Saturday, March 31, 2012

नमन धोरा धरा। नमन!

संस्कृति विकास के विविध रूपों की समन्वयात्मक समष्टि है। यह हमारी संस्कृति ही हैॅ जिसमें दृष्य और श्रव्य कलाओं का अनूठा भव है। कहें संस्कृति जीवन में व्याप्त है। यूं भी राजस्थान अपणायत का प्रदेष है। माने अपनत्व से लबरेज राज्य। उत्सवधर्मी संस्कति में रचा-बसा। कलाओं की विविधता लिये। यहां का इतिहास केवल तिथि-क्रम से ही जुड़ा हुआ नहीं है वरन् उसका संबंध उन मान्यताओं, परम्पराओं, विचारों से भी है जिनमें संस्कृति और समाज के गहरे सांस्कृतिक सरोकार निहित होते हैं।
मुझे लगता है, लोक का आलोक लिए है यह राजस्थान की कला-संस्कृति ही है जिसमें संगीत, नृत्य एवं लोक वाद्यों की मधुर झंकार है। रेत के धोरों में बजते अलगोजे, मोरचंग, नगाड़े, मंजिरों , तानपुरे की तान बरबस ही कानों में रस घोलती है तो घुमर, कालबेलिया, तेराताली, भवई जैसे लोक नृत्यों से मन मयुर औचक नाचने लगता है। रेत के धोरों में जीवन के स्पन्दन से जुड़ी है तमाम यहां की हमारी कलाए। माटी की सौंधी महक लिये। कालगत को देषगत बनाते।
चित्रकला की बात करें। तमाम पारम्परिक हमारी चित्रषैलियां जीवन साधना की संवाहक है। धार्मिकता और श्रृंगारिता इनके मूल में जो रही है। अलग-अलग रियासतों में पनपी भिन्न-भिन्न चित्रकला षैलियां। इनमें जीवन के विविध विषयों के साथ वहां के परिवेश का सांगोपांग उभार है। मसलन नाथद्वारा शैली को ही लें। ब्रज और उदयपुर शैली के समन्वय से बनी नाथद्वारा शैली के अंतर्गत श्रीनाथजी के प्राकट्य एवं लीलाओं से संबंधित असंख्य चित्र कागज और कपड़े पर तब से लेकर अब तक बन रहे हैं। बीकानेर शैली में यति मथेरणों की पारम्परिक जैन मिश्रित शैली और मुगल दरबार से आयी उस्ता परिवार की ऊॅंट की खाल पर चित्रकारी के अलावा विभिन्न शैलियों के मिश्रण के साथ बीकानेर के परिवेश को उद्घाटित करती ठेठ राजस्थानी शैली में हिन्दु कथाओं, संस्कृत और हिन्दी राजस्थानी काव्यों को आधार बनाकर बनाए चित्र सर्वथा अलग रंगत लिए है।
ऐसे ही किशनगढ़ शैली की बणी-ठणी ने विश्वभर में अपनी अलग धाक जमायी। रजपूति सभ्यता और संस्कृति, तत्कालीन परिस्थितियों, भौगोलिक विशेषताओं के बारीक पहलुओं को अपने में समेटे यहां चित्र शैलियों का जो विकास हुआ उसमें देशज काल की अनुरूपता तो है ही, प्रकृति परिवेश का भी बहुरंगी चित्रण है। जन जीवन की भावनाओं के लोकप्रिय विषयों, राधाकृष्ण के माधुर्य भाव के साथ ही विभिन्न पौराणिक आख्यानों, दरबारी जीवन, उत्सव, शिकार, राजा-रानियों के चित्रांकन, लोक कथाओं, काव्य आदि असंख्य विषयों पर कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों में प्रयुक्त लाल, पीला, श्वेत और हरे रंगों का संयोजन ऐसा है जिससे विषय अपने विराट परिवेश में स्वतः ही उद्घाटित होता है। आधुनिक दौर में चित्रकला में सर्जन के महत्वपूर्ण आयाम भी जुड़े है। प्रभाववाद, घनवाद, अभिव्यंजनावाद, अमूर्त कला धारा, तंत्र कला और देष के कला आंदोलनों से जुड़ते सृजन की वैचारिकता के अंतर्गत अम्लांकन, काष्ठ, छापांकन व कोलोग्राफ विधा में भी इस दौरान पर्याप्त सृजनकर्म किया गया है तो सेरीग्राफ व लीथोग्राफ में भी नवीन सोच रखते महत्वपूर्ण कलाकर्म किया गया है। कला जगत में वैश्विक स्तर पर पर पसर रही नयी प्रवृति के अंतर्गत पश्चिम में जड़े जमा रहे वीडियो आर्ट या इंस्टालेशन की गंूज भी अब राजस्थान मे सुनायी देने लगी है।
बहरहाल, चित्रकला ही क्यों, संगीत और नृत्य में भी राजस्थान अत्यधिक समृद्ध प्रदेष है। उल्लसित लोक मानस से निकलने वाली अटूट धारा के यहां के लोक गीत, अलग-अलग क्षेत्रों की परम्पराओं, मान्यताओं और संस्कृति से जुड़े लोक नृत्यों में मानों जीवन थिरकता है। घूमर, गैर, गींदड़, डांडिया, तेरहताली, भवई, चकरी, बमरसिया, मेहंदी, पणिहारी का नाच, भैरूजी के भोपे का नृत्य, नाथपंथ कालबेलियों का पूंगी नृत्य, थोरियों का फड़ नृत्य, कच्छी घोड़ी का नृत्य, मिरासी, चित्तौड़ का तुर्रा-कलंगी नृत्य उल्लसित मन के ही तो प्रतीक हैं। लोकनाट्यों के साथ भी यही है। स्थान-विषेष की परम्पराओं को प्रतिबिम्बित करते इनमें नृत्य के साथ नाट्य संवाद भी निहित है। बीकानेर में होली के दिनों में रम्मतें होती है। हेड़ाउ मेरी, अमरसिंह राठौड़ की रम्मतों में एतिहासिक, पौराणिक के साथ सामाजिक जीवन से जुड़े प्रसंगों का चौक-मौहल्लों में प्रदर्षन होता है। कला मन के यही तो वह चितराम हैं, जिनमें व्यक्ति सदा बसना-रचना चाहता है। इसीलिये कहें कि उत्सवधर्मी राजस्थान में सात वार, नौ त्योंहार हैं। ‘पधारो म्हारे देस...’ की आतिथ्य सत्कार परम्परा के साथ कला-सस्कृति के अनूठे रंगों से सजी है यह धोरा धरती। नमन धोरा धरा। नमन!

Friday, March 23, 2012

सभ्यता और संस्कृति का कला नाद

सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरूद्ध अपने को प्रमाणित करने का प्रयत्न कहीं है तो वह कला में है। यह कलाएं ही है जो भीतर के हमारे सौन्दर्यबोध को जगाती हैं। संपूर्ण अर्थ में कला कैनवस का अंकन, मूर्तिशिल्प, नृत्य, नाट्य भर ही तो नहीं है। अंतर्मन संवेदना का उत्स कला है। आनंदानुभूति भी उसी का एक हेतु है। रेखाओं द्वारा, वाणी द्वारा, मूर्ति गढ़न में और ताल में कला की उपयोगिता का आधार यह हमारा सौन्दर्यबोध ही है। इसीलिये लोक संस्कृति, परम्पराओं, रहन-सहन और स्थान विशेष के वास्तु, स्थापत्य में हर ओर, हर छोर कलाओं का ही बोलबाला है।
मुझे लगता है, यह कला और कलाकार ही हैं जो सार्वजनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर काल को नियोजित करते हैं। कलाओं में ही काल, समय का नाद निहित है। अजंता की गुफाओं में, खजूराहो, कोर्णार्क की दिवारों पर अंकित मिथुन मूर्तियों में, सांची के स्तूप में, अशोक कालीन स्तम्भों में और दूसरी तमाम हमारी मूर्तिकला, स्थापत्यकला में स्थान, विशेष के साथ युगीन सभ्यता और संस्कृति ही तो प्रतिबिम्बित होती है। युगीन सोच की संवाहक हमारी कलाकृतियों, वास्तु और शिल्प ही है। यही क्यों, समाधियां, स्मारकों में भी हमारे पूर्वजांे की संलिप्तता एक खास अंदाज में दिखाई देती है।
यह जब लिख रहा हूं, कला दीठ के यायावरी दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, छत्तीसगढ़ जाना हुआ था। खैरागढ़ स्थित देश के एक मात्र इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने। कला संकाय के डीन मित्र महेश चन्द्र शर्मा के सौजन्य से वहां से अस्सी किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के खजूराहो कहे जाने वाले शिव धाम भोरमदेव भी जाना हुआ। गाड़ी स्वयं ही ड्राइव कर रहा था सो रास्ते पर खास ध्यान था। भोरमदेव छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में स्थित है। रास्ते भर आदिवासी संस्कृति से साक्षात् होते मैनें पाया सड़क किनारे छपरेल के घरों में खास अंदाज में लोक चितराम अंकित हैं। सिंदुरी रंग से स्थानीय लोगों का गहरे से जैसे नाता है। वहां पहुंचा तो सिंदुरी रंग से सजा भोरमदेव मंदिर का संकेत चिन्ह ळभी अलग से दिखा। पांच फूट ऊंचे चबूतरे पर बना शिव का अद्भुत शिल्प, स्थापत्य धाम। गोड राजाओं के देवता भोरमदेव माने शिव। कलात्मक सौन्दर्य से सराबोर। मंदिर की बाहरी दिवारों पर बारीकी से अंकित नृत्यांगनाएं, मिथुन मूर्तियों का भव। वहां से लौट आया परन्तु अभी भी खैरागढ़ जेहन में है। वहां के वास्तु, शिल्प और तमाम दूसरे निर्माण कार्यों ने जो सौन्दर्यबोध दिया, उसी में रमा हूं। मुझे लगता है, कला के यही तो वह युगीन सरोकार हैं जिनसे हम चाह कर भी जुदा नहीं हो सकते।
बहरहाल, ऐसी ही अनुभूति भुवनेश्वर में भी हुई। दो भागों मंे बंटा भुवनेश्वर का एक भाग आधुनिकता से तो दूसरा पूरी तरह से प्राचीन संस्कृति को अपने में सामाहित किये है। लिंगराज मंदिर जाएंगे तो इस संस्कृति से साक्षात् होगा। बिन्दु सागर झील के आस-पास का परिवेश बीते समय और कला के अद्भुत सौन्दर्य का आस्वाद कराता है। खंडहर होते हुए भी पाषाण मंदिरों का शिल्प वैभव वहां जैसे आपसे संवाद करता है। वहां ही क्यों आप किसी भी धरोहर संपन्न नगर, स्थान पर जाएं आपको ऐसा ही अहसास होगा। छतों के कंगूरें, चोरौहों पर स्थापित मूर्तिशिल्प को लें। पार्क में रखी कोई पुराने ढंग की बैंच, महल, मंदिर परिसर में लगे फव्वारें झाड़फानुशों को देखें। रोड साईटों पर लगाये गये पिल्लरों, उनमें बंधी लोहे की सांकलों को लें। शहर की संस्कृति, वहां की कला से आपका सीधे साक्षात् होगा। विश्व के एम मात्र सुनियोजित बसे शहर गुलाबी नगरी जयपुर को ही लें। चौपड़, एकरस बनी दुकानें, गुलाबी रंग और यहा का वास्तु-सभी में सुव्यवस्थित बसावट की धरोहर प्रतिबिम्बित होगी। और नही ंतो कस्बाई संस्कृति को अभी भी जीते शहर बीकानेर को ही लें। वहां की तंग गलियां, हवेलियां, चौक मोहल्लों में बिछे तख्त माने पाटों की संस्कृति अपनापे को अपने आप ही बंया कर देती है। किसी शहर का कलात्मक सौन्दर्यबोध क्या यही नहीं है!

