Saturday, January 29, 2011

कला में भदेस और अनर्गल

आकल्पन, रूपविधान और रचना से कोई भी चित्र मौलिक और आनन्ददायक बन सकता है परन्तु वैश्विकरण के इस दौर में अभिव्यक्ति एवं कला के नवीन तरीके खोजने के प्रयास में सौन्दर्यबोध के माने भी जैसे बदल रहे हैं। संस्थापन में भदेस और अनर्गल भी कला है। स्वतंत्रता का अर्थ है जो मन आए करो। गवेषणा का विषय जो बन गई है कला। नई संभावनाओं और मूल्यों के प्रति इधर कलाकारों के आग्रह को इसी से समझा जा सकता है कि विचार, नैतिक सिद्धान्त और तथ्यात्मक सामग्री की बजाय अतिशय उत्तेजकता, चौंकाने वाले और किसी छोर से समझ न आने वाले दृश्य की उत्पति ही कला का हेतु हो रही है। क्या है कला की इस आधुनिकता का भविष्य? कला आलोचक मित्र विनयकुमार कला दीठ को लेकर इस पर टिप्पणी करते हैं, ‘दर्शकों को नासमझ समझने की भूल नए मीडिया के कलाकार कर रहे हैं।’

बहरहाल, पिछले दिनों ‘इण्डिया आर्ट समिट’ में भाग लेते लगा, कला का आधुनिक युग पंाच सितारा संस्कृति का है। ग्लेमर से लबरेज। प्रगति मैदान में कला के आज से आंखे चौंधिया रही थी। विश्वभर की कला विथिकाएं एक छत के नीचे थी और संस्थापन कला की तगड़ी नुमाईश में कला की प्रचलित मान्यताएं तय कर पाना मुस्किल हो रहा था। पुणे से आए कलाकार मित्र स्वरूप और स्मिता विश्वास, लखनऊ से आए अवधेश और दिल्ली के हेमराज, वेदप्रकाश भारद्वाज के साथ ‘इण्डिया आर्ट समिट’ में विचरते लगा किसी और दुनिया में आ गया हूं। कला की यह हमारी दुनिया तो किसी अर्थ में नहीं कही जा सकती थी। कैनवस किनारे पर था। विडियो इन्स्टालेशन, ध्वनि प्रभाव और एक जगह तो बाकायदा जिन्दा मुर्गों की नीम बेहोशी को भी कला के दायरे में लाते प्रदर्शित किया गया था। प्रयोगों में कहीं आम इस्तेमाल में होने वाले 10-20 के नोटों में महात्मा गॉंधी की आकृति को हटाकर कुछ और आकृतियां बनाकऱ उसे फ्रेम कराया हुआ था तो कहीं ग्राफिक्स में बहुत सारे लाउड स्पिकर थे, विडियो में न थमने वाली भद्दे ढंग की हंसी थी। अजीबोगरीब शक्ल बनाए इंसानों का कोलाज था और संस्थापन में कूड़े-कचरे को भी यथास्थिति में प्रदर्शित किया गया था। बहुत सारी विथिकाओं से बाहर निकल जूठे ग्लास फेंकने की डस्टबीन की तलाश करते अवधेश ने एक जगह कचरे के ढेर को देख हमें भी जूठन फेंकने के लिए वहां बुला लिया। स्मिता ने गौर किया, कचरा फेंक स्थल नहीं, वह भी संस्थापन था। मुझे लगा, कलाकार बनने का यह अच्छा अवसर है। कैनवस पर तो हाथ आजमा नहीं सकता, क्यो नहीं इन्स्टालेशन आर्टिस्ट ही बन जाउं। पूरी कॉफी पीने के मोह को त्यागते आधे ग्लास को मैंने भी कचरे के उस ढ़ेर में सजा दिया। हो गया इन्स्टालेशन!

बरहाल, कला की इस चकाचौंध में पिकासो, वॉन गॉग, अवनीन्द्रनाथ, सुबोध गुप्ता, रज़ा, हुसैन के चित्रों से साक्षात् करते सुकुन भी हुआ। कला के हर रंग, हर ढंग में अतुल डोडिया भी अलग से ध्यान खींच रहे थे। रेखांकनों के साथ अतुल ने डिजिटल फोटोग्राफी के प्रयोग में कला के इस वर्तमान दौर को जैसे कैनवस पर जिया। कैप्सन और फिल्म पोस्टर चित्रों के अंतर्गत बाजार, कलाकार, कला में व्यवसाय को ढूंढते लोगों पर उनकी कला टिप्पणी मौजूं थी।

सच ही तो है! चाक्षुष कलाओं का प्रतिनिधित्व अब परफार्मेंन्स, मिक्स मीडिया, फोटोग्राफी, इन्स्टालेशन जैसे माध्यम ही कर रहे है। यानी तकनीक कला में निरंतर हावी होती जा रही है। ‘इण्डिया आर्ट समिट’ के दर्शकीय अनुभव से बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा। अर्न्तमन संवेदनाओं और विचारों के बगैर बहुत से स्तरों पर केवल और केवल तकनीक का कौशल क्या कला का भविष्य है? हे पाठको! इसका निर्णय तो अब आप पर ही छोड़ता हूं।
(कला तट - २८-१-२०११)

Tuesday, January 25, 2011

काल का उनके गान पर क्या जोर!

पंडित भीमसेन जोशी कालवश नहीं हो सकते! अजर है, अमर है उनका गान। काल से होड़ लेते ब्रेन ट्यूमर के बाद भले वह मंद पड़ गए परन्तु उन्होंने संगीत का जो सागर हमें दिया है, उसकी अनंत गहराईयों को मापा नहीं जा सकता। याद करें लता और बाल मुरली कृष्णा के साथ आज भी घर-घर गूंज रहा है उनका गाया ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा...’। सच! यह पंडित भीमसेन जोशी ही थे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की धारा का हर आम और खास में प्रवाह किया। ठुमरी और भजन गायकी में तो उनका आज भी कोई शानी नहीं है।

सवाई गंधर्व से गान की विधिवत् शिक्षा उन्होंने ली परन्तु बचपन में मां जब मधुर कीर्तन गाती तो वह ध्यान से सुनते। उसे भी बाद में उन्होनंे निरंतर गुना। जो उन्होंने सीखा उसके शास्त्र और उसकी रंजक शक्ति पर सदा उनका विश्वास भी रहा। सुनता तो उन्हें बचपन से ही रहा हूं परन्तु साक्षात् भेंट और मन मुताबिक संवाद करने का मौका साहित्य अकादमी की यात्रा फैलोशिप के तहत कोई एक दशक पहले ही महाराष्ट्र भ्रमण के दौरान पुणे में उनके निवास पर ही मिला था। याद पड़ता है, मैंने उनके गान पर एक बड़ा आलेख लिखा था और उसमें शास्त्रीय गान कीउनकी लोकोन्मुख धारा का विशेष रूप से जिक्र किया था। पुणे में मराठी के ख्यातनाम उपन्यासकार शिवाजी सावंत से भेंट के बाद उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी जी से मिला और उन्हें वह लेख दिखाया। उन्होंने ही बाद में पंडितजी से भेंट की मुराद पूरी की। विश्वास नहीं हो रहा था, जिन्हे सुना है, जिनके बारे में लिखता रहा हूं, वह यूं मिल जाएंगे। श्रीनिवासजी खुद बहुत अच्छे गायक हैं...उनके साथ मिलने के सुख को बंया नहीं किया जा सकता। कल्पना मंे सदा बसी रहने वाली मुस्कराहट मेरे सामने थी। मंद मुस्काते ही पंडितजी ने देर तक बातें की। कौन नहीं जानता उनका व्यक्तित्व! सो मैंने गान पर ही संवाद केन्द्रित करते बहुत सी बातें पूछी थी। तभी उन्होंने कहा था, ‘स्व के आनंद के लिए गाता हूं और जब गाता हूं तो श्रोताओं की भीड़ को नहीं देखता।...गुरू आपको सिखाता है परन्तु आपने केवल वही कंठस्थ कर लिया तो वह दूसरों को रूचेगा नहीं। वह नकल होगा। आपको नकल थोड़े ही करनी है, गाना है। उसके लिए शक्ति चाहिए। दृष्टि चाहिए। अपनी समझ से गायकी में टिकने की, चिरंतन होने की शक्ति ही आपको आगे तक ले जाती है।’ कहते हुए वह सवाई गंधर्व के गान को याद करते यह कहना भी नहीं भुले थे कि उनका गला गान के लिए ठीक नहीं था परन्तु उसे उनके गुरू ने तैयार किया। सुबह एक घंटा और शाम को एक घंटा। गला तैयार करवाने की तालीम चली। पांच वर्ष यही चला। और कुछ नहीं।

