Friday, May 25, 2012

बचा रहे शास्त्रीय कलाओं का हमारा मूल


कल आनंदकुमार स्वामी को पढ़ रहा था। वह स्थापित करते हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है।’ इस समय जब भारतीय शास्त्रीय कलाओ पर विचारता हूं तो उनका यह कहा गहरे से घर करता है। शास्त्रीय नृत्य, चित्रकला का मूल वही है, शास्त्रीय गायन,वादन में मूल राग वही है जो बरसों से हम सुनते आए हैं फिर भी इन शास्त्रीयकलाओं में कलाकार सदा प्रस्तुति में नवीन करता है। इस नवीन में ही रसानुभूति हैं। फिर से कुछ सुनने, फिर से कुछ गुनने की। परन्तु अपसंस्कृति के इस समय में शास्त्रीय कलाओं का यह मूल हमसे जैसे निरंतर दूर भी हो रहा है।
बहरहाल, भारतीय दर्षन में कलाओं को शुद्ध रूप से जीवन से अभिहित किया गया है। ऐसा जब है तो फिर क्या यह विचारणीय नहीं है कि हम अपनी शास्त्रीय कलाओ के नवीनता के उस मूल को कितना बचाए रख पा रहे हैं? मुझे लगता है, कुछेक लोकप्रिय कलाओं को छोड़ हम बहुतेरी हमारी सांस्कृतिक कलाओं से लगातार दूर और दूर हुए जा रहे हैं। कभी राजस्थान के मांगणियारों, लंगो का लोक संगीत धोरों की अनूठी रेत राग से मेल कराता कानों में शहद घोलता था, उसे नवीन बनाने के चक्कर में सूफी संगीत लोक संगीत बन गया है। इसी तरह शास्त्रीय संगीत के स्वर भी बहुत से स्तरों पर फ्यूजन में कनफ्यूज हो रहे हैं। शास्त्रीय नृत्यों को कोरियोग्राफी के नाम बिगाड़ शारीरिक लयकारी में तब्दील किया जा रहा है। चित्रकला में इन्स्टालेषन के नाम पर मनमानी हो ही रही है। सोचता हूं, ऐसा ही होता रहा तो आने वाली पीढ़ी में कलाओं का हमारा मूल क्या कुछ बचा भी रहेगा! 
कुछ समय पहले अषोक वाजपेयी के नेतृत्व में पं. बिरजू महाराज, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद जाकिर हुसैन, पं. राजन-साजन मिश्र, पं. षिवकुमार शर्मा, टी.एन. कृष्णन, सुधा रघुनाथन, यू.श्रीनिवासन आदि कलाकारो के एक दल ने मिलकर षास्त्रीय कलाओं के संरक्षण के लिये संसद भवन में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। इसके तहत शास्त्रीय कलाओं को प्रोत्साहित करने के लिये बड़े व्यावसायिक घरानों की एक प्रतिषत आय को आयकर मुक्त कर उसे सांस्कृतिक गतिविधियों मंे लगाने, अलग से सांस्कृतिक टेलीविजन चैनल स्थापित करने आदि की मांग की गयी थी। इन मांगों पर सरकार ने क्या किया है और क्या कुछ करने जा रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता परन्तु सोचने की बात यह भी है कि शास्त्रीय कलाओ के लिये खुद समाज क्या कर रहा है? स्पीक मैके, श्रुति मंडल और सरकारी संस्थाएं, अकादमियां अपने स्थायी आयोजनों में कलाओं का प्रदर्षन, प्रोत्साहन के उपक्रम करती भी हैं परन्तु शास्त्रीय कलाओं के आयोजन से ही क्या हम हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मूल रूप में सहेज पाएंगे? शास्त्रीय कलाओं के अपसंस्कृतिकरण, अरूपीकरण को क्या इससे रोका जा सकता है? इन पर गहरे से विचारने की जरूरत है। 
यह सही है कि शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक कलाओं के आयोजनों से इन कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है परन्तु इतना ही सच यह भी है कि इनसे नया कोई श्रोता वर्ग, दर्षक वर्ग खड़ा नहीं किया जा रहा। वही है जिनकी रूचि शास्त्रीय कलाओं में है। फिर से गौर करें, रसिकता नया बनाने से नहीं नये होने से ही पैदा की जा सकती है। इसका अर्थ है, आयोजनों के पार्ष्व में भी इस ‘नये होने’ पर विचार करना होगा। सोचता हूं, अभिनेता आमीर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ में वही कुछ कहा है, उसी पर ध्यान दिलाया है जिस पर अरसे से कहा, ध्यान दिलाया जाता रहा है परन्तु प्रस्तुति के और मंषा के उनके नयेपन से उनके शो ने अधिसंख्य लोगों का ध्यान खींचा है। शास्त्रीय कलाओं की प्रस्तुतियों के साथ कलाओं की सहज समझ, जानकारियां, रसिकता के लिये भी कुछ ऐसा ही नया करना होगा। 
उस्ताद अमीर खॉं, पं. भीमसेन जोषी, पं. जसराज ने वही राग गाए हैं जो उनसे पहले गायक गाते आए हैं, पं. बिरजू महाराज ने वह नृत्य किया जो पहले होता रहा परन्तु इन सबने अपने को मूल में साधा। पुनर्नवा किया। आनंद कुमार स्वामी इसीलिये फिर से याद आ रहे हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं नवीन होने में है।’ शास्त्रीय कलाओं को बचाने, उनके संरक्षण के लिये यही मूल मंत्र हो सकता है। 

Friday, May 18, 2012

परकोटों से झांकता अतीत

उपयोगिता में सौन्दर्य की सृष्टि का प्रयास माने कला। किले, गढ़ और महल रहने के लिये, सुरक्षा के लिये बनाये गये परन्तु वहां कलात्मकता का भी कोई ओर-छोर नहीं है। हवेलियों को ही लें। जैसलमेर और बीकानेर की हवेलियां सौन्दर्य में अप्रतिम है। आवासीय उपयोगिता और कलात्मकता का अद्भुत मेल जो वहां है।
 ‘स्थपतेः कर्म स्थापत्यम्’ यानी स्थापन का कार्य स्थापत्य है। नगरों की बसावट में स्थापत्य और वास्तु कला का योग ही तो रहा है। पुराने लगभग सभी नगर कलात्मक परकोटों से घिरे मिलेंगे। अलंकारयुक्त परकोटों से। भले बेतहाषा बढ़ती आबादी में परकोटों को तोड नगर अपनी सीमाएं बढ़ा रहे है परन्तु नगरों के भीतर के परकोटे द्वार आज भी निर्माण की कला की जैसे गवाही देते हैं।  
परकोटों से घिरा जयपुर  विष्व का कभी सर्वाधिक सुनियाजित षहर रहा है। कनक वृन्दावन स्थित मंदिरों में जब भी जाता हूं, आमेर घाटी से दूर तक दिखाई देने वाला षहर का सुन्दर से परकोटे का अंष मन मोह लेता है। औचक, मन में यह अहसास भी होता है कि किसी नगर का रक्षा कवच ही नहीं बल्कि सुन्दर वस्त्राभूषण परकोटा ही तो रहा है।
बहरहाल, परकोटे अब अतीत बन रहे हैं। जनसंख्या बढ़ी तो शहर की सुरक्षा के यह पहरेदार गिरा भी दिए गए। कहीं अभी भी परकोटे हैं परन्तु शहर से बाहर नहीं शहर के अंदर। यानी पुराना शहर। नया वह जो इस परकोटे से बाहर बसा है। जैसलमेर का सोनार किला विष्व में शायद पहला ऐसा दुर्ग है जहां आज भी किले में आबादी रहती है। घेरदार घाघरे की मानिंद परकोटे से घिरा विषाल दुर्ग और अंदर आबादी। बाहर से देखें तो किले के कलात्मक परकोटे से आभाष ही नहीं होता कि अंदर पूरी की पूरी एक सभ्यता वास कर रही होगी.. परन्तु सच यही है। 
परकोटों को ओढ़े षहरों में मेरा अपना षहर बीकानेर भी है। परकोटे के द्वारों से गुजरता हूं। कितने द्वार परकोटे के रहे हैं, शायद बता ही नहीं सकूं परन्तु कोटगेट के तीन द्वार, जस्सूसर गेट के तीन द्वार और नत्थूसर गेट और भी न जाने कितने द्वार अपने परकोटे सौन्दर्य से अभिभूत करते हैं। अब तो खैर सभी स्थानों पर आबादी भी इतनी हो चुकी है कि परकोटो वाले षहर और परकोटे के बाहर वाले शहर का भेद ही नहीं रहा। कभी पुराना और नया षहर कहकर जो अंतर परकोटे और परकोटे विहिन षहर का किया जाता था वह भी खत्म हो चुका है। हां, जोधपुर में परकोटे के भीतर एक षहर है और बाहर दूसरा। जालौरी गेट, सोजती गेट जैसे कितने ही गेट परकोटे से घिरे षहर में अभी भी प्रवेष कराते हैं।
भारत के साथ विष्व के दूसरे देष भी परकोटे की कला संजोए हैं। पुर्तगाल का ओबिडोस कस्बा पहाड़ी पर बसा है। परकोटे से घिरा। दूर से देखें तो किले का सा अहसास कराता। ऐसा ही इजरायल की राजधानी के साथ भी है। पवित्र नगरी जेरूषलम परकोटे से घिरा बेहद खूबसूरत ष्षहर है। हां, वहां भी परकोटे से बाहर बसावट हो चुकी है परन्तु परकोटे के भीतर अभी भी पुराना ष्षहर इतिहास की अपनी विरासत को संजोए है। यूनाईटेड किंगडम की यार्क सिटी भी परकोटे से घिरी है। यह षहर बारहवीं से चौदहवीं वीं सदी में चारों तरफ बनी लम्बी दीवार से घिरा है। चीन के झियान षहर के परकोटे का तो कहना ही क्या! परकोटे की दीवारें इतनी चौड़ी है कि आराम से वहां वाहन चल सकते हैं। ग्यारहवीं ष्षताब्दी के आस-पास बना पष्चिमी स्पेन का एविला षहर भी परकोटों की शान लिए है। इस षहर की प्राचीर में नौ द्वार बने हुए हैं और 88 टॉवर है। भूमध्य के पर्यटन स्थलों मे से एक क्रोएषिया का एतिहासिक नगर डबरोवनिक परकोटे के सौन्दर्य का अप्रतिम उदाहरण है। एड्र्यिाटिक सागर तट पर बने इस षहर को इसीलिये ‘एडियाटिक का मोती’ कहा जाता है।
जो हो, इस बात से इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि हमारी जो प्राचीन सभ्यताएं रही हैं, उनमें सुरक्षा उपयोगिता में भी कला का अद्भुत मेल किय गया था। कला की यही तो सौन्दर्य सृष्टि है। इसीलिये तो हमारे यहां कला को जीवन से जुड़ा बताया गया है। 


