का रंग उजास मोहने वाला है। ग्लोब का दिक् यहां है। टेक्स्चर और रेखाओ की सघन संवेदना जीवननुभूतियों को धुसरित रंगो में जैसे खास ढंग से व्यंजित करती है। शबीर हसन काजी रेखीय मानवाकृतियों में प्रतीक और बिम्बों के जरिए कैनवस के आंतरिक दर्षन को जैसे व्यंजित करते हैं। गोपाल
खेतांची ने बारहमासा की अपणायत में नायक-नायिका और मौसम के परिवेष की सुरम्य व्यंजना कैनवस पर की है तो नाथूलाल वर्मा और समन्दर सिंह खंगारोत की कलाकृतियां रंगो की सुघड़ता में परम्परा का सांगीतिक राग सुनाती सरीखी है। विनय शर्मा ने अपने स्टूडियो को केन्द्र में रखते अतीत को कैनवस पर सर्वथा नए ढंग से व्यंजित किया है। उनकी नाट्यमय रूपाकृतियों में मिनिएचर की एप्रोच तो है पर वहां रंगो और रूपाकारों की आधुनिकता भी है। 
बहरहाल, भिन्न माध्यमों में ‘जयरंगम’ के लिए कलाकारों ने दृष्टि का विस्तार किया है। इन कलाकृतियों में हमारा समय और समाज अपनी तमाम स्मृतियों, विस्मृतियों, खामियों और बेशक विशेषताओं के साथ मौजूद है। सौन्दर्य हमारी दृष्टि में है। दीठ के विस्तार में! ‘जयरंगम’ कला प्रदर्षनी की कलाकृतियां कलाकर्म में दीठ की बढ़त ही है।

Tuesday, November 24, 2015

सौन्दर्य का घूंट घूंट आस्वाद


अमृतलाल वेगड़ जी से बतियाना नर्मदा की संस्कृति को जीना सरीखा है. इधर उनकी महत्वपूर्ण कला-पुस्तक प्रकाशित हुई है-"नर्मदा तुम कितनी सुन्दर हो’.



"जयपुर आर्ट समिट" में आयोजित पुस्तक लोकार्पण. में उनकी इस कृति पर आलोचकीय बोलने का अवसर सुखद था. 



नर्मदा के सौन्दर्य की ठौड़-ठौड़ व्यंजना इस पुस्तक में है. इसमें थोड़े शब्द हैं, चित्र और रेखांकन अधिक. इसमे उनके वह पेपर कोलाज हैं, जिनमे नर्मदा का सौन्दर्य झिलमिलाता हमें उसके होने का जीवंत अहसास कराता है. 



वेगड़जी के पास वह दृष्टि है जिसमे वह स्थानों को उसके भुगोल में ही नहीं वहां के संस्कार, संस्कृति में देखने वालों को बंचवाते हैं। यह सब लिख दिया है पर मैं फिर से इस कलाकृतिनुमा पुस्तक के पन्ने पलटने लगा हूं। सौन्दर्य का घूंट घूंट आस्वाद कर रहा हूं...

