Friday, November 26, 2010

कैनवस पर अनुभतियों का अर्थोन्मेष

चित्रकला रूपार्थ पर निर्भर है जबकि काव्य कला वागर्थ पर। कला में रंग, आकार तथा इनके विन्यास हमारी आंखों के जरिए हमारी संपूर्ण इन्द्रियों को संवेदित करते हैं। यहां यह सब इसलिए कि काव्य संवेदना रखने वाला जब कैनवस पर रंगो और रेखाओं से दर्शकों का नाता कराता है तो उसमें अर्थ संदर्भों के नए गवाक्ष अनायास ही खुलते दिखायी देते हैं। तेजी ग्रोवर मूलतः कवयित्री हैं परन्तु पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में लगी चित्रों की उनकी प्रदर्शनी को देखते लगा, कैनवस पर वह प्रकृति के स्वरूप, दृश्यों को सर्वथा नयी दीठ से रूपायित करती है। उनके चित्र बिम्बो में समय की संवेदना और प्रकृति की बहुतेरी भंगिमाएं कला का अनूठा सौन्दर्य रचती है। ऐसा नहीं है उनके सारे चित्र प्रकृति केन्द्रित ही है, उनमें रोजमर्रा की जीवनानुभूतियां भी है परन्तु एक बात सबमें समान है और वह है उनका सांगीतिक आस्वाद। कैनवस पर उनकी कला से साक्षात् होते औचक स्वयं उनकी ही लिखी कविता की पंक्तियां जेहन में कौंधने लगती है, ‘वे बिम्ब ही थे@जिनसे और बिम्ब उपजते थे@कुछ और मिट जाते थे@उनसे निकलना@उनकी अति के बाद ही संभव होता@उनका तिरस्कार@उन्हें रचने की सामथ्र्य से@रचने की सामथ्र्य को रचते भी बिम्ब थे@मिटाते भी थे....।’

तेजी के चित्रों में ऐसे ही बिम्बों की भरमार है, प्रतीक हैं और यह ऐसे हैं जिनसे बाहर निकलना आसान नहीं है। ऐसा ही उनका एक चित्र है जिसमें भगवा, पीली, हरी, सफेद रंगों की आकृतियां है। रंगों का संयोजन ऐसा कि उसमें अध्यात्म की गहराईयो ंको गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। यूं देखने पर चित्र पत्तियों का कोलाज भर दिखायी देता है परन्तु जैसे-जैसे उस पर गौर किया जाता है, वहां रंगों का अनूठा आलोक बिखरा दिखायी देता है। इस आलोक में शांत बहती नदी है, मंद बहती पवन है और है प्रकृति की गुनगुनाहट भी। ऐसे ही दूसरा एक चित्र है जिसमें पत्तियां का रंग हरा, मटमैला सा है। जीवन की आस-निराश के साथ तमाम विविधताओं को इनमें अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, तेजी बिम्बों में लय का सर्वथा नया मुहावरा रचती है।

मुझे लगता है, तेजी सृष्टि में व्याप्त सौन्दर्य को अखंड और वृहद रूप में देखती है। शायद यही कारण है कि उनके चित्रों में प्रतिकात्मक लाल में भी हरापन है। हरेपन में पीलापन। काले में सफेद और ऐसे ही एक रंग में उसके विपरीत का अनुठा मिश्रण। जीवन दर्शन की लय जैसे कैनवस पर गहरे से गुनगुनाई गयी है। उनके चित्र दरअसल समकालीन कला परिदृश्य में एक जरूरी हस्तक्षेप करते हैं। वे ऐसे अर्थ के अनुसंधान की ओर भी ले जाते हैं जिनमें भारतीय संस्कृति, हमारे संस्कार और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के बहुतेरे भाव भी निहित हैं। होने और न होने के बीच के स्पेस में अन्तर्मन संवेदनाओं को कैनवस पर स्वर देती तेजी जीवन, समाज और प्रकृति से घुल-मिलकर अपनी गहन अनुभूतियों को ही जैसे कैनवस पर अनुप्राणित करती है।

तेजी के चित्रों में रंग, रेखाएं, टैक्सचर और स्थापत्य मिलकर रूपकों की जो निर्मिती करते हैं, उनमें रंगों के भी अनूठे बिम्ब है। एक्रेलिक, आॅयल के साथ ही तेजी के बरते रंगों की खास बात स्वयं उसके द्वारा सृजित रंग भी है। मसलन उसने अपने चित्रों में हल्दी, अनार के रस, फूलों, पत्तियों को घोलकर बनाए रंग भी बहुतायत से प्रयुक्त किए हैं। ऐसे में चित्रों में निहित विषय रंगों के उसके संयोजन, स्वयं उसकी विचारधारा और प्रकृति से उनके जुड़ाव को भी सहज संप्रेषित करते हैं। तेजी के चित्रों में लोक चित्रो की सौरभ है तो बहुत से चित्रों में प्रयुक्त अलंकरण, फूल-पत्तियां समकालीन बोध की भी विशिष्ट अर्थ छवियां लिए है। रंग और रेखाओं का यही तो गतिशील प्रवाह हैं और कला की सांस्कृतिक दीठ भी।

कभी निर्मल वर्मा ने कहा था, ‘कलाकृति से एक अर्थ निकालना-अथवा उसमें अपने विश्वासों का सबूत ढूंढना-दोनों ही बातें झूठी नैतिकता को जन्म देती है। कला की नैतिकता इसमें नहीं है कि वह हमारे संस्कारों या विश्वासों का समर्थन करे,...कला सिखाती नहीं, सिर्फ जगाती है, क्योंकि उसके पास ‘परम सत्य’ की ऐसी कोई कसौटी नहीं, जिसके आधार पर वह गलत और सही, नैतिक और अनैतिक के बीच भेद करने का दावा कर सके।’ मैं इसमें यह और जोड़ देता हूं, ‘कला सत्य या यथार्थ नहीं है, वह सत्य या यथार्थ की खोज की एक प्रकार से प्रस्तावना है।’ तेजी के चित्रों की इस प्रसतावना में निहित संवेदना ही कला का क्या परम सौन्दर्य नहीं है! आप ही बताइये।
राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 26-11-2010


Friday, November 19, 2010

मुरली की तान में माधुर्य की सृष्टि

सूक्ष्म अंतर्वृतियों के उद्घाटन का सबल माध्यम संगीत ही है। खाली ध्वनि भर नहीं है संगीत। आंतरिक भावों, अनुभूतियों को इसमें जब अभिव्यक्ति दी जाती है तो लगता है, प्रकृति गा रही है। मुझे लगता है, संगीत का विशुद्धतम रूप वाद्य है। वाद्यों का जन्म नैसर्गिक ध्वनियों के अनुकरण तथा अन्य चेष्टाओं के परिणामस्वरूप ही हुआ है। बांसुरी को ही लें। इसकी मीठी तान जब भी कानो मंे पड़ती है, लगता है प्रकृति माधुर्य का रस घोल रही है। प्रकृति वाद्य ही तो है बांसुरी। कहते हैं, कभी कीटों ने बांस के एक टूकड़े मंे छेद कर दिया। छेद में से होकर निकलने वाली हवा से जब मधुर ध्वनि निकली तो बांसुरी के निर्माण की पहल हुई।...ऐसा ही कुछ कहानी अन्य वाद्यों के साथ भी रही होगी परन्तु अभी तो बात मुरली की हो रही है। कन्हैया जिसे बजाते, उसी मुरली की।

पंडित रोनू मजूमदार की बांसूरी की तान सुनते लगा, वह अंतर के साथ बाहर के राग-अनुराग का अद्भुत मेल कराते हैं। मुरली में फूंक के जरिए वह जैसे नूतन की सृष्टि करते हैं। ‘म्यूजिक इन द पार्क’ में उन्हें सुनते लगा भांत-भांत के सुर संजोती उनकी बांसूरी गा रही है। बांसुरी में वह बढ़त करते हैं। बढ़त माने विस्तार। ढ़लती सांझ रात्रि की ओर बढ़ने लगी थी। मुरली की तान छेड़ने से पहले श्रोताओं से संवाद करते वह कहने लगे, ‘मन की शांति और अध्यात्म से जुड़ा है हमारा संगीत। मुरली प्रकृति वाद्य है। इसमें न तार है न चाभी। चलिए आपको सुनाता हूं,...पहले आलाप होगा।’