Saturday, May 5, 2012

सिनेमा में झांकता कला संसार


दृष्य से अदृष्य की सत्ता बड़ी होती है। दृष्य में यथार्थ की दीठ भर होती है परन्तु अदृष्य स्मृतियों, अनुभूतियों का अनंत आकाष जो लिये होता है। इसीलिये शायद कभी अज्ञेय ने कहा भी, ‘स्मृति ही वह गतिषील सर्जनात्मक तत्व है, जो काल, इतिहास, साहित्य और हां, भाषा के नये परिदृष्य रचती चलती है।’ यह स्मृतियां ही हैं जो सर्जना में काल के गाल विगत-वर्तमान का अंतर पाटती है। विनय शर्मा के चित्रों पर जब भी विचार करता हूं, कैनवस पर मूल कैलिग्राफी में झांकती स्मृतियां रोमांचित करती है। उनका कैनवस अतीत से जुड़ी चीजों का वस्तुगत यथार्थ नहीं होकर स्मृतियों के निजी संवेदन संज्ञान के रूप में हमारे समक्ष उद्घाटित होता है। मूल कैलिग्राफी में तड़कते कागजों की पुरानी बहियां, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, जन्मपत्रियों आदि के साथ ही इस्तेमाल कुछ वैसे ही रंगो में भीतर के संवेदन को रूपायित करने की उनकी क्षमता अद्भुत है।
बहरहाल, हाल ही उनके कला के इस आयाम पर ख्यात फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज और रोहित सूरी ने लघु फिल्म ‘रिम्बेर्म्स ऑफ थिंग्स पास्ट: द वर्ल्ड ऑफ विनय शर्मा’ बनायी है। इसका आस्वाद करते चित्रकला, संगीत और सिनेमा के रिष्तों को गहरे से जिया जा सकता है। पंडित विद्याधर व्यास के स्वरों में राग बागेश्री के गान में संजोयी इस फिल्म की शुरूआत सांगानेर स्थित कागज के कारखाने से होती है। लुगदी से कागज बन रहा है। इस बन रहे कागज में चित्र सर्जन की तमाम संभावनाएं तलाषते स्वयं विनय कागज को अपने तई आकार देते मूल कैलिग्राफी में अतीत से जुड़ी वस्तुओं को सहेज रहे हैं। दृष्य बदलता है। विनय का जन्म स्थल लालसोट दिखाई देता है। कस्बाई गली, पुराना घर और उसके अंदर रखा बड़ा सा संदूक। पितामह आत्मानंद सरस्वती के बड़े से संदूक से पुराने ग्रंथ, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, पुराने कागजाद निकालते विनय अपनी कला यात्रा की जैसे यहां गवाही दे रहे हैं। सर्जन की तलाष आगे बढ़ती है। रेखाओं के रंग आच्छादित कैनवस में संवाद करती स्मृतियां से अनायास अपनापा होने लगता है। गाढे रंगों में मूल कैलिग्राफी के अंतर्गत प्रकृति के चितराम हैं तो जीवनगत सरोकार भी हैं। फिल्म के एक दृष्य में विनय स्टूडियों में काम कर रहे हैं। कला मगन मुद्रा का रोहित सूरी का लॉन्ग शॉट और उसकी बारीकी मन को छूती है।  दृष्य और भी हैं जिनमें कैनवस अलंकरण करते कलाकार की भाव मुद्राएं हैं तो हाल का विनय का वह संस्थापन भी है जिसमें पुरानी लालटेन, कलम दवात और दूसरी अतीत की चीजें उनके कला संवेदन को गहरे से हमारे समक्ष रखता है। पूरी फिल्म में कहीं कोई संवाद नहीं है, दृष्य ही देखने वाले से जैसे संवाद करते हैं। 
विनय देष के संभवतः ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अतीत से जुड़ी चीजों को मूल कैलिग्राफी में सर्जन का हिस्सा बनाते स्मृतियॉं के अंकन का सर्वथा नया कला भव निर्मित किया है। वह अतीत से जुड़ी किसी एक वस्तु को उसकी पूर्णता में नही बल्कि उसके किसी आयाम को निकालकर भीतर के अपने भावों के अनुसार उसका रूपाकार गढ़ते हैं। ऐसा करते अंतर्मन संवेदना के संप्रेष्य के तमाम आयामों का भरपूर इस्तेमाल उनकी सर्जना में होता है। कहें, लघु फिल्म उनके सर्जन के इस आयाम को गहरे से उद्घाटित करती है।
सिनेमा और चित्रकर्म का आरंभ से ही गहरा रिष्ता रहा है। कभी गोपी गजवानी ने ‘द टाईम’ और ‘द एंड’ शीर्षक से कला फिल्में बनायी थी। हुसैन और विवान सुन्दरम निर्मित कला फिल्में कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहती हैं। इनमंें कहीं कोई कथा नही थी परन्तु विषय का जो ट्रिटमेंट है, उसे गहरे से जिया गया है। कला और कलाकार पर फिल्म निर्मिती में दृष्य के साथ कलाकार की संवेदना के तमाम आयामों को बहुत कम समय में छूना ही तो होता है। इस दृष्टि से विनय के कला संसार पर निर्मित यह फिल्म कलाकार की भीतर की संवेदना से देखने की हमारी संवेदना को गहरे से जोड़ती है। उनकी कला से साक्षात्कार कराती है।


Monday, April 30, 2012

अंतर्मन संवेदना जगाते चित्र



कला का यह वह दौर है जिसमें कैनवस पर प्रयोगधर्मिता  का ताना-बाना बुनने की होड़ मची है तो संस्थापन में अचम्भित करने की। मानव मन संवेदना के साथ कला की सहज सौन्दर्य सृष्टि इसी से बहुतेरे स्तरों पर तिरोहित भी हो रही है। माने संवेदना से स्वतः होने वाली अभिव्यक्ति की बजाय कला प्रयासों की यांत्रिकता में गुम हो रही है। सब ओर इसी एकरसता को जैसे जिया जा रहा है। 
बहरहाल, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में युवा कलाकार मालचन्द पारीक के चित्रों से रू-ब-रू होते सुखद लगा। बंधी-बंधायी चित्र परम्परा की बजाय वहां अंतर्मन संवेदना को सर्वथा नये ढंग से उजागर जो किया गया था। प्रयोगधर्मिता परन्तु खाली प्रयोग के लिये ही नहीं। विषय-वस्तु की संवेदना भी वहां थी। मिश्रित माध्यम के पारीक के चित्रकर्म में भीतर की उसकी संवेदना का उजास तो है ही अभिव्यक्ति व विषुद्ध सौन्दर्य की खोज के बीच का द्वन्द भी दिखाई दिया। इसी से रूपायित ‘क्रांकीट जंगल’ की उसकी चित्र श्रृंखला देखने के बाद भी जेहन में बसती है।
बढ़ती आबादी के साथ कटते जंगल और उस पर इमारतों का खड़ा होता क्रांकीट संसार इन चित्रों के केन्द्र में है। खास बात यह है कि मालचन्द ने आत्मिक अनुभूति में जीवन के बदलते ढर्रे और तेजी से आ रहे बदलाव को सर्जन में गहरे से सहेजा है। शहरों की मॉल और फ्लेट संस्कृति पर एक प्रकार से अपनी कला से प्रष्न भी खड़े किये है। प्रष्न यह कि किस किमत पर हम इस संस्कृति के रहनुमा बन रहे हैं? प्रष्न यह कि सुकून का हमारा मापदंड क्या आधुनिक सुख सुविधाएं ही हैं? प्रष्न यह कि जंगल साफ कर अदेखे आकाष में हम कौनसे सपने चुन रहे हैं? तमाम उसके चित्रों का आस्वाद करते ऐसे ही सवाल और जेहन में कौंधते हैं। मुझे लगता है, चित्र सर्जन की यही वह मुखरता होनी चाहिए जिसमें दृष्य हमसे संवाद करे, भीतर की हमारी संवेदना को जगाए।
मालचन्द के चित्राकाष में खूबसूरत इमारतों में एक के ऊपर दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी और भी बहुत सी और खड़ी मंजिलों में गुम होते आकाष में वस्तुनिरपेक्ष रूप में विचारों का अनूठा प्रवाह है। इस प्रवाह में भौतिकता की दौड़ में तेजी से आ रहे मूल्यों के बदलाव को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। बाह्य रूप के सादृष्य में प्रतीकात्मक रूप मंे सौन्दर्य की अनूठी सृष्टि यहां है तो प्रकृति के गुम होते मूल्यों का रूदन भी है। ‘क्रांकीट जंगल’ श्रृंखला का रंग लोक भी अनूठा है। गहरे, हल्के और धूसरित के रंग बिम्ब। जल रंग, तेलीय, एक्रेलिंग का मिश्र प्रयोग। ज्यामीतिय संरचना में विषय-वस्तु के सूक्ष्म चितराम के अंतर्गत अंतर्मन संवेदना को इनमें गहरे से जिया जो गया है।
बहरहाल, मालचन्द के इन चित्रों को देखते हुए जेहन में वस्तु चित्रकार शार्द की याद आती है तो पौल सेजान के बनाए चित्र भीं औचक कोंधने लगते हैं। इसलिये कि दृष्य प्रभाव के साथ ही रूप तत्व को भी उसके चित्रों में तीव्रता से अनुभूत किया जा सकता है। मसलन बहुमंजिला एक इमारत के चित्र में मरे हुए शेर की खाल केन्द्र में है, पार्ष्व में जंगली जीवों के सफाया किये जाने के तमाम औजार आधुनिकता की चकाचौंध से झांकते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे ही फिष एक्वेरियम, गोल्डन मेमरी, एडजस्टेबल हैप्पीनेस, चेंज द हाउस, इट्स एनफ आदि चित्रों में जंगल काट बनायी इमारतों, बिजली के बेतरतीब झुलते तारों, होर्डिंग्स के बहाने जीवन के उस सच को मुखरित किया गया है जिसमें प्रकृति से दूर जीवन में यांत्रिकता का अनायास वरण हो रहा है।  
इन चित्रों को देखते कहीं पढ़ा औचक याद आ रहा है, ‘कला वास्तव के नैसर्गिक दृष्य रूप व काल्पनिक प्रतिकात्मक रूप के बीच घड़ी के  लंगर के समान झूलती रहती है।’ 


