Monday, September 12, 2016

उत्सवधर्मिता का आकाश


कलाएं अतीत, वर्तमान और भविष्य को पुनर्नवा करती है। और हां, वैयक्तिक मुझे लगता है, देखने और सुनने का संस्कार भी कहीं ठीक से मिलता है तो वह कलाएं ही हैं। जवाहर कला केन्द्र की कलादीर्घाओं में अक्सर जाना होता है। कुछ समय पहले चतुर्दिक कला दीर्घा में ‘कला चर्चा’ समूह के 26 कलाकारों की कलाकृतियों का आस्वाद सर्वथा नया अनुभव देने वाला था। भिन्न कला माध्यमों में कलाकारों ने जो सिरजा था, उसमें ठौड़-ठौड़ उत्सवधर्मिता को जैसे गहरे से जिया गया था। रंग-रेखाओं में कलाकारों ने प्रकृति को गुना और बुना था। और हां, कैनवस के साथ दूसरे माध्यमों  में भी जीवनानुभूतियों की व्यंजना कलाकरों ने इस प्रदर्षनी में की थी। एक खास बात यह भी नजर आई कि बहुत सी कलाकृतियों में लोक का आलोक था। माने स्थान-विषेष की लोक संस्कृति से जुड़े सरोकारों को भी कलाकारों ने अपने तई इस प्रदर्षनी में अंवेरा था। 
आमतौर पर समूह प्रदर्षनियांे में विषय विविधता के साथ रंग छटाओं की अनुभूतियां मन को रंजित करती बहुत कुछ नया देती है पर प्रायः सोचकर भी कलाकृतियों या कलाकारों पर चाहकर भी लिख नहीं पाता हूं। शायद इसलिए कि किसी कलाकार की कुछेक कलाकृतियों से उसके सृजन को समग्रता में नहीं कूंता जा सकता। पर ‘कला चर्चा’ के कलाकारों के उकेरे चित्रों को देखते बार-बार मन करता रहा कुछ लिखूं...पर चाह की राह कहां! याद आया, कभी सुप्रसिद्ध साहित्यकार विद्यानिवास मिश्रजी को अपना कविता संग्रह ‘झरने लगते हैं शब्द’ भेंट किया था। कुछ समय बाद उनका पत्र आया था जिसमें उन्होंने कुछेक कविताओं पर अपनी राय दी थी पर फिर यह भी लिखा था, ‘कविता घूंट घूंट आस्वाद का विषय है सो कर रहा हूं।’ ‘कला चर्चा’ समूह की कला प्रदर्षनी का आस्वाद करते हुए और बाद में भी कलाकृतियों पर विचारते विद्यानिवासजी के लिखे शब्द ही ज़हन में गूंजते रहे। कलाकृतियां भी घूंट घूंट आस्वाद के लिए ही होती है। ‘कला चर्चा’ के कलाकारों की कलाकृतियों में बरता रंग, परिवेष और रेखाओं की लय अभी भी मन में बसी है। बहुत सी में परिपक्वता की राह भी दिखाई दे रही थी पर महत्वपूर्ण यह भी था कि फूल-पत्तियों, आकृतिमूलकता में सृजन की राह पर आगे बढ़ते कलाकारों में सृजन में नया मुहावरा बनाने की उत्सवधर्मिता हूंस को गहरे से अनुभूत किया। माने तमाम नए कलाकारों ने जो कुछ सिरजा उसमें जीवन से जुड़े सृजन पलों के प्रति आभार झलक रहा था, रंग और रेखाएं जैसे इसकी गवाही दे रही थी।
छायांकन सौजन्य : ललित भारतीय 
बहरहाल, ‘कला चर्चा’ के अंतर्गत कलाकारों ने कैनवस पर भी बहुत कुछ सिरजा था पर कैनवस से परे भी कला का मोहक संसार वहां झिलमिला रहा था। अदिति अग्रवाल ने पक्षियों के छोड़े पंखों पर कल्पनाओं का ताना-बाना बुनते रंग रेखाओं का नया आकाष रचा था तो अजीत कुमार के छायांकन में दृष्य में निहित संवेदनाओं की घट-घट सौरम थी। ममता रोकना के चित्रो में लोक संस्कृति से जुड़ा जीवनानुराग खासतौर से दाय आया तो संजय कांति सेठ के मोबाईल छायाचित्रों में उभरी दृष्यानुभूतियां अभी भी मन मे ंबसी है। तमाम कलाकारों की कला साधना पर जाऊंगा तो न जाने कितने और पन्ने भर जाएंगे, इसलिए इतना ही कि समूह कला प्रदर्षनियो में वैविध्यता के साथ रंग-रेखाओं के राग का सर्वथा नया उजास कलाकारों ने अपने तई रचा था। मुझे लगता है, कलाओं से साक्षात् भी अपनी तरह की साधना है। आपने कोई चित्र देखा है, मूर्ति का आस्वाद किया है, नृत्य की भंगिमाओं को जिया है-तत्काल कुछ भाव मन में आते हैं-उसके प्रति। कुछ समय बाद फिर से आस्वाद करंेगे तो कुछ और सौन्दर्य भाव अलग ढंग से मन में जगेंगे। जितनी बार देखेंगे मन उतना ही मथेगा? ‘कला चर्चा’ की कलाकृतियों के बारे में भी कुछ ऐसा ही भव मन में निर्मित हो रहा है। एक और खास बात इस प्रदर्षनी के चित्रो ंकी साझा की जानी चाहिए कि इसमें संगीत, नृत्य और नाट्य से जुड़ी संवेदनाओं का भी ठौड़-ठौड़ वास था। शायद यही वह कारण था कि चित्रों का आस्वाद करते उत्सवधर्मिता की हमारी संस्कृति के बारे में भी मन बारम्बार जा रहा था।
प्रदर्षनी स्थल पर ही एक रोज वडोदरा के वरिष्ठ कलाकार अजीत वर्मा की सैंड कास्टिंग देखते लगा, वह मिट्टी-कंक्रीट में देखने का सर्वथा नया अनुभव-भव निर्मित करते हैं। उनकी षिल्प दीठ का आस्वाद करते मन रह-रह कर रामकिंकर बैज की कलाकृतियों को भी याद करता रहा। सैंड को दृष्य की अनंत संभावनाओं में रूपान्तरित करते अजीत वर्मा जी जैसे कला के उस आकाष में ले जाते है जहां जीवन को देखने का नजरिया औचक बदल जाता है। ऐसे ही नवल सिंह चैहान के रेखाचित्रों के आस्वाद के वह क्षण भी सुखद थे जिनमें गत्यात्मक प्रवाह की उनकी रेखाओं में परिवेष के साथ उकेरे पोट्रेट्स में चेहरे के भावों को गहरे से जिया गया था। डाॅ. वीरबाला भावसर के सैंड आर्ट डेमो के साथ ही हरिषंकर भालोटिया की कैलिग्राफी का आस्वाद भी तो अब तक कहां भूला हूं।
ऐसे दौर में जब कलाओं पर संवाद गौण प्रायः हो रहा है, यह महत्वपूर्ण है कि ‘कला चर्चा’ समूह ने कलाओ में विमर्ष की राह खोली है। संयोजक द्वय डाॅ. ममता रोकना और ताराचंद शर्मा स्वयं कलाकार हैं, सो उनके आग्रह पर समूह के कलाकारों से अनौपचारिक संवाद जब हुआ तो यह जानकर सुखद लगा कि समूह के देषभर के कलाकारो ंमें नया कुछ रचने की ही नहीं बल्कि कलाओं से जुड़ी अनुभूतियों पर जानने की भी अखूट ललक है। संवाद में कलकारों से कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा षिल्प के साथ ही कलाओं के अंतःसंबंधों पर अपनी अनुभूतियों को साझा करते, कलाकारों द्वारा जिरजे कला आकाष पर जाते यह भी लगा यह कलाएं ही है तो मन को रंजित करती हमें अंदर से संपन्न करती है। ‘कला चर्चा’ कलाकृतियों में नया कुछ रचने की दीठ से ही नहीं कलाओं मंे संवादधर्मिता को भी इसी तरह भविष्य में आगे बढ़ाएगी, इस उम्मीद के साथ...स्वस्तिकामना।


Tuesday, August 30, 2016

छायाचित्रों की कलाधर्मिता में रचा प्रकृति का रंगाकाश


कलाएं मन को रंजित करती है। शायद इसलिए कि वे हमारी संवेदना को चक्षु देती है। यथार्थ को सर्वथा नई दीठ से देने का एक प्रकार से संस्कार भी कलाएं ही देती है। छायांकन की ही बात करें। ब्रितानी सैरा चित्रकार टर्नर ने कैमरे के आविष्कार के समय कहा था कि फोटोग्राफी के आगमन का अर्थ है, कला का अंत। पर कला स्वरूपों की सृजन प्रक्रिया का आज छायांकन प्रमुख आधार है। न्यु मीडिया का तो प्रमुख आधार ही आज फोटोग्राफी ही है।
मुझे लगता है, छायांकन दृष्य संवेदना में अनुभव का सर्वथा नवीन भव निर्मित करती है। संवेदना से उपजी यह वह सर्जना है जिसमें देखने का हमारा ढंग बदल जाता है। दृष्य में निहित बाहरी ही नहीं बल्कि आंतरिक सौन्दर्य की भी दीठ इसमें निहित है। अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में छायाकार महेश स्वामी की छायाचित्र कला की एक सर्वथा भिन्न दृष्टि की प्रदर्षनी  का आस्वाद किया। लगा, दृष्य के साफ-सुथरेपन के साथ प्रकृति में घुले रंगो का उन्होंने बजरिए तकनीक सर्वथा नया आकाष रचा। कोई कह रहा था, खींचे गए छायाचित्रों से छेड़-छाड़ कर छायाकार ने दृष्यों को अपना निजत्व देते अधिक सुन्दर बनाने का प्रयास किया है। पर इसमें बुरा भी क्या है? तकनीक साधन है, साध्य नहीं। 
कैमरे से लिए गए छायाचित्रों को कलाकृतियो मेें रूपान्तरित करते यदि प्रयोगधर्मिता का ताना-बाना बुना जाए तो इसमें बुरा भी क्या है। और फिर कैमरे से लिए गए चित्रों में यदि हूबहू जो कुछ दिख रहा है वही दर्षकों का सच बनता है तो इसमे ंफिर कला क्या है? कला तो संवेदना की वह आंख ही है जिसमें छायाकार अपने तई दृष्यों को अंवेरता, उसे अपनी सूक्ष्म सूझ से रूपान्तरित करता है। एक समय में पिकासो, मातीस, सेजां, साल्वो आदि ने फोटोग्राफी से निरंतर प्रभावित होते स्वयं की कला के संप्रेषण माध्यम में इसका उपयोग किया भी तो है। और फिर यह भी तो सच है, छायाकंन मे ंयदि यथार्थ का ही अंकन होता है तो उसमे फिर कला कहां है? छायाकार यदि कलाकार है तो वह दृष्य में निहित उस सौन्दर्य से भी हमारा साक्षात् करा देता है, जो नंगी आंखों से चाहकर भी हम देख नहीं पाते। इसमें यदि प्रयोगधर्मिता का सहारा कलाकार लेता है तो यह तो जड़त्व को तोड़ने की सृजनधर्मिता ही हुई ना। इसी की तो कला में दरकार है।
छायाकार महेश स्वामी 
बहरहाल, महेष स्वामी की छायाचित्र प्रदर्षनी ‘दर्पण’ पर लौटता हूं। इस बार के उनके छायाचित्र देखने के हमारे चले आ रहे ढंग की लीक को तोड़ने वाले हैं। कहूं, एक खास तरह की एकांतिका उनके इस बार के छायाचित्रों में व्याप्त है। लॉन में पड़ी कुर्सियॉं, साईकिल और कूलर, गमले और यहां तक की दरवाजों तक के अकेलेपन के बावजूद उनमें रमी फूल-पत्तियों की गुनगुनाहट की सूक्ष्म अंर्तदृष्टि में इन छायाचित्रों में समय के अवकाष को गहरे से पकड़ा गया है। यह भी महज संयोग नहीं है कि प्रयोगधर्मिता लिए उनके छायाचित्रों में पेड़ों के हरेपन के बहाने दैनिन्दिनी उपयोग की वस्तुओं की छवियों को एक खास तरह का अर्थ दिया गया है। यह सही है, तकनीक के प्रयोग से महेष ने अपने इन छायाचित्रों को कैनवस पर सृजित कलाकृतियों सरीखा रूपाकार दिया है परन्तु महत्वपूर्ण इस सृजन का वह पक्ष है कि जिसमें प्रकृति से जुड़ी उनकी संवेदना को पंख लगे हैं।
उनके छायाचित्रों में गमलों में उगे पौधों, फूलों में निहित सौन्दर्य को असल में रूपक की तरह इस्तेमाल किया गया है। इसलिए कि कैमरे से जो कुछ आंख ने देखा, वही भर यहां सत्य नहीं है-उससे परे वह संवेदना भी है जिसमें प्रकृति को अपने तई गुना और बुना जाता है। छायांकन-कला की यह वह नवीन प्रयोगधर्मिता है जिसमें छाया-प्रकाष की कलात्मक सूझ के साथ रंग और रूप के मनः स्केच एक तरह से उकेरे गए हैं। मसलन पेड़ों से छाई हरियाली के हरेपन को, पतझड़ के पीलेपन को और सूर्ख गुलाब और दूसरे फूलों के रंगो को चुराते महेष ने अपने कैमरे की छवि की दृष्यात्मकता को सर्वथा नया आयाम दिया है। यह है तभी तो उनकी कैमरे से उकेरी छवियां यहां रंग-रूप का नया आकाष रचती देखने वालों में बसती है।
उनकी छायाचित्र प्रदर्षनी में प्रकृति एक तरह से वह दर्पण ही तो है जिसमें जीवन से जुड़े बिम्ब झिलमिलाते हैं। इनमें उभरे हल्के हरे, नीले, लाल, भूरे, काले रंगों का और रूप का अद्भुत उजास है। यह अनायास ही नहीं है कि उनकी इस श्रृंखला के छायाचित्रों को देखते हुए औचक वॉन गॉग की कलाकृतियों की याद आती है तो पिकासो के कला प्रयोग भी ज़हन में कौंधते हैं। कुछ इस तरह से कि प्रदर्षनी में देखने के बाद भी उनकी छाया-छवियां मन में सदा के लिए बसी रहती है। मुझे लगता है, महेष ने अपने इन छायाचित्रो ंमें अनुभूतियों को स्केचेज की अपनी प्रयोगधर्मिता में इस कदर सरल, सहज कैमरे से रूपान्तरित किया गया है कि कोने में पड़ी साईकिल, कार, सन्नाटे में पसरी कोई बेल, करीने से रखे हुए गमलों का लाल रंग और पक्षियों के लिए रखा पानी सदा के लिए हममें बस जाता है। इस छायाचित्र श्रृंखला का वह फोटोग्राफ तो अद्भुत है जिसमें खाली पड़ी कुर्सियों की के मौन को पीले उगे फूल स्वर दे रहे हैं। ऐसे ही एक फोटोग्राफ में बेल में उगे फूल जैसे देखने वाले से संवाद करते हैं तो दूसरे एक में हरे पत्ते और बारिष से नहाया आंगन जैसे मुस्करा रहा है। उड़ते पक्षियों की परछाई, एक स्थान पर एकत्र हरे तोते, पानी का रखा पात्र पर उसमें झांकती पेड़ की शाखाएं आदि की बिम्ब-प्रतीक व्यंजना के इन फोटोग्राफ्स में छायांकन कला के जरिए महेष स्वामी ने जैसे प्रकृति का रंगाकाष रचा है। जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं बल्कि उससे भी अधिक मन की अनुभूतियों को सहेजती, छाया-कला प्रदर्षनी के फोटोग्राफ दरअसल मौन में प्रकृति की गुनगुनाट सुनाती कलाकृतियां ही तो है।

