Friday, May 6, 2011

व्यष्टि नहीं समष्टि का पर्व

अन्तःसत्ता से संबद्ध व्यक्ति की आनन्दवृत्तिमूलक सर्जना ही हमारी तमाम कलाओं का हेतु है। बाहरी सौन्दर्य का महत्व ही वहां नहीं है बल्कि आंतरिक भावों का गहरा अंकन उनमें है। सच ही तो है! कलाओं का अर्थ कहना नहीं है, व्यंजित और ध्वनित होना है। समय के अनवरत प्रवाह की द्योतक यह भारतीय कलाएं ही हैं जिनमें व्यस्टि के स्थान पर समष्टि के भाव हैं। आस्थाओं, विष्वास से उपजी हमारी कलाएं दर्षिता विष्वरूपा है। लौकिक उत्सवों में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।

बहरहाल, आज वैषाख शुक्ला तृतीया है। माने आखातीज। अक्षय तिथि। कलाओं की संपन्नता का, उत्सवधर्मिता का पर्व। कहते हैं, त्रेतायुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ। इसी से यह युगादि तिथि मानी जाती है। अबूझ दिन। तीन प्रमुख अवतार नर-नारायण, परषुराम और हयग्रीव इसी दिन हुए। बद्रीनाथ के कपाट इसी दिन खुलते हैं तो वृन्दावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्षन वर्ष में एक बार इसी दिन होते हैं। किसी भी कार्य को करने का अनपूछा मुहूर्त है आखातीज।

कलाओं के सर्जन का पर्व भी तो है यह आखातीज। अलंकृत घड़े, खड़ाऊ, छत्ते आदि दान करते यत्र-तत्र सर्वत्र लोग दिखाई देंगे। घड़े का, भांत-भांत की पंखियों का निर्माण-यह सब कलाओं का सर्जन ही तो है। अक्षयतृतीया पर लक्ष्मी सहित नारायण की पूजा का विधान है । वाणी जब सुसंस्कृत होती है, तब उसे सरस्वती का स्वरूप प्राप्त होता है परन्तु शब्दों को फटक-फटक कर भाषा का जब निर्माण हुआ तो लक्ष्मी ने ही वाणी को निधि समर्पित की। वाणी, निधि सभी प्रतीक हैं। गूढ, मनोगत अर्थों को प्रकट करते इन्हीं में तो रूप सादृष्य का अभिप्राय होता है। मनुष्य की रसिकता, मंगलकामना और आध्यात्मिकता को नवजीवन और पोषण देते प्रायः सभी उत्सवों में हम प्रतीकों का ही तो वरण करते हैं।

आखातीज पर प्रतीक रूप में पतंग उड़ाने का भी रिवाज है। जी हां, बीकानेर में कड़ी धूप, तेज चलती लू में भी घरों की छतें इस दिन आबाद होती है। पतंगे उड़ती है। स्थानीय भाषा में इन्हें किन्ना कहते हैं। वैषाख शुक्ला बीज, 1545 के शनिवार के दिन बीकानेर शहर की स्थापना हुई थी। स्थापना की उमंग में बीकानेर में उत्सव मनाया गया। घरों में खीचड़ा बना। घी भर इसे लोगों ने खाया और जीभर पिया ईमली का सर्बत। आखातीज पर राव बीका ने खुषी का ईजहार करते, आसमान में उड़ते मनों के प्रतीक रूप में बड़ा सा चिन्दा यानी बड़ी पतंग उड़ायी। बस तभी से परम्परा हो गयी। पूरे विष्व में शायद बीकानेर एक मात्र जगह है जहां तपते तावड़े में छत पर चढ़कर लोग पतंगे उड़ाते हैं। कागज पर कोरे चित्र, आकृतियों से सजी कलात्मक पतंगे। इन्हें उड़ाना भी अपने आप में कला है। आसमान में गोते खाती पतंगों के उड़ाके तगड़े लड़ाके होते हैं। दूसरे की पतंग काटने में मजबूत डोर नहीं बल्कि कला की दीठ वहां होती है। ऐसी जिसमें कलाबाजियों खिलाते पतंग को अनायास ढील या औचक कसते हुए काटने के गुर निहित जो होेते हैं।

...तो मन के उत्साह, उमंग की अभिव्यक्ति का पर्व है आखातीज। सच्ची कला यही तो है जिसमें अनायास मानव मन अपने अंतःकरण को प्रसन्न करने की जुगत कर बैठता है। व्यष्टि नहीं समष्टि की भावना के साथ। ऐसे ही जागृत होती है भीतर की हमारी उदात्त भावनाएं । यही तो है कला का सत्यं, षिवं और सुन्दरम्। आप क्या कहेंगे!