बहरहाल, पंडितजी ने अपने को साधा। आरंभ में सोलह से सत्रह घंटे तक का रियाज किया। बाद में तो संगीत के सप्तक की उनकी समझ इतनी बढ़ी कि किराना घराने का उन्होनंे अपने तई पुनराविष्कार किया। इस पुनराविष्कार में लयबद्ध आलाप और भिन्न शैलियों के मिश्रण के बावजूद भावों की संगीत संवेदना हरेक के मन के भीतर तक प्रवेश करती है। उनके गान में आरोह-अवरोह में कहीं कोई तनाव नहीं है। अद्भुत संयम है वहां। अनंत माधुर्य। विराट रेंज। विशाल वितान में वह कईं बार सुरों को इतना ऊपर तो कईं बार इतना नीचे ले जाते कि अचरज होता, कैसे यह संभव होता था। अद्भुत आलापकारी के तो कहने ही क्या! पारम्परिक रागों में यह पंडित भीमसेन जोशी ही रहे हैं जो आरंभ में ही अपनी आवाज को पंचम में अवर्णनीय प्रभाव के साथ ले जाते और मुरकियां और आकर्षक मींड में श्रोताओं को अवर्णनीय आनंद की अनुभूति कराते हैं। परम्परा से जो उन्होंने ग्रहण किया उसमें युग के हिसाब से बहुत सा मिश्रण भी किया। मसलन सवाई गंधर्व से सीखे में उन्होंने जयपुर घराने की केसरबाई केरकर और पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर से बहुत सी तान रचनाएं ली तो इलाहबाद के भोलानाथ भट्ट से ‘सखि, श्याम नहीं आये’ रचना ली। उनके बहुत से बोल आलाप और बोल तान रचनाएं आगरा घराने के विलायत हुसैन खां साहब से भी प्रेेरित है। एक तरह से किराना घराने को बहुत से दूसरे घरानों से उन्होंने संगीत के नये संस्कार दिए परन्तु ऐसा करते स्वयं गान की अपनी मौलिकता को सदा उन्होंने बरकरार रखा। जरा सुनें उनके गान को...‘अखियां रही दर्शन को प्यासी...’, ‘जो भजे हरि को सदा वही परम पद पाएगा...’। दीर्घ तान के बाद ख्याल की बंदिश।...सधे स्वरांे में सम तक की यात्रा मंे उनका श्वांस नियंत्रण, ठहरावों के साथ लयात्मक जोर में ध्वनि उत्पादन की उनकी शैली मन को झंकृत करती है। अंतरर्मन संवेदना का अदभुत सौन्दर्य है वहां। यमन कल्याण, शुद्ध कल्याण, राग पूरिया, मालकौंस में तुकाराम, नामदेव के भजनों को सुनें तो मन न भरे। ठुमरी और नाट्य संगीत का अपूर्व रस भी वहां है। कभी उनके संगीत से प्रतिकृत चित्र हुसैन ने बनाए थे तो पंडित बिरजू महाराज ने उनकी गायकी पर नृत्य भी प्रस्ततु किया। लता को उनका गान बेहद पसंद है। सचिन को वह बेहद पसंद करते थे। सबको अचरज में डालते खुद लम्बी दूरी की कार ड्राइव करते गान के लिए पहुंच जाते थे।... पुणे में ही फिर से उनसे ‘सवाई गंधर्व संगीत समारोह’ में भी एक बार भेंट हुई थी। तब भी सहज बतियाए। कहीं से कुछ ओढ़ा हुआ नहीं। सब कुछ सहज। उनके व्यक्तित्व और गान की यही विशेषता थी। यह जब लिख रहा हूं, राग भीमपलासी मंे गाये ‘ब्रज में धूम मचावे..’ बोल मन को झंकृत करने लगे हैं। नहीं! वह कहीं नहीं गए। यहीं है। उनके सुर सदा हमारे साथ रहेंगे। काल का उनके गान पर क्या जोर! कालजयी हैं पंडित भीमसेन जोशी।

Sunday, January 23, 2011

आकाशीय प्रभाव दृष्य चित्रों का अनूठा लोक


दृष्य चित्रों के अंतर्गत चित्रकार जीवन के ज्ञात प्रसंगों का एक प्रकार से संकलन करता है। यथार्थ के रूपाकार की इस प्रविधि में वह देखने वाले को अपनी दृष्टि भी एक प्रकार से देता है। जिस कोणए जिस दीठ से दृष्य का रूपांकन होता हैए कला आस्वाद की बाद में वही हमारी दृष्टि बन जाती है। पचास के दषक में कभी अमेरिका की रूबेन कलाविथी में ख्यात कलाकार अॅलेन काप्रो की एक प्रदर्षनी लगी थी। अमेरीकी घटनाओं को आधार बनाते प्रदर्षित उनके यह चित्र जीवन सदृष ही प्रतीत हो रहे थे। कहते हैंए वहीं से यथार्थ चित्रण शैली की एक नई धारा ‘घटना.निर्माणश् चित्र का भी विकास हुआ। पिछले दिनों स्वरूप विष्वास के चित्र जब देखे तो लगा घटना.निर्माण चित्र शैली के बरक्स वह एक नई यथार्थ चित्र तकनीक का अपने तई जैसे विकास कर रहे हैं। इस नई शैली में जीवन से जुड़े प्रसंगोंए अनुभूतियोंए क्रियाओं को छायाभाषी रूप प्रदान करते वह बहुधा देखे दृष्यों को आष्चर्यजनक स्पष्टता के साथ हमारे नेत्रों के निकट लाते हैं। दूरदृष्यलघुता में उनके चित्रों के नाटकीय प्रभाव मन को रोमांचित करते हैं और दृष्य को उसके पूरेपन में देखने की चाह भी अनायास ही जगाते हैं। वह ऊपर से नीचेए नीचे से ऊपर क्षेत्र जोड़कर अपने चित्रों में स्पेस के जरिए जैसे समय के अवकाष को पकड़ते हैं।

स्वरूप विष्वास मानवाकृतियां को केन्द्र में रखते हुए जीवन से जुड़ी सामान्य घटनाओंए प्रसंगों को अपने अंदाज में कैनवस पर परोटते हैं। खास बात है उनके चित्रों के दृष्य प्रभाव। उनके चित्र भू दृष्यों को ऊपर आकाष से देखने का अहसास लिए हैं। दूरदृष्यलघुता के उनके अधिकांष चित्र ऐसे हैं जिनमें दूरी के साथ आंख वस्तुओं के छोटे.बड़े आकार का अपने आप ही निर्धारण करती है। मानेए आंगन में यदि कुछ लोग बैठें हैं तो छत से बगैर उनको बताए उनकी गतिविधियों को कैमरे ने कैद कर लिया हो। ऐसा करते उनके चित्र में उभरी घटनाए प्रसंग हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाती है। केवल देखने के समय ही नहीं बल्कि सदा के लिए।

बहरहालए मानव आकृतियों के कोलाज में स्वरूप के वे चित्र बेहद प्रभावी हैं जिनमें ताषए शतरंज और ऐसे ही दूसरे खेलों में मगन व्यक्तियों के समूह दिखाए गए हैं। वायलीन बजानेए गिटार बजाने में मगन व्यक्ति हों या फिर गमले की सार संभाल करती मां का चित्र.सभी में शबीह अंकन का उनका अंदाज भी सर्वथा अलग है। वह सीधे शबीह न बनाकर ऊपर से देखते जैसे उसका निर्माण करते हैं। चित्र संयोजन एवं चित्रण विधि में जीवन दर्षन की उनकी समझ भी अंतर्मन संवेदनाएं लिए है। अपनी अंतरभुत संवेदनाआंे में वह घटना.निर्माण का यह अहसास भी कराते हैं कि भौतिकता में तेजी से भागते जीवन में उसकी डोर हमारे हाथों से कहीं छूटती भी जा रही है। मुझे लगता हैए घटनाओं की स्थिरता में स्वरूप जीवन की गत्यात्मक्ता का अनूठा प्रवाह करते हैं।

स्वरूप के चित्र सादृष्य हैं। माने दर्पण में प्रतिबिम्ब। परस्पेक्टिव। इतने कि आप दूर तक के बहुत से दृसरे दृष्यों की भी इनमें खोज कर सकते हैं। चित्राकृतियां भले किसी खास प्रयोजन में रत हैं परन्तु उनमें संवेग है। एक खास तरह के कथ्य का संप्रेषण भी। प्राकृतिक रंगों की सूक्ष्मता को पकड़ते स्वरूप दृष्यों की सहज समझ विकसित तो करते ही हैंए कईं बार मैटेलिक में भी वह ऐसे प्रभाव डाल देते हैं कि चित्र अपनी समग्रता में मन को गहरे से छूता है। मसलन मैटेलिक रंग संयोजन का चाय के प्यालों के साथ ताष खेलती मानवाकृतियां का उनका परस्पेक्टिव एक चित्र चाह कर भी हम स्मृति से विस्मृत नहीं कर सकते। वह अपने चित्रों में दृष्य में भिन्न दूरगामी समतलों का निर्धारण करते विषय की गहराई में जाते हैं। आकाशीय दूरदृष्यलघुता में उनके चित्र कला की पृथक शैलीए पृथक तकनीक और चित्रांकन का अलग ढंग लिए है। कला की उनकी यही मौलिकता है।
(कला तट 21-1-2011)

Friday, January 14, 2011

काव्य संवेदनाओं का कैनवस पर रूपान्तरण


विष्णुधर्मोत्तर पुराण का तीसरा खंड चित्रसूत्र है। इसमें विभिन्न कलाओं के अंर्तसंबंधों पर गहरे से प्रकाश  डाला गया है। एक स्थान पर रोचक प्रसंग आता है। राजा वज्र नृत्य सीखना चाहते हैं। ऋशि मार्कण्डेय कहते हैं, पहले चित्रकला को सीखना होगा। वह चित्रकला सीखना चाहते हैं तो कहा जाता है, इसके लिए संगीत सीखना होगा। वह संगीत सीखना चाहते हैं तो कहा जाता है पहले काव्य कला को जाना होगा। इस तरह कलाओं के अंतरसंबंधों की चर्चा करते संवाद व्याकरण तक पहुंच जाता है। संवाद का मूल है,कलाओं की परस्पर निर्भरता। चित्रसूत्र स्पष्ट  करता है कि सभी कलाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक कला को जाने बिना दूसरी कला को नहीं समझा जा सकता। सभी कलाएं परस्पर अन्तर्गुम्फित है। एक दूसरे से अंदर तक जुड़ी हुई। कभी टाईम्स ऑफ इण्डिया ने नव वर्ष  पर अपने पाठकों के लिए आवरण पेज  पर एम.एफ.हुसैन का एक बेहद सुन्दर चित्र प्रकाशित  किया था। ख्यातनाम चित्रकार अखिलेष बताते हैं,  हुसैन ने यह चित्र शमसेर  बहादुरसिंह की कविता ‘पतझर’ की पंक्तियां ‘एक पीली शाम /पतझर का जरा/अटका हुआ पत्ता...’ पर बनाया था। कविता पर चित्र बनाने के साथ ही चित्रों को देखते, संगीत का आस्वाद करते भी हमारे यहां कम काव्यकर्म नहीं हुआ है। अशोक  वाजपेयी ने रजा, हुसैन, स्वामीनाथन के चित्रों और कुमारगंधर्व के गान पर उम्दा कविताएं लिखी हैं तो कभी चित्रकार जय झरोटिया ने सौमित्र मोहन की कविता ‘लुकमान अली’ के पाठ को सुनते पूरी की पूरी एक चित्र श्रृंखला ही उस पर बना दी थी। महादेवी, शमसेर के  काव्य के साथ चित्रकर्म भी करते रहे हैं।

बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों सप्तक का आस्वाद किया। चित्र और कविताओं के सप्तक का। सात कवियों की कविताएं थी और उन पर सात चित्रकारों के चित्र। कवि-चित्रकार सप्तक का आस्वाद करते लगा एक कलाकार को दूसरे माध्यम के कलाकार की रचना संवेदना के स्तर पर छू जाए तो वह रूपान्तरण की प्रक्रिया में लग जाता है। कला प्रदर्शनी ‘हमकदम’ जैसे इसे ही व्यक्त कर रही थी। दुष्यंत की काव्य पंक्तियां ‘अकेला चांद और तुम’ में मन के भावों का कलात्मक सौन्दर्य हैं, अडीग ने इसे कैनवस पर गहरे से जैसे जिया है। रिच टैक्स्चर में अडीग ने सर्वथा अलग स्पेस रचते पाशर्व के काले में पीले और लाल रंग की महीन बुनावट करते संवेदना का अलग उजास रचा है। अभिशेक गोस्वामी की ‘हम कुछ बोलेंगे’ कविता को विश्वास  ने कैनवस पर सलेटी, धूसर रंगों की अनुभूतियों से संवारा तो प्रभात की ‘पन्द्रह साल’ पर निधि सक्सेना ने छिटके हुए बैंगनी रंगों का जैसे स्मृति कोलाज रचा है। देवयानी की ‘बदनाम लड़कियों’ को राजेद्रसिंह के मूर्त-अमूर्तन के त्रिआयामी रूपाकार में और प्रेमचन्द्र गांधी की ‘मलयाली स्त्रियॉं’ पर महेन्द्रप्रताप शर्मा  की रूपसर्जना में अनुभूत किया जा सकता है। बलराम कावंत की ‘तेरी तलाश  में’ पर ज्योति व्यास ने छायाकला के अंतर्गत सर्जनात्मकता की अर्थव्यंजना की है तो हरेन्द्र कौर की कविता ‘ये कैसी लड़की’ को अविनाश ने रेखाओं की सरल चित्र संरचना में निहित किया है।

सप्तक आस्वाद करते मुझे लगता है यह शब्द की संवेदना ही है जो किसी भी कलाकार की रागात्मक वृत्ति को, उसके सौर्न्दबोध को परिस्कृत करती है। जिन सात कवियों की संवेदनाओं का कैनवस पर रूपान्तरण हुआ, उन सब ने अपने अनुभवों, स्मृतियों को एक खास तरह की व्यंजना दी और अपने तई समकालीन सरोकारों से भी अपने को जोड़ा है। काव्य की उनकी संवेदनाओं का कैनवस पर यह रूपंकरण कला के अन्तर्गुम्फन समय का ही तो एक प्रकार से रचाव है! महादेवी वर्मा की "दीपशिखा"  में लिखी भूमिका याद आ रही है, ‘कलाओं में चित्र ही काव्य का अधिक विश्वत सहयोगी होने की क्षमता रखता है।’

Friday, January 7, 2011

संगीत ऋषि के सुरों में माधुर्य का अनुष्ठान

सुरों के माधुर्य में अमरत्व का भाव कहीं मिलता है तो वह भारतीय संगीत में ही है। उपनिषद् कहते हैं, ‘जन्म ग्रहण किया है इसलिए सभी अमर नहीं होते, जिन्होंने असीम की उपलब्धि की है वे ‘अमृतास्ते भवन्ति’।...तो यह संगीत ही है जिसमें व्यक्ति असीम को भी पा लेता है। असीम माने उसके आनंद की कोई सीमा नहीं है। अमृतरस की वर्षा है वहां। मधुर गान के श्रवण की अनुभूति को क्या व्याख्यायित किया जा सकता है! शायद नहीं। शब्द वहां पहुच ही नहीं सकते।

बहरहाल, पंडित जसराज को सुनते मन में अध्यात्म के अद्भुत भाव जगते हैं। उन्हें पहले भी सुना है परन्तु अस्सी की उम्र में इकत्तीसवें राजमल सुराणा संगीत समारोह में पिछले दिनों उन्हें सुना तो लगा, अध्यात्म की अद्भुत चेतना में उनके सुर जैसे अभी भी पुनर्नवा हैं। हमारे यहां ऋषियों ने सदा ही रागों को मंत्रांे की तरह देखा है। मुझे लगता है, पंडित जसराज हमारे समय के संगीत ऋषि हैं।...राग नट नारायण से वह मंगलाचरण करते हैं, ‘मंगलम भगवान विष्णु...मंगलम गरूड़ध्वज...।’ सुरों में पवित्रता की अवर्णनीय खनक। पंडितजी का गान खुद की उनकी प्रभु भक्ति का सहज संगीतात्मक रूपान्तरण ही तो है। स्वर, ताल और राग को निभाते वह रागों के अथाह समुद्र में ले जाते हैं। सुनने वालों को उसमें डूबकी लगवाते, पवित्र करते।

साज और सुरों का अनूठा मेल लिए वह गा रहे हैं, ‘जब से छवि देखी...’। स्वरों को ऊपर ले जाते औचक वह नीचे ले आते हैं... सप्तकों का भेद जैसे समाप्त हो रहा है। आरोह में अवरोह और अवरोह में आरोह। प्रस्तुत बंदिशों में मींड और स्वर, श्रवण सौन्दर्य क जैसे अद्भुत उजास रच रहे है। गान में अर्थवत् ध्वनियों का जो लोक वह रचते हैं, उसमें अध्यात्म की अनंत गहराईयां हैं। गायन की उनकी द्रुत गति तबले को भी बहुतेरी बार मात देती है। स्वरों की स्वाधीनता में कहीं कोई दखल नहीं करते हुए भी वह उन पर गजब का नियंत्रण रखते हैं। हृदयतंत्री के तार-तार को झंकृत करते विचलित होते हमारे भावों को अद्भुत शांति देता है उनका गान।

अचरज होता है, अस्सी की उम्र में भी श्वांस पर इस कदर नियंत्रण! लय में, सात सुरों में ‘निरंकार नारायण’ से प्रभु की प्रार्थना। म प ध नी...ध ग प ध नी। बीच-बीच में स्वरों का कंपन। गान मंे बहुतेरी बार वह स्वरों को हिलाते हैं। उनकी यह गमक चित्त को आनंदित करती है। झूले में झूल रहे हैं स्वर। आंदोलित गमक का अनूठा लोक रचा जा रहा है। संगीत का यह माधुर्य और कहां है! राग के वादी, संवादी, अनुवादी स्वरों में...सच! वह बढ़त करते हैं। सज रहे हैं स्वर। बोल बदल जाते हैं, ‘राधे-राधे बोलो बिहारी चले आएंगे...’। सहज-सरस गान। कहीं कोई उलझाव नहीं। आलाप में वह खुद को भी जैसे भुल रहे हैं। यह गान में आत्म की उनकी खोज है। भावों में माधुर्य का अनुष्ठान। ‘राधे गुन गावूं, मैं श्याम को रीझावूं...’, सुरदास के पद ‘मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायौ...’ गाते वह खुद रचित भजन भी सुनाते हैं, ‘मेरे प्यारे लला, हनुमान लला...’। हृदय के सूक्ष्म भावों की भाषा ही जैसे इसमें उन्होंने रची है।

मुझे लगता है, संगीत मार्तण्ड गान में स्वरों का सर्वथा नया बनाव करते हैं। राग वही है जिसे दूसरे भी गाते हैं परन्तु पंडित जी की अपनी उपज है। वहां शब्दों को जैसे भक्तिरस से गुना गया हैं। सर्वथा अलग है राग का उनका निभाव। पवित्रता का आह्वान करता। हमारे यहां कहा भी गया है, ‘नादाधीनं जगत’ अर्थात् संपूर्ण जगत नाद के अधीन है। पं. जसराज के नाद के सभी सुनने वाले हम अधीन हैं। जीवन में पूर्णता का आर्विभाव करते उन्हें सुनना क्या अनिवर्चनीय की उपलब्धि ही नहीं है!

Friday, December 31, 2010

आईए, हम भी रचें नए वर्ष का उजास...