Sunday, August 14, 2016

खुली किताब : यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'


यादवेंद्र शर्मा चंद्र से संवाद (1989)

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' राजस्थान के ऐसे साहित्यकार थे जिनके जीवन का कर्म और मर्म लिखना और बस लिखना ही था। लिखते बहुत से लोग हैं परन्तु चन्द्रजी जैसे विरले हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन या यूं कहें आजीविका मात्र लेखन के सहारे ही गुजारी। हिंदी और राजस्थानी में उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, संस्मरण आदि सभी विधाओं में उन्होंने विपुल सृजन किया। 

उनके सान्निध्य और दिए गए स्नेह की बहुत सी यादें हैं। याद करूंगा तो न जाने कितने पन्ने भर जाएंगे! यह १९८९ की बात है, जब उनका एक बड़ा साक्षात्कार मेंने किया और वह प्रकाशन विभाग की पत्रिका 'आजकल' में छपा था। बाद में उनके साथ 'राजस्थानी की कालजयी कहानियां' के संपादन का सुयोग भी मिला। नई धारा, इण्डिया टूडे, नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, नवज्योति आदि के लिए निरंतर मैंने उनके साक्षात्कार किए। 'जागती जोत' के लिए मित्र नीरज दईया के आग्रह पर कभी मैंने राजस्थानी में उनका बड़ा साक्षात्कार किया। इतना कुछ उनके बारे में सहेजा, संजोया है कि पूरी एक किताब प्रकाशित हो जाए। याद पड़ता है, उनकी साक्षात्कार की एक किताब का शीर्षक ही है, 'खुली किताब'। मुझे लगता है, चन्द्रजी भी सबके लिए खुली किताब थे।
उनसे पहली भेंट का किस्सा भी उनके बड़पन्न को बंया करने वाला है। याद है, तब कॉलेज में पढ़ता था और 'ब्लिट्ज' के लिए पत्रकारिता करता था। उनके उपन्यास की समीक्षा मैंने इसमें एक दफा की। शायद वह उनका लिखा राजस्थानी परिवेश का'रक्तकथा' उपन्यास ही था। समीक्षा में अपने होने को गहरे से जताते मैंने अनावश्यक अश्लील शब्दों, कथा विस्तार और शब्दावली आदि जुमलों से जैसे उसकी भरपूर खिंचाई की थी। सच में तो यह आसमान पर पत्थर फेंकने जैसा ही था। तय था, चन्द्रजी कभी मिलेंगे तो खबर लेंगे पर हुआ बिल्कुल उलट। एक रोज़ चन्द्रजी घर के बाहर से आवाज लगा रहे थे, 'यह राजेशजी का ही घर है?' मैं लपककर पहुंचा। वह शायद चेहरे से मुझे नहीं जानते थे पर जब मिले तो तुरंत कहा, 'तुम्हारे यहां चाय पीने आया हूं।' बातों ही बातों में वह मेरी लिखी समीक्षा पर आ गए परन्तु स्वर बिल्कुल संयत। बोले, 'अच्छी लिखी है पर अतिशयोक्ति से की है तुमने समीक्षा।' मैं जानता था, वह सही कह रहे हैं परन्तु बाद में उन्होंने इस बात को भी हवा में उड़ा दिया। यह तो बहुत बाद में पता चला सम्पादक उनके निकट के मित्र थे। चाहते तो वह सदा के लिए मेरा लिखना "ब्लिट्ज" से छुड़वा सकते थे। पर यह उनका बड़पन्न था कि उन्होंने संपादक श्री नौटियालजी से मेरी तारीफ की।....ऐसे बहुत से और भी किस्से हैं, जो उनकी उदात्तता के हैं। वह साफ मन के थे। बहुत प्यार देने वाले। 
जब भी बीकानेर जाता हूं, लौटता हूं तो चन्द्रजी के नहीं होने के खालीपन को लेकर ही लौटता हूं। इतना प्यार अब कौन दे? और शायद उन्होंने बिगाड़ भी दिया था कि जितना नेह वह देते थे, उतने से कम में अब पार नहीं पड़ती। नमन, चन्द्रजी। नमन!

Saturday, August 13, 2016

जब कलाएं पास आती है...'