Sunday, April 22, 2012

आलागीला और पक्षी चित्रण की नयी दीठ


आरायस , आलागीला, मोराकसी। आप सोच रहे होंगे ये शब्द मैं कहां से ले आया। हिन्दी में फ्रेस्को पेंटिंग के लिये यही शब्द प्रयुक्त होते हैं। भित्ति चित्रण पद्धति की इस परम्परा पर जब भी विचार करता हूं, देवकी नंदन शर्मा याद आते हैं। कहूं, यह शर्मा ही थे जिन्होंने फ्रेस्को का भारतीय दीठ से एक प्रकार से पुनराविष्कार किया। फ्रेस्को ही क्यों बातिक, पेपरमेषी और तमाम दूसरी परम्परागत कलाओं को जीवित करने, उनमे युगानुकूल  परिवर्ततन के साथ प्रयोगधर्मिता के जो तान-बाने उन्होंने बुने, उन्हीं से तो यह सब कलाएं फिर से सामयिक हुई।
बहरहाल, सात साल पहले इसी अप्रैल माह की 24 तारीख को वह चिरमौन हुए। कुछ दिन पहले जवाहर कला केन्द्र में ख्यात कलाकार नाथूलाल वर्मा के निर्देषन में फ्रेस्को पेंटिंग का षिविर आयोजित हुआ तो देवकी नंदनजी की यादें जेहन में कौंधने लगी थी। ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और उनकी परम्परा में बढ़त करने वाले कलाकार भवानीषंकर शर्मा से संवाद हुआ। मैंने सुझाव दिया कि देवकी नंदन शर्मा के कला आयामों पर अकादमी क्यों नहीं एक व्याख्यान माला ही आयोजित करे। आखिर जड़ों सींच कर ही तो कला का पेड़ हरा हो सकता है!
बहरहाल, देवकी नंदन शर्मा ने वह किया जो कोई ओर नहीं कर सका। अजन्ता के भित्ति चित्रों के साक्षात् में उनके मिटते अस्तित्व ने उन्हें जैसे उद्धेलित किया। उन्होंने जैसे तभी यह तय कर लिया कि भित्ति चित्रों की अतीत की विरासत को वह सहेजेंगे। यह वर्ष 1949 की बात है। वनस्थली के कच्चे भवनों का पक्के में उनके प्रयासों से ही रूपान्तरण हुआ। इनमें अजन्ता चित्रों की अनुकृतियां के साथ ही भित्ति चित्रण के सर्वथा नवीन प्रयोग हुए। शैलेन्द्रनाथ डे, बिनोद बिहारी मुखर्जी सरीखे कला आचार्यों को वनस्थली बुला भित्ति चित्रण की परम्परा का उनके हथूके पुनराविष्कार हुआ। 
वनस्थली में पचास के दषक से ही देवकी नंदन शर्मा ने फ्रेस्को के विधिवत् प्रषिक्षण षिविर भी आयोजित करवाने प्रारंभ किये। कला षिक्षण को इससे नये आयाम मिले। यही नहीं बातिक, पेपरमेषी जैसी पारम्परिक कलाओं की समृद्ध परम्परा में युगानुकूल परिवर्तन करते उन्होंने लुप्त होती इन कलाओं को एक प्रकार से जीवनदान दिया। जयपुर रेलवे स्टेषन पर फ्रेस्को तकनीक से बनायी उनकी ढोला-मारू कलाकृति बरसों तक यात्रियों को लुभाती रही। वनस्थली कला मंदिर की दीवारों पर राजा पुलकेषी दरबार, बोधिसत्व, पदमपाणी और अन्य जातक कथाओं पर बनाये उनके आरायष अपनी मौलिकता में भित्ति चित्रों की हमारी समृद्ध परम्परा के ही संवाहक हैं।
फ्रेस्को को जीवित करने के साथ ही पक्षी चित्रण का भी देवकी नंदनजी ने सर्वथा नया मुहावरा हमें दिया। उनके उकेरे कबूतर, मोर, भांत-भांत की चिड़ियाओं, कोव्वों को देखते दीठ संवेदना के सर्वथा नये बिम्बों से साक्षात्कार होता है। ऐसा है तभी तो कभी ब्रिटिष इन्फॉर्मेषन सर्विस ने उन्हें विष्व के 18 सर्वश्रेष्ठ पक्षी चित्रकारों की सूची में शुमार किया था। 
प्रकृति, लोक एवं पौराणिक आख्यानों को देवकी नंदन शर्मा ने अपने चित्रों में सर्वथा नयी दीठ दी। फ्रेस्को तकनीक को नयी पहचान दी। कला के विभिन्न माध्यमों में काम करते उनके चित्रों को जब भी देखता हूं, प्रकाष और छाया प्रभाव का भी लयात्मक नाद वहां पाता हूं। परम्परागत चित्रों में प्रयोगधर्मिता करते के साथ उन्हें सामयिक करने का महत्ती कार्य ही देवकी नंदन शर्मा ने नहीं किया बल्कि दैनिन्दिनी जीवन के अनुभवों को चित्रों में परोटते जीवन दर्षन की लय को बेहद षिद्दत से उन्होंने अपने चित्रों में पकड़ा है। मुझे लगता है, यह देवकी नंदन शर्मा ही हैं जिन्होंने पेड़ो ंपर चहचहाती चिड़िया, कबूतर, कौव्वे, मोर आदि की अपने तई वैयक्तिक पुनर्व्याख्या की है। मानवीय अनुभव अपने आस-पास के परिवेष को सिर्फ आंख से देखना भर ही तो नहीं है वह महसूस करना भी है जो आंख की पूतली की परिधि से परे भी दिखाई देता है। देवकी नंदन शर्मा का चित्रलोकयही तो महसूस कराता है। 