Friday, April 29, 2011

अनुभूतियों की सघनता का उजब़क न्यास

अवधेष मिश्र के चित्र भीतर की हमारी संवेदना को जगाते हैं। उनके चित्र अंतर्मन अनुभवों और परिवेष की सच्चाई को जीते हैं और आत्म-अनात्म के साथ कला के तमाम आनुषांगिक तत्वों को बेहद खूबसूरती से हमारे समक्ष रखते हैं। समय की संवेदना गहरे से जीते इधर उन्होंने चित्रों की जो श्रृंखला तैयार की है, उसमें खेतों में खड़े रहने वाले बिजूके को माध्यम बनाया है।
अवधेष ने बिजूके के उजब़क न्यास में समय और समाज की तीव्रतम अनुभूतियों की सघनता को अनुभूत किया जा सकता है। वैसे भी बिजूका खेत-खलिहानों में खड़ा हमारी आंखों से ओझल हुआ भी कहां है! दिन में वह खेत की रक्षा करने वाले रक्षक के रूप में दिखाई देता है तो सुनसान जंगल में पेड़ों के बीच से झांकने पर वह जंगली जानवर सरीखा प्रतीत होता है। दोनों हाथ फैलाए कभी लगता है, वह हमें अपने पास बुला रहा है तो कभी अंधेरी रातों में उसकी आकृति भयावह, डरावनी लगती है। अजीबोगरीब शक्ल अख्तियार करता वह कभी विदूषक की भूमिका के रूप मंे हमारे सामने आता है। कभी सच तो कभी धोखा लगता है परन्तु खेत में उसका होना हमारी संतुष्टि है। भले वह कुछ कर नहीं सकता परन्तु कुछ कर सकने की साक्षी जरूर देता है और इस साक्षी से ही कईं बार पषु पक्षी भ्रम में पड़ खेत से दूर रूख कर लेते हैं।...बिजूका निरीह है परन्तु दीठ से भयावह भी, सभ्य भी और खेत की रक्षा कर सकने वाला संस्कारी भी। शायद इसीलिए अवधेष ने बिजूके को माध्यम बनाते हुए उसके जरिए जीवन की उथल-पुथल, विषमताओं, विद्रुपताओं, विडम्बनाओं और तिरोहित होते मूल्यों को रूपायित किया है। भले बिजूके के रूप में उन्होंने कैनवस पर यह सब जिया है परन्तु रंग और रेखाओं की लय में उनका बिजूका मनुष्य की सोच और बदलते समय की धारणाओं का प्रतिनिधित्व करता है। विद्रुपताओं और विडम्बनाओं का निरूपण करते हुए भी अवधेष ने बिजूका को कैनवस पर सर्वथा नया परिवेष दिया है। एक बार नहीं। बार-बार। उनके बिजूके को देखना नयेपन में जाना है।
अवधेष का बिजूका और साथ की आकृतियों, पार्ष्व के रंगों, रेखाओं के अर्थ और अभिप्राय धीरे-धीरे प्रकट होते है। भले अवधेष ने खेत में खड़े बिजूका के उजब़क आकार को अपने अवचेतन मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है परन्तु इसमें रंगों की संपन्नता भी अलग से ध्यान खींचती है। उनके बरते रंग, रेखाओं की कोमलता, सहजता और यथार्थ ऐन्द्रियबोध की उनकी समग्र सृजनात्मकता को भी अलग से प्रतिबिम्बित करती है। किसी एक रंग की बजाय अवधेष का कैनवस बहुत से ऐसे चटख रंगों से भी सज्जित हैं, जिन्हें आम तौर पर बरता नहीं जाता है। गाढ़े चटख बैंगनी, गहरे हरे, नीले, लाल, पीले रंगों के जरिए विषम परिस्थितियों में भी रहने वाली ग्रामीण उत्सवधर्मिता को जैसे कैनवस पर जीते हैं। उनका बिजूका प्रतीक है उस सभ्यता का जिसमें हम जी रहे हैं और जो कईं स्तरों पर हमें जी रही है।
बिजूका चित्र श्रंखला में अवधेष का टेक्सचर बेहद समृद्ध है। बारीक रेखाएं टैक्सचर की पूरक है। शायद इसका कारण यह भी है कि वह रेखांकन और चित्रण दोनों ही एक साथ करते हैं। उनके बिजूका के साथ के दृष्यों की गतिमयता की सूक्ष्म से सूक्ष्म सचलता को भी पकड़ा जा सकता है। मसलन उजब़क आकार के बिजूका के पास मंडरा रही चिड़िया, साथ खड़ा कोई जानवर, दूर झांकता चांद या सूरज, लहलहाती फसलें, पास, बहती नदी, दूर तक जाती कच्ची सड़क और भी बहुत सारी चीजें। मुझे लगता है अंतरंग की अविच्छिन्नता के स्थायित्व के अंतर्गत अवधेष के बिजूका की उपस्थिति से बड़ा कला का और मानवीय प्रमाण भला और क्या होगा!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 29-4-2011

Monday, April 25, 2011

संस्कृति और इतिहास का दृष्य-श्रव्य आख्यान



इतिहास की अविरल धारा में संस्कृति और कलाएं हमें ज्ञानोन्मुख करती भविष्य की नवीन दीठ देती है। चिरंतन और लौकिक है हमारा इतिहास। मात्र तथ्यों का संकलन भर नहीं है इतिहास बल्कि साक्ष्य, दस्तावेज और अवषेषों की उपलब्धता में यह हमसे हर समय जैसे संवाद करता है। हमारी जो संस्कृति, परम्पराएं, और कलाएं हैं, उनके अतीत से ही तो सृजित हुआ है यह वर्तमान। माने वर्तमान की नींव हमारा अतीत है, बीता हुआ कल है।