मुरली की तान छिड़ जाती है। खुले आसमान में दूर तक फैली हरियाली में सुरों की मिठास घोलती। राग के चरणबद्ध शास्त्रोक्त स्वरूप में रमने लगा मन। विलम्बित लय का आलाप। स्वरों की बढ़त। तार, अति तार, मन्द्र और मध्य सप्तकों में वह आलापों का माधुर्य विस्तार करते जैसे खुद भी उसमें खो से जाते हैं। आरंभ होता है, राग बागेश्वरी से। संगीत की चिर सम्पूर्णता में हृदयभावों की उनकी अभिव्यंजना सूक्ष्मातिसूक्ष्म परन्तु बंधनमुक्त सुरांे की निर्मिति करती जैसे ईश्वर से तादात्म्य की गुहार कर रही है। बांसूरी में पुकार। प्रार्थना की ध्वनि। सांसो से सधा भावों का मनोयोग। शांति, नीरवता और पवित्रता लिए। ध्वनि में मौन।...औचक जैसे पं. रोनू ने अपने होठों से लगी बांसूरी से शंख बजाया है। ठीक वैसे ही जैसे ईश़्ा आरती में बजता है शंख।

प्रभु! बांसुरी में शंखनाद। यह मोटी बांसुरी है। अति मन्द्र सप्तक में शंखनाद करती। ध्वनि के माधुर्य में पंडितजी अलग-अलग बांसुरियों से बढ़त करते हैं। लगता ऐसे है जैसे एक ही बांसुरी में वह सप्तकों को साध रहे हैं, ईश्वर को रिझाते। मनाते। शंखनाद के बाद मन्द्र और मध्य सप्तक के सुर। लम्बी तान। पुकार! आनंद विभोर करती बांसुरी। अनंत में विलीन होते सुर। तबला नहीं बज रहा परन्तु उसकी थाप है। तानपुरा नहीं परन्तु उसकी तान है।...मन को लुभाती बासुरी जैसे गा रही है। इस गान में आरोह है और अवरोह भी। मुझे लगता है, सधते सुरों में बांसुरी एक-एक कर दीप जला रही है। अंतर के दीप। एक...दूसरा...तीसरा और फिर अनेक दीपकों की रोशनी से जैसे नहा उठा माहौल। बांसुरी की पं. रोनू मजूमदार की तान जैसे आह्वान कर रही है, जल दीप। जल! हर ओर संगीत का उजास। मंद बहती पवन भी झुम कर तेजी से बहने लगी। सुरों का कारंवा भी परवान चढ़ने लगा।

तबले में सुधीर पाण्डे भी उनको गजब का साथ देते हैं। आलाप के साथ राग को उठाते वह मंड, मध्य और तार सप्तक का शनैःशनैः जब विस्तार करते हैं  तो ताल भी पूरा साथ देती है। भुपताल, तीनताल में बंदिशें। आलाप। शास्त्रीय रागों के साथ सुफी संगीत, मांड, पहाड़ी लोकसंगीत और मीरां के भजनों के माधुर्य में वह तन और मन दोनों को ही अंदर तक भिगोते हैं। उन्हें सुनते मन नहीं भरता। मुझे लगता है, बांसुरी की तान में वह अपने ही रचे को तोड़ते हैं। हर बार। बार-बार। मधुर तान में फूंक को एक जगह रोक वह उसके टूकड़े करने लगते हैं। फूंक को तोड़ते, फिर से उसे जोड़ते हैं। अद्भुत रस की सृष्टि करते। सांसो को गजब साधते मुरली वादन की यही उनकी मौलिकता है।

Friday, November 12, 2010

जड़ होते चिंतन को नई दिशा देता संवाद

आधुनिक कला प्रवृतियां और संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कला की परम्परा, विषय वस्तु, माध्यम पर हिन्दी में लगभग सन्नाटा सा पसरा रहता है। पत्र-पत्रिकाओं में कला पर जो कुछ छपता है, बहुधा  उसमें विचार गौण होता है। कला लेखन सर्जन में जो निहित है, उसकी संवेदनाओं की बजाय कलाकार को मिलने वाले सम्मान, पुरस्कार तथा तमाम अन्य घटनाओं पर ही जैसे केन्द्रित होता जा रहा है। ऐसे में ‘अखिलेश एक संवाद’ पुस्तक अंधेरे में जैसे
उजास लिए है। दूरभाष पर कवि, संपादक मित्र पीयूष दईया अपनी पत्रिका के लिए कला पर नया कुछ लिखने का आग्रह करते पूछते हैं, ‘आपको अखिलेश से संवाद की मेरी पुस्तक मिली?’ मैं नहीं कहता हूं तो वे सहर्ष इसे प्रकाशक से भिजवाते हैं। ख्यातनाम चित्रकार अखिलेश से पीयूष के लम्बे साक्षात्कार की इस पुस्तक का घूंट-घूंट  आस्वाद करते लगता है, हिन्दी में भारतीय कला को जैसे गहरे से जिया हूं।
पीयूष ने इसमें कला के आज और आने वाले कल के साथ ही परम्परा के सूत्र व्यापक रूप में संजोए हैं। ऐसा करते यह किताब कोरा संवाद भर नहीं रह गयी है बल्कि अपने आप में एक स्वतंत्र सृजन बन गयी है। पुस्तक में अखिलेश एक जगह कहते हैं, ‘चित्रकला में महत्वपूर्ण अवकाश है, समय नहीं। आप समय का चित्रांकन नही कर रहे होते हैं बल्कि आप अवकाश को रच रहे होते हैं।...’ वह जब यह कहते हैं तो कला में निहित किसी कलाकार की अन्तर्मन संवेदनाओं को, कला की उसमी जमीन को गहरे से समझा जा सकता है। उस जमीन को जिसमें अखिलेश मनुष्यता के सभ्यतर होने में सभी कलाओं का वास भी अनायास ही ढूंढ लेते हैं।
लियोनार्दो के ‘द लास्ट सपर’, पिकासो के ‘गुएर्निका’, वॉन गॉग के व्यक्तिचित्र, हुसैन के ‘जमीन’, डेमियन हस्र्ट की ‘फॉर द गॉड ऑफ  लव’ की प्रसंगवश चर्चा करते अखिलेश भारतीय और पाश्चात्य कला के परिप्रेक्ष्य के समझ की दृष्टि भी पाठक को अनायास देते हैं। पीयूष इस संवाद में कला के अनंत आकाश की बारीकियों से रू-ब-रू कराते पाठक को एक कलाकार के मन को पढ़ने का अवसर देते हैं।
दरअसल हमारे यहां कला और उसके अन्र्तसंबंधों को प्रायः गंभीरता से लिया ही नहीं गया है। कला और कलाकार के मध्य संवाद तो प्रायः नहीं के बराबर है। ऐसे में पीयूष ने अखिलेश के बहाने कलाकार के सर्जन में निहित उसकी समझ से जुड़े तमाम मुद्दों को एक प्रकार से रोशनी दी है। इस रोशनी में सृजन में निहित संवेदनाओं, रचनाशीलता के दूसरे सरोकारों के साथ रचना का समग्र परिप्रेक्ष्य उद्घाटित हुआ है। जड़ होते चिंतन को नई दिशा देते।
बहरहाल, मुझे लगता है संस्कृतिबोध, सौन्दर्यदृष्टि और कला से जुड़े अपने सरोकारों के कारण ही पीयूष अखिलेश के कलाकर्म और उसमें निहित उनकी सोच की सिराओं को गहरे से पकड़ पाए हैं। अपनी जिज्ञासाओं में उन्होंने एक तरह से अखिलेश के कलाकर्म का मंथन ही नहीं किया है बल्कि कला की प्रासंगिकता और परम्पराओं से भी सहज संवाद किया है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि अखिलेश से संवाद में कला के चिंतन सूत्रों में वह बहुत से स्तरों पर कलाकार की कला से ‘बाहर’ भी गए हैं। इसी से यह पुस्तक कला आलोचना की एक जरूरी आधारभूमि भी निर्मित करती है।  पीयूष ने इसमें कला की अछूती संभावनाओं को गहरे से छुआ ही नहीं है बल्कि कलाकार के मर्म को गहरे से अपने तई जिया भी है। ऐसे दौर में जब कला लेखन सिद्धान्तों की पड़ताल और अकादमिक निष्कर्षों तक ही सीमित होकर रह गया है, पीयूष की यह पुस्तक हिन्दी में कला विमर्श का नया आकाश निर्मित करती है। अशोक वाजपेयी ठीक ही कहते हैं, ‘भारतीय कला के व्यापक क्षेत्र में, और हिन्दी मंे तो बहुत कम ऐसा हुआ है कि कोई कलाकार अपनी कला, संसार की कला, परम्परा और आधुनिकता आदि पर विस्तार से, स्पष्टता से, गरमाहट और उत्तेजना से बात करे और उसे ऐसी सुघरता से दर्ज किया जाये।’

