Saturday, January 21, 2012

सुर चिंतन का अद्भुत गान

संगीत के सात स्वर षडज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद हैं। सा रे ग म प ध और नि इन्हीं के पहले अक्षर से बने हैं। नाद से स्वर और स्वरों से सप्तक तैयार होता है। राग संस्कृत की धातु ‘रंज्’ से बना है। रंज माने रंगना। सात स्वरों से रंगना। उस्ताद अमीर खा़न को सुनते संगीत के सातों स्वरों में अर्न्तनिहित को गहरे से समझा जा सकता है। कहें सुर चिंतन है उनका गान। पहली बार सुनेंगे तो उनके गान की दुरूहता से कुछ झल्लाहट होगी। धीमी आलापकारी में उनकी बढ़त, स्वर विवर्धन की तान एकबारगी सुनने वाले के धैर्य की परीक्षा भी लेती है परन्तु जैसे-जैसे उनके स्वरों की गहराई से साक्षात् होता है, स्वर सम्मोहन से हम घिरने लगते हैं।
किराना घराने के अधिकांष संगीतकार इस बात पर सदा ही जोर देते रहे हैं कि खयाल गायकी में शब्दों का खास कोई महत्व नहीं होता परन्तु अमीर ख़ान ने कभी इससे इतेफाक नहीं रखा। उनकी गायकी शब्द का ओज है। अज्ञेय का कहा अनायास जेहन में कौंधता है, ‘षब्द ब्रह्म है।’ वह गाते नहीं संगीत की अनंतता के सागर की जैसे सैर कराते हैं। चौनदार खयाल गायकी की उनकी रागदारी भीतर के हमारे खालीपन को जैसे भरती है। द्रुत तीन ताल में उनका गाया ‘गुरू बिन ज्ञान...’ कानों में गूंजने लगा है। वह गा रहे हैं और शब्दों में निहित भावों की गहराई सुरों से जैसे दिल में उतरने लगी है। शब्दों में निहित संवेदना के सुरों से मन में अवर्णनीय सुकून होता है। रागों के निभाव में लयकारी और तानकारी की जो मौलिक सृष्टि अमीर ख़ान करते हैं, उसे बस अनुभूत भर किया जा सकता है। भिंडीबाजार घराने की खयाल गायकी की जिस धीमी गत को उनकी गायकी की मेरूखंड पद्धति कहा जाता है, मुझे लगता है वह पूरी तरह से संस्कारित अमीर ख़ान की गायकी से ही हुई। चौदहवीं शताब्दी के सारंगदेव लिखित संस्कृत ग्रंथ संगीत रत्नाकर में मेरूखंड पद्धति का उल्लेख मिलता है। खान साहब इसी पद्धति में आलाप की बढ़त करते। सधी हुई स्वर लहरी, तान और मींड की मिठास।
यह जब लिख रहा हूं बैरागी का उनका खयाल ‘मन सुमिरत निस दिन तुम्हारो नाम...’, ‘लाज रख लिज्यौ मोरी,...तू रहीम राम तेरी माया अपरम्पार...’ गान भी मन में घर करने लगा है। अद्भुत सुर दीठ। नवनिर्मिती की लगन और अनुपम कल्पनाषक्ति।
बहरहाल, यह वर्ष अमीर ख़ान का जन्मषती वर्ष है। उनके गान की सूक्ष्म कलात्मकता पर जाते गौर करता हूं, स्वर के सभी संभव क्रमचय और संचय वहां है। भावों का रस वहां है। शुद्ध रस। बगैर किसी मिलावट का रस। फिल्मांे में गाये उनके गान को ही लें। नौषाद साहब के लिये ‘बैजू बावरा’ में राग पुरिया धनश्री में ‘तोरी जय जय करतार...’, बंसत देसाई के संगीत निर्देषन में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ (राग अदना) का उनका गाया शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ सुनते हैं तो लगता है स्वर शुद्धता के साथ शब्दों में निहित भावों को वह अपने गान में गहरे से जीते थे। फिल्मों में उन्होंने गाया परन्तु संगीत की शुद्धता से वहां भी उन्होंने समझौता कहां किया! कभी उस्ताद अमीर खान के कहने पर ही स्वर कोकिला लता मंगेषकर ने एक वर्ष तक मौन व्रत धारण किया था। कहते हैं, ऊंचा सुर लगाते स्वर यंत्र में परेषानी के कारण लता को अपनी आवाज फटती हुइ महसूस हुई। अपनी यह परेषानी लेकर तब वह उस्ताद अमीर खान के पास पहुंची। अमीर खान साहब ने सलाह दी कि वह छह माह तक मौन रहे और एक साल तक कोई गाना न गाये। लता ने यही किया। मौन व्रत के बाद वर्ष 1962 में लता ने ‘बीस साल बाद’ में ‘कहीं दीप जले कहीं दिल..’ गीत गाया। इसके लिये उन्हें तब सर्वश्रेष्ठ पार्ष्वगायिका का सम्मान मिला।
अषोक वाजपेयी का लिखा जेहन में कौंध रहा है, ‘अपने समय से प्रायः उदासीन और निरपेक्ष लगते हुए भी संगीत काल से संवाद है, वह काल को संबोधित है।’ अमीर खान का गायन काल को संबोधित ही तो है।


Friday, January 13, 2012

संस्कृति का संस्थापन नाद

मकर राशि में सूर्य का संक्रमण यानी मकर सक्रान्ति। इससे पहले दक्षिणायन होता है। माने देवताओं के शयन का समय। सक्रान्ति के बाद होता है उत्तरायण। बसन्त आगमन का आभाष। देव जागने का समय। प्रकृति इसी समय सुनाती है जीवन का संदेश। शुरू होता है शुभ और मंगल का उल्लास।
पतंगबाजी का कला पर्व भी तो है मकर सक्रान्ति। हर ओर, हर छोर उड़ती पतंगे आसमान के कैनवस पर इस दिन अनूठे रंगों की जैसे सर्जना करती है। कहीं डोर संग लटकती कन्नी तो कहीं लहराती कटी पतंग। फर्र फर्र उड़ती भांत-भांत की पतंगे। जयपुर के महाराजा रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में सिटी पैलेस में देश-विदेश के पतंगों के संग्रह के लिये बाकायदा कभी पतंगखाना भी बनवाया गया। पतंग उड़ाने का इतिहास हकीम लुकमान से भी जुड़ा है तो नवाबों की पतंगबाजी के किस्से भी कम मशहूर नहीं है। पतंग उड़ाई में वाजिद अली शाह भी कम निष्णात न थे। हर साल पतंगबाजी के लिये वह अपनी टोली के साथ दिल्ली आते और आसमान पतंगों से भरते। पतंग उड़ाने के आशिक अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर भी रहे हैं। जयपुर मकर सक्रान्ति पर पतंगमय होता है तो मेरे अपने शहर बीकानेर में अक्षय तृतीया पर आसमान में किन्नों के पेच भिड़ते हैं। राव बीका ने बीकानेर की जब स्थापना की तो खुशी में एक बड़ा सा चिन्दा उड़ाया। चिन्दा माने बड़ी पतंग। बस तभी से मकर सक्रान्ति की बजाय वहां मई-जून की भीषण गर्मी में पतंगे उड़ाने का रिवाज हो गया जो आज भी चल रहा है।
बहरहाल, मकर सक्रान्ति से पहले ही इस बार जवाहर कला केन्द्र की एक कला दीर्घा पूरी की पूरी पतंग के अनूठे कला उत्सव से सराबोर थी। प्रदेश के प्रयोगधर्मी कलाकार गौरीशंकर सोनी ने संस्थापन में उत्सवधर्मिता की अद्भुत सौन्दर्य सृष्टि की। कला की उसकी इस दीठ में अनुभव और विचार का कैनवस पर ही नहंी बल्कि चर्खी, पतंगों पर भी गजब का रूपान्तरण हुआ। कलादीर्घा में भांत-भांत की छोटी-बड़ी पतंगे। एक बड़ी सी और बहुत सी छोटी टंगी चर्खियां। चर्खियों पर मंडा रेखाओं, रंगो का उजास। कैनवस की अमूर्त-मूर्त आकृतियों पर करीने से टंगा मांझा। मांझे की लछियां और लछियों की जैकेट। मांझे की रंग-बिरंगी गंेदे। गौरीशंकर ने मन मंे उड़ती उमंग, उल्लास के प्रतीक रूप में पतंगों को संस्थापन कला के बहुविध आयाम दिये तो चर्खी पर उकेरी सामयिक-एतिहासिक प्रसंगो से जुड़ी आकृतियों के भी अनूठे बिम्ब दिये।
हमारे यहां संस्थापन यानी इन्स्टालेशन का बेहद पुराना इतिहास रहा है। दुर्गा और गणेश विसर्जन के साथ ही जनमाष्टमी पर सजने वाली झांकियां आदि सभी में संस्थापन ही तो है। अतुल डोडिया, विवान सुन्दरम, सुबोध गुप्ता, अर्पणा कौर सरीखे कलाकारों ने संस्थापन को सामयिक संदर्भ दिये हैं। विडम्बना यह भी है कि इधर अधिकांश हमारा संस्थापन पश्चिम से ही प्रेरित हो रहा है। तकनीक का ही वहां बोलबाला जो है। ऐसे में आधुनिकता के साथ परम्परा के संस्कारों की गौरीशंकर सोनी की कला को देखकर बेहद सुखद भी लगा। गौरीशंकर ने पतंग, डोर, चर्खी को भिन्न आयामों में एक छत के नीचे एक अवकाश में रखते संस्थापन की अद्भुत दीठ दी। विषय-वस्तु और फॉर्म का सोनी का संयोजन विचार में रूपान्तरित होता जिस परिवेश की सृष्टि करता है उसमें उत्सवधर्मिता के अनूठे रंगों का औचक अहसास होता है।
संस्थापन स्थापत्य से जुड़ी कला है। कलानुभव के स्थापत्य से जुड़ी कला। बहुत सारी चीजों को तकनीक के जरिये बेतरतीब बिखरा देना, उनसे चमत्कारिक परिवेश की तलाश करना संस्थापन हो सकता है कला नहीं। कला माने कोई दीठ। ऐसी जो सोचने पर विवश करे। इस दृष्टि से गौरीशंकर का यह संस्थापन कला का अनूठा सौन्दर्य भव लिये है। इसलिये कि वहां पहले से आ रही उत्सवधर्मी हमारी परम्परा का सामयिक कला पोषण है। संस्कृति से जुड़े सरोकार वहां हैं। पश्चिम से प्रेरित संस्थापन नहीं बल्कि उत्सवधर्मी संस्कृति का देशज नाद। गौरीशंकर सोनी का भव्य रंग, रेखा संस्थापन नाद।