कलाएं समय, समाज और परिवेश की एक तरह से सुघड़ व्यंजना है। सृजन के स्त्रोतों पर जाएंगे तो संस्कृति, परम्परा, इतिहास को वहां ध्वनित पाएंगे। अतीत और वर्तमान वहां साथ-साथ झिलमिलाता है। मुझे लगता है, बहुत से स्तरों पर कलाएं अतीत के जरिए भविष्य का किवाड़ भी खोलती हैं। कलाओं में अतीत यदि ध्वनित होता है तो इसका कारण शायद यह भी है कि अतीत का जो भी सुदंर है-मनभावन है, वह बचाया जा सके। अतीत से जुड़ी वस्तुएं सीढ़ी है-कला के सौन्दर्य तक पहुंचने की। इस सीढ़ी के जरिए ही पाई जा सकती है, नव्यतम दीठ। सोचता हूं, अपने अंतरतम तक पहुंचने का मार्ग भी तो है अतीत! 
विनय शर्मा मूलतः चित्रकार है परन्तु इधर अपनी कला में अतीत को सर्वथा नवीन दीठ से संजोया है। उनका कैनवस संगीत से जुड़ गया है, नृत्य की थिरकन उसमें समा गयी है और नाट्य की भंगिमाओं से उनकी कलाकृतियां जैसे दृष्य के अद्भुत आख्यान हमारे समक्ष रखती है। उनके स्टूडियो में बीते हुए कल को जीवंत करता अतीत ठौड़-ठौड़ जैसे बिखरा पड़ा है। पुराने जमाने की रोजमर्रा से जुड़ी भांत-भांत की चीजें उनकी कला का हिस्सा हैं। पुराने जमाने का ग्रामोफोन, टाईपराईटर, बड़ी सी दवात, झूले, झाड़ फानुस, ईरानी आईना, सूत कातते चरखे और गुजरे जमाने की याद दिलाते ढेर सारे रेडियो का अद्भुत संग्रह उन्होंने पिछले कुछ वर्षों के दौरान किया है। उनकी कलादीर्घा (स्टूतडियो) में प्रवेष करेंगे तो पाएंगे, एक कोने में बहुत सारे पुराने टेलीफोन यंत्र हैं। पुराना टेलीफोन बूथ और उसके बाहर लटकते ढेर सारे अलग-अलग समय के दूरभाष यंत्र। यही नहीं, बीते कल की फिल्मों के पोस्टर! अतीत से जुड़े ढेरों दस्तावेज। हर ओर, हर छोर। और हां, इन सबसे ही यहां अतीत जैसे रागायमान है। भले पुराने जमाने की चीजें यहां स्थिर हैं परन्तु उनमें लययुक्त गतियां हैं। गुम हुई आवाजें हैं और हैं स्मृतियां। 
चीजें स्थिर रहें, मौन रहें तो उदासी, सन्नाटा पसरता है पर कलाकर्म से उनमें ध्वनित होने की अनुभूतियां पैदा की जाए वह राग बन जाता है। ‘अतीत राग’। विनय शर्मा की स्टूडियो इस दीठ से मुझे ‘अतीत राग’ ही लगता है। इसलिए कि अतीत को अपनी कला में उनने गहरे से संजोया है। बीते हुए कल को अपने तई संवारते कैनवस पर ही नहीं संस्थापन की अपनी सूझ में भी उसे गहरे से जीया है। कैनवस पर रंग-रेखाओं के संग का पाष्र्व कुछ और नहीं पुरानी बहियां, स्टाम्प पेपर, जन्मपत्रियां, पुराने भोजपत्र और तमाम वह दस्तावेज जो कल की बात हो चुके हैं। सोचता हूं, अतीत से यह कैसा अनुराग है। नया काम पर अतीत से जुड़ा। कला की आधुनिक दीठ पर परम्परा का सांगोपांग मेल। संस्थापन की विनय की नव्यतम प्रस्तुति में चित्रकला के साथ संगीत, नृत्य, नाट्य में ध्वनित होते इतिहास में परम्परा का राग है तो आधुनिकता का अनुराग भी।
हाल ही में जयपुर आर्ट समिट में इस बार विनय शर्मा का संस्थापन विषेष आकर्षण का केन्द्र रहा। जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में एक कोना विनय के संस्थापन का था जिसमें अतीत से जुड़ी चीजों का विनय का कला संग्रह ही नहीं था बल्कि वहां अतीत दृष्य के साथ ध्वनित भी हो रहा था। वह सांझ सचमुच खास थी। विनय ने अपनी नव्यतम संस्थापन प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया था। पहुंचा तो देखा कलर पेलेट लिए ब्रष से ईजल पर रखे कुछ बनाते विनय दिख रहा था पर बहुत प्रयास के बाद भी कुछ शायद बन नहीं पा रहा था। कुछ न बना पा सकने की झुंझलाहट भी उसके चेहरे पर स्पष्ट दिख रही थी। औचक, विनय ने कैनवस पर ब्रष से कुछ बनाया पर फिर शायद उसे लगा, जो कुद वह सृजित करना चाहता है कैनवस उसके लिए पर्याप्त नहीं है। हमने देखा, अपनी पुरानी चीजों में से वह कुछ तलाष करने लगा। अपनी संग्रहित अतीत से जुड़ी वस्तुओं में से एक पुरानी लालटेन को अंततः उसने ढूंढ निकाला। लालटेन को रोषन कर वह फिर से ईजल के पास आया। रोषनी ईजल पर रखे कैनवस पर पड़ती दिखाई दी पर उसने कैनवस पर कुछ उकेरने की बजाय उसे हटा दिया। लालटेन की रोषनी ईजल पर फिर से थी, उजास में दिखाई दी कैनवस के पीछे छीपी वह मूर्तिनुमा मानवाकृति जो अब तक स्थिर, खामोष थी। 
लालटेन की रोषनी जैसे ही मानवाकृति पर पड़ी जैसे अब तक सोई उस मूर्ति में जान आई। रोषनी से पूरी तरह नहाते रंगपूति मानवीय आकृति जैसे जीवंत हो उठी। विनय ने कलर पेलेट से रंग उठाए और ब्रष से उस आकृति में और कुछ रंग पोत दिए। गणेष की सूंड। गजानन जैसे रंग-रेखाओं में जी उठे। गणेष वंदना के ध्वनित संगीत पर तभी नृत्यांगना झंकृति जैन की नृत्य भंगिमाएं भी जैसे परिवेष को जीवंत करने लगी। पुरानी चीजों के संग्रह में एक ओर नटेष के अभिनय में रंग-रेखाओं पूते अषोक बांठिया थे तो दूसरी ओर 51 लघु कैनवस पर उकेरी गणेष की भांत-भांत की मुद्राओं की विनय की कलाकृतियां थी। चित्रकला, नृत्य, संगीत और अभिनय का यह अद्भुत मेल था। इधर झंकृति का नृत्य थमा कि छत से लटके पुराने टेलिफोन के चोगों की घंटियां एक साथ बज उठी। विनय की कलाकृति बने अषोक बांठिया हैलो....हैलो...हैलो करते हैरान-परेषान फोन सुनते भांत-भांत के टेलिफोन यंत्रों की ओर लपकते हैं। उधर ध्वनियों का आकाष है। एक टेलिफोन पर प्रसन्न्ता का समाचार दिया जा रहा है तो दूसरे किसी में शोक समाचार का रूदन है, तीसरे किसी में प्यार और रोमांष की बातें हैं तो चैथे किसी में दैनिन्दिनी जीवन से जुड़ी कोई बात।...तब-जब मोबाईल नहीं थे, टेलिफोननुमा यंत्र जीवन को ऐसे ही तो स्पन्दित किया करता था। 
प्रख्यात रंगकर्मी, निर्देशक अशोक बांठिया 
नाटक जारी आहे! एक टेलिफोन पर गाना बनजे लगा है, ‘मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलिफोन, तुम्हारी याद सताती है...।’ यह टेलिफोन में गूंजरित रेडियो ध्वनि है। विनय के एकत्र रेडियो सैट जैसे इसी की याद दिलाते हैं। गीत पूरा होता है कि टन...टन...टन के घंटे बजते हैं। अभिनय कर रहे अषोक बांठिया हैरान होकर इधर-उधर देखते हैं। रंगपूती विनय की कलाकृति की बैचेनी साफ दिखाई देती है। इधर-उधर अतीत को जीवंत करती वस्तुओं पर लाईट घूमती है। औचक बड़ी सी दिवार घड़ी पर नजर जाती है। जीवित कलाकृति गौर से इस घड़ी को देखती है। घड़ी में रात के 9 बजने के साथ ही टन-टन-टन करते नौ घंटे भी बज जाते हैं। टिक...टिक...टिक करती एक नहीं अनेक घडि़यां दिखती है। अलग-अलग रूपाकारों में। पुराना समय जैसे इन घडि़यों में जीवित हो उठा है कि फिर से रेडियो से गीत बजता है, ‘सुनो गजर क्या गाए...समय गुजरता जाए।’ विनय की कलाकृति (अषोक बांठिया) इस गीत पर थिरकने लगती है। भावाभिनय  की अद्भुत व्यंजना! बांठिया के अभिनय में बीता हुआ समय जैसे ध्वनित होते देखने वालों को भी अतीत के किसी गलियारे में ले जाता है। लगता है, देखने वाले टाईम मषीन में बैठ गये हैं, समय पीछे लौट गया है। ...धीरे...धीरे कलाकृति पुराने जमाने की संग्रहित चीजों में जैसे अपनी ही तलाष करती है कि खर...खर की आवाज से उसका ध्यान भंग होता है। फिर से हैरानी...विस्मय के भाव कलाकृति के चेहरे पर दिखाई देते हैं। वह इधर-उधर नजर दौड़ाती है कि नजर पुराने जमाने के संग्रहित रेडियो सैटों पर पड़ जाती है। रेडियो के वाॅलियम और बैंड को मिलाने पर आकाषवाणी के समाचार सुनाई देने लगते हैं। रेडियो की आवाज समाचारों से होती हुई बहुत सी और रेडियो प्रस्तुतियां सुनाती है। इन प्रस्तुतियों में आजादी की लड़ाई के समाचार हैं, विचार हैं और लोकतांत्रिक राष्ट्र से जुड़े आख्यान-व्याख्यान की पुरानी रिकाॅर्ड ध्वनियां दर ध्वनियां हैं। इन ध्वनियां पर कलाकृति बने अषोक बांठिया का सहज, आवाज में निहित भावों को जीवंत करता अभिनय इस कदर प्रभावी है कि आंखे उनकी भंगिंमाओं पर ही केन्द्रित हो जाती है। ...पुराने जमाने के संग्रहित रेडियो की आवाजें धीरे-धीरे शांत होती है कि लाईट फिर से पुराने झाड़फानुस, टाईपराईटर, दवात, कलमों और दूसरी अतीत से जुड़ी जीचों पर केन्द्रित हो जाती है। इन्हें ही विनय ने इधर अपने कलाकर्म का माध्यम बनाया है। कलाकृति बने अषोक बांठिया इन चीजों में अपने होने की तलाष करते इधर-उधर हो रहे हैं कि फिर से कलाकार विनय पाष्र्व से लालटेन लिए आ जाते हैं। कलाकृति लालटेन के उजास को पाते ही फिर से ईजल की ओर लौटती उसपर कैनवस बनती थिर हो जाती है। शायद यह जताते हुए कि हरेक कला दूसरी कला से मिलकर ही पूर्ण होती है।
बहरहाल, विनय शर्मा के कलाकर्म पर विदूषी और अजय जैन की इस आधा घंटे की भावपूर्ण प्रस्तुति में कलाओं के अन्तःसबंधो को जैसे मुझ अंकिंचन ने गहरे से जीया। इस प्रस्तुति को देखकर कहीं पढ़ा हुआ ज्याॅं सेराॅ का वह कथन भी जेहन में फिर से कौंधता है जिसमें वह कहते हैं कि शब्दों से अगर चित्रों का अर्थ बताया जा सकता तो फिर चित्रकार को चित्र आंकने की क्या आवष्यकता होती। चित्रकला ही नहीं तमाम कलाएं अनुभव का अनूठा लिए ही तो होती है। कलाएं इसीलिए शरण्य है कि वहां कोई एक अर्थ नहीं अर्थ की अनंत संभावनाओं का आकाष होता है। बगैर उनमें रमे-बसे इस आकाष की थाह कहां कोई पा सकता है!
मौलिक दीठ के विनय के इस ड्रामा-इंस्टालेषन में रंग-रेखाओं को मानव शरीर पर जीवंत करते अतीत को वर्तमान से जोड़कर देखने की गहरी सूझ है। नाट्य अभिनेता, निर्देषक अषोक बांठिया के साथ मिलकर विनय ने संस्थापन के अपने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। 
अशोक बांठिया और  विनय शर्मा  
बहरहाल, कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा षिल्प है। षिल्प माने नृत्य, संगीत, चित्रकला, वास्तुकला, स्थापत्य और यहां तक कि हस्तकलाएं तक। विष्णुधमोत्तरपुराण का तीसरा खंड चित्रसूत्र है पर वहां चित्रकला ही नहीं है, प्रतिमाशास्त्र और मंदिर वास्तु पर भी विषद् विवरण है। नृत्य और संगीत के साथ नाट्य की मुद्राओं, भाव एवं रस आदि सहित समस्त कलाओं के पारस्परिक अंतरसंबंधों को अंवेरते यह बताया गया है कि एक कला को समझे बगैर दूसरी कला को समझा नहीं जा सकता। वैसे भी संगीत का उद्देश्य स्वरों की भाव सृष्टि से होता है और चित्र का उसमें निहित रूप-रेखाओं से। वास्तु या मूर्ति में पत्थर, काष्ठ या धातुओं में उसी रूप की प्रतिष्ठा होती है। और फिर वास्तुकला की तो सागीतिक भाषा तक बताई गयी है। इसीलिए कहें तमाम हमारी कलाएं कारू (उपयोगी) भी है और चारू (कलात्मक) भी हैं। सभी कलाओ को एक समान मानने का उद्देश्य सत्य का संधान तथा मानव जीवन को सौंदर्य एवं माधूर्य से परिपूर्ण बनाना ही तो रहा है। इस दीठ से विनय शर्मा का संस्थापन ‘अतीत राग’ मन को मथता है,  कलाओं के अन्तःसंबंधों की गवाही देता हुआ।                         

Sunday, August 7, 2016

मौन हो गया, कलाओं के अंतःसंबंधों का वह रंगाकाश

कालिदास ने रंगमंच को चाक्षुष यज्ञ की संज्ञा दी है और भरतमूनि ने इसे सामुदायिक अनुष्ठान बताया है। मुझे लगता है, कावलम नारायण पणिक्कर के नाटक इन कथनों को अपने तई जीवंतता प्रदान करते हममें बसते है। भावों की समग्रता में उनके नाटक रागबन्ध है। रागबन्ध माने रस के रूप में भावों की सुमधुर व्यंजना वहां है। उनकी नाटय प्रस्तुतियों पर विचारता हूं तो सहज कलाओं के अंतःसंबंधों के दृश्य माधुर्य को भी वहां पाता रहा हूं। इसलिए कि वहां नृत्य, भावभिनय है, गान और चित्रमय दीठ का सांगोपांग है। 
बहरहाल, भारतीय रंगमंच में पणिक्करजी का नहीं होना सदैव खलता रहेगा। उनके देहांत की सूचना जब मिली, तब श्रीनगर में था। विष्वास नहीं हुआ। भारतीय रंगकर्म में किए उनके प्रयोगों में ही मन बसा रहा। यह सच है, उनके नाटक कलाओं के अंतःसंबंधों की एक तरह से व्याख्या ही है। उनके कुछेक नाटकों का आस्वाद तो पहले भी किया था परन्तु जयपुर के रवीन्द्र रंगंमंच पर वर्ष 2013 में ‘रंग पणिक्कर समारोह’ के अन्तर्गत मंचित उनके नाटकों में मन अभी भी रचा-बसा है। कोई सप्ताह भर तक पणिक्कर जी का प्रवास भी इस दौरान जयपुर ही रहा, सो एक बार निरंतर दो घंटे और फिर टुकडों-टुकडों में नाटय और कलाओं पर महती संवाद का सुयोग भी हुआ। नाटय प्रदर्शन से पहले वह कलाकारों से संवाद करते, मंच के पार्श्व परिवेश में भी क्या कुछ पहले से नया हो सकता है, इसके लिए भी वह अपने तई जुटे रहते। तभी गौर किया, प्रकाश, ध्वनि और तमाम दूसरे नाटय उपादानों से भी वह निरंतर अपने को जोड़े रखते। मुझे लगता है, यह था तभी तो उनके निर्देशित नाटक रंगमंच की परम्परा के जडत्व से मुक्त होते संस्कृति के लोक सरोकार लिए जहन में सदा के लिए दर्षकों के मन में बसते रहे हैं। 
कावलम नारायण पणिक्कर छाया-चित्र  : महेश स्वामी
कावलम नारायण पणिक्कर निर्देशित नाटकों की अर्थ अभिव्यंजना ही नही उनमें निहित परिवेश भी समय की अधुनातन संवेदना से जुडा देखने वालो का मोहता रहा है। साधारीकरण में वह सौन्दर्य की वस्तु सत्ता से साक्षात कराते रहे है। उनका एक नाटक है, अवन वन कडिम्बा। सुप्रसिद्ध फिल्मकार जी. अरविन्दन ने इसे कभी उनके सहयोग से मंचित किया था। खुले रंगमंच पर वृक्षों की पृष्ठभूमि पर जब यह हुआ तो भारतीय रंगकर्म के लिए यह सर्वथा नवीन पहल थी। जयपुर में हुए संवाद में उन्होने इसका उल्लेख भी किया  और कहा भी कि प्रकृति से जुडी चीजों की मंच पर प्रयोग की सीख उन्हे जी. अरविन्दन से ही मिली। रवीन्द्र रंगमंच पर मालविकाग्निमित्र के मंचन में अशोक वृक्ष का जो चितराम उनके निर्देशन में हुआ, वह भी अदभूत था। अशोक वृक्ष, उसकी पत्तियां, शाखाओं के विरल दृश्य रूपान्तरण अभी भी जहन में बसे है। मुझे लगता है, मंचीय परिवेश की जीवन्तता की उनकी अनूठी सूझ है। नाटयकुलम की और से रंग पणिक्क्र समारोह में मध्यमव्यायोम कर्णभारम मालविकाग्निमित्र उत्तरामचरितम, थैया थैयम कलिवेशम नाटकों का मंचन हुआ। इनका आस्वाद करते लगा, वह भारत के विरल नाट्य निर्देशक है। ऐसे जो संस्कृत और दूसरे परम्परागत नाटकों के रूप में विधान से किसी प्रकार की छेडछाड नही करते। परन्तु उन्हें हुबहु वैसा ही नही रखकर उसमें अपनी सूक्ष्म दीठ से समय के संदर्भ पिरोते रहे है। बतौर नाटय निर्देशक रंगकर्म में उन्होने जोखिम भरे प्रयोग भी कम नही किए है। मसलन उनके बहुतेरे नाटकों में पात्र के साथ उसके छाया पात्र से दर्शकों का बार बार सामना होता हे। अंतर्मन संवेदनाओं, मन मंें घुमडते विचारों, खुद के खुद से होने वाले प्रश्नों और द्वन्द का मंचन आसान नही है। बल्कि कहे, इन सबके नाटय रूपान्तरण की जोखिम नाटक में कोई ले भी नही सकता। परन्तु यह जोखिम ही पणिक्कर जी के नाटकों की बडी विशेषता है। उनके नाटको में नह केवल  इस जोखिम को उठाया गया है बल्कि चरित्र का आत्म संवाद गहरे से अभिव्यंजित भी हुआ है।
छाया-चित्र महेश स्वामी
पणिक्कर जी के नाटकों में संकेतो के जरिये संवेदना का संम्प्रेषण तो है साथ ही नाटय दृश्य में पात्रों की भंगिमाओं से गढे गये अदृश्य का भी भावनात्मक रूपान्तरण है। इसीलिए उनके नाटक देखते हुए हमारे भीतर घटने लगते है।  भास रचित ‘मध्यम व्यायोम’ को ही ले। घटोत्कच जब वहां पहाड उठाने का अभिनय करता है तो लगता है, सच में उसने विशाल काय पहाड को अपनी भुजाओं में उठा लिया है। भले ही पहाड़ वहां विचार है। परन्तु पहाड़ उठाए पात्र को देखने लगता है, वह हमारे भीतर घटने लगा है। ऐसे ही इस नाटक में घटोत्कच और हिडिम्बा के उनके रण प्रयोगो में लोक अनुष्ठान्न है। भवभूति रचित ‘उत्तर रामचरित्रम’ की उनकी नाटय प्रस्तुति भी विरल है। यह राम के राज्य या अभिषेक के बाद सीता निर्वसन और फिर से मिलन की कथा है। रामायण की मूल कथा दुखान्त है। परन्तु भवभूति  की सुखान्त। पणिक्करजी के रंग निर्देशन में नाटक और नाटक के भीतर एक और नाटक जीवंत हो जैसे देखने वालो से संवाद करता है। 
बहरहाल, पणिक्कर जी ने अपने तई देष में नवीन रंग संस्कृति का विकास किया। ऐसी नवीन संस्कृति का जिसमे रंग कर्म संस्कृति से जुडी हमारी एक अनिवार्यता लगता है। नाट्यकर्म पर उनसे दीर्घ संवाद में नाटय शास्त्र की प्रासंगिकता के साथ ही आधुनिक रंगकर्म पर ढेरो बाते हुई है। वह नहीं है पर नाट्य में लोकधर्मिता के प्रयोगो पर और भारतीय रंगकर्म की स्थापनाओं पर उनसे हुए संवाद मन को निरंतर मथता रहा है। अनुभव संचित रंगाकाश में कलाओं के अंतःसंबंधों का अदभूत उजास संवाद में उनसे मिला। भारतीय रंगकर्म की चर्चा जब भी की जाएगी, पणिक्करजी की रंगधर्मिता के समय को भी याद किया जाएगा।