Friday, November 5, 2010

कला की समग्रता का आलोक पर्व

भारतीय कला दृष्टि, सृष्टि का पुनःस्थापन है। एक प्रकार से सृष्टि का अनुकरण। सृष्टि माने भांत-भांत के रंग। भांत भांत की ऋतुएं। उत्सव और पर्व। इस सब में ही तो है जीवन की समग्रता। कला का परम सौन्दर्य। शायद इसीलिए कवीन्द्र रवीन्द्र ने कभी कहा, ‘सौन्दर्य अभिव्यंजना मात्र नहीं है, वरन् आत्मा में निवास करता है।‘ यह कला ही तो है जो मन को रंजन और उद्बोधन देती है। मुझे लगता है, कला प्रकृति की प्रतिकृति है। नहीं, इससे भी आगे, प्रकृति का बिम्ब प्रतिबिम्ब है। हम सभी उत्सवधर्मी हैं। शायद इसलिए कि कला से हमें अनुराग है। उसमें बसते, सदा कुछ नया रचना चाहते हैं। इस रचे को जीना चाहते हैं।

दीपावली से बड़ा और कौनसा होगा हमारा कला का हमारा पर्व। बाहर और भीतर के आलोक के इस पर्व पर घर-आंगन सज उठते हैं। मन हिलोरें लेता सौन्दर्य की सर्जना को आतुर हो उठता है। लक्ष्मी के स्वागत के बहाने, रंगोली सजती हैं। कुमकुम के उसके पगलिए हम घरों में मंाडते हैं। मुझे याद है, बीकानेर में सीमेंन्ट के आंगन को भी दीपावली पर गोबर से हम सब लीपते। उस पर हिरमच, हल्दी और दूसरे प्रकृति प्रदत्त रंगों से मांडणे मांडते। जहां दीपावली पूजन होता, वहां पर स्वस्तिक ओर षट्कोणीय आकृतियां दीवारों पर बनाते। बाकायदा इनके नीचे ‘लाभ’ और ‘शुभ’ लिखा जाता। पता नहीं कहां से भीतर का कलाकार तब जाग उठता और भांत-भांत की रंगोलियां हम बना डालते। हम ही क्यों, प्रजापति कुम्हार की कला भी दीपावली पर ही तो परवान चढ़ती है। करीने से बनाए सुन्दर दीये। एक से बढ़क एक।

बाजार जाना हुआ तो, इस बार दीपकों की पारम्परिक आकृतियां से अलग दीपक भी इस बार दिखाई दिए। बेहद सुन्दर दीपक। अलंकारिक। लगा, समय के साथ कुम्हार का कलाकार मन भी समाज को पढ़ लेता है। इस पढ़े हुए को ही वह अपने सर्जन में आकार देता है। दिये ही क्यों बहुत सी और मृण आकृतियां भी तो कुम्हार हम लोगों के लिए दीपावली पर बनाता है। दिए रखने वाली छेद करी हंडिया, घंटियां, मिट्टी के मिष्टान पात्र और भी दूसरी बहुतेरी कलात्मक चीजें। इन सबसे ही तो सजती है हम सबकी दीपावली। हमारा घर-आंगन।

यह हमारा कलाकार मन ही तो है जो पारम्परिक प्रजापति कुम्हार के बनाए दीये जतन से घरों में सजाता है। थाली में आंगन के चौक में, घर के बाहर की दिवारों पर, छत की दिवारों और घर के कोने-कोने में हर एक दरवाजे और हर खिड़की के पास दीये रखे जाते हैं। एक साथ जब ये दिये जलते हैं तो मन में भी अनूठा आलोक होता है। दीपकों के झिल-मिल प्रकाश में घर-आंगन में भी हर कोई अनूठी सजावट करता है। लक्ष्मी के स्वागत को तैयार मन प्रतीक रूप में उसके कुमकुम पगलिये मांडता है। कहते है, दीवाली की रात लक्ष्मीजी विष्णु की शेषशय्या त्यागकर अपनी बहन दरिद्रा के साथ भू लोक पर विचरण करती है। जो घर कलात्मक सजा है, स्वच्छ सौन्दर्य का जहां वास है, उसी में लक्ष्मी प्रवेश करती है और जहां गंदगी है, कला नहीं है वहां दरिद्रा चली जाती है। इसी लोक विश्वास के चलते दीपावली का आलोक हर ओर, हर छोर होता है। कला सर्जन के इस पर्व में हर क्षण अपूर्व होता है। जीवन की पूर्णता, समृद्धि, शांति के समस्त सांस्कृतिक भाव इस एक पर्व में ही जो निहित है।

चन्द्रमा की सोलह कलाएं होती है। सोलहवीं कला अमावस्या की अदृश्य कला है। यही अमृता है। अमृता का अर्थ है न समाप्त होना। दीपावली के जगमगाते दीयों का आलोक हरेक मन को भाता है। सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि वहां है, नेत्रों को तृप्ति प्रदान करती हुई। जब हम यह कहते हैं कि दीपकों के प्रकाश से यह जहां आलोकित है तो इस आलोक के निहितार्थ पर भी जाना होगा। आलोक माने प्रकाश। प्रत्यक्ष का भेद। आलोकित दरअसल आकार की सत्ता का बोध कराता है। इसीलिए दीपकों के प्रकाश से आलोकित है जहां। कला दीठ की यही समग्रता है। मन की हमारी कलात्मक संवेदनाओं को ये दीपक ही तो रूपायित करते हैं। इन्हीं में है अंतर के आनंद का रस।

...तो आईए, दीपावली के आलोक में नहाएं। चित्रकला की चित्रोपमता, संगीत के माधुर्य को इस पर्व में अनुभूत करें। यह दीपावली ही है जिसमें कला के लिए अवकाश के क्षण हम निकाल ही लेते हैं, वरना कहां है इस भागमभाग में अवकाश। आईए, सहेजें कला के इन अवकाश के क्षणों को। आज के लिए नहीं। सदा के लिए। इन्हीं में तो है लोक का हमारा आलोक।

डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 5-11-2010

Friday, October 29, 2010

कला, कला का भविष्य और हिंदी


दिल्ली से ललित कला अकादेमी की ओर से ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर चंडीगढ में आयोजित राष्‍ट्रीय कला सप्‍ताह में भाग लेने और संवाद करने का जब संदेश मिला तो संशय में था। संशय इस बात को लेकर था कि संवाद हिन्दी में करना है या अंग्रेजी में। चंडीगढ़ ललित कला अकादेमी की मेजबानी में आयोजित समारोह के निमंत्रण पत्र से लेकर तमाम संवाद, औपचारिकताएं अंग्रेजी में ही हो रही थी। यूं भी केन्द्रित विषय में हिन्दी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। सो मेरा संशय भी वाजिब ही कहूंगा। पहुंचने पर चंडीगढ़ ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और देश के जाने माने छायाकार दिवान मन्ना ने गर्मजोशी से अंग्रेजी में ही स्वागत किया। होटल में कुछ और भी प्रतिभागी थे, सबके सब अंग्रेजीदां। हिन्दी वहां भी कहीं नजर नही आ रही थी।