Monday, November 9, 2015

स्मृतियों का वातायन


पिताजी नहीं है! मन इसे अभी भी स्वीकार नहीं कर रहा। उनकी गुनगनाहट कान अभी भी अनुभूत कर रहे हैं। हमने उन्हें कभी ठाले बैठे नहीं देखा। हर वक्त वह किसी न किसी काम में ही लगे रहते। अपने नहीं-अधिकतर दूसरों के काम में। खाली बैठना उन्हें पसंद नहीं था। सोचता हूं, उन्होंने जिस साफगोई, सुफियाना फक्कड़पन को जिया उस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। मैं डायरी लिखता हूं। बहुत से पन्ने उन पर ही लिखे हुए हैं। क्यों नहीं वे ही किसी शक्ल में बाहर आ जाएं। कभी लगता है, उनकी स्मृति संजोते कुछ ऐसा करूं जो किसी ने नहीं किया है पर यह भी जानता हूं, पिताजी इस तरह के किसी भी दिखावे, ताम-झाम को पंसद नहीं करते थे। और फिर पिता किन्हीं डायरीनुमा लेखन में या फिर स्मृतियों के दीप में ही क्यों रहें, वह तो सदा मेरे पास है। रहेंगे। हां मुझे लगता है, स्मृतियों को लिखने का यह राग दरअसल उनके तर्पण प्रयास है! ऐसा तर्पण जो शांति प्रदान कर सके। उनकी आत्मा को जिनके लिए किया जाए और आपके उस मन के लिए भी जो यादों के गलियारे से बाहर आना ही नहीं चाहता।
बहरहाल, पिताजी नहीं है तो बीकानेर जाना औचक कुछ अधिक हो गया है। पहले ऐसा नहीं था। पर अब न जाने क्यो ंबीकानेर बारम्बार जाने का जोग बन रहा है। घर पहुंचता हूंू तो भूल जाता हूं, पिताजी नहीं है। इन्तजार करता हंू, वह आएंगे और कहेंगे, ‘यह ले स्कूटर की चाबी। पैट्रोल फूल करवा दिया है। टायर में हवा और सब दुरस्त है। जहां चाहो वहां ले जाना।’ पर देखता हूं, सफेद रंग का स्कूटर पूरी तरह से मिट्टी में भर गंया है। उनके जाने के बाद कौन उसकी सार-संभाल मेरे लिए करता!
अभी एक दस दिन पहले बीकानेर में ही था। सुबह रोज उठता तो अजीब सा खालीपन मन को कचोटता। पिताजी अलसुबह उठ जाते। दूध लाते और इधर कुछ वर्षों में तो हम जब बीकानेर पहुंचते तो सुबह की चाय भी ख्ुाद बना पिलाते। मैं गौर करता बच्चों के साथ मुझे आया देख वह आत्मिक सुकून को जैसे पा लेते। उनका मन करता, घर बहुत दिन तक ऐसे ही भरा-भरा रहे। चाहते बहू अरूणा को भी जयपुर से आने के बाद कोई काम घर में  नहीं करना पड़े। हां, वह घूंघट के हिमायती थे परन्तु बहू को बेटी से भी बढ़कर मानते। यही कारण था कि हम जब पहुंचते तो अपनी तरफ से यह प्रयास करते कि अरूणा को कुछ भी करना नहीं पड़े। सर्दी के मौसम मंे तो वह चाहते अरूणा और बच्चे बिस्तर से बाहर ही नहीं निकले। कहते, ‘अरे! बाहर बहुत सर्दी है। घूसे रहो रजाई में। कोई काम नहीं है, क्यों बाहर आ रहे हो।’