Sunday, July 24, 2016

सत्यम् शिवम् सुन्दरम


शिव माने कल्याणकारी। जो कल्याण करता है, वही तो इस जगत में सुन्दर है। और जो सुन्दर है, वही सत्य है। इसीलिए कहें ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम’ का उत्स भगवान शिव है। देह कहां सुन्दर होती है, सुन्दर तो वह स्वरूप होता है जो मन में बसता है। शिव निराकार हैं। सुखद अनुभूति प्रदान करने वाले। सुन्दरता का अर्थ भद्र और कल्याण का भाव है। सौंदर्य की अवधारणा आनंदानुभूति में ही तो है। सौन्दर्य में शुचि, शुभ और भद्र की समन्विति है। मंगल की भावना है। कहते हैं, सृष्टि से पहले न सत् ही था न असत्। आदिकाल में जब केवल अंधकार ही अंधकार था, न दिन था न रात्रि, न सत् यानी कारण था न असत् यानी कार्य। तब केवल निर्विकार शिव ही विद्यमान थे, ‘न सन्नासच्छिव एव केवलः।’ केवल एक निर्विकार षिव। 
आदि देव। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और आत्मा-अष्टमूर्ति  रूप से उपास्य। शिर पर गंगा और चन्द्र कला को धारण करने वाले। हाथ में त्रिशूल, डमरू लिए हुए भस्मी रमाये हुए। कभी दिगम्बर तो कभ व्याघ्र का चर्म वसन पहने हुए। त्रिपुर संहारक। भक्त मार्कण्डेय को बचाने के लिए यमराज की छाती पर पाद प्रहार करने वाले। विष्णु द्वारा एक हजार कमल अर्पण के संकल्प में एक कमल कम पड़ने पर स्वयं अपना ही नेत्रकमल उखाड़कर चढाने पर उन्हें प्रसन्न हो सुदर्शनचक्र प्रदान करने वाले भगवान शिव कोटि सूर्यप्रभः है। अखिल संसार की रचना करने वाले परमेश्वर। ज्ञान, वैराग्य के परम आदर्श। 
यह शिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्त्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए ही उन्होंने सुर सप्तक की रचना की। नादतनु कहलाए। शिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। शिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चौदह बार डमरू बजाया। इसी से चौदह शिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चौदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। मन में कल्पना होती है, नटराज शिव मगन हो नृत्य कर रहे हैं। सृष्टि के विकास में सभी प्रादुर्भूत सहायक शक्तियां वहां एकत्र है। ब्रह्मा ताल देते हैं। सरस्वती वीणा बजाती है। इन्द्र बांसूरी बजाते हैं और विष्णु मृदंग। लक्ष्मी गान करती है। भेरी, परह, भाण्ड, डिंडिम, पणन, गोमुख आदि अनद्ध वाद्यों से गुंजरित है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह इन पांच ईश्वरीय क्रियाओं का द्योतक नटराज का नृत्य ही तो है। शिव के आनंद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है और रोद्र ताण्डव के साथ ही संपूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाता है। 
मुझे लगता है, नटराज शिव केवल अपने वैभव, शक्ति, शांति, संयम में ही सर्वोत्तम नहीं है, वे समय और स्थिति के आध्यात्मिक अतिक्रमण के भी प्रतीक हैं। इसीलिए तो वह महादेव हैं। जहां कहीं भी ‘ईश्वर’ अथवा ‘ ईश’ शब्द बगैर किसी विशेषण के आया है उसका अर्थ शंकर ही तो है।...शिव का रूद्रावतार कला का पर्याय है। इसी अवतार में उन्होंने कभी नारद को संगीत कला का ज्ञान दिया था। नारद ने संगीत के पूर्ण ज्ञान के लिये भगवान शिव की तपस्या जो की थी। संगीत ही क्यों, शिव सभी विधाओं के आदि आचार्य हैं। इसीलिए तो कहा है, ‘ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः।’ 
सोचता हूं, अकेले शिव ही हैं जो नंग-धड़ंग पूजे जाते हैं। और कुछ नही ंतो लंगोटी की जगह चमड़े का टुकड़ा ही लपेट लिया। गहनों के नाम पर गले में सांप धारण कर लिया। चिता की राख लपेटे भी वह लुभाते हैं। उनकी सवारी भी कोई और नहीं सांड है। आप-हम उसके पास जाते हुए भी डरें। भंग-धतुरा उनका भोजन है। कंठ में विष की भंयकर ज्वालाएं। भूतभावन। समुद्र मंथन में जब हलाहल निकला तो उसे कौन पीए। भोले भंडारी ही आगे आए। दूषण हलाहल उनके कंठ में पहुंच भूषण बन गया। इसी से वह नीलकंठ कहाए। गंगा के प्रचण्ड वेग को कौन धारण करें? शिव यहां भी आगे। कर लिया अपनी जटाओं में उसे धारण। कलंकी चन्द्रमा किसके पास जाए! शिव ने उसे भी अपने सर पर स्थान दिया।...यही तो है शिव का सौन्दर्य। कला का अद्भुत रूप! शिव लिंग जहां है वहां शिव की मूर्ति कहां है! माने वह मूर्त भी है और अमूर्त भी। जिस भी भेष में, रूप मंे हम दर्शन करना चाहें, प्रकट हो वह दर्शन दे देंगे। षिव यानी सर्वव्यापी। सर्वेष्वर। निर्गुण, सगुण, निराकार और साकार। शब्द जहां पहंुच नहीं पाते, ऐसे हैं षिव। शब्दातीत। कहते हैं एक भक्त ने उनके बगल में पार्वती की पूजा करने से इन्कार कर दिया। षिव आधा पुरूष आधा नारी यानी अर्धनारीष्वर बन गए। इसीलिए तो आदि शंकराचार्य लिखी षिव लहरी की पंक्तियां जेहन में कौंध रही है, ‘सा रसना ते नयने तावेव करौ स एव कृतकृत्यः। या ये यौ यो भर्गं वदतीक्षेते सदार्चतः स्मरति।।’ वही जिह्म है जो षिव के विषय में बोलती है। वे ही आंखे हें जो षिव को देखती है। वे ही हाथ हैं जो सदा षिव की पूजा करते हैं। वह ही कृतार्थ है जो सदा षिव का स्मरण करता है।
श्रावण शिव का प्रिय मास है। इस मास में शिव से संबंधित किसी भी लीला का वर्णन शास्त्र-पुराणों में नहीं है पर शिव को यही मास प्रिय है। कहते हैं, हिमालय की पुत्री के रूप में जब सती फिर से जन्मी तो श्रावण मास में ही शिव की विधिवत् पूजा-अर्चना की। शिव प्रसन्न हो पुनः पति रूप में उन्हें प्राप्त हो गये। फिर क्या था। श्रावण शिव का प्रिय हो गया। आषुतोष हैं शिव। शीघ्र प्रसन्न जो होते हैं। श्रावण षिव का मास है पर पूजा-पाठ का लम्बा-चौड़ा ताम-झाम करने की जरूरत नहीं है। मन से भजें शिव को, वह त्वरित प्रसन्न हो परम अलभ्य भी सहज दे देंगे। बिना जन्म और बिना अंत के हैं शिव। ईश्वर  की तरह अनंत पर ईश्वर से भी असीमित। देवों के देव महादेव! अर्चना कर रहा है मन, ‘प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।’