बहरहाल, बात करें राजस्थान के इतिहास की। यह रंग-बिरंगी धोरां धरती की उत्सवधर्मी संस्कृति और गौरवमयी परम्पराओं का जैसे अनूठा गान है। पिछले दिनों दूरदर्षन, जयपुर द्वारा प्रसारित वृत्तचित्र ‘मैं राजस्थान हूं’ का आस्वाद करते लगा, इतिहास तथ्यों का संकलन भर नहीं है बल्कि गुजरे हुए कल का कला की दीठ से व्याख्यात्मक पुनर्निमाण है। शैलेन्द्र उपाध्याय ने अपनी कला संपन्न दृष्टि से राजस्थान के इतिहास को गहरे से संजोया है। शब्दों से उसे जीते दृष्य-श्रव्य में धोरां धरती की संस्कृति और समृद्ध कलाओं का रोचक आख्यान ही एक प्रकार से उन्होंने इस वृत्तचित्र में प्रस्तुत किया है। इतिहास के प्रसंगों, घटनाओं के ब्योरों मंे ले जाते वृत्तचित्र की खास बात यह है कि इसमें शब्दों की दृष्यचित्रात्मकता में अतीत से वर्तमान की कदमताल है। राणा प्रताप की आन-बान और शान के साथ ही ‘इला न देणी, आपणी हालरियो हुलराय’ का दृष्य-श्रव्य चितराम हो या फिर आजादी के लिए आऊवा के बलिदान के बहाने खुलते अतीत के वातायन में इतिहास के साथ संस्कृति के बहुतेरे अछूते प्रसंग। सब में हमारी संस्कृति की जीवंतता है। डाक्यूमंेट्री 1857 की क्रांति में राजस्थान की भूमिका का रोचक डॉक्यूड्रामा भी है तो इसमें मानगढ़ का सिंहनाद, ऊपरमाल की अनुगूंज, एकी का अनुष्ठान, नवयुग के नव अवतार, स्वाधीनता का सूर्योदय, पंचायतीराज की शुरूआत जैसे रोचक दृष्य खंड राजस्थान के अतीत की मनोरम झांकी है। शैलेन्द्र उपाध्याय स्वयं कवि, साहित्यकार हैं सो उन्होंने अपने तई वृत्तचित्र में रेत के धोरों के कहन को कलात्मक सौन्दर्य भी अनायास ही दिया है। इस सौन्दर्य में ऋग्वेद की ऋचाओं में आए मरूप्रदेष का जिक्र है तो यहां के लोगों की उत्सवधर्मी संस्कृति का अनूठा शब्द कैनवस भी है। वृत्तचित्र के जरिए ऐतिहासिक आख्यान को लोकनृत्य, लोक संगीत और चित्रकला से हर ओर, हर छोर से संवारा गया है। मसलन घटनाओं की राजस्थानी चित्रषैलियों की साक्षी और रेखाचित्रों, कविताओं से दृष्यों का पुनर्सजन। ऐसा करते वृत्तचित्र की पारम्परिक बुनावट की जड़ होती परम्परा को तोड़ा भी गया है। सम्पूर्ण डाक्यूमेंट्री गत्यात्मक प्रवाह की सृजनषीलता में इतिहास के ब्योरों, सूचनाओं, घटनाओं और प्रसंगों का रोचक आस्वाद कराती है। खंडहर महलों से झांकते इतिहास के गलियारों से वर्तमान में हुए राजस्थान के विकास वातायन में राजस्थान के कलामय जीवन की सांगीतिक अनुगूंज भी इस वृत्तचित्र की वह बड़ी विषेषता है जो हमें बांधे रखती है।

रेतघड़ी में इतिहास की करवटों को इसमंे बखूबी संजोया गया है। इसीलिए वृत्तचित्र दरअसल चलचित्र दृष्य कोलाज के अनूठे बिम्ब और प्रतीक लिए देखने वाले से बतियाता है। अर्सा पहले राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी हुसैन की फिल्म ‘थ्रू द आईज ऑफ एक पंेटर’ देखी थी। इसमें कोई कहानी नहीं थी बस इम्प्रेषंस हैं। कुछ शक्लें, सूरतें, छतरी, लालटेन, महलों के साथ कला के सुर और लय। ‘मैं राजस्थान हूं’ देखते न जाने क्यों वह फिल्म याद आ गयी! शायद इसलिए कि इसमें दृष्य-श्रव्य कोलाज के अंतर्गत इतिहास के कला-संस्कृति प्रभावों की अनूठी कला दीठ जो है। प्रसारण में व्यावसायिकता के इस चरम दौर में दूरदर्षन जैसे सार्वजनिक प्रसारण माध्यम से ही अब इस प्रकार के सृजनात्मक वृत्तचित्रों के प्रसारण की उम्मीद की जा सकती है वरना इतिहास और संस्कृति की सूझ की ऐसी बूझ ओर कहां!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास
 का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 22-4-2011


Friday, April 15, 2011

अनुभव और विचार का छायाकला रूपान्तरण

हिगेल के सौन्दर्यानुभूति आकाश में चीजों को, देखे हुए दृश्यों को फिर से देखने की चाह जगती है। शायद इसलिए कि वह भीतर के हमारे चिंतन को झकझोरते हैं। जो कुछ हमारे समक्ष है, उसके बारे में पूरी की पूरी हमारी धारणा को बदलते हुए। कल हिगेल को पढ़ते इन पंक्तियों पर ठीठक गया, ‘व्यक्ति की संपूर्ण चेतना विचार में ही है। कलाकार की जिन मानसिक क्रियाओं में विचार की प्रक्रिया निहित होती है, वे ही कलात्मक संवेदन क्रियाएं अस्पष्ट रूप से उसकी चेतना में कार्यशील होती है। विचार प्रक्रिया के बगैर कलाकार किसी भी कला सर्जना को जन्म नहीं दे सकता।’