Friday, April 13, 2012

शताब्दी बिहार महोत्सव में मिट्टी की सौंधी महक


मानव सभ्यता की सहचरी कालजयी हैं तमाम हमारी कलाएं। माने काल पर उनका कोई वष नहीं है। युग की पीड़ा, हर्ष, प्रथा-गाथा, धर्म-संस्कार के तमाम स्वर एक साथ वहां है। लोक का आलोक लिये। नृत्य, संगीत, चित्रकला, नाट्य आदि में कलाओं की सौरम को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।
हरहाल, जवाहर कला केन्द्र के मुक्ताकाष, रंगायन सभागार और कलादीर्घाओं में पिछले दिनों शताब्दी बिहार महोत्सव में कलाओं की इसी सौंधी महक में मन जैसे रम गया था। बिहारमय राजस्थान की मेरे लिये यह अलग दीठ थी। ऐसी जिसमें लोक नृत्य, नाट्य, गीत, संगीत, चित्रकला प्रदर्षनी के जरिये संस्कृति के अनूठे चितराम आंखे देख रही थी। लगा, यह कलाएं ही हैं जिनमें जीवन की उदात्ता है। आत्मीयता का अपनापा है। जीवन का रस है। संस्कृति की जीवंतता है। रंजना सरकार और अपूर्वा सृष्टि के कथक, नलिनी मिश्रा के कुचीपुड़ी, शारदा सिन्हा के लोकगीत माधुर्य के साथ ही लोक नाट्य फूल नौटंकी विलास देखे। हर प्रस्तुति में कला समृद्ध बिहार ही जैसे आंखों के समक्ष जीवंत हो रहा था।
षिल्पग्राम के खुले मंच पर देष की ख्यात लोकगायिका शारदा सिन्हा ‘अमवा महुअवा के झूमे डलिया, तनी ताक न बलमवा...’ गा रही थी। लगा, यह लोकमानस ही है जिसमें स्वतंत्रता और उन्मुक्ति की ऐसी उर्वरता है। सहजता का गान है। इस गान में मिट्टी की सौंधी महक है। फालतू के आदर्ष नहीं है और न ही शास्त्र बंधे नियम वहां है। ओढ़ी हुई दानषमंदी की बजाय वहां प्रकृति उपजे भावों का सहज स्पन्दन है। शारदा सिन्हा के स्वरों में लोक की अद्भुत मिठास है। स्वरों में खोते अनुभूत होता है जैसे बिहार का लोकजीवन आंखों के समक्ष साकार हो रहा है। दूसरे दिन मनोरंजन ओझा ने अपनी लोकगायकी में भी कुछ ऐसे ही रंग बिखेरे।
रंगायन सभागार में अपूर्वा सृष्टि का कथक भी उर में आनंद के भाव देने वाला था। उसके नृत्य से रू-ब-रू होते लगा सीखे हुए में वह अपने तई बढ़त करती है। नई नई परनों और नये नये टूकड़ों का अद्भुत रचाव वहां है। ताल को गहरे से जीते उसके घुंघरूओं की खनक और ‘ता थेई थेई...तत’ में चमत्कारिक पद संचालन। षिव स्तुति में नृत्य की उसकी मोहक छटा में ही मन जैसे रच-बस गया। अंग-प्रत्यंग उपांगों से अपूर्वा सृष्टि भावों की प्रस्तुति में नृत्य रस की समग्रता का आस्वाद करा रही थी। इससे ठीक पहले सभागार में कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के उत्तराधिकारी राजकुमार सिद्धार्थ की पत्नी ‘गोपा’ पर केन्द्रित नृत्य नाटिका में यषोधरा की अंतर्मन व्यथा, त्याग को कलाकारों ने अपने अभिनय से जीवंत किया। ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के संगीत स्वरो के साथ ही पारिजात कलादीर्घा में मधुबनी, भागलपुर षिल्प और बिहार की दूसरी पारंपरिक चित्रकलाओं की समृद्ध परम्परा का आस्वाद भी अनूठा है।
बहरहाल, बिहार शताब्दी समारोह अनूठा आयोजन था। बिहार के कला संस्कृति विभाग के प्रमुख शासन सचिव अंजनी कुमार सिंह और राजस्थान के पुलिस आयुक्त बी.एल. सोनी शताब्दी समारोह की समापन सांझ में षिल्पग्राम के खुले मंच पर कलाकारों की प्रस्तुतियों से भाव विभोर थे। राजस्थान और बिहार की संस्कृति समानताओं पर उन्हें बतियाते देख लगा, कलाएं काल निरपेक्ष ही नहीं स्थान निरपेक्ष भी होती है। भीतर के आनंद का ओज जो वहां है! विष्व के पहले बड़े लोकतंत्र, भगवान बुद्ध और जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर की जन्मस्थली है बिहार। कहीं पढ़ी किवदंती याद हो आयी। रेगिस्तानी इलाकों से कभी बिहार पहुंचे ऊंट सवार वहां की हरियाली देख खुषी से चिल्ला उठे ‘बहार है बहार!’ कहते हैं यही बहार बाद में बिहार हो गया। यह कितना सच है, कह नहीं सकता परन्तु शताब्दी समारोह में बिहार की बहार अभी भी मन अनुभूत कर रहा है।

Saturday, March 31, 2012

नमन धोरा धरा। नमन!

संस्कृति विकास के विविध रूपों की समन्वयात्मक समष्टि है। यह हमारी संस्कृति ही हैॅ जिसमें दृष्य और श्रव्य कलाओं का अनूठा भव है। कहें संस्कृति जीवन में व्याप्त है। यूं भी राजस्थान अपणायत का प्रदेष है। माने अपनत्व से लबरेज राज्य। उत्सवधर्मी संस्कति में रचा-बसा। कलाओं की विविधता लिये। यहां का इतिहास केवल तिथि-क्रम से ही जुड़ा हुआ नहीं है वरन् उसका संबंध उन मान्यताओं, परम्पराओं, विचारों से भी है जिनमें संस्कृति और समाज के गहरे सांस्कृतिक सरोकार निहित होते हैं।
मुझे लगता है, लोक का आलोक लिए है यह राजस्थान की कला-संस्कृति ही है जिसमें संगीत, नृत्य एवं लोक वाद्यों की मधुर झंकार है। रेत के धोरों में बजते अलगोजे, मोरचंग, नगाड़े, मंजिरों , तानपुरे की तान बरबस ही कानों में रस घोलती है तो घुमर, कालबेलिया, तेराताली, भवई जैसे लोक नृत्यों से मन मयुर औचक नाचने लगता है। रेत के धोरों में जीवन के स्पन्दन से जुड़ी है तमाम यहां की हमारी कलाए। माटी की सौंधी महक लिये। कालगत को देषगत बनाते।
चित्रकला की बात करें। तमाम पारम्परिक हमारी चित्रषैलियां जीवन साधना की संवाहक है। धार्मिकता और श्रृंगारिता इनके मूल में जो रही है। अलग-अलग रियासतों में पनपी भिन्न-भिन्न चित्रकला षैलियां। इनमें जीवन के विविध विषयों के साथ वहां के परिवेश का सांगोपांग उभार है। मसलन नाथद्वारा शैली को ही लें। ब्रज और उदयपुर शैली के समन्वय से बनी नाथद्वारा शैली के अंतर्गत श्रीनाथजी के प्राकट्य एवं लीलाओं से संबंधित असंख्य चित्र कागज और कपड़े पर तब से लेकर अब तक बन रहे हैं। बीकानेर शैली में यति मथेरणों की पारम्परिक जैन मिश्रित शैली और मुगल दरबार से आयी उस्ता परिवार की ऊॅंट की खाल पर चित्रकारी के अलावा विभिन्न शैलियों के मिश्रण के साथ बीकानेर के परिवेश को उद्घाटित करती ठेठ राजस्थानी शैली में हिन्दु कथाओं, संस्कृत और हिन्दी राजस्थानी काव्यों को आधार बनाकर बनाए चित्र सर्वथा अलग रंगत लिए है।
ऐसे ही किशनगढ़ शैली की बणी-ठणी ने विश्वभर में अपनी अलग धाक जमायी। रजपूति सभ्यता और संस्कृति, तत्कालीन परिस्थितियों, भौगोलिक विशेषताओं के बारीक पहलुओं को अपने में समेटे यहां चित्र शैलियों का जो विकास हुआ उसमें देशज काल की अनुरूपता तो है ही, प्रकृति परिवेश का भी बहुरंगी चित्रण है। जन जीवन की भावनाओं के लोकप्रिय विषयों, राधाकृष्ण के माधुर्य भाव के साथ ही विभिन्न पौराणिक आख्यानों, दरबारी जीवन, उत्सव, शिकार, राजा-रानियों के चित्रांकन, लोक कथाओं, काव्य आदि असंख्य विषयों पर कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों में प्रयुक्त लाल, पीला, श्वेत और हरे रंगों का संयोजन ऐसा है जिससे विषय अपने विराट परिवेश में स्वतः ही उद्घाटित होता है। आधुनिक दौर में चित्रकला में सर्जन के महत्वपूर्ण आयाम भी जुड़े है। प्रभाववाद, घनवाद, अभिव्यंजनावाद, अमूर्त कला धारा, तंत्र कला और देष के कला आंदोलनों से जुड़ते सृजन की वैचारिकता के अंतर्गत अम्लांकन, काष्ठ, छापांकन व कोलोग्राफ विधा में भी इस दौरान पर्याप्त सृजनकर्म किया गया है तो सेरीग्राफ व लीथोग्राफ में भी नवीन सोच रखते महत्वपूर्ण कलाकर्म किया गया है। कला जगत में वैश्विक स्तर पर पर पसर रही नयी प्रवृति के अंतर्गत पश्चिम में जड़े जमा रहे वीडियो आर्ट या इंस्टालेशन की गंूज भी अब राजस्थान मे सुनायी देने लगी है।
बहरहाल, चित्रकला ही क्यों, संगीत और नृत्य में भी राजस्थान अत्यधिक समृद्ध प्रदेष है। उल्लसित लोक मानस से निकलने वाली अटूट धारा के यहां के लोक गीत, अलग-अलग क्षेत्रों की परम्पराओं, मान्यताओं और संस्कृति से जुड़े लोक नृत्यों में मानों जीवन थिरकता है। घूमर, गैर, गींदड़, डांडिया, तेरहताली, भवई, चकरी, बमरसिया, मेहंदी, पणिहारी का नाच, भैरूजी के भोपे का नृत्य, नाथपंथ कालबेलियों का पूंगी नृत्य, थोरियों का फड़ नृत्य, कच्छी घोड़ी का नृत्य, मिरासी, चित्तौड़ का तुर्रा-कलंगी नृत्य उल्लसित मन के ही तो प्रतीक हैं। लोकनाट्यों के साथ भी यही है। स्थान-विषेष की परम्पराओं को प्रतिबिम्बित करते इनमें नृत्य के साथ नाट्य संवाद भी निहित है। बीकानेर में होली के दिनों में रम्मतें होती है। हेड़ाउ मेरी, अमरसिंह राठौड़ की रम्मतों में एतिहासिक, पौराणिक के साथ सामाजिक जीवन से जुड़े प्रसंगों का चौक-मौहल्लों में प्रदर्षन होता है। कला मन के यही तो वह चितराम हैं, जिनमें व्यक्ति सदा बसना-रचना चाहता है। इसीलिये कहें कि उत्सवधर्मी राजस्थान में सात वार, नौ त्योंहार हैं। ‘पधारो म्हारे देस...’ की आतिथ्य सत्कार परम्परा के साथ कला-सस्कृति के अनूठे रंगों से सजी है यह धोरा धरती। नमन धोरा धरा। नमन!