Saturday, May 28, 2016

मनोरंजन में हो कलाओं का वास


 इस सोमवार को देशभर  में नर्सों ने एक टीवी चैनल पर उन्हें बेहद भद्दे ढंग से फुहड रूप में प्रस्तुत किए जाने पर कॉमेडियन कपिल शर्मा के खिलाफ नाराजगी जताते हुए उन्हें माफी मांगने के लिए कहा गया है। कॉमडी धारावाहिकों में ही नहीं इस समय में लगभग सभी मनोरंजन चैनलों में हास्य के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर शर्म आती है। भद्दे मजाक, चिरौरियां, रिष्तों को नेस्तनाबुद करते धारावाहिकों के बोल और इस कदर भोंडापन खुलेआम प्रस्तुत किया जा रहा है कि मर्यादा तार-तार हुई जा रही है। एक धारावाहिक है जिसमें मां समान भाभी को लेकर पूरी की पूरी कॉमेडी गढते फुहड़पन को जैसे पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया गया है। मनोरंजन के नाम पर टीवी चैनलों पर इस कदर सामग्री दी जा रही है कि उन्हें पूरा परिवार बैठकर एक साथ देखले तो एक दूसरे से आंख तक न मिला सके।
बहरहाल, मनोरंजन का अर्थ है, मन को रंजित करना। मन को रंगना। अतीत में जाएंगे तो पाएंगे, मनोरंजन का बड़ा आधार हमारी कलाएं रही हैं। सोचिए, इस समय मनोरंजन का जो दौर चल रहा है, क्या उससे मन वास्तव में रंजित होता है! फूहडता, भौण्डेपन में अनर्गल कार्यक्रमों से सजे हैं सारे के सारे टीवी चैनल। मंचीय कार्यक्रमों में चुटकुलों को कविता रूप में परोसा जा रहा है। विडम्बना यह है कि मन के बगैर रंजित हुए भी हम लगोलग देखे जा रहे हैं, सहन कर रहे हैं। विकल्प जो नहीं है! सवाल यह है कि ऐसा आखिर हो कैसे रहा है? सीधा सा जवाब है कि मनोरंजन में कला पक्ष की पूरी तरह से अनदेखी हो गयी है। मनोरंजन को हमारे सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़कर नहीं देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि कभी मनोरंजन की जो विधाएं समाज में पुष्पित और पल्लवित हुई हैं, उनके पीछे कलाओं का ही मजबूत आधार रहा है, और इधर हो यह रहा है कि मनोरंजन से कला पक्ष पूरी तरह से तिरोहित सा हो गया है।
बहरहाल, साहित्य के साथ मनोरंजन से जुड़ी कलाओं ने ही हमारी संस्कृति को बहुत से स्तरो ंपर समृद्ध किया है। कहानी कहने वालों का भी एक दौर था। हमारे यहां तो वैसे भी कहानी की परम्परा का लूंठा इतिहास है। विष्णु शर्मा रचित ‘पंचतंत्र’ को ही लें। ‘पंचतंत्र’ में कहानियां है पर कहन की कला का सौन्दर्य भी है। कुशल पारंगत गुरू मूढ शिष्यों को भी विवेकवान बना सकता है, यही इन कथाओं का आधार है। मूर्ख राजपुत्रों को जीव जंतुओं की कथा के जरिए नीति के महत्वपूर्ण संदेश इसमें दिए गए हैं। अकबर-बीरबल और तेनालीराम की कहानियां आज भी खत्म कहां हुई है!  मूल कहानियां तो पता नहीं किस तरह की रही है परन्तु जिसने जैसे चाहे उसमें बदलाव करके बीरबल, तेनालीराम की बुद्धिमानी को अपने तई व्यंजित किया है। पहेलियां भी मनोरंजन का बड़ा आधार रही है, और इसके सांस्कृतिक संदर्भ भी हैं। कभी दरड़ी ने ‘काव्यादर्श’ में सोलह प्रकार की प्रहेलिकाएं बतायी थी। कहते हैं उसी से बाद में खुसरो ने ‘बूझ पहेली’ और ‘बिन बूझ पहेलियां’ गढ़ी। मनोरंजन के अंतर्गत संगीत की बात करें ंतो धु्रवपद में ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ जैसे निर्थक शब्द भी कुछ इसी तरह से आए। कहते हैं अमीर खुसरो जब भारत आए तो उन्हें ध्रुवपद की भारतीय परम्परा बहुत भायी पर इसमें संस्कृत के श्लोकों को देख वह घबराए। खुसरो अरबी विद्वान थे। उन्होंने धु्रवपद में निर्थक शब्द ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ गढ़ कर तरह-तरह के हिन्दुस्तानी राग गाए। यही बाद में तराने हुए। 
कला-संस्कित का अभिजात दक्षिण भारत के कलात्मक रूप में परिणत हुआ है। आधुनिक मनोरंजन विधाओं का बहुत से स्तरों पर संस्कृतिकरण बाद में इन कलाओं ने ही किया। परन्तु बड़ी विडम्बना यह भी है कि आज के दौर में मनोरंजन का अर्थ पूरी तरह से हास्य से लिया जाने लगा है। सोचिए! हंसना ही क्या मनोरंजन है? हास्य मनोरंजन के एक पक्ष की स्थूल अभिव्यक्ति जरूर है पर यह पूरी तरह से मनोरंजन तो नहीं ही है। टीवी चैनल इधर यही कर रहे हैं। हंसाने के नाम पर दर्शकों को वहां निरंतर भोंडापन परोसा जा रहा है! माने वक्ट काटना है। कैसे भी कटे परन्तु वक्ट काटना क्या मनोरंजन है? वक्ट काटने के अर्थ में ही यदि मनोरंजन लें तो उसका परिणाम मन में उपजे क्षोभ, विषाद से अतिरिक्त कुछ न होगा। वक्ट कटे पर भौंडेपन से उपजे हास्य से नहीं, इस तरह से कि वक्ट से व्यक्ति ऊपर उठ जाए। मनोरंजन हो पर मन को रंजित करता। स्वस्थ मनोरंजन। कलाएं यही करती है। मन उनसे रंजित ही नहीं होता, सृजन के लिए निरंतर प्रेरित भी होता है। 
नाट्य, नृत्य, संगीत के ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक संदर्भ है। इन संदर्भों में जीवनानुभूतियां है। संस्कार हैं और है हमारी संपन्न संस्कृति का आधार। सोचिए! सांस्कृतिक संदर्भ खोकर आखिर कोई समाज कैसे आगे बढ़ सकता है! कालिदास ने रंगमंच को ‘चाक्षुस यज्ञ’ की संज्ञा दी थी। देखने के यज्ञ का अर्थ है, हमारी देखने के संस्कार की आहुति। कलाओं में गूंथा मनोरंजन व्यक्ति को संस्कारित करता है, संस्कृति के गुणों से लबरेज करता है। इस दौर में जबकि सांस्कृतिक मूल्य क्षीण हो रहे हैं, सबसे बड़ी आवश्यकता तो यही है कि हम मनोरंजन में कलाओं के वास पर गौर करें। ऐसा मनोरंजन जो खाली वक्त काटने के लिए ही किया जा रहा है, उसका कोई औचित्य नहीं है। 

Sunday, April 24, 2016

रंग-रेखाओं में ध्वनित संस्कृति छन्द


 भाषाई भिन्नता और परिवेष की असमानता होते हुए भी राम भारतीय संस्कृति में भावों के सुन्दर छन्द सरीखे है। यह है तभी तो कार्बी रामायण के राम आदिवासी रूप में लोक संवेदनाओं का उजास बिखेरते हैं तो वन में रहते वह कबिलाई संस्कृति के संवाहक भी कला में बनते हैं। इण्डोनेषिया, थाइलैण्ड, बर्मा आदि सुदूर देषों में राम की लीला है। फैजाबाद में अयोध्या शोध संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कला षिविर में बतौर कला समीक्षक भाग लेते यह जैसे गहरे से अनुभूत किया। देष के विभिन्न प्रांतों से आए 15 कलाकारों ने अयोध्या के राजा और स्थापत्य को केन्द्र में रखते हुए कलाकृतियों का सृजन किया। 
शिविर में मुम्बई के शार्दूल कदम ने अपनी कलाकृति में राम-सीता के जनजातीय स्वरूप के साथ ही अयोध्या के स्थापत्य की व्यंजना में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत गूड़ी पर्व को भी याद किया। अरण्य प्रवास के उनके चित्र रूपक में राम और सीता के पुष्प आभूषण अलग से ध्यान खींचते हैं। बड़ौदा के राहुल मुखर्जी वृहद विषयों का एक तरह से कैनवस रूपान्तरण करते हैं। उनके चित्र रूप गोठ हैं। उनके एक चित्र का आधार रामायण के सातों काण्डो से जुड़े प्रसंग है। दूसरे चित्र में रघुवंष की व्यंजना भी कुछ ऐसी ही है। गुवाहाटी के दिलीप तामुली ने असम के आदिवासी इलाकों में रची-बसी कार्बी रामायण के राम को अपने चित्र का आधार बनाते आदिवासी राम के चरित्र चित्रण को श्वेत-ष्याम में रचा। उनका चित्र ‘सबिन अलून’ माने राम का गाना है। हेलेन बाला ब्रह्मा भुवनेष्वर की हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता है, रेखाओं की ओपती लय और टैक्सचर। अपने एक चित्र में हेलेन ने स्वर्णमृग को उकेरा है। ओडि़सा की सुप्रसिद्ध सम्बलपुरी साड़ी के रंगो को कैनवस पाष्र्व बनाते उन्होंने स्वर्णमृग के बहाने रामायण को आख्यायित किया है। 
भोपाल की अपर्णा अनिल ने राम और अयोध्या के राजाओं की प्रतीक और बिम्बों में रेखीय व्याख्या की है। कैनवस में गहरा नीला रंग और उनमें रेखाओं में रचे तीर-धनूष के सुनहरेपन में उन्होंने राम की मर्यादापुरूषोतम छवि की जैसे दृष्य व्याख्या की है। उनके सृजित चित्र में बरते रंग अयोध्या के शासकों के साथ ही राम की असीम उदात्तता और घट-घट में व्याप्त उनके आदर्ष को जैसे व्याख्यायित करते हैं। मुझे लगता है, रंगो की उत्सवधर्मिता में अपने चित्रों में वह रेखाओं का जैसे छन्द रचती है। 
मुम्बई के डगलस जाॅन ने अपने कैनवस में अयोध्या नगरी और सरयू का सांतरा चितराम किया है। उनके चित्र में अयोध्या के प्रमुख स्थानों, मंदिरों, हिन्दु और मुगल स्थापत्य के साथ ही सरयू नदी को प्रतीक रूप में उकेरा गया है। दूसरे चित्र में चित्त को आकर्षित करते राम की मोहक छवि है। बहुत सारे गहरे रंग पर धीरे-धीरे परछाई स्वरूप में वह वह उन्हें इस कदर हल्का कर टैक्सचर का हिस्सा बना देते हैं कि उनकी सिरजी आकृतियों से औचक अपनापा होने लगता है। कोलकत्ता के दिप्तिष घोष दस्तीदार के चित्र देखने की हमारी बंधी-बंधाई सोच से जैसे हमें विलग करते हैं। दूर-लघू परिप्रेक्ष्य (परस्पेक्टिव) में वह चरित्रों को सर्वथा नए ढंग से हमारे समक्ष उद्घाटित करते हैं। उनके एक चित्र में धनुष-बाण लिए राम है तो दूसरे में सेतुबंध के दौरान मदद करने वाली गिलहरी को लिए राम है। दोनों में ही रेखाओं की लय अंवेरते उन्होंने राम के चरित्र और घटना विषेष के भावों की गहराई को छूआ है। 
पटना के मिलन दास ने लोक में व्याप्त राम-सीता को अपने तई कैनवस मं जिया है। टैक्सचर में बिहार की जनजातीय कलाओं, खासकर मिथिला कला का परिवेष रचते उन्होंने लिपियों की भाव सर्जना में राम लीला को ही जैसे उकेरा है। पीले, हरे, लाल, नीले, सफेद रंगो को कैनवस पर पोतने की बजाय वह जैसे बिखेरते हैं। रंग लय के साथ टैक्सचर में बुने राम और सीता और पाष्र्व में अक्षरों की बुनघट। लोक में गुंजरित रामकथा जैसे उनके कैनवस पर चलायमान है। उनकी कलाकृति बिहार की सुप्रसिद्ध कला मधुबनी  का समकालीनता में जैसे पुनराविष्कार है।
जयपुर के विनय शर्मा ने इस बार कला षिविर में सर्वथा नवीन प्रयोग किया। अयोध्या स्थित नया घाट में सरयू नदी के भीड़-भाड़ रहित एक तट को उन्होंने अपने कैनवस का हिस्सा बनाया। श्रीमदभागवत के नवें स्कन्ध में आए अयोध्या के चित्रण को आधार बनाते उन्होंने अपने दूसरे चित्र में सूर्यवंषी राजाओं की परम्परा, यज्ञ से जुड़ी भारतीय संस्कृति और अयोध्या के स्थापत्य अलंकरण को बिम्ब और प्रतीक में रखते हुए रंगो का जैसे छन्द रचा है। लखनऊ के अवधेष मिश्र ने लव-कुष द्वारा पकड़े गए अष्वमेघ यज्ञ के घोड़े को कैनवस पर जीवंत किया है। नीले, लाल, हरे, पीले, भूरे रंगों के घोल में रेखाओं की लय रचते अवधेष ने घोड़े के बहाने जीवन की गति और राम से जुड़ी आदर्ष की भारतीय संवेदना को अपने कैनवस पर जैसे मुखर किया है। उनके दूसरे चित्र में अयोध्या का षिल्प केन्द्र में है। इमारतों की बारीकी में जाते उन्होंने वृत्त में स्थापत्य प्रतीक मछली को भी कैनवस पर बुना है।
अवधेष के चित्रों में स्थान, परिवेष से जुड़ी संवेदना उनके बरते रंगों और रेखाओं में ऐसे ही ध्वनित होती है। चेन्नई के षिवा बालन ने अपने कैनवस पर अयोध्या के कनक भवन की भव्यता को उकेरा तो दिल्ली के एम.के. पुरी ने अयोध्या से भारतीय जन-जीवन के जुड़ाव के आलोक में राम के घट-घट में व्याप्त होने की दृष्य सर्जना की। लखनऊ के राजेन्द्र प्रसाद ने समाधिस्थ राम का चित्रांकन किया है। राम है पर तापस स्वरूप में। रंग और रेखाओं का उनका पाष्र्व तप की भारतीय संस्कृति का आख्यान स्वरूपा है।
बहरहाल, कला षिविर में सिरजे राम और अयोध्या के स्थापत्य विषयक चित्रों में रंगाच्छादन और मौलिक दृष्य प्रभाव कुछ इस तरह से है कि कला में रूप तत्वों का सांगीतिक आस्वाद होता है। भिन्न प्रांत पर राममय भारतीय संस्कृति को कलाकारों ने रंग और रेखाओं में  गहरे से जिया है। यह है तभी समालीनता की लय के बावजूद लगभग सभी चित्रों में पारम्परिक भारतीय चित्र शैलियांे की दीठ भी है और है, लोक कलाओं का अलंकरण। 