Friday, March 16, 2012

उत्सवधर्मी संस्कृति के संवाहक

प्रेमचन्द गोस्वामी रंग और और रेखाओं की उत्सधर्मी संस्कृति के संवाहक थे। संवदनाओं का स्पन्दन कराता उनका कैनवस अनुभूतियों का जैसे गान करता। तुलिकाघातों से रंगों का वह जो राग सुनाते उसमें रचने-बसने का हर किसी का मन करता। कहें वह मानव मन संवेदनाओं, प्रवृतियों, ंिचंतन को रंग,रेखाकाष देने वाले अद्भुत कला साधक थे। ऐसे जिन्होंने अमूर्तन में परम्परा का रस घोलते भारतीय संस्कृति की उत्सवप्रियता की हमारी संस्कृति का नाद किया। किसी एक षैली सें बंधे रहने की बजाय तमाम कला षैलियों से सरोकार रखते यह प्रेमचन्दजी ही थे जिन्होंने रंग, रेखाओं के गतिषील प्रवाह में उनकी कोमलता के छन्द को कभी मुर्झाने न दिया।
याद पड़ता है, माउन्ट आबू में कोई चार-पांच साल पहले ललित कला अकादेमी ने राज्य स्तरीय कला षिविर का आयोजन किया था। कला समीक्षक के रूप में खाकसार भी इसमंे सम्मिलित हुआ था। तभी चार-पांच दिन लगातार प्रेमचन्दजी का साथ मिला था। षिविर में अपनी ही धुन में उन्हें काम करते देखा। कैनवस पर रेखांकन के बाद ब्लेडनुमा लोहे की पत्ती से फलक पर वह रंग फैला रहे थे। हरे, पीले, नीले, लाल, काले में सफेद रंग को मिलाते वह रंगों का जैसे अद्भुत कोलाज रच रहे थे। मैं देख रहा था, रंगों के उनके निभाव में सर्वथा नयापन था। यह ऐसा था जिसमें स्ट्रोक दर स्ट्रोक रंग अपनी चमक में अद्भुत लय अंवेर रहे थे। कैनवस उत्सवधर्मी रंगों से सज रहा था। रंग नहीं रंगों का कोलाज। हरेक रंग का अपना अनुषासन। एक साथ बहुत सारे रंगों की उपस्थिति परन्तु कहीं कोई कोलाहल नहीं। निरवता। चटक रंग परन्तु सौम्यता हर ओर, हर छोर। रंग रागात्मकता। ब्लेडनुमा पत्ती से वह कैनवस पर कभी रंग छितराते तो कभी बिखराते। बहुत देर से उनके कैनवस पर ही नजर ठहरी थी परन्तु उन्हें जैसे मेरी उपस्थिति का भान ही नहीं था। शायद इसलिये कि रंगों की अपनी दुनिया में ही वह पूरी तरह से खोये हुए थे।
कैनवस के प्रेमचन्दजी के यही वह सरोकार थे जो उन्हें ओरों से जुदा करते थे। बाद में तो उनके कलाकर्म का गहरे से साक्षात् किया। मुझे लगता है, राजस्थान के वह एक मात्र ऐसे कलाकार थे जिन्होंने रंग और रेखाओं के होनेपर का गहन अन्वेषण करते अपने तई उन्हें सर्वथा नये अंदाज में परोटा। मसलन रंगो को मन के स्पन्दन से जोड़ती उनकी रंगोत्सव श्रृंखला को ही लें। कैनवस का उत्सवधर्मी गान वहां सुनाई देगा तो उनकी ज्यामितीय संरचनाओं में अद्भुत उड़ान है। आकाष मंे उड़ते पंछियों की मानिंद। ऐसे ही बिन्दु पद्धति से फलक में अंतराल को तोड़ते भी उन्होंने आकृतियों का सर्वथा भिन्न मुहावरा हमें दिया। यह ऐसा है जिसमें ग्लोबनुमा गोलों में रंगों की पारदर्षी परत में चलचित्रनुमा जीवंत दृष्यों का असीमित आकाष है। कभी उन्होंने तांत्रिक प्रतीक लेते हुए भी कैनवस को समृद्ध किया था। तंत्र साधना की समृद्ध परम्परा को रंग और रेखाओं के सृजन सरोकारों से जोड़ते उन्होंने लोक परम्पराओं, इतिहास, धर्म, मिथकों का अपने तई कैनवस पुनराविष्कार किया। तंत्र साधना चित्र ही क्यों तमाम उनके चित्रों की बड़ी विषेशता यही तो है कि उनमें कहीं कोई कथा, व्यथा अभिव्यंजित है। मानो कैनवस हमसे कुछ कह रहा है। मुझे लगता है, प्रेमचन्दजी कैनवस की किस्सागोई में सिद्धहस्त थे। किसी एक शैली में बंधकर रहने की बजाय बहुविध शैलियों, कला परम्पराओं में उन्होंने कार्य किया। कला में उन्होंने सदा नई राहों का अन्वेषण करते रंग, रेखाओं के संयोजन की संप्रेषणीयता का सर्वथा नया मुहावरा भी रचा।
यह जब लिख रहा हूं, रंगोत्सव श्रृंखला के उनके चित्र जेहन में फिर से कौंधने लगे हैं। लग रहा है, औचक कोई आकृति खिलखिलाकर सामने आएगी, हल्की सी मुस्कान देकर लौट जायेगी। रंग और रेखा संवाद का प्रेमचन्दजी का यह आमंत्रण उनके चित्रों में सदा ही मिलता रहा है। वह नहीं है परन्तु उत्सवधर्मिता की हमारी संस्कृति के उनके कैनवस कहन को क्या कभी हम भुला पाएंगे!