सच ही तो है। यह विचार प्रक्रिया ही है जिसमें कलाकार देखी हुई वास्तविक वस्तुओं की अपने तई नई सौन्दर्यसृष्टि करता है। छायाकारी में इसे गहरे से समझा जा सकता है। कैमरा जो दिखाई देता है, उसे ही तो पकड़ता है परन्तु बहुतेरी बार उसे परोटने वाला कलाकार भीतर की अपनी विचार प्रक्रिया से यथार्थ का जो कला रूपान्तरण करता है, उसमें देखे हुए के मायने बदल जाते हैं। यह जब लिख रहा हूं, छायाकार के.के अग्रवाल की छायाकृतियां जेहन में हलचल मचा रही है। अग्रवाल ने अपने होम गार्डन में अफ्रिकी पौधों, फूलों की बहुत सी प्रजातियों का संग्रह किया है। पौधों का उनका संग्रह तो खूबसूरत है ही परन्तु इनका जो उन्होंने छायांकन किया है, उसका लोक सर्वथा अनूठा है। छाया रूपान्तरण की उनकी सौन्दर्यदीठ में आकृतियों पर पड़ती रोशनाई में लहराती पत्तियों, फूलों की पंखुरियों, टहनियों, तने की वह तमाम बारीक संरचनाएं हैं, जिनमें पौधों की जीवंतता को अनुभूत किया जा सकता है। अफ्रिकी पौधों के उनके संसार के यथार्थ को भी बहुतेरी बार निहारा है परन्तु वास्तविकता से उनका छाया रूपान्तरण हर स्तर पर कहीं अधिक मोहक है। इस मायने में कि इसमें फूल, पत्तियों, टहनियों को देखने की अनंत संभावनाओं में उनके छायाकार मन ने जिया है। पौधों के यथार्थ के साथ सूरज की रोशनी है, शाम की लालिमा है और सोच की गत्यात्मकता का प्रवाह भी। मसलन एक पौधे की एक दूसरे से लिपटी टहनियां और धुंआ-धुंआ होती बारीक पत्तियों के गुुंफन के बाद ऊपर खिले फूल का रूपाकार। एक कंटिले पौधे से निकल रहे फूलों की लड़ियां और बहुत से पौधों के खिले फूलों की लय। पौधों के छाया रूपों में निहित अग्रवाल के अनुभव संवेदन में यंत्र रूपी कैमरा कला का माध्यम भर है, मूल बात उनके वह विचार हैं जिनके अंतर्गत यथार्थ का एक प्रकार से पुनराविष्कार किया गया है।

मुझे लगता है, अनुभव तो घटित का होता है परन्तु अनुभूति संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात करती है जो वास्तविकता में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है। बहुतेरी बार वही आत्मा के समक्ष ज्वलंत प्रकाश में आ जाता है और तब वह अनुभूति प्रत्यक्ष हो जाती है। अग्रवाल के छायांकन में यही हुआ है। उन्होंने पौधों को सहेजते लगोलग उनके सौन्दर्य का पान करते उनमें देखने की अनंत संभावनाओं को एक प्रकार से पकड़ा और कैमरे से उसका कला रूपान्तरण किया है। अनुभव से गहरी उनकी यह अनुभूति है। एक खास तरह की विजुअल सेंसेबिलिटी उनमें है। इसी से वह जो कुछ दिखाई देता है, उससे परे भी बहुत कुछ नया निकाल लेते हैं। पेड़, पौधों, उनकी टहनियां, लहराती पत्तियों को खास अंदाज में फोकस करते वह उनके कला रूपों पर गए हैं। उनमंे निहित अनंत संभावनाआंे को उभारा है और ऐसा करते छाया-प्रकाश के अंतर्गत समय संरचना को कैमरे की भाषा देते वह काल बोध भी कराते हैं। छायांकन में अनुभव और विचार प्रक्रिया का यही क्या कला रूपान्तरण नहीं है! आप ही बताईए।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 15-4-2011



Friday, April 8, 2011

लोक संस्कृति का सांगीतिक चितराम


 पारम्परिक लोक वाद्यों के साथ लोक कलाकारों के हर्षित चेहरे। हरितिमा से आच्छादित वातावरण और प्रेक्षागृह की मानिंद खुले आसमान के नीचे बना मंच। ऐसा जिसमें सैंकड़ों कलाकार सहज नृत्य, गायन और वादन कर सके।...अभी कार्यक्रम आगाज में पौन घंटे का समय था, मुझे लगा क्यों नहीं इस समय का उपयोग लोक मन को टटोलने में ही किया जाए सो कुछेक लोक कलाकारों से बतिया भी लिया। लोक कलाकारों के कहन में गजब का उत्साह, उमंग।...अंतराल बाद ही नगाड़े बजने के साथ ही कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियों के लिए तैयार हो मंच के पार्ष्व में एकत्र होने लगे थे। आंखों के सामने मंच पर वह माहौल जैसे जीवंत होने लगा जिसमें हिल-मिल रहते हैं हम सब। अजान होने के साथ ही बज उठे ढोल और नगाड़े। संस्कृति की सौरम चहुं ओर फेलने लगी। यह हमारी समृद्ध लोक संस्कृति ही है जिसकी लय में सहज हम सब बंध जाते हैं...कभी मुक्त न होने की चाह रखते।

बहरहाल, यह राजस्थान दिवस का आयोजन था। उत्सवधर्मी हमारी संस्कृति का सांगीतिक चितराम। ढलती सांझ में अजान से जैसे सुबह हुई। खड़ताल के साथ समवेत गायन, वादन और नृत्य। जातीय संस्कारों, परम्पराओं का अनुठा भव। सच! लोक संस्कृति की सुबह...एक-एक कर घुमर, गैर, तेरहताली, चरी, कालबेलिया, कछी घोड़ी, मांगणियार लोक गीतों, मयुर नृत्य, गींदड़, चकरी...आदिवासी कलाओं के उजास से नहा उठे तमाम उपस्थित लोग। दृष्य-श्रव्य में राजस्थान का अतीत, परम्पराएं जीवंत हो उठी। खालिस लोक ही नहीं था वहां बल्कि बहुत से स्तरों पर शास्त्रीयता का मेल भी था। मसलन कथक में निबंध लोक राग, लोक नृत्य। लंगा, मांगणियार कलाओं में निहित सूफी कलाम। लोक कलाकार नाच रहे थे, गा रहे थे परन्तु उनमें ठेठ शास्त्रीय संगीत, सिनेमाई गीतों की इधर प्रचलित धुनों का भी समावेष था।