दूसरे दिन राहुल भट्टाचार्य ने अंग्रेजी में संयोजन की अपनी शुरूआत में ही जता दिया कि हिन्दी का वहां कोई स्थान नहीं है। विभा ने भी उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से मोहर लगायी। अब बारी मेरी थी। मेरी सहजता हिन्दी है सो हिन्दी में बोला। हां, अवधेश ने आरंभ में हिन्‍दी में कुछ बोला तो उनकी बात की काट अंग्रेजीं में कुछ इस तरह से की गयी कि बाद मे उन्‍होंने बोलना ही नहीं चाहा। ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर हिन्दी में दिए तर्क और कला संवेदना की व्याख्या को समझते हुए भी मंच अंत तक अंग्रेजी पर ही अडा रहा, मैं हिन्‍दी पर। अजीब स्थिति थी। यह बात अलग थी कि आयोजन से पहले जो लोग अंग्रेजी में बोल रहे थे, उन सबसे हिन्‍दी में बाहर खुब बतियाने का अवसर रहा।

‘न्यू मीडिया आर्ट’ में अंग्रेजी बाजार की जरूरत हो सकती है परन्तु हिन्दी का वहां क्या कोई स्थान नहीं है? हर युग में कला में नवीनतम तकनीक अपनायी जाती रही है। संवेदनशीलता के साथ हमारी जो परम्पराएं है उनके साथ हमारे वर्तमान को जोड़ते हुए अपनी एक दीठ के जरिए सांस्कृतिक चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में यदि कलाकार कुछ नया सृजित करता है और उसमें उसे लगता है कि नयी तकनीक उसका अधिक सहयोग करती है, तो निश्चित ही कला को नया क्षितिज मिलता है परन्तु उसमें अपनी भाषा के संस्कार ही यदि छोड़ दिए जांएंगे तो क्या वह कला जनोन्मुख हो पाएंगी?

भारत में अभी भी कला जनरूचि का विषय शायद इसीलिए नहीं हो पायी है कि यहां पर अव्‍वल तो कला के सार्वजनिक आयोजन ही नहीं होते और जो होते हैं, उनमें हिन्‍दी कहीं नही होती जबकि इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आज भी आम जन की भाषा हिन्‍दी ही है। हिन्दी में कला आलोचना के नहीं होने का जो रोना रोया जाता है, उसका एक बड़ा कारण क्या यही नहीं है कि हमारे यहां कला में जो कुछ नवीन होता है, उसमें हिन्दी का कहीं कोई स्थान ही नहीं होता। जो कुछ छपता है, अंग्रेजी में। जो कुछ प्रस्तुत किया जाता है अंग्रेजी में। हिन्दी की शायद वहां जरूरत ही नहीं महसूस की जाती। हिन्दी को फिर क्यों दोष दिया जाए। क्यों हिन्दी में फिर ऐसी कला को देखा और परखा जाए। कला में तकनीक और माध्यम के साथ ही उसे आम जन में संप्रेषित किए जाने की सोच नहीं है तो चाहे जितनी चौंकाने वाली, अतिशय उत्तेजना प्रदान करने वाली, जिज्ञासा में लुभाने वाली कला हो, वह अपने दीर्घकालीन भविष्य का निर्माण क्या कर सकती है? चंडीगढ़ से लौटे एक माह के करीब हो रहा है, परन्तु जेहन में अभी भी यही प्रश्न मंडरा रहे हैं।
"डेली न्यूज़" में  प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 29-10-2010

Friday, October 22, 2010

नमन महाकुम्भ! तुम्हारे ये दृश्यालेख...

कलात्मक खोज हमेशा जीवन को नया तथा अद्वितीय बिम्ब देती है। यह कलाएं ही तो है जो जीवन की अनंतता के बारे में हमें चिरन्तन ललक देती है। छायाचित्रों को ही लें। वहां पर सामान्यतः यथार्थ का ही दर्शाव होता है परन्तु इससे परे जब छायाकार अपनी अर्न्तदृष्टि में दृश्यों में निहित संवेदनाओं को परोटने लगता है तो वह चाक्षुष में दृश्य के सत्य को प्रकाशित करने लगता है। दरअसल सृजन की आंतरिक गत्यात्मकता में चित्रकला की बजाय छायाचित्र गति और स्थिति को अधिक प्रभावी ढंग से पुनःप्रेक्षित करते हैं। सृजन की आंतरिक गत्यात्मकता में तकनीक वहां कला में गजब का संतुलन जो स्थापित करती है। हस्तनिर्मित चित्रों में शायद यह संभव नहीं।

बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र की सुकृति कला दीर्घा में कुछ समय पूर्व अजय सोलोमन और जॉन एंड्रयू की छायाकृतियों से रू-ब-रू हुआ था। एक नजर में महाकुम्भ के दृष्यों के लोक ने खास आकृश्ट नहीं किया परन्तु जैसे-जैसे छायाचित्रों की गत्यात्मकता पर गया, लगा उन चित्रो में बहुत कुछ कुछ विषिश्ट है। अजय-एंड्रयू हरिद्वार के महाकुम्भ को कैमरे के अपने लैंस से खंगालते बहुत से स्तरों पर कला की गहराईयों में गए हैं। मसलन मोक्ष के लिए स्नान के अंतर्गत उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे एक व्यक्ति चित्र में विषय की बारीकी ही नहीं है बल्कि उसके महत्व की भी जैसे स्थापना की गयी है। ऐसे ही महाकुम्भ में एक स्थान पर साधु के हुक्के में उठती चिंगारी में दृश्य के साथ समय के अवकाश को पकड़कर उसे जैसे स्थिर कर दिया गया है। पूर्णाहुति में राख मले साधु हों या फिर शाही स्नान की ओर बढ़ते नागा साधुओं के कदम या फिर हुजूम में अकेलेपन को बंया करते नागा साधुओं के व्यक्ति चित्र-प्रदर्शित छायाकृतियां स्वयंस्फूर्त दृश्य संवाद कराती है। महाकुम्भ के बहाने साधुओं की फक्कड़ता, उनके राजसी ठाठ, मोक्ष के लिए उनकी भटकन के साथ ही कहीं-कहीं भौतिकता से विलग होते भी उसमें रमती उनकी मुखाकृतियां के छाया दृश्यों की यथार्थपरकता को एक प्रकार से छायाकारों ने चाक्षुष कला दृश्यों में रूपान्तरित किया है। ऐसा करते एकाधिक नागा साधुओं की मुखाकृतियों में एक खास एकांतिका भी अनायास ही उजागर हुई है।

बहरहाल, मुझे लगता है श्रद्धा की मूल भावना को महाकुम्भ श्रृंखला के छायाचित्र एक मधुर स्मृति में तब्दील करते महाकुम्भ के विराट रूपाकारों को साकार करते हैं। महाकुम्भ में नागा साधुओं, वहां आए श्रद्धालुओं की भावाविष्ट मुख-मुद्राओं, दृश्यों की लम्बी श्रृंखला की अजय सोलोमन और जॉन एंड्रयू की रचनात्मक छायाकृतियों का यह वृहत दस्तावेज छायाकला का उनका नया आयाम है।

जे.स्वामीनाथन् का कहा याद आ रहा है, ‘एक कलाकार का काम केवल कला-रचना या उसका सृजन मात्र नही है, बल्कि जन अभिरूचियों में कला के प्रति आकर्शण पैदा करना और प्रबुद्ध कला-दर्षकों को तैयार करना भी है।’ मुझे लगता है, छायाचित्र में छायाकार जो कुछ देखता है, उसका कैमरे की अपनी आंख से एक प्रकार से पुनराविश्कार करता है। ऐसा करते वह देखने की एक कला दृश्टि और षैली भी अपने तई विकसित करता है, वही उसका छायाकला का अपना मुहावरा होता है। छायाचित्र मंे यदि यथार्थ को हूबहू वैसे ही दिखा दिया जाता है, तो उसमें सब कुछ तकनीक का ही खेल होता है परन्तु जो दिख रहा है उसमें निहित संवेदना, उससे जुड़ा कला सौन्दर्य यदि छायाकार पकड़ लेता है तो वह एक प्रकार से सृजन ही कर रहा होता है। ऐसा करते वह जन अभिरूचियों में कला के प्रति आकर्शण पैदा करने का कार्य भी अनायास ही कर रहा होता है। अजय सोलोमन और जॉन एंड्रयू के छायाचित्र कला की दीठ से जनहितेशणा युक्त रचनाधर्मिता के सषक्त संवाहक हैं। हमारी समृद्ध परम्पराओं की छायाकला का उनका यह सृजन सतर्क कल्पनाषीलता के साथ बदलते दौर में महाकुम्भ के संदर्भ में सर्वथा नवीन वैचारिक स्थापनाएं भी कराता है। कलादीर्घा में उनके छायाचित्रों के भव में विचरते औचक मन कह उठा, नमन महाकुम्भ! तुम्हारे ये दृश्यालेख...