Friday, March 23, 2012

सभ्यता और संस्कृति का कला नाद

सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरूद्ध अपने को प्रमाणित करने का प्रयत्न कहीं है तो वह कला में है। यह कलाएं ही है जो भीतर के हमारे सौन्दर्यबोध को जगाती हैं। संपूर्ण अर्थ में कला कैनवस का अंकन, मूर्तिशिल्प, नृत्य, नाट्य भर ही तो नहीं है। अंतर्मन संवेदना का उत्स कला है। आनंदानुभूति भी उसी का एक हेतु है। रेखाओं द्वारा, वाणी द्वारा, मूर्ति गढ़न में और ताल में कला की उपयोगिता का आधार यह हमारा सौन्दर्यबोध ही है। इसीलिये लोक संस्कृति, परम्पराओं, रहन-सहन और स्थान विशेष के वास्तु, स्थापत्य में हर ओर, हर छोर कलाओं का ही बोलबाला है।
मुझे लगता है, यह कला और कलाकार ही हैं जो सार्वजनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर काल को नियोजित करते हैं। कलाओं में ही काल, समय का नाद निहित है। अजंता की गुफाओं में, खजूराहो, कोर्णार्क की दिवारों पर अंकित मिथुन मूर्तियों में, सांची के स्तूप में, अशोक कालीन स्तम्भों में और दूसरी तमाम हमारी मूर्तिकला, स्थापत्यकला में स्थान, विशेष के साथ युगीन सभ्यता और संस्कृति ही तो प्रतिबिम्बित होती है। युगीन सोच की संवाहक हमारी कलाकृतियों, वास्तु और शिल्प ही है। यही क्यों, समाधियां, स्मारकों में भी हमारे पूर्वजांे की संलिप्तता एक खास अंदाज में दिखाई देती है।
यह जब लिख रहा हूं, कला दीठ के यायावरी दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, छत्तीसगढ़ जाना हुआ था। खैरागढ़ स्थित देश के एक मात्र इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने। कला संकाय के डीन मित्र महेश चन्द्र शर्मा के सौजन्य से वहां से अस्सी किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के खजूराहो कहे जाने वाले शिव धाम भोरमदेव भी जाना हुआ। गाड़ी स्वयं ही ड्राइव कर रहा था सो रास्ते पर खास ध्यान था। भोरमदेव छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में स्थित है। रास्ते भर आदिवासी संस्कृति से साक्षात् होते मैनें पाया सड़क किनारे छपरेल के घरों में खास अंदाज में लोक चितराम अंकित हैं। सिंदुरी रंग से स्थानीय लोगों का गहरे से जैसे नाता है। वहां पहुंचा तो सिंदुरी रंग से सजा भोरमदेव मंदिर का संकेत चिन्ह ळभी अलग से दिखा। पांच फूट ऊंचे चबूतरे पर बना शिव का अद्भुत शिल्प, स्थापत्य धाम। गोड राजाओं के देवता भोरमदेव माने शिव। कलात्मक सौन्दर्य से सराबोर। मंदिर की बाहरी दिवारों पर बारीकी से अंकित नृत्यांगनाएं, मिथुन मूर्तियों का भव। वहां से लौट आया परन्तु अभी भी खैरागढ़ जेहन में है। वहां के वास्तु, शिल्प और तमाम दूसरे निर्माण कार्यों ने जो सौन्दर्यबोध दिया, उसी में रमा हूं। मुझे लगता है, कला के यही तो वह युगीन सरोकार हैं जिनसे हम चाह कर भी जुदा नहीं हो सकते।
बहरहाल, ऐसी ही अनुभूति भुवनेश्वर में भी हुई। दो भागों मंे बंटा भुवनेश्वर का एक भाग आधुनिकता से तो दूसरा पूरी तरह से प्राचीन संस्कृति को अपने में सामाहित किये है। लिंगराज मंदिर जाएंगे तो इस संस्कृति से साक्षात् होगा। बिन्दु सागर झील के आस-पास का परिवेश बीते समय और कला के अद्भुत सौन्दर्य का आस्वाद कराता है। खंडहर होते हुए भी पाषाण मंदिरों का शिल्प वैभव वहां जैसे आपसे संवाद करता है। वहां ही क्यों आप किसी भी धरोहर संपन्न नगर, स्थान पर जाएं आपको ऐसा ही अहसास होगा। छतों के कंगूरें, चोरौहों पर स्थापित मूर्तिशिल्प को लें। पार्क में रखी कोई पुराने ढंग की बैंच, महल, मंदिर परिसर में लगे फव्वारें झाड़फानुशों को देखें। रोड साईटों पर लगाये गये पिल्लरों, उनमें बंधी लोहे की सांकलों को लें। शहर की संस्कृति, वहां की कला से आपका सीधे साक्षात् होगा। विश्व के एम मात्र सुनियोजित बसे शहर गुलाबी नगरी जयपुर को ही लें। चौपड़, एकरस बनी दुकानें, गुलाबी रंग और यहा का वास्तु-सभी में सुव्यवस्थित बसावट की धरोहर प्रतिबिम्बित होगी। और नही ंतो कस्बाई संस्कृति को अभी भी जीते शहर बीकानेर को ही लें। वहां की तंग गलियां, हवेलियां, चौक मोहल्लों में बिछे तख्त माने पाटों की संस्कृति अपनापे को अपने आप ही बंया कर देती है। किसी शहर का कलात्मक सौन्दर्यबोध क्या यही नहीं है!

Friday, March 16, 2012

उत्सवधर्मी संस्कृति के संवाहक

प्रेमचन्द गोस्वामी रंग और और रेखाओं की उत्सधर्मी संस्कृति के संवाहक थे। संवदनाओं का स्पन्दन कराता उनका कैनवस अनुभूतियों का जैसे गान करता। तुलिकाघातों से रंगों का वह जो राग सुनाते उसमें रचने-बसने का हर किसी का मन करता। कहें वह मानव मन संवेदनाओं, प्रवृतियों, ंिचंतन को रंग,रेखाकाष देने वाले अद्भुत कला साधक थे। ऐसे जिन्होंने अमूर्तन में परम्परा का रस घोलते भारतीय संस्कृति की उत्सवप्रियता की हमारी संस्कृति का नाद किया। किसी एक षैली सें बंधे रहने की बजाय तमाम कला षैलियों से सरोकार रखते यह प्रेमचन्दजी ही थे जिन्होंने रंग, रेखाओं के गतिषील प्रवाह में उनकी कोमलता के छन्द को कभी मुर्झाने न दिया।
याद पड़ता है, माउन्ट आबू में कोई चार-पांच साल पहले ललित कला अकादेमी ने राज्य स्तरीय कला षिविर का आयोजन किया था। कला समीक्षक के रूप में खाकसार भी इसमंे सम्मिलित हुआ था। तभी चार-पांच दिन लगातार प्रेमचन्दजी का साथ मिला था। षिविर में अपनी ही धुन में उन्हें काम करते देखा। कैनवस पर रेखांकन के बाद ब्लेडनुमा लोहे की पत्ती से फलक पर वह रंग फैला रहे थे। हरे, पीले, नीले, लाल, काले में सफेद रंग को मिलाते वह रंगों का जैसे अद्भुत कोलाज रच रहे थे। मैं देख रहा था, रंगों के उनके निभाव में सर्वथा नयापन था। यह ऐसा था जिसमें स्ट्रोक दर स्ट्रोक रंग अपनी चमक में अद्भुत लय अंवेर रहे थे। कैनवस उत्सवधर्मी रंगों से सज रहा था। रंग नहीं रंगों का कोलाज। हरेक रंग का अपना अनुषासन। एक साथ बहुत सारे रंगों की उपस्थिति परन्तु कहीं कोई कोलाहल नहीं। निरवता। चटक रंग परन्तु सौम्यता हर ओर, हर छोर। रंग रागात्मकता। ब्लेडनुमा पत्ती से वह कैनवस पर कभी रंग छितराते तो कभी बिखराते। बहुत देर से उनके कैनवस पर ही नजर ठहरी थी परन्तु उन्हें जैसे मेरी उपस्थिति का भान ही नहीं था। शायद इसलिये कि रंगों की अपनी दुनिया में ही वह पूरी तरह से खोये हुए थे।
कैनवस के प्रेमचन्दजी के यही वह सरोकार थे जो उन्हें ओरों से जुदा करते थे। बाद में तो उनके कलाकर्म का गहरे से साक्षात् किया। मुझे लगता है, राजस्थान के वह एक मात्र ऐसे कलाकार थे जिन्होंने रंग और रेखाओं के होनेपर का गहन अन्वेषण करते अपने तई उन्हें सर्वथा नये अंदाज में परोटा। मसलन रंगो को मन के स्पन्दन से जोड़ती उनकी रंगोत्सव श्रृंखला को ही लें। कैनवस का उत्सवधर्मी गान वहां सुनाई देगा तो उनकी ज्यामितीय संरचनाओं में अद्भुत उड़ान है। आकाष मंे उड़ते पंछियों की मानिंद। ऐसे ही बिन्दु पद्धति से फलक में अंतराल को तोड़ते भी उन्होंने आकृतियों का सर्वथा भिन्न मुहावरा हमें दिया। यह ऐसा है जिसमें ग्लोबनुमा गोलों में रंगों की पारदर्षी परत में चलचित्रनुमा जीवंत दृष्यों का असीमित आकाष है। कभी उन्होंने तांत्रिक प्रतीक लेते हुए भी कैनवस को समृद्ध किया था। तंत्र साधना की समृद्ध परम्परा को रंग और रेखाओं के सृजन सरोकारों से जोड़ते उन्होंने लोक परम्पराओं, इतिहास, धर्म, मिथकों का अपने तई कैनवस पुनराविष्कार किया। तंत्र साधना चित्र ही क्यों तमाम उनके चित्रों की बड़ी विषेशता यही तो है कि उनमें कहीं कोई कथा, व्यथा अभिव्यंजित है। मानो कैनवस हमसे कुछ कह रहा है। मुझे लगता है, प्रेमचन्दजी कैनवस की किस्सागोई में सिद्धहस्त थे। किसी एक शैली में बंधकर रहने की बजाय बहुविध शैलियों, कला परम्पराओं में उन्होंने कार्य किया। कला में उन्होंने सदा नई राहों का अन्वेषण करते रंग, रेखाओं के संयोजन की संप्रेषणीयता का सर्वथा नया मुहावरा भी रचा।
यह जब लिख रहा हूं, रंगोत्सव श्रृंखला के उनके चित्र जेहन में फिर से कौंधने लगे हैं। लग रहा है, औचक कोई आकृति खिलखिलाकर सामने आएगी, हल्की सी मुस्कान देकर लौट जायेगी। रंग और रेखा संवाद का प्रेमचन्दजी का यह आमंत्रण उनके चित्रों में सदा ही मिलता रहा है। वह नहीं है परन्तु उत्सवधर्मिता की हमारी संस्कृति के उनके कैनवस कहन को क्या कभी हम भुला पाएंगे!