मुझे लगता है, लोक कलाकार इधर अपनी पारम्परिक कलाओं के साथ आम जन की रूचियों पर भी जाने लगे हैं। शायद इसका बड़ा कारण उनके समक्ष मौजुदा रोजी-रोटी संकट भी है। परम्परा से उनका मोह तो है परन्तु आधुनिकता और जन रूचियों में हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार करने की मजबूरी भी। फिर लंगा, मांगणियार तो देष की सरहद लांघते विदेषों में भी अपनी कला ले जा चुके हैं, स्वाभाविक ही है व्यावसायिक सफलता की समझ का उनका आकाष बड़ा हो गया है। यही कारण है, यह लोक गायक अपनी पारम्परिक धुनो में शास्त्रीय और लोकप्रिय सिनेमाई धुनों का तड़का लगाने लगे हैं। हालांकि कालबेलिया जैसी नृत्य विधाएं अभी भी इससे अछूती अपने मूल को बचाए हुए भी है परन्तु बहुत से दूसरे लोकगीतों, लोकनृत्यों में सूफी कलामों में पारम्परिक लोकगींतो का राग निबंधन और वह आलाप, आरोह-अवरोह है जिसमें ध्वनियों का तीव्रतम उतार-चढाव उत्तेजकता के माहौल की निर्मिति करता है। कहीं सिनेमाई धुनों को उधार लेते भी परम्परा के मूल में रूप परिवर्तन किया गया है। उनका आस्वाद करते मन में कहीं यह खटका भी हुआ कि भविष्य में उन असल लोक धुनों का क्या होगा, जिसमें रचा-बसा रहा है हमारा तन और यह मन।

जैसे-जैसे लोक व्यवहार में परिवर्तन हुआ है, वैसे-वैसे ही हमारे यहां संगीत में भी निरंतर परिवर्तन हुआ ही है। जीवन की एकांगिता को तोड़ते लोक संगीत में निहित शास्त्रीयता का लोकोन्मुखीकरण उचित ही है परन्तु सोचने की बात क्या यह नहीं है कि संगीत का यह नया रूपान्तरण लोक लय को रौंदने वाला है। भविष्य में खतरे की घंटी क्या यह नहीं है कि इससे असल लोक धुनें फिर हम चाहकर भी नहीं पा सकेंगें। आखिर गांवों में बसे हमारे यह पारम्परिक लोक कलाकार ही तो हैं, जिन्होंने अब तक लोक के हमारे उजास को हमारे लिए बचा कर रखा हुआ है!

राजस्थान पत्रिका  समूह के "डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 8-4-2011

Saturday, April 2, 2011

उत्सवधर्मी संस्कृति का चाक्षुष लोक


हमारे यहां कहा गया है, ‘कलयति स्वरूपं आवेषयति वस्तुनि वा’ माने जो वस्तु के रूप को संवारे वह कला है। चित्रकला की बात करें तो वहां मनोरम दृष्य, उल्लास और उमंग के भावों का सृजन ही बहुतेरी बार चाक्षुष सौन्दर्य की परिणति होता है। कला का यही तो वह लालित्य है जो हमें रस देता है।

बहरहाल, राजस्थान दिवस पर इस बार कला के इस लालित्य को गहरे से अनुभूत करते लगा, बच्चों में अपने परिवेष और दृष्य को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता है। यथार्थ को हुबहु की बजाय अपने तई नई सौन्दर्य सृष्टि देते उनका संवेदनषील मस्तिष्क एन्द्रिकता को रूपायित करते सोच में सर्वथा स्पष्ट है। जवाहर कला केन्द्र में बच्चों की तत्स्थलीय चित्र प्रतियोगिता में राजस्थान की उत्सवधर्मी संस्कृति, चित्ताकर्षक पर्यटन स्थल, विरासत के साथ ही यहां के सुरम्य परिवेष के उकेरे चित्रों में निहित उस दीठ पर औचक अनायास ध्यान जा रहा था जिसमें मरूभूमि की भूली बिसरी परम्पराओं की एक प्रकार से पुर्नसंरचना थी। पहले दिन सामान्य बच्चों की प्रतियोगिता में एक बच्चे ने केवल धोरे पर ऊंट सवार को दिखाते आगे का स्थान पूरी तरह से खाली छोड़ स्पेस की अद्भुत सर्जना की तो एक ने मेले के उल्लास में आकृतियों के अद्भुत कोलाज रचे थे। कुछ चित्र ऐसे थे जिनमें राजस्थान के ऐतिहासिक स्थलों के साथ संस्कृति के भिन्न सरोकारों के पार्ष्व में राजस्थानी वाद्य यंत्र बजाते कलाकार थे। लगभग सभी चित्रों में किसी एक विषय की बजाय राजस्थान को समग्रता से जैसे अभिव्यक्ति दी गयी थी। दृष्य चलचित्र की मानिंद नजरों के सामने आ रहे थे। रंग, रेखाएं, आकृतियां और संवेदनषील भावों का बहुत सारा अमूर्तन भी। माध्यम से अधिक आषय की अर्थवत्ता। सृजन का अद्भुत लोक।