कल अज्ञेय को पढ़ रहा था। शब्दों में वह कला का अद्भुत लोक रचते हैं। आप-हम सबकी सुप्त अनुभूतियों और संवेदनाओं को स्वर देते हुए। भीतर की नींद से जगाते। थोड़े में बहुत कुछ कहते। काव्य कला के चर्म को उनके लिखे में अनुभूत किया जा सकता है, ‘उड़ गयी चिड़िया@कॉपी, फिर@थिर@हो गयी पत्ती।’ मुझे लगता है, यह अज्ञेय ही हैं जो शब्दों के भीतर के मौन को भी स्वर देते हैं। समय और उसकी चेतना से साक्षात् कराते वह जड़ की बात करते हैं। जड़ की बात कौनसी? जो आज है वह कल नहीं होगा। तब क्या यह जो आज है वह क्या हमारी परम्परा नहीं बन जाएगा! मन इस परम्परा में ही है। अज्ञेय की काव्य कला की परम्परा में, चित्रकारों की चित्रकृतियों की परम्परा में, नृत्य की, नाट्य की, संगीत की हमारी परम्परा में। हम जितना उन परम्पराओं में जाते हैं, उतना ही नवीन होते हैं। अंदर का हमारा जो रीता है, वह भरता है। यह परम्परा ही है जो अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती है। सामाजिक जीवन को इसी से तो निरंतरता मिलती है।

यह वर्ष आज बीत रहा है। कल नया सूर्य उगेगा। कैलेण्डर बदल जाएगा। नया साल प्रारंभ हो जाएगा, कैलेण्डर बदलने की परम्परा को जीवित रखते हुए! एमिली डिकिन्सन की बेहद खूबसूरत सी एक कविता याद आ रही है, ‘दिस इज माई लेटर टू दी वल्र्ड..’। वह कहती हैं मैं कविता नहीं कर रही। यह तो बहुत जरूरी, निहायत जरूरी चिट्ठी है मेरी-दुनिया के नाम...जिसे लिखे बिना मैं रह नहीं सकती-भले दुनिया उसे समझे न समझे, भले दुनिया को उसे पढ़ने की फुरसत हो, न हो।’ एमिली कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही है। कह क्या रही है, हममें जैसे प्रवेश कर रही है। यही तो संप्रेषण की उसकी कला है। सच्ची कला कल्पना और अनुभूति का ही तो संयोजन है। एक तरह से कल्पना प्रवण भावुकता के दौर में आए एक संवेदनशील मस्तिष्क की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति। कवि, चित्रकार, अभिनेता, नर्तक जब कलाकर्म कर रहा होता है तो बहुत से स्तरों पर हमसे संवाद ही तो कर रहा होता है। आत्मीयता का अहसास कराते। हमें लगता है, वह जो संवाद कर रहा है, वही तो हमारा अपना सच है। हम भाव-विभोर हो उठते हैं। गलगलापन हो जाता है। लगता है, बस केवल और केवल हमारे लिए ही है शब्द, कलाकृति। यही तो है कला की हमारी परम्परा। जीवन की एक प्रकार से पुनर्रचना। हम अपने होने को सदा कलाओं में ही ढूंढते हैं। बार-बार यह याद करते,-ईश्वर की रची कला ही तो है यह सम्पूर्ण सृष्टि।

इस मूल्यमूढ़ समय में अनुभव संवेदन की हमारी क्षमता के अंतर्गत यह कलाएं ही हैं जो हमें बचाए हुए है। नए माध्यमों में हमारी अपनी पहचान और भीतर की खोज का उन्मेष जगाती समयातीत हैं हमारी तमाम कलाएं। उनकी परम्पराएं। यह कलाएं ही हैं जिनके सरोकार उत्तरोतर विराट् और व्यापक होने की सामथ्र्य रखते हैं। परम्परा के पोषण और परस्परता में वे निरंतर उगती रहती है सांमजस्य भाव पैदा करते। विग्रह के लिए वहां कोई अवकाश नहीं है। आत्म को व्यक्त करने का माध्यम हैं कलाएं।

आईए, बीते वक्त की तमाम कड़वाहटों को भुलाते, अच्छाईयों को याद करते साहित्य, संगीत, नृत्य और चित्र कृतियों की कलाओं मे रमें। उन्हें अपने भीतर की सर्जना से रचें। हर दिन नया आसमान छूएं। अपना नया आकाश बनाएं।...बचेगा वही जो रचेगा। यह आकाश ही तो है जिसमें कुछ नहीं रहता और सब भरा रहता है।...यह जब लिख रहा हूं, सर्जन के गहरे सरोकार लिए, देश के ख्यातनाम कलाकार अवधेश मिश्र की कलाकृति का आस्वाद भी ले रहा हूं। आप भी लें यह आस्वाद! आइये कलाओं में बसें।...हम भी रचें नए वर्ष का उजास।
डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" 31-12-2010

Friday, December 24, 2010

सांवर सा ओ गिरधारी...ओ भरोसो भारी...

गान का रस जहां मिलता है वही संगीत है। भारतीय संगीत की अनवरत धारा से बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा जो आध्यात्मिक और भावात्मक जीवन का आज भी अनिवार्य अंग है। मंदिरों में आरती वन्दन के समय जाएं और पाएं, वहां जो ध्वनित होता है उसमें अनूठी कला की धारा जैसे प्रवाहित हो रही होती है। भले शब्द हमें वहां बहुतेरी बार समझ नहीं आ रहे होेते हैं परन्तु भीतर के आनंद के भाव सहज संप्रेषित होते हैं। मदिरों में ही तो हिन्दुस्तानी संगीत ने जन्म पाया है। हर प्रांत, स्थान के लोगों ने प्रभु की आराधना को अपनी समझ से स्वर दिए और इसी से शायद आरतियों का भी सृजन हुआ।

सामुहिक रूप में जब कभी किसी भी भाषा में ईश आराधना के स्वरों का प्रवाह होता है तो वह समझ आता है। मुझे लगता है, मूलतः यही तो है संगीत की कलात्मक्ता। आरती जब हम सुन रहे होते हैं तो समवेत शब्दों का आस्वाद ही नहीं कर रहे होते हैं बल्कि उनमें निहित भावों में आनंदानुभूति भी कर रहे होते हैं। तब लगता है, शब्द मात्र उन ध्वनियों का पुंज मात्र नहीं है जो बोली जाती है बल्कि वह ध्वनिशास्त्रीय या आक्षरिक ढ़ांचे पर स्थापित एक प्रकार से मानसिक अवधारणा है। इस अवधारणा में भले वह बहुतेरी बार पढ़त और गान की प्रक्रिया में ही अर्थ को पूरा करता हो परन्तु मूलतः उसकी सबसे बड़ी क्षमता अर्थोत्पादकता ही है। यह शब्द की कला शक्ति ही तो है जो उसे अर्थ से जोड़ती है।

कुमार गंधर्व का कहा याद आ रहा है, मधुर गला होने से ही कोई गायक थोड़े बन सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि स्वरों पर आपकी हुकूमत कितनी है। जिसके लिए गाते हैं, उसमें आपकी श्रद्धा कितनी है। आरती गान वाले भले संगीत का क ख ग ही नहीं जानें परन्तु जब वह आरती गा रहे होते हैं तो संगीतकला को ही जी रहे होते हैं। वर्षो से अपने जन्मे-जाये शहर बीकानेर के लक्ष्मीनाथ मंदिर जाता रहा हूं। इस बार जब गया तो समवेत स्वरों में निहित शब्दों को समझने का प्रयास किया। पुरूष-महिलाएं विभोर हो प्रभु की आरती में लीन हैं। संगीत के अद्भुत रस का प्रवाह हो रहा है। एक साथ सधे हुए स्वरों का पान करते मन पवित्रता के सागर में गोते लगाने लगा। भूल गया कि शब्द समझने आया हूं।...शब्द नही भाव समझ आ रहे थे। वह भी ऐसे जिन्हें किसी ओर को कहां समझा सकता था! मैंने एक काम किया। आरती को अपने मोबाईल में रिकॉर्ड कर लिया। जयपुर जब आया तो उसे सुना। एक बार नहीं, बार-बार। समूह स्वरों में आरती के शब्द जो ध्वनित हुए, वह थे ‘सांवर सा ओ गिरधारी...ओ भरोसो भारी... ओ शरण तिहारी। ओ हर बिना मोरी, गोपाल बिना मोरी, लक्ष्मी रे नाथ बिना मोरी... कौन खबर ले...।...‘शहस्त्र गोप्यां रो गिरधरधारी। चक्करधारी...।’

जरा गौर करें गोपियों को गोप्यां और चक्रधारी को चक्करधारी कहा गया है। खालिश बीकानेरी भाषा में रची आरती को बचपन से सुनता रहा परन्तु उसके शब्दों में कभी गया ही नहीं। बस! संगीत के माधुर्य का ही पान करता रहा। जिस प्रकार से लोकगीतों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें किसने रचा, ठीक वैसे ही आरतियों के बारे में भी यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें किसने रचा। हां, आंचलिक भाषा की मिठास के साथ उनमें संगीत के सास्वत स्वरों का प्रवाह हर जगह एक ही है। दरअसल वहां शब्द सत्तावान है और अर्थ नित्य। घुम्मकड़ी के अपने स्वभाव के कारण देशभर के मंदिरों में गया हूं और पाया यही है कि वहां आरती के शब्द भले अलग हों परन्तु उनमें सौन्दर्यपरक आनंद का हेतु तो एक ही है। यही तो है संगीत कला! उपनिषद् कहते हैं, ‘रसो वै सः’ अर्थात् रस ही आनंद है। अन्य ललित कलाओं से संगीत कला निराली है। संगीत में एक साची नहीं सव्यसाची होते हैं कलाकार।...आनंद रस की बरखा करते!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर  प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 24-12-2010

Saturday, December 18, 2010

बंधनों से मुक्त इन्स्टालेशन आर्ट का यह नया दौर

कहते हैं, यह दौर संस्थापन कला का है। संस्थापन कला माने इंस्टालेशन आर्ट। पश्चिम में ही नहीं बल्कि भारत में भी इस तरफ हर ओर, हर छोर कलाकारो में रूझान साफ दिखायी देने लगा है। यूं भी हर कला युगीन परिवर्तनों की संवाहक होती है। स्वाभाविक ही है कि युग में जो कुछ नया होता है, उसे कलाएं स्वीकार करती हुई ही सदा आगे बढ़ती है। जो आज है, कल वह पुराना होगा ही। आधुनिकता के अंतर्गत बंधनों से मुक्त इन्स्टालेशन आर्ट का भले यह नया दौर कहा जा रहा हो परन्तु मुझे लगता है, संस्थापन कोई नई चीज नहीं है। कला में अभिव्यक्ति की इसे एक एक नई भाषा जरूर माना जा सकता है। ऐसी भाषा जो कैनवस के बंधन से मुक्त है। स्कल्पचर के निर्धारित आकार का बंधन वहां नहीं है। वहां स्क्ल्पचर और कैनवस पर खींची जाने वाली रेखाओं, खुरच और रंगों की एप्रोच तो है परन्तु सब कुछ वहां वर्चुअल है। यानी आभाषी। वहां ध्वनि है, रंग है, डिजिटल इमेजेज है और इन सब में दृश्यों को विशेष ढंग से रूपायित करने की कला की सर्वथा नयी दीठ भी है परन्तु मूल बात है संयोजन। बनी बनाई चीजें इन्सटॉलेशन में मिल जाती है। कला की दीठ से उनका एक प्रकार से संयोजन ही तो फिर कलाकार करता है।