बचपन के दिनों को याद करता हूं। पिताजी में पिछले 15 वर्षों में हदभांत बदलाव आ गया था। विष्वास नहीं होता, रोबदार, कड़क मिजाज के मेरे पिता इतना अधिक बदल गए थे कि कोई उनके पुराने दिनों को याद कर कह नहीं सकता कि यह वही भूरजी हैं जिनसे गली-मोहल्ला तक कभी थर-थर कांपा करता था। जस्सूर गेट के हमारे पुस्तैनी घर में जब हम रहते थे। पिताजी का पूरी गली में इस कदर रोब था कि जब वह गली में प्रवेष करते तो जानबूझकर खंखारा करते। उनके इस खंखारे पर ही तमाम गली के लोग इधर-उधर हो जाया करते थे। उनके आते ही घर में जैसे कर्फ्यू लग जाता। हमसे वह कभी सामान्य सी बातचीत भी नहीं किया करते थे। मम्मी से भी उन्हें बतियाते हमने कभी नहीं देखा। उनके कक्ष में भी जाने की हमारी हिम्मत नहीं होती थी। पर इधर उनमें जबरदस्त बदलाव आ गया था। घर-परिवार की हर जरूरत का ध्यान रखते वह बीते वर्षों में इस बात का अपने तई निरंतर प्रयास करते थे कि उनकी वजह से किसी का जरा भी दिल न दुखे। इससे बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा कि धर्मनगर द्वार वाले हमारे घर का पूरा गली-मोहल्ला उनका फैन हो गया था। पड़ौस मे रहने वाला 26-27 वर्षीय मुकुल श्रीमाली तो उनका खास मित्र बन गया था। और भी गली-मोहल्ले के बच्चों के वह सर्वाधिक प्रिय पात्र थे। याद है, उनका जब अवसान हुआ तो पूरी गली के लोग आंसूओं से भीग रहे थे। उनके प्रति सच्ची श्रद्धा को अनुभूत कर तब मन मे ंअवर्णनीय आनंद की अनुभूति हुई थी।
पिताजी मजबूत कद-काठी के, बड़ी-बड़ी करीने से संवारी मूंछे रखने वाले रोबदार व्यक्तित्व के धनी थे। बचन में जब समझ विकसित नहीं हुई थी, अक्सर मन में एक प्रष्न उमड़ता रहता था कि पिताजी सुबह-सुबह मूंछों पर पट्टी क्यों बांध लेते हैं? स्नान करने के बाद पूजाघर में मूछों पर पट्टी बांध वह भैंरूजी का ध्यान किया करते थे। यह पट्टी तभी खुलती थी जब वे खाना खाने बैठते थे। उनका रोब कुछ ऐसा था कि हम तीनों भाई-बहिन इधर-उधर दुबके रहते। उनके सामने जाने से डरते थे। बहुत बाद में जब समझ विकसित हुई तब जाकर पता चला कि यह पट्टी मूंछो को करीने से रखने के लिए बांधी जाती थी। जब तक पिताजी थे, मूंछो के प्रति उनका लगाव ऐसे ही रहा। उन्होंने कभी बाल काले नहीं किए, सफेद होती जा रही मूंछो को रंगा नहीं। हां, कपड़ों और चाल-ढाल में अपनी स्वाभाविक अकड़ को उन्होंने कभी नहीं बिसरासया। बगैर प्रेस किए, सलवटों के कपड़े पहने उन्हें कभी नहीं देखा। रहते वह टीप-टाॅप थे परन्तु बनावटीपन न उनके स्वभाव में था न ही वह पंसद करते थे। 
इधर कोई दो दषक से वह हम लोगों से अत्यधिक घुल मिल गए थे। मम्मी को ब्रेस्ट कैंसर जब हुआ तो मैंने देखा, वह चुपके-चुपके आंसू बहाते थे। पर जितना ध्यान उन्होंने मम्मी का रखा, हममें से कोई रखने का सोच भी नहीं सकता। अक्सर वह कहते, ‘मेरी चिंता मत कर। तु अपनी मम्मी को जयपुर ले जा। वहीं रख।’ मैं कहता, आप भी चलो। त्वरित वह कहते, ‘मैं इस घर को छोड़ नहीं सकता।’ पर जानता हूं, मम्मी के बगैर वह एक दिन भी नहीं रह सकते थे। मम्मी जब जयपुर होती तो फोन पर रोज उनसे बात करती। वह कभी फोन पर नहीं कहते कि अब बहुत दिन हो गए, बीकानेर आ जाओ। मम्मी को बहुत बुरा लगता परन्तु हम जानते थे, पिताजी मन से चाहते थे कि मम्मी बीकानेर आ जाए परन्तु उनके मन में यह भी रहता कि इसका मन यदि बेटे के पास है तो उसके मन को क्यों मना करूं। मम्मी को भी पिताजी कि चिन्ता लगी रहती। वह जानती थी कि अपने आप वह न तो दूध लेंगे न ठीक से खाना खाएंगे सो वह कुछ समय बिताकर ही पिताजी के पास लौट जाती। अब सुनिए, बीकानेर घर नहीं छोड़ने की दास्तां। असल में पिताजी को बड़े भईया मनोज की चिंता रहती। भतीजी मुक्ता को सुबह रोज वह बस छोड़कर आते। यह दायित्व किसी ने उन्हें दिया नहीं, स्वयं ही ओढ़ लिया था सो अगर जयपुर चले जाए तो उसे छोड़ना नागा हो जाए। कभी इस दायित्व से वह झुंझलाते भी परन्तु जो दायित्व ले लिया सा ले लिया इसलिए वह जयपुर नहीं आते थे। यह उनके स्वभाव में था, वह अपने आप दायित्व ओढ़ लिया करते थे। छोटी बहन अनुराधा और उसके पुत्र माधव से भी उन्हें अतिरिक्त लगाव था। वह इन्तजार करते, अनु आए तो उससे ढ़ेरो मन की बातें करे। अनु भी उनका विषेष ध्यान रखती।
बाद के दिनों में धार्मिक पुस्तकों के प्रति वह अत्यधिक अनुरक्त हो गए थे। उनके कमरे में रखी ढ़ेरां पुस्तकों को जब खंगाला तो पाया, वह पुस्तकें गौर से पढ़ते। उन पर अण्डर लाईन करते और उनको गहरे से गुनते थे। धर्म और दान-पुण्य के प्रति भी उनकी आस्था अत्यधिक हो गई थी। मम्मी को कहते, ‘जिसको जो दान देना है। मनभर कर दे दो। इस जीवन का कोई पता नहीं है। आज हैं, कल नहीं रहेंगे।’ अपने पास रखे सामान को भी वह लोगों को बुला-बुलाकर बांटते रहते। यहां तक कि अपने पास जमा ढेरांे सूट, नए सिलाए कपड़े भी उन्होंने बुला-बुलाकर मित्रों को दे दिए।
बहरहाल, पिताजी अंदर-बाहर एक जैसे थे। ताउम्र वह दूसरों के काम भी बहुत आए। उनके साथ के मित्रों से अब संवाद होता है तो पता चलता है, अपने आपको बाद में शहर में खास मुकाम पर स्थापित करने वाले बहुतेरे उनके घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे। कुछ बाद तक रहे भी परन्तु यह भी देखा कि उनका भोलापन सब जानते थे, इसलिए जब जरूरत हुई-उनसे काम निकलवाया। कुछ बड़े कथित बड़े कद की हस्तियां ऐसी भी थी जिन्होंने उनको जमकर छला पर उन्हें इससे कभी कोई वास्ता नहीं रहा। कोई अच्छा है या बुरा-इसका मापदंड पिताजी के पास स्पष्ट था। वह अच्छा जो उनको सामने मान दे। वह बुरा जो उन्हें देखकर भी नमस्कार नहीं करे। उन्हें कोई दोस्त प्रणाम कर देता, कोई मित्र कह देता यार तुम्हारा रोब अभी भी कायम है तो उनके चेहरे पर अद्भुत चमक आ जाती। उनकी रोबदार मूंछे जैसे शान से खिल-खिला पड़ती। 
यादें इतनी है कि लिखूंगा तो उसका सिरा कहीं पकड़ ही नहीं पाऊंगा। पर यह सच है, उनका जीवन खुली किताब था। हर कोई उसे पढ़ सकता था। यह भी सच है कि उनने जो जिया, वह हम जैसे कथित समझ रखने वाले चाहकर भी जी नहीं सकते। जितना उनके पास था, उसे ईष्वर का दिया बहुत अधिक मानते थे। बहुत अधिक चाहतें उनकी कभी रही ही नहीं। भैंरूजी उनके ईष्ट थे और संजोग देखिए, उनके मंदिर में ही उन्होंने अंतिम सांस ली।
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नहीं सीख पाया जीने की वह कला...  