Monday, March 5, 2012

दृश्य संवेदना के अनुभव का भव


छाया कला यानी दृश्य संवेदना में अनुभव का भव। प्रकाश की कला सर्जना। प्रकाश गति पथ पर कोई भी दूसरा पदार्थ अवरोधक बनता है तो पीछे एक छाया की सृष्टि होती है। कैमरे में छाया की इस सृष्टि से ही दृश्य का अंकन होता है। कैमरेनुमा इस यंत्र की सहायता से यदि दिख रहे दृश्य में निहित संवेदना, अंतर्मन अनुभव के भव को उकेरा जाये तो वह छाया कला ही तो कही जाएगी। छायाकला माने संवेदना से उपजी सर्जना। ऐसी सर्जना जिसेमें दृश्य मंे निहित बाहरी ही नहीं बल्कि आंतरिक सौन्दर्य की भी दीठ निहित है। कहें, कैमरे की आंख से वह सौन्दर्य भी अनावृत होता है जिसे न तो शब्दो में व्यक्त किया जा सकता है और न ही वस्तुगत दृष्टि से उसे जाना जा सकता है।
बहरहाल, कुछ समय पहले मालवीय राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान के क्रिएटिव आर्ट्स सोसायटी फोटोग्राफी क्लब द्वारा आयोजित छाया कला प्रदर्शनी ‘मोमेन्ट्स 2012’ का आस्वाद करते सहज ही यह सब अनुभूत किया। लगा, यह छायाकला ही है जिसमें सामान्यतया दिख रही वस्तु, विषय के साथ ही वह तमाम भी अनायास उभर आता है, जिसे नंगी आंख चाहकर भी नहीं देख पाती। स्मृति के गलियारे में छाया कला कृतियां काैंध रही है। एक छायाचित्र है जिसमें जारनुमा एक्वेरियम में तैरती मछली के आस-पास के निर्जिव हंसते बुद्ध, महाराजा और गुलदस्ते की जीवंतता का सांगोपांग चितराम है। दूसरे में जूतों के पार्श्व में मंजिलों की गहराई है। छायाचित्र और भी हैं जिनमें जंतर-मंतर में थकित पथिकों का धूप विश्राम है तो चौथे में पत्तियों से झांकती गिलहरियां, मछली को मुंह में दबा उड़ती क्रेन, सूखे डंडेनुमा डाली पर बैठी चिड़िया और इमारत से झांकता अतीत जैसे हमसे संवाद कर रहा है। किसी में अंधेरे में उभरती मानवाकृति, फूटपाथ पर खड़े को निहारती साईकिल सवार और उसकी गति, पेड़ की छाया में जीवन के अविराम का मोहक अंकन तो किसी में तारों पर चलता बंदर औचक ठहर कर कुछ सोचने को विवश करता है। दृश्य संवेदना लिए चित्र और हैं। मुझे लगता है, प्रकाश-अंधकार के बिम्ब प्रतिबिम्बों के साथ यह विद्यार्थियों का संवेदनशील कला मन ही तो है जिससे अनुभव का ऐसा खूबसूरत भव निर्मित हुआ है। रूपों की मौन मुखराभिव्यक्ति। सौन्दर्यपरक लय-छन्द मंे आविष्ट छायाचित्र। सोचता हूं, देखना महत्वपूर्ण है परन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण देखने की हमारी सोच है। यह वह सोच ही तो है जिसमें रंगों, रूप के भिन्न सरोकार हमें रस से सराबोर करते हैं।
फोटोग्राफी क्लब के सलाहकार और छायाकार मित्र महेश स्वामी के साथ एक-एक चित्र की बारीकी मंे जाते विद्यार्थियांे के छाया कला मन की संवेदना को गहरे से जिया। महेश छाया चित्रकारी में रूचि रखने वाले विद्यार्थियों को उत्तरोतर आगे बढ़ाने, उनमें निहित कला संवेदना को जगा उसे मंच प्रदान करने के अनथक प्रयास निरंतर करता रहा है। यह उसका संवेदनशील मन ही है जिसमें उत्सवधर्मिता के साथ अपने नहीं दूसरों के छायाचित्रों के प्रति भी अपार प्यार है। छाया कला के उसके यही तो वह सरोकार हैं जो उसे ओरांे से जुदा करते हैं।
बहरहाल, मुझे लगता है, यह छाया कला ही है जिसमें प्रकृति प्रदत्त चीजों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत ही नहीं किया जाता बल्कि प्रकृति के प्रस्तुत गुणों में से उकेरे जाने वाली विषय-वस्तु की एक प्रकार से अन्विति की जाती है। विषय में निहित आंतरिक सौन्दर्य, सौन्दर्य के किसी अंश को अनुभूत करते कैमरे की तीसरी आंख से उसे परोटा जाता है। कैमरेनुमा यंत्र की तकनीक यहां मदद जरूर करती है परन्तु यदि छायाकार में विषय-वस्तु के प्रति अतिरिक्त सजगता, क्षण में परिवर्तित घटना की गति को पकड़ने की सामर्थ्य नहीं है तो वह केवल फोटोग्राफी ही होगी छायाकला नहीं। प्रकृति और चीजों को उसके सर्वोत्तम रूप में पकड़ भीतर के अपने कलाकार से उसे जीवंत ही तो करता है छायाकार। तकनीक इसमें साधन हो सकती है साध्य नहीं। सर्जना में क्षण आस्वाद के अनुभव की समग्रता को जीते इसीलिये छायाकार जो अभिव्यक्ति करता उसे शब्दों मंे चाहकर भी कहां व्यक्त किया जा सकता है! इसीलिये तो कहा गया है एक चित्र हजारों हजार शब्दों से भी कहीं अधिक मुखर होता है।

Friday, February 24, 2012

उत्सवधर्मी संस्कृति के आख्याता और व्याख्याता

कला माने जिसका कलन होता है। काल में जिसकी गणना की जा सके। काव्य में भाषा, चित्र मंे रंग और रेखाएं संगीत में नाद आदि कलाओं की हमारी भिन्नता का बोध कराते हैं। यही सब तो वह है जिससे उत्सधर्मिता की संस्कृति है। बहरहाल, कला संस्कृति संस्थानों में रहते अषोक वाजपेयी ने सदा ही उत्सवधर्मिता की हमारी इस संस्कृति से हमारा नाता कराया है। केन्द्रीय ललित कला अकादमी के अध्यक्ष पद रहते भी उन्होंने चित्रकला के साथ ही उसके दूसरी कलाओं से संबंधों पर महत्वपूर्ण आयोजन किये। ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर देष में अपनी तरह का पहला नेषनल आर्ट वीक भी उनकी सोच से ही चंडीगढ़ में हो पाया। यह उनका कार्यकाल ही रहा जिसमें ललित कला अकादेमी चित्रकला षिविरों तक ही सीमित नहीं रहकर कलाओं पर संवाद का भी केन्द्र बनी। हिन्दी और अंग्रेजी सहित भारतीय भाषाओं में कला और कलाकारों पर लिखे गये निबंधों का दो बड़े जिल्दों में कवि, कला समीक्षक पीयूष दईया के संपादन में ‘कला भारती’ शीर्षक से प्रकाषन भी अषोकजी के कार्यकाल में ही हुआ। रचनात्मक गतिविधियॉ और भी हुई परन्तु कार्यकाल पूरा होने पर जब उन्होंने कहा कि वह जो चाहते थे नहीं कर सके और यह भी कि वह संस्थाएं बना तो सकते हैं परन्तु उन्हें चला नहीं सकते हैं तो इसमें निहित सरकारी तंत्र में चाहकर भी इच्छित नहीं कर पाने की उनकी मजबूरी को भी समझा जा सकता है। सरकारी तंत्र में कलाओं के लोकतंत्र की कहां कोई गुंजाइष होती है!बहरहाल, मुझे लगता है, कला-संस्कृति आयोजनों के अषोकजी अविराम पथिक है। रजा फाउण्डेषन के ग्यारह वर्ष पूरा होने पर दिल्ली में ललित कला, कविता, संगीत और नृत्य के ‘अविराम’ समारोह की उनकी सोच इसी का प्रमाण कही जा सकती है। भारत भवन, उस्ताद अलाउद्दीन खां अकादमी और भी न जाने कितने संस्थानो के जरिये सदा उन्होंने कला उत्सवधर्मिता का नाद किया है। कला-साहित्य की उनकी उत्सवधर्मिता और पंगे मोल लेकर भी कुछ करने की उत्सुकता से बहुतेरे स्थापित हुए, बहुतों ने बहुत कुछ पाया भी और नुगरे बन उन्हें गालियां भी दी है परन्तु आयोजनधर्मी अषोकजी को इसकी क्या परवाह! बकौल वाजपेयी ‘अविराम’ भी उनकी निंदित उत्सवधर्मिता का ही प्रमाण हैं।बहरहाल, आपा-धापी के इस दौर मंे जब हमें अपने पास के आदमी की आवाज भी सुनने की फुर्सत नहीं है, कलाओं के अर्न्तनिहित को सुनाने वाला ऐसा कोई है जिसे सुनने का, बल्कि कहें गुनने का मन करता है। उन्हें पढते, सुनते साहित्य और संस्कृति के हमारे संपन्न संसार की अनुभूतियों के अनगिनत संदर्भ मिलते हैं। यह ऐसे हैं जिनमें जिस समय में हम जी रहे हैं, उस समय की संस्कृति की उत्सवधर्मिता बंया होती है। कहें वह संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम हमारी कलाओं के आख्याता भी हैं और व्याख्याता भी। मुझे लगता है, कलाओं पर तमाम उनका लिखा हमारा सांस्कृतिक चिन्तन है। ऐसा सांस्कृतिक चिन्तन जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य कुछ इस तरह से घुले-मिले हैं कि उसमें कलाकार नहीं होते हुए भी हम अपने होने की तलाष कर सकते हैं। आडम्बरप्रियता और वाक्वैदग्ध्य के प्रदर्षन की होड़ में उनका होना और कुछ करना सुकून देता है। इसलिये भी कि हम में से कोई है जो कला-संस्कृति के प्रति घटते रूझानों पर खाली विलाप ही नहीं करता बल्कि सदा कुछ कर कलाओं की हमारी उत्सवधर्मिता को जिंदा रखे हुए हैं। संवाद में अषोकजी ने बहुतेरी बार कहा है ‘साहित्य और कलाएं मनुष्य का ऐसा प्रजातंत्र है, जहां आप सिर्फ अपनी प्रतिभा, उपलब्धि और संघर्ष के बल पर ही प्रवेष पा सकते हैं और जहां से आपको कोई भी, चाहे वह सत्ता हो या ईष्वर, संघ हो या संगठन, अभियान हो या कुप्रचार, देषनिकाला नहीं दे सकता।’ अषोकजी की रचनाधर्मिता, आयोजकीय व्यक्तित्व पर जब भी विचार करता हूं, उनका यह कहा ही जेहन में कौंधता है। नौकरषाह कह कर उन पर सवाल उठाने वालों को यह तो समझना ही चाहिए कि इतने नौकरषाहों में क्यों केवल अषोक वाजपेयी ही संस्कृतिकर्मी, कला मर्मज्ञ के रूप में विवादों को झेलते हुए भी अपनी रचनाधर्मिता से हमारे सामने से कभी लोप नहीं हुए हैं!