इन्स्टॉलेशन में एक रंग या एक आकृति या फिर यूं कहें आकृतियों के कोलाज, ध्वनियों का विस्तार हमे ंविशुद्ध ऐन्द्रिय आनंद प्रदान कर सकते हैं। वहां कलाकार किसी एक कला के सरोकार लिए नहीं होता, उसकी समझ का वहां विस्तार है। उसके सरोकार व्यापक रूप में कला के बहुत से रूपों से जुड़े होते हैं। मौन भी अगर वहां है तो वह एक खास अंदाज में उद्घाटित होता है। समय की पदचाप से जुड़ी आकृतियों की अनुभूतियां वहां है। यह नहीं कहा जा सकता है कि वहां संगीत है तो वह गायन या वादन के रूप में ही है। यह नहीं कहा जा सकता है कि वहां चित्र है तो कैनवस पर और मूर्ति में उकेरा यथार्थ या अमूर्त है। संगीत है तो वह सुनी हुई आवाजों में निहित नहीं है। चित्र है तो वह देखे हुए रंगों में नहीं है। जो है, वह रूपाकार में नहीं, रूपाकार और उससे संबद्ध सामग्री के बीच की चीजों में है। बल्कि यूं कहना चाहिए कि वहां रूपाकार और रूपायित करने के बीच का भेद बहुत से स्तरों पर समाप्त होता लगता है। वहां कोई बंधन नहीं है। विषयवस्तु की अधीनता नहीं है। जो है मुक्त है। बंधन रहित। देखी या सुनी हुई, अनुभूत की हुई की बजाय बहुत कुछ वहां कल्पित है। संवेदना में बुना कल्पना का ताना-बाना। ऐसा जिसमें बहुत कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहने की छटपटाहट है।

तकनीक का सशक्त पक्ष इन्स्टॉलेशन आर्ट में है परन्तु इस बात पर फिर भी हमें गौर करना ही होगा कि वह वहां अभिव्यक्ति का साधन है, साध्य नहीं। रंगीन वर्णो, आयतों और लकीरों का तनावपूर्ण संयोजन और कम्प्यूटर के साथ ही विभिन्न अन्य स्तरों पर अभिव्यक्त इंस्टालेशन आर्ट को ऐसे में कला नहीं कला की प्रतिछाया ही क्या नहीं कहा जाएगा!

कलाकार अन्तर्मन में बनने वाली छवियों, और स्थान विशेष के साथ जुड़ी यादों के बिम्बों को सहज और आत्मीय संस्थापनों के जरिए ही तो कला में अभिव्यक्त करता है। इस अभिव्यक्ति में आभासी (वर्चुअल) और वास्तविक के बीच के द्धन्द केा भले ही इन्स्टालेशन आर्ट के तहत ही अधिक सशक्त ढंग से उजागर किया जा सकता है, परन्तु छवि विज्ञान यानी इमेजोलॉजी के अंतर्गत यदि बगैर किसी रचनात्मक सोच के साथ कुछ किया जाता है तो उसकी कोई सार्थकता है क्या? इस पर विचार किए जाने की जरूरत क्या इस दौर में अधिक नहीं है। आप ही बताईए!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 17-12-2010

Friday, December 10, 2010

आधुनिक भारतीय कला की नयी आलोचकीय दीठ

कलाएं हमें समझ का नया आलोक देती है। कुछ हद तक जीवन जीने का एक नया अर्थ भी देती है। इसीलिए जब कभी किसी कलाकृति से हम प्रतिकृत होते हैं तो उसमें निहित कलाकार की भावनाओं, संवेदनाओं से अपने आप ही साक्षात् होता हैं। कलाकृति तब हमें अपनी लगती हमसे जैसे संवाद भी करने लगती है और इसी से उसको बनाने वाले का भी बहुत से स्तरों पर अपने आप ही मूल्यांकन हो जाता है। कला मूल्यांकन का मूलतः आधार भी यही होना चाहिए परन्तु कला पर केन्द्रित जो पुस्तकें इधर आ रही है, उन्हें पढ़ते लगता है वहां कलाकार प्रमुख है, उसकी कला गौण है। कलाकार का परिवेश, संस्कार, प्रेरणा, सम्मान, पुरस्कार, जीवन के हर्ष-विषाद ही वहां बहुधा मिलते हैं। कला और कलाकार के मूल्यांकन का आधार क्या यही सब कुछ है! ‘समकालीन कला के सम्पादक, आलोचक मित्र डॉ. ज्योतिष जोशी ने कुछ समय पूर्व जब अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय कला’ भेजी तो लगा, उन्होंने भी प्रकाशक की किसी मांग को त्वरित पूरा किया है। पढ़ने के आपके एकसे अनुभव बहुतेरी बार पूर्वाग्रह उपजा देते हैं सो उनकी पुस्तक को इस पूर्वाग्रह ने ही तब पढ़ने नहीं दिया। किसी संदर्भ में कुछ दिन पहले पुस्तक को यूं ही जब टटोला तो लगा कलाकारों के अवदान पर लिखे की अतिअभ्यस्त संवेदना के संसार से भिन्न उन्होंने भारतीय कला के मर्म को इसमें गहरे से छुआ है। कलाकारो की सर्जना के अंतर्गत उनके बनाए चित्रों की बारीकियों में तो वह अपनी इस पुस्तक में गए ही हैं, कलाकार की अपनी ही कला के संदर्भ में की गयी स्वीकारोक्तियों के आलोक में वह पाठकों को कला कथ्य का भी अनायास जैसे नया संदर्भ इसमें देते हैं। राजा रवि वर्मा पर लिखी उनकी यह पंक्तियां देखें, ‘संगीत के स्वरों को उनके आकास(स्पेस) झंकृत करते हैं, नृत्य परिवेश रचता है, साहित्य का सौन्दर्य चरित्रों को समग्रता में रूपायित करता है और कला शेष कलाओं से समन्वित होकर रूपंकर का प्रतिमान बन जाती है।...’

बहरहाल, नंदलाल बसु, यामिनी राय, असित कुमार हालदार, गुरचरण सिंह, कंवल कृष्ण, अमृता शेरगिल, शरतचन्द्र देब, एम.एफ.हुसैन, चित्त प्रसाद, धनराज भगत, रामकुमार, अकबर पदमसी, तैयब मेहता, हकुशाह, अंजलि इला मेनन, बिकास भट्टाचार्यी, ए. रामचन्द्रन, बीरेन दे, सतीश गुजराल, एफ.एन.सूजा, वासुदेव एस. गायतोण्डे, सोमनाथ होर, मनजीत बावा आदि कलाकारों के अवदान पर लिखते वह उनकी कला का रचनात्मक परिचय तो देते ही हैं, स्वयं अपने आत्मानुभवों का एक नया तर्क विन्यास भी पाठकों के समक्ष रखते हैं। मसलन राजा रवि वर्मा के बारे में वह लिखते हैं कि उन्होंने भारतीय भावनाओं और सौन्दर्यशास्त्रीय अवधारणाओं की उपेक्षा की परन्तु इस बात में सच्चाई है कि उन्होंने ही भारतीय कला की आधुनिकता संभव की;यह अलग बात है कि अवनीन्द्रनाथ टैगौर के नेतृत्व में भारतीय कला का राष्ट्रवाद विकसित हुआ। ऐसे ही देवीप्रसाद रायचैधुरी के समानांतर वह रामकिंकर बैज की मूर्तिकला की स्वच्छन्दता की बात करते हैं तो रजा की कला को भारतीय दर्शन की खोज की परम्परा की दृष्टि से वह महत्वपूर्ण बताते हैं। रामकुमार की अमूर्ततता को वह गहरी अनुभूतियों की संज्ञा देते हैं तो के.जी.सुब्रमण्यनन के चित्रों की दृश्यभाषा के गंभीर भावों की लय पर जाते वह सूजा की कला की निर्वसन स्त्रियों को कला के बाजार से जोड़ते हैं। ए.रामचन्द्रन की कला में आख्यान और संदर्भों के विखंडन के साथ ही हकुशा की कला के मानववाद के साथ ही पणिकर की कला में पारम्परिक प्रतिमानों को खंडित कर उसमें समकालीन जीवन के जटिल ताने-बाने पर जाते ज्योतिष सोमनाथ होर द्वारा छापाकला को नई प्रविधि से और भोगी यातना से शिखरत्व पर पहुंचाने की चर्चा करना भी नहीं भुलते। ज्योतिष अपनी इस पुस्तक में कला के गूढ़ और गंभीर अर्थों से भारतीय कला को समझने की एक नयी आलोचकीय दीठ भी देते है। इस दीठ में पुस्तक के अंत में आधुनिक भारतीय कलाकृतियों के संजोए 48 रंगीन चित्र भी भरपुर मदद करते है।
"डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का साप्ताहिक स्तम्भ "कला तट" दिनांक 10-12-2010