Friday, January 6, 2012

कैनवस पर सौन्दर्य संवेदना का गान


चित्र माने आकार की भाषा। सोचिए! सूक्ष्म और स्थूल आकार पर यदि किसी रंग का नाम लिख दें तो क्या वह आकार उस रंग में दिखाई देगा! नहीं ही दिखाई देगा क्योंकि चित्र की भाषा शब्द नहंी आकृति और रंग है। चित्रकला दृष्यकला इसीलिये तो है कि यह पढ़ने या सुनने की चीज नहीं देखने की चीज है। अर्थ नहीं अर्थ संकेत वहां सौन्दर्य के संवाहक जो होते हैं।

बहरहाल, कलादीर्घाओं में मूर्त-अमूर्त चित्रों से रू-ब-रू होते सौन्दर्य को इतने आयामों में अनुभूत किया है कि लिखूंगा तो न जाने कितने पन्ने भर जाए। अभी बहुत समय नहीं हुआ, कलानेरी कला दीर्घा में डॉ. सुमन एस. खरे की कलाकृतियां का आस्वाद करते लगा यथार्थ का कैनवस में वह अपने तई रंग और रेखाओं से पुनराविष्कार करती हैं। जल, जंगल और जमीन के साथ ही पषु-पक्षी, लोक कलााओं का उजास और उत्सवधर्मी हमारी संस्कृति में निहित संवेदना को भी समझ के गहरे रंग, रेखाएं खरे ने दी है। आकृतिमूलकता में सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि। रंगों का अनूठा लोक। बिंबो की सघन श्रृंखला में लोक कलाओं का उजास। संवेदनाओं के अनुभव का यही तो है भव।

कैनवस पर बरते डॉ. सुमन एस. खरे के रंग बहुत से स्तरों पर भले यथार्थ से परे हैं परन्तु उनमें जीवंतता है। मयूर आकृतियों को ही लें। असल रंगों की बजाय मोर को बहुतेरे दूसरे रंगों में नृत्य करते दिखाया गया है परन्तु यह ऐसे हैं जिनसे हमारी दीठ का विस्तार होता है। माने रेत नहाता, रेत पर लोटता रेत रंग लिये मोर। पंख फैलाता और औचक घुमाकर अपने को ही देखता मयूर। मेघ मल्हार में नृत्य करते से भिन्न है यह मोर। मयूर की भिन्न स्थितियों को परोटते कैनवस पर खरे जैसे रंग सृष्टि करती है। प्रकृति के सौन्दर्य की रेखाओं और रंगों में यह गत्यात्मक लय है। इसलिये कि उनमें ध्वनित मयूर संस्कृति के अनगिनत चितराम औचक हमारी स्मृति का हिस्सा बनने लगते हैं। चित्रकला, संगीत, षिल्प, स्थापत्य की हमारी संस्कृति में मयूर यत्र तत्र सर्वत्र है। राजस्थान में तो लोकगीतों की मिठास मोर महिमा से ही है। आबू के पहाड़ों पर बोलते मोर की सुरमयी अभिव्यंजना हो या फिर ढलती रात में कलेजे में फांस की तरह फंसती मोर की आवाज।...और मोर पखों के सौन्दर्य की तो बात ही कुछ ओर है। भगवान श्री कृष्ण का तो एक नाम ही मोर मुकुट बंषीवाला है। नाद, स्पर्ष, रूप, रस और गंध के पर्याय मोर के पांच रंग ही तो है। तलाष करें तो पाएंगे सौन्दर्य के तमाम भाव यहां है। षड्ज स्वर भी मयूर नाद ही है। षिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर है।...मोर की महिमा अपरम्पार। जितना कहें उतना ही कम।

बहरहाल, खरे की मयूर कलाकृतियों ही नहीं बल्कि प्रकृति से जुड़ी तमाम कैनवस आकृतियांे के सधे हुए स्ट्रोक भीतर की हमारी संवेदना को गहरे से जगाते हैं। लोक अभिप्राय के रूपांकन में वह मिट्टी, गोबर और तमाम दूसरे रंगों की ठेठ देसजता को भी कैनवस पर अपने तई परोटती है। सहज आकर्षित करते हैं उनके यह चित्र। सलेटी, धूसर रंगों का मोर यहां भले यथार्थ से परे भी है परन्तु वह हमें भाता है। ऐसे ही मणिपुरी, असमी, मराठी लोकनृत्यों के भांत-भांत के चितराम भी लुभाते हैं। मसलन बिहू नृत्य में लड़कियों के पार्ष्व में परिवेष की सघनता, जंगल की आग में हरियाली की दहक, पलाष के फूलों के चटखपन के जीवंत दृष्य।

स्वस्फूर्त गतिषील प्रकाष पुंज में खरे के चित्र हमसे जैसे संवाद करते हैं। भीतर की हमारी सौन्दर्य संवेदना का गान यहां है। प्रकृति का सांगीतिक आस्वाद। रेखाओं और रंगों की गत्यात्मक लय। कैनवस पर सहज ग्राम्य जीवन, प्रकृति के पल-पल बदलते रूपों, जंगल की वनस्पतियों की भांत-भांत दीठ। मुझे लगता है, रेखाओं की अन्विति में वह दृष्य के उस सौन्दर्य को गहरे से रूपायित करती हैं जिसमें प्रकृति का सहज गान है। मेघों की छटाएं यहां है तो दूर तक पसरी धरित्रि की हरियाली है। आकृति का बाह्य रूप ही यहां नहंी है बल्कि प्रकृति की सौरम की ताने-बाने में बुनावट है। प्रकृति सौन्दर्य के अपार का उनका यह चाक्षुष स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़त ही तो है। आप क्या कहेंगे!


Friday, December 30, 2011

लो, बीत चला है यह एक और साल!

लो, बीत चला है यह एक और साल! अनवरत चलती है समय की घड़ी। काल चक्र के पहियों पर किसका जोर! समय घड़ी के सूईयों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं बीते ने बहुत कुछ दिया है तो हमसे बहुत कुछ लिया भी है।
कला की दीठ से बीत रहेे वर्ष की यादें संजोता हूं तो मन में गहरा अवसाद घर करता है। ख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन, जहांगीर सबावाला के बिछोह का गम इस वर्ष ने हमें दिया तो भारतीय रंगमंच की महान विभुतियां बादल सरकार, सत्यदेव दुबे, गुरूषरण सिंह के न रहने का गहरा खालीपन भी हमें दिया है। संगीत सुनते उसे गुनते इस साल के पुराने पन्ने टटोलता हूं तो भूपेन हजारिका, पं. भीमसेन जोषी, जगजीत सिंह, उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर, सुल्तान खां, मकबूल साबरी, अजीत राय, उस्ताद असद अली खां, गोपीजी भट्ट जैसी संगीत हस्तियों की जुदाई का दर्द भी उसमें दर्ज पाता हूं।

बहरहाल, पिछले साल कला के रूझानों में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। चित्रकला की दृष्टि से जहां अंतर्राष्ट्रीय मुहावरे के चलते संस्थापन कला के नये तेवर हमारे समक्ष उभरे हैं तो भारतीय संगीत-वादन सरहदों की सीमा लांघते और परिस्कृत हुआ है। रंगकर्म में परम्परा के साथ आधुनिकता के मेल ने नयी जमीन भी तैयार की है। संगीत नाटक अकादमी ने इस वर्ष सुप्रसिद्ध कला समीक्षक, कवि प्रयाग शुक्ल के संपादन में ‘संगना’ पत्रिका के जरिये संगीत, नृत्य और नाट्य कलाओं पर प्रकाषन की महत्ती पहल की तो वर्ष के आरंभ में ही नेषनल मोर्डन आर्ट गैलरी में हुए अनिष कपूर के स्कल्पचर प्रदर्षन ने विष्व कला जगत में खासी हलचल मचायी। विज्ञान और कला के नये षिल्पाकाष में अनिष कपूर अपने कलाकर्म में वृहद विष्व को ही जैसे रूपायित करते हैं।

राजस्थान में इस वर्ष कलाओं में परम्परा के जड़त्व को तोड़ते बहुत से स्तरों पर नयी राहों का सृजन हुआ है। रंगकर्म की ही बात करें तो सुप्रसिद्ध रंगकर्मी भारत रत्न भार्गव के निर्देषन में संगीत नाटक अकादेमी के सहयोग से नाट्प्रषिक्षण के साथ रवीन्द्र मंच में नाट्य विधा के नये तेवर देखने को मिले तो अषोक राही, रणजीत सिंह के निर्देषन में मंचित नाटकों ने भी दर्षक उपस्थिति के नये रिकॉर्ड बनाये। नृत्य की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण यह भी रहा कि देष की सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली की अर्से बाद जयपुर में नृत्य वापसी हुई। अचल, चल थाट को कुषलता से बरतती प्रेरणा दर्षकों को अपनी प्रस्तुति से बांधती है। विभिन्न तोड़े टूकड़े उठाती वह विलम्बित में छेड़छाड़ की गत की मोहक छटा बिखेरती है।