Monday, March 5, 2012

दृश्य संवेदना के अनुभव का भव


छाया कला यानी दृश्य संवेदना में अनुभव का भव। प्रकाश की कला सर्जना। प्रकाश गति पथ पर कोई भी दूसरा पदार्थ अवरोधक बनता है तो पीछे एक छाया की सृष्टि होती है। कैमरे में छाया की इस सृष्टि से ही दृश्य का अंकन होता है। कैमरेनुमा इस यंत्र की सहायता से यदि दिख रहे दृश्य में निहित संवेदना, अंतर्मन अनुभव के भव को उकेरा जाये तो वह छाया कला ही तो कही जाएगी। छायाकला माने संवेदना से उपजी सर्जना। ऐसी सर्जना जिसेमें दृश्य मंे निहित बाहरी ही नहीं बल्कि आंतरिक सौन्दर्य की भी दीठ निहित है। कहें, कैमरे की आंख से वह सौन्दर्य भी अनावृत होता है जिसे न तो शब्दो में व्यक्त किया जा सकता है और न ही वस्तुगत दृष्टि से उसे जाना जा सकता है।
बहरहाल, कुछ समय पहले मालवीय राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान के क्रिएटिव आर्ट्स सोसायटी फोटोग्राफी क्लब द्वारा आयोजित छाया कला प्रदर्शनी ‘मोमेन्ट्स 2012’ का आस्वाद करते सहज ही यह सब अनुभूत किया। लगा, यह छायाकला ही है जिसमें सामान्यतया दिख रही वस्तु, विषय के साथ ही वह तमाम भी अनायास उभर आता है, जिसे नंगी आंख चाहकर भी नहीं देख पाती। स्मृति के गलियारे में छाया कला कृतियां काैंध रही है। एक छायाचित्र है जिसमें जारनुमा एक्वेरियम में तैरती मछली के आस-पास के निर्जिव हंसते बुद्ध, महाराजा और गुलदस्ते की जीवंतता का सांगोपांग चितराम है। दूसरे में जूतों के पार्श्व में मंजिलों की गहराई है। छायाचित्र और भी हैं जिनमें जंतर-मंतर में थकित पथिकों का धूप विश्राम है तो चौथे में पत्तियों से झांकती गिलहरियां, मछली को मुंह में दबा उड़ती क्रेन, सूखे डंडेनुमा डाली पर बैठी चिड़िया और इमारत से झांकता अतीत जैसे हमसे संवाद कर रहा है। किसी में अंधेरे में उभरती मानवाकृति, फूटपाथ पर खड़े को निहारती साईकिल सवार और उसकी गति, पेड़ की छाया में जीवन के अविराम का मोहक अंकन तो किसी में तारों पर चलता बंदर औचक ठहर कर कुछ सोचने को विवश करता है। दृश्य संवेदना लिए चित्र और हैं। मुझे लगता है, प्रकाश-अंधकार के बिम्ब प्रतिबिम्बों के साथ यह विद्यार्थियों का संवेदनशील कला मन ही तो है जिससे अनुभव का ऐसा खूबसूरत भव निर्मित हुआ है। रूपों की मौन मुखराभिव्यक्ति। सौन्दर्यपरक लय-छन्द मंे आविष्ट छायाचित्र। सोचता हूं, देखना महत्वपूर्ण है परन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण देखने की हमारी सोच है। यह वह सोच ही तो है जिसमें रंगों, रूप के भिन्न सरोकार हमें रस से सराबोर करते हैं।
फोटोग्राफी क्लब के सलाहकार और छायाकार मित्र महेश स्वामी के साथ एक-एक चित्र की बारीकी मंे जाते विद्यार्थियांे के छाया कला मन की संवेदना को गहरे से जिया। महेश छाया चित्रकारी में रूचि रखने वाले विद्यार्थियों को उत्तरोतर आगे बढ़ाने, उनमें निहित कला संवेदना को जगा उसे मंच प्रदान करने के अनथक प्रयास निरंतर करता रहा है। यह उसका संवेदनशील मन ही है जिसमें उत्सवधर्मिता के साथ अपने नहीं दूसरों के छायाचित्रों के प्रति भी अपार प्यार है। छाया कला के उसके यही तो वह सरोकार हैं जो उसे ओरांे से जुदा करते हैं।
बहरहाल, मुझे लगता है, यह छाया कला ही है जिसमें प्रकृति प्रदत्त चीजों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत ही नहीं किया जाता बल्कि प्रकृति के प्रस्तुत गुणों में से उकेरे जाने वाली विषय-वस्तु की एक प्रकार से अन्विति की जाती है। विषय में निहित आंतरिक सौन्दर्य, सौन्दर्य के किसी अंश को अनुभूत करते कैमरे की तीसरी आंख से उसे परोटा जाता है। कैमरेनुमा यंत्र की तकनीक यहां मदद जरूर करती है परन्तु यदि छायाकार में विषय-वस्तु के प्रति अतिरिक्त सजगता, क्षण में परिवर्तित घटना की गति को पकड़ने की सामर्थ्य नहीं है तो वह केवल फोटोग्राफी ही होगी छायाकला नहीं। प्रकृति और चीजों को उसके सर्वोत्तम रूप में पकड़ भीतर के अपने कलाकार से उसे जीवंत ही तो करता है छायाकार। तकनीक इसमें साधन हो सकती है साध्य नहीं। सर्जना में क्षण आस्वाद के अनुभव की समग्रता को जीते इसीलिये छायाकार जो अभिव्यक्ति करता उसे शब्दों मंे चाहकर भी कहां व्यक्त किया जा सकता है! इसीलिये तो कहा गया है एक चित्र हजारों हजार शब्दों से भी कहीं अधिक मुखर होता है।

Friday, February 24, 2012

उत्सवधर्मी संस्कृति के आख्याता और व्याख्याता

कला माने जिसका कलन होता है। काल में जिसकी गणना की जा सके। काव्य में भाषा, चित्र मंे रंग और रेखाएं संगीत में नाद आदि कलाओं की हमारी भिन्नता का बोध कराते हैं। यही सब तो वह है जिससे उत्सधर्मिता की संस्कृति है। बहरहाल, कला संस्कृति संस्थानों में रहते अषोक वाजपेयी ने सदा ही उत्सवधर्मिता की हमारी इस संस्कृति से हमारा नाता कराया है। केन्द्रीय ललित कला अकादमी के अध्यक्ष पद रहते भी उन्होंने चित्रकला के साथ ही उसके दूसरी कलाओं से संबंधों पर महत्वपूर्ण आयोजन किये। ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर देष में अपनी तरह का पहला नेषनल आर्ट वीक भी उनकी सोच से ही चंडीगढ़ में हो पाया। यह उनका कार्यकाल ही रहा जिसमें ललित कला अकादेमी चित्रकला षिविरों तक ही सीमित नहीं रहकर कलाओं पर संवाद का भी केन्द्र बनी। हिन्दी और अंग्रेजी सहित भारतीय भाषाओं में कला और कलाकारों पर लिखे गये निबंधों का दो बड़े जिल्दों में कवि, कला समीक्षक पीयूष दईया के संपादन में ‘कला भारती’ शीर्षक से प्रकाषन भी अषोकजी के कार्यकाल में ही हुआ। रचनात्मक गतिविधियॉ और भी हुई परन्तु कार्यकाल पूरा होने पर जब उन्होंने कहा कि वह जो चाहते थे नहीं कर सके और यह भी कि वह संस्थाएं बना तो सकते हैं परन्तु उन्हें चला नहीं सकते हैं तो इसमें निहित सरकारी तंत्र में चाहकर भी इच्छित नहीं कर पाने की उनकी मजबूरी को भी समझा जा सकता है। सरकारी तंत्र में कलाओं के लोकतंत्र की कहां कोई गुंजाइष होती है!बहरहाल, मुझे लगता है, कला-संस्कृति आयोजनों के अषोकजी अविराम पथिक है। रजा फाउण्डेषन के ग्यारह वर्ष पूरा होने पर दिल्ली में ललित कला, कविता, संगीत और नृत्य के ‘अविराम’ समारोह की उनकी सोच इसी का प्रमाण कही जा सकती है। भारत भवन, उस्ताद अलाउद्दीन खां अकादमी और भी न जाने कितने संस्थानो के जरिये सदा उन्होंने कला उत्सवधर्मिता का नाद किया है। कला-साहित्य की उनकी उत्सवधर्मिता और पंगे मोल लेकर भी कुछ करने की उत्सुकता से बहुतेरे स्थापित हुए, बहुतों ने बहुत कुछ पाया भी और नुगरे बन उन्हें गालियां भी दी है परन्तु आयोजनधर्मी अषोकजी को इसकी क्या परवाह! बकौल वाजपेयी ‘अविराम’ भी उनकी निंदित उत्सवधर्मिता का ही प्रमाण हैं।बहरहाल, आपा-धापी के इस दौर मंे जब हमें अपने पास के आदमी की आवाज भी सुनने की फुर्सत नहीं है, कलाओं के अर्न्तनिहित को सुनाने वाला ऐसा कोई है जिसे सुनने का, बल्कि कहें गुनने का मन करता है। उन्हें पढते, सुनते साहित्य और संस्कृति के हमारे संपन्न संसार की अनुभूतियों के अनगिनत संदर्भ मिलते हैं। यह ऐसे हैं जिनमें जिस समय में हम जी रहे हैं, उस समय की संस्कृति की उत्सवधर्मिता बंया होती है। कहें वह संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम हमारी कलाओं के आख्याता भी हैं और व्याख्याता भी। मुझे लगता है, कलाओं पर तमाम उनका लिखा हमारा सांस्कृतिक चिन्तन है। ऐसा सांस्कृतिक चिन्तन जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य कुछ इस तरह से घुले-मिले हैं कि उसमें कलाकार नहीं होते हुए भी हम अपने होने की तलाष कर सकते हैं। आडम्बरप्रियता और वाक्वैदग्ध्य के प्रदर्षन की होड़ में उनका होना और कुछ करना सुकून देता है। इसलिये भी कि हम में से कोई है जो कला-संस्कृति के प्रति घटते रूझानों पर खाली विलाप ही नहीं करता बल्कि सदा कुछ कर कलाओं की हमारी उत्सवधर्मिता को जिंदा रखे हुए हैं। संवाद में अषोकजी ने बहुतेरी बार कहा है ‘साहित्य और कलाएं मनुष्य का ऐसा प्रजातंत्र है, जहां आप सिर्फ अपनी प्रतिभा, उपलब्धि और संघर्ष के बल पर ही प्रवेष पा सकते हैं और जहां से आपको कोई भी, चाहे वह सत्ता हो या ईष्वर, संघ हो या संगठन, अभियान हो या कुप्रचार, देषनिकाला नहीं दे सकता।’ अषोकजी की रचनाधर्मिता, आयोजकीय व्यक्तित्व पर जब भी विचार करता हूं, उनका यह कहा ही जेहन में कौंधता है। नौकरषाह कह कर उन पर सवाल उठाने वालों को यह तो समझना ही चाहिए कि इतने नौकरषाहों में क्यों केवल अषोक वाजपेयी ही संस्कृतिकर्मी, कला मर्मज्ञ के रूप में विवादों को झेलते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता से हमारे सामने से कभी लोप नहीं हुए हैं!

