Friday, April 23, 2010
परम्परा में आधुनिकता का ताना-बाना
अभी बहुत समय नहीं हुआ, गौरीशंकर सोनी की कलाकृतियों का आस्वाद करते लगा, वह चित्रो मे आधुनिक और पारम्परिकता के बीच के संघर्ष का ताना-बाना अपनी कलाकृतियों में कुछ इस गहराई से बुनता है कि चित्र देखने वाले के विचारों में भी उथल-पुथल मचा देेते हैं। हल्की रस्सी के साथ दो अलग हुई परतों की आकृतियों की खींचतान के उसके चित्रो में उभरा द्वन्द और बीच में गोले अनायास ही देखने वाले को कुछ सोचने को मजबूर करते हैं और कैनवस पर बरते उसके रंगों के पार्ष्व में उभरती आकृतियां जैस चित्रकला की भारतीय परमपरा से साक्षात् कराती है।
चित्रो में विषय को जीते गौरीषंकर की आकृतियों मे पंरतों का टूटना, रंगो का गहरे से हल्के होते जाना और पार्ष्व में नियत आकार नहीं होकर अजन्ता, एलोरा के गुफा चित्रों सरीखी उभरती आकृतियों में वह जैसे आधुनिकता और परम्परा का सांगोपांग मेल कराता है। उसके लगभग सभी चित्रों की संरचना में आकृतियां गोल घेरे से कभी बाहर निकली तो कभी उसमें लटकी तो कभी उसमें घूसने का प्रयास करती दिखायी देती है। गोल घेरा चित्रों के केन्द्र में रहता है, बहुत कुछ कहता मानों चित्र के विषय को पूरी तरह से व्यक्त करता मनुष्य के अंतर्द्धन्द को भी बंया करता है।...और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इधर जो चित्र श्रृंखला गौरीषंकर ने बनायी है उसकी पृष्ठभूमि में अंजता के पाषाण सौन्दर्य को गोल घेरे के पार्ष्व में दिया गया है। गोल घेरों से निकलती उसकी आकृतियां यांत्रिक जटिलता और मानव मन की दुरूहता को व्यक्त करती कुछ नहीं कहते हुए भी जैसे बहुत कुछ कहती है। चित्रों में बरते गए उसके रंग विषय को जताने के साथ ही उसके रचनाकार के द्वन्द को भी पूरी तरह से उभारते हैं। कैनवस पर गौरीषंकर बहुत सी परतों का अहसास कराता है। एक दूसरे से अलग होती परत में टूटन है तो जुड़ाव का प्रयास भी है। ऐसे ही रंगों के प्रयोग में खिंचाव और मिलनोत्सुकता को महसूस किया जा सकता है। उसके चित्रों में गति है, विषय का बेहतरीन निरूपण है और हां, रंगो की गहरी समझ का अहसास भी है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘कला तट’, दिनांक 23 अप्रैल 2010
Saturday, April 17, 2010
नाटक जारी आहे!

नाट्यकला को दृश्य काव्य कहा गया है। दरअसल इसमें यथार्थ की नकल नहीं बल्कि विशेष उद्देश्य से की गयी उसकी पुनःसृष्टि होती है। अनगिनत नाटकों की दर्शकीय दीठ में सदा ही यह महसूस किया है कि नाटक में जीवन का सतही यथार्थ ही प्रतिबिम्बित नहीं होता बल्कि उसमें गहरे नैतिक और सौंदर्यमूलक विवेक से मुनष्य के कार्यों और भावों की, जीवन की विभिन्न अवस्थाओं की कलात्मक कल्पनाशील अनुकृति भी कलाकार करता है। जब तक फिल्मों का दौर प्रारंभ नहीं हुआ था, तब तक नाटक केवल रंगमंच पर ही खेले जाते थे परन्तु अब उन्हें दूरदर्शन, रेडियो, और सिनेमाघारों में भी देखा, सुना जाने लगा है।
बहरहाल, रंगकर्म के कलाकारों की कला को इसी से व्यापक दर्शक मिल गए हैं। रंगकर्म को जीते ईश्वरदत्त माथुर के बारें में जब भी विचारता हूं, मुझे लगता है अभिनय को जीवन दर्शन बनाते उसमें अपने आप को तलाशने की कोशिश उन्होंने की है। मिले तो कहने लगे, ‘नाटक ग्लेमर नहीं, चकाचौंध नहीं, बल्कि साधना है।’ वह जब यह कहते हैं तो अनायास ध्यान उनके इस कला कर्म पर जा रहा है। इब्राहिम अल्काजी, एम. वासुदेव, एच.पी.सक्सेना, रवी झांकल के साथ पारसी रंगमंच की नाट्य परम्परा से लेकर अधुनातन नाटकों को खेलते उन्होंने अभिनय को सदा ही जैसे जिया है। श्याम बेनेगल निर्मित बेहद लोकप्रिय धारावाहिक ‘यात्रा’ में इंजन ड्राइवर के रूप में उन्हें दर्शक आज भी भूले नहीं है तो ‘भारत एक खोज’ में गाए राजस्थान के इतिहास के जरिए उन्होंने जैसे राजस्थान की कला का देशभर में प्रतिनिधित्व किया। ‘पोलमपोल रो खयाल’, ‘पांचवा सवाल, ‘जसमा ओढ़न’, आजादी की नीदं’, ‘भूमिका’ जैसे बहुतेरे नाटकों के साथ ही दूरदर्शन की शुरूआत के दौर में आए ‘दायरे’, ‘भोर’ धारावाहिक और कल्याणी जैसे शिक्षाप्रद कार्यक्रमों में निभाये अपने किरदारों को जैसे उन्होंने अब अपनी पहचान में शुमार कर लिया है। कहते हैं, ‘उन दिनों की बात ही कुछ ओर थी। हम रंगकर्म को जीते थे और रंगकर्म हमें।...’
बहरहाल, उनके साथ दूरदर्शन निर्मित ‘हरित राजस्थान’ की एंकरिंग करते उन्हें निकट से जाना, समझा और तभी पहली बार लगा अभिनय करते वे कला की बारीकियों में खुद को जैसे भूल से जाते हैं। उनके भीतर का कवि, गायक और लेखक भी जैसे तब जाग पड़ता है। शायद इसीलिए कहा गया है, कलाकार जब अपनी कला प्रदर्शित करता है तो भीतर के उसके समस्त रचनात्मक बोध जीवित हो उठते हैं।...और नाटक जारी आहे!