Friday, October 8, 2010

कला का समय, संवेदना और रचनात्मक मूल्य

अपने युग से कला जब संवाद करती है तो निष्चित ही उससे जुड़ी घटनाओं, परिघटनाओं को अपने में समाहित करके चलती है। कम्प्यूटर के इस दौर में जब विज्ञान और तकनीक कला पर निरन्तर हावी होती जा रही है, यह सोचने की बात है कि तकनीक क्या कला हो सकती है? वह कलात्मक तो हो सकती है परन्तु उसे कला कैसे कहा जाए!

दरअसल तकनीक बाजार की जरूरत है। वह यदि रचनात्मकता पर हमला करती है तो फिर उससे कला जगत को सतर्क होने की आवष्यकता है। ‘फ्रीडम ऑफ क्रिएटीविटी’ के तहत कला में इधर तकनीक के जरिए बहुत से स्तरों पर बेहतरीन कार्य भी हुआ है परन्तु उसकी अपील सार्वकालिक, सार्वदेशीय है भी अथवा नहीं, इस पर विचार किए जाने की जरूरत है। तकनीक के साथ इधर इंगलैण्ड, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कलाकार अपने शरीर तक का इस्तेमाल तथाकथित अपनी कला में करने लगे हैं। कुछ समय पहले कोडिस गैलरी ने नया काम करने वाले विभिन्न कलाकारों को बुलाया था। मकसद था कला में नवीन करने वालों की कला का प्रदर्षन। इसमें इन्स्टॉलेषन के लिए अमेरिकी कलाकार गुइलर्मो वर्गाज जिमनेज हेबाकक ने एक कुत्ते को तब तक बांधे रखा जब तक कि वह भूख से बिलबिला कर मर नहीं गया। इस तथाकथित कला को इन्स्टालेषन कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना घोषित किया गया। सोचने की बात यह है कि कला के नाम पर इस तरह का प्रयोग हमारी संवेदना को कहां पहुंचा जा सकता है। आज कूत्ते का प्रयोग क्या कल मनुष्य में परिणत नहीं होगा?

कलाकार अन्तर्मन में बनने वाली छवियों, और स्थान विशेष के साथ जुड़ी यादों के बिम्बों को सहज और आत्मीय संस्थापनों के जरिए ही कला में अभिव्यक्त करता है। इस अभिव्यक्ति में आभासी (वर्चुअल) और वास्तविक के बीच के द्धन्द को तकनीक बेहतरी से अभिव्यक्त कर सकती है परन्तु इमेजोलॉजी के अंतर्गत यदि बगैर किसी रचनात्मक सोच के साथ कुछ किया जाता है तो वह तकनीक का प्रदर्षन भर होगा। तकनीक अन्तर्मन अनुभवों और संवेदनशीलता को उजागर करने का साधन तो हो सकती है परन्तु कला का साध्य नहीं। कला व्यक्ति की संवेदनाओं को चक्षु देती है। यह कला ही है जिसमें विचार और प्रतिक्रियाएं गहन आत्मान्वेषण से मुखरित होती है। ऐसा जब होता है तो कलाकार इस बात की परवाह नहीं करता कि उसके किए सृजन का क्या महत्व होगा। उसका बाजार में क्या मूल्य होगा। कला रचनात्मकता का अनुभव है। इस अनुभव में जीवन की लय संवेदना से जुड़ी हो न कि चौंकाने या चमत्कृत करने के लिए। आप क्या कहेंगे?

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित
डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 8-10-2010

Friday, October 1, 2010

अनुभव, चिंतन और तकनीक का नया आकाश

कला का इधर जो नया रूप सामने आ रहा है वह अतिशय उत्तेजक, बहुआयामी प्रक्रिया लिए हुए कलाकारो ंके अनुभव और चिन्तन को नया रूप दे रहा है। यह न्यू मीडिया आर्ट है। इसमें डिजिटल इमेेजेज हैं, विडियो है, साउंड है और बहुत सा आभासी यानी वर्चुअल भी है। सारनाथ बैनर्जी, सोनल जैन, अतुल डोडिया, विभा गेहरोत्रा, रनबीर, किरण सुबैया, साईना आनंद जैसे कलाकार इस दिशा में बहुत अच्छा कर रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो तकनीक के जरिए कलाकार का दर्जा पाने में लगे हैं।

ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष और ख्यात कवि, आलोचक अशोक वाजपेयी की पहल पर पिछले दिनों चंडीगढ़ में ‘नेशनल आर्ट वीक आॅफ न्यू मीडिया’ मंे भाग लेते लगा जैसे कला की नयी दुनिया मंे प्रवेश कर गया हूं। इसमें रचनात्मकता तो है परन्तु तकनीक हर ओर, हर छोर जैसे हावी है। अंतिम दिन विमर्श में न्यू मीडिया आर्ट की चर्चित कलाकार विभा गेहरोत्रा, समकालीन कला के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर, कला दीर्घा के सम्पादक डॉ. अवधेश मिश्र, अंग्रेजी कला पत्रिका ‘आर्ट एंड डील’ के सम्पादक राहुल भट्टाचार्य के साथ इस कला के विभिन्न पक्षों पर विषद् विमर्श हुआ। राहुल और विभा ने न्यू मीडिया आॅफ आर्ट की समकालीनता पर अपनी दृष्टि दी तो खाकसार ने स्पष्ट किया कि कला के साथ तकनीक और विज्ञान का मेल तो हो सकता है परन्तु इस मेल में ही यदि कोई कला की आधुनिकता की तलाश करता है तो यह सही नहीं है। इसलिए कि कला वस्तु मात्र नहीं है और ऐसा जब नहीं है तो उसकी व्याख्या भी वस्तु की तरह नहीं की जा सकती। विज्ञान और तकनीक कला को एक आधार दे सकती है बशर्ते कि उसमें रचनात्मक सौन्दर्य की मानवीय दृष्टि निहित हो। अवधेश ने कला में आधुनिकता के नाम पर भयावह प्रयोगों की सिहरन का अहसास कराते कहा कि यही न्यू मीडिया कला है तो उसकी फिर कोई सार्थकता नहीं है।

ललित कला अकादेमी की यह सर्वथा नयी पहल थी। चंडीगढ़ ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और जाने-माने छायाकार दिवान मना के प्रयासों से ‘न्यू मीडिया आर्ट’ पर भारत में संभवतः पहली बार इस प्रकार का राष्ट्रीय आयोजन हो सका। आम तौर पर कला संबंधी इस प्रकार के आयोजनों में दर्शकों, श्रोताओं की अधिक रूचि नहीं होती परन्तु चंडीगढ़ में समयबद्ध सारे कार्यक्रमों में प्रेक्षागृह खचाखच भरा रहा। विमर्श से एक दिन पहले अल्का पांडे ने न्यू मीडिया आर्ट से संबंधित कलाकारों के साथ ही इस कला के भविष्य पर स्लाईड शो के जरिए कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला। भारत में तेजी से न्यू मीडिया आर्ट के तहत हो रहे कार्य की चर्चा के साथ ही अल्का की साफगोई भी भाई। उन्हांेने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि न्यू मीडिया से बहुत अधिक उनका नाता नहीं है, इसीलिए जब इस पर बोलने का निमंत्रण मिला तो सबसे पहले उनकी बेटी ने ही उन्हें टोका था परन्तु अपने क्यूरेटर अनुभवों के साथ ही अध्ययन के आधार पर उन्होंने जो बोला उससे न्यू मीडिया के संबंध में बहुत कुछ समझा जा सकता था। वैसे भी यह वैश्विकरण का दौर है, चीजें तेजी से बदली रही है। तकनीक भी हर रोज बदल जाती है, ऐसे में आर्ट में न्यू मीडिया का प्रयोग स्वाभाविक ही है। आष्ट्रीया मे इस संबंध में बेहद महत्वपूर्ण काम हो रहा है। आष्ट्रीय काउन्सिल के अनुसार न्यू मीडिया आर्ट वह है जिसमें कलाकार नवीन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इस प्रकार का कार्य सृजित करता है जिससे उसकी कला का नया कलात्मक संप्रेषण हो। इस नवीन तकनीक में कलाकार की ब्रश और कूची कम्प्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी, इन्स्टालेशन और ध्वनि की अधुनातन तकनीक है। इस परिप्रेक्ष्य में यह भी जोड़ा जा सकता है कि कला सत्य या यथार्थ नहीं बल्कि उसकी खोज की एक प्रकार से प्रस्तावना है। इस प्रस्तावना में न्यू मीडिया आर्ट में भी संभावनाओं का अनंत आकाश है।