Friday, February 17, 2012

नटराज राज नमो नमः

संगीत-नाट्य के आदि प्रवर्तक हैं भगवान शिव। कहते हैं, कभी अपनेे नृत्य के बाद उन्होंने डमरू बजाया। डमरू की ध्वनि से ही शब्द ब्रह्म नाद हुआ। यही ध्वनि चौदह बार प्रतिध्वनित होकर व्याकरण शास्त्र के वाक् शक्ति के चौदह सूत्र हुए। नृत्य में ब्रह्ाण्ड का छन्द, अभिव्यक्ति का स्फोट सभी कुछ इसी में छिपा है। महर्षि व्याघ्रपाद ने जब शिव से व्याकरण तत्व को ग्रहण किया तो इस माहेश्वरसूत्र की परम्परा के संवाहक बने पाणिनि।
बहरहाल, आदि देव हैं भगवान शिव। देवों के भी देव। सुर-ताल के महान ज्ञाता। नृत्य की चरम परिणति शिव का ताण्डव ही तो है। नटराज जब नृत्य करते हैं तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वेश्वर की लीला का उच्छास उनके अंग-प्रत्यंग मंे थिरक उठता है। शिव का नृत्य तांडव है और पार्वती का लास्य। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार लास्य का अर्थ लीला या क्रीडा करना है। स्त्री-पुरूषांें के आपसी मनोभावों के आधार पर होने वाली लीला लास्य है। यह एक ही अर्थ या अलग-अलग अर्थों पर अवलम्बित हो सकती है। पारम्परिक मान्यता यह भी है कि नटराज शिव ने पहले पहल पृथ्वी पर तमिलनाडू के चिदम्बरम मंदिर मंे ही संध्या ताण्डव किया। चिदम्बरम् के मंदिर जाएं तो ध्यान दें, वहां नटराज पंचम प्राकार के अंदर हैं। यहां उनका आकाश स्वरूप हैं। माने कहीं कोई अवकाश नहीं। नटराज की शक्ति-स्वरूपा नाट्येश्वरी भी है।
मन में कल्पना होती है, नटराज शिव मगन हो नृत्य कर रहे हैं। वह जब नृत्य करते हैं तो एकाकी कहां होते हैं! सृष्टि के विकास में सभी प्रादुर्भूत सहायक शक्तियां वहां एकत्र है। ब्रह्मा ताल देते हैं। सरस्वती वीणा बजाती है। इन्द्र बांसूरी बजाते हैं और विष्णु मृदंग। लक्ष्मी गान करती है। भेरी, परह, भाण्ड, डिंडिम, पणन, गोमुख आदि अनद्ध वाद्यों से गुंजरित है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड।
बहरहाल, नटराज प्रवर्तित नृत्य के अनेक प्रकार हैं। ताण्डव सर्वप्रमुख है। कहते हैं शिव ने त्रिपुरदाह के बाद उल्लास नर्तन किया। भगवान शिव उल्लास में आकर पृथ्वी पर अपना पैर पटके भुजाओं को संकुचित करते हुए अभिनय करते हैं ताकि यह लोक उनकी भुजाओं के आघात से छिन्न-भिन्न न हो जाये। शिव तीसरा नेत्र खोले तो यह लोक भस्म हो जाये सो वह तृतीय नेत्र बंद करके ही नाच करते हैं। भोले भंडारी नाचने लगे तो सब कुछ भूल गये। नाचते ही रहे। निर्बाध। कहते हैं, उन्हें संयत करने के लिये ही तब पार्वती ने लास्य नृत्य किया। शिव ताण्डव रस भाव से विवर्तित था और पार्वती का किया लास्य रस भाव से समन्वित। कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में शिव के नृत्य का वर्णन करते लिखा है, यह नाट्य देवताओं की आंखों को सुहाने वाला यज्ञ है। पार्वती के साथ विवाह के अनन्तर शिव ने अपने शरीर में इसके दो भाग कर दिये हैं। पहला ताण्डव है और दूसरा लास्य। ताण्डव शंकर का नृत्य है-उद्धत। लास्य पार्वती का नृत्य है-सुकुमार तथा मनोहर।
ताण्डव नामकरण की भी रोचक कथा है। कहते हैं महादेव के नृत्य का अनुकरण उनके शिष्य ‘तण्ड’ या ‘तण्डु मुनि’ ने किया। तण्ड मुनि द्वारा प्रचारित होने से यह ताण्डव कहलाया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र मंे इसका सांगोपांग उल्लेख है। शिव आज्ञा से ही तण्डु ने उनके इस नृत्य को अभिनय के प्रयोग निमित्त भरतमुनि को दिया। अभिनवगुप्त की टीका मंे तण्डु को ही भगवान शिव का प्रख्यात गण नन्दी बताया गया है।
बहरहाल, नटराज की नृत्यशाला यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड है। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पांच ईश्वरीय क्रियाओं का द्योतक नटराज का नृत्य ही है। शिव के आनंद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है और रोद्र ताण्डव के साथ ही संपूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाता है। यह जब लिख रहा हूं, नटराज स्तुति ही जेहन में कौंध रही है, ‘सत सृष्टि तांडव रचयिता नटराज राज नमो नमः/हे आद्य गुरू शंकर पिता/गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्माण्डना/ नित होत नाद प्रचंडना, नटराज राज नमो नमः।’ माने हे नटराज आप ही अपने तांडव द्वारा सृष्टि की रचना करने वाले हैं। आप ही परम पिता और आदि गुरू हैं। हे शिव, यह संपूर्ण विश्व आपके मृदृंग की ध्वनि द्वारा ही संचालित होता है। इस संसार में व्याप्त प्रत्येक ध्वनि के स्त्रोत आप ही हैं। हे नटराज राज आपको नमन है! नमन प्रभू। नमन!

Friday, February 10, 2012

कर्षयति इति कृष्णः

कृष्ण का अर्थ है, जो आकर्षित करे। बाह्य रूप मंे ही नहीं, आंतरिक रूप मंे भी। कहा भी तो गया है, ‘कर्षयति इति कृष्णः।’ माने चिरंतन है जिनका आकर्षण। यह कृष्ण ही तो हैं जिन्होंने 64 कलाओं में पूर्णता को जिया। चन्द्रमा की भी 14 ही कलाएं है परन्तु कृष्ण तो तमाम कलाओं की पूर्णता लिए हैं। पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण। उनके मोहक स्वरूपों पर जब भी मन विचारता है, त्रिभंगी मुद्रा में खड़े गोपियों को रिझाने वाले बंशी बजैया कान्हा की छवि आंखों के सामने घूमती है तो महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन रथ के सारथी बन उन्हें कर्मयोग की शिक्षा देते कृष्ण भी औचक नजरों के सामने प्रकट होते हैं। श्रीमद्भागवत् में गोचारण के बाद घर लौटती गायों के पीछे गऊओं के खुर से उठती धूल से सने श्री कृष्ण का रूप वर्णन भी जेहन में अनायास ही कौंधता है। चेहरे पर पसीने की छिटकी बूंदे और धूल से लथपथ थका थका उनका चेहरा। अद्भुत शोभा लिये। छवियां और भी है। राधा संग रास रचाते कृष्ण। सबको थिरकाते स्वयं अचल कृष्ण। यह कृष्ण ही हैं जिनके लोकरंजक स्वरूप ने जन-मानस को सदा ही आनंदित, आल्हादित किया है। नृत्य, संगीत और चित्रकला तो कृष्ण लीलाओं से जुड़कर ही सदा समृद्ध होती रही है।
बहरहाल, कुछ समय पहले ही जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा में कृष्णा मौर्य के बनायी कृष्ण कलाकृतियों को देखकर सुखद अनुभूति हुई। रेखाओं के गत्यात्मक प्रवाह में कृष्ण और उनके प्रतीक रूप में मोर पंखों के जरिये अद्भुत सौन्दर्य सर्जना जैसे की गयी थी। कृष्णा कृष्ण की मोर मुकुट बंशीवाले की छवि से इस कदर मुग्ध है कि कैनवस में प्रेम के बहुविध रूपों में उन्हें ही रूपायित किया है। हरे, काले, लाल, पीले और नीले रंगों का उसका सधा प्रयोग भी बहुत से स्तरों पर मन को स्पन्दित करता है। स्ट्रोक तो खैर कृष्णा के महत्वपूर्ण हैं ही। मोर पंखों के रेखीय आयाम का कृष्णा का एक चित्र बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें रेखाओं के जरिये कृष्ण-राधा के रूपों का बेहद मोहक अंकन किया गया है-मूर्त में अमूर्त। माने वहां रेखाओं में ही कृष्ण की मुरली, राधा की मूरत, कृष्ण की सूरत और और रास का अद्भुत रचाव किया गया है। गौर करेंगे तो मोर पंखों का सौन्दर्य ही हर ओर, हर छोर नजर आयेगा। मुझे लगता है, रेखाओं की यही तो वह गतिशीलता है जिसमें संगीत, नृत्य को कैनवस जीवंत करता है। एक ओर चित्र है जिसमें राधा-कृष्ण की बस मूरत है...मोर पंख यहां भी अंतर्मन संवेदना के संवाहक बने हैं। चित्र और भी हैं जिनमें राधा-कृष्ण के प्रेम के बहाने जीवन सौन्दर्य की अभिव्यक्ति में रंगो और रेखाओं की उत्सवधर्मिता को कृष्णा ने जैसे जिया है।
राधा-कृष्ण के बारे में रोचक तथ्य यह भी है कि महत्वपूर्ण पुराण इस बारे में मौन ही है। यह गीत गोविन्द रचयिता जयदेव ही थे जिन्होंने राधा-कृष्ण की मोहक लीलाओं को स्वयं अपने काव्य मंे रूपायित करते दूजों को भी निरंतर इसकी प्रेरणा दी। कृष्ण-राधा प्रसंग उनके कारण ही फिर लोक में इस कदर रचे-बसे कि जीवन में प्रेम की कल्पना का प्रमुख आधार ही यही हो गये।
बहरहाल, कृष्णा मौर्य के कृष्ण चित्र ही नहीं बल्कि कलादीर्घा में लगाये उनके ऐतिहासिक सामोद पैलेस के चित्र भी अलग से ध्यान खींचते लगे। हां, सामोद महल के विभिन्न द्वार, वहां के स्थापत्य और शिल्प सौन्दर्य को कैनवस पर बरतते कृष्णा ने दृश्य के सौन्दर्य आयामों को ही छुआ लगता है। अच्छा होता वह दृश्य संवेदना के उन आयामों पर भी जाती जिसमे किसी ऐतिहासिक इमारत का अतीत वक्त में हो रहे बदलावों के साथ वर्तमान मंे ध्वनित होता है। यथार्थ के कैनवस अंकन में यही तो महत्वपूर्ण होता है कि हम दिख रहे सौन्दर्य की बजाय उस अदेखे को भी कैनवस पर अनुभूत कराएं जिसमें समय की महीन पदचाप ध्वनित होती है। किसी कलाकृति की जीवंतता आखिर इसी मंे तो है कि इतिहास का मौन भी वहां रंग और रेखाओं में मुखर हो।


Saturday, February 4, 2012

जदि तोर डाक सुने केउ ना आरने तबे एकला चलो रे...