बहरहाल, गोपीजी भट्ट के निधन से तमाषा परम्परा के एक युग का अवसान हो गया है। ताउम्र फक्कड़ जीवन जिये गोपीजी। रियासतों में पली-बढ़ी उनकी कला के सम्मान की अड़ी भी किसे थी! सुखद पहलू यह जरूर रहा कि निधन से कुछ समय पहले ही पिंकसिटी प्रेस क्लब में उनका जयपुर की तमाम कला संस्थाओं ने मिलकर सार्वजनिक सम्मान किया। पहल की रंगकर्मी ईष्वरदत्त माथुर ने। नमन गोपीजी! नमन।

चित्रकला के अंतर्गत वर्षपर्यन्त मूर्त-अमूर्त कलाओं की प्रदर्षनियां का सिलसिला जारी रहा परन्तु कलानेरी कला दीर्घा का उल्लेख यहां जरूरी होगा। इसलिये कि कलाओं पर संवाद का नया आगाज इस निजी कलादीर्घा ने अपने तई किया। सुप्रसिद्ध कला समीक्षक विनोद भारद्वाज को आमंत्रित कर कलानेरी ने रजा और मकबूल फिदा हुसैन पर बनायी गयी लघु फिल्में दिखाने के साथ ही कलाओं की दीठ पर उनका संवाद भी करवाया। जवाहर कला केन्द्र लोकरंग जैसे वृहद आयोजन के साथ ही संगीत, नृत्य, नाट्य की नयी नयी प्रस्तुतियों से पूरे बरस ही आबाद रहा परन्तु राजस्थानी सिनेमा उत्सव का आयोजन इस साल की खास उपलब्धि कही जाएगी। राजस्थानी सिनेमा के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर इसमें जहां विमर्ष हुआ वहीं दर्षकों को राजस्थानी सिनेमा की बेहतरीन फिल्में भी देखने को मिली। साल बीतते बीतते राजस्थान ललित कला अकादेमी को भवानीषंकर शर्मा और संगीत नाटक अकादमी को अर्जुनदेव चारण के रूप मंे अध्यक्षीय सौगात भी मिल गयी। बातें, यादें और भी है। लिखूंगा तो शायद विराम ही न हो। सो थमता हूं।...आईए, स्वागतातुर हों नये साल की भोर को। नयी भोर में आखिर कलाएं ही देंगी हमें रचनात्मकता का उजास!


Friday, December 23, 2011

अनंत अर्थ संभावनाओं का छायाकला आकाश

कहते हैं, जर्मनी के ज्योतिर्विद और वैज्ञानिक जॉन हरसेल ने 1839 ईस्वी में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में पहले पहल फोटोग्राफी शब्द का इस्तेमाल किया था। इससे पहले 1826 में फ्रांसीसी आविष्कर्ता निप्से ने विष्व का पहला फोटोग्राफ बनाया था। छायांकन कृति देखकर तभी पेरिस में चित्रकार-प्राध्यापक पॉल देलारोष ने यह कहा कि चित्रकला आज से मर गयी है तो ब्रितानी सैरा चित्रकार टर्नन ने भी इसे कला का अंत बताया था। फ्रांसीसी कवि बोदलेयर ने तो फोटोग्राफी को अन्य कलाओं की दासी तक की संज्ञा दी थी परन्तु संयोग देखिये तकनीक की दृष्टि से बेहद संपन्न डिजिटल हुई आज फोटोग्राफी तमाम हमारे कला स्वरूपों का प्रमुख आधार बनती जा रही है। जो कुछ दिख रहा है, उसे हूबहू वैसे ही कैमरे में यदि उतार लेते हैं तो वह फोटोग्राफी ही होगी परन्तु यदि दृष्य मंे निहित संवेदना, उसके अनुभूति सरोकारों को भी यदि छायाकार कैमरे से अपनी दीठ देता है तो इसे फोटोग्राफी नहीं छायाकला ही कहेंगे। तकनीक तब कला का साधन होगी, साध्य नहीं। कहें तो यह छायाकला ही है जिसमें विस्तृत दृष्य को भी एक छोटे से आयतन में तमाम उसकी बारीकियों के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है तो लघुतम दृष्य को भी दुगने-तिगुने और उससे भी बड़े आकार में सहज दिखाया जा सकता है। थर्मोग्राफी के अंतर्गत अब तो यह भी होने लगा है कि आप किसी जीवन्त वृक्ष के पत्ते के कुछ अंष को काट कर उसके संपूर्ण भाग को दर्षा सकते हैं। इसे तकनीक का कमला कह सकते है परन्तु फोटोग्राफी का दूसरा सच यह भी है कि इसके जरिये यथार्थ में निहित तमाम हमारी दृष्य संवेदनाओं और अनुभूतियों का कला रूपान्तरण किया जा सकता है। शबीहों के लिये फोटोग्राफ का आधार नया कहां है!बहरहाल, इससे कौन इन्कार करेगा कि इतिहास कलाओं को जगाता है। फोटोग्राफी के इतिहास को इसी नजरिये से देखे जाने की जरूरत है। भले आरंभ में इसे कैनवस कला के दौर की समाप्ति के रूप में देखा गया परन्तु कालान्तर में इसने कलाओं के मोटिफों में जो सर्जनात्मक बदलाव किये उनसे ही कैनवस कला समृद्ध भी हुई। प्रकाष-छाया सम्मिश्रण के अंतर्गत जीवन से जुड़े दृष्यों, षिल्प सौन्दर्य की बारीकियांे में जाते दृष्यावलियों के जो आख्यान कैमरे ने हमारे समक्ष रखे हैं उनमें कला के गहरे सरोकार ही प्रतिबिम्बित हुए हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, जयपुर के जंतर-मंतर पर ख्यात ग्राफिक कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल की छाया कलाकृतियांे का आस्वाद किया था। छाया-प्रकाष और उससे आभासित स्पेस के अंतर्गत उन्होंने जंतर-मंतर की नयी सौन्दर्य सृष्टि की। प्रिंट मंेकिंगं के तहत जयकृष्णजी ने हमारे समक्ष दूरी की नजदीकी के साथ ही इतिहास के उस अपरिचय से भी परिचय कराया जिसमें दीवारों, सीढ़ियों और पाषाण यंत्रों से संबद्ध विषय-वस्तु को खंड खंड मंे अखंड किया गया है। छाया-प्रकाष की स्वायत्त सत्ता का अद्भुत रचाव करते उन्होंने अपनी इस कला में इतिहास, वर्तमान और भविष्य को जैस गहरे से बुना है। मसलन यहां पत्थरों का पीला रंग है तो प्रकाष से परिवर्तित इस पीले का लाल भी है। स्पेस से झांकते नीले आसमान के रंग की उत्सवधर्मिता भी यहां है अंधेरे में निहित रहस्य की बहुत सी परतें भी उघड़ती साफ दिखाई देती है। कैमरे से जंतर-मंतर की प्रतिकृति नहीं बल्कि सजीव सरल कला छवियों का बेहतरीन भव एक प्रकार से उन्होंने अपने तई तैयार किया है। प्रकाष-छाया सम्मिश्रण की उनकी इस कला अभिव्यक्ति में स्थापत्य के नये दृष्य आयाम है। इतिहास का मौन जैसे उनकी इस छायाकला में मुखर हुआ है। दृष्य की अनंत अर्थ संभावनाओं, संवेदनाओं के उनके इस आकाष में फोटोग्राफी के कला रूपान्तरण को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। सच! यह छायाकला ही है जिसमें वस्तुओं के रूप, टैक्सचर, आकार जैसी चक्षुगम्य लाक्षणिकता को यूं उद्घाटित किया जा सकता है। अब भी यदि फोटोग्राफी को कला नहीं कहेंगे तो क्या यह हमारी बौद्धिक दरिद्रता नहीं होगी!