ललित कला अकादेमी ने इधर कला आयोजनों की जो स्वस्थ परम्परा विकसित की है, उसमें इस पहल का इसलिए भी स्वागत किया जाना चाहिए कि नई पीढ़ी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की है। स्वाभविक ही है कि कला में भी आने वाले कल में अब उसकी कूची और ब्रश न्यू मीडिया ही होगा। लौटते वक्त दिल्ली में कला आलोचक विनयकुमार मिले तो कहने लगे, ‘न्यू मीडिया आर्ट पर जब देश में बड़े स्तर पर काम हो रहा है तो इस पर विमर्श की भी तो नई राहें खुलनी ही चाहिए, ललित कला अकादमी ने यही किया है।’

बहरहाल, तकनीक का उपयोग कलाकार अपनी अंतःदृष्टि के अंतर्गत रचनात्मक ऊर्जा को नया रूप देने के लिए करता है तब तो ठीक है परन्तु केवल प्रयोग के लिए, चमत्कृत करने के लिए ही ऐसे जतन होते हैं तो फिर उसमें कला की संभावनाओं को फिर तलाशा भी क्यंूकर जाए। तकनीक को भला कला का पर्याय कहा जा सकता है!

Friday, September 24, 2010

चित्रकर्म में कविता के अर्थ गवाक्ष

कवि, चित्रकार की मूल ऊर्जा सृजन में ही निहित होती है। हां, आधार सामग्री के अंतर के कारण दोनों ही अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्ति पाते हैं। मूल बात उन आत्मपरक संवेदनाओं की है जिनमें रचनाकार हर बार जड़त्व को तोड़ते अपने को ही रचता और गढ़ता है। कविता और कैनवस संबंध जगजाहिर हैं। कभी महादेवी ने ‘यामा’ और ‘दीपशिखा’ जैसे अपने संग्रहों में कविताओं के साथ जो चित्र बनाए वे उनके सृजन का ही एक नया आयाम थे। आज भी चित्रों के साथ उनकी कविताएं पढ़ते लगता है, कविता में रचनाकार दरअसल ध्वनि के अर्थ के जरिए हमें संवेदित करता हैं तो कैनवस पर रंग, आकार और इनके विन्यास के जरिए हमारी आंखों से सम्पूर्ण इन्द्रियों को वह संवेदित करता है।

बहरहाल, पिछले दिनों प्रयास संस्थान एवं राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने चूरू में अपने एक आयोजन में पत्रवाचन के लिए जब आमंत्रित किया तो कविता और कैनवस के संबंधो को वहां गहरे से जिया। साहित्यकार मित्र दुलाराम सारण ने राजस्थानी के मूर्धन्य कवि स्व. कन्हैयालाल सेठिया की कविताओं के कैनवस पर रूपान्तरण का प्र्रस्ताव रखा और कलाकार रामकिशन अडिग ने इसे त्वरित मूर्त भी कर दिया। रंगो, रूपाकारों और उनके संपूर्ण विन्यास में सेठियाजी की कविताओ में निहित भावों और विचारों को अडिग ने फलक पर रेखीय प्रतीकों में रखते जैसे साहित्य और कला के अन्तर्सम्बन्धों का भी नव साक्षात्कार कराया। सेठिया जी की कविता ‘सबद’ की पंक्तियां ‘जाबक भोली गोरड़ी@कर सोळे सिणगार...’ को रेखाओं में जीवंत करते अडिग के एक चित्र पर नजर ठहर जाती है। चित्र में स्वयंस्फूर्त सृजनात्मक गत्यात्मकता हर ओर, हर छोर है। ऐसे ही ‘कूंकूं’ कविता की अन्र्तनिहित संवेदनाओं की अर्थ ध्वनियों को कैनवस पर सुनते मन उसे स्वतः ही गुनने को करता है। मैंने अर्थ ध्वनि सुनी और गुन अब भी रहा हूं। दरअसल सेठियाजी की बहुतेरी कविता पंक्तियों में अडिग ने अपने चित्रकर्म से कविता के अर्थ संदर्भों के सर्वथा नये गवाक्ष खोले हैं।

अडिग कैनवस पर सरल, स्पष्ट एवं ज्यामितीय रेखाओं के जरिए सेठियाजी के काव्य को पुनर्नवा करते यह अहसास भी कराते हैं कि चित्रकला रूपार्थ पर निर्भर है जबकि काव्य कला वागर्थ पर। उनके चित्रों में बरती रेखाओं, और रंगों की हल्की परत में मांडणों, समृद्ध जैन चित्र शैलियों में राजस्थान और यहां की रचनाधर्मिता का समग्र परिवेश भी अनायास ही मुखरित हुआ है। अडिग के साथ सेठियाजी की काव्य पंक्तियों पर कुछ चित्र संभावनाशील कलाकार राजेन्द्र प्रसाद ने भी बनाए है, उनमंे भी भावों की अभिव्यंजना काफी हद तक है। मुझे लगता है, सृजन का यही वह स्वाभाविक प्रवाह है जिसमें नया कुछ गढ़ने और रचने की दीठ निहित होती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश   कुमार व्यास का स्तम्भ
"कला तट" दिनांक 24-09-2010

Saturday, September 18, 2010

लोक का आलोक

सौन्दर्य की साधना किसी भी समाज के सांस्कृतिक स्तर का निर्धारण करती है। दैनिन्दिनी वस्तुओं, उपकरणों में कलात्मक अंकन और रंग संयोजन उन्हें सादृश्यता प्रदान कर आनंददायी बनाता है। कला का यही तो सौन्दर्यान्वेषण है। इस सौन्दर्यान्वेषण में शिल्प, चित्र, मूर्ती और वास्तु कलाओं का समग्रता से विस्तार अर्न्तनिहित जो होता है।

बहरहाल, हमारी जो परम्परागत कलाएं हैं, उनमंे जीवन के हर पहलू की अनुगूंज है। मानव के अपने परिवेश की स्मृतियां इनमंे हैं और है अर्न्तनिहित भावना का साकार रूप। राजस्थान तो हस्तकलाओं, हस्तशिल्प परम्पराओं का जैसे गढ़ है। पन्नालाल मेघवाल ने पिछले दिनों अपनी पुस्तक ‘शिल्प सौन्दर्य के प्रतिमान’ जब भेंट की तो लगा मैं हस्तकलाओं, हस्तशिल्प के इस गढ़ में जैसे प्रवेश कर गया हूं। गढ़ का द्वार खुलता है तलवार, खुखरी, खंजर, गुप्ती, ढ़ाल-तलवार आदि पर नक्काशी करने वाले सिकलीगर परिवारों की कला के बखान से। आगे बढ़ता हूं तो पुस्तक गढ़ की दरो-दीवारों पर कांच पर सोने के सूक्ष्म चित्रांकन की बेहद सुन्दर थेवा कला है। मिट्टी से निर्मित छोटे-छोटे गवाक्ष, जालियां, कंगूरों की गृहसज्जा में उपयोग आने वाली मिट्टी की महलनुमा कलाकृतियां ‘वील’ है। लकड़ी का चलता फिरता देवघर काष्ठ-तक्षित कावड़ है और है बाजोट, मुखौटे, कठपुतली, लाख की कलात्मक वस्तुएं, मोलेला की मृणमृर्तियां, पीतल के गहने-भरावे, शीशम की लकड़ी पर किये तारकशी आदि की मनोहारी कलाएं। लोक मन के अवर्णनीय उल्लास, उमंग की सौन्दर्य सृष्टि करती कलाओं का मेघवाल का पुस्तक गढ पाठकीय दीठ से हर ओर, हर छोर से लुभाता है। पन्नालाल ने इस गढ़ को कलाकारों से बतियाते और राजस्थान की कला से संबद्ध बहुतेरी पुस्तकों को खंगालते रचा है। इस रचाव में वे राजस्थान की प्रमुख कलाओं, हस्तशिल्प आदि की सहज जानकारी तो देते ही हैं, साथ ही लुप्त होती उन कलाओं की ओर भी अनायास ध्यान आकर्षित करते हैं, जिन्हें आज संरक्षण की अत्यधिक दरकार है।