Friday, December 3, 2010

जलरंगों में दृश्य यथार्थ की नयी दीठ

दृश्यकला में चित्रकला ही ऐसी है जो आधार और माध्यम की दृष्टि से सर्वाधिक सूक्ष्म है। यथार्थ का अंकन भी उसमें यदि होता है तो वह खाली यथार्थ भर नहीं होता बल्कि सूक्ष्म रूप में उसमें कलाकार अपनी आंतरिक एकता और अनुशासन में नई दृष्टि का विस्तार करते देखे हुए का एक प्रकार से पृनर्सृजन करता है। नागपुर शासकीय चित्रकला महाविद्यालय के आचार्य मारूति सेलके के आग्रह पर इस सोमवार को वहां के विद्यार्थियो ंको जब कला की संवेदना पर संबोधित करना हुआ तो प्रकृति चित्रो के अनंत आकाश को जैसे फिर से जिया। स्थान विशेष और प्रकृति के लैण्डस्केप शायद इसीलिए हर कोई पंसद करता है कि उनमें सौन्दर्य की चाक्षुष दीठ होती है। सच कहूं, यह स्थान विशेष और प्रकृति के नाना रूपों के लैण्डस्केप ही थे, जिन्होंने कला से मेरा पहले पहल रिश्ता कराया। ख्यात-विख्यात कलाकारों के बनाए लैण्डस्केप देखने में बाद में इतना प्रवृत हुआ कि ढूंढ-ढूंढ कर स्थानों के बनाए चित्रों का आस्वाद करने लगा। बहुतेरी बार ऐसा भी हुआ कि कोई लैण्डस्केप देखता, फिर उस स्थान पर जाता। मुझे लगता प्रत्यक्ष जो देखता हूं, उसके परे भी बहुत कुछ ऐसा है जो कलाकार ने अपने चित्र में बनाया है। उसे यथार्थ में हमारी आंख शायद पकड़ नहीं पाती। कलाकार के संवेदना चक्षु ही हमें तब सर्वथा नयी दृष्टि देते है। कला ही यह जो दीठ है, उसी ने बाद में कला के मेरे लेखक को बाहर निकाल, कलाकृतियों पर लिखने की ओर निरंतर प्रवृत किया।

बहरहाल, नागपुर के शासकीय चित्रकला महाविद्यालय में भविष्य के कलाकारों के साथ संवाद के बाद प्रो. मारूति सेलके अपने घर ले गए। वहां उनके बनाए बहुत से चित्रों को देखते औचक दृष्टि उनके बनाए एक लैण्डस्केप पर गयी। जलरंगों में प्रकृति जैसे वहां गा रही थी। मैंने उस चित्र पर जब ज्यादा गौर किया तो बेहद संकोच से वह बोले, ‘ये तो बस ऐसे ही बनाया है।’ मैंने उनके उन चित्रों में बेहद उत्सुकता दिखायी तो वे पूरी की पूरी एक श्रृंखला ले आए। नागपुर के ज्ञात-अज्ञात स्थानों की उनकी इस जलरंग श्रृंखला में प्राच्य स्थलों के साथ ही आधुनिक निर्माण, पेड़-पौधे, तालाब, मंदिर, महल और रोजमर्रा के जीवन को उन्होंने इनमें जैसे जिया है। देखे हुए यथार्थ और उनसे उपजी अनुभूतियों और अंतर्दृष्टि का रंगों और रेखाओं से कागज पर पुनराविष्कार करते वह नागपुर की जैसे पूरी सैर ही करा देते हैं। नागपुर की अंबाझरी झील, शिवन गांव, महल, तेलम खेड़ी, दीक्षाभूमि और प्रकृति के उल्लास को रंगों और आकृतियों के संयोजन में गहरे से उद्घाटित करते सेलके अपने चित्रों में कला का जटिल व्याकरण नहीं रचते बल्कि जल रंगों के सुन्दर लोक में ले जाते हैं। यह ऐसा है जिसमें सघन, शुद्ध और मूल रंगों की उत्सवधर्मिता है तो मौन में निहित ध्वनि को भी इनमें सुनते स्थान विशेष के एकांत को अनुभूत किया जा सकता है। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि रेखाओं की सहज वर्तुलता और विषयवस्तु के गठन और संयोजन के बीच के स्थान और अवकाश को भी उन्होंने इन चित्रों में गहरे से पकड़ा है। जल रंगों का उजास तो इनमें हर ओर, हर छोर है ही। सेलके स्थान, काल और पात्र को अपनी कूची में विस्तार देते उन्हें अनूठा रंग सूत्र देते हैं। इन सूत्रों में स्मृतियां, देखी हुई छवियां सर्वथा नये ढंग से उद्घाटित होती हैं। यथार्थ एक प्रकार से नई अर्थवत्ता प्राप्त करता यहां सौन्दर्य का सर्वथा नया आकाश रचता है।

दरअसल सेलके वस्तु, स्थानों और प्रकृति के चाक्षुष स्वभाव को निश्चित करते रंग, रूप, धरातल और उभार में अपने अनुभव और अंतर्मन संवेदना की दृष्टि का एक प्रकार से विस्तार करते हैं। ऐसे में जो कुछ वह देखते रहे हैं, उससे प्राप्त अनुभवों का कला रूपान्तरण मन को भाता है, कुछ कहने को विवश करता भीतर की सौन्दर्य दृष्टि को एक प्रकार से जगाता है। नागपुर के इतिहास, वहां की संस्कृति, रोजमर्रा के जीवन, स्थान विशेष की दृश्यावलियों के जल रंगों के सेलके के भव को अनुभूत करते उन्हें प्रस्तावित करता हूं कि क्यों नहीं इस श्रृंखला की ही एक प्रदर्शनी आयोजित की जाए। इसलिए भी कि बहुत से स्तरो पर वह इन दृश्यावलियों में प्रकाश-छाया प्रभावों के अंतर्गत दृश्य यथार्थ का सर्वथा नया बिम्ब भी रचते हैं। इस बिम्ब में क्षैतिज एवं समरैखिक दृष्टि का अद्भुत सांमजस्य है। जल रंगों के बरतने का उनका गुण तो खैर अनूठा है ही जिसमें देखे हुए को अपने संवेदना चक्षु से वह और अधिक सुन्दर, भावपूर्ण बनाते ऐसा माहौल भी अनायास उत्पन्न करते हैं जिससे रंग देखने वाले से जैसे संवाद करते है। सेलके के जलरंगों की यही वह मौलिकता है, जो उन्हें ओरों से जुदा करती है।
राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का साप्ताहिक स्तम्भ "कला तट" दिनांक 3-12-2010

Friday, November 26, 2010

कैनवस पर अनुभतियों का अर्थोन्मेष

चित्रकला रूपार्थ पर निर्भर है जबकि काव्य कला वागर्थ पर। कला में रंग, आकार तथा इनके विन्यास हमारी आंखों के जरिए हमारी संपूर्ण इन्द्रियों को संवेदित करते हैं। यहां यह सब इसलिए कि काव्य संवेदना रखने वाला जब कैनवस पर रंगो और रेखाओं से दर्शकों का नाता कराता है तो उसमें अर्थ संदर्भों के नए गवाक्ष अनायास ही खुलते दिखायी देते हैं। तेजी ग्रोवर मूलतः कवयित्री हैं परन्तु पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में लगी चित्रों की उनकी प्रदर्शनी को देखते लगा, कैनवस पर वह प्रकृति के स्वरूप, दृश्यों को सर्वथा नयी दीठ से रूपायित करती है। उनके चित्र बिम्बो में समय की संवेदना और प्रकृति की बहुतेरी भंगिमाएं कला का अनूठा सौन्दर्य रचती है। ऐसा नहीं है उनके सारे चित्र प्रकृति केन्द्रित ही है, उनमें रोजमर्रा की जीवनानुभूतियां भी है परन्तु एक बात सबमें समान है और वह है उनका सांगीतिक आस्वाद। कैनवस पर उनकी कला से साक्षात् होते औचक स्वयं उनकी ही लिखी कविता की पंक्तियां जेहन में कौंधने लगती है, ‘वे बिम्ब ही थे@जिनसे और बिम्ब उपजते थे@कुछ और मिट जाते थे@उनसे निकलना@उनकी अति के बाद ही संभव होता@उनका तिरस्कार@उन्हें रचने की सामथ्र्य से@रचने की सामथ्र्य को रचते भी बिम्ब थे@मिटाते भी थे....।’

तेजी के चित्रों में ऐसे ही बिम्बों की भरमार है, प्रतीक हैं और यह ऐसे हैं जिनसे बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसा ही उनका एक चित्र है जिसमें भगवा, पीली, हरी, सफेद रंगों की आकृतियां है। रंगों का संयोजन ऐसा कि उसमें अध्यात्म की गहराईयो ंको गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। यूं देखने पर चित्र पत्तियों का कोलाज भर दिखायी देता है परन्तु जैसे-जैसे उस पर गौर किया जाता है, वहां रंगों का अनूठा आलोक बिखरा दिखायी देता है। इस आलोक में शांत बहती नदी है, मंद बहती पवन है और है प्रकृति की गुनगुनाहट भी। ऐसे ही दूसरा एक चित्र है जिसमें पत्तियां का रंग हरा, मटमैला सा है। जीवन की आस-निराश के साथ तमाम विविधताओं को इनमें अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, तेजी बिम्बों में लय का सर्वथा नया मुहावरा रचती है।

मुझे लगता है, तेजी सृष्टि में व्याप्त सौन्दर्य को अखंड और वृहद रूप में देखती है। शायद यही कारण है कि उनके चित्रों में प्रतिकात्मक लाल में भी हरापन है। हरेपन में पीलापन। काले में सफेद और ऐसे ही एक रंग में उसके विपरीत का अनुठा मिश्रण। जीवन दर्शन की लय जैसे कैनवस पर गहरे से गुनगुनाई गयी है। उनके चित्र दरअसल समकालीन कला परिदृश्य में एक जरूरी हस्तक्षेप करते हैं। वे ऐसे अर्थ के अनुसंधान की ओर भी ले जाते हैं जिनमें भारतीय संस्कृति, हमारे संस्कार और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के बहुतेरे भाव भी निहित हैं। होने और न होने के बीच के स्पेस में अन्तर्मन संवेदनाओं को कैनवस पर स्वर देती तेजी जीवन, समाज और प्रकृति से घुल-मिलकर अपनी गहन अनुभूतियों को ही जैसे कैनवस पर अनुप्राणित करती है।

तेजी के चित्रों में रंग, रेखाएं, टैक्सचर और स्थापत्य मिलकर रूपकों की जो निर्मिती करते हैं, उनमें रंगों के भी अनूठे बिम्ब है। एक्रेलिक, आॅयल के साथ ही तेजी के बरते रंगों की खास बात स्वयं उसके द्वारा सृजित रंग भी है। मसलन उसने अपने चित्रों में हल्दी, अनार के रस, फूलों, पत्तियों को घोलकर बनाए रंग भी बहुतायत से प्रयुक्त किए हैं। ऐसे में चित्रों में निहित विषय रंगों के उसके संयोजन, स्वयं उसकी विचारधारा और प्रकृति से उनके जुड़ाव को भी सहज संप्रेषित करते हैं। तेजी के चित्रों में लोक चित्रो की सौरभ है तो बहुत से चित्रों में प्रयुक्त अलंकरण, फूल-पत्तियां समकालीन बोध की भी विशिष्ट अर्थ छवियां लिए है। रंग और रेखाओं का यही तो गतिशील प्रवाह हैं और कला की सांस्कृतिक दीठ भी।

कभी निर्मल वर्मा ने कहा था, ‘कलाकृति से एक अर्थ निकालना-अथवा उसमें अपने विश्वासों का सबूत ढूंढना-दोनों ही बातें झूठी नैतिकता को जन्म देती है। कला की नैतिकता इसमें नहीं है कि वह हमारे संस्कारों या विश्वासों का समर्थन करे,...कला सिखाती नहीं, सिर्फ जगाती है, क्योंकि उसके पास ‘परम सत्य’ की ऐसी कोई कसौटी नहीं, जिसके आधार पर वह गलत और सही, नैतिक और अनैतिक के बीच भेद करने का दावा कर सके।’ मैं इसमें यह और जोड़ देता हूं, ‘कला सत्य या यथार्थ नहीं है, वह सत्य या यथार्थ की खोज की एक प्रकार से प्रस्तावना है।’ तेजी के चित्रों की इस प्रसतावना में निहित संवेदना ही कला का क्या परम सौन्दर्य नहीं है! आप ही बताइये।
राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 26-11-2010


Friday, November 19, 2010

मुरली की तान में माधुर्य की सृष्टि

सूक्ष्म अंतर्वृतियों के उद्घाटन का सबल माध्यम संगीत ही है। खाली ध्वनि भर नहीं है संगीत। आंतरिक भावों, अनुभूतियों को इसमें जब अभिव्यक्ति दी जाती है तो लगता है, प्रकृति गा रही है। मुझे लगता है, संगीत का विशुद्धतम रूप वाद्य है। वाद्यों का जन्म नैसर्गिक ध्वनियों के अनुकरण तथा अन्य चेष्टाओं के परिणामस्वरूप ही हुआ है। बांसुरी को ही लें। इसकी मीठी तान जब भी कानो मंे पड़ती है, लगता है प्रकृति माधुर्य का रस घोल रही है। प्रकृति वाद्य ही तो है बांसुरी। कहते हैं, कभी कीटों ने बांस के एक टूकड़े मंे छेद कर दिया। छेद में से होकर निकलने वाली हवा से जब मधुर ध्वनि निकली तो बांसुरी के निर्माण की पहल हुई।...ऐसा ही कुछ कहानी अन्य वाद्यों के साथ भी रही होगी परन्तु अभी तो बात मुरली की हो रही है। कन्हैया जिसे बजाते, उसी मुरली की।

पंडित रोनू मजूमदार की बांसूरी की तान सुनते लगा, वह अंतर के साथ बाहर के राग-अनुराग का अद्भुत मेल कराते हैं। मुरली में फूंक के जरिए वह जैसे नूतन की सृष्टि करते हैं। ‘म्यूजिक इन द पार्क’ में उन्हें सुनते लगा भांत-भांत के सुर संजोती उनकी बांसूरी गा रही है। बांसुरी में वह बढ़त करते हैं। बढ़त माने विस्तार। ढ़लती सांझ रात्रि की ओर बढ़ने लगी थी। मुरली की तान छेड़ने से पहले श्रोताओं से संवाद करते वह कहने लगे, ‘मन की शांति और अध्यात्म से जुड़ा है हमारा संगीत। मुरली प्रकृति वाद्य है। इसमें न तार है न चाभी। चलिए आपको सुनाता हूं,...पहले आलाप होगा।’

मुरली की तान छिड़ जाती है। खुले आसमान में दूर तक फैली हरियाली में सुरों की मिठास घोलती। राग के चरणबद्ध शास्त्रोक्त स्वरूप में रमने लगा मन। विलम्बित लय का आलाप। स्वरों की बढ़त। तार, अति तार, मन्द्र और मध्य सप्तकों में वह आलापों का माधुर्य विस्तार करते जैसे खुद भी उसमें खो से जाते हैं। आरंभ होता है, राग बागेश्वरी से। संगीत की चिर सम्पूर्णता में हृदयभावों की उनकी अभिव्यंजना सूक्ष्मातिसूक्ष्म परन्तु बंधनमुक्त सुरांे की निर्मिति करती जैसे ईश्वर से तादात्म्य की गुहार कर रही है। बांसूरी में पुकार। प्रार्थना की ध्वनि। सांसो से सधा भावों का मनोयोग। शांति, नीरवता और पवित्रता लिए। ध्वनि में मौन।...औचक जैसे पं. रोनू ने अपने होठों से लगी बांसूरी से शंख बजाया है। ठीक वैसे ही जैसे ईश़्ा आरती में बजता है शंख।

प्रभु! बांसुरी में शंखनाद। यह मोटी बांसुरी है। अति मन्द्र सप्तक में शंखनाद करती। ध्वनि के माधुर्य में पंडितजी अलग-अलग बांसुरियों से बढ़त करते हैं। लगता ऐसे है जैसे एक ही बांसुरी में वह सप्तकों को साध रहे हैं, ईश्वर को रिझाते। मनाते। शंखनाद के बाद मन्द्र और मध्य सप्तक के सुर। लम्बी तान। पुकार! आनंद विभोर करती बांसुरी। अनंत में विलीन होते सुर। तबला नहीं बज रहा परन्तु उसकी थाप है। तानपुरा नहीं परन्तु उसकी तान है।...मन को लुभाती बासुरी जैसे गा रही है। इस गान में आरोह है और अवरोह भी। मुझे लगता है, सधते सुरों में बांसुरी एक-एक कर दीप जला रही है। अंतर के दीप। एक...दूसरा...तीसरा और फिर अनेक दीपकों की रोशनी से जैसे नहा उठा माहौल। बांसुरी की पं. रोनू मजूमदार की तान जैसे आह्वान कर रही है, जल दीप। जल! हर ओर संगीत का उजास। मंद बहती पवन भी झुम कर तेजी से बहने लगी। सुरों का कारंवा भी परवान चढ़ने लगा।

तबले में सुधीर पाण्डे भी उनको गजब का साथ देते हैं। आलाप के साथ राग को उठाते वह मंड, मध्य और तार सप्तक का शनैःशनैः जब विस्तार करते हैं  तो ताल भी पूरा साथ देती है। भुपताल, तीनताल में बंदिशें। आलाप। शास्त्रीय रागों के साथ सुफी संगीत, मांड, पहाड़ी लोकसंगीत और मीरां के भजनों के माधुर्य में वह तन और मन दोनों को ही अंदर तक भिगोते हैं। उन्हें सुनते मन नहीं भरता। मुझे लगता है, बांसुरी की तान में वह अपने ही रचे को तोड़ते हैं। हर बार। बार-बार। मधुर तान में फूंक को एक जगह रोक वह उसके टूकड़े करने लगते हैं। फूंक को तोड़ते, फिर से उसे जोड़ते हैं। अद्भुत रस की सृष्टि करते। सांसो को गजब साधते मुरली वादन की यही उनकी मौलिकता है।

Friday, November 12, 2010

जड़ होते चिंतन को नई दिशा देता संवाद

आधुनिक कला प्रवृतियां और संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कला की परम्परा, विषय वस्तु, माध्यम पर हिन्दी में लगभग सन्नाटा सा पसरा रहता है। पत्र-पत्रिकाओं में कला पर जो कुछ छपता है, बहुधा  उसमें विचार गौण होता है। कला लेखन सर्जन में जो निहित है, उसकी संवेदनाओं की बजाय कलाकार को मिलने वाले सम्मान, पुरस्कार तथा तमाम अन्य घटनाओं पर ही जैसे केन्द्रित होता जा रहा है। ऐसे में ‘अखिलेश एक संवाद’ पुस्तक अंधेरे में जैसे
उजास लिए है। दूरभाष पर कवि, संपादक मित्र पीयूष दईया अपनी पत्रिका के लिए कला पर नया कुछ लिखने का आग्रह करते पूछते हैं, ‘आपको अखिलेश से संवाद की मेरी पुस्तक मिली?’ मैं नहीं कहता हूं तो वे सहर्ष इसे प्रकाशक से भिजवाते हैं। ख्यातनाम चित्रकार अखिलेश से पीयूष के लम्बे साक्षात्कार की इस पुस्तक का घूंट-घूंट  आस्वाद करते लगता है, हिन्दी में भारतीय कला को जैसे गहरे से जिया हूं।
पीयूष ने इसमें कला के आज और आने वाले कल के साथ ही परम्परा के सूत्र व्यापक रूप में संजोए हैं। ऐसा करते यह किताब कोरा संवाद भर नहीं रह गयी है बल्कि अपने आप में एक स्वतंत्र सृजन बन गयी है। पुस्तक में अखिलेश एक जगह कहते हैं, ‘चित्रकला में महत्वपूर्ण अवकाश है, समय नहीं। आप समय का चित्रांकन नही कर रहे होते हैं बल्कि आप अवकाश को रच रहे होते हैं।...’ वह जब यह कहते हैं तो कला में निहित किसी कलाकार की अन्तर्मन संवेदनाओं को, कला की उसमी जमीन को गहरे से समझा जा सकता है। उस जमीन को जिसमें अखिलेश मनुष्यता के सभ्यतर होने में सभी कलाओं का वास भी अनायास ही ढूंढ लेते हैं।
लियोनार्दो के ‘द लास्ट सपर’, पिकासो के ‘गुएर्निका’, वॉन गॉग के व्यक्तिचित्र, हुसैन के ‘जमीन’, डेमियन हस्र्ट की ‘फॉर द गॉड ऑफ  लव’ की प्रसंगवश चर्चा करते अखिलेश भारतीय और पाश्चात्य कला के परिप्रेक्ष्य के समझ की दृष्टि भी पाठक को अनायास देते हैं। पीयूष इस संवाद में कला के अनंत आकाश की बारीकियों से रू-ब-रू कराते पाठक को एक कलाकार के मन को पढ़ने का अवसर देते हैं।
दरअसल हमारे यहां कला और उसके अन्र्तसंबंधों को प्रायः गंभीरता से लिया ही नहीं गया है। कला और कलाकार के मध्य संवाद तो प्रायः नहीं के बराबर है। ऐसे में पीयूष ने अखिलेश के बहाने कलाकार के सर्जन में निहित उसकी समझ से जुड़े तमाम मुद्दों को एक प्रकार से रोशनी दी है। इस रोशनी में सृजन में निहित संवेदनाओं, रचनाशीलता के दूसरे सरोकारों के साथ रचना का समग्र परिप्रेक्ष्य उद्घाटित हुआ है। जड़ होते चिंतन को नई दिशा देते।
बहरहाल, मुझे लगता है संस्कृतिबोध, सौन्दर्यदृष्टि और कला से जुड़े अपने सरोकारों के कारण ही पीयूष अखिलेश के कलाकर्म और उसमें निहित उनकी सोच की सिराओं को गहरे से पकड़ पाए हैं। अपनी जिज्ञासाओं में उन्होंने एक तरह से अखिलेश के कलाकर्म का मंथन ही नहीं किया है बल्कि कला की प्रासंगिकता और परम्पराओं से भी सहज संवाद किया है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि अखिलेश से संवाद में कला के चिंतन सूत्रों में वह बहुत से स्तरों पर कलाकार की कला से ‘बाहर’ भी गए हैं। इसी से यह पुस्तक कला आलोचना की एक जरूरी आधारभूमि भी निर्मित करती है।  पीयूष ने इसमें कला की अछूती संभावनाओं को गहरे से छुआ ही नहीं है बल्कि कलाकार के मर्म को गहरे से अपने तई जिया भी है। ऐसे दौर में जब कला लेखन सिद्धान्तों की पड़ताल और अकादमिक निष्कर्षों तक ही सीमित होकर रह गया है, पीयूष की यह पुस्तक हिन्दी में कला विमर्श का नया आकाश निर्मित करती है। अशोक वाजपेयी ठीक ही कहते हैं, ‘भारतीय कला के व्यापक क्षेत्र में, और हिन्दी मंे तो बहुत कम ऐसा हुआ है कि कोई कलाकार अपनी कला, संसार की कला, परम्परा और आधुनिकता आदि पर विस्तार से, स्पष्टता से, गरमाहट और उत्तेजना से बात करे और उसे ऐसी सुघरता से दर्ज किया जाये।’

Friday, November 5, 2010

कला की समग्रता का आलोक पर्व

भारतीय कला दृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। एक प्रकार से सृष्टि का अनुकरण। सृष्टि माने भांत-भांत के रंग। भांत भांत की ऋतुएं। उत्सव और पर्व। इस सब में ही तो है जीवन की समग्रता। कला का परम सौन्दर्य। शायद इसीलिए कवीन्द्र रवीन्द्र ने कभी कहा, ‘सौन्दर्य अभिव्यंजना मात्र नहीं है, वरन् आत्मा में निवास करता है।‘ यह कला ही तो है जो मन को रंजन और उद्बोधन देती है। मुझे लगता है, कला प्रकृति की प्रतिकृति है। नहीं, इससे भी आगे, प्रकृति का बिम्ब प्रतिबिम्ब है। हम सभी उत्सवधर्मी हैं। शायद इसलिए कि कला से हमें अनुराग है। उसमें बसते, सदा कुछ नया रचना चाहते हैं। इस रचे को जीना चाहते हैं।

दीपावली से बड़ा और कौनसा होगा हमारा कला का हमारा पर्व। बाहर और भीतर के आलोक के इस पर्व पर घर-आंगन सज उठते हैं। मन हिलोरें लेता सौन्दर्य की सर्जना को आतुर हो उठता है। लक्ष्मी के स्वागत के बहाने, रंगोली सजती हैं। कुमकुम के उसके पगलिए हम घरों में मंाडते हैं। मुझे याद है, बीकानेर में सीमेंन्ट के आंगन को भी दीपावली पर गोबर से हम सब लीपते। उस पर हिरमच, हल्दी और दूसरे प्रकृति प्रदत्त रंगों से मांडणे मांडते। जहां दीपावली पूजन होता, वहां पर स्वस्तिक ओर षट्कोणीय आकृतियां दीवारों पर बनाते। बाकायदा इनके नीचे ‘लाभ’ और ‘शुभ’ लिखा जाता। पता नहीं कहां से भीतर का कलाकार तब जाग उठता और भांत-भांत की रंगोलियां हम बना डालते। हम ही क्यों, प्रजापति कुम्हार की कला भी दीपावली पर ही तो परवान चढ़ती है। करीने से बनाए सुन्दर दीये। एक से बढ़क एक।

बाजार जाना हुआ तो, इस बार दीपकों की पारम्परिक आकृतियां से अलग दीपक भी इस बार दिखाई दिए। बेहद सुन्दर दीपक। अलंकारिक। लगा, समय के साथ कुम्हार का कलाकार मन भी समाज को पढ़ लेता है। इस पढ़े हुए को ही वह अपने सर्जन में आकार देता है। दिये ही क्यों बहुत सी और मृण आकृतियां भी तो कुम्हार हम लोगों के लिए दीपावली पर बनाता है। दिए रखने वाली छेद करी हंडिया, घंटियां, मिट्टी के मिष्टान पात्र और भी दूसरी बहुतेरी कलात्मक चीजें। इन सबसे ही तो सजती है हम सबकी दीपावली। हमारा घर-आंगन।

यह हमारा कलाकार मन ही तो है जो पारम्परिक प्रजापति कुम्हार के बनाए दीये जतन से घरों में सजाता है। थाली में आंगन के चौक में, घर के बाहर की दिवारों पर, छत की दिवारों और घर के कोने-कोने में हर एक दरवाजे और हर खिड़की के पास दीये रखे जाते हैं। एक साथ जब ये दिये जलते हैं तो मन में भी अनूठा आलोक होता है। दीपकों के झिल-मिल प्रकाश में घर-आंगन में भी हर कोई अनूठी सजावट करता है। लक्ष्मी के स्वागत को तैयार मन प्रतीक रूप में उसके कुमकुम पगलिये मांडता है। कहते है, दीवाली की रात लक्ष्मीजी विष्णु की शेषशय्या त्यागकर अपनी बहन दरिद्रा के साथ भू लोक पर विचरण करती है। जो घर कलात्मक सजा है, स्वच्छ सौन्दर्य का जहां वास है, उसी में लक्ष्मी प्रवेश करती है और जहां गंदगी है, कला नहीं है वहां दरिद्रा चली जाती है। इसी लोक विश्वास के चलते दीपावली का आलोक हर ओर, हर छोर होता है। कला सर्जन के इस पर्व में हर क्षण अपूर्व होता है। जीवन की पूर्णता, समृद्धि, शांति के समस्त सांस्कृतिक भाव इस एक पर्व में ही जो निहित है।

चन्द्रमा की सोलह कलाएं होती है। सोलहवीं कला अमावस्या की अदृश्य कला है। यही अमृता है। अमृता का अर्थ है न समाप्त होना। दीपावली के जगमगाते दीयों का आलोक हरेक मन को भाता है। सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि वहां है, नेत्रों को तृप्ति प्रदान करती हुई। जब हम यह कहते हैं कि दीपकों के प्रकाश से यह जहां आलोकित है तो इस आलोक के निहितार्थ पर भी जाना होगा। आलोक माने प्रकाश। प्रत्यक्ष का भेद। आलोकित दरअसल आकार की सत्ता का बोध कराता है। इसीलिए दीपकों के प्रकाश से आलोकित है जहां। कला दीठ की यही समग्रता है। मन की हमारी कलात्मक संवेदनाओं को ये दीपक ही तो रूपायित करते हैं। इन्हीं में है अंतर के आनंद का रस।

...तो आईए, दीपावली के आलोक में नहाएं। चित्रकला की चित्रोपमता, संगीत के माधुर्य को इस पर्व में अनुभूत करें। यह दीपावली ही है जिसमें कला के लिए अवकाश के क्षण हम निकाल ही लेते हैं, वरना कहां है इस भागमभाग में अवकाश। आईए, सहेजें कला के इन अवकाश के क्षणों को। आज के लिए नहीं। सदा के लिए। इन्हीं में तो है लोक का हमारा आलोक।

डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 5-11-2010