बहुतेरी बार कुहासे बाहर ही नहीं होते, मन के भीतर भी गहरे से छाए होते हैं। छंटने की जिद लिए। पूर्वाग्रह, अपने को स्थापित करने से जुड़े छल, प्रपंच, बनावटीपन के आवरण में यह मानव मन भीतर के कुहासों से ही तो लिपटा होता है। जो इन कुहासों की गर्द में नहीं जकड़ा, समझें वही जीवन जीने की असल कला जानता है। पिता श्री प्रेमस्वरूप व्यास ऐसे ही थे। अंदर-बाहर से खुली किताब। कहीं कोई छुपाव नहीं,  कहीं कोई बनावटीपन या छल-कपट नहीं। जो पसंद आया, खुलकर उसे सराहा, जो नहीं जंचा वहीं उसके खिलाफ मोर्चा खोल जमकर बोल दिया। बगैर इस बात की परवाह किए कि परिणाम क्या होगा!
मित्र लोग मुझे कलाओं से सरोकार रखने वाला लेखक कहते हैं पर पापा को याद करता हूं तो लगता है, कलाओं में रमते, उन्हें अनुभूत करते कागज-कलम से कुछ लिखना ही कला नहीं है। हां, यह प्रक्रिया कलात्मक जरूर हो सकती है पर कला नहीं हो सकती। सच्ची और अर्थपूर्ण कला संगीत नहीं, नृत्य नहीं, चित्र नहीं मनुष्य होने का बोध  है। इसीलिए उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना ही कला है। मुझे लगता है, जीवन इसलिए भी कला है कि इससे ही मनुष्य सौन्दर्य को रच सकता है। बाहरी ही नहीं आंतरिक सौन्दर्य भी। अंतर के सौन्दर्य की रचना दुरूह है, बाहर के सौन्दर्य की रचना आसान। 
देना-पावना चुकाकार  आज ही के दिन एक बरस पहले पिताजी लोकातंरित हो गए। वह सब काम बहुत तेजी से किया करते थे। फूर्ती से। यही फूर्ती उन्होंने जाने में भी दिखाई। जीवन जीने की सच्ची कला उनके पास थी। हम उनके लिए कभी बड़े हुए ही नहीं। घर में वह रहते तो सभी को उनके होने का अहसास बना रहता। सीधे तौर पर वह हमसे बातचीत नहीं करते थे। एक डर सा उनका रहता था पर वह बेवजह कभी डांटते भी नहीं थे। जाने क्या उनके व्यक्तित्व में था कि उनके सामने कुछ भी कहने की हिम्मत कभी होती ही नहीं थी। हम लोग अपनी बात मां के जरिए उन तक पहुंचाते। तब भी जब स्कूल में पढ़ते थे और तब भी जब स्वयं के बच्चे हो गए। यह उनके व्यक्तित्व का जादू था कि उनके सामने सदा ही बच्चे ही बने रहने का मन करता। काल कवलित वह जब हुए तो इसका अहसास किसे था! याद है, दीपावली उनके साथ ही मनाई थी। और उसके चन्द दिनों बाद ही वह बगैर कोई आहट, हम सब से सदा के लिए दूर चले गए। याद है, वह जयपुर से हमारे आने की बाट जोहते। कहते कुछ नहीं पर पूरी तैयारी करके रखते। मम्मी से पूछते, ‘कब रहा है तुम्हारा बेटा? फोन कर दो, बच्चों के साथ अब जाए।खुद जयपुर कभी कभार ही आते। मम्मी जयपुर होती तो कहते, अपनी मां को वहीं रख लो पर हम जानते थे, मम्मी के बगैर उनका भी मन नहीं लगता था। मम्मी को भी उनकी चिंता लगी रहती सो वह भी कुछ दिन रूककर ही उनके कारण वापस लौट जाती। कहते, ‘घूर सूनो कोनी छोड़ सकूं।हम जानते हैं, घर में क्या था पर शायद उनका मन जयपुर में लगता नही ंथा। अपने घर में ही वह रहना चाहते थे। अपने भाईयों से उनका गहरा लगाव था। बड़े भईया मनोज को साथ रखते। रोज सुबह भतीजी मुक्ता को बस छोड़ने की जिम्मेदारी भी उन्होंने औचक अपने आप ही ओढ़ ली और चिरनिद्रा में जाने वाले दिन तक उसे निभाया। वह काम ऐसे ही ओढ़ लेते थे। ठाले बैठे उन्हें कभी नहीं देखा। हरदम कुछ कुछ करते रहना। गुनगुनाते रहना। कुछ बरसो से वह धार्मिक गं्रथो के प्रति गहरे से आसक्त हो गए थे। बल्कि वेद-पुराणों के नोट्स बनाने लगे थे।
हम उनसे सहमते पर नीहार, यशस्वी (पुत्र-पुत्री) से उनकी खूब घूटती थी। जयपुर से बीकानेर आने का कार्यक्रम के बारे में पता चलते ही स्कूटर को साफ-सुथरा कराने के साथ मिस्त्री से उसे चैक करवाकर रखते, पैट्रोल की टंकी फूल। खुद भले साईकिल का इस्तेमाल करते पर चाहते मैं उनके स्कूटर का ही उपयोग करूं। कभी हमसे कुछ लिया नहीं, बल्कि कभी उपहार स्वरूप ही कुछ लेकर आए तो सख्ती से उसे लेने से इन्कार कर दिया। अपनी तरफ से बस सबका करना, चाहत कुछ भी नहीं। अपेक्षा रहित था उनका जीवन।
बहरहाल, इस लोक में मनुष्य जीवन यात्रा के जो तीन अंष कहे जाते हैं, उनमें से एक अंष कला का है। हर व्यक्ति कलाकार है। बषर्ते वह जीवन जीने की कला में रमे। उसमें बसे। पिताजी इस मायने में निष्छल जीवन से जुड़ी इस समय की दुर्लभप्रायः कला से ही तो जुड़े थे। सोचता हूं, उन्होंने ही तो बहुत से अर्थों में जीवन में पसरे कुहासे को हटाने की कला से साक्षात् कराया। उपदेष देकर नहीं-अपने जिए से। अपेक्षा के अंधकार से वह सदा दूर रहे। उनकी सीख स्वाभिमान से जीने की थी। उसूलों पर कायम रहने की है। पेड़ की जड़ पेड़ का जीवन है। फूल-फल के लिए जड़ को मजबूत करना होता है। वह सदा हरी रखनी होती है। जड़ को खोदकर उपर ले आए तो उसका सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। जीवन भी सूख जाता है। मुझे लगता है, जीवन जड़ को बचाते, उसके सौन्दर्य को अंवेरते वह जूझते रहे। संघर्ष करते रहे, कभी उसे बाहर नहीं आने दिया। याद है, उनका नश्वर शरीर पंचभूत में विलीन हो रहा था,  मन में उनके खरेपन, सच्चाई के जीवन और किसी के प्रति दुराग्रह नहीं रखने के उनके सैकड़ों किस्से ही तैर रहे थे। बहुधा वह लोगों को डांट देते पर क्षण बीतता और वह खुद ही भुल जाते कि उन्होंने कुछ कहा है क्या
अब जब वह नहीं है, सौन्दर्य की उनकी जीवन दीठ गहरे से समझ रही है। मनोभाव छुपाना आसान है, व्यक्त करना कष्टप्रद। कष्ट उठाना हर किसी के बस का कहां! पिताजी ने ताउम्र यह कष्ट उठाए। इसलिए कि उन्हें अपने को छुपाना नहीं आता था। अंदर से किसी का बुरा चाहने वाले, सबके लिए कुछ कुछ अच्छा करने की चाह के बावजूद कटुक्ति के वाक्यबाणों से वह सदा दूसरों को अपना दुष्मन बनाते रहे। शायद इसलिए भी कि भाषा का कारू कार्य उनके पास नहीं था। मन के अच्छे भावों को प्रचलित मीठे शब्दों में व्यक्त करना उन्हें नहीं आता था। वाक्यबाणों से अपने अच्छेपन को सदा वह खुद ही धोते रहे। अच्छेपन को कभी साबित नहीं होने दिया। दावपेच, छलकपट से वह कोसों दूर जो थे! कथित बुद्धि के चातुर्य का सौन्दर्य नहीं। चमक दमक की व्यावहारिकता को परे धकेलते वह जिए।  जिसे जब चाहे कुछ भी सुना दिया। जब चाहे डांट दिया। बगैर इस बात की परवाह किए कि इसका परिणाम क्या होगा। मन में किसी के प्रति कोई बैर-भाव नहीं पर सीधे सट सुना देने से उपजी गांठों को सहते विरोध उत्पन्न करते रहे। भले को भला, बुरे को बुरा कहने में कभी कोई हिचक नहीं की।
सोचता हूं, दान हाथ फैलाकर लिया जाता है। त्याग आंखो से दिखाई पड़ता है लेकिन आडम्बरहीन निष्छलता, भीतर की उदात्तता का वैराग्य किसे कहां दिखता है! पिताजी प्रेमस्वरूपजीभूरजीइस मायने में वैरागी थे। छल वह जानते नहीं थे। झूठ चाहकर भी बोल नहीं सकते थे। अपने लिए कभी कोई चाह नहीं थी। दाव-पेच वह जानते नहीं थे।निर्भर वह किसी के रहना नहीं चाहते थे। नपा-तुला सुचिन्तित रहन-सहन। कहीं किसी से कोई अपेक्षा नहीं। दीनता कभी दिखाई नहीं। बल्कि सहानुभूति कोई जताए, यह भी उन्हें सहन नहीं था। पराभव कभी स्वीकार नहीं किया। 
किसी का दिल दुखाने की इच्छा कभी रही नहीं पर खारे बोल रोक पाना भी तो उकने बस में कहां था! अंदर से कभी किसी का बुरा नहीं चाहते हुए भी बहुतेरी बार बल्कि प्रायः ही बुरे व्यक्ति होने की छवि को वह भोगते रहे। सोचता हूं, खारे बोल अच्छी बात नहीं है पर उसके लिए अंदर के अच्छेपन के द्वार बंद कर देना भी तो कल्याणकारी नहीं है। पिताजी अंदर के अच्छेपन का द्वार खोले खारेपन की छवि से सदा ही बेपरवाह ही रहे। शायद इसलिए कि क्रोध से उनका गहरा नाता था। कोई बात मन माफिक नहीं हुई। कहीं कुछ अनैतिक दिखा, त्वरित क्रोध। दुर्वासा सा। 

यह उनके संस्कार थे। और संस्कारों के विरूद्ध बनावटीपन के सौन्दर्य को वह रच नहीं सकते थे। अब जबकि वह नहंी है, लगता है बहुतेरे उन्हें समझ ही नहीं पाए। पर वह जब नहीं रहे, तब यह भी देखा है कि जो उन्हें समझ गए थे, उनकी स्मृतियों को सहेजे उन्हें भूलना ही नहीं चाहते। जो व्यक्त नहीं कर पाए, वह अब व्यक्त कर रहे हैं। मुझे गर्व है कि मैं उनका पुत्र हूं। वह चले गए। सुख-दुख से परे। देना-पावना चुकाकर लोकातंरित हो गए हैं। अफसोस उनकी मृत्यु का नहीं है। यह तो स्वयं उनका वरण थी। आखिर वह यह कैसे सहन करते कि कोई उनकी तिमारदारी करे। कैसे वह यह सहन करते कि कोई उनसे सहानुभूति जताए। इसीलिए कुछ क्षण पहले जिन्होंने उनसे संवाद किया, उन्होंने उन्हें उनके फक्कड़पन के अलमस्त अंदाज में ही देखा। अफसोस इस बात का है कि जीते जी उनके जीवन जीने की उस कला को नहीं सीख पाया जो पास रहकर भरपूर सीख सकता था। पर इसके लिए उनके जैसा बनना पडता। भला यह बनावटीपन से भरे इस जीवन में क्या संभव था!