रवीन्द्र संगीत माने भाषा, भाव और रस। शास्त्रीय और लोक संगीत का मेल। आत्मा का गान। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी वहां है तो बंगाल के लोक संगीत की अजस्त्र धारा बाउल, भटियाली का माधुर्य भी वहां है। कहें हिन्दुस्तानी संगीत की राग-रागिनियों में लोक के समवेत स्वर कही हैं तो वह रवीन्द्र संगीत में ही हैं।
रवीन्द्र नाथ टैगौर अपने युग के अद्भुत संगीत मर्मज्ञ रहे हैं। ‘गीत वितान’ में रवीन्द्र ने अपने गीतों को ‘गान’, ‘बंधु’, ‘प्रार्थना’, ‘विरह’, ‘साधना और संकल्प’, ‘अन्तर्मुख’, ‘निःसंशय’, ‘उत्सव’, ‘बाउल’ आदि उपशीर्षकों से संयोजित करते बाकायदा उनकी स्वरलिपि भी दी है। बांगला भाषा में उनके ये गीत ‘भांगा-गान’ से भी लोकप्रिय हुए। यह रवीन्द्र ही हैं जिन्होंने गान में स्वरानंद के साथ ही गीतों मंे निहित भावों के संप्रेषण की भी राह सुझाई। रवीन्द्र संगीत की यही तो बड़ी विशेषता है कि वह शास्त्रगत नहीं होकर लोक से जुड़ा है। उसे सुनते अनुभूति का आलोक मिलता है। शुद्ध एवं मिश्रित रागों में लोकसंगीत की छोंक से बना रवीन्द्र संगीत हृदय के अंतरतम उद्गारों का गान है।
बहरहाल, आरंभ से ही संगीत संगीत हमारे यहां इतना अधिक शास्त्रगत और अनुष्ठानगत रहा है कि उसके सहज माधुर्य से आम जन की एक प्रकार से दूरी होती चली गयी। ऐसे में रवीन्द्रनाथ टैगौर ने शास्त्रीय राग-रागिनियों की समृद्ध परम्परा की जीवंतता के साथ उसमें लोक का रस घोला। संवेदना, भाव और संगीत का मेल किया। संगीत की ऐसी धारा का प्रवाह किया जिसमें सकल विश्व की हॉर्मनी है।
रवीन्द्र संगीत माने जिसमें स्वरानंद के लिये ही गान न हो बल्कि सुर माधुर्य के साथ गीत रस भी हो। एक साथ कईं रागों का मिश्रण। रागाश्रयी की बजाय भावाश्रयी संगीत। सुनें तो गुनने का मन करे। कोरा गान भर नहीं, अंतर्मन अनुभूतियों का भव। शास्त्रीय राग-रागिनियां की छटा परन्तु उनमंे निहित बंधनों की क्लिष्टता नहीं। लोक संगीत मंे निहित मानव मन की तमाम सहज संवेदनाएं परन्तु कहीं कोई असंयत आवेग और चित्कार नहीं।
मुझे लगता है, प्रकृति, पूजा, भक्ति प्रेम और ऋतुओं में निहित आनंद की खोज कहीं है तो वह रवीन्द्र संगीत में ही है। कारण, वहां पारम्परिक राग-रागिनियों का मूल परिवेश तो है परन्तु श्रवण मंे आनंद के अवरोधों की जकड़न नहीं है। बंधनों में निर्बन्ध। माने रवीन्द संगीत।
अभी बहुत समय नहीं हुआ। रवीन्द्र जन्मशती आयोजनों के सिलसिले में साहित्य अकादमी की ओर से भारतीय लेखकों के दल में शांतिनिकेतन जाना हुआ तो बांगला कथाकार मित्र बिनोद घोषाल के साथ रवीन्द्र संगीत का आस्वाद करते जैसे अपने आपको फिर से जिया। लगा, रवीन्द्र संगीत खाली संगीत भर नहीं है। भावों का आनंद प्रवाह वहां है। रवीन्द्र संगीत माने पूजा पर्व गान, माने ऋतु पर्व गान। माने स्वदेश पर्व गान, माने भक्ति पर्व गान। रवीन्द्र के गान में आत्मा की अभ्यर्थना है। यह जब लिख रहा हूं, जेहन में रवीन्द्र संगीत अमृत रस घोलने लगा है, ‘आमि तोमारो शौंगे बेंधेछी आमारो प्राण शूरेरो बांधोने...तुमि जानोना आमि तोमारे पेयेछि अजाना शाधोने...’ और ‘स्वर्ग हइते बिदाय...’, ‘आजि झोझेर राते तोमार अभिसार...’ गीत और भी है। सुनते हैं तो दर्शन की गहराईयों में उतरने लगते हैं। अनुभूतियों का अनुठा भव जो वहां है। भावांे के अनुभव का भव।
अकेलेपन का गान। किसी के साथ की जरूरत वहां कहां है। रवीन्द्र गान का यही तो संदेश है, ‘जदि तोर डाक सुने केउ ना आरने तबे एकला चलो रे...’। यदि कोई साथ नहीं आता है तो कोई बात नहीं। अकेले चलो। चलते चलो। कोरा गान नहीं बल्कि अंर्तमन संवेदनाओं की भावाभिव्यक्ति। आनंद का गान। कलाओं के मर्म को जो गहरे से जीता है, वही रच सकता है ऐसा कालजयी संगीत। इसीलिये तो रवीन्द्र कालजयी हैं। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम कलाओं के वे साधक, संवाहक हैं।


Saturday, January 21, 2012

सुर चिंतन का अद्भुत गान

संगीत के सात स्वर षडज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद हैं। सा रे ग म प ध और नि इन्हीं के पहले अक्षर से बने हैं। नाद से स्वर और स्वरों से सप्तक तैयार होता है। राग संस्कृत की धातु ‘रंज्’ से बना है। रंज माने रंगना। सात स्वरों से रंगना। उस्ताद अमीर खा़न को सुनते संगीत के सातों स्वरों में अर्न्तनिहित को गहरे से समझा जा सकता है। कहें सुर चिंतन है उनका गान। पहली बार सुनेंगे तो उनके गान की दुरूहता से कुछ झल्लाहट होगी। धीमी आलापकारी में उनकी बढ़त, स्वर विवर्धन की तान एकबारगी सुनने वाले के धैर्य की परीक्षा भी लेती है परन्तु जैसे-जैसे उनके स्वरों की गहराई से साक्षात् होता है, स्वर सम्मोहन से हम घिरने लगते हैं।
किराना घराने के अधिकांष संगीतकार इस बात पर सदा ही जोर देते रहे हैं कि खयाल गायकी में शब्दों का खास कोई महत्व नहीं होता परन्तु अमीर ख़ान ने कभी इससे इतेफाक नहीं रखा। उनकी गायकी शब्द का ओज है। अज्ञेय का कहा अनायास जेहन में कौंधता है, ‘षब्द ब्रह्म है।’ वह गाते नहीं संगीत की अनंतता के सागर की जैसे सैर कराते हैं। चौनदार खयाल गायकी की उनकी रागदारी भीतर के हमारे खालीपन को जैसे भरती है। द्रुत तीन ताल में उनका गाया ‘गुरू बिन ज्ञान...’ कानों में गूंजने लगा है। वह गा रहे हैं और शब्दों में निहित भावों की गहराई सुरों से जैसे दिल में उतरने लगी है। शब्दों में निहित संवेदना के सुरों से मन में अवर्णनीय सुकून होता है। रागों के निभाव में लयकारी और तानकारी की जो मौलिक सृष्टि अमीर ख़ान करते हैं, उसे बस अनुभूत भर किया जा सकता है। भिंडीबाजार घराने की खयाल गायकी की जिस धीमी गत को उनकी गायकी की मेरूखंड पद्धति कहा जाता है, मुझे लगता है वह पूरी तरह से संस्कारित अमीर ख़ान की गायकी से ही हुई। चौदहवीं शताब्दी के सारंगदेव लिखित संस्कृत ग्रंथ संगीत रत्नाकर में मेरूखंड पद्धति का उल्लेख मिलता है। खान साहब इसी पद्धति में आलाप की बढ़त करते। सधी हुई स्वर लहरी, तान और मींड की मिठास।
यह जब लिख रहा हूं बैरागी का उनका खयाल ‘मन सुमिरत निस दिन तुम्हारो नाम...’, ‘लाज रख लिज्यौ मोरी,...तू रहीम राम तेरी माया अपरम्पार...’ गान भी मन में घर करने लगा है। अद्भुत सुर दीठ। नवनिर्मिती की लगन और अनुपम कल्पनाषक्ति।
बहरहाल, यह वर्ष अमीर ख़ान का जन्मषती वर्ष है। उनके गान की सूक्ष्म कलात्मकता पर जाते गौर करता हूं, स्वर के सभी संभव क्रमचय और संचय वहां है। भावों का रस वहां है। शुद्ध रस। बगैर किसी मिलावट का रस। फिल्मांे में गाये उनके गान को ही लें। नौषाद साहब के लिये ‘बैजू बावरा’ में राग पुरिया धनश्री में ‘तोरी जय जय करतार...’, बंसत देसाई के संगीत निर्देषन में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ (राग अदना) का उनका गाया शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ सुनते हैं तो लगता है स्वर शुद्धता के साथ शब्दों में निहित भावों को वह अपने गान में गहरे से जीते थे। फिल्मों में उन्होंने गाया परन्तु संगीत की शुद्धता से वहां भी उन्होंने समझौता कहां किया! कभी उस्ताद अमीर खान के कहने पर ही स्वर कोकिला लता मंगेषकर ने एक वर्ष तक मौन व्रत धारण किया था। कहते हैं, ऊंचा सुर लगाते स्वर यंत्र में परेषानी के कारण लता को अपनी आवाज फटती हुइ महसूस हुई। अपनी यह परेषानी लेकर तब वह उस्ताद अमीर खान के पास पहुंची। अमीर खान साहब ने सलाह दी कि वह छह माह तक मौन रहे और एक साल तक कोई गाना न गाये। लता ने यही किया। मौन व्रत के बाद वर्ष 1962 में लता ने ‘बीस साल बाद’ में ‘कहीं दीप जले कहीं दिल..’ गीत गाया। इसके लिये उन्हें तब सर्वश्रेष्ठ पार्ष्वगायिका का सम्मान मिला।
अषोक वाजपेयी का लिखा जेहन में कौंध रहा है, ‘अपने समय से प्रायः उदासीन और निरपेक्ष लगते हुए भी संगीत काल से संवाद है, वह काल को संबोधित है।’ अमीर खान का गायन काल को संबोधित ही तो है।


Friday, January 13, 2012

संस्कृति का संस्थापन नाद

मकर राशि में सूर्य का संक्रमण यानी मकर सक्रान्ति। इससे पहले दक्षिणायन होता है। माने देवताओं के शयन का समय। सक्रान्ति के बाद होता है उत्तरायण। बसन्त आगमन का आभाष। देव जागने का समय। प्रकृति इसी समय सुनाती है जीवन का संदेश। शुरू होता है शुभ और मंगल का उल्लास।
पतंगबाजी का कला पर्व भी तो है मकर सक्रान्ति। हर ओर, हर छोर उड़ती पतंगे आसमान के कैनवस पर इस दिन अनूठे रंगों की जैसे सर्जना करती है। कहीं डोर संग लटकती कन्नी तो कहीं लहराती कटी पतंग। फर्र फर्र उड़ती भांत-भांत की पतंगे। जयपुर के महाराजा रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में सिटी पैलेस में देश-विदेश के पतंगों के संग्रह के लिये बाकायदा कभी पतंगखाना भी बनवाया गया। पतंग उड़ाने का इतिहास हकीम लुकमान से भी जुड़ा है तो नवाबों की पतंगबाजी के किस्से भी कम मशहूर नहीं है। पतंग उड़ाई में वाजिद अली शाह भी कम निष्णात न थे। हर साल पतंगबाजी के लिये वह अपनी टोली के साथ दिल्ली आते और आसमान पतंगों से भरते। पतंग उड़ाने के आशिक अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर भी रहे हैं। जयपुर मकर सक्रान्ति पर पतंगमय होता है तो मेरे अपने शहर बीकानेर में अक्षय तृतीया पर आसमान में किन्नों के पेच भिड़ते हैं। राव बीका ने बीकानेर की जब स्थापना की तो खुशी में एक बड़ा सा चिन्दा उड़ाया। चिन्दा माने बड़ी पतंग। बस तभी से मकर सक्रान्ति की बजाय वहां मई-जून की भीषण गर्मी में पतंगे उड़ाने का रिवाज हो गया जो आज भी चल रहा है।
बहरहाल, मकर सक्रान्ति से पहले ही इस बार जवाहर कला केन्द्र की एक कला दीर्घा पूरी की पूरी पतंग के अनूठे कला उत्सव से सराबोर थी। प्रदेश के प्रयोगधर्मी कलाकार गौरीशंकर सोनी ने संस्थापन में उत्सवधर्मिता की अद्भुत सौन्दर्य सृष्टि की। कला की उसकी इस दीठ में अनुभव और विचार का कैनवस पर ही नहंी बल्कि चर्खी, पतंगों पर भी गजब का रूपान्तरण हुआ। कलादीर्घा में भांत-भांत की छोटी-बड़ी पतंगे। एक बड़ी सी और बहुत सी छोटी टंगी चर्खियां। चर्खियों पर मंडा रेखाओं, रंगो का उजास। कैनवस की अमूर्त-मूर्त आकृतियों पर करीने से टंगा मांझा। मांझे की लछियां और लछियों की जैकेट। मांझे की रंग-बिरंगी गंेदे। गौरीशंकर ने मन मंे उड़ती उमंग, उल्लास के प्रतीक रूप में पतंगों को संस्थापन कला के बहुविध आयाम दिये तो चर्खी पर उकेरी सामयिक-एतिहासिक प्रसंगो से जुड़ी आकृतियों के भी अनूठे बिम्ब दिये।
हमारे यहां संस्थापन यानी इन्स्टालेशन का बेहद पुराना इतिहास रहा है। दुर्गा और गणेश विसर्जन के साथ ही जनमाष्टमी पर सजने वाली झांकियां आदि सभी में संस्थापन ही तो है। अतुल डोडिया, विवान सुन्दरम, सुबोध गुप्ता, अर्पणा कौर सरीखे कलाकारों ने संस्थापन को सामयिक संदर्भ दिये हैं। विडम्बना यह भी है कि इधर अधिकांश हमारा संस्थापन पश्चिम से ही प्रेरित हो रहा है। तकनीक का ही वहां बोलबाला जो है। ऐसे में आधुनिकता के साथ परम्परा के संस्कारों की गौरीशंकर सोनी की कला को देखकर बेहद सुखद भी लगा। गौरीशंकर ने पतंग, डोर, चर्खी को भिन्न आयामों में एक छत के नीचे एक अवकाश में रखते संस्थापन की अद्भुत दीठ दी। विषय-वस्तु और फॉर्म का सोनी का संयोजन विचार में रूपान्तरित होता जिस परिवेश की सृष्टि करता है उसमें उत्सवधर्मिता के अनूठे रंगों का औचक अहसास होता है।
संस्थापन स्थापत्य से जुड़ी कला है। कलानुभव के स्थापत्य से जुड़ी कला। बहुत सारी चीजों को तकनीक के जरिये बेतरतीब बिखरा देना, उनसे चमत्कारिक परिवेश की तलाश करना संस्थापन हो सकता है कला नहीं। कला माने कोई दीठ। ऐसी जो सोचने पर विवश करे। इस दृष्टि से गौरीशंकर का यह संस्थापन कला का अनूठा सौन्दर्य भव लिये है। इसलिये कि वहां पहले से आ रही उत्सवधर्मी हमारी परम्परा का सामयिक कला पोषण है। संस्कृति से जुड़े सरोकार वहां हैं। पश्चिम से प्रेरित संस्थापन नहीं बल्कि उत्सवधर्मी संस्कृति का देशज नाद। गौरीशंकर सोनी का भव्य रंग, रेखा संस्थापन नाद।

Friday, January 6, 2012

कैनवस पर सौन्दर्य संवेदना का गान


चित्र माने आकार की भाषा। सोचिए! सूक्ष्म और स्थूल आकार पर यदि किसी रंग का नाम लिख दें तो क्या वह आकार उस रंग में दिखाई देगा! नहीं ही दिखाई देगा क्योंकि चित्र की भाषा शब्द नहंी आकृति और रंग है। चित्रकला दृष्यकला इसीलिये तो है कि यह पढ़ने या सुनने की चीज नहीं देखने की चीज है। अर्थ नहीं अर्थ संकेत वहां सौन्दर्य के संवाहक जो होते हैं।

बहरहाल, कलादीर्घाओं में मूर्त-अमूर्त चित्रों से रू-ब-रू होते सौन्दर्य को इतने आयामों में अनुभूत किया है कि लिखूंगा तो न जाने कितने पन्ने भर जाए। अभी बहुत समय नहीं हुआ, कलानेरी कला दीर्घा में डॉ. सुमन एस. खरे की कलाकृतियां का आस्वाद करते लगा यथार्थ का कैनवस में वह अपने तई रंग और रेखाओं से पुनराविष्कार करती हैं। जल, जंगल और जमीन के साथ ही पषु-पक्षी, लोक कलााओं का उजास और उत्सवधर्मी हमारी संस्कृति में निहित संवेदना को भी समझ के गहरे रंग, रेखाएं खरे ने दी है। आकृतिमूलकता में सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि। रंगों का अनूठा लोक। बिंबो की सघन श्रृंखला में लोक कलाओं का उजास। संवेदनाओं के अनुभव का यही तो है भव।

कैनवस पर बरते डॉ. सुमन एस. खरे के रंग बहुत से स्तरों पर भले यथार्थ से परे हैं परन्तु उनमें जीवंतता है। मयूर आकृतियों को ही लें। असल रंगों की बजाय मोर को बहुतेरे दूसरे रंगों में नृत्य करते दिखाया गया है परन्तु यह ऐसे हैं जिनसे हमारी दीठ का विस्तार होता है। माने रेत नहाता, रेत पर लोटता रेत रंग लिये मोर। पंख फैलाता और औचक घुमाकर अपने को ही देखता मयूर। मेघ मल्हार में नृत्य करते से भिन्न है यह मोर। मयूर की भिन्न स्थितियों को परोटते कैनवस पर खरे जैसे रंग सृष्टि करती है। प्रकृति के सौन्दर्य की रेखाओं और रंगों में यह गत्यात्मक लय है। इसलिये कि उनमें ध्वनित मयूर संस्कृति के अनगिनत चितराम औचक हमारी स्मृति का हिस्सा बनने लगते हैं। चित्रकला, संगीत, षिल्प, स्थापत्य की हमारी संस्कृति में मयूर यत्र तत्र सर्वत्र है। राजस्थान में तो लोकगीतों की मिठास मोर महिमा से ही है। आबू के पहाड़ों पर बोलते मोर की सुरमयी अभिव्यंजना हो या फिर ढलती रात में कलेजे में फांस की तरह फंसती मोर की आवाज।...और मोर पखों के सौन्दर्य की तो बात ही कुछ ओर है। भगवान श्री कृष्ण का तो एक नाम ही मोर मुकुट बंषीवाला है। नाद, स्पर्ष, रूप, रस और गंध के पर्याय मोर के पांच रंग ही तो है। तलाष करें तो पाएंगे सौन्दर्य के तमाम भाव यहां है। षड्ज स्वर भी मयूर नाद ही है। षिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर है।...मोर की महिमा अपरम्पार। जितना कहें उतना ही कम।

बहरहाल, खरे की मयूर कलाकृतियों ही नहीं बल्कि प्रकृति से जुड़ी तमाम कैनवस आकृतियांे के सधे हुए स्ट्रोक भीतर की हमारी संवेदना को गहरे से जगाते हैं। लोक अभिप्राय के रूपांकन में वह मिट्टी, गोबर और तमाम दूसरे रंगों की ठेठ देसजता को भी कैनवस पर अपने तई परोटती है। सहज आकर्षित करते हैं उनके यह चित्र। सलेटी, धूसर रंगों का मोर यहां भले यथार्थ से परे भी है परन्तु वह हमें भाता है। ऐसे ही मणिपुरी, असमी, मराठी लोकनृत्यों के भांत-भांत के चितराम भी लुभाते हैं। मसलन बिहू नृत्य में लड़कियों के पार्ष्व में परिवेष की सघनता, जंगल की आग में हरियाली की दहक, पलाष के फूलों के चटखपन के जीवंत दृष्य।

स्वस्फूर्त गतिषील प्रकाष पुंज में खरे के चित्र हमसे जैसे संवाद करते हैं। भीतर की हमारी सौन्दर्य संवेदना का गान यहां है। प्रकृति का सांगीतिक आस्वाद। रेखाओं और रंगों की गत्यात्मक लय। कैनवस पर सहज ग्राम्य जीवन, प्रकृति के पल-पल बदलते रूपों, जंगल की वनस्पतियों की भांत-भांत दीठ। मुझे लगता है, रेखाओं की अन्विति में वह दृष्य के उस सौन्दर्य को गहरे से रूपायित करती हैं जिसमें प्रकृति का सहज गान है। मेघों की छटाएं यहां है तो दूर तक पसरी धरित्रि की हरियाली है। आकृति का बाह्य रूप ही यहां नहंी है बल्कि प्रकृति की सौरम की ताने-बाने में बुनावट है। प्रकृति सौन्दर्य के अपार का उनका यह चाक्षुष स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़त ही तो है। आप क्या कहेंगे!


Friday, December 30, 2011

लो, बीत चला है यह एक और साल!

लो, बीत चला है यह एक और साल! अनवरत चलती है समय की घड़ी। काल चक्र के पहियों पर किसका जोर! समय घड़ी के सूईयों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं बीते ने बहुत कुछ दिया है तो हमसे बहुत कुछ लिया भी है।
कला की दीठ से बीत रहेे वर्ष की यादें संजोता हूं तो मन में गहरा अवसाद घर करता है। ख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन, जहांगीर सबावाला के बिछोह का गम इस वर्ष ने हमें दिया तो भारतीय रंगमंच की महान विभुतियां बादल सरकार, सत्यदेव दुबे, गुरूषरण सिंह के न रहने का गहरा खालीपन भी हमें दिया है। संगीत सुनते उसे गुनते इस साल के पुराने पन्ने टटोलता हूं तो भूपेन हजारिका, पं. भीमसेन जोषी, जगजीत सिंह, उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर, सुल्तान खां, मकबूल साबरी, अजीत राय, उस्ताद असद अली खां, गोपीजी भट्ट जैसी संगीत हस्तियों की जुदाई का दर्द भी उसमें दर्ज पाता हूं।

बहरहाल, पिछले साल कला के रूझानों में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। चित्रकला की दृष्टि से जहां अंतर्राष्ट्रीय मुहावरे के चलते संस्थापन कला के नये तेवर हमारे समक्ष उभरे हैं तो भारतीय संगीत-वादन सरहदों की सीमा लांघते और परिस्कृत हुआ है। रंगकर्म में परम्परा के साथ आधुनिकता के मेल ने नयी जमीन भी तैयार की है। संगीत नाटक अकादमी ने इस वर्ष सुप्रसिद्ध कला समीक्षक, कवि प्रयाग शुक्ल के संपादन में ‘संगना’ पत्रिका के जरिये संगीत, नृत्य और नाट्य कलाओं पर प्रकाषन की महत्ती पहल की तो वर्ष के आरंभ में ही नेषनल मोर्डन आर्ट गैलरी में हुए अनिष कपूर के स्कल्पचर प्रदर्षन ने विष्व कला जगत में खासी हलचल मचायी। विज्ञान और कला के नये षिल्पाकाष में अनिष कपूर अपने कलाकर्म में वृहद विष्व को ही जैसे रूपायित करते हैं।

राजस्थान में इस वर्ष कलाओं में परम्परा के जड़त्व को तोड़ते बहुत से स्तरों पर नयी राहों का सृजन हुआ है। रंगकर्म की ही बात करें तो सुप्रसिद्ध रंगकर्मी भारत रत्न भार्गव के निर्देषन में संगीत नाटक अकादेमी के सहयोग से नाट्प्रषिक्षण के साथ रवीन्द्र मंच में नाट्य विधा के नये तेवर देखने को मिले तो अषोक राही, रणजीत सिंह के निर्देषन में मंचित नाटकों ने भी दर्षक उपस्थिति के नये रिकॉर्ड बनाये। नृत्य की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण यह भी रहा कि देष की सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली की अर्से बाद जयपुर में नृत्य वापसी हुई। अचल, चल थाट को कुषलता से बरतती प्रेरणा दर्षकों को अपनी प्रस्तुति से बांधती है। विभिन्न तोड़े टूकड़े उठाती वह विलम्बित में छेड़छाड़ की गत की मोहक छटा बिखेरती है।

बहरहाल, गोपीजी भट्ट के निधन से तमाषा परम्परा के एक युग का अवसान हो गया है। ताउम्र फक्कड़ जीवन जिये गोपीजी। रियासतों में पली-बढ़ी उनकी कला के सम्मान की अड़ी भी किसे थी! सुखद पहलू यह जरूर रहा कि निधन से कुछ समय पहले ही पिंकसिटी प्रेस क्लब में उनका जयपुर की तमाम कला संस्थाओं ने मिलकर सार्वजनिक सम्मान किया। पहल की रंगकर्मी ईष्वरदत्त माथुर ने। नमन गोपीजी! नमन।

चित्रकला के अंतर्गत वर्षपर्यन्त मूर्त-अमूर्त कलाओं की प्रदर्षनियां का सिलसिला जारी रहा परन्तु कलानेरी कला दीर्घा का उल्लेख यहां जरूरी होगा। इसलिये कि कलाओं पर संवाद का नया आगाज इस निजी कलादीर्घा ने अपने तई किया। सुप्रसिद्ध कला समीक्षक विनोद भारद्वाज को आमंत्रित कर कलानेरी ने रजा और मकबूल फिदा हुसैन पर बनायी गयी लघु फिल्में दिखाने के साथ ही कलाओं की दीठ पर उनका संवाद भी करवाया। जवाहर कला केन्द्र लोकरंग जैसे वृहद आयोजन के साथ ही संगीत, नृत्य, नाट्य की नयी नयी प्रस्तुतियों से पूरे बरस ही आबाद रहा परन्तु राजस्थानी सिनेमा उत्सव का आयोजन इस साल की खास उपलब्धि कही जाएगी। राजस्थानी सिनेमा के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर इसमें जहां विमर्ष हुआ वहीं दर्षकों को राजस्थानी सिनेमा की बेहतरीन फिल्में भी देखने को मिली। साल बीतते बीतते राजस्थान ललित कला अकादेमी को भवानीषंकर शर्मा और संगीत नाटक अकादमी को अर्जुनदेव चारण के रूप मंे अध्यक्षीय सौगात भी मिल गयी। बातें, यादें और भी है। लिखूंगा तो शायद विराम ही न हो। सो थमता हूं।...आईए, स्वागतातुर हों नये साल की भोर को। नयी भोर में आखिर कलाएं ही देंगी हमें रचनात्मकता का उजास!