Saturday, December 10, 2011

रेखीय आयामों का संवेदना आकाश



कलाएं हमें सौन्दर्य अनुभूति के आंतरिक चक्षु देती है। वहां जो दिख रहा है, वही सच नहीं रहता बल्कि उससे परे भी संवेदना का एक नया आकाष उभरता है। चित्रकला की ही बात करें। विषय-वस्तु सादृष्य की अपेक्षा वहां उसके अभिव्यंजक रूप में ही अधिक और सुदीर्घ असरकारी नहीं होते! अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में अब्दुल करीम के चित्रों से रू-ब-रू हुआ था। लगा, ज्यामीतिय संरचनाओं में कला के अनूठे सौन्दर्य लोक में पहुंच गया हूं। हर ओर, हर छोर रंग और रेखाओं के जड़त्व को तोड़ते वास्तविक सृष्टि का जैसे पुनःस्ािापन किया गया है। चटख रंगों से सजी उनकी कलाकृतियों का आस्वाद करते प्रकाष और रेखीय कोणों के नये संदर्भ भी अनायास मिले। मुझे लगता है, आत्मिक और विषुद्ध सौन्दर्य के बीच के द्वन्द में वह कला में प्रयोगषीलता का सर्वथा नया मुहावरा रचते हैं। यह ऐसा है जिसमें मानवाकृतियों को रेखीय आवरण में रंग, प्रकाष संवेदना के नये अर्थ हैं। अर्सा पहले पढ़ा कुर्बे का कहा औचक जेहन में कौंधने लगा है, ‘कला में कोई शैलियां नहीं होती, वहां केवल कलाकार होते हैं।’ 
सच ही तो है...अब्दुल करीम के ज्यामीतिय आकारों में बाह्य की बजाय उनके आंतरिक दर्षन की अनुगूंजे है। इन अनुगूंजों में छीजती मानवीय संवेदनाओं को अनुभूत किया जा सकता है तो आधुनिकता में रोबोटीय होते जीवन में घुलते परिवेष के रंगो की महीन परतें भी साफ देखी जा सकती है।
बहरहाल, अब्दुल करीम के कैनवस पर उभरी  बहुआयामी आकृतियों के बिम्ब-प्रतीकों में रेखाओं का सघन टैक्सचर है। नीले, पीले, हरे, लाल और चटख से धूसरित रंगों में आकृतियां स्पष्ट है परन्तु वहां संवेदना के अनगिनत रंग हैं। रेखीय आयामों की सामर्थ्य का वह जो कैनवस रचते हैं उसमें कला की किसी एक शैली की बजाय तमाम आधुनिक कला शैलियों का सांगोपांग मेल है। माने वहां मानवाकृतियों के साथ विज्ञान है तो सूक्ष्मग्राही सौन्दर्य संवेदना का भी अनूठा आकाष है। मूक व अचल वस्तु समूहों के साथ प्रकृति और जीवन का संगीत उनकी ज्यामीतिय संरचनाओं में सहज सुना जा सकता है। प्रायः सभी चित्रों में एक दूसरे को भिन्न अर्थों में काटती रेखाओं के कोण और उनसे झांकती मानव आकृतियां में कला का नया अर्थान्वेषण है। कलाकृतियों के साथ भीतर के उनके दर्षन की थाह लगाते औचक एक चित्र पर नजर ठहर जाती है। कैनवस के शीर्ष पर चांद है। ज्यामीतिय संरचना में कोण लिये रेखाओं और रंगो का अनूठा उजास यहां है। गौर करता हूं, प्रकाषीय किरणों की मानिंद जो प्रतीक और बिम्ब करीम ने इस चित्र में रखे है उसमें जैसे सृष्टि के गूढ अर्थ रूपायित हुए हैं। प्रकाष की रेखीय लय में  सहज सरल आकृतियां। एक प्रकार से प्रकृति की गूढ शक्तियों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति। ओपते रंग जैसे अभिव्यक्ति की उनकी अनुकूलता के संवाहक हैं। ऐसे ही एक चित्र में गहरे रंगों की लेयर में मानव मस्तिष्क के जरिये अध्यात्म की गहराई के साथ दर्षन के अनूठे चितराम हैं। कुछेक चित्र ऐसे भी हैं जिनमें प्रकाषीय रेखाओं के साथ अलंकार भी उभरे दिखाई देते हैं। सहज। हां, रंग और रेखाओं की उनकी बड़ी विषेषता ज्यामीतिय नियमबद्धता से युक्त चित्रकाव्यात्मकता है। अंतर्मन संवेदनाओं के साथ दर्षन की गहराईयां में उभरे ज्यामीतिय कोलाज  में वह कला का सर्वथा नया मुहावरा हमारे समक्ष रखते हैं। 
बहरहाल, अब्दुल करीम के चित्रों से रू-ब-रू होते पिकासो की याद आती है, जॅक्सन पोलाक याद आते हैं और ओरोस्को शागाल के नायाब चित्रों की कुछ स्मृतियां जेहन में कौंधती है। आखिर कलाकार स्मृतियां ही तो कैनवस में रूपान्तरित करता है। शैली का रूपान्तरण वहां नहीं होता। यही तो है कला की मौलिकता। इसी में तो कलाकार प्रकृति और जीवन को जैसा है वैसा ही देखने की बजाय आंतरिक चक्षु से सर्वथा नये ढंग से देखे जाने का आग्रह करता है। यह जब लिख रहा हूं, अब्दुल करीम के चित्रों में उभरे बिम्ब और प्रतीक फिर से मन को मथने लगे हैं। आप क्या कहेंगे!

Friday, December 2, 2011

सौ रंगों की सारंगी हुई मौन

शब्द के साथ जब सुर मिलते हैं तभी होता है गान। उस्ताद सुल्तान खां की सांरगी को सुनें तो लगेगा वहां शब्द न भी घुले हों तब भी गान का माधुर्य है। उनकी सारंगी गाती थी। इस गाये में आलाप, स्वर की स्थिरता, मींड, गमक, मुरकी और तान की तमाम कंठ क्रियाओं को सहज अनुभूत किया जा सकता था। माने कंठ से जो स्वर निकले वह सब उस्ताद की सारंगी निकालती थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, पं. भीमसेन जोषी, मल्लिकार्जुन मंसूर, केसरबाई केरकर के गान में उनकी सारंगी संगत जैस सुरों की वर्षा करती। जब भी इनके स्वरों के साथ संजोयी उस्ताद की सारंगी पर जाता हूं, लगता है कंठ की हरकत को पकड़ते विकट तानों पर भी उनकी सारंगी सम पर जाकर ही थमती। पंडित रविषंकर के सितार, उस्ताद जाकिर हुसैन के तबला, पंडित षिवकुमार के संतुर और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसूरी के साथ उस्ताद सुल्तान खां की सारंगी बढ़त करती। बहुतेरी बार तो शब्द और सुरों को पूर्णता उनकी सारंगी ही प्रदान करती। तानों के उनके निकास पर जब भी जाता हूं मुझे लगता है वह जो बजाते उसमें लड़ियों का जैसे कोई सुन्दर सा नौलखा हार पिरोया गया है। भीतर के खालीपन को भरती उनकी सारंगी रागों को जैसे जीवंत करती। हर राग को गाती उनकी सारंगी में स्वर रस का जैसे निर्झर बहता।

सारंगी तत्सम शब्द है। अर्थ करें तो स्वर के माध्यम से अंगों में जो अमृत घोले वह सारंगी है। उस्ताद सुल्तान खा की सारंगी ऐसी ही थी। वह जब सारंगी बजाते तो ऐसा लगता जैसे कोई गला गा रहा है। गजल, ठुमरी, दादरा के सुरों में मिलती उनकी तरजें माधुर्य के अनुठे लोक में ले जाती। यह उस्ताद की सारंगी ही है जो ख्यात गायकों, वादकों के गान-वादन में सुनने की अवर्णनीय अनुभूति कराती है। शास्त्रीय ही नहीं लोकप्रिय संगीत में भी उनकी सारंगी के घुले रस जीवन के जिस आनंद रस का संचार करती रही है, उसे शब्द कहां बंया कर सकते है! राग भैरव, बसंत, मारवा और भी दूसरे रागों का गान करती उनकी सारंगी के साथ बहुतेरी बार दूसरे वाद्य सहयोग जरूर करते परन्तु मुझे लगता है किसी ओर के समाश्रित नहीं रही उनकी सारंगी। माने अन्य किसी भी वाद्य का आश्रय वहां नहीं है। बीन अंग के आलाप करते हुए मन्द्र सप्तक से लेकर अतितार सप्तकों तक वह विस्तार करते। गज चलाने की अद्भुत निपुणता। उल्टे सीधे-छोटे-लम्बे गज पर नियंत्रण। शायद इसका बडा कारण यह भी था कि उन्होंने सारंगी में अपने को समर्पित करते हुए साधा था। बड़े गुलाम अली खा, आंेकार नाथ ठाकुर, सिद्धेष्वरी देवी और भी तमाम उन लोगों से निरंतर उन्होंने सीखा जिनके साथ वह सारंगी वादन किया करते थे। उनकी सारंगी किसी एक घराने से नहीं बल्कि संगीत के तमाम घरानों से ताल्लुक रखती। घरानों की बढ़त में संगीत की विराटता का अहसास वहां है। तानों में एक साथ कई सप्तकों की सपाट तान। देर तक चलने वाले लम्बे-लम्बे छंदों में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। सधे हुए गायक की मानिंद उनकी सारंगी स्वरों के अनूठे लोक में ले जाती। यह ऐसा था जिसमें मींड और गमक के साथ विकट तानों की पूर्णता होती थी। इसीलिये स्वर साधकों के साथ की उनकी सारंगी संगत गान को निखारती। गला जहां आलाप नहीं ले सकता, तान को पूरा नहीं कर सकता वहां उनकी सारंगी चली जाती। जब भी उनकी प्रस्तुति से साक्षात् हुआ, लगा उंगलियों को बाज के तार के किनारे दबाये रखते ऊपर-नीचे चलते वह सारंगी में रम जाते। साधनारत किसी जोगी की मानिंद। सारंगी की उनकी इस साधना से ही बाद में उनके गले के सुर भी सजे। ‘अलबेला सजन आयो रे...’, ‘पिया बसंती...’, ‘आंखो से ख्वाब रूठकर, पलकों से अष्क टूटकर...’ गान सुनें तो माधुर्य की अनूठी मौलिकता की अनुभूति होगी। अक्सर वह कहते भी थे, ‘मेरा रियाज नहीं गाता, रूह गाती है।’ सच! गान की उनकी यह रूह जैसे बंदे का खुदा से साक्षात् ही कराती। पंडित रामनारायण, मुनीर खां, शकूर खां, गुलाम साजिद, बन्ने खां, गोपाल मिश्र की सारंगी परम्परा को उन्होंने संजोया ही नहीं बल्कि अपने तई उसे सदा आगे भी बढ़ाया। सीकर में जन्में। बाद में जोधपुर आ बसे। विष्वभर में उन्होंने सारंगी को लोकप्रिय किया। सारंगी नहीं सौरंगी कहें। गायन-वादन के सौ रंग वहां जो हैं!