Tuesday, March 8, 2016

सांस्कृतिक नीति के लिए हो चिंतन


लोकतंत्र की परम्परा और उसकी विशिष्टता जनभागीदारी की सतत तलाश है और यह किसी भी समाज में कला, संस्कृति और साहित्य के स्वस्थ मूल्यों से ही हो सकती है। सोचता हूं, कलाओं का मूल आधार संस्कृति ही तो है। जीवन से जुड़े संस्कारों की नींव भी संस्कृति ही तैयार करती है। 
ऐसे दौर मे जब जीवन मूल्यों का ह्ास हो रहा है, यह जरूरी है कि संस्कृति से जुड़े सरोकारों पर हम विचारें। संस्कृति को जीवन के व्यापक संदर्भों से जोडने की पहल हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हो। स्वाभाविक ही है कि दूसरे कार्यों में इससे अपने आप ही शुरूआत हो जाएगी। सरकारी अकादमियां और संस्थाएं सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का कार्य कथित रूप में करती भी है परन्तु उनकी प्राथमिकताओं में संस्कृति से जुड़े पहलुओं का स्थूल रूप भर है। यानी साहित्य अकादेमी साहित्य के लिए, संगीत नाटक अकादेमी संगीत, नृत्य और नाट्य के लिए, ललित कला अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए कार्य करती है परन्तु संस्कृति इनसे ही नहीं है। संस्कृति समुदाय के आचरण से है। संस्कृति मनुष्य का व्यवहार और जीवन जीने का ढंग है। जैसे बीज हम बोएंगे-फल वैसा ही मिलेगा। सांस्कृतिक आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ जीवन को पोषित करती है। स्वाभाविक ही है कि इसके लिए सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही कार्य हो सकता है। 
संस्कृति और सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार प्राथमिकता रखते हुए इस ओर पहल करे तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। संस्कृति मूल्यों की सृष्टा और संपोषक है। साहित्य और कला अकादमियों के गठन और वहां पर अध्यक्ष, सदस्यों के मनोनयन या फिर किसी तरह के साहित्य, कला उत्सव करने से संस्कृति पोषित नहीं होती। साहित्य और कला के साधनों और सुविधाओं का विकास तो एक बात है परन्तु इससे भी बडी जरूरत यह है कि कलाएं अभिजात या फिर सीमित वर्ग तक की पहुंच के साथ तमाम जनता तक पहुंचे। स्वस्थ और दीर्घकालीन नीति यदि संस्कृति की बनती है तो उसमें साहित्य और कलाओं का ही नहीं व्यक्ति की सोच बदलने तक की ताकत है। यह बड़ी बात है पर पहली आवश्यकता तो अभी यही है कि प्रदेश की अपनी सांस्कृतिक नीति हो, ऐसी जिसमें साहित्य और कलाएं व्यापक संदर्भों से जुडे। 
साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं में जो मठाधीश लोग हैं, उनकी बजाय सर्जन के सरोकारों से जुडे मूल लोगों को जोडते हुए, उनसे परामर्श करते हुए राज्य की सांस्कृतिक नीति बनायी जाए। ऐसी सांस्कृतिक नीति जिसमें मायड भाषा राजस्थानी के लिए कार्य हो, जिसमें संगीत, नृत्य चित्रकला और खासतौर से लोक कलाओं का जमीनी स्तर पर संरक्षण हो। संस्कृति की जीवंतता किससे  है? अंतर्विरोधों की पहचान से ही तो! अच्छे-बुरे की समझ से। इसलिए जरूरी यही है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हुए हम एक सुनियोजित सांस्कृतिक नीति के तहत सांस्कृतिक हों। संस्कृति जिससे जीवंत हो जीवाश्म न बने। आखिरकार तमाम हमारी कलाओं और दर्शन पर संस्कृति का ही तो प्रभाव रहता है। वह समृद्ध होगी तो हम भी समृद्ध-जीवंत रहेंगे। 
यह बात याद रखे जाने की है कि सभ्यताएं बदलती है पर संस्कृति चिरंतन है। साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला, नाट्य आदि का नैतिकता से संबंध हो या न हो परन्तु विचार से निष्चय ही है। विचार के लिए हमें सांस्कृतिक होना पड़ेगा। पाठ्यपुस्तकों से संस्कारित करने का राग भले हम कितना ही अलापें परन्तु कोई भी विचार संस्कृति से जुड़कर ही संस्कारों का वाहक हो सकता है। इसीलिए जरूरी है, संस्कारों के लिए सांस्कृतिक नीति बने। 
हमारी संस्कृति ‘मनुर्भव’ में है। यानी मनुष्य बनें, में। मनुष्य बनने का संस्कार, ऊर्जा का स्त्रोत संस्कृति ही है। संस्कृति अपने व्यापक रूप में समाज की तमाम कलाओं, साहितय, ज्ञान, विचारधारा, सामाजिक, धार्मिक-प्रथाओं, कानून एवं क्षमताओं के साथ आदतों का मिला-जुला रूप ही तो है। इसी से व्यक्ति वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के आदर्ष निर्मित करता है। संस्कृति व्यक्ति नहीं, समाज की संपति है। हां, उसके स्वरूप-निर्माण और विकास में प्रत्येक व्यक्ति का कम या अधिक योगदान अवष्य रहता है। इसी कारण वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है या कहें हरेक की भागीदारी इसमें जरूरी है। इसीलिए कहें वही सत्ता सार्थक है जिसमें संस्कृति की सोच हो। संस्कृति में निवेष भविष्य का संचय है। मानवीयता के लिए निवेष है। समाजगत अपेक्षाओं की पूर्ति संस्कृति में निवेष के जरिए ही संभव है। कोई भी लोकतंत्र परिष्कृत तभी माना जाता है जब वहां प्रष्नवाचक संवाद हो। भौतिक जरूरतों के लिए ही नहीं, संस्कृति के लिए भी संवाद वहां हो। विडम्बना यह है कि संस्कृति के प्रष्न पर हम सभी मौन हैं। जबकि लोकतंत्र की मजबूती स्वतंत्र विचारों से हैं, बासी विचारों से नहीं। नवीन स्थापनाएं संस्कृति की समझ से ही हो सकती है।
अमेरिका में राज्य सीधे भले ही संस्कृति में निवेष नहीं करता पर काॅरपोरेट क्षेत्र को कर में छूट देकर संस्कृति में निवेष के लिए प्रोत्साहित करता है। ऐसा हमारे यहां भी हो सकता है। सांस्कृतिक नीति बनाई जाए, उसमें ऐसे प्रावधान किए जाएं कि आम आदमी की भागीदारी से हमारी संस्कृति पल्लवित-पुष्पित हों। यह भी ध्यान रखा जाए कि संस्कृति के लिए कार्य हो पर उसमें सरकारीकरण या किसी विषेष विचारधारा की दखल नहीं हो। केवल और केवल संस्कृति से जुड़ा विचार हो। शास्त्रीयता हो परन्तु उसमें लोक के बीज भी हों। सभी जन उसमें अपने लिए ‘स्पेस’ देखते अपनी भागीदारी स्वयं तय करें। सरकार का काम प्रोत्साहन देना भर हो। इसी से व्यापक रूप में हम संस्कृति से जुड़े सरोकारों से सराबोर हो सकेंगे। यह बात याद रखने की है कि संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है। यहां कोई है, रह रहा है या भविष्य में भी रहेगा तो केवल और केवल अपने बूते। कोई यहां अपनी पीठ आप ठोकता भी है तो उसे स्वयं के अधिकारों की लड़ाई चाहकर भी बना नहीं सकता। आखिर, यही तो है सच्चा लोकतंत्र! इस लोकतंत्र को मजबूत करते राज्य की सांस्कृतिक नीति तैयार किए जाने पर क्या विचार होगा?

Tuesday, March 1, 2016

अदेखे की दृष्य सर्जना

दृष्टिहीन बच्चों के छायांकन की चित्र प्रदर्शनी ‘ध्वनियां’

कलाएं कल्पना और अनुभूति का संयोजन है। आंतरिक चक्षु के समक्ष उद्घाटित होते भले कलाओं को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सके, पर वस्तुगत दृष्टि से जाना जा सकता है। छायांकन को ही लें। प्रकाश-छाया प्रभाव से सृजित इस कला में जो कुछ दृष्टि का सच है, वहीं नहीं संवेदना का मर्म भी उद्घाटित होता है। 
बहरहाल, अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र में दृष्टिहीन बच्चों के छायाचित्रों की प्रदर्शनी के बारे में पढ़ा था। लगा, बगैर दृष्टि कैमरे सेे कैसे दृश्य को संजोया जा सकता है! छायाकार मित्र महेश स्वामी एक रोज जिद कर प्रदर्शनी दिखाने ले गए। पहुंचा तब भी अनमनापन था, पर जब छायाचित्रों को देखा तो विश्वास नहीं हुआ। बगैर दृष्टि ध्वनियों ने जो सृजित करवाया, क्या वह इस कदर मोहक हो सकता है!  दृष्टिहीन बच्चों ने कैमरे से जो सिरजा उसमें प्रकृति में पसरे मौन की व्यंजना थी, नदी थी, नाव थी और था प्रकाश से टिमटिमाता लहरमय नीर। दृश्य और भी थे जिनमें कहीं बिखरे सूखे पेड़ की पत्ती, नदी की पाल पर रखी बैंच पर बैठे दो जन और पेड़ो की छांव के साथ प्रकृति की सौरम का छायांकन से रचा सौंदर्य था तो कहीं केवल कदमों की सरसराहट भर भी उनके कैमरे ने कैद की थी। एक छायाचित्र मैदान में बच्चों की खेलकूद भरी मस्ती को इंगित था तो एक में बाजार की हलचल थी। रेत, साईकिल, बरसात और परिवार से जुड़ी ध्वनियों  के आधार पर सृजित छायाचित्र देखने के भिन्न आयामों को जैसे हमारे समक्ष रख रहे थे। अचरज हुआ, आखिर कैसे बगैर दृष्टि के दृश्य संवेदनाओं के ताने-बाने को कैमरे से रचा गया होगा? पर पष्चिम बंगाल के दृष्टिहीन छायाकार अंजन, मिलन, फणी, दुलाल और टिंकू को छायांकन के लिए प्रेरित, दक्ष-प्रषिक्षित किया युवा फिल्म निर्माता, छायाकार और लेखक चन्दन राठौड़ और पद्मजा शर्मा ने। कभी नेत्रहीन छायाकार के बारे में फिल्म देखकर चंदन-पद्मजा के मन में दृष्ठिटीहन बच्चों से छायाकारी कराने का खयाल आया और दोनों ही इसके लिए प्रयास में जुट गए। उनके खयाल को बहुतेरों ने मजाक में उड़ाया तो कुछ को यह नागवार भी लगा। अंततः बंगाल के हुगली के सेवाडाफुली स्थित ‘सोसायटी फाॅर ब्लाइण्डस’ में यह दृष्टिहीन बच्चों को छायांकन के लिए तैयार करने की कार्यषाला हो पाई। लकड़ी के फ्रेम अी अनुभूति, अनुमान से दृष्यों को ध्वनि आधार पर पकड़ने और बहुतेरे ऐसे ही प्रयोग रंग लाए और अल्प समय में दृष्टिहीन बच्चों ने छायांकन कला को अपना लिया।
दृष्टिहीन बच्चों से उनके छायांकन अनुभवों पर संवाद हुआ तो लगा, उन्होंने ध्वनियों की अनुभूति से बाह्य सौंदर्य को आंतरिक चक्षुओं से उकेरा है। यह भी लगा आंख बहुत बार धोखा देती है, आप देखते हुए भी वह नहीं देख पाते जो महत्वपूर्ण होता है। इस दृष्टि से दृष्टिहीन बच्चों की ’ध्वनियां‘ चित्र प्रदर्शनी ने बहुतेरे स्तरों पर यह भी जैसे समझाया कि देखना आंखों से ही नहीं होता, हमारी साफ समझ से भी होता है। आखिर कलात्मक समझ परिवेश के अंतज्र्ञान के साथ समाप्त नहीं होती बल्कि वह इसे एक अर्थपूर्ण आकार देने का प्रयास ही तो करती है। 
मुझे लगता है ’ध्वनियां‘ प्रदर्षनी अनुभूतियों और कल्पनाओं का ऐसा सुरम्य ताना बाना है जिसमें छवियां प्रतिध्वनित हुई है। दृष्टिहीन विद्यार्थियों ने कैमरे के बहाने संवाद किया है- अदेखी प्रकृति से और जीवन से। उस दीठ से जो सदा उनके लिए अदीठ रही है, पर उनके कैमरे से हुए संवाद ने देख नहीं पाने की उनकी स्थाई चुप्पी को छायाचित्रों के जरिए एक तरह से तोड़ा है। आंख नहीं होने पर प्रकृति में बिखरे सौंदर्य और जीवन के सरोकारों से अलग-थलग होने की बाधा को जैसे समाप्त किया है। 
कैमरे ने कुछ अलग नहीं किया है, पर बाह्य जगत, दृश्य के भिन्न आयामों से इन छायाचित्रों के जरिए दृष्टिहीनों को आकाष दिया है। एक संवाद स्थापित हुआ है-ध्वनियों के जरिए दृश्य की अनंतता से। और उससे शायद न देख पाने की इनकी आंतरिक बेचेनी का शमन भी हुआ है। यह है तभी तो दृृष्टिहीन छायाकारों से संवाद में उनके छायांकन कला से जगे भीतर के उत्साह को अनुभूत कर सका। सहज सवाल संवाद में यह भी हुआ कि दृष्टिहीन ये बच्चे कैमरा लिए क्यों उस अदृश्य के पीछे भाग रहे थे जो उनकी आंखे नहीं देख सकती। जवाब मिला, ’कैमरे ने हमारी अनुभूतियों और दृश्य की कल्पनाओं को जीवंत करने का मार्ग दिया है। हम जो कल्पनाएं ध्वनियों के आधार पर करते रहे हैं, अनुभूतियों को संजोते रहे हैं, उन्हें छायाचित्रों के जरिए प्रकट कर रहे हैं। शब्द से जो बंया नहीं कर सकते, छवियां वह शायद बता रही हैै।‘
सच भी है, छायांकन कला की सांकेतिक भाषा है। कल्पना और अनुभूतियों से बाह्य परिवेश को फिर से नए रुप में सृजित करने की। इसके लिए बाहरी आंख की कहां जरुरत है! आंतरिक चक्षु ही पर्याप्त है। दृश्य के लिए समझ का साफ होना जरुरी है। कलाएं समझ को पाक-साफ ही तो करती है। दृष्टि वहां कहां बाधक है!