डॉ. राजेश कुमार व्यास का ‘डेली न्यूज’ में प्रकाशित कॉलम ‘कला तट’ दिनांक 16-4-2010
Tuesday, April 13, 2010
अपने होने से
अंतर से
अंतरतम तक
अपने से लड़ना है,
ठीक वैसे ही
जैसे आईने में
अपने ही अक्स को देखकर
फड़़फड़ाती है चिड़िया
फड़़फड़ाते ही फड़़फड़ाते
करती है प्रहार,
तब तक
जब तक कि
लहूलुहान
न हो जाए चोंच।
शायद
वैसा ही कुछ
होता है हमारे साथ
कि अपने को
पहचान कर भी
लड़ते हैं हम
अपने होने से।
हाँ,
अपना होना भी
एक संघर्ष है
अंतर से
अंतरतम का,
अतीत से
वर्तमान का।
Monday, April 12, 2010
पर्व के बहाने प्रकृति से जुड़ाव
प्रकृति पल प्रतिपल अपना रंग बदलती है। या यूं कहूं कि अपना परिष्कार करती है। हमारी धर्म की परम्पराओं के मूल में भी प्रकृति का यही सूक्ष्म रूप छुपा हुआ है। प्रकृति के साथ व्यक्ति अपने आपको साधे। वह परम्पराओं को ढोए नहीं, उनसे अपने आपको जोड़ता हुआ निरतर अपना परिष्करण करे। कुंभ में स्नान का महात्म्य नदी में नहाना भर नहीं है। नदी के पानी से शरीर को स्वच्छ करना भर नहीं है। शारीरिक शुचिता के साथ मानसिक शुचिता को प्राप्त करना भी हैं। मन को उदार बनाते उसकी शुद्धि करना है। पाप धुलने का अभिप्राय है, आप धुलें।
स्नान करने पर पुण्य मिलता है। धर्म यही कहता है परन्तु उसका मर्म धरित्रि की प्रार्थना से जुड़ा है। प्रार्थना सिर्फ अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी। पुण्य को संजोना है, इस जन्म के लिए नहीं अगले जन्म के लिए भी। यानी अनवरत चलना है यह क्रम। जाने-अनजाने हम जो कुछ गलतियां करते हैं, जो कुछ अनर्थ करते हैं, जो कुछ नहीं करने वाला करते हैं, उनका प्रायष्चित कराता है नदी का स्नान। लोग भोर से पहले ही आकर गंगा और दूसरी नदियों के तट पर एकत्र होने लगते हैं।
कुम्भ में स्नान की मेरी अपनी यादें हैं। हरिद्वार में अलसूबह ही गंगा तट पर परिवारजन एकत्र हो गया। दादी ने सभी को जगाया। कुम्भ स्नान के लिए शायद रात भर वह सोई भी नहीं थी।...सभी को साथ ले नदी तट पर ले आयी थी। अर्सा पहले की बात है यह। मन में उसकी धूंधली याद भर है। भीड़ का रेला लगा था परन्तु फिर भी जैसे हर व्यक्ति अकेला था। इस अकेलेपन में भाव था, अपने आपको शुद्ध करने का। मनसा, वाचा और कर्मणा से। तभी पहली बार लगा था, समूह में उंच-नीच के भाव तिरोहित हो जाते हैं। पहली बार भीड़ में होते हुए भी भीड़ से अलग अकेलेपन का भाव भी तभी लगा था। नदी पर स्नान की परम्परा में सम्मिलित होने की उस याद में पित्तरों के साथ आने वाली पीढ़ी के कल्याण का हरजस भी दादी के मुंह से निकल रहा था। नदी तट पर कमर तक डूबे अभ्यर्थना में उठे हाथ हर ओर हर छोर।
कुम्भ में आपको भीतर और बाहर से शुद्ध करने की मंषा ही दूर दराज से लोगों को एक स्थान पर खींच ले आती है। सूर्य को अर्ध्य देते हाथ। डूबकी लगाकर अपने आपको शुद्ध करने के साथ भविष्य के सद्कर्मों के लिए अपने आपको संकल्पबद्ध करते जन। किसी भी धर्म का यही सबसे बड़ा मर्म है। हम अपने आपका मूल्यांकन करें। अपना आत्मविष्लेषण करें। कुंभ इसी का प्रतीक है।
एक ही घाट पर जाति, सम्प्रदाय के भेदभाव से परे वहां हर व्यक्ति इंसान होता है। सबके लिए उसके भाव सम होते हैं। जाति का वहां कोई बंधन नहीं है। गरीब और अमीर की कोई खाई नहीं है। वय का कोई बंधन नहीं है। सभी एक डूबकी भर लगाने को आतुर। हैं। मन में उठने वाले ईर्ष्या, द्वेष के भाव नदी तट आ जैसे तिरोहित हो जाते हैं। मनुष्य केवल और केवल मनुष्य रह जाता है। स्नान से पहले ही धुलने लगता है मन का मेल। डूबकी लगी नहीं कि उदादत्ता के भाव अपने आप ही जगने लगते हैं।
मुझे लगता है, सांस्कृतिक अस्मिता की अर्थ बहुल ध्वनियां यदि सुननी हो तो एक बार कुम्भ पर्व पर जरूर सम्मिलित होना चाहिए। उत्सवधर्मिता के इस पर्व में मन में उमंग और उत्साह का नया प्रवाह होता है।
नदियों में स्नान की परम्परा शायद इसलिए है कि नदी के प्रवाह से हम सीख ले। कहते हैं जल यदि बहता नहीं है, एक ही जगह रूक जाता है तो संधाड़ं मारने लगता है। ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मंत्र भी तो यही है, ’चरेवैति, चरैवेति....’ अर्थात् चलते रहो। चलते रहो। नदी की तरह। नदियां का प्रवाह जीवन का पर्याय है। शून्य से आती अनंत में समाती नदी। वे बहती हैं तो अपने साथ बहुत कुछ बहा कर ले जाती है। धूल, कंकर, मिट्टी, बड़े पेड़ों के तने और तमाम गंदगी। मुझे लगता है पुण्य सरिताओं के प्रवाह को देखें नहीं उसे सुनें और फिर गुनें। प्रवाह में कितने वेग, संवेग झेलती है नदी। उतार-चढ़ाव में पत्थरों की बाधाओं को पार करती नदियां बहती है। न थकते। कभी मंद तो कभी तेज। नदी का प्रवाह गति में आगे बढ़ता रहता है। जीवन में भी तो यही है। जीवन प्रवाह क्या नदी के समान नहीं है? कितने उतार-चढ़ाव आते हैं। आषाएं-निराषाएं उत्पन्न होती रहती है। संकट आते हैं। दुःख से उत्पन्न होती है पीड़ परन्तु हम कईं बार अपने प्रवाह को रोक देते हैं। दुःखों से घबरा जाते हैं। नदी नहीं घबराती। उसका प्रवाह कम नहीं होता। नदी की शक्ति है उसकी गति। हम गति को कम कर देते हैं। गति को समाप्त कर देते हैं। सोचिए! यदि जीवन में गति ही नहीं रहे तो क्या सब कुछ थम नहीं जाएगा। गति जीवन की सहजता है। गति का अर्थ है चलते रहना। सांस भी तो चलती है। यदि उसका चलना रूक जाए तो!
...तो बहती नदी के प्रवाह को सुनें। उसमें भीगें। कुम्भ से बड़ा और बहाना इसका और हो भी क्या सकता है! कुम्भ स्नान कर जब लौटें तो अनुभूत करें, आप जो पहले थे, अब वह नहीं रहे। कवि घाघ कहता है,
‘क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति वदेव रूपं रमणीयाताः’
अर्थात् क्षण-क्षण में जो वस्तु को अपूर्व सुन्दरता अथवा नवीनता प्रापत होती है, वही रमणीयता का सच्चा स्वरूप है। इसीलिए हर पल, हर क्षण सुंदर है। उसे हाथ से न जान दें। कुम्भ में स्नान का हर क्षण, हर पल रमणीयता प्रदान करता है।
कुम्भ पर विचार करते ही रैदास का किस्सा स्मरण हो आया है, प्रयाग में कुम्भ का मेला भरा था। संत रैदास भी वहां पहुंचे। षिष्यों और उनके भक्तों ने उनका स्वागत किया, आदर-सत्कार किया। प्रयाग के पंडित चिढ़ गए। तय यह हुआ कि दोनों ओर के प्रतिनिधि हाथ में शालिग्राम लेकर गंगा में बहाएंगे। जो सच्चा होगा उसके शालिग्राम तैरते रहेंगे। रैदास की शालिग्राम मूर्ति तैरने लगी। रैदास ने तभी कहा था, ‘मूरती मांहि बसे परमेष्वर तो पानी मांहि तिरै रे।’
कुम्भ यानी घड़ा। जिसमें जल भरा जाता है। कुम्भ के बारे में विचारता हूं तो बहुत से बिम्ब मन में तैरने लगते हैं। एक कुम्भ वह जो अमृत से भरा है। क्षीरसागर के मंथन से निकला। वह जिन जिन स्थानों पर छलका और भूतल पर रखा गया और जिस जिस ग्रह के कालबिन्दु पर रखा गया, उन-उन स्थानों पर उस ग्रहयोग के कालबिन्दु पर प्रति बारह वर्ष के बाद कुम्भ पर्व मनाया जाता है। एक कुम्भ वह है जिस प्रक्रिया में सांस भरकर रोकी जाती है। यह शरीर भी तो कुम्भ ही है। कबीरदासजी तभी तो कहते हैं-
यह तन कच्चा कुभ है, लियां फिरै या साथि।
ढक्का लगा फुटि गया, कछु न आया हाथि।।
अर्थात् यह जो शरीर है वह कच्चा कुभ है, मिट्टी का बना जिसे लिये तूं यूं ही फिर रहा है। धक्का लगते ही यह फूट जाएगा फिर कुछ भी हाथ नहीं लगना है। भावार्थ यह कि भौतिक चीजें यहीं रह जानी है। मिट्टी का बना यह शरीर मिट्टी में ही मिल जाना है।
...तो कुम्भ जीवन चक्र का प्रतीक है। एक फेरे से मुक्ति के बाद दूसरा चक्र प्रारंभ हो जाता है। अमृत का अर्थ है न मरा होने का भाव। शरीर के मरने को एक स्नान के रूप में देखने का भाव। इसीलिए कुम्भ में स्नान किया जाता है। स्नान के बाद व्यक्ति वह नहीं रहता जो पहले था, वह नवीन हो जाता है। कुम्भ का स्नान तन और मन दोनों की ही शुद्धि का पर्व है। आस्तिक ही नहीं नास्तिक भी निस्पृह भाव से नदियों में स्नान करते हैं। स्नान करते अपने आपको नवीन करते हैं। पुराने भाव तिरोहित हो जाते हैं। नूतनता का संचार हो जाता है।
‘नवो नवो भवति जायमानः‘
लोक के अनहद नाद का यही मूल स्त्रोत है। नयेपन में ही तो व्यक्ति की असल यात्रा प्रारंभ होती है। भीतर की यात्रा। अकेलेपन की यात्रा। खुद को खोजने की यात्रा। कुंभ स्नान के बाद जब यह यात्रा करके व्यक्ति बाहर आता है तो वह पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाता है। पंडित विद्यानिवास मिश्र कहते हैं, ‘कुम्भ पर्व एक निमंत्रण है अपने गांव-घर, अपने जाति, कुल, अपने धन-वैभव को भूलकर एकदम अंकिचन बनकर जुड़ो, एक दूसरे से और जब जीवन की पवित्र धारा से रागी-वैरागी, सब एकत्र हों, काल के उस बिन्दु को पहचानो, देष की उस बिन्दु को पहचानो जहां अमृत का कुम्भ है। वह एक समय हरिद्वार में, दूसरे समय प्रयाग में है, तीसरे समय महाकाल की नगरी उज्जयिनी में है, चौथे समय गोदावरी के उद्गमस्थल नासिक में है। कोटी-कोटी आस्थाएं जुड़ती है जीवन के इस मूर्त्त प्रवाह से पत्थरो ंके हदृय से निकली हुई रसधार से कोटि-कोटि सांसे एक महाष्वास बनती हैं, सांसो का मेला होता है तब एक पर्व बनता है। पर्व का अर्थ है वह सन्धि जो भरे हुए रस की रक्षा करती है, गन्ने की दो पारों के बीच ही तो गन्ने की मिभस है। समष्टि जीवन का माधुर्य संचय ही पर्व है।’
कुम्भ का शास्त्रीय पक्ष ज्योतिष शास्त्र से जुड़ा है। कुंभ शब्द की व्युत्पत्ति है, कुं भूमिं, कु कुत्सितं उम्भति पूरयति इति कुम्भः। अर्थात् दिन का वह भाग जब क्षितिज पर राषि चक्र का उदय होता है। अलग-अलग स्थानों पर कुंभ का अलग अलग योग होता है।
पद्मिनी नायके मेषे कुम्भं राषिगतो गुरूः।
गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भ नाम ददोत्तमम्।।
सूर्य जब वृष राषि पर हों तथा वृहस्पति कुंभ राषि पर जाएं तब हरिद्वार में कुम्भ होता है और यह स्थिति बारह वर्षों में एक बार आती है।
कं जलं उम्भति पूरयति अवर्षणादि दुर्भिक्षेम्यो दूरयति इति कुम्भः।।
यानी बारह वर्षों में घटित वह ग्रह योग जो दुर्भिक्ष तथा अवर्षण को दूर करके सबको समृद्धि प्रदान करता है, वह कुम्भ है। इसीलिए हरिद्वार से ही कुम्भ की परम्परा की शुरूआत मानी गयी है। कुम्भ लोक पर्व है। प्रकृति से जुड़ने का पर्व। कुम्भ पर एकत्र जन समुदाय भीतर से खाली होता है। हरेक वहां मनुष्यता के भाव से ही खींचा चला आता है। कुम्भ महात्माओं के मिलन का पर्व है। बल्कि यूं कहें कि जब पृथ्वी पर लोकहित के लिए एक स्थान पर महात्मा एकत्र होते हैं तो वह कुम्भ योग होता है। कुम्भ स्नान के अंतर्गत एकत्र होने वाला जन समुदाय जो भाव लेकर वहां उपस्थित होता है, वह महात्मा का भाव ही तो होता है। इसीलिए शायद कहा गया है-
कुं पृथ्वीं उम्भतेऽनुगृह्यते उत्तमोत्तम महात्म संगमैः
तदीय हितोपदेषै यस्मिन् स कुम्भः।।
अर्थात् जब पृथ्वी पर अनेक महात्मा एकत्रित होकर लोकहितकारी उपदेषों का प्रवचन करें, वह कुम्भ योग है। लोक के बिना जीवन-सत्व का उद्घाटन कैसे हो! लोक में ही उत्सवधर्मिता और जीवन धर्म का उद्भव होता है। लोक तत्व का जब स्पन्दन होता है तो संस्कृति और दूसरी कलाएं मुखरित होते देखी जा सकती है। महाभारत के उद्योग पर्व में भी तो वेद व्यास कहते हैं
‘प्रत्यक्षदर्षी लोकानाम् सर्वदर्षी भवेष्वरः’
अर्थात् जो लोकदर्षन में शामिल होकर खुद उसे अपने अन्तरमन से देखता है, वही मनुष्य सच्चे रूप में लोक को समझ सकता है। भारतीय संस्कृति विष्ववरणीय इसीलिए है कि उसमें लोक जीवन का साधकीय रूप है। लोक उत्सवधर्मिता की अपनी परम्परा के अंतर्गत निरंतर अपने आपको साधता है। निरंतर साधने के लिए तन और मन दोनों की ही शुद्धि जरूरी है।
...और कुम्भ की पौराणिक कथाएं! सहज ही मन में कथाओं की गूंज होती है। सागर मंथन से निकले अमृत कुम्भ की कथा जेहन में सबसे पहले कौंधती है। अमृत की खोज में देवता और असुर दोनों ही साथ मिलकर जुट गए हैं। अमृत कलष जैसे ही हाथ में आया, दोनांे में ही उसे पाने का युद्ध छिड़ गया। लड़ाई चलती रही। चलती ही रही। कहते हैं, जिन स्थानों पर यह लड़ाई चली वहां कालान्तर में पर्व मनाया जाने लगा। इन स्थानों पर स्नान को मोक्षकारक माना जाने लगा।
एक और भी कथा है ‘मत्स्य पुराण’ की। अमृत कलष लेकर गरूण उड़ रहे हैं। उड़ान के दौरान अमृत कलष की बूंदे जहां जहां छलकी और जहां बूदें गिरीं, वहां कुम्भ पर्व विश्रुत हुआ।
आख्यान और भी है।...गरूण नागमाता कद्रू से अपनी माता को दासत्व से मुक्ति दिलाने के लिए ‘अमृत कलष’ हठात् छीनकर ले आए हैं। नागलोक में वासुति द्वारा रक्षित अमृत कलष के यूं गरूण के छीनकर ले जाने पर नागांे को बहुत क्रोध आता है। नाग उनका पीछा करता हैं। ‘अमृत कलष’ प्राप्ति के लिए नाग गरूण पर चार बार प्रहार करते हैं। चारों बार ‘अमृत कलष’ पृथ्वी पर रखकर गरूण को युद्ध करना पड़ा। कहते हैं, पृथ्वी पर जहा, जहां अमृत कलष रखा गया, वे ही स्थान ‘कुम्भ स्थली’ से जाने गए।
विष्णुद्वारे तीर्थराजेऽअवन्त्यां गोदावरी तटे।
सुधाविन्दु विनिक्षेपात् कुम्भ पर्वेति विश्रुतः।।
हरिद्वार का कुम्भ प्रथम कुम्भ है। प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में क्रमषः कुम्भ घटित होता है। कुम्भ अभावों को दूर करता है। जीवन में नवीनता का संचार करता है। यह जब घटित होता है तो मंगल होता है। पृथ्वी में समृद्धि व्याप्त होती है। हर ओर, हर छोर अनिष्टकारी प्रवृतियों का शमन होता है। मंगल कामनाओं के स्वर धरित्रि पर गूंज उठते हैं। अपने लिए नहीं बल्कि पूरे संसार के लिए मंगलकामना के स्वर-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कष्चित् दुःख भाग्भवेत्।।
Sunday, April 11, 2010
सब्दों की नीरवता के बीच...