दूसरा दिन विषेष बच्चों के चित्रों से रू-ब-रू होने का था। हमसे अलग दुनिया के यह वह बच्चें हैं जो न सुन सकते हैं और न बोल सकते हैं परन्तु कला अभिव्यक्ति के उनके उजास में ध्वनि का अद्भुत लोक है। मुझे लगता है, भीतर का उनका भव बोलता, गाता, झुमता और उत्सव मनाता हम सबसे कहीं अधिक मुखर है। मसलन एक चित्र में छोटी सी एक बच्ची ने रंगों को उड़ेलते अपने सपनों के आकाष के अद्भुत रूपाकार बनाए थे तो एक ने गहरा नीला रंग और उसमें उभरती सोन मछली, तैरते दूसरे जीवों का जो स्वप्न लोक गढ़ा, उसे छोड़ने का मन नहीं हो रहा था। एक बच्चे ने रंगों के पार्ष्व में दो हाथी निकाले। ऐसे, जैसे बाहर निकलकर हमसे अभी बतियायेंगे। फूल, पत्तियां, कठपुतलियां, मेले-उत्सव और झुमता-गाता मन वहां था। कहीं कोई उदासी, नीरवता नहीं। हर ओर अंतर की उत्सवधर्मिता। अपने को व्यक्त करने की अद्भुत सामर्थ्य वहां है। अपने परिवेष से विमुख नहीं बल्कि हमसे कहीं अधिक मुखर हैं यह विषेष बच्चे। शायद इसीलिए उनके बनाए चित्रों को देखकर पर्यटन, कला एवं सस्कृति विभाग की प्रमुख शासन सचिव उषा शर्मा के मुंह से औचक निकल ही पड़ा, ‘राजस्थान दिवस आयोजनों में भाग लेने का यह अनूठा अनुभव है। हम इन चित्रों को प्रिंट करा सार्वजनिक करेंगे। लोग देखे तो सही अद्भुत यह कला।’

बहरहाल, पर्यटन विभाग के सहयोग से ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता में निर्णायक मंडल सदस्यों डॉ. नाथुलाल वर्मा, डॉ. अर्चना जोषी के साथ यह खाकसार दो दिन बेहद मुस्किल में भी रहा। यह तय कर पाना बेहद कठिन था कि पुरस्कार के लिए कौनसे चित्र चुने जाए परन्तु धर्म का निर्वहन तो करना ही था सो किया ही। हां, बच्चों के मनोलोक के अंतर्गत सृजन के स्वाभाविक रचनात्मक प्रवाह से साक्षात् का यह ऐसा अनुभव रहा है, जिसे कभी बिसरा नहीं पाऊंगा। चाक्षुष सौन्दर्य देखते शब्द गूंगे जो हो गए थे वहां!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 1-4-2011

Friday, March 25, 2011

अलंकारों का सांगीतिक आस्वाद

एस.जी.वासुदेव का कला संसार बहुआयामी है। एक ही समय में वह बहुत से कला माध्यमों में अपने को साधते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि उनकी कला में लोक के उजास के साथ आधुनिकता का सर्वथा नया मुहावरा भी है। माने टेक्सचर में वह लोक कलाओं के नजदीक ले जाते हैं तो रेखाओं के जो बिम्ब और प्रतीक हमारे समक्ष रखते हैं, उनमें आधुनिकता का ताना-बाना भी है। पेंटिंग, ड्राइंग, कॉपर रिलीफ के उनके कलाकर्म में आकृतियांे और एब्स्ट्रेक्ट में गजब की लय है। मुझे लगता है, भिन्न माध्यमों में रेखाओं के गत्यात्मक प्रवाह में वह अपनी कलाकृतियों के जरिए हमें सांगीतिक आस्वाद कराते हैं।

बहरहाल, पिछले दिनों दिल्ली में कलाकार मित्रों के साथ ललित कला अकादेमी की कलादीर्घा में वासुदेव की कला से रू-ब-रू होते लगा, उनकी कलाकृतियों में समृद्ध टेक्सचर के साथ रेखाओं की अनूठी जुगलबंदी है। भीतर की अपनी सृजनात्मक ऊर्जा मंे वह बहुत से कला माध्यमों के जरिए दरअसल कला का अलंकार लोक रचते हैं। इसमें रेषम ट्रेपेस्ट्रीज में चाक्षुष जो है, उसमें लोककलाओं का अद्भुत सौन्दर्य भी है। मसलन वहां रेखीय आकृतियों में जो दृष्य उभरते हैं, मानों वह कोई कथा कह रहे हैं। सहज, सरल और कोमल रंगों में उनके दीवार दरी चित्रों की ही मानिंद कॉपर का रिलिफ वर्क भी है। तांबे में मानव आकृतियों के साथ ही पत्तियां, फूल, चांद, तारे, पिरामिड की बहुतेरी आकृतियों में अलंकार प्रधान रूपाकृतियों में रेखीय कार्य की सृक्ष्मता में कला की उनकी बारीकियों को सहज अनुभूत किया जा सकता है। सरल रूपाकारों में वहां अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूतियों के बिम्ब अलग से देखने वाले को आकर्षित करते हैं। तेल रंगों की उनकी कलाकृतियों में प्राकृतिक दृष्यावलियों मन को मोहती है। शायद इसलिए कि वहां रंगों का अनूठा प्रवाह है। नीले, धुसरित रंगों में बादलों, सागर की लहरों का अहसास कराते।

विविध माध्यमों के अंतर्गत कार्य करते वासुदेव की कलाकृतियों में स्मृतियों के अनूठे कोलाज भी हैं। रेखीय प्रभावों में वह बिम्बों और प्रतीकों के जरिए जो चित्रभाषा हमारे समक्ष रखते हैं, उसमें रूपाकारपरक चुस्ती है। यह चुस्ती कॉपर के उनके कार्य में भी है। खास तौर से वह कॉपर में बिन्दुओं के जरिए एन्द्रिकता और वस्तुपरकता को सर्वथा नये अर्थों में उद्घाटित करते हैं।