Friday, February 17, 2012

नटराज राज नमो नमः

संगीत-नाट्य के आदि प्रवर्तक हैं भगवान शिव। कहते हैं, कभी अपनेे नृत्य के बाद उन्होंने डमरू बजाया। डमरू की ध्वनि से ही शब्द ब्रह्म नाद हुआ। यही ध्वनि चौदह बार प्रतिध्वनित होकर व्याकरण शास्त्र के वाक् शक्ति के चौदह सूत्र हुए। नृत्य में ब्रह्ाण्ड का छन्द, अभिव्यक्ति का स्फोट सभी कुछ इसी में छिपा है। महर्षि व्याघ्रपाद ने जब शिव से व्याकरण तत्व को ग्रहण किया तो इस माहेश्वरसूत्र की परम्परा के संवाहक बने पाणिनि।
बहरहाल, आदि देव हैं भगवान शिव। देवों के भी देव। सुर-ताल के महान ज्ञाता। नृत्य की चरम परिणति शिव का ताण्डव ही तो है। नटराज जब नृत्य करते हैं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वेश्वर की लीला का उच्छास उनके अंग-प्रत्यंग मंे थिरक उठता है। शिव का नृत्य तांडव है और पार्वती का लास्य। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार लास्य का अर्थ लीला या क्रीडा करना है। स्त्री-पुरूषांें के आपसी मनोभावों के आधार पर होने वाली लीला लास्य है। यह एक ही अर्थ या अलग-अलग अर्थों पर अवलम्बित हो सकती है। पारम्परिक मान्यता यह भी है कि नटराज शिव ने पहले पहल पृथ्वी पर तमिलनाडू के चिदम्बरम मंदिर मंे ही संध्या ताण्डव किया। चिदम्बरम् के मंदिर जाएं तो ध्यान दें, वहां नटराज पंचम प्राकार के अंदर हैं। यहां उनका आकाश स्वरूप हैं। माने कहीं कोई अवकाश नहीं। नटराज की शक्ति-स्वरूपा नाट्येश्वरी भी है।
मन में कल्पना होती है, नटराज शिव मगन हो नृत्य कर रहे हैं। वह जब नृत्य करते हैं तो एकाकी कहां होते हैं! सृष्टि के विकास में सभी प्रादुर्भूत सहायक शक्तियां वहां एकत्र है। ब्रह्मा ताल देते हैं। सरस्वती वीणा बजाती है। इन्द्र बांसूरी बजाते हैं और विष्णु मृदंग। लक्ष्मी गान करती है। भेरी, परह, भाण्ड, डिंडिम, पणन, गोमुख आदि अनद्ध वाद्यों से गुंजरित है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड।
बहरहाल, नटराज प्रवर्तित नृत्य के अनेक प्रकार हैं। ताण्डव सर्वप्रमुख है। कहते हैं शिव ने त्रिपुरदाह के बाद उल्लास नर्तन किया। भगवान शिव उल्लास में आकर पृथ्वी पर अपना पैर पटके भुजाओं को संकुचित करते हुए अभिनय करते हैं ताकि यह लोक उनकी भुजाओं के आघात से छिन्न-भिन्न न हो जाये। शिव तीसरा नेत्र खोले तो यह लोक भस्म हो जाये सो वह तृतीय नेत्र बंद करके ही नाच करते हैं। भोले भंडारी नाचने लगे तो सब कुछ भूल गये। नाचते ही रहे। निर्बाध। कहते हैं, उन्हें संयत करने के लिये ही तब पार्वती ने लास्य नृत्य किया। शिव ताण्डव रस भाव से विवर्तित था और पार्वती का किया लास्य रस भाव से समन्वित। कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में शिव के नृत्य का वर्णन करते लिखा है, यह नाट्य देवताओं की आंखों को सुहाने वाला यज्ञ है। पार्वती के साथ विवाह के अनन्तर शिव ने अपने शरीर में इसके दो भाग कर दिये हैं। पहला ताण्डव है और दूसरा लास्य। ताण्डव शंकर का नृत्य है-उद्धत। लास्य पार्वती का नृत्य है-सुकुमार तथा मनोहर।
ताण्डव नामकरण की भी रोचक कथा है। कहते हैं महादेव के नृत्य का अनुकरण उनके शिष्य ‘तण्ड’ या ‘तण्डु मुनि’ ने किया। तण्ड मुनि द्वारा प्रचारित होने से यह ताण्डव कहलाया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र मंे इसका सांगोपांग उल्लेख है। शिव आज्ञा से ही तण्डु ने उनके इस नृत्य को अभिनय के प्रयोग निमित्त भरतमुनि को दिया। अभिनवगुप्त की टीका मंे तण्डु को ही भगवान शिव का प्रख्यात गण नन्दी बताया गया है।
बहरहाल, नटराज की नृत्यशाला यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड है। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पांच ईश्वरीय क्रियाओं का द्योतक नटराज का नृत्य ही है। शिव के आनंद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है और रोद्र ताण्डव के साथ ही संपूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाता है। यह जब लिख रहा हूं, नटराज स्तुति ही जेहन में कौंध रही है, ‘सत सृष्टि तांडव रचयिता नटराज राज नमो नमः/हे आद्य गुरू शंकर पिता/गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्माण्डना/ नित होत नाद प्रचंडना, नटराज राज नमो नमः।’ माने हे नटराज आप ही अपने तांडव द्वारा सृष्टि की रचना करने वाले हैं। आप ही परम पिता और आदि गुरू हैं। हे शिव, यह संपूर्ण विश्व आपके मृदृंग की ध्वनि द्वारा ही संचालित होता है। इस संसार में व्याप्त प्रत्येक ध्वनि के स्त्रोत आप ही हैं। हे नटराज राज आपको नमन है! नमन प्रभू। नमन!