Friday, November 25, 2011

कविन्द्र रवींद्र का "ताशेर देश"

रवीन्द्रनाथ टैगोर के सर्जन पर जब भी जाता हूं, लगता है साधारण के व्यतिक्रम हैं कविन्द्र। विश्वजनीन संस्कृति में पिरोई चित्रकला और संगीत की उनकी सर्जना में सौन्दर्य की जीवन अभिव्यक्ति की तलाश जैसे पूरी होती है। यह रवीन्द्र ही हैं जो कहते थे, ‘चित्र देह है एवं संगीत प्राण।’
बहरहाल, साहित्य अकादमी ने इस बार महत्वपूर्ण पहल की। टैगोर के 150 वें जन्मशती वर्ष के अंतर्गत विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखको का कोलकता में रचना पाठ रखा गया। उन्हें शांतिनिकेतन और  उनके कला-संगीत से जुड़े रचना स्थलों पर भी ले जाया गया। भारतीय लेखकों के इस दल में खाकसार भी था। कविताओं के रचना पाठ से पहले के दिन की स्मृति रह-रह कर जेहन में कौंध रही है।

शांतिनिकेतन परिसर में बांग्लादेश के कलाकारों द्वारा रवीन्द्रनाथ के सुप्रसिद्ध नृत्यनाटक "ताशेर देश" का मंचन किया गया। ताशेर  बांग्ला शब्द है। "ताशेर देश" माने ताश का देश । ओपेरा से प्रभावित संगीत और नृत्य के अनूठे मेल की गुरूदेव की रचना का आस्वाद करते लगा वह जिस विश्वजनीन संस्कृति की बात करते थे, उसे अपने रचनाकर्म में गहरे से जीते भी थे।

"ताशेर देश" की कथा मर्मस्पर्शी  है। किसी देश का राजकुमार भ्रमण करते हुए ऐसे स्थान पर पहुंच जाता है जहां सब कुछ नियमों से बंधा है।  नियम-कानूनों की बेड़ियों में जकड़े लोगों से राजकुमार का संवाद होता है। राजकुमार की आजादी-प्रगति और सहजता की बातें सभी को लुभाती है। उस देश  के राजा का फरमान है कि नियमों को तोड़ने वाले की बात न सुनी जाये। राजकुमार तब वहां की रानी साहिबा से बात करता है। रानी को स्वतंत्रता की बात सुहाती है। ताश के पतों की मानिंद वहां के निर्जीव जीवन में राजकुमार के आने से सजीवता का संचार होता है। हर ओर उल्लास और उमंग भी जैसे लौट आती है। उत्सवधर्मिता का गान होता है।

बांग्ला भाषा का ज्ञान नहीं है परन्तु मूल बांग्ला की इस नृत्य नाटिका का मंचन इतना सशक्त था और रवीन्द्र का लिखा इतना मधुर कि संगीत-नृत्य में निहित कथन पूरी तरह से समझ आता है। मुझे लगता है, कलाओं का यही वह आकाश है जिसे समझने में भाषा बाधा नहीं बन पाती। वैसे भी रवीन्द्र के लिखे में जीवन के माधुर्य का वह गान है जो सौन्दर्य से स्निग्ध है। "ताशेर देश"  इस मायने में भी अद्भुत लगा कि इसमें  ओपेरा शैली है, मणिपुरी नृत्य की भंगिमाएं हैं तो पष्चिम बंगाल के पुरलिया में किये जाने वाले छऊ नृत्य का आस्वाद भी अनायास होता है। कहते हैं रवीन्द्र ने जब इस नृत्य नाटक की रचना की थी तो वह ‘एलीस इन वण्डरलैण्ड’ से खासे प्रभावित थे। इसीलिये "ताशेर देश" में स्वप्न संसार की अनूठी झलक भी दिखती है।

ओपेरा दरअसल गीतिनाटक है। संवाद की बजाय वहां गायन से ही कुछ कहा जाता है। पात्र नृत्य करते हैं परन्तु लगता है, सधे हुए हवाओं में तैर रहे हैं। मणिपुरी में सांकेतिक भव्यता में मनमोहक गति से नृत्य होता है और छऊ में ढोल मांदर की धुन पर मुखौटा लगाकर नृत्य होता है। "ताशेर देश" में इन सबका सांगोपांग मेल दिखा। ओपेरा करते राजकुमार ताश  के देश में पहुंचता है तो वहां के मुखौटा लगाये पात्रों को देखते लगता नहीं है, वे मानव हैं। भाव-भंगिमाएं, अंग संचालन और मुखौटों की सहजता से आंखे नहीं हटती।


नृत्य-संगीत में एक के बाद एक प्रभावी दृष्यों और रवीन्द्ररचित बांग्ला का गीति कहन इतना सशक्त कि कब दो घंटे बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। भाषा भिन्नता के बावजूद कला के अपनेपन से सराबोर मन शांतिनिकेतन की शांति के सुकून में भी जैसे खो सा गया। कला और संगीत के क्षेत्र में आखिर क्रांति का श्रेय रवीन्द्र को यूं ही तो नहीं दिया जाता। शांतिनिकेतन से लौटे एक सप्ताह हो रहा है परन्तु "ताशेर देश" आंखों के सामने अभी भी घूम रहा है। नमन कर रहा है मन रवीन्द्र के तपःपूत जीवन को। संगीत और कला के उनके ज्ञान को। नमन रवीन्द्र। नमन!


Tuesday, November 22, 2011

भूमण्डलीकरण, बाजार और कला

भूमंडलीकरण माने भूमंडलीय समरूपीकरण। संस्कृति के साथ अर्थ के जुड़ाव से बाजार आधारित कला का सर्वथा नया लोकतंत्र हमारे सामने आ रहा है। यह ऐसा है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के बेरोकटोक आवागमन की संस्थागत सुनिष्चितता विष्व अर्थव्यवस्था को सर्वथा नया आयाम दे रहा है। कहना यह चाहिये कि बाजारोन्मुख भूमंडलीकरण ने एक ऐसी संस्कृति विकसित करनी प्रारंभ कर दी है जिसमें कलादीर्घाएं उपभोक्ता और उत्पादक के रूप में कार्य करने लगी है। कलादीर्घाएं कला की उत्कृष्टता को अपने तई ही तय करने लगी है। माने जिस कलाकार को चाहे वह आसमान पर बैठा दे और जिसे चाहे नीचे उतार दे। यह प्रचारित भर करना है कि फंला कलाकार की कलाकृतियों विष्व बाजार में सर्वाधिक बिक रही है। भूमंडलीकरण का बड़ा अस्त्र साइबर स्पेस है ही सो वहां संबंधित कलाकार की वर्चुअल कला यात्रा भी करवा दी जाती है।
बहरहाल, जेम्स क्ल्फिर्ड ने ‘द प्रेडिकांमेंट ऑफ कल्चर’ में लिखा भी है, ‘जब कोई यात्रा ‘चेतना में समा कर’ अपना अर्थ देती है तो उसका वृतांत आपकी अस्मिता को मजबूती से घेर लेता है।’ कला मंे आज यही हो रहा है। इन्टरनेट के तहत ऑनलाईन कलादीर्घाएं जिसे चाहे उसे उठा देती है, जिसे चाहे पटक देती है। कभी पॉल विरिलियो ने भी यही तर्क दिया था कि साइबर स्पेस ऐसे भूमंडलीय समय का वाहक है जो स्थानीय समय को आच्छादित कर देगा।...भविष्य मंे बहुत जल्दी ही हमारे इतिहास का निर्माण अपने आप में तात्कालिकता के गर्भ से उपजे सार्वभौमिक-समय में होने लगेगा।’ कला बाजार में कलाकृतियों की बिक्री सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के साथ उसके उपयोगकर्ता के हाथ में जब चली गयी है तो स्वाभाविक ही है कि कलाकृतियां गौण हो गयी है, बाजार प्रमुख हो गया है। कलाकृतियां आत्म विसर्जन की हेतु रही है परन्तु आज बाजारोन्मुख भूमंडलीकरण में जीवन के उपादान के रूप में नहीं होकर वह बाजार प्रायोजित हो रही है।
 सवाल यह भी है कि बाजारीकरण के इस दौर में आखिर कला की कौनसी नयी भाषा गढ़ी जा रही है। याद पड़ता है, जयपुर में एक पांच सितारा होटल मंे निजी आर्ट गैलरी द्वारा एक राष्ट्रीय कला षिविर का आयोजन किया गया था। षिविर के अंतर्गत देष के ख्यातनाम कलाकारों ने आर्ट गैलरी के लिए ‘ऑन द स्पॉट’ पेंटिंग्स बनाई। षिविर में जब जाना हुआ तो ईजल पर कलाकारों को काम करते देख बेहद सुकून हुआ। कलाकारों और उनकी कला पर लेखन के अपने कर्म के अंतर्गत बहुत से कलाकारों से स्वाभाविक ही था कि संवाद भी हुआ। एक ईजल पर देष के ख्यातनाम कलाकार कार्य कर रहे थे। वे तेजी से कैनवस पर कुछ पोत रहे थे, साथ-साथ मुझसे बातचीत भी कर रहे थे। कोई 20 मिनट बाद ही चौंक कर उन्होंने घड़ी देखी और वहां मौजूद आर्ट गैलरी के कर्मचारी से कहा कि उनकी फ्लाईट का क्या हुआ? कर्मचारी दौड़ा दौड़ा आर्ट गैलरी संचालिका के पास पहुंचा और फ्लाईट वाली बात बताई। संचालिका दौड़ी चली आई। देखती है कलाकार मुझसे संवाद भी कर रहे हैं और उनके हाथ कैनवस पर भी बड़ी तेजी से चल रहे हैं। धीरे से वह मुझे एक किनारे ले जाकर अनुनय विनय में कहने लगी, ‘देखिए, आप इनसे बातचीत कर डिस्टर्ब न करें। उन्हें आज ही दिल्ली लौटना भी है, फिर उनकी पेंटिंग अधूरी ही रह जाएगी।’
 भूमण्डलीकरण में यही आज कला की बाजार भाषा है। यह ऐसी है जिसमें कलाकार को तो अपना काम जल्द से जल्द समाप्त कर कहीं ओर दूसरे काम के लिए भागने की जल्दी है और गैलरी को इस बात की फिक्र कि ब्राण्ड कलाकार का काम बस पूरा हो जाए ताकि उसे बाजार में बेचा जा सके। हर व्यक्ति जल्दी से जल्दी कला से कमा लेना चाहता है। आर्ट गैलरियां कला षिविरों के बहाने ख्यात-विख्यात कलाकारेां को अपने यहां बुलाकार धड़ाधड़ पेंटिंग्स बनवा रही है। बाजार मांग वाले कलाकार भी इस बात को समझ रहे हैं कि उनकी कला नहीं, उनका नाम बिक रहा है इसलिए वे भी बगैर समय गंवाए अपने कलाकर्म से ज्यादा से ज्यादा कमाने की होड़ में जो चाहे बना रहे हैं। मानों वह बाजार को पहचानने लगे हैं कि वह कभी भी करवट बदल सकता है, चुनांचे क्यों न करवट बदलने से पहले ही इतना कमा लिया जाए कि बाद में अफसोस नहीं रहे।