कैनवस, मूर्तिषिल्प और तमाम दूसरे माध्यमों में कला के अंतर्गत इधर जटिलता का जो व्याकरण रचा जा रहा है, उससे परे वासुदेव की कलाकृतियोें में उभरी सहजता भीतर के हमारे खालीपन को जैसे भरती है। लोककलाओं से अनुप्रेरित उनकी कला में सर्वथा देषी मुहावरा है। वहां प्रतीक और बिम्ब है परन्तु यह ऐसे हैं जिनमें हम अपने होने की तलाष कर सकते हैं। उनके लैण्डस्केप, दीवार दरी और कैनवस पर उभरी मूर्त-अमूर्त कला में रंगों की कोमल लय है तो आस-पास के हमारे परिवेष का सहज दर्षाव भी है। लहरदार आकारों का उनका कला लोक हमें अपना लगता है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि उसमें अंतर्मन प्रफुल्लता है। जो कुछ है वह सहज है, उसके लिए किसी प्रकार का प्रयास किया हुआ नहीं लगता। कभी पिकासो ने समसामयिक बिम्बों का सृजनात्मक विरूपीकरण किया था परन्तु मुझे लगता है, वासुदेव लाईन और टैक्सचर की अपनी निजता में लोककलाओं के अंतर्गत एकरसीय आकृतियों को नया परिवेष देते हुए उनका अपने तई विरूपीकरण करते हैं। विविध कला माध्यमों में वह कल्पना और अनुभवों के अनूठे दृष्यालेख हमारे समक्ष रखते हैं। मुझे लगता है, यह वासुदेव की कलाकृतियों में निहित लोक का उजास और कोमल रंगों का दृष्यप्रभाव ही है जो हमें उनसे मुक्त नहीं होने देता है, एकाधिक बार देखने के बाद भी। सहज, सरल बिम्बों में स्मृतियों, अनुभवों की लय में रची-बसी उनकी कलाकृतियां का यह अपनापन ही उन्हें ओरों से क्या जुदा नहीं करता!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 25-3-2011

Friday, March 18, 2011

विमर्श में सांस्कृतिक समीक्षा

काल और दिक् की सीमा से परे एक व्यापक सांस्कृतिक प्रक्रिया के भीतर ही यह समाज अपनी तमाम स्मृतियों, प्रवृतियों, खामियों के साथ सदा मौजूद रहता है। वहां बहुत कुछ अव्यक्त होता है। संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्रकलाएं ही हैं जो इस अव्यक्त को व्यक्त करती है। हमारी जो संस्कृति है, उसकी संवाहक यह कलाएं ही तो हैं। सोचिए! यदि जीवन से कलाओं को निकाल दिया जाए तो फिर बचेगा क्या! इसीलिए शायद कहा गया है, कलाएं शरण्य हैं। उनमें रचते, उनमें बसते ही इस जीवन को गहरे से हम व्याख्यायित कर सकते हैं।

बहरहाल, आलोचक मित्र राजाराम भादू की पहल पर ‘समान्तर’ ने साहित्य और संस्कृति से संबद्ध दो दिवसीय आयोजन का एक सत्र जब ‘विमर्ष में सांस्कृतिक समीक्षा’ रखा तो सुखद अचरज हुआ। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकलाएं संस्कृति के उपादान ही हैं, बावजूद इसके सांस्कृतिक समीक्षा न जाने क्यों कभी विमर्ष में रही ही नहीं। स्वाभाविक ही है, इसी से संस्कृति से संबद्ध कोई सोच हमारे यहां कभी बन ही नहीं पाई। जब सोच ही नहीं बन पाई तो पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक समीक्षाओं के क्या हाल होंगे, इस पर कुछ कहना बेमानी ही होगा। पत्र-पत्रिकाओं में में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उन से संबद्ध तमाम सूचनाएं होगी परन्तु उन्हें पढ़कर कलाकार और उसकी कला के बारे में कोई धारणा बनती है, ऐसा मुझे नहीं लगता।

सवाल सांस्कृतिक समीक्षा के हेतु का भी है। मुझे लगता है, जितना महत्व जीवन में कलाओं का है, उतना ही महत्व उन पर लिखे का भी है। यह लिखा खाली सूचनाप्रद ही होगा तो कलाएं हमें क्योंकर झकझोरेगी! उनमें निहित पर कैसे फिर हम फिर जा पाएंगे। तब धीरे-धीरे क्या यह नहीं होगा कि हम कलाओं से और कलाएं हमसे दूर होती चली जाएगी। सोचिए! तब क्या यांत्रिक ही नहीं हो जाएगा यह पूरा जीवन।

आपको नहीं लगता, सांस्कृतिक समीक्षाएं ही हमें कला और कलाकारों के निकट ले जाती है। बहुतेरी बार कलाओं के समग्र परिवेष को समझने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर वह हमें व्यापक और उदात्त दृष्टिकोण भी अनायास ही दे देती है, चूंकि उसमें कला को अनुभूत करने का रस जो निहित होता है। ...और यह रस ही तो है जिससे यह पूरा जीवन आबद्ध है। रस माने आनंद। जीवन की लय। तेरहवीं शताब्दी में सारंगदेव ने संगीत में रस की बात पर कही थी और भरतमुनि ने तो इस रस की तुलना व्यंजनों के आस्वाद से की है। सोचिए, यदि हमारे सांस्कृतिक परिवेष में जो कुछ हो रहा होता है, उसके इस रस आस्वाद का ही हमें पता नहीं हो तो फिर उसकी सार्थकता क्या है। यह तो वही बात हुई कि भोजन करें और उसमें रस नहीं हो। सांस्कृतिक समीक्षा कलाओं का रस आस्वाद कराती है, उन्हें भी जो केवल पाठक या संचार माध्यमों के ही प्रयोगकर्ता हैं। आप प्रेक्षागृह में नहीं गए हैं, आपने संगीत को नहीं सुना है, कलादीर्घा में नहीं गए हैं फिर भी आपको वहां जो हुआ है, उसका रस मिल रहा है। सांस्कृतिक समीक्षा यही करती है, कला के प्रति जिज्ञासा, उसे स्वयं अनुभूत करने की ललक पैदा करती हुई।