Friday, December 23, 2011

अनंत अर्थ संभावनाओं का छायाकला आकाश

कहते हैं, जर्मनी के ज्योतिर्विद और वैज्ञानिक जॉन हरसेल ने 1839 ईस्वी में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में पहले पहल फोटोग्राफी शब्द का इस्तेमाल किया था। इससे पहले 1826 में फ्रांसीसी आविष्कर्ता निप्से ने विष्व का पहला फोटोग्राफ बनाया था। छायांकन कृति देखकर तभी पेरिस में चित्रकार-प्राध्यापक पॉल देलारोष ने यह कहा कि चित्रकला आज से मर गयी है तो ब्रितानी सैरा चित्रकार टर्नन ने भी इसे कला का अंत बताया था। फ्रांसीसी कवि बोदलेयर ने तो फोटोग्राफी को अन्य कलाओं की दासी तक की संज्ञा दी थी परन्तु संयोग देखिये तकनीक की दृष्टि से बेहद संपन्न डिजिटल हुई आज फोटोग्राफी तमाम हमारे कला स्वरूपों का प्रमुख आधार बनती जा रही है। जो कुछ दिख रहा है, उसे हूबहू वैसे ही कैमरे में यदि उतार लेते हैं तो वह फोटोग्राफी ही होगी परन्तु यदि दृष्य मंे निहित संवेदना, उसके अनुभूति सरोकारों को भी यदि छायाकार कैमरे से अपनी दीठ देता है तो इसे फोटोग्राफी नहीं छायाकला ही कहेंगे। तकनीक तब कला का साधन होगी, साध्य नहीं। कहें तो यह छायाकला ही है जिसमें विस्तृत दृष्य को भी एक छोटे से आयतन में तमाम उसकी बारीकियों के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है तो लघुतम दृष्य को भी दुगने-तिगुने और उससे भी बड़े आकार में सहज दिखाया जा सकता है। थर्मोग्राफी के अंतर्गत अब तो यह भी होने लगा है कि आप किसी जीवन्त वृक्ष के पत्ते के कुछ अंष को काट कर उसके संपूर्ण भाग को दर्षा सकते हैं। इसे तकनीक का कमला कह सकते है परन्तु फोटोग्राफी का दूसरा सच यह भी है कि इसके जरिये यथार्थ में निहित तमाम हमारी दृष्य संवेदनाओं और अनुभूतियों का कला रूपान्तरण किया जा सकता है। शबीहों के लिये फोटोग्राफ का आधार नया कहां है!बहरहाल, इससे कौन इन्कार करेगा कि इतिहास कलाओं को जगाता है। फोटोग्राफी के इतिहास को इसी नजरिये से देखे जाने की जरूरत है। भले आरंभ में इसे कैनवस कला के दौर की समाप्ति के रूप में देखा गया परन्तु कालान्तर में इसने कलाओं के मोटिफों में जो सर्जनात्मक बदलाव किये उनसे ही कैनवस कला समृद्ध भी हुई। प्रकाष-छाया सम्मिश्रण के अंतर्गत जीवन से जुड़े दृष्यों, षिल्प सौन्दर्य की बारीकियांे में जाते दृष्यावलियों के जो आख्यान कैमरे ने हमारे समक्ष रखे हैं उनमें कला के गहरे सरोकार ही प्रतिबिम्बित हुए हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, जयपुर के जंतर-मंतर पर ख्यात ग्राफिक कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल की छाया कलाकृतियांे का आस्वाद किया था। छाया-प्रकाष और उससे आभासित स्पेस के अंतर्गत उन्होंने जंतर-मंतर की नयी सौन्दर्य सृष्टि की। प्रिंट मंेकिंगं के तहत जयकृष्णजी ने हमारे समक्ष दूरी की नजदीकी के साथ ही इतिहास के उस अपरिचय से भी परिचय कराया जिसमें दीवारों, सीढ़ियों और पाषाण यंत्रों से संबद्ध विषय-वस्तु को खंड खंड मंे अखंड किया गया है। छाया-प्रकाष की स्वायत्त सत्ता का अद्भुत रचाव करते उन्होंने अपनी इस कला में इतिहास, वर्तमान और भविष्य को जैस गहरे से बुना है। मसलन यहां पत्थरों का पीला रंग है तो प्रकाष से परिवर्तित इस पीले का लाल भी है। स्पेस से झांकते नीले आसमान के रंग की उत्सवधर्मिता भी यहां है अंधेरे में निहित रहस्य की बहुत सी परतें भी उघड़ती साफ दिखाई देती है। कैमरे से जंतर-मंतर की प्रतिकृति नहीं बल्कि सजीव सरल कला छवियों का बेहतरीन भव एक प्रकार से उन्होंने अपने तई तैयार किया है। प्रकाष-छाया सम्मिश्रण की उनकी इस कला अभिव्यक्ति में स्थापत्य के नये दृष्य आयाम है। इतिहास का मौन जैसे उनकी इस छायाकला में मुखर हुआ है। दृष्य की अनंत अर्थ संभावनाओं, संवेदनाओं के उनके इस आकाष में फोटोग्राफी के कला रूपान्तरण को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। सच! यह छायाकला ही है जिसमें वस्तुओं के रूप, टैक्सचर, आकार जैसी चक्षुगम्य लाक्षणिकता को यूं उद्घाटित किया जा सकता है। अब भी यदि फोटोग्राफी को कला नहीं कहेंगे तो क्या यह हमारी बौद्धिक दरिद्रता नहीं होगी!

Saturday, December 10, 2011

रेखीय आयामों का संवेदना आकाश



कलाएं हमें सौन्दर्य अनुभूति के आंतरिक चक्षु देती है। वहां जो दिख रहा है, वही सच नहीं रहता बल्कि उससे परे भी संवेदना का एक नया आकाष उभरता है। चित्रकला की ही बात करें। विषय-वस्तु सादृष्य की अपेक्षा वहां उसके अभिव्यंजक रूप में ही अधिक और सुदीर्घ असरकारी नहीं होते! अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में अब्दुल करीम के चित्रों से रू-ब-रू हुआ था। लगा, ज्यामीतिय संरचनाओं में कला के अनूठे सौन्दर्य लोक में पहुंच गया हूं। हर ओर, हर छोर रंग और रेखाओं के जड़त्व को तोड़ते वास्तविक सृष्टि का जैसे पुनःस्ािापन किया गया है। चटख रंगों से सजी उनकी कलाकृतियों का आस्वाद करते प्रकाष और रेखीय कोणों के नये संदर्भ भी अनायास मिले। मुझे लगता है, आत्मिक और विषुद्ध सौन्दर्य के बीच के द्वन्द में वह कला में प्रयोगषीलता का सर्वथा नया मुहावरा रचते हैं। यह ऐसा है जिसमें मानवाकृतियों को रेखीय आवरण में रंग, प्रकाष संवेदना के नये अर्थ हैं। अर्सा पहले पढ़ा कुर्बे का कहा औचक जेहन में कौंधने लगा है, ‘कला में कोई शैलियां नहीं होती, वहां केवल कलाकार होते हैं।’ 
सच ही तो है...अब्दुल करीम के ज्यामीतिय आकारों में बाह्य की बजाय उनके आंतरिक दर्षन की अनुगूंजे है। इन अनुगूंजों में छीजती मानवीय संवेदनाओं को अनुभूत किया जा सकता है तो आधुनिकता में रोबोटीय होते जीवन में घुलते परिवेष के रंगो की महीन परतें भी साफ देखी जा सकती है।
बहरहाल, अब्दुल करीम के कैनवस पर उभरी  बहुआयामी आकृतियों के बिम्ब-प्रतीकों में रेखाओं का सघन टैक्सचर है। नीले, पीले, हरे, लाल और चटख से धूसरित रंगों में आकृतियां स्पष्ट है परन्तु वहां संवेदना के अनगिनत रंग हैं। रेखीय आयामों की सामर्थ्य का वह जो कैनवस रचते हैं उसमें कला की किसी एक शैली की बजाय तमाम आधुनिक कला शैलियों का सांगोपांग मेल है। माने वहां मानवाकृतियों के साथ विज्ञान है तो सूक्ष्मग्राही सौन्दर्य संवेदना का भी अनूठा आकाष है। मूक व अचल वस्तु समूहों के साथ प्रकृति और जीवन का संगीत उनकी ज्यामीतिय संरचनाओं में सहज सुना जा सकता है। प्रायः सभी चित्रों में एक दूसरे को भिन्न अर्थों में काटती रेखाओं के कोण और उनसे झांकती मानव आकृतियां में कला का नया अर्थान्वेषण है। कलाकृतियों के साथ भीतर के उनके दर्षन की थाह लगाते औचक एक चित्र पर नजर ठहर जाती है। कैनवस के शीर्ष पर चांद है। ज्यामीतिय संरचना में कोण लिये रेखाओं और रंगो का अनूठा उजास यहां है। गौर करता हूं, प्रकाषीय किरणों की मानिंद जो प्रतीक और बिम्ब करीम ने इस चित्र में रखे है उसमें जैसे सृष्टि के गूढ अर्थ रूपायित हुए हैं। प्रकाष की रेखीय लय में  सहज सरल आकृतियां। एक प्रकार से प्रकृति की गूढ शक्तियों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति। ओपते रंग जैसे अभिव्यक्ति की उनकी अनुकूलता के संवाहक हैं। ऐसे ही एक चित्र में गहरे रंगों की लेयर में मानव मस्तिष्क के जरिये अध्यात्म की गहराई के साथ दर्षन के अनूठे चितराम हैं। कुछेक चित्र ऐसे भी हैं जिनमें प्रकाषीय रेखाओं के साथ अलंकार भी उभरे दिखाई देते हैं। सहज। हां, रंग और रेखाओं की उनकी बड़ी विषेषता ज्यामीतिय नियमबद्धता से युक्त चित्रकाव्यात्मकता है। अंतर्मन संवेदनाओं के साथ दर्षन की गहराईयां में उभरे ज्यामीतिय कोलाज  में वह कला का सर्वथा नया मुहावरा हमारे समक्ष रखते हैं। 
बहरहाल, अब्दुल करीम के चित्रों से रू-ब-रू होते पिकासो की याद आती है, जॅक्सन पोलाक याद आते हैं और ओरोस्को शागाल के नायाब चित्रों की कुछ स्मृतियां जेहन में कौंधती है। आखिर कलाकार स्मृतियां ही तो कैनवस में रूपान्तरित करता है। शैली का रूपान्तरण वहां नहीं होता। यही तो है कला की मौलिकता। इसी में तो कलाकार प्रकृति और जीवन को जैसा है वैसा ही देखने की बजाय आंतरिक चक्षु से सर्वथा नये ढंग से देखे जाने का आग्रह करता है। यह जब लिख रहा हूं, अब्दुल करीम के चित्रों में उभरे बिम्ब और प्रतीक फिर से मन को मथने लगे हैं। आप क्या कहेंगे!