Friday, November 11, 2011

आकृतिमूलकता का अमूर्तन

हर शिव  शर्मा रेखाओं और रंगों में किसी क्षण की भंगिमाओं के बहाने आत्मान्वेषी अनुभवों की अनवरत यात्रा कराते हैं। रंग, रेखाओं और रूप के संधान में आवरण रहित देह के जरिये वह जीवन  के अबूझ रहस्यों में ले जाते भीतर की हमारी सुप्त संवेदनाओं को जैसे झकझोरते हैं। देखते हैं तो चित्रों में रंगों का गहरा कोहरा और रेखाओं के उजास में स्त्री देह की सिकुड़ी, लेटी, असावधानी में बैठी आकृतियां दिखाई देती है परन्तु वहां रंग, रेखाओं का अद्भुत संयोजनकौषल है। नैसर्गिक दृष्य के प्रति अंतर्मन में छिपी भावनाओं के प्रतीक रूप में इन चित्रों में भले क्षण विशेष की भंगिमा ही सर्जन का आधार बनी है परन्तु यथार्थ जीवन के गहरे अनुभव यहां है।
बहरहाल, हर शिव छायाकला में भी दक्ष है। यही कारण है कि उनके चित्रों में दूर एवं समीपवर्ती वस्तुओं के धुंधलेपन, दृष्य का अनैच्छिक विभाजन भी अलग से ध्यान खींचता है। कैनवस की उनकी रेखाओं का रंग संयोजन बगैर सूचना अकस्मात् खींचे छायाचित्रों का अहसास भी अनायास कराता है। असावधानी का स्वाभाविक प्रभाव वहां जो है! स्त्री देह की वह जो चित्र भाषा हमारे समक्ष रखते हैं उसमें विषेष किसी परिवेष के बहाने जीवन की विडम्बनाओं, त्रासदियों और तमाम घटनाओं के प्रति स्थितिप्रज्ञता को सहज पढ़ा जा सकता है। मसलन बहते रंगों के बीच घुटनों पर कोहनी टिकाए असावधानी मे बैठी स्त्रीदेह की एक आकृति के आस-पास जो परिवेष सृजित किया गया है, उसमें जीवन के तमाम द्वन्द जैसे उभर आए हैं। ऐसे ही लाल रंग के कोहरे में झांकती लेटी आकृति पर सफेद, पीला, नीला और थोड़ा सा बचा हरा रंग जैसे भीतर की हमारी संवेदना को झंझोड़ता कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहता है। मुझे लगता है, रंगों में अटकी, घुली, प्रवाह में बहती और एक प्रकार से बसी हुई उनकी आवरण रहित स्त्री आकृतियांे में प्रभाववाद भी है और प्रतीकवाद भी। उठने, बैठने, लेटे हुए के सामान्य स्त्री देह दृष्यों में अंकित क्षणिक दृष्य में निहित जीवन के शाष्वत सत्य की अनुभूति वहां की जा सकती है।
चित्रों के कहन पर जाता हूं तो नाबि चित्रकार पियर बोन्नार की भावनाओं को मानवीय आकृतियों में रूपायित करती उन कलाकृतियों की भी सहसा याद हो आती है, जिनमें समकालीन जीवन के विषयों को चुनकर उनका कल्पनारम्य, काव्यपूर्ण चित्रांकन है। हां, हर शिव शर्मा अपने गतिदार रेखांकन, किसी क्षण विषेष की भंगिमा के जरिये जीवन के शाष्वत सत्य से साक्षात्कार कराने की सोच और उद्देष्यपूर्ण रंग योजना के सर्वथा नये सर्जन संदर्भ हमें देते हैं। वहां अपने पूर्ववर्ती चित्रकारों के कला संस्कार तो हैं परन्तु उनका अनुकरण नहीं है। मसलन असावधानी की किसी मानवीय भंगिमा के इरोटिक फिगर और चटख रंगों का अद्भुत संयोजन जिसमें कभी रंग बहते नजर आते हैं तो कभी परिवेष में घुले विषय-वस्तु से अपनापे का सहज दर्षाव करते हैं। खास तौर से लाल रंग की वहां प्रधानता है परन्तु फ्रेम में उभरे दूसरे तमाम रंग अंष में रेखाओं का उनका कहन अलग से ध्यान खींचता है। मुझे लगता है प्रकृति और मानव निर्मित जीवन का वह अपने तई चित्राविष्कार करते क्षण विषेष की भंगिमा में अनुभूतियों की अनंतता का विस्तार करते हैं। उनकी कलाकृतियों को किसी एक अर्थ की बजाय क्षण विषेष की तमाम अर्थ संभावनाओं में देखा जा सकता है। ज्यॉं सेरॉ से कभी उनके चित्रों के अर्थ बताने के लिये आग्रह किया गया था तो उन्होंने उत्तर में बेहद रोचक कहानी सुनायी थी, जिसका सार यह था कि शब्दों से अगर चित्रों का अर्थ बताया जा सकता तो फिर चित्रकार को चित्र आंकने की क्या आवष्यकता होती। चित्रकला ही क्यों तमाम ललित कलाओं पर ज्यॉ सेरॉ का यह कहा प्रासंगिक है। तमाम हमारी कलाएं अपनी स्वायत्ता में अर्थ की अनंत संभावनाएं लिये ही तो होती है।
बहरहाल, हर शिव शर्मा आवरण रहित स्त्री देह के बहाने प्रकृति के पंचभुत तत्वों के अर्थ गांभीर्य में ले जाते जीवन की उस समग्रता का कैनवस रूपान्तरण करते हैं जिसमें चीजों, लोगों और उनसे संबंधित विचारों को देखने का, उनके बारे में सोचने का हमारा ढंग बदल जाता है। चित्रकला में दिख रहे दृष्य की आकृतिमूलकता का यही तो अमूर्तन है। आप क्या कहेंगे!

Friday, November 4, 2011

विवाह गीतों के लोक का आलोक

लोकगीतों को किसने रचा, कहां से आये और कब ये हर आम और खास के अपने हो गये, कोई नहीं जानता। सभ्यता और संस्कृति का अनहद नाद करते कंठ दर कंठ आगे बढ़े है ये। व्यक्ति ही नहीं धरती, आकाष, नदी, जीव-जंतु, पषु-पक्षियों का गान इनमें है। हर ओर, हर छोर प्रकृति की सौरम इनमें है।
जन्म से मृत्यु तक के तमाम संस्कारों का उजास लोकगीतों में ही तो है। मुझे लगता है, परम्पराओं का अखूट धन कहीं है तो वह इनमें ही है। विवाह संस्कार को ही लें। परिवार की उत्पति, समुदाय और राष्ट्र का निर्माण इस एक संस्कार से ही तो होता है। मानव संबंधों की आधारषिला विवाह ही है। तमाम हमारा जीवन इस संस्कार में ही जैसे परिव्याप्त है। विवाह के लोकगीत सुनें तो संबंधों में निहित संवेदनाओं को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। वहां तमाम हमारे विवाह के संस्कार हैं। रीत-रिवाजें हैं और है परिवार संबंधो का अद्भुत उजास। राजस्थानी लोकगीत संग्रह में तो विवाह गीत पहले भी दिखे हैं परन्तु पूरी तरह से विवाह केन्द्रित लोकगीतों को एक साथ बड़ी-बड़ी दो जिल्दों में देखना सर्वथा नया अनुभव था।  लूंठा-अलूंठा यह संग्रह संपादित किया है के.सी. मालू ने। यह ऐसा है जिसमें एक तरह से लोक की हमारी परम्परा का पुनराविष्कार है। बिखरी और बहुत से स्तरों पर विलुप्त विवाह लोक गीतों की परम्पराओं को परोटते मालू ने लिखित के साथ उसका सांगीतिक स्वरूप भी सहेजा है।  राजस्थान की संस्कृति, धरोहर सहेजने के अंतर्गत किसी एक संस्कार पर मुझे लगता है यह अपनी तरह का पहला व्यक्तिगत वृहद कार्य है। विवाह में सावा थरपण, मूंग बिखेरण के साथ ही विनायक, देव निमंत्रण, भात बत्तीसी, भात मायरा, मेंहदी, रातिजगा, उबटन, घोड़ी, फेरा सीख, बधावा, विदाई, नेगचार आदि तमाम रस्मों के राजस्थानी लोकगीतों, उनके हिन्दी भावानुवाद और अंग्रेजी सार संक्षेप के इस कार्य में मोहक चित्रांकन विवाह परम्परा को आंखो के समक्ष जैसे जीवन्त करते हैं। यह सब लिख रहा हूं तो ‘जल्ला मारू आमलिया पाक्या नै अब रूत आई रै...’, ‘घोड़ी अधर-अधर पग मेलै...घोड़ी घुघरा बजावै...’, और ऐसे ही बन्ने-बन्नी के मांगलिक, छेड़-छाड़, उलाहने और श्रृंगार के गीत भी कानों में रस घोल रहे हैं। हर गीत का अपना माधुर्य, अपनी राग।
विवाह गीतों की खास बात गायन का उनका काव्यगत प्रयोग है। रीत-रिवाज का लय में बखान। गायन के बाद टेक। सुनते हुए गौर करता हूं, किसी बात, किसी संदेष, किसी घटना को लयात्मक पंक्ति में जोड़ कर अद्भुत गेय रूप की सर्जना यहां है। दोहे-सोरठों की छंदोमय अभिव्यक्ति। सच! लोगीतों में सोरठों की अद्भुत सौरम भी है। सोरठ माने सोराष्ट्र। संगीत की दीठ से सोरठ राग भी है। बींझा की नायिका भी तो है सोरठ। कहीं पढ़ा याद आ रहा है, ‘सोरठियौ दूहौ भलौ/भल मरवरण री बात/जोबन छाई धण भली/तारां छाई रात।’ लोकगीतों की गेय शैली का प्रमुख अंग इस तरह के छंद ही है। परम्पराओं को उड़ाती आधुनिकता की आंधी में मुख परम्परागत का भावी पीढ़ियों के लिये विवाह लोकगीत संग्रह श्रमसाघ्य कार्य है। के.सी. मालू से संवाद होता है तो पता चलता है दीर्घकालीन सोच की परिणति है यह। गांव-गांव, शहर-षहर की बाकायदा इसके लिये यात्राएं हुई। विवाह गान को घरों में मूल गायी राग में उसे सुना गया, लिखा गया और पहले लिखे की प्रतिलिपियां भी की गयी। ऐसे ही कोई 250 से अधिक विवाह गीत एकत्र हो गये और फिर हुआ बड़े आकार के दो भागों में इन्हें संपादित कर प्रकाषित करने का कार्य। मूल रागों में उन्हें संगीत में संजोया गया। विवाह गीतों, परम्पराओं के अनमोल खजाने को पढ़ते, सुनते और गुनते जीवन की उत्सवधर्मिता के बहुविध रूप अनायास दिखाई पड़ते हैं। कहें, आप-हम और हमारा परिवार ही इनमें ध्वनित होता है। समय की तेज रफ्तार और उससे उड़ने वाली धूल की जैसे धूंध हटाते है ये। देष-काल की परिधि से परे कालजयी हैं ये। ताजगी लिये। आल्हाद, आह्वान के निरालेपन में संस्कृति के जीवन्त चितराम जो इनमें हैं। लिखे को गुनते, लो अब मैं गुनगुनाने भी लगा हू। लोक का यही तो है आलोक!