"उड़ना संभव करता आकाश" की बड़ी विषेषता यह भी है कि इस संग्रह की कविताओं में आचार्य ने व्यक्ति की आस्थाओं, मन में उपजे संदेहों और एंकात की संपूर्णता को भी सर्वथा नये अर्थ दिए हैं। इस नये अर्थ में जो ध्वनित होता है, उसे जरा देखें, ‘‘मेरा एकान्त/हो आया/दुनिया तुम्हारी जैसे/कभी एकान्त को अपने/मेरी दुनिया में/ढ़लने दो..’ और ‘‘निंदियायी झील के जल में/सोते हुए अपने को/देखता रहूं/तुम्हारे सपनों के जल में/कभी पत्ता कोई झर जाय/नीरव...।’
नंदकिशोर आचार्य के पास भाषा की अद्भुत कारीगरी है परन्तु यह ऐसी है जिसमें षिल्प या शैली के चमत्कार का आग्रह नहीं है। बात कहने का उनका अपना मौलिक अंदाज है, इस अंदाज में शब्दों के अपव्यय से उन्हें परहेज है। शायद यही कारण है कि कविता के उनके शब्द अगले शब्दार्थ को खुद ही खोलते नजर आते हैं। देखें, जरा छोटी सी बानगी ‘केवल अपने रंग में रहना/कम बेरंग होना है/यह उस हरे से पूछो/जिसका खो गया है लाल/या लाल से जानों/जिसका हरा गया है हरा।’
"उड़ना संभव करता आकाश" की कविताओं में आचार्य ने अपने एकांतिक क्षणों को कविता में गहरे जीते जीवनानुभवों और अन्तर्मन संवेदनाओं के आकाष से भी पाठकों का बेहद खूबसूरती से साक्षात्कार कराया है। यहां उनकी बहुत सी आत्मपरक कविताएं भी है जो उनका निजीवृत बनाती, पाठकों की संवेदनाओं को भी गहरे से दस्तक देती है। अपनी पूर्ववर्ती कविताओं की भांति ईष्वर के सबंध में उपजे भावों को उन्होंने यहां नये अर्थों में व्याख्यायित किया है। वे ईष्वर के होने और न होने के बीच के स्पेस को भरते विमर्ष की जैसे नयी राहें खोलते हैं, ‘‘जीवन से पहले है/ईष्वर/जीवन के बाद/मृत्यु है/दोनों ही निर्थक होते जो/दोनों के बीच/या जीवन/लेता हुआ सांसे/तुम्हारे वायुमंडल में।’
बिम्ब और प्रतीकों से उभरते अर्थों में दरअसल आचार्य कविता का नया रूपक बनाते हैं। मुझे लगता है, काव्य भाषा के साथ काव्यवस्तु में जो कुछ अव्यक्त और सामान्यतया अननुमार्गणीय है, उसे अभिव्यक्त और अभिव्यंजित करती संग्रह की उनकी कविताएं दरअसल कविता की कलात्मक खोज भी है। इस खोज में परम्पराबोध तो है परन्तु जड़त्व को तोड़ने का प्रयास भी हर ओर, हर छोर है। मसलन ‘लय रच जाना उस का’ कविता को ही लें, ‘हर उड़ना/सम्भव करता आकाष/लय होता हुई उस मेंः/उड़ने का आनंद है/पाखी/लय रच जाना उस का/मुक्ति मेरी हो जाना है।’
"उड़ना संभव करता आकाश" संग्रह पढ़ते बार-बार यह अहसास भी होता है कि यहां वे अपनी पूर्व कविताओं को ही नहीं बल्कि अपने समकाल को भी जैसे नये सिरे से पुनर्संस्कारित करते हैं।
"राजस्थान पत्रिका" के रविवारीय, दिनांक 4 अप्रैल 2010 को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास की समीक्षा
Friday, April 2, 2010
कला में अर्थ अभिव्यंजना
Friday, March 26, 2010
माध्यम का हूबहू रूपान्तरण
बहरहाल, किसी कलाकृति के लिए छायाचित्र सहयोगी बने तो इसे स्वीकारा जा सकता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि कला का रूप एक हो जाए। ऐसा यदि होता है तो फिर कला की अपनी निजता कैसे रहेगी। दूसरी कला से आप विषय ले सकते हैं, फॉर्म का कुछ हिस्सा इस्तेमाल कर सकते हैं परन्तु पूरा का पूरा उसे ही आप यदि अपनाते हैं तो फिर वह कला कहां रहेगी!
पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र की सुरेख कला दीर्घा में जयगढ़, नाहरगढ़, गढ़ गणेष, जन्तर-मन्तर, आमेर दुर्ग आदि की खेतान्ची की पेंटिग देखते हुए लगा कैनवस पर छायाचित्रों को रूपान्तरित कर दिया गया है। उनके तेलचित्रों में कला की मौलिक अभिव्यंजना की बजाय छायाचित्रकारी का ही आस्वाद हर ओर हर छोर नजर आ रहा था। किलों के भीतर के गलियारों के छाया-प्रकाष प्रभाव, उग आयी घास और ऐसे ही बहुतेरे दूसरे दृष्य ऐसे हैं जिनहें अनुभूति चाह कर भी संचित नहीं कर सकती। खेतान्ची ने इन्हें अपनी पेंटिंग में संचित किया है। जाहिर सी बात है, कैमरे का इस्तेमाल उन्होंने अपनी इन पेंटिंग मे अनुकरण की हद तक किया है। सवाल यह है कि क्या इन्हंे फिर कलाकृतियां कहा जाएगा? कलाकार पर दूसरी कला का प्रभाव हो सकता है। अमृता शेरगिल, गुलाम मोहम्मद शेख, विकास भट्टाचार्य, गीव पटेल, भूपेन खक्खर, शांतनु भट्टाचार्य आदि की कलाकृतियों में फोटोग्राफी का प्रभाव जरूर दिखायी देता है परन्तु उन्हें छायाचित्रों का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। बहुतेरी बार अचेतन भी ऐसा होता है परन्तु खेतान्ची ने तो पेंटिंग को ही छायाचित्र बना दिया है। हूबहू आप यदि दूसरे माध्यम को अपने माध्यम में रूपान्तरित करते हैं तो फिर इसमें नया क्या हुआ?
बहरहाल, ऐसे दौर में जब कैमरानुमी सक्षम यंत्र बेहद विकसित हो गया है और नंगी आंख से न देख सकने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म दृष्य को भी वह चित्र में परिवर्तित कर देता है, क्या पेंटिग का प्रयोजन भी यही होना चाहिए! पॉल देलारोष फिर से याद आ रहे है, ‘क्या चित्रकला मर गयी है?’
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" २६-३-२०१०
Friday, March 19, 2010
कलाओं का अन्तर्सम्बन्ध
भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखती है, उसमें जीवन के सभी पक्षों को समाहित किया जाता है। जाहिर सी बात है, कला के परिप्रेक्ष्य में उसमे संगीत है, नृत्य है, चित्रकला है और तमाम प्रकार की दूसरी कलाएं भी सम्मिलित हैं। दरअसल सभी कलाएं एक दूसरे से गूंथी हुई हैं। वे एक दूसरे को रूप देने का कार्य करती है। भरत मुनि के नाट्यषास्त्र का नाम भले नाटक से संबद्ध हो परन्तु उसमें सभी कलाओं के अर्न्तसंबंधों की परिणति में हर कला की अपनी स्वायत्ता को दर्षाया गया है। भरत मुनि का एक बेहद खूबसूरत श्लोक है जिसमें उन्होंने संगीत को नाट्य की शय्या कहा है। आर्जेन्टीनी लेखक खोर्खे लुइस बोर्खेस के कथन को इसी परिप्रेक्ष्य में लें जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द का जन्म कविता में हुआ होगा। सच भी क्या यही नहीं है! गान मे छन्द का स्थान केन्द्रीय है। यदि वहां छन्द नहीं बरता गया है तो वह गान का स्वांग भर होगा।संगीत में आलाप के अंतर्गत राग का हल्के हल्के विस्तार होता है। इस विस्तार में ही पूरा एक भाव लोक तैयार होता है। ठीक ऐसे ही रंगमंच के साथ है। वहां किसी पात्र सें संबंधित दृष्य में विस्तार होने के बाद ही अगला दृष्य मंचित होता है। नृत्य में दृष्टि, हाव-भाव आदि की भंगिमाएं ही उसका विस्तार करती है। यही बात चित्रकला के साथ भी है। रंग और रेखाएं बढ़त करती है। इस बढ़त में ही कैनवस पर मूर्त और अमूर्त चित्र की परिणति होती है। हर कला अपने रूप में सौन्दर्य और श्रेष्ठता का वरण दूसरी कला के मेल से ही करती है। सोचिए! यदि नाटक में नृत्य और सगीत नहीं हो, संगीत में चित्रात्मकता के दृष्य उभारने का भाव नहीं हो और चित्रकला में संगीत की लय नहीं हो तो क्या उसे जीवंत कहा जाएगा!बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं, जतिनदास का एक चित्र जेहन में कौंध रहा है। नृत्य की भाव भंगिमाओं में यह चित्र ऐसा है जिसमें कला की सम्पूर्णता को अनुभूत किया जा सकता है। इसमें चित्रात्मकता तो है ही, सांगीतिक आस्वाद है, नाट्य का भ्व है, कविता का छन्द है और कला की तमाम अनुभूतियों भी यहां सघन महसूस की जा सकती है। कहा जा सकता है कि सभी कलाएं एक दूसरे से मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। संवाद और सहकार के जरिए कलाओं के परस्पर संबंधों को और अधिक सघन किया जा सकता है। अब जबकि बाजारवाद ने लगभग सभी कलाओं को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और हर कला अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगी है, क्या यह जरूरी नहीं है कि कलाओं के अन्तर्सम्बधों पर विचार करते हम उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो क्या अपनी श्रेष्ठता की होड़ में एक कला का दूसरी कला से संवादहीनता और सहकारहीनता से उनके मूल अस्तित्व से संघर्ष की चुनौती ही क्या हम पैदा नहीं कर रहे?
‘‘डेली न्यूज’’ में प्रति शुक्रवार को प्रकशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ ‘‘कला तट’’ दिनांक 19।3।2010
Tuesday, March 16, 2010
सच करो रेत के सपने
मौन में
संजोए हैं मैंने
रेत के सपने
पाल ली है मछलियां
मरूथल की मृगमरिचिका में
तुम-
सांस बन जीवन दो
मेरी मछलियों को
सच करो
रेत के सपनों को
मझदार भी किनारा बने
मेरी सोच का
खोलो, खोलो
तुम्हारे होने के सच का
अनावृत घेरा।
Friday, March 12, 2010
स्मृतियों के दृष्यालेख
सैयद हैदर रज़ा के चित्र स्मृतियों के दृष्यालेख हैं। ऐसे जिन्हें आप देखकर सुकून पा सकते हैं, पढ़ सकते हैं और हां, यदि घूंट घूंट आस्वाद लंेगे तो अर्से तक आप उन्हें भुला भी नहीं पाएंगे। वे आपकी स्मृतियों को झंकृत करते रहेंगे। रजा दअरसल चित्रों से देखने वाले का रागात्मक संबंध स्थापित कराते हैं। बेषक, चित्रों में उभरी स्मृतियां उनकी वैयक्तिक हैं, उनके अपने संदर्भ है परन्तु वे देखने वाले की अंतर्मन भाव सत्ताओं को गहरे से छूती है। ड्राइंग के अंतर्गत रेखाओं का उनका सहज लयात्मक संतुलन और कोमलता हर देखने वाले को आत्मीयता का बोध कराती है। उनके चित्रों में जिस प्रकार की सफाई, रंग स्पर्ष से झलकने वाली कोमलता नजर आती है, वह अमूर्तन में इधर न के बराबर दिखायी देती है। यह रजा की कला के गंभीर आत्मसयंम की ही परिणति है, जिसमें वे कैनवस पर अनुभूति और संवेदनाओं के अपने आत्मकथ्य की खोज बाहर की ओर नहीं करके भीतर की ओर करते हैं, देखने वालों को करवाते हैं।बहरहाल, रज़ा के चित्रों पर पहले भी लिखा है, परन्तु इस बार जब जवाहर कला केन्द्र में लगे उनके चित्रों की प्रदर्षनी देखी तो लगा वे इस उम्र भी में भी निंरतर कला की बढ़त की ओर ही उन्मुख है। रंगों का तो वे अद्भुत लोक रचते हैं। रंग उनके चित्रांे का माहौल बनाते हैं। भावों के उद्वेग में रंग एक निर्मम तटस्थता भी प्रदान करते हैं। आंतरिक तन्मयता और आग्रहषीलता से रजा अपनी ऐन्द्रिकता को कैनवस पर रूपायित करते जैसे दृष्यों को लेख बंचवाते हैं। प्रकृति और जीवन के रहस्यों को कैनवस की भाषा में परोटते उनके चित्र अभिप्राय बहुत अधिक चर्चित भले नहीं हो परन्तु बौद्धिक आडम्बर उनमें नहीं है। मसलन पंचभुत तत्व का उनका चित्र ही लें या फिर बिन्दू के उनके चित्र या फिर उनके रेखांकन-सभी में ज्यामितिक आकारों के उभरते बिम्ब और प्रतीक अदम्य ऊर्जा लिए हैं। उनके चित्रों की बड़ी विषेषता यह भी है कि वे पावन शंांति का अहसास कराते हैं। ऐसे दौर में जब रंग और रेखाएं कैनवस में कला की सघनता की बजाय बाजार की संभावनाओं की दस्तक देती हों, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि रजा के चित्र कला के सच से हमंे रू-ब-रू कराते आषय की अर्थवत्ता की तलाष कराते हैं। उनके बरते रंग मन में उत्सवधर्मिता का जैसे आगाज करते हैं। कोलकाता की आकार-प्रकार आर्ट गैलरी के जरिए प्रदर्षित उनके चित्र हाल ही बनाए हैं और वे सभी ‘लिरिकल’ हैं, हॉं, कुछ में जबरदस्त दोहराव भी है परन्तु समग्रता में उनके चित्रों के रंग और रूपाकार एक अतीन्द्रिय सत्ता के संवाहक बनते, सूक्ष्म बौद्धिक संवेदनाओं का सांगीतिक आस्वाद लगभग सभी स्तरों पर कराते हैं।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १२-३-१०
Friday, March 5, 2010
संस्कृति के अंतर्द्वन्द की पुनर्रचना
सिनेमा का कला से सीधा ही नहीं बल्कि निकट का रिष्ता है। इसलिए कि दोनों ही एक दूसरे के लिए अनंत संभावनाओं के द्वार खोलते हैं और बेशक व्यावहारिक रूप में सामाजिक सरोकारों से जुड़े भी हैं। बहरहाल, कला की सभी विधाएं अंततः अपने माध्यमों से कोई न कोई कथा कहने का ही प्रयास करती है। मुझे लगता है कला के विभिन्न रूपों का पारस्परिक संतुलित समन्वय करना कला को एक प्रकार से अभिजात्य वर्ग की सीमाओं से बाहर निकाल उसे जन सामान्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही है और फिल्म में इसकी सर्वाधिक संभावनाएं हैं। पिछले दिनों जयपुर के नमन गोयल की बनायी ‘एन अफेयर विद न्यूयॉर्क’ देखते इसे जैसे और गहरे से अनुभूत किया। नमन न्यूयॉर्क फिल्म एकेडमी में फिल्म निर्माण और निर्देषन की बारीकियां सीख रहा है। यहां रहते उसने अपने वतन के संस्कारों की स्मृतियों में न्यूयॉर्क की जीवन शैली, संस्कृति को फिल्म में जैसे गूंथ दिया है। दैनंदिन जीवन की साधारण घटनाओं से विषेष उद्दीपन में मन और दैहिक संबंधों के साथ संस्कारों से मुक्ति के घटनाक्रमों में तेजी से बदलते फिल्म के दृष्य घनीभूत नाटकीय रूप धारण कर देखने वाले को आंदोलित करते हैं। रचनात्मक अर्थों में कहानी के बिखरे कोलाज की एक बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें कमेन्ट्री, परस्पर संवाद और सब टाईटल्स की मदद से कथा के बड़े सूत्रों को अल्पअवधि में सहज संप्रेष्य किया गया है। खुद के संस्कारों के बरक्स अपने तई सामाजिकि संहिताओं का एक प्रकार से विरेचन करते नमन ने फिल्म में यथार्थ के विकृत को ट्रिटमेंट में कला की सौन्दर्यानुभूति भी दी है। स्क्रिन पर ताजमहल, खजूराहों की मूर्तियों के बहाने न्यूयार्क और भारतीय दर्शन की गहराईयों को भी जिया गया है। यथार्थ जीवन के कटू सत्यों के साथ उनके संघर्ष में नमन ने अपनी फिल्म में संस्कृतियांे के अंतर्द्वन्द को सैलुलाइड पर जैसे पुनर्सृजित किया है। नमन ने इससे पहले ‘अदर देन राइट ऑर रोंग’, ‘सस्पेक्ट लिस्ट’, बिगनिंग टू गेट बाल्ड’ जैसी लघु फिल्में भी बनायी है। कथ्य की मौलिकता और भाव बोध को अधिकाधिक सुगम करती उसकी बनायी फिल्में मन और मस्तिष्क को झंकृत करती कुछ सोचने को विवष करती है। मुझे लगता है, वास्तविकता की पुनर्रचना की सिनेमा की आभासी क्षमता ही उसके कला सरोकारों को और अधिक प्रमाणित करती है।"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक ५-३-१०
Friday, February 26, 2010
दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार

जीवन मे जो कुछ हो रहा है, उसे हम नंगी आंख से बहुतेरी बार शायद ठीक से देख और समझ नहीं पाते। शायद इसका कारण यह भी है कि चीजें और दृश्य इस तेजी से बदलते हैं कि उनकी गति को हमारी आंख चाह कर भी पकड़ नहीं पाती। वस्तुओं के रूप, टैक्सचर, आकार जैसी चक्षुगम्य लाक्षणिकता के स्थान पर उनकी अनुभूत गति को कैमरा पकड़ सकता है, बशर्तें उसे बरतने वाला कला की संवेदनशील आंख रखता हो। हिमांशु व्यास के छायाचित्रो में कला की बारीकियों को सहज अनुभूत किया जा सकता है। उसके चित्र देखते लगता है, वह दृश्य की प्रतिकृति ही नहीं करता बल्कि उसमें अपने तई संवेदना जोड़ता दिख रहे दृश्य की गति का नयी दीठ से पुनराविष्कार भी करता है। उसके कैमरे से निकले चित्रों में प्रकृति और जीवन के रंग अपने शास्वत स्वरूप में तो हैं परन्तु खुद उसकी आंतरिक संवेदना में वे अपनी पृथक स्वायत्ता लिए भी अलग से लुभाते हैं। मसलन उसका एक बेहद खूबसूरत छायाचित्र है पानी मंे विसर्जित प्रतिमा का। प्रतिमा के बहाने जल में उभरते दूसरे बिम्ब यहां छायाचित्र की कला सर्जना के संवाहक हैं। एक छायाचित्र है जिसमें चिड़िया उड़ रही है। एक गमले से दूसरे गमले में फूदक कर पहुंचती चिड़िया की गति और पाश्र्व की हरितिमा में यहां संवेदनशीलता का जैसे काव्यात्मक सृजन किया गया है। एक कला दूसरी कला को कैसे आलोकित करती है, उसे इस दृश्य में गहरे से समझा जा सकता है।बहरहाल, हिमांशु के संवेदना चक्षु में टूटती इमारत की पानी में पड़ती स्पष्ट परछाई, रात्रि में स्ट्रीट लाईट की रोशनी में साईकिल चलाते साधु का अद्भुत अक्स, श्वेत-श्याम छायाचित्र में बादलों की लुकाछिपी में होले से निकलता सूरज और झोपड़ी की मुंडेर पर इस दृश्य का आस्वाद लेती चिड़िया और बरसात में चलते पथिक के बहाने झरते पानी की संगीत की सुर लहरियां में जैसे दर्शन लोक और जीवन की अद्भुत लय का विस्तार है। मुझे लगता है हिमांशु के छायाचित्रों में अर्थ बहुल ध्वनियां है। ये ध्वनियां कैमरे के उसके एंगल, कोण के साथ ही औचक उत्पन्न ऐसे दृश्य जिसकी पुनरावृति उसी रूप में फिर से संभव नहीं है, में विशिष्ट रूप में सुनी जा सकती है। स्मृति को सघन और उत्कट करते कैमरे से लिए हिमांशु के दृश्य इसी कारण अप्रत्याशित और अद्वितीय रूपों की सर्जना करते हैं। हर कला की अपनी स्वायत्ता होती है और वह समाज निरपेक्ष होती है, हिमांशु का कैमरा इसे और अधिक सघन और संवेदनशील अर्थों में समझाता है। उसके छायाचित्रो को देखकर कला के दूसरी कलाओं से अंतःसबंधों को भी समझा जा सकता है।
प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २६-२-10
Saturday, February 20, 2010
जड़त्व तोड़ती कथक नृत्यांगना का सम्मान

घरानों की परम्पराओं के बावजूद संगीत और नृत्य परिवर्तनषील है। घराने नृत्य और संगीत की पारम्परिक शास्त्रीयता का पोषण तो करते हैं परन्तु यदि कोई कलाकार घरानों की परम्परा में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता है, तो फिर उसकी कोई सार्थकता भी नहीं है। व्यक्तिगत मुझे लगता है संगीत और नृत्य परिवर्तनषील यानी क्षितिज-विहीन हैं। यदि परम्परा मंे वे चलते रहें तो फिर उनमें जड़त्व आ जाता है। इस जड़त्व को वे ही कलाकार तोड़ते हैं जो खुद अपनी ओर से उसमें कुछ जोड़ते हैं। ऐसा जिसमें पारम्परिक कला और भी निखर निखर जाती आनंदानुभूति कराती है। मुझे लगता है, कथक के जयपुर घराने की नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली ऐसी ही कलाकार हैं। इस बार जब सगीत नाटक अकादमी अवार्ड उनहें देने की घोषणा हुई तो लगा कविता की लय को उसका हक दिया गया है। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों को बहुतेरी बार देखा है और हर बार यूं भी लगा जैसे वे पहले की ही अपनी प्रस्तुति का फिर से पुनराविष्कार कर रही हैं। परम्परागत कथक में प्रेरणा की तत्कार बेजोड़ है। वें जब नृत्य करती हैं तो घुंघरू ताल का विलक्षण चमत्कार दिखाते हैं और उनके गत और भावों का तो कहना ही क्या! यह जब लिख रहा हूं, जयुपर लिटरेरी फेस्टीवल में अषोक वाजपेयी की पढ़ी, कविता जेहन मेें कौंध रही है,- वह अपने एकान्त को भरती है/अपने शरीर की लय से,/लालित्य से/उसकी आत्मा/उसे अपलक निहारती है...’। प्रेरणा के नृत्य में कोमल कल्पनाओं, सूक्ष्म विचारों, उल्लास, प्रेम, हृदय की पीड़ा आदि मनोभावों के साथ ही दारूण दुख, स्वकीया, परकीया, नदी, समुद्र, त्याग, सन्यास आदि बहुतेरे विषयों के भाव प्रदर्षन उसकी आंख, भौहें, पलकोें और मुस्कान से सदा विषिष्ट अंदाज में जीवन्त होती है। इसमें परम्परा भर नहीं है, खुद उसके नृत्य की रची भाषा की भावाभिव्यक्ति है। गुरू कुंदनलाल गंगानी की दी परम्परा को आगे बढ़ाते प्रेरणा ने दर्षन की गहराईयों में संगीत के भावों को अपनी विषिष्ट अदाओं के संस्कार दिए हैं। वह कहती भी है, ‘मैं नृत्यांगना हूं। नृत्य मेरी भाषा है। नृत्य ने मेरे जीवन का मार्गदर्षन किया है।’सच ही तो है यह संगीत और नृत्य ही तो है जो हमारा मार्गदर्षन करते भीतर के हमारे खालीपन को भरते हैं। इस लिहाज से ताल और लयकारी की गूढ़ता के साथ भावों और कल्पनाओं के सच्चे और सूक्ष्म प्रदर्षन को जीती प्रेरणा का सम्मान परम्परा के जड़त्व को तोड़ती कथक को समृद्ध करती कलाकार का सम्मान नही है!
डेली न्यूज़ में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १९-२-२०१०
Friday, February 12, 2010
नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवर्तक आचार्य
भारतीय कला-सृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। सृष्टि का अनुकरण है। नव सृष्टि है। जब भी कला के ये भाव मन मंे आते हैं, भगवान षिव की नटराज मूर्ति आंखों के सामने घुमने लगती है। षिव ही तो हैं जो नृत्य, संगीत, नाट्य के आदि प्रवत्र्तक आचार्य हैं। संगीत को अधिक सूक्ष्मता प्रदान करने के लिए भगवान षिव ने ही सुर सप्तक की रचना की। इसी से वे नादतनु कहलाए। षिव सूत्र में कहा गया है ‘नर्तक आत्मा’ अर्थात् आत्मा नर्तक है। षिव का नृत्य आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक इन तीनों ही स्तरों पर हो रहा है। नृत्य का जहां जन्म होता है, वहीं गति होती है। षिव नर्तक हैं, नटराज हैं। नृत्य सम्राट है। यह संपूर्ण विष्व षिव का लगातार नाच ही है। सृजन के नृत्य और जीवन चक्र की नियमितता की मनोहर अभिव्यक्ति षिव की नटराज मूर्ति में ही दिखायी पड़ती है। नटराज में सृष्टि के लयात्मक विकास तत्व का दर्षन है। अपने नृत्य रस में मस्त चिदंबर षिव के आनंदमय नृत्य से ही सृष्टि का जन्म और विकास साथ साथ होता रहता है। नटराज की मूर्ति को इस बार जब देखें तो जरा गौर करें, उनके ऊपर वाले दाहिने हाथ में डमरू है। काल के डमरू के ताल पर ही कला थिरकती है। डमरू सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। कहते हैं, सृष्टि का उद्भव विष्फोट से, शब्द से हुआ। नटराज ने एक बार नाच के अंत में चैदह बार डमरू बजाया। इसी से चैदह षिवसूत्रों का जन्म हुआ। यही वस्तुतः उनके शब्द रूप का पूर्ण विस्तार है। इन चैदह सूत्रों के आधार पर ही पाणिनी ने व्याकरण की रचना की। आकाषवाणी में अस्थायी उद्घोषक की सेवाओं के दौरान स्टूडियो में जब भी प्रवेष करता, षिव की नटराज मूर्ति से ही सामना होता। षिव के इस नृत्य स्वरूप ने मन को झंकृत करते सदा ही विचारों की जाग का नया भव दिया। ऐसा जिसमें डूब-डूब आज भी आनंद से सराबोर हो जाता हूं। मुझे लगता है सृष्टि के लयात्मक विकास का समग्र दर्षन षिव के नटराज स्वरूप में ही है। षिव का यह नृत्य स्वरूप अमृतमय और मंलकारक है। षिव जब नृत्य करते हैं तो सभी देवता उसमें सम्मिलित होते हैं। सरस्वती वीणावादन करती है, इन्द्र बांसूरी बजाते हैं, भगवती रमा गायन करती है, विष्णु ताल वाद्य मृदंग बजाते हें, देवता उन्हें घेरकर खड़े हैं। यही तो है षिव का महादेवत्व स्वरूप। सृष्टि विद्या समाहित षिव स्वरूप। कुमार स्वामी ने षिव ताण्डव को सृष्टि के रहस्य के उन्मीलन के रूप में देखा है। और मैं, नटराज की मूर्ति जब भी देखता हूं सृष्टि विद्या का रहस्य उसी में पाने लगता हूं। महाषिवरात्रि....नृत्य गीत की रात्रि ही तो है। षिव को याद करते झूमें और गाएं। 