Wednesday, February 24, 2016

देखने, सुनने और गुनने का संस्कार देती कलाएं

कलाएं देखने, सुनने और गुनने का संस्कार देती है। खजुराहो नृत्य समारोह में 'कलावार्ता' के अंतर्गत दिए व्याख्यान के केन्द्र में यही सबकुछ साझा किया। 

सुखद लगा, विश्व के बेहतरीन नृत्य आयोजनोें में से एक 'खजुराहो नृत्य महोत्सव' कलाओं के अंर्तसंबंधों का संवाहक बनता जा रहा है। जब बोल रहा था, सुनने वालों में नृत्य से जुड़ी देश की प्रतिभाएं थी, चित्रकार थे, नाट्य कलाकार थे और थे साहित्य की संवेदनाओं से जुड़े वह रचनाकार भी जो कलाओं में सौंदर्य की मेरी अनुभूतियों का रस ले रहे थे। 

...कलाओं के विशाल भव से स्वयं भी तो निरंतर साक्षात् होता वहां अपने को संपन्न पा रहा था। कभी न भुला देने वाली अनुभूतियां सहेजे देह से लौट आया। ...मन की यात्रा तो अविराम है. 


Sunday, February 14, 2016

जीवनगत सरोकारों की बारीक पड़ताल


सुधीर तैलंग काटूर्निस्ट भर नहीं थे, उम्दा इंसान और संस्कृति के रेखीय पोषक भी थे। यह सही है, वह राजनीतिक विषयों को लेकर ही अधिकतर काटूर्न बनाया करते थे पर समाज के विदु्रप को भी वह अपनी पैनी नजर से अपने कार्टूनों में निरंतर उघाड़ते  रहे। याद है, देश में गणेश जी को दूध पिलाने की अफवाह जब तेजी से फैली और सारा देश गणेश मूर्तियों को दूध पिलाने में लगा था, उनका एक कार्टून आया। इसमें लंबोदर गणेश की तोंद बहुत अधिक बड़ी दिखाई दे रही है,। पास में उनका वाहन चूहा हंस रहा है और मदर डेयरी का टेंकर खड़ा दिखाई दे रहा है। वाहन चालक कह रहा है, ‘प्रभू! यह अंतिम टैंकर है।’(माने सारा दूध तो आपको पिला दिया गया है) उनके इस काटूर्न को लेकर अंधश्रद्धालुओं ने बवाल भी खूब मचाया परंतु सुधीर तैलंग ने समाजगत रूढि़यों को उघाड़ते अपनी रेखाओं की धार को कभी कुंद नहीं होने दिया।  
राजनीति के अंदरूनी सच को उनकी रेखाओं ने परत दर परत निरंतर उघाड़ा। उनका एक कार्टून अभी भी जेहन में बसा है। कार्टून क्या, सच को बयां करने का उनका वह अंदाज न भूला देने वाला है । काली रेखाओं से उकेरा कमाण्डों सुरक्षा में खड़ा है और सिंहासन रूपी कुर्सी पर सफेद झक्क कपड़ो में नेताजी विराज रहे है। उनके इस कार्टून का कैप्सन है-‘ब्लेक कमांडो एण्ड व्हाईट ऐलिफेंट’। नेताओं को सफेद हाथी कहने की ऐसी कार्टून व्यंजना के बहु़तेरे दसरे आयामों में उन्होंने देश की राजनीति के अंदरूनी सच को सदा ही अपने व्यंग्य चित्रों से उभारा। उनका कहना भी था, राजनेता जनता के लिए उपयोगी भले नहीं हो परन्तु कार्टून बनाने वालो के लिए काम आने वाले कोई हैं तो वह राजनेता ही है। 
उनसे कभी भेंट का सुयोग नहीं हुआ पर उनके व्यंग्य चित्रों की धार देखने को मन लालायित सदा ही रहा। एक कार्टून संसद का उन्होेंने कभी बनाया था। मानसून सत्र चल रहा है, संसद परी तरह से पानी में ड़ूबी है, नेताजी संसद की छत को फाड़ बाहर निकले है। संसद जैसे गुहार कर रहीं है-बचाओ बचाओ। मुझे लगता है, अच्छे व्यंग्य चित्र यहीं करते है। वे आपको अंदर तक झकझोर देते है। कंधार अपहरण के दौरान पूर्व मंत्री जसवंत सिंह का तालिबानी वेश में बनाया कार्टून हो या फिर मुंबई आतंकवादी हमलों के दौरान बनाये कार्टूनों की उनकी वह श्रृखंला जिसमें सभी देश को, मीडिया को संबोधित करने में व्यस्त है-आतंकवादियों से निपटने की किसी को कोई फुर्सत नहीं है। 
मुझे लगता है वह जो कुछ घटित हो रहा होता  उसी को नहीं बल्कि उसके अंतर्निहित उस सच पर भी जाते जिस पर आमतौर पर ध्यान जाता नहीं है। उनकी रेखाओं मे समय-परिवेश से जुड़ी संवेदनाओं का अंदरूनी राग निरंतर ध्वनित होता रहा है। एक बड़ी विशेषता उनकी रेखाओं की यह भी लगती है कि वहां स्थान विशेष की संस्कृति के परिवेश की छाप खास तौर से नजर आती है। माने किसी राज्य  से जुड़ा कोई कार्टून उन्होंने बनाया है तो उसमें उससे जुड़े परिवेष की सूक्ष्म व्यंजना भी वहां मिलेगी ही। उन पर आरंभ में यह आरोप भी लगा कि वह अंग्रेजी के कमजोर कार्टूनिस्ट है पर बाद में उनकी रेखाओं और सधे कैप्षन इस बात के गवाह भी बने कि विचार से जुडे तीव्रतम संवेग में वह जीवनगत सरोकारों को बारीकी से खंगालते विसंगतियोें पर गहरा प्रहार करने वाले थे। यहीं कारण था कि देखने के बाद भी उनके कार्टून आंखो में सदा के लिए बसते थे। 
सुधीर तैलंग का मानना भी था कि लोकतंत्र में कार्टूनिस्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए कि वह समाज में जो कुछ हो रहा है या फिर होने की आषंका है-उसके लिए पाठकों को जागरूक करता है। यह आसान नहीं है कि प्रतिदिन कोई शानदार विचार आपके दिमाग में आए ही परन्तु कार्टूनिष्ट के पास राजनेता है जो जनता के लिए नहीं पर कार्टूनिस्टों के लिए पूरें दिन कार्य करने को तैयार है। उनके कहे के इस मर्म में कार्टून कला के मर्म को गहरे से समझा जा सकता है। उन्होंने निरंतर कार्टून बनाए। काटूनिष्ट के रूप में इलेस्ट्रेड विकली में उन्होंने काम किया। हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए बरसों उन्होंने कार्टून बनाए। टाइम्स आॅफ इण्डिया और नवभारत टाइम्स भी उनके कार्टूनों से सजता रहा। अपने कार्टूनों में उन्होंने भारतीय राजनीति का जैसे रेखीय व्यंग्य इतिहास लिखा। 
सुधीर तैलंग निरंतर कहते भी रहे, कार्टून की हरेक लाईन का अपना जीवन होता है। हरेक लाईन कुछ कहती है। वह जीवंत होती है। उनके भीतर के उम्दा इंसान को इसी से समझा जा सकता है कि कभी उन्होंने कपिलदेव का सात फुट का व्यंग्य चित्र बनाया था, इसकी निलामी से मिली राशि को उन्होंने बच्चों के फंड में दान कर दिया था। इसी प्रकार भोपाल गैस त्रासदी में हताहत हुए लोगों की राहत के साथ ही उन्होंने राजस्थान के सूखा प्रभावित लोगों के लिए भी अपने कार्टूनों की बिक्री कर राशि जुटाई थी। 
सुधीर तैलंग राजनेताओं की मुखाकृतियों के बहाने उनके भीतर अपनी रेखाओं से जैसे झांकते थे। कार्टून में विचार के संवाहक सुधीर की रेखाओं का सुघड़पन और कंपोजिशन सेंस के साथ ब्रश-स्टोक घटनाओं, स्थितियों का आकाश स्पन्दित करता था। वह नहीं है परन्तु उनकी रेखाएं और उनमें व्यंजित जीवन से जुड़े सरोकारों पर रखी पैनी नजर सदा हमें उनकी याद दिलाती रहेगी।

Sunday, February 7, 2016

अन्तःसौन्दर्य का गान

स्वामी संवित सोमगिरी अभियांत्रिकी अध्यापन से बरसों तक जुडे़ रहे हैं पर मन वैराग्य में रमा, सो वेदान्त का अध्ययन व साधना करने सब कुछ छोड़-छाड़ सन्यासी हो गए। वेद-पुराणों के साथ ही भगवद्गीता पर उनकी सूक्ष्म दीठ के प्रकाषित साहित्य ने सदा ही मन मोहा है पर इधर सद्य प्रकाशित उनका काव्य संग्रह ‘प्रणव ने हृदय में गाया’ पढ़ते प्रकृति और जीवन के नए संदर्भों से साक्षात् होता है। 
उपनिषदों के आलोक का हममें वास कराता यह ऐसा संग्रह है जिसमें किसी सन्यासी की अनुभूतियो की अनूठी दीठ है। प्रकृति के विरल अभिप्राय हैं तो संवेदनाओ की वह दार्षनिक व्यंजना भी जिसमें प्रकृति और व्यक्ति के होने की तलाश को नए अर्थ दिए गए हैं। 
प्रकृति और जीवन के बाह्य परिवेष के सौन्दर्य के बहाने भीतर के राग की रस वृष्टि यहां है। यह है तभी तो सोमगिरिजी जी संग्रह में अपने को पूर्णता से भरने का आग्रह करते ‘मुझे आकाष कर’ जैसे शब्दों में वात्सल्य को नए अर्थ देते आंखों में आकाश और क्षितिजों को पलकों में भरने को उद्यत होते हैं। 
‘प्रणव ने हृदय में गाया’ रूपी अपने कविता घर में वह ‘गंगा-मां’ से संवाद करते हैं तो ‘श्रीगुरू-अवतरण’ कविता में शब्दों की जैसे गागर छलकाते  हैं, ‘नर तन थरकर/आये गुरूवर/समरस करने/बाहर-अंदर’। ऐसे ही हृदय के अंतरतम भावों का आकाष रचते सोमगिरिजी ‘ओ सूरज! तुम मुझेमें उगो’, ‘ऐसा दो सुनसान मुझे’, ‘षब्दों! सुनो-मत पहनो पराये वसन’, ‘शिल्पित-संस्कृत’ जैसी शब्द व्यंजना में अंतर्मन संवेदनाओं के मर्म से ठौड़-ठौड़ साक्षात् कराते हैं। संग्रह में प्रकृति  और मानवेतर का अंष-अंष शब्दोद्घाटन है। जो कुछ देखा-सुना और छूआ जा सकता है, वही नहीं बल्कि उससे परे की संवेदना को भी इसमें गहरे से गुना और बुना गया है। प्रकृति के अनूठे अभिप्राय संग्रह में है तो अनुभूति की तीव्रता में मर्मस्पर्षी बिम्बों का अनूठा भव भी रचा गया है। यह है तभी तो इसमें बरते शब्द संवेदना की हमारी आंख बनते बहुत कुछ वह दिखाते है जिसे सामान्यतः हम देख नहीं पाते हैं। 
संग्रह में सोमगिरिजी के काव्य संकेत मन को मथते हैं, शब्द नहीं शब्द से जुड़ी संवेदना इसी कारण औचक, बार-बार हममें बसती है। औचक केनोपनिषद् के पढ़े को फिर से जैसे जीने लगता हूं। केनोपनिषद् में ईष्वर, ब्रह्म, परमात्मा के स्वरूप को गुरू द्वारा समझाने के बाद भी षिष्य की फिर से जिज्ञासा है, ‘उपनिषदं भो ब्रूहीति’-मुझे उपनिषद् कहिए। शब्द जहां पहुंच नहीं पाते, सोमगिरिजी के भाव वहां पहुंच-पहुुंच फिर से कुछ और जानने को प्रेरित करते हैं। मन विचारने लगा है, कविता क्या है? अन्तःसौन्दर्य का गान ही तो। लय में अंवेरा संवेदना राग। तो कहूं, ‘प्रणव ने हृदय में गाया’ इसी की व्यंजना है।

कविता संग्रह: प्रणव ने हृदय में गाया
कवि: स्वामी संवित् सोमगिरि
प्रकाषक: मानव प्रबोधन न्यास, शिवबाड़ी, बीकानेर
मूल्य: एक सौ पचास, पृष्ठ: 128


Saturday, January 9, 2016

प्रकृति सौन्दर्य में घुली किस्सागोई


यात्राएं  घुम्मकड़ी के सौन्दर्य से ही साक्षात् नहीं कराती, स्थान-विषेष से जुड़ी संवेदना का राग भी हमें सुनाती है, मन को मथते हुए। कथाकार मधु कांकरिया का यात्रा-वृतान्त ‘बादलों में बारूद’ सुदूर आदिवासी इलाकों मे की गई यात्राओं का पत्रकारीय कोलाज है तो भ्रमण से जुड़ी संवेदनाओं में आत्म की खोज सरीखा भी है। इस यात्रा वृतान्त में जनजातीय इलाकों की छान-बीन है तो पहाड़, झरनों के सौन्दर्य का वह पाष्र्व भी है जिसमें सिसकती जिन्दकी का दर्द भी चुपके से बयां हुआ है। मधु कांकरिया के यात्रा लेखे की यह विषेषता है कि वह चिर-परिचित स्थानों में भी बहुतेरा वह अदेखा बंया होता है, जिस पर आमतौर पर नजर जाती नहीं है। मसलन उनके यात्रावृतान्त में रांची से 132 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुमला जिले के विषुनपुर प्रखंड और वहां से भी और अंदर की उनकी यात्रा में प्रकृति में धुले अकूत सौन्दर्य से तो साक्षात्कार होता ही है, आदिवासी जीवन और उनके संघर्ष की व्यथा-कथा से भी हम रू-ब-रू होते हैं। अपनी इस यात्रा में वह लुट रहे जंगल की पीड़ की शब्द व्यंजना करती है तो वहां रहने वाले और सदियो से शोषित आदिवासियों के अनुभवों की आंख को अपनी आंख भी बनाती है। आदिम जनजाति बिरसिया के ‘सुक्का दा’ के साथ की यात्रा में उनके जरिए वह आदिवासी परम्पराओं और जीवन से जुड़े बहुत से प्रसंगों को सभ्य समाज से जोड़ती है। इस दौरान लेखिका की चिंतन से जुड़ी मनकही से भी पाठक साक्षात् होते हैं। इस मनकही में जंगल के हसीन सफर में देषातीत और कालातीत होती मधु कांकरिया प्रकृति के पूर्णतत्व के अपने अहसास को बहुतेरी बार पाठकीय अहसास भी बना देती है। रांची से विषुनपुर के सफर में लेखिका खूबसूरत झारखंड के जंगलो की ओर जाने को प्रेरित भी करती है। लिखती है, ‘नजरों की छोर तक बिखरा हरियाला सौन्दर्य और ऊपर केसरिया होता आकाष!’ 
मधु कांकरिया ने अपनी इस घुम्मकडी में बहुतेरी ऐसी परम्पराओं को भी जीया है, जिनसे शहरी समाज का नाता शायद कभी पडता नही है। मसलन रांची से विशुनपुर, की यात्रा के अंतर्गत प्यास लगने पर चेचू बनाकर पानी पीने की परम्परा। आदिवासी क्षेत्रों में कम पानी की नदी में गंदगी के चलते जब लेखिका पानी पीने में संकोच करती है तो साथ चल रहे आदिम जन जाति बिरसिया के सुक्का दा कहते है, रूकिये आपके लिए चेचू बना देते है। चेचू यानी देशी फिल्टर। नदी किनारें की गीली रेत को खोदकर गढ्ढा बनाना और फिर उसमें जल भर देना। थोडी देर में पानी की गंदगी नीचे बैठ जाती है और स्वच्छ जल ऊपर तैरने लगाता है। यही चेचू है। 
बहरहाल, पुस्तक में ‘जंगलों की ओर’ तथा ‘पहाड़, पलामू और आग’ ऐसे यात्रावृत्त हैं जो रिपोर्ताज सरीखे हैं। इन्हें पढ़ते जनजातियों के बीच कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए वहां पहुंचे और पिछले कोई तीन दषक से वहां काम करने वाले अषोक राय से अषोक भगत बने व्यक्ति के जीवन की मानवीयता से भी पाठक साक्षात् होते हैं तो दूसरी ओर झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ के पीपूल्स वार के कमांडर रणधीर भगत से पत्रकार के रूप में भेंट का भी साहसिक दास्तां भी यहां है। चरित्र, स्थानों और वहां के जन जीवन को लेखिका ने अपने इन वृतान्तों में गहरे से जिया है। आदिम जनजातियों के जीवन से जुड़ी प्रथाओं की भी मोहक व्यंजना यहां है। मसलन यात्रा के एक रोचक प्रसंग में यह भी पता चलता है कि पलामू की महिलाओं में कुछ अधेड़ों या वृद्धाओं के चेहरे पर गोदने के तीन निषान होते हैं। दो गालों पर और तीसरा माथे पर। कहते हैं, इनके पूर्वज तीन युद्ध हार गए थे और इसी के प्रायष्चीत इन्होंने अभी तक तीन गोदना गोदवा रखे हैं। इसी यात्रा में डायन प्रथा का वह सभी लेखिका सामने लाती है जिसमे जमीन हड़पने के लिए औरत को डायन घोषित कर मरवा दिया जाता है। आदिवासी जीवन की रूढि़यां, अंधविष्वास और उनके जीवन के संघर्ष के बारे में अपने यात्रावृतान्त में लेखिका सहज बंया करती है।
मधु कांकरिया के पास स्थानों और वहां से जुड़े संदर्भों को लिखे में परोटने की सौंदर्य दीठ है। ‘बादलों में बारूद’ उनकी इस दीठ की ही मोहक व्यंजना है। उनकी इस घुम्मकड़ी में इतिहास से संवाद है पर वह ‘आत्म की खो’ सरीखा है। ‘सपना-साना हाथ जोडि...’ में हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा के स्वर्गीय सौन्दर्य को बंया करते लेखिका पहाडि़यों के दर्द को भी चुपके से बंया करती है। पहाड़ों के संकरे रास्तों पर लगी चेतावनियों के निहितार्थ जीव से जुड़ी संवेदनाओं के राग में ही वह प्रकृति की उदात्तता में इस कदर घुलती दिखाई देती है कि शब्द जैसे औचक ही झरे पाठक के पास पहुंचते हैं, ‘मेरे पांव झन-झन करने लगे। पर मन वंृदावन हो रहा था। भीतर जैसे देवता जाग गए थे।’ ऐसे ही काठमांडू में बुद्ध एअरलाइंस की ‘माउन्टेन फ्लाइट’ में वह लिखती है, ‘ऊंचाइयां सारी क्षुद्रताओं को मिटा देती है। विमान में उड़ते हम सभी यात्री भी प्रकृति के अनुपम करिष्मे हिमालय पर सम्माहित थे, न भारत पर, न नेपाल पर। समय और सृष्टि के परे ले जाते हुए गन सौंदर्य से भरपूर उन दुर्लभ लम्हों को देखकर मन मचला कि किसी करिष्मे से विमान के शीषे टूट जाएं और मैं हाथ बढ़ाकर छू लूं बर्फ के इन छोटे-छोटे पर्वतों को।’
मुझे लगता है, यह प्रकृति ही है जो मन कीे इन काल्पनिक अनुभूतियांे के आकाष में उड़ा ले जाता है। नागरकोट से पोखरा की बढ़ते लेखिका रेवा झील के सौंदर्य को तो बंया करती है परन्तु नेपाल की उथल-पुथल भरी अराजकता और प्रतिरोध के साथ काठमांडू की मंहगाई और दहषत में डालने वाली आधुनिकता को भी स्वर देती है। 
‘बादलों मे बारूद’ षिलांग यात्रा की वह रोचक दास्तां है जिसमें लेखिका वहां की दोपहर को ‘महबूब’ की संज्ञा देती है तो परी देष की चकाचक से भी उसे अभिहित करती है। यात्रा मंे षिलांग की संस्कृति, प्राकृतिक सौनदर्य और परम्पराओं का गान तो है परन्तु महत्वपूर्ण पक्ष इस यात्रा का वह है जिसमें लेखिका उसे कष्मीर के बाद सबसे असुरक्षित इलाका पाती है। चेरापूंजी से नेहू पहुंच वहां अपने पुत्र के दोस्त के घर बिताई रात में पूर्वोत्तर के आतंक के उस साए से भी साक्षात् कराती है जिसमें नौजवान बेहतर दुनिया का स्वप्न संजोए आंतकवादी संगठनों मे ंसम्मिलित होते हैं और फिर माटी होकर बाहर निकलते हैं। ‘हाइन्यूट्रेप नेषनल लिबरेषन काउंसिल’ और मिलट्री के मध्य हुई गोलीबारी में ही वह पुत्र के दोस्त के पिता को सांत्वना देती है, ‘धरती बीज नहीं चोरती है, देखिएगा वे फिर लौट आएंगे। धरती को सजाएंगे।’ पर जवाब मिलता है, ‘-और फिर मारे जाएंगे।’ 
‘जाल, जहाज और मछुआरे’ में सुदंरवन की सुदंर सुबह, दिरूबा रात है तो शहर बनते गांवो की दास्तां भी है। जहाज मे की गई इस यात्रा है में स्मृतियों के सिरहाने लेखिका अपने मन की गहराईयो में ले जाती अनंत जिजीविषा से ऊर्जस्वित मछुआरों के जीवन की मार्मिक व्यंजना करती है। ऐसे ही आधुनिकता से आक्रात पर परम्परा के प्रति सम्मोहित चेन्नई और लेह-लद्दाख की उनकी यात्रा मंे लेखिका के ही शब्दों मे कहूं तो ‘विचारों की थपकियां’ सरीखी हैं। ‘देष मंे विदेष’ चेन्नई यात्रा में हिंदी के देषनिकाले की अनुभूतियोें को लेखिका ने संजोया है तो संस्कृत की तासीर में रची-बसी तमिल भाषा और दिखावे से दूर जीवन के मर्म का अनुभव-भव है। ‘बुद्ध, बारूद और पहाड़’ में नौ दिनों की वह यात्रा है जिसमें तिब्बत से आए शरणार्थियों के आजाद तिब्बत के स्वप्न और बुद्ध की नगरी से लोप बुद्धतत्व की मार्मिक व्यंजना है। ऐसा ही कुछ आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली कालड़ी का ‘देखती चली गई’ का पत्रकारीय सरीखा यात्रा वृत्त है। इसमे दक्षिण भारत मंे वेदों और वेद पाठषालाओं के प्रति भक्ति के आकर्षण के साथ ही वेदांत की पकड़ी राह का वह कटू सत्य भी है जिसमें, लेखिका कहती है ‘वेद विद्यार्थी हों, बौद्ध भिक्षुक हों, जैन साधु हों, पादरी हों-बचपन सदैव ही निषाने पर रहा है।’
बहरहाल, मधु कांकारिया के इस यात्रावृतान्त की बड़ी विषेषता है, उनकी किस्सागोई और प्रकृति सौन्दर्य की कूंत। वह लिखती है, ‘...मैं बार-बार इन जंगलों, पर्वतों और प्रकृति के बीच आती हूं? या सिर्फ प्रकृति के प्रति एक नैसर्गिक लगाव के चलत या अपनी आत्मा में लगे महानगरीय कीचड़ को धोने?’ मैं समझता हूं, इस शब्द व्यंजना में ही उनके लिखे को गहरे से समझा जा सकता है। ‘बादलों में बारूद’ यात्रावृतान्त है, पर ऐसा जिसमें स्थान और भौगोलिकता से परे जाकर लेखिका ने प्राकृतिक सौन्दर्य से जुड़ी मन संवेदना के बरक्स जीवन से जुड़ी वेदना और संघर्ष को भी अपने अनुभव का भव दिया है।
-समकालीन भारतीय साहित्य, नवम्बर-दिसंबर 2016