Friday, October 21, 2011

दीपो यत्नेन वार्यताम्

कार्तिक उत्सवधर्मिता का मास है। आम आदमी के कला सरोकारों, संस्कृति और परम्परा के पोषण का महिना। धार्मिक अर्थ में सूर्योदय से पहले स्नान का पावन मास। तमाम महिनों में श्रेष्ठतम। अनगिनत पर्व-परम्पराओं का संयोग इसी माह में होता है। शरद पूर्णिमा आती है। करवा चौथ आती है। धन तेरस, छोटी दिवाली, बड़ी दिवाली, गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, भैयादूज, गोपाष्टमी, देव उठनी एकादषी, तुलसी विवाह और भी बहुत सारे उत्सव दिन। मुझे लगता है, भीतर की हमारी कलाओं का पोषण इन सबमें ही तो होता है। करवा चौथ में सोलह श्रृंगार कर छलनी से चांद निहारने की परम्परा हो या फिर शरद पूर्णिमा में खीर बना उसे चांद की रोषनी में रख पान की परम्परा हो या फिर गोवर्धन पूजा के अंतर्गत गोबर में हिरमच और दूसरे रंग मिला मांडणे मांड दीप जला पूजने की रीत। सबमें उत्सवधर्मिता के साथ कलाओं को ही तो हम गहरे से जीते हैं। दीपावली आती है तो एक साथ असंख्य दीपकों का प्रकाष मन में भी उजास भरता है।

बहरहाल, कार्तिक माह में स्नान का विषेष महत्व है। याद पड़ता है, बीकानेर के अपने घर में दादी जब काति नहान करती थी तो घर उत्साह के अनगिनत रंगो से भी जैसे रंग जाता था। भोर के उजास से पहले दादी उठती। हरजस गाती ईष्वर को स्मरण करती। पौ फटने से पहले नहा लेती। ठंडे जल से। सुबह हम उठते तो स्नानघर के पास जगमगाते दीपक की लौ और हरजस का माधुर्य मन में अवर्णनीय आनंद की अनुभूति कराता। दादी कहती, नदी में स्नान होता तो और पुण्य मिलता। नदियां यहां कहां! दादी स्नानघर में ही नदियों को बुला लेती। अचरज होता कभी स्कूल नही गयी दादी परन्तु तमाम हमारी धार्मिक नदियों का संस्कृत आह्वान करती थी-

पुष्करादीनि तीर्थानिगङ्गाद्यारूसरितस्तथा।आगच्छन्तुपवित्राणिस्नानकालेसदा मम॥

गङ्गे चयमुनेचैवगोदावरिसरस्वति।नर्मदेसिन्धु कावेरिजलेऽस्मिन्संनिधिंकुरु॥

कला का यही जीवन उत्स है। जो नहीं है, अपूर्ण है उससे पूर्णता की गमन। किसी विषेष अनुभूति को निपुणता द्वारा अभिव्यक्त करना ही तो है कला। नदी नहीं है परन्तु नदी को अनुभूत करना। उसमें नहान के आनंद की यह अभिव्यक्ति ही क्या कला नहीं है!

मानव संस्कृति का आवष्यक अंग ही कला है। जीवन के सहज आनंद की अभिव्यक्ति के अलावा कला का कोई अन्य उद्देष्य हो भी कैसे सकता है। महात्मा गॉंधी ने इसीलिये तो कला को आत्मा का ईष्वरीय संगीत कहा है। कार्तिक नहान की परम्परा को पुण्य प्राप्ति से जोड़ा गया है। इस माह में नहान माने बाह्य और आभ्यन्तर की पवित्रता।

बहरहाल, परम्पराओं से ही कलाएं पोषित होती है। धर्म, संस्कार, रीत-रिवाज के तमाम हमारे कर्म कलाओं के ही तो हेतु हैं। दीप पर्व दीपावली तो कला का सिरमौर पर्व है। मिट्टी के जगमगाते दियों की अनवरत श्रृंखला के सौन्दर्य की दीठ इसी पर्व पर होती है। प्रजापति कुम्हार मिट्टी के दीये गढ़ता है, और भी बहुत सारी मूर्तियां बनाता है। मोलेला मृण मूर्तियों के लिये विष्व विख्यात है। अभी कुछ दिन पहले ही उदयपुर जाना हुआ तो वहां भी गया। पता चला सड़क के मोड़ पर है यह गांव सो इसका नाम कभी था ‘मोडेडा’। कालान्तर में परिष्कृत होते यह मोलेला बन गया। कार्तिक माह में मोलेला की मूर्तियां, दीपकों की सर्वाधिक बिक्री होती है। वहां बनी लोक देवी-देवताओं की मिट्टी की फड़ तो अब हर आम और खास में लोकप्रिय है। मिट्टी की फड़ माने लोक देवी-देवताओं की मूर्तियों का कोलाज। सोचता हूं तो पाता हूं जीवन में तमाम कलाओं का उत्स हमारी परम्पराओं, उत्सवधर्मिता की संस्कृति से ही तो है। उत्सवधर्मिता का उजास जीवन में होता है तभी तो कलाओं का सृजन होता है। दीपावली को ही लें, कला की उत्सवधर्मिता इस त्योहांर पर अपनी पूर्णता में होती है। शहरों में तो नहीं परन्तु गांव और बीकानेर जैसे हमारे कस्बाई शहर में घरों में दीपावली पर लक्ष्मी के आगमन के लिये प्रतीक रूप में कुमकुम से उसके पगलिये अभी भी बनाये जाते हैं। सुन्दर पगलिये। मांडणे। मिट्टी के सुन्दर दीपक घरों में लाये जाते हैं। उन्हे पहले धोकर साफ किया जाता है फिर तेल-बाती डाल घर के हर कोने में रखा जाता है। दीवारों पर दीपकों की पूरी की पूरी श्रृंखला बनायी जाती है। दीपक जलाते हैं परन्तु पूर्ण जतन से। कला की समग्रता से। ‘दीपो यत्नेन वार्यताम्’ माने दीया जलाओ पर जतने से जलाओ।



Friday, October 14, 2011

विज्ञान और तकनीक का शिल्पाकाश

अनिश कपूर अपने षिल्प में अस्तित्व से संबंधित गूढ़ता लिये कलाकार हैं। कला की उनकी यह गूढ़ता ऐसी है जिसमें जीवन में होने वाले तमाम प्रकार के परिवर्तनों और प्रतिक्रियाओं का दर्षाव है। भले वह जो बनाते हैं उनमें बहुत सा ऐसा जिसमें नगरीय आर्किटेक्ट की आवष्यकता से जुड़े आष्चर्य का लोक है परन्तु वहां तकनीक के कला रूपान्तरण की पूरी की पूरी एक विचार पद्धति को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। उसमें स्वय की उनकी कला दीठ और सृजनात्क षिल्प शैली है।
दिल्ली की नेषनल मोर्डन आर्ट गैलरी में उनके कलाकर्म से पहले पहल रू-ब-रू जब हुआ तो लगा यह षिल्प की वह दुनिया नहीं है, जिसे पहले देखता रहा हूं। रहस्य लोक में ले जाते बड़े-बड़े षिल्प। समय जैसे उनमें ध्वनित हो रहा है। और स्पष्ट कहंू तो अन्तराल का षिल्पाकाष। फाईबर, मोम, मैटल और तमाम दूसरी तरह की चीजों के मिश्रण से निर्मित उनकी आकृतियों में वैज्ञानिक बोध भी है। कला में विज्ञान और तकनीक के विकास की प्रतिध्वनि। ब्रिटेन का उनका ‘आर्क लोर मित्तल ओरबिट’ कभी खासा चर्चित रहा था। यांत्रिकता के समय की तमाम संवेदनाओं को जैसे वहां पिरोया हुआ है। यही क्यों, उनकी बेहद प्रसिद्ध कलाकृति ’क्लाउड गेट’ को ही लें। घेरदार स्टेनलेस स्टील के ढ़ांचे का क्लाउड गेट अपने ढ़ाचे में इमारत के साथ आकाष को जैसे समाहित करता है। याद पड़ता है, नेषनल मोर्डन आर्ट गैलरी में ही उनके तमाम दूसरे कार्यों से रू-ब-रू होते उनसे संवाद भी हुआ था। तब वह भारत मंे ही थे। संवाद से पहले कलाकृतियों से रू-ब-रू होते औचक यह भी लगा कि किसी फेंटेसी जगत में पहंुच गया हूं। टाईम मषीन की मानिंद शीषे के घेरे में आप प्रवेष करते हैं तो कितने ही और अक्स आपको अपने नजर आते हैं। ऐसे ही पिरामिड आकृतियों और उनके पास रंगों को देख उनके भारतीयपन को गहरे से अनुभूत किया जा सकता था। लाल, ब्ल्यू, पीले रंगों की ढे़री अलग से ध्यान खींच रही थी। उनके इस रूपक को देख अपने शहर बीकानेर में गणगौर पूजन की याद हो आयी। गीत गाते हुए गणगौर, ईषर, के मांडणों के लिये गुलाल की ढ़ेरियां से मुट्ठी भर गुला लेती लड़कियां, ऐसा करते जमीन पर छिटकती गुलाल। मुझे लगता है, अनिष कपूर के पिरामिड के पास गुलाल की रक्ताभ लाली का देसज ठाठ  उनकी भारतीयता की उत्सवधर्मिता है। हरे, पीले, नीले रंगों के बावजूद लाल रंग अनिष कपूर के षिल्प के केन्द्र में रहता है। संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘यह पूर्णतः भारतीय रंग है। शरीर के आकर्षण का केन्द्र भी यही रंग है।’ सच ही तो है लाल जीवन संबंधों के साथ ही खतरे, भय को भी व्यक्त करता है। खून का रंग भी तो लाल ही है। कभी ‘रॉयल एकेडमी’ में अनिष कपूर का एक ऐसा ही इन्स्टालेषन खासा चर्चित रहा था। वह तोप से बारूद दागने, खून के रंगों में लथपथ टूकड़े टूकड़े हुए शरीर के चमड़ों के लोथड़ों का संस्थापन था। ऐसे ही उनकी एक कलाकृति में खून और पटरियों के संबंधों को की व्यंजना है। चर्चित षिल्प और भी हैं, ‘तारातंत्र’, ‘मार्सयस’, ‘‘टीजवेली’, ‘स्वयंभ’, ‘मेमरी’ और भी परन्तु तमाम में मानव जीवन और जीवन से जुड़े सरोकार हैं।
अनिष विष्वभर में अपने वृहद स्कल्पचर के लिये जाने जाते हैं। स्कल्पचर की विविधता, विषालता के लिये भी। विष्व की तमाम कला छवियों को उनकी कला में अनुभूत किया जा सकता है। जीवन के रहस्य जगत को पकड़ते हुए वह विज्ञान और तकनीक का अपने तई कला पुनराविष्कार करते हैं। कला का अनूठा आष्चर्यलोक अनिष के कलाकर्म में है। संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘कला वृहद विष्व का विषय है। मैं आधुनिक कलाकार हूं परन्तु परम्परावादी भी हूं। मूलतः मैं भारतीय हूं परन्तु मुझे यह कहने में कतई कोई शकोच नहीं है कि सौन्दर्य की कोई सीमा नहीं होती। इसे किसी राष्ट्रीयता के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए।’
सच ही तो है। कला में विचारों की उनकी लय में तमाम विष्व के सरोकार हैं। एक अनूठी पारदर्षिता भी वहां है। ऐसी जिसमें सृजन की बारीकियां है और है विज्ञान और तकनीक के विकास की कला संगतता।

Tuesday, October 11, 2011

धूप की नदी में पावं छपछपाती चांदनी

जगजीत सिंह अपने गान में गजल गायकी का जैसे अर्थ समझाते थे। सुनने तो अपने आप ही हम उन्हें गुनने लगते। मन में अजीब सी कषीष का अहसास होता। आवाज का वह लरजपन, मर्मस्पर्षी रूमानियत, शब्दों को होलै से निभाने का अलहदा उनका ढंग और जीवन के तमाम भावों के संस्पर्षों की नर्मियां। थमती नहीं है गान की उनकी बारीकियां की उनकी यादें। सुनते हुए किसी ओर जग में जैसे वह ले जाते। यह हर व्यक्ति के अंदर का अपना लोक है। जहां भावनाओं का ज्वार है, तन्हाईयां है और जी भर कर रोने की फुर्सत भी जैसे तलाष ली गयी है। जगजीत माने रूमानी आध्यात्मिकता के स्वर। दर्द के समन्दर का अपनापन। हम नहीं गाते परन्तु उन्हें सुनते हुए भीतर का हमारा मन उनके साथ औचक गाने लगता है। अंदर से रूह हिल जाये, ऐसा वह गाते। भीतर के सन्नाटे का गान। दिल की तन्हाई का संगीत यानी जगजीत सिंह।
जगजीत सिंह की मर्मस्पर्षी आवाज दिल के अंदर जैसे हलचल मचा रही है। ‘किसने रास्ते में चांद रखा था, मुझको ठोकर लगी कैसे...।’ पहले गुलजार के लफ्जों के ‘मरासिम’ में और बाद में ‘कोई बात चले’ एलबम में जिस तरह से उन्होंने निभाया, वैसे क्या कोई ओर निभा सकता है! यही है पारम्परिकता के जड़त्व को तोड़ना।
संगीत के अधीरजनों की प्यास बुझाने के लिये ही जैसे उनका गान बना। उन्हें सुनते हुए गीत, गजल, भजन के बोल ही नहीं उन्हें बरतने का उनका अंदाज भी मन को भाता। यह उनका अपना और केवल अपना था। ऐसा जिसमें मुहब्बत को जिस्मानी रिष्तों से मनुष्य के वजूद से जोड़ने का प्रयास था। गायन की उनकी रोषनी में सर्जन की उन तमाम संभावनाओं को तलाषा जा सकता है जिसमें व्यक्ति अपने खुद के वजूद को ढूंढता है, अपने होनेपन को तलाषता है। मुझे लगता है गजल में छंद की संस्कृति को बोल की रंगत देते वह जो थरथरापन सुनने वालों को देते थे उसमें एक मीठा सा दर्द बंया होता था। गजल में यह रूमानियत लिये होता तो भजन में प्रार्थना के अंदरूनी संस्पर्षों की नीरवता को मुखरित करता हमें अपना लगता था। इसीलिये उनकी आवाज दिल की गहराईयों तक उतरती  अपनी कषीष में दिलो दिमाग पर छा जाती है। हम डूब जाते हैं, संगीत के उनके समन्दर में। आंसू का सैलाब उमड़ता है...भीगती है रूह। याद पड़ता है, कभी सुनामी पीड़ितों की मदद के ख्याल से उन्होंने ‘साईं धुन’ एलबम निकाला था। यह धुन उनके मन की धुन थी। उस मन की जिसमें खुद उनका दर्द दूसरों के दर्द से घुल-मिल हल्का होता था।
बहरहाल, जगजीत राजस्थान के थे। श्रीगंगानगर के जाये जन्मे। संगीत की सुरूआती तालीम उन्हें छगनलाल शर्मा से मिली। बाद में सेनिया घराने के उस्ताद जमाल खान के वह शागिर्द भी बने। गायन की शुरूआत गुजराती फिल्म में पार्ष्वगायन से हुई और वर्ष 1976 में उनका एलबम ‘द अनफॉरगेटेबल’ निकला। जगजीतसिंह ने सच में इससे जग को जीत लिया। याद करें इसमें गाया उनका वह गीत, ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...’। यह शायरी की समझ वाला गान था। ‘कौन रोता है किसी और के गम की खातिर, सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया...।
उनका मूल नाथ था जगमोहन। गायन में जगजीत से मषहूर हुए। जग को मोहने वाला कहें या जीतने वाला क्या फर्क प़ड़ता है! सुरों की जगजीत की सर्वथा अलग कायनात, एक पूरी दुनिया उनके पास जो थी। इसमें सुनने वालों को वह कभी रूमानी तपिष का अहसास कराते तो कभी शर्मो हया का हिजाब डालते। गायन के अलहदा बिंब रचते वह खंड-खंड होते स्वरों को पिरोने की साझा विरासत जैसे हमें सौंप गये हैं। शायरी के मिजाज में आवाज का उनका घुला रस बहुविध रंगों में पतझर के दरख्तों के खालीपन का अहसास कराता है। वहां एक अलग तरह की बैचेनी, गहराई है। मन के रीतेपन को भरती हुई। गजल के बारे में मधुरिमा सिंह का लिखा औचक जेहन में कौंधने लगा है, ‘गजल जिदंगी की पलकों पर थरथराती हुई आसूं की बूंदे हैं जो सूरज की रोषनी अपने अंदर समाकर सतरंगी आभा से आलोकित हो जाती है।’ मुझे लगता है जगजीत सिंह की गायकी ऐसी ही है जिसमें धूप की नदी में पावं छपछपाती है चांदनी। आप क्या कहेंगे!