Friday, February 10, 2012

कर्षयति इति कृष्णः

कृष्ण का अर्थ है, जो आकर्षित करे। बाह्य रूप मंे ही नहीं, आंतरिक रूप मंे भी। कहा भी तो गया है, ‘कर्षयति इति कृष्णः।’ माने चिरंतन है जिनका आकर्षण। यह कृष्ण ही तो हैं जिन्होंने 64 कलाओं में पूर्णता को जिया। चन्द्रमा की भी 14 ही कलाएं है परन्तु कृष्ण तो तमाम कलाओं की पूर्णता लिए हैं। पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण। उनके मोहक स्वरूपों पर जब भी मन विचारता है, त्रिभंगी मुद्रा में खड़े गोपियों को रिझाने वाले बंशी बजैया कान्हा की छवि आंखों के सामने घूमती है तो महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन रथ के सारथी बन उन्हें कर्मयोग की शिक्षा देते कृष्ण भी औचक नजरों के सामने प्रकट होते हैं। श्रीमद्भागवत् में गोचारण के बाद घर लौटती गायों के पीछे गऊओं के खुर से उठती धूल से सने श्री कृष्ण का रूप वर्णन भी जेहन में अनायास ही कौंधता है। चेहरे पर पसीने की छिटकी बूंदे और धूल से लथपथ थका थका उनका चेहरा। अद्भुत शोभा लिये। छवियां और भी है। राधा संग रास रचाते कृष्ण। सबको थिरकाते स्वयं अचल कृष्ण। यह कृष्ण ही हैं जिनके लोकरंजक स्वरूप ने जन-मानस को सदा ही आनंदित, आल्हादित किया है। नृत्य, संगीत और चित्रकला तो कृष्ण लीलाओं से जुड़कर ही सदा समृद्ध होती रही है।
बहरहाल, कुछ समय पहले ही जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा में कृष्णा मौर्य के बनायी कृष्ण कलाकृतियों को देखकर सुखद अनुभूति हुई। रेखाओं के गत्यात्मक प्रवाह में कृष्ण और उनके प्रतीक रूप में मोर पंखों के जरिये अद्भुत सौन्दर्य सर्जना जैसे की गयी थी। कृष्णा कृष्ण की मोर मुकुट बंशीवाले की छवि से इस कदर मुग्ध है कि कैनवस में प्रेम के बहुविध रूपों में उन्हें ही रूपायित किया है। हरे, काले, लाल, पीले और नीले रंगों का उसका सधा प्रयोग भी बहुत से स्तरों पर मन को स्पन्दित करता है। स्ट्रोक तो खैर कृष्णा के महत्वपूर्ण हैं ही। मोर पंखों के रेखीय आयाम का कृष्णा का एक चित्र बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें रेखाओं के जरिये कृष्ण-राधा के रूपों का बेहद मोहक अंकन किया गया है-मूर्त में अमूर्त। माने वहां रेखाओं में ही कृष्ण की मुरली, राधा की मूरत, कृष्ण की सूरत और और रास का अद्भुत रचाव किया गया है। गौर करेंगे तो मोर पंखों का सौन्दर्य ही हर ओर, हर छोर नजर आयेगा। मुझे लगता है, रेखाओं की यही तो वह गतिशीलता है जिसमें संगीत, नृत्य को कैनवस जीवंत करता है। एक ओर चित्र है जिसमें राधा-कृष्ण की बस मूरत है...मोर पंख यहां भी अंतर्मन संवेदना के संवाहक बने हैं। चित्र और भी हैं जिनमें राधा-कृष्ण के प्रेम के बहाने जीवन सौन्दर्य की अभिव्यक्ति में रंगो और रेखाओं की उत्सवधर्मिता को कृष्णा ने जैसे जिया है।
राधा-कृष्ण के बारे में रोचक तथ्य यह भी है कि महत्वपूर्ण पुराण इस बारे में मौन ही है। यह गीत गोविन्द रचयिता जयदेव ही थे जिन्होंने राधा-कृष्ण की मोहक लीलाओं को स्वयं अपने काव्य मंे रूपायित करते दूजों को भी निरंतर इसकी प्रेरणा दी। कृष्ण-राधा प्रसंग उनके कारण ही फिर लोक में इस कदर रचे-बसे कि जीवन में प्रेम की कल्पना का प्रमुख आधार ही यही हो गये।
बहरहाल, कृष्णा मौर्य के कृष्ण चित्र ही नहीं बल्कि कलादीर्घा में लगाये उनके ऐतिहासिक सामोद पैलेस के चित्र भी अलग से ध्यान खींचते लगे। हां, सामोद महल के विभिन्न द्वार, वहां के स्थापत्य और शिल्प सौन्दर्य को कैनवस पर बरतते कृष्णा ने दृश्य के सौन्दर्य आयामों को ही छुआ लगता है। अच्छा होता वह दृश्य संवेदना के उन आयामों पर भी जाती जिसमे किसी ऐतिहासिक इमारत का अतीत वक्त में हो रहे बदलावों के साथ वर्तमान मंे ध्वनित होता है। यथार्थ के कैनवस अंकन में यही तो महत्वपूर्ण होता है कि हम दिख रहे सौन्दर्य की बजाय उस अदेखे को भी कैनवस पर अनुभूत कराएं जिसमें समय की महीन पदचाप ध्वनित होती है। किसी कलाकृति की जीवंतता आखिर इसी मंे तो है कि इतिहास का मौन भी वहां रंग और रेखाओं में मुखर हो।


Saturday, February 4, 2012

जदि तोर डाक सुने केउ ना आरने तबे एकला चलो रे...


रवीन्द्र संगीत माने भाषा, भाव और रस। शास्त्रीय और लोक संगीत का मेल। आत्मा का गान। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी वहां है तो बंगाल के लोक संगीत की अजस्त्र धारा बाउल, भटियाली का माधुर्य भी वहां है। कहें हिन्दुस्तानी संगीत की राग-रागिनियों में लोक के समवेत स्वर कही हैं तो वह रवीन्द्र संगीत में ही हैं।
रवीन्द्र नाथ टैगौर अपने युग के अद्भुत संगीत मर्मज्ञ रहे हैं। ‘गीत वितान’ में रवीन्द्र ने अपने गीतों को ‘गान’, ‘बंधु’, ‘प्रार्थना’, ‘विरह’, ‘साधना और संकल्प’, ‘अन्तर्मुख’, ‘निःसंशय’, ‘उत्सव’, ‘बाउल’ आदि उपशीर्षकों से संयोजित करते बाकायदा उनकी स्वरलिपि भी दी है। बांगला भाषा में उनके ये गीत ‘भांगा-गान’ से भी लोकप्रिय हुए। यह रवीन्द्र ही हैं जिन्होंने गान में स्वरानंद के साथ ही गीतों मंे निहित भावों के संप्रेषण की भी राह सुझाई। रवीन्द्र संगीत की यही तो बड़ी विशेषता है कि वह शास्त्रगत नहीं होकर लोक से जुड़ा है। उसे सुनते अनुभूति का आलोक मिलता है। शुद्ध एवं मिश्रित रागों में लोकसंगीत की छोंक से बना रवीन्द्र संगीत हृदय के अंतरतम उद्गारों का गान है।
बहरहाल, आरंभ से ही संगीत संगीत हमारे यहां इतना अधिक शास्त्रगत और अनुष्ठानगत रहा है कि उसके सहज माधुर्य से आम जन की एक प्रकार से दूरी होती चली गयी। ऐसे में रवीन्द्रनाथ टैगौर ने शास्त्रीय राग-रागिनियों की समृद्ध परम्परा की जीवंतता के साथ उसमें लोक का रस घोला। संवेदना, भाव और संगीत का मेल किया। संगीत की ऐसी धारा का प्रवाह किया जिसमें सकल विश्व की हॉर्मनी है।
रवीन्द्र संगीत माने जिसमें स्वरानंद के लिये ही गान न हो बल्कि सुर माधुर्य के साथ गीत रस भी हो। एक साथ कईं रागों का मिश्रण। रागाश्रयी की बजाय भावाश्रयी संगीत। सुनें तो गुनने का मन करे। कोरा गान भर नहीं, अंतर्मन अनुभूतियों का भव। शास्त्रीय राग-रागिनियां की छटा परन्तु उनमंे निहित बंधनों की क्लिष्टता नहीं। लोक संगीत मंे निहित मानव मन की तमाम सहज संवेदनाएं परन्तु कहीं कोई असंयत आवेग और चित्कार नहीं।
मुझे लगता है, प्रकृति, पूजा, भक्ति प्रेम और ऋतुओं में निहित आनंद की खोज कहीं है तो वह रवीन्द्र संगीत में ही है। कारण, वहां पारम्परिक राग-रागिनियों का मूल परिवेश तो है परन्तु श्रवण मंे आनंद के अवरोधों की जकड़न नहीं है। बंधनों में निर्बन्ध। माने रवीन्द संगीत।
अभी बहुत समय नहीं हुआ। रवीन्द्र जन्मशती आयोजनों के सिलसिले में साहित्य अकादमी की ओर से भारतीय लेखकों के दल में शांतिनिकेतन जाना हुआ तो बांगला कथाकार मित्र बिनोद घोषाल के साथ रवीन्द्र संगीत का आस्वाद करते जैसे अपने आपको फिर से जिया। लगा, रवीन्द्र संगीत खाली संगीत भर नहीं है। भावों का आनंद प्रवाह वहां है। रवीन्द्र संगीत माने पूजा पर्व गान, माने ऋतु पर्व गान। माने स्वदेश पर्व गान, माने भक्ति पर्व गान। रवीन्द्र के गान में आत्मा की अभ्यर्थना है। यह जब लिख रहा हूं, जेहन में रवीन्द्र संगीत अमृत रस घोलने लगा है, ‘आमि तोमारो शौंगे बेंधेछी आमारो प्राण शूरेरो बांधोने...तुमि जानोना आमि तोमारे पेयेछि अजाना शाधोने...’ और ‘स्वर्ग हइते बिदाय...’, ‘आजि झोझेर राते तोमार अभिसार...’ गीत और भी है। सुनते हैं तो दर्शन की गहराईयों में उतरने लगते हैं। अनुभूतियों का अनुठा भव जो वहां है। भावांे के अनुभव का भव।
अकेलेपन का गान। किसी के साथ की जरूरत वहां कहां है। रवीन्द्र गान का यही तो संदेश है, ‘जदि तोर डाक सुने केउ ना आरने तबे एकला चलो रे...’। यदि कोई साथ नहीं आता है तो कोई बात नहीं। अकेले चलो। चलते चलो। कोरा गान नहीं बल्कि अंर्तमन संवेदनाओं की भावाभिव्यक्ति। आनंद का गान। कलाओं के मर्म को जो गहरे से जीता है, वही रच सकता है ऐसा कालजयी संगीत। इसीलिये तो रवीन्द्र कालजयी हैं। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम कलाओं के वे साधक, संवाहक हैं।