कला की प्रभा और प्रतिभा सदा सर्वोन्मुखी रही है। ऐसा है तभी तो हमारी इन पारम्परिक कलाओं को हम आज भी अपने घरों मंे सहेजे हुए हैं। लोक का क्या अब यहीं ही नहीं बचा रह गया है आलोक!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित
डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "काका तट" दिनांक 17-09-2010

Friday, September 10, 2010

अंतर्मन आस्था में संस्कृति का प्रवाह


कला का रूप और संस्कृति समाज स्वीकृत जीवन दर्शन से बंधे होते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि हमारी जो संस्कृति है, हमारी जो परम्परा है उससे अलग होकर कलाकृतियों का सृजन संभव नहीं है। यह परम्परा ही है जो पूर्ववर्ती गुणों के साथ नये गुणों को आत्मसात करती जड़त्व को तोड़ती है। इस दृष्टि से परम्परा का पोषण यदि कोई कलाकार करता है और उसे अपने तई समय की संवेदनाओं से साधता है तो उसमें अपूर्व की तमाम संभावनों से इन्कार नहीं किया जा सकता। रागिनी उपाध्याय के चित्रों से रू-ब-रू होते लगता है, परम्परा के अंतर्गत कहानियां, मिथकों, किवदंतियों, पुराण कथाओं को आधार बनाता उसका कलाकर्म कला का सर्वथा नया मुहावरा लिए है। इस नये मुहावरे में गहरे रंगोंे के साथ स्पष्ट आकार, स्वच्छन्द संयोजन और किसी मिथक पर आधारित होने के बावजूदे चित्रों मंे निहित विषय वस्तु की स्वतंत्रता अलग से ध्यान खींचती है। टेक्सचर प्रधान रूपाकारों में नेपाल की कुमारी का अंकन हो या फिर हिन्दू देवी-देवताओं को आधुनिक संदर्भों में कैनवस पर उकेरना या फिर भगवान बुद्ध के जरिए विध्वंश में आश का सूर्य संजोना-रागिनी अनुभूति और अंर्तदृष्टि के पुनर्सृजन में कला की सर्वथा नयी दीठ देती है।

बहरहाल, रागिनी के चित्रों में परम्परा और मिथकों के जरिए अन्तर्मन संवेदना के अनुभवों के विराट भव से रू-ब-रू हुआ जा सकता है। आॅयल पेंटिंग के उसके एक चित्र में औरत के रूप में गाय का अंकन है। इस अंकन में लोकचित्रकला की हमारी परम्परा के जो प्रतीक और बिम्ब आधुनिक संदर्भों में दिए गए हैं, वे अलग से लुभाते हैं। ऐसे ही ‘द पावर’, ‘द पेशेंस’ जैसे बहुतेरे उसके चित्रों के तुलिकाघात सहज, स्वाभाविक तो हैं ही, उनमंे बरते गए रंगों का संयोजन भी उत्तमता से परिकल्पित ऐसा है जिसमें चाक्षुष सौन्दर्य है। आॅयल पेंटिंग के अंतर्गत ‘बर्लिन की दीवार’ ‘डस्ट एंड लव’, ‘गोल्डन चेयर’ जैसे उसके बहुचर्चित चित्रांे में रंग और रेखाओं का गतिशील प्रवाह हैं। इधर रागिनी ने पौराणिक हिन्दू कथाओं को आधार बनाते हुए उसमें आधुनिक परिवेश को उद्घाटित किया है। स्टेच्यु आॅफ लिबर्टी, ताजमहल, एफिल टावर आदि को प्रतीकों में रखते हुए उसने आधुनिक परिवेश और बदल रही धारणाओं की इनके जरिए अपने तई कला व्याख्या की है। अपने कलाकर्म के जरिए वह इतिहास और संस्कृति की यात्रा कराती है। उसके चित्रों में उभरे बिम्ब और प्रतीकों में संस्कृति के अनूठे स्वरों का आस्वाद है। कला की उसकी यही सांस्कृतिक दीठ उसे औरों से जुदा करती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 10-09-2010

Saturday, September 4, 2010

अलहदा चित्रकार आर.के. लक्ष्मण

भारतीय कला परम्परा के अंतर्गत विष्णुधर्मोत्तर पुराण में ‘चित्रसूत्रम्’ के अंतर्गत चित्रकला के जो नौ रस बताए गए हैं, उनमें व्यंग्यचित्रकला भी प्रमुख है। विडम्बना यह है कि मूल्यांकन के अंतर्गत आधुनिक और पारम्परिक चित्रकला में भेद करते हमने हास्य-व्यंग्य चित्रकला को इधर जैसे सिरे से बिसरा दिया है। यह जब लिख रहा हूं, आर.के लक्ष्मण का कॉमन मैन याद आने लगा है। चेक का बंद गले का कोट, सर पर चंद बालों के गुच्छे, नाक पर भारी सा चश्मा लगाता अधेड़ उम्र का लक्ष्मण का हास्य-व्यंग्य चित्र किरदार कॉमन मैन हैरान और हक्का बक्का सा हमारी राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी गतिविधियों से संबंधित घटनाओं का जैसे मूक साक्षी है।

एक चित्र में आर.के.लक्ष्मण ने अपने कॉमन मैन को बड़े उदर, लम्बे कान के भगवान गणेश के चित्र के समक्ष नतमस्तक होते दर्शाया है। इन दिनों जब आर.के. लक्ष्मण अस्पताल में गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। स्नेहवश उनके द्वारा भेंट किए और अपने अध्ययन कक्ष में लगाए उनके इस चित्र को देखकर मुझे औचक खयाल आता है कि उनका कॉमन मैन गणेश से अपने सृजनहार को ठीक करने की प्रार्थना कर रहा है। क्यों न करें? उनका सृजनहार सबसे अलायदा जो हैं। बारीक रेखाओं में अपने व्यंग्यचित्रों से लक्ष्मण ने जीवन के तमाम पहलुओं को हर ओर, हर छोर से जैसे बार-बार उद्घाटित किया है।

याद पड़ता है, पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.कलाम ने जयपुर में उनके व्यंग्यचित्रों की कला प्रदर्शनी ‘लक्ष्मण रेखा’ का उद्घाटन किया था, तब उनसे लम्बा संवाद हुआ था। सवाल करें तो हर जवाब में आपसे सवाल। पैरेलेसस के बाद भी उनके काम में कोई फर्क नहीं पड़ा। कहने लगे, ‘हाथ और दिमाग काम कर रहा है...और क्या चाहिए।’ किसी से मिलना-जुलना उन्हें पंसद नहीं। न कहीं वे जाते-आते हैं, फिर उनका कॉमन मैन कैसे समकालीन जीवन की सांगोपांग अभिव्यक्ति कर देता है? सवाल जब हुआ तो बोले, ‘आम आदमी के पास जाना क्या जरूरी है? मीडिया सारा कुछ तो बताता ही है।’ रचनाकार के तौर पर कोई अपेक्षा के सवाल पर कहने लगे, ‘मैंने जो बनाया है, उसे लोग समझे बस इतनी ही।’ पहली बार ऐसा हुआ कि किसी व्यंग्यचित्रकार की कला प्रदर्शनी का राष्ट्रपति ने उद्घाटन किया। इस पर जब प्रश्न हुआ तो कहने लगे, ‘पहली बार किसी ने इतना अच्छा कार्य जो किया है। आपको नहीं लगता?’