बहरहाल, ‘विमर्ष मंे संास्कृतिक समीक्षा’ की परिणति क्या होगी, नहीं कह सकता परन्तु समानधर्मा कवि, लेखक प्रेमचंद गांधी, नाट्य अभिनेता, निर्देषक रणवीरसिंह, अषोक राही, पत्रकार, संपादक ईषमधु तलवार, मायामृग, कथाकार रामकुमार के साथ ही तमाम दूसरे सहभागियों ने सांस्कृतिक समीक्षा की दषा और दिषा पर जो मुद्दे उठाए वह सारे ही मौंजू थे। इससे बड़ा इसका उदाहरण और क्या होगा कि इस महत्ती विमर्ष पर दूसरे दिन लगभग तमाम समाचार पत्र मौन थे। यह जब लिख रहा ख्यात चित्रकार स्वरूप विष्वास की मौन पर मुखर कलाकृति का आस्वाद भी कर रहा हूं। आप भी करिए।


राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर  प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 18-3-2011

Friday, March 11, 2011

अतीत, वर्तमान और भविष्य की दीठ


कला सर्जना की नई विश्व भाषा स्थानीयता के आग्रह से मुक्त है। तकनीक, शैली, चित्रांकन के साथ ही संस्थापन के जो नये आयाम इधर कला में सामने आ रहे हैं, उनमें केवल आधुनिकता बोध ही नहीं है बल्कि अतीत, वर्तमान और भविष्य की उपस्थिति की सर्वथा नयी दीठ भी है।

बहरहाल, विचार संपन्नता में ही नहीं बल्कि कला बाजार की प्रवृतियों में भी इधर तेजी से बदलाव आया है। चैंकाने वाला तथ्य यह है कि हुसैन, रजा और सूजा की कलाकृतियों की बजाय सर्वाधिक मूल्य वाले पांच कलाकारों में अनिश कपूर पहले स्थान पर हैं और बाकी के चार स्थानों पर भी सुबोध गुप्ता, अतुल डोडिया, टीवी संतोष और रकीब शॉ हो गए हैं। कोलकाता से विक्रम बच्छावत द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘आर्ट न्यूज एंड व्यूज’ को पढ़ते कला की वर्तमान बाजार प्रवृतियों के साथ ही वैचारिक दृष्टि से कला में आ रहे परिवर्तनों को गहरे से समझा जा सकता है। ‘समकालीन सृजन’ के सम्पादक, ख्यात कवि-आलोचक मानिक बच्छावत ने पिछले दिनों जब इस पत्रिका के कुछ अंक प्रेषित किये तो सुखद अचरज हुआ। पत्रिका ने जनवरी से मार्च के तीन अंक समकालीन भारतीय कला पर केन्द्रित प्रकाशित किए है।

मुझे लगता है, देश की यह पहली ऐसी पत्रिका है जोे समकालीनता के बहाने भारतीय कला की बारीकियों में जाने के साथ ही कला की बाजार प्रवृतियों पर भी पैनी दृष्टि लिए है। भारतीय कला की विकास यात्रा के साथ ही, कला के अंतर्गत इधर विचार, माध्यम और तकनीक के हो रहे अधुनातन परिवर्तनों, प्रयोगधर्मिताओं की तमाम प्रवृतियों पर पत्रिका ने बेहद महत्वपूर्ण कला सामग्री पाठकों को दी है। मसलन मार्च अंक में कलाकृतियों के बाजार मूल्यों पर निगाह डालते हुए बताया गया है कि विश्व परिपे्रक्ष्य में भारतीय समकालीन कला बाजार की दृष्टि से ही नहीं बल्कि अधुनातन प्रवृतियों की दीठ से भी बेहद महत्वपूर्ण हो गयी है। आधुनिकता और परम्परा के संदर्भ में हुसैन, रामकुमार, एफ.एम.सूजा, रज्जा, विकास भट्टाचार्य, गुलाम शेख, कृष्ण खन्ना, अर्पणा कौर, गणेश हालोई, कार्तिक, गणेश पाईन जैसे कलाकारों की चर्चा करती पत्रिका की बहुतेरी सामग्री में भारतीय कला की नयी दृष्टि और पुरानी जमीन को तोड़े जाने के प्रयासों पर गहराई से विवेचन तो है ही साथ ही कलाकारों से संवाद और देशभर की कलादीर्घाओं की कला प्रदर्शनियों के बारे में भी नवीनतम जानकारियां समाहित है। नवीन अंक में प्रख्यात भारतीय कलाकार सुबोध गुप्ता और टीवी संतोष से संवाद है तो थर्ड इण्डियन आर्ट समिट, कला की नवीनतम विश्व भाषा, कला की नई पीढ़ी और कोलकाता की समकालीन कला को अतीत से निहारते जो आलेख, फीचर दिए गए हैं, उनसे भारतीय कला की नवीन प्रवृतियों की गहरी समझ अनायास ही मिलती है। नई दिल्ली की मोर्डन आर्ट गैलरी में प्रदर्शित अनिश कपूर के स्कल्पचर शो के बहाने विश्व क्षितिज पर कला के बदