Sunday, April 11, 2010

सब्दों की नीरवता के बीच...

नन्द किशोर आचार्य के सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह "उड़ना संभव करता आकाश" उनके सर्वथा नये कवि रूप से साक्षात्कार कराता है। इस रूप में कि इस संग्रह की उनकी लगभग सभी कविताएं समय, समाज और परिवेष के अंतर्गत शब्दों की नीरवता के बीच के स्पेस को सर्वथा नये अर्थों में व्याख्यायित करती है। वे संग्रह में जिज्ञासाओं को खड़ा करते हैं, उनसे संवाद करते हैं और चुपके से शब्दों के बीच की नीरवता में उनका समाधान भी कर देते हैं। ऐसा करते हुए भाषा की उनकी लाक्षणिकता और कलात्मक अनुशासन पर औचक ही ध्यान जाता है, ‘नहीं होती है शब्दों में-/बीच की नीरवता में/होती है कविता/नीरवता!यह क्या है/षब्द ने सोचा/जानना चाहिए इस को/चुपके से उतर गया/उसमें...’
"उड़ना संभव करता आकाश" की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील के जल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों के जल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’
नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’
"उड़ना संभव करता आकाश" की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’
बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’
"उड़ना संभव करता आकाश" संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।
"राजस्थान पत्रिका" के रविवारीय, दिनांक 4 अप्रैल 2010 को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास की समीक्षा

Friday, April 2, 2010

कला में अर्थ अभिव्यंजना


किसी भी कला के लिए रूपाकार को स्वतंत्र और जगत का सत्व मान लेना ही पर्याप्त नहीं है। छायाचित्रकारी की ही बात करें। यथार्थ में अन्तर्निहित जो है, उसकी जो संवेदना है, उसके भीतर के सच का जो अर्थ है, उसे यदि कैमरा व्याख्यायित करता है, तो वह उसकी कला परिणति हो जाती है। ऐसा करते छायाचित्रकार स्थूल तत्वों, जो कुछ घटित हो रहा है, तेज-मंद हो रहे प्रकाश, विविध रंगों, नादों और आकार और अर्थ के संयोग को ही तो निरूपित कर रहा होता है।

मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान की क्रिएटिव आर्ट सोसायटी के फोटोग्राफी क्लब के अंतर्गत निर्णायक के रूप में जब सम्मिलित हुआ तो अभियांत्रिकी विद्यार्थियों की देशभर से आयी छायाचित्र प्रविष्टियों को देखकर मन में यही सब कौंध रहा था। यह तय करना बेहद मुश्किल हो रहा था कि कौनसी प्रविष्टियों का चयन किया जाए। विद्यार्थियों ने दिखाई देने वाले दृश्यों से अप्रासंगिक वस्तुओं और विषयों को बाहर निकालकर अर्थपूर्ण ही नहीं बनाया था बल्कि अपने तई सौन्दर्य की भी जैसे नई सृष्टि की थी। डाल पर लटकी चींटी, नृत्यांगना का नुपूर पहना पांव, सूरज की ढ़लती किरणों में उछलता युवामन, पानी के भीतर तैर रहे तिनकों की सर्वथा नयी अर्थ अभिव्यंजना और ऐसे ही बहुतेरे दूसरे छायाचित्रों में आकृति की तीक्ष्णता, कुछ के तीव्र और तटस्थ भाव औचक अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे।

अभियांत्रिकी शिक्षण संस्थानों में फोटोग्राफी क्लब तो बने हैं परन्तु वहां आयोजन की उदासीनता विद्यार्थियों में अर्न्तनिहित कला को पंख नहीं लगने देती। छायाकार मित्र महेश स्वामी अभियांत्रिकी विद्यार्थियों में उनकी कला के लिए जो जोश भर रहे हैं, उससे छायाचित्रकला की भविष्य की उम्मीदें जगती है। बच्चा बन वे जिस तरह से हमारे साथ अपनी नहीं विद्यार्थियों की छायाचित्रकला की बारीकियों का बखान कर रहे थे, वह भी सर्वथा नयी अनुभूति थी।

बहरहाल, अभियांत्रिकी छात्रों की फोटोग्राफी देखते यह अहसास भी हो रहा था कि छायाचित्रकार भी किसी दार्शनिक से कम नहीं होता। कैमरे का वह यांत्रिक उपयोग ही नहीं करता बल्कि ऐसा करते वह उसमें अपनी रचना, सृजन और चिंतन को भी जोड़ता है। अच्छा जो दिख रहा है, उसे कैमरे में कैद कर लेना ही कला नहीं है। सूक्ष्म और ऐन्द्रजालिक चित्ताकर्षण को मन के भीतर की संवेदना से जोड़ते जब अपने तई व्याख्यायित किया जाता है तो उसे नयी कला की अर्थ अभिव्यंजना मिलती है। छायाचित्रकारी ही क्यों, सभी कलाओं का सच भी क्या यही नहीं है!
डॉ. राजेश कुमार व्यास का "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक २ अप्रैल २०१०

Friday, March 26, 2010

माध्यम का हूबहू रूपान्तरण

छायाचित्रकारी का दौर जब प्रारंभ नहीं हुआ था, तब कलाकार अपनी कलाकृतियों के जरिए ही यथार्थ का दर्षाव किया करते थे। बाद में जब 1826 में फ्रांसीसी आविष्कर्ता निप्से ने पहला फोटोग्राफ बनाया और 1839 में ब्रिटेन के नागरिक टाल्बो ने छायाचित्रकारी की शोध आम जन के समक्ष रखी तो पूरे विष्व में एक हलचल सी मच गयी थी। पेरिस में चित्रकार-प्राध्यापक पॉल देलारोष ने हताषा और गुस्से में तब घोषणा की थी, ‘आज से चित्रकला मर गयी है।’ चित्रकला का तो इससे कहीं नुकसान नहीं हुआ। हॉं, कुछ स्तरों पर दोनों कलाएं एक दूसरे के प्रभाव से समृद्ध जरूर हुई।


बहरहाल, किसी कलाकृति के लिए छायाचित्र सहयोगी बने तो इसे स्वीकारा जा सकता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि कला का रूप एक हो जाए। ऐसा यदि होता है तो फिर कला की अपनी निजता कैसे रहेगी। दूसरी कला से आप विषय ले सकते हैं, फॉर्म का कुछ हिस्सा इस्तेमाल कर सकते हैं परन्तु पूरा का पूरा उसे ही आप यदि अपनाते हैं तो फिर वह कला कहां रहेगी!


पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा में जयगढ़, नाहरगढ़, गढ़ गणेष, जन्तर-मन्तर, आमेर दुर्ग आदि की खेतान्ची की पेंटिग देखते हुए लगा कैनवस पर छायाचित्रों को रूपान्तरित कर दिया गया है। उनके तेलचित्रों में कला की मौलिक अभिव्यंजना की बजाय छायाचित्रकारी का ही आस्वाद हर ओर हर छोर नजर आ रहा था। किलों के भीतर के गलियारों के छाया-प्रकाष प्रभाव, उग आयी घास और ऐसे ही बहुतेरे दूसरे दृष्य ऐसे हैं जिनहें अनुभूति चाह कर भी संचित नहीं कर सकती। खेतान्ची ने इन्हें अपनी पेंटिंग में संचित किया है। जाहिर सी बात है, कैमरे का इस्तेमाल उन्होंने अपनी इन पेंटिंग मे अनुकरण की हद तक किया है। सवाल यह है कि क्या इन्हंे फिर कलाकृतियां कहा जाएगा? कलाकार पर दूसरी कला का प्रभाव हो सकता है। अमृता शेरगिल, गुलाम मोहम्मद शेख, विकास भट्टाचार्य, गीव पटेल, भूपेन खक्खर, शांतनु भट्टाचार्य आदि की कलाकृतियों में फोटोग्राफी का प्रभाव जरूर दिखायी देता है परन्तु उन्हें छायाचित्रों का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। बहुतेरी बार अचेतन भी ऐसा होता है परन्तु खेतान्ची ने तो पेंटिंग को ही छायाचित्र बना दिया है। हूबहू आप यदि दूसरे माध्यम को अपने माध्यम में रूपान्तरित करते हैं तो फिर इसमें नया क्या हुआ?


बहरहाल, ऐसे दौर में जब कैमरानुमी सक्षम यंत्र बेहद विकसित हो गया है और नंगी आंख से न देख सकने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म दृष्य को भी वह चित्र में परिवर्तित कर देता है, क्या पेंटिग का प्रयोजन भी यही होना चाहिए! पॉल देलारोष फिर से याद आ रहे है, ‘क्या चित्रकला मर गयी है?’

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" २६-३-२०१०

Friday, March 19, 2010

कलाओं का अन्तर्सम्बन्ध

भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखती है, उसमें जीवन के सभी पक्षों को समाहित किया जाता है। जाहिर सी बात है, कला के परिप्रेक्ष्य में उसमे संगीत है, नृत्य है, चित्रकला है और तमाम प्रकार की दूसरी कलाएं भी सम्मिलित हैं। दरअसल सभी कलाएं एक दूसरे से गूंथी हुई हैं। वे एक दूसरे को रूप देने का कार्य करती है। भरत मुनि के नाट्यषास्त्र का नाम भले नाटक से संबद्ध हो परन्तु उसमें सभी कलाओं के अर्न्तसंबंधों की परिणति में हर कला की अपनी स्वायत्ता को दर्षाया गया है। भरत मुनि का एक बेहद खूबसूरत श्लोक है जिसमें उन्होंने संगीत को नाट्य की शय्या कहा है। आर्जेन्टीनी लेखक खोर्खे लुइस बोर्खेस के कथन को इसी परिप्रेक्ष्य में लें जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द का जन्म कविता में हुआ होगा। सच भी क्या यही नहीं है! गान मे छन्द का स्थान केन्द्रीय है। यदि वहां छन्द नहीं बरता गया है तो वह गान का स्वांग भर होगा।संगीत में आलाप के अंतर्गत राग का हल्के हल्के विस्तार होता है। इस विस्तार में ही पूरा एक भाव लोक तैयार होता है। ठीक ऐसे ही रंगमंच के साथ है। वहां किसी पात्र सें संबंधित दृष्य में विस्तार होने के बाद ही अगला दृष्य मंचित होता है। नृत्य में दृष्टि, हाव-भाव आदि की भंगिमाएं ही उसका विस्तार करती है। यही बात चित्रकला के साथ भी है। रंग और रेखाएं बढ़त करती है। इस बढ़त में ही कैनवस पर मूर्त और अमूर्त चित्र की परिणति होती है। हर कला अपने रूप में सौन्दर्य और श्रेष्ठता का वरण दूसरी कला के मेल से ही करती है। सोचिए! यदि नाटक में नृत्य और सगीत नहीं हो, संगीत में चित्रात्मकता के दृष्य उभारने का भाव नहीं हो और चित्रकला में संगीत की लय नहीं हो तो क्या उसे जीवंत कहा जाएगा!
बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं, जतिनदास का एक चित्र जेहन में कौंध रहा है। नृत्य की भाव भंगिमाओं में यह चित्र ऐसा है जिसमें कला की सम्पूर्णता को अनुभूत किया जा सकता है। इसमें चित्रात्मकता तो है ही, सांगीतिक आस्वाद है, नाट्य का भ्व है, कविता का छन्द है और कला की तमाम अनुभूतियों भी यहां सघन महसूस की जा सकती है। कहा जा सकता है कि सभी कलाएं एक दूसरे से मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। संवाद और सहकार के जरिए कलाओं के परस्पर संबंधों को और अधिक सघन किया जा सकता है। अब जबकि बाजारवाद ने लगभग सभी कलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और हर कला अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगी है, क्या यह जरूरी नहीं है कि कलाओं के अन्तर्सम्बधों पर विचार करते हम उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या अपनी श्रेष्ठता की होड़ में एक कला का दूसरी कला से संवादहीनता और सहकारहीनता से उनके मूल अस्तित्व से संघर्ष की चुनौती ही क्या हम पैदा नहीं कर रहे?




‘‘डेली न्यूज’’ में प्रति शुक्रवार को प्रकशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘‘कला तट’’ दिनांक 19।3।2010

Tuesday, March 16, 2010

सच करो रेत के सपने

अबोले शब्दों के
मौन में
संजोए हैं मैंने
रेत के सपने
पाल ली है मछलियां
मरूथल की मृगमरिचिका में
तुम-
सांस बन जीवन दो
मेरी मछलियों को
सच करो
रेत के सपनों को
मझदार भी किनारा बने
मेरी सोच का
खोलो, खोलो
तुम्हारे होने के सच का
अनावृत घेरा।

Friday, March 12, 2010

स्मृतियों के दृष्यालेख



सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।


"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १२-३-१०

Friday, March 5, 2010

संस्कृति के अंतर्द्वन्द की पुनर्रचना

सिनेमा का कला से सीधा ही नहीं बल्कि निकट का रिष्ता है। इसलिए कि दोनों ही एक दूसरे के लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खोलते हैं और बेशक व्यावहारिक रूप में सामाजिक सरोकारों से जुड़े भी हैं। बहरहाल, कला की सभी विधाएं अंततः अपने माध्यमों से कोई न कोई कथा कहने का ही प्रयास करती है। मुझे लगता है कला के विभिन्न रूपों का पारस्परिक संतुलित समन्वय करना कला को एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग की सीमाओं से बाहर निकाल उसे जन सामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही है और फिल्म में इसकी सर्वाधिक संभावनाएं हैं। पिछले दिनों जयपुर के नमन गोयल की बनायी ‘एन अफेयर विद न्यूयॉर्क’ देखते इसे जैसे और गहरे से अनुभूत किया। नमन न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी में फिल्म निर्माण और निर्देषन की बारीकियां सीख रहा है। यहां रहते उसने अपने वतन के संस्कारों की स्मृतियों में न्यूयॉर्क की जीवन शैली, संस्कृति को फिल्म में जैसे गूंथ दिया है। दैनंदिन जीवन की साधारण घटनाओं से विषेष उद्दीपन में मन और दैहिक संबंधों के साथ संस्कारों से मुक्ति के घटनाक्रमों में तेजी से बदलते फिल्म के दृष्य घनीभूत नाटकीय रूप धारण कर देखने वाले को आंदोलित करते हैं। रचनात्मक अर्थों में कहानी के बिखरे कोलाज की एक बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें कमेन्ट्री, परस्पर संवाद और सब टाईटल्स की मदद से कथा के बड़े सूत्रों को अल्पअवधि में सहज संप्रेष्य किया गया है। खुद के संस्कारों के बरक्स अपने तई सामाजिकि संहिताओं का एक प्रकार से विरेचन करते नमन ने फिल्म में यथार्थ के विकृत को ट्रिटमेंट में कला की सौन्दर्यानुभूति भी दी है। स्क्रिन पर ताजमहल, खजूराहों की मूर्तियों के बहाने न्यूयार्क और भारतीय दर्शन की गहराईयों को भी जिया गया है। यथार्थ जीवन के कटू सत्यों के साथ उनके संघर्ष में नमन ने अपनी फिल्म में संस्कृतियांे के अंतर्द्वन्द को सैलुलाइड पर जैसे पुनर्सृजित किया है। नमन ने इससे पहले ‘अदर देन राइट ऑर रोंग’, ‘सस्पेक्ट लिस्ट’, बिगनिंग टू गेट बाल्ड’ जैसी लघु फिल्में भी बनायी है। कथ्य की मौलिकता और भाव बोध को अधिकाधिक सुगम करती उसकी बनायी फिल्में मन और मस्तिष्क को झंकृत करती कुछ सोचने को विवष करती है। मुझे लगता है, वास्तविकता की पुनर्रचना की सिनेमा की आभासी क्षमता ही उसके कला सरोकारों को और अधिक प्रमाणित करती है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक ५-३-१०

Friday, February 26, 2010

दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार



जीवन मे जो कुछ हो रहा है, उसे हम नंगी आंख से बहुतेरी बार शायद ठीक से देख और समझ नहीं पाते। शायद इसका कारण यह भी है कि चीजें और दृश्य इस तेजी से बदलते हैं कि उनकी गति को हमारी आंख चाह कर भी पकड़ नहीं पाती। वस्तुओं के रूप, टैक्सचर, आकार जैसी चक्षुगम्य लाक्षणिकता के स्थान पर उनकी अनुभूत गति को कैमरा पकड़ सकता है, बशर्तें उसे बरतने वाला कला की संवेदनशील आंख रखता हो। हिमांशु व्यास के छायाचित्रो में कला की बारीकियों को सहज अनुभूत किया जा सकता है। उसके चित्र देखते लगता है, वह दृश्य की प्रतिकृति ही नहीं करता बल्कि उसमें अपने तई संवेदना जोड़ता दिख रहे दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार भी करता है। उसके कैमरे से निकले चित्रों में प्रकृति और जीवन के रंग अपने शास्वत स्वरूप में तो हैं परन्तु खुद उसकी आंतरिक संवेदना में वे अपनी पृथक स्वायत्ता लिए भी अलग से लुभाते हैं। मसलन उसका एक बेहद खूबसूरत छायाचित्र है पानी मंे विसर्जित प्रतिमा का। प्रतिमा के बहाने जल में उभरते दूसरे बिम्ब यहां छायाचित्र की कला सर्जना के संवाहक हैं। एक छायाचित्र है जिसमें चिड़िया उड़ रही है। एक गमले से दूसरे गमले में फूदक कर पहुंचती चिड़िया की गति और पाश्र्व की हरितिमा में यहां संवेदनशीलता का जैसे काव्यात्मक सृजन किया गया है। एक कला दूसरी कला को कैसे आलोकित करती है, उसे इस दृश्य में गहरे से समझा जा सकता है।बहरहाल, हिमांशु के संवेदना चक्षु में टूटती इमारत की पानी में पड़ती स्पष्ट परछाई, रात्रि में स्ट्रीट लाईट की रोशनी में साईकिल चलाते साधु का अद्भुत अक्स, श्वेत-श्याम छायाचित्र में बादलों की लुकाछिपी में होले से निकलता सूरज और झोपड़ी की मुंडेर पर इस दृश्य का आस्वाद लेती चिड़िया और बरसात में चलते पथिक के बहाने झरते पानी की संगीत की सुर लहरियां में जैसे दर्शन लोक और जीवन की अद्भुत लय का विस्तार है। मुझे लगता है हिमांशु के छायाचित्रों में अर्थ बहुल ध्वनियां है। ये ध्वनियां कैमरे के उसके एंगल, कोण के साथ ही औचक उत्पन्न ऐसे दृश्य जिसकी पुनरावृति उसी रूप में फिर से संभव नहीं है, में विशिष्ट रूप में सुनी जा सकती है। स्मृति को सघन और उत्कट करते कैमरे से लिए हिमांशु के दृश्य इसी कारण अप्रत्याशित और अद्वितीय रूपों की सर्जना करते हैं। हर कला की अपनी स्वायत्ता होती है और वह समाज निरपेक्ष होती है, हिमांशु का कैमरा इसे और अधिक सघन और संवेदनशील अर्थों में समझाता है। उसके छायाचित्रो को देखकर कला के दूसरी कलाओं से अंतःसबंधों को भी समझा जा सकता है।



प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २६-२-10

Saturday, February 20, 2010

जड़त्व तोड़ती कथक नृत्यांगना का सम्मान


घरानों की परम्पराओं के बावजूद संगीत और नृत्य परिवर्तनषील है। घराने नृत्य और संगीत की पारम्परिक शास्त्रीयता का पोषण तो करते हैं परन्तु यदि कोई कलाकार घरानों की परम्परा में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता है, तो फिर उसकी कोई सार्थकता भी नहीं है। व्यक्तिगत मुझे लगता है संगीत और नृत्य परिवर्तनषील यानी क्षितिज-विहीन हैं। यदि परम्परा मंे वे चलते रहें तो फिर उनमें जड़त्व आ जाता है। इस जड़त्व को वे ही कलाकार तोड़ते हैं जो खुद अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़ते हैं। ऐसा जिसमें पारम्परिक कला और भी निखर निखर जाती आनंदानुभूति कराती है। मुझे लगता है, कथक के जयपुर घराने की नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली ऐसी ही कलाकार हैं। इस बार जब सगीत नाटक अकादमी अवार्ड उनहें देने की घोषणा हुई तो लगा कविता की लय को उसका हक दिया गया है। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों को बहुतेरी बार देखा है और हर बार यूं भी लगा जैसे वे पहले की ही अपनी प्रस्तुति का फिर से पुनराविष्कार कर रही हैं। परम्परागत कथक में प्रेरणा की तत्कार बेजोड़ है। वें जब नृत्य करती हैं तो घुंघरू ताल का विलक्षण चमत्कार दिखाते हैं और उनके गत और भावों का तो कहना ही क्या! यह जब लिख रहा हूं, जयुपर लिटरेरी फेस्टीवल में अषोक वाजपेयी की पढ़ी, कविता जेहन मेें कौंध रही है,- वह अपने एकान्त को भरती है/अपने शरीर की लय से,/लालित्य से/उसकी आत्मा/उसे अपलक निहारती है...’। प्रेरणा के नृत्य में कोमल कल्पनाओं, सूक्ष्म विचारों, उल्लास, प्रेम, हृदय की पीड़ा आदि मनोभावों के साथ ही दारूण दुख, स्वकीया, परकीया, नदी, समुद्र, त्याग, सन्यास आदि बहुतेरे विषयों के भाव प्रदर्षन उसकी आंख, भौहें, पलकोें और मुस्कान से सदा विषिष्ट अंदाज में जीवन्त होती है। इसमें परम्परा भर नहीं है, खुद उसके नृत्य की रची भाषा की भावाभिव्यक्ति है। गुरू कुंदनलाल गंगानी की दी परम्परा को आगे बढ़ाते प्रेरणा ने दर्षन की गहराईयों में संगीत के भावों को अपनी विषिष्ट अदाओं के संस्कार दिए हैं। वह कहती भी है, ‘मैं नृत्यांगना हूं। नृत्य मेरी भाषा है। नृत्य ने मेरे जीवन का मार्गदर्षन किया है।’सच ही तो है यह संगीत और नृत्य ही तो है जो हमारा मार्गदर्षन करते भीतर के हमारे खालीपन को भरते हैं। इस लिहाज से ताल और लयकारी की गूढ़ता के साथ भावों और कल्पनाओं के सच्चे और सूक्ष्म प्रदर्षन को जीती प्रेरणा का सम्मान परम्परा के जड़त्व को तोड़ती कथक को समृद्ध करती कलाकार का सम्मान नही है!
डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १९-२-२०१०

Friday, February 12, 2010

नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्तक आचार्य

भारतीय कला-सृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। सृष्टि का अनुकरण है। नव सृष्टि है। जब भी कला के ये भाव मन मंे आते हैं, भगवान षिव की नटराज मूर्ति आंखों के सामने घुमने लगती है। षिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवत्र्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए भगवान षिव ने ही सुर सप्तक की रचना की। इसी से वे नादतनु कहलाए। षिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। षिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। षिव नर्तक हैं, नटराज हैं। नृत्य सम्राट है। यह संपूर्ण विष्व षिव का लगातार नाच ही है। सृजन के नृत्य और जीवन चक्र की नियमितता की मनोहर अभिव्यक्ति षिव की नटराज मूर्ति में ही दिखायी पड़ती है। नटराज में सृष्टि के लयात्मक विकास तत्व का दर्षन है। अपने नृत्य रस में मस्त चिदंबर षिव के आनंदमय नृत्य से ही सृष्टि का जन्म और विकास साथ साथ होता रहता है। नटराज की मूर्ति को इस बार जब देखें तो जरा गौर करें, उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू है। काल के डमरू के ताल पर ही कला थिरकती है। डमरू सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। कहते हैं, सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चैदह बार डमरू बजाया। इसी से चैदह षिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चैदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। आकाषवाणी में अस्थायी उद्घोषक की सेवाओं के दौरान स्टूडियो में जब भी प्रवेष करता, षिव की नटराज मूर्ति से ही सामना होता। षिव के इस नृत्य स्वरूप ने मन को झंकृत करते सदा ही विचारों की जाग का नया भव दिया। ऐसा जिसमें डूब-डूब आज भी आनंद से सराबोर हो जाता हूं। मुझे लगता है सृष्टि के लयात्मक विकास का समग्र दर्षन षिव के नटराज स्वरूप में ही है। षिव का यह नृत्य स्वरूप अमृतमय और मंलकारक है। षिव जब नृत्य करते हैं तो सभी देवता उसमें सम्मिलित होते हैं। सरस्वती वीणावादन करती है, इन्द्र बांसूरी बजाते हैं, भगवती रमा गायन करती है, विष्णु ताल वाद्य मृदंग बजाते हें, देवता उन्हें घेरकर खड़े हैं। यही तो है षिव का महादेवत्व स्वरूप। सृष्टि विद्या समाहित षिव स्वरूप। कुमार स्वामी ने षिव ताण्डव को सृष्टि के रहस्य के उन्मीलन के रूप में देखा है। और मैं, नटराज की मूर्ति जब भी देखता हूं सृष्टि विद्या का रहस्य उसी में पाने लगता हूं। महाषिवरात्रि....नृत्य गीत की रात्रि ही तो है। षिव को याद करते झूमें और गाएं।
प्रति शुक्रवार को "डेली न्यूज़" में प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट"

Sunday, February 7, 2010

कुछ कविताए

शब्दों के घाव
चुन-चुन कर
फेंक दिए हमने
सभी अक्षर
अंधे कुओं में।
भाषा के चेहरे पर
इसी से लगे हैं
शब्दों के घाव।

शब्द-एक
शब्दों की नहीं होती
कोई अंतिम यात्रा
अलिखित और मौन में भी
शास्वत है
चरैवेति, चरैवेति।


शब्द-दो
नाप लेते हैं
शब्द
अरबों-खरबों
मीलो की दूरियां
पाट देते हैं
मन की
गहरी खुदी खाइयां।
औचक
भौचक करते
सप्रयास न बन सकने वाला
बना देते हैं
जब वे कोई वाक्यांश
अहसास कराने लगते हैं वे
बूझ ली हो जैसे उन्होंने
मन के भीतर की
अनसूलझी
हजारों-हजार पहेलियां।
शब्द सेतु है
जीवन का।

Saturday, February 6, 2010

डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित लेखक का स्तम्भ कला तट



फ़रवरी २०१०


शब्दों का सांगीतिक आस्वाद

हमारे यहां संगीत को इतना शास्त्रगत और अनुष्ठानगत कर दिया गया है कि आम जन की उससे सहज ही दूरी होती चली गयी है। ऐसे मंे यदि किसी पुस्तक में संगीत साधक और सुनने वाले दोनों के भावों की मिठास हो तो वह क्या हमारे अनुभाव-प्रकाष की भाषा नही होगी! यतीन्द्र मिश्र की ‘सुर की बारादरी’ यही आभाष कराती है। पिछले दिनों वह जब जयपुर आए तो यह पुस्तक भेंट कर गए। पढ़ी तो लगा सांगीतिक अनुभवों को सर्वथा नये अंदाज में इसमें जिया गया है। अर्सा पहले बिस्मिल्ला खां से भेंट हुई थी। जितनी मिठास उनकी शहनाई मंे है, उतनी ही मिठास उनके व्यक्तित्व में भी थी, यह पहली बार तभी अनुभूत किया था...और यतीन्द्र ने तो अपनी पुस्तक में शब्द और सुरों की भाषा के जरिए भाव की भाषा का मुहावरा ही जैसे पाठकों को दे दिया है। यह ऐसा है जिसमें शहनाई के सुर ही नहीं झरते बल्कि खुद खां साहब का भोलापन और खुद को कुछ नहीं समझने का वह भाव भी है जो उनकी महानता को दर्षाता है। खां साहब कहते हैं, ‘अभी भी मेरा काम कच्चा है। षडज (स) ही ठीक से कायम नहीं हो सका, तो बाकी के छह सुूरों के लिए अभी छह जन्म और चाहिए।’ यतीन्द्र इस पर टिप्पणी करते हैं, ‘यह बिस्मिल्ला खां की कला प्रज्ञा के प्रति कहन आभार व जन्म की निरर्थकता का वही बोध है, जो निजामुद्दीन औलिया के पास है, जहां सोना-चांदी, घोड़े-हाथी सभी अपनी उपस्थिति में ऐष्वर्यहीन है।’ यतीन्द्र एक जगह अपने लिखने की शुरूआत करते हैं, ‘...अस्सी बरस से वे सुर मांग रहे हैं।’ भाषा का यह सांगीतिक छन्द नहीं है! इस छन्द में खां साहब की सुर साधना के बहुतेरे अनछुए पहलू भी पहली बार पाठकांे के सामने आए हैं। मसलन खां साहब का बचपन का नाम कमरूद्दीन नहीं बल्कि अमरूद्दीन था। उनका जन्म उस डूमगांव मंे हुआ वही जहां की सोन नदी के किनारों पर पाई जाने वाली घास से शहनाई बजाने की रीड बनाई जाती है। यह भी कि उन्हें भारत रत्न सम्मान मिला परन्तु उनकी फटी तहमद नहीं बदली। उनकी षिष्या ने टोका, ‘बाबा!...अब तो आपको भारत रत्न भी मिल चुका है, यह फटा तहमद ना पहना करें।...’ खां साहब लाड़ से भरकर बोले-‘धत्! पगली ई भारत रत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।...मालिक से यही दुआ है-फटा सुर न बख्शे।’ ऐसे ही बहुतेरे प्रसंगों में यतीन्द्र बिस्मिल्ला खां से करीबी नाता कराते हैं। सांगीतिक आस्वाद में आस्वाद में ‘सुर की बारादरी’ मंे बिस्मिल्ला खां से किया संवाद है, बिसरा दी गई लोकधुनें और बेहद पुरानी ठुमरियों के बोल हैं तो काषी की संगीत परम्परा का गान भी हैं। यतीन्द्र लिखते हैं, ‘कजरी के बोलों के साथ अगर आपको घुलना हो और शहनाई की अलबेली लय पर बहुत दूर तक बहते चले जाना हो तो खां साहब के दरवाजे आपके लिए खुले हुए हैं।’ मैं इसमें यह जोड़ देता हूं, शब्दांे में सांगीतिक आस्वाद करना हो और उसमें डूब-डूब जाने का मन हो तो ‘सुर की बारादरी’ मंे आपका स्वागत है।

२९ जनवरी २०१० को प्रकाशित
विचार स्वरूप की संगीत दृष्टिपद्म पुरस्कारों की इस बार की सूची में पं. जसराज के षिष्य कला मर्मज्ञ मुकुन्द लाठ का नाम पढ़कर सुखद प्रतिती हुई। अर्सा पहले उनकी ‘संगीत एवं चिन्तन’ पुस्तक पढ़ी थी। दर्षन और संस्कृति के संगीत परक विमर्ष की यह अनूठी कृति है। विचार के स्वरूप को संगीत की दृष्टि से देखते वे इसमें कहते हैं, ‘दूसरी कलाओं की तरह राग-संगीत में भी व्युत्पति की रूढ़ियां हमें नये से एक सीमा तक रोकती है। राग-संगीत जैसी परम्पराओं में रूढ़ि-षास्त्र नहीं बांधता-गुरू, सम्प्रदाय, घराने बांधते हैं।’लाठ जब यह कहते हैं तो कलाओं के इतिहास को, उनके अतीत को, उनके संघर्षों को सहज जाना जा सकता है। विचार के स्वरूप को पहले पहल संगीत की दृष्टि से देखते वह बेहद महतवपूर्ण अवधारणाएं भी औचक देेते हैं। मसलन ‘संगीत संस्कृति विषेष की परिधि के भीतर ही बनता और पनपता है क्योंकि शब्द का अनुवाद हो सकता है, पर स्वर का नहीं।’ यह भी कि चिंतन भाषा के माध्यम से होता है, संगीत स्वर के माध्यम से।’ और यह भी कि संगीत की हर समृद्ध परम्परा अपना अलग ‘आधुनिक’ बनाती है जिसमें दूसरे का प्रवेष कु-साध्य होता है।’ लाठ से जब संवाद होता है तो भारतीय संगीत के संबंध में बने बहुत से पूर्वाग्रह टूटते भी हैं। वे कहते हैं, ‘चिन्तन में सृजन की संभावनाओं का वैसा ही सहज विस्तार है जैसा रागदारी में। वैसी ही बहुलता भी है।’ कलाओं के अपने गहरे सरोकारों में लाठ दर्षन की गहराईयां लिए है। लाठ ने दत्तिल मुनि के ढाई सौ श्लोकों के संस्कृत के प्राचीन संगीत ग्रंथ ‘दत्तिलम’ का अनुवाद और विवेचन किया है। जैन व्यापारी और अध्यात्म कवि बनारसीदास की आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक: हाफ ए टेल’ के नाम से अनुवाद करते भारत में आत्मकथा लेखन का सूक्ष्म अध्ययन और विवेचन किया है। वीनांद कालावर्त के साथ निर्गुण कवि नामदेव के मूलपाठ का विस्तृत शोध एवं अनुवाद करते प्राचीनतम पाठ की गेय परम्पराओं का महीन विष्लेषण भी किया है। उनका मौलिक चिन्तन मन को झंकृत करता है। जरा देखें उनकी लिखी ये पंक्तियां, ‘चिंतन के साथ संगीत बज नहीं सकता लेकिन इसका यह अर्थ नहीं हे कि इनकी किसी भी तरह जुगलबन्दी नहीं हो सकती।’ बहरहाल, राग, धुन, आलाप जैसी शब्दावली के अपने चिन्तन में मुकुन्द लाठ का संगीत चिन्तन सर्वथा नयी दीठ लिए है। इस दीठ का सम्मान क्या हम सबका सम्मान नहीं है?

डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित लेखक का स्तम्भ कला तट

२२ जनवरी २०१० को प्रकाशित
झरने लगते हैं शब्द
एक कलाकृति से जब कभी किसी भी रीति से हम प्रतिकृत होते हैं, उससे हमारी एक प्रकार की अंतरंगता बनने लगती हैं। वह हमें अपने नजदीक लगने लगती है। उसके रहस्य को भी तब हम छूने लगते हैं परन्तु कलाकृति को देखते समय की हुई हमारी ढे़रो अनुभूतियों को क्या हम ठीक वैसे ही व्यक्त कर सकते है? दरअसल कलाकृति को देखना और उसके बारे में कुछ कहना दोनों ही अलग है। देखना हमारी एक क्रिया है जबकि उसकी व्याख्या प्रतिक्रिया। देखना अन्तर्मन अनुभव है। देखने के समय हम कलाकृति की तात्कालिक संवेदना से जुड़ते हैं परन्तु लिखने बैठते हैं तो अन्तराल का गैप कुछ और अर्थ ध्वनित करने लगता है। मुझे लगता है हर कलाकृति में कलाकार कला का अपना स्वयं का व्याकरण रचता है। यह जब लिख रहा हूं, अवधेष मिश्र की एक कलाकृति जेहन में कौंध रही है। सूर्य के गोले में प्रकृति की अद्भुत सृष्टि में रंगो के लोक की उनकी चित्रकृति में परम्परा के साथ आधुनिकता का सर्वथा नया व्याकरण है। इस चित्र में अनुभव हैं। स्मृतियां है और परम्पराओं को भी परोटा गया है। अवधेष के लगभग सभी चित्रों में कला की इसी प्रकार की दीठ है। यही कारण है वे मन को आंदोलित करते हैं।दरअसल किसी भी कलाकृति के व्याकरण में समय की संवेदनाओ ंऔर कला की परम्पराओ को जोड़ते हुए लिखते वक्त कलाकृति के अंदर प्रवेष करना होता है। उसमें रचना और बसना पड़ता है। तब शब्द नहीं ढूंढने पड़ते। शब्द अपने आप ही झरने लगते हैं। यदि कोई कलाकृति किसी देखने वाले में चैकन्नी विचारषीलता और अपार रसिकता जगाती है तो स्वतः ही उसका विष्लेषण देखने वाला करने लगता है। यही किसी कलाकृति की सहज आलोचना है। कलाकृति में महत्वपूर्ण यह नहीं है कि वह किस वाद से प्रेरित है या फिर यह कि वह किन सिद्धान्तों पर आधारित है। महत्वपूर्ण यह है कि उसे देखकर मन को कितना सुकून मिल रहा है और वह संवेदना के स्तर पर कितना हमें जगाती है और जिस समय में हम जी रहे हैं, उस समय में उसकी प्रासंगिकता क्या है। कलाकृति को देखते हुए उसके आस्वाद का यह अहसास ही तब मूल्यांकन का हमारा सहारा बनता है। इस सहारे से प्राप्त मंजिल ही क्या किसी कलाकृति की सहज आलोचना नहीं है?