बहरहाल, उनका जवाबनुमा यह सवाल मन में हलचल मचा रहा है। सच ही तो कहा उन्होंने, व्यंग्यचित्रकला में लक्ष्मण ने जो किया है, वह क्या कोई ओर कर सका है? है कोई, जिसमें अपने काम के प्रति इतना आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा हो? व्यंग्य चित्र कॉमन मैन जितना हुआ है कोई और व्यंग्यचित्र इतना लोकप्रिय? कॉमन मैन के साथ आईए, हम भी ईश्वर से दुआ करें। वे जल्द स्वथ हों। आमीन!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 3-09-2010

Saturday, August 28, 2010

कला परम्परा का आधुनिक व्याकरण

भारतीय कला मुख्यतः धर्म एवं आध्यात्मिक चिन्तन को समर्पित रही है। जैन धर्म की हस्तलिखित प्राचीन पाण्डुलिपियां को ही लें। हाथ से सुन्दर लिखाई और उनके साथ भावपूर्ण चित्रों का वहां सांगोपांग मेल है। आज के इस दौर में भी कला की उस भारतीय परम्परा का सतत निर्वहन इधर डॉ. मंजू नाहटा के कलाकर्म में देखकर सुखद अचरज हुआ। आचार्य महाप्रज्ञ सृजित खंडकाव्य ऋषभायण के साथ ही जैन धर्म के अनेकांत दर्शन के जो चित्र उन्होंने उकेरे हैं, उनमें भारतीय चित्रकला के सुनहरे अतीत की अनुगूंज तो है ही आधुनिक कला के बिम्ब और प्रतीकों के जरिए कला का जैसे नया व्याकरण भी रचा गया है।

पिछले दिनों जब वह जयपुर आयीं तो जैन धर्म और भारतीय चित्रकला पर उनसे विषद् चर्चा हुई। कहने लगी, ‘यह जैन धर्म ही है जिसमें हस्तलिखित पाण्डुलिपियों पर सूक्ष्म लिखाई और चित्रांकन की परम्परा आधुनिक दौर में भी जीवन्त है।’ वह जब यह कहती है तो अनायास ध्यान उनके बनाये अनेकांत दर्शन और विभिन्न जैन कथाओं से प्रेरणा ले बनाए उन चित्रों पर जा रहा है। समतल रंगाकन, आकारों के सरलीकरण में मंजू ने जैन दर्शन में जो अर्न्तनिहित है उसे मूर्त-अमूर्त में बेहद सजिदंगी से उकेरते बारीक रेखाओं में रंगो का भी अभूतपूर्व संयोजन किया है। ऑयल या एक्रेलिक रंगो की बजाय प्राकृतिक रंगों का उनका प्रयोग करते। मसलन काला रंग यदि बनाना है तो उसके लिए बड़े दीपक की लौ में धूंआ उपाड़कर कार्बन को एकत्र कर उसका प्रयोग किया गया है। सफेद रंग के लिए काठ खड़ी, फूल खड़ी आदि का उपयोग हुआ है तो नील के वृक्ष से नील, पलाश के फूलों से गहरा लाल व पीला रंग घोटकर तैयार करने के साथ ही सोने और चांदी के रंगों का प्रयोग भी बहुतायत से किया गया है।

आचार्य तुलसी के जीवन पर इधर डॉ. मंजू ने 54 फीट लम्बी और 4 फीट चौड़ाई की म्यूरल पेंटिंग बनायी है। रंग और रेखाओ में उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों के जो बिम्ब और प्रतीक इसमें उन्होंने दिए हैं, अनायास ही वे ध्यान खींचते हैं। मसलन उनके परिनिर्वाण को उन्होंने उड़ते हुए एक पक्षी के रूप में उकेरा है। मुझे उसे देखते जेहन में कबीर का ‘उड़ जायगा हंस अकेला...’ भजन स्मरण हो आता है। कुमार गंधर्व के गाए उस भजन की जीवंतता डॉ. मंजू नाहटा के चित्रांकन में भी मैं गहरे से अनुभूत करते कला की उनकी इस दीठ में जैसे खो सा जाता हूं।

बहरहाल, निंरंतर अभ्यास और लयबद्धता के साथ रंगों और रेखाओं को अपने तई साधते मंजू के चित्र भले जैन धर्म और दर्शन पर ही केन्द्रित हैं परन्तु उनमें समय की संवेदनाओ ंऔर कला की परम्पराओ को गहरे से जिया गया है। मुझे लगता है, अतीत को वर्तमान से जोड़ते डॉ. मंजू अपने चित्रों में जैन दर्शन के जरिए जीवन के रहस्यों और सच्चाई को ही तो तुलिका स्वर देती है। सच भी है। जीवन से पृथक होकर क्या कोई कला जीवित रह सकती है!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 27-8-2010

Friday, August 20, 2010

चाक्षुष बिम्बों में भावों का सम्प्रेषण

कलाओं में परस्पर द्वैत नहीं अंर्तसम्बन्ध होते हैं। एक कलाकार जब सर्जन करता है तो रचना में निहित उसकी अनुभूति और संवेदना ही उसे उदात्त बनाती है, कईं मायनों में सर्वग्राही भी। फोटोग्राफी को ही लें। चित्रकला की भांति इसमें जो दिख रहा है, वही यदि उभरकर सामने आता है तो उसका कोई कला अर्थ नहीं है परन्तु भावग्राही दीठ वहां है तो वही उसका कला आधार बन जाता है।

बहरहाल, छायाकारी ही नहीं बल्कि किसी भी कला के रूप मंे परिवर्तन होते रहना उस कला को सचेत व प्रभावी रखने के लिए आवश्यक है। पहले पहल जब कैमरा अस्तित्व में आया तब उसका प्रमुख ध्येय जो कुछ दिख रहा है, उसे हूबहू प्रस्तुत करना ही रहा होगा परन्तु जैसे-जैसे उसका विस्तार हुआ, कला माध्यम के रूप में भी उसने अपनी पहचान बनायी। भले ललित कला अकादमी फोटोग्राफी को अभी भी कला नहीं मानें परन्तु माध्यम के रूप में फोटोग्राफी को कोरी यांत्रिक प्रक्रिया भर नहीं कहा जा सकता। रघुराय, ज्योति भट्ट, अकबर पदमसी के छायाचित्रों को ही लेें। क्या वहां कला नहीं है? कैमरा जब यथार्थ में अन्र्तनिहित संवेदनाओं का सृजन करता है तो उस क्रिया में साधारण चीजें कला रूपान्तरण के रूप में ही हमारे सामने आती है। तब तस्वीरों में उभरने वाले अजीबोगरीब दृश्य हमारे अवचेतन मन को छूने लगते हैं। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर छायाकार महेश स्वामी की छाया-कला प्रदर्शनी ‘यात्रा’ से रू-ब-रू होते भी लगा उसकी खींची तस्वीरें यथार्थ का अंकन भर नहीं है। वहां दृश्य में निहित संवेदनाओं, भावनाओं और उस सौन्र्दबोध को भी छुआ गया है जो हमारे अन्तर्मन को झकझोरते कुछ सोचने को विवश करता है। मसलन स्कल्पचर को कैमरे से पकड़ते उसने उसके आकाश, बुलन्द इमारत को भी इस खूबसूरती से प्रस्तुत किया है कि वह यथार्थ में जो दिख रहा है, उससे परे अमूर्त संवेदना का चाक्षुष बिम्ब बन गया है। इसी तरह समारोहों की हलचल में कदमताल को आउट आॅफ फोकस करते जो दृश्य संयोजन किए गए हैं, उनमें एक नये तरह का भावबोध संप्रेषित होता है। यही नहीं ऐतिहासिक इमारत के पानी में पड़ते अक्स, वास्तु धरोहर में परिन्दों के बास, प्रकृति दृश्यावलियों में अन्र्तनिहित सौन्दर्य के बिम्ब कला का सर्वथा नया मुहावरा ही रचते हैं।

मुझे लगता है, संवेदनाओं के चाक्षुष बिम्ब उकेरने वाला छायाचित्रकार भी सर्जक, चित्रकल्पी ही होता है। भावग्राही दृष्टि के अंतर्गत फोटोग्राफी और चित्रकला में परस्परावलम्बता है। दोनों में ही जब सर्जक यथार्थ को एक निजी अनुभव की तरह समझता है तो जीवन के नये तथा अद्वितीय बिम्ब हमारे सामने उभरकर सामने आते हैं और ऐसे बिम्बों के जरिए ही अनंत के बारे में एक जागरूकता विकसित होती है।...तो अब भी क्या फोटोग्राफी को हम कला नहीं कहेंगे!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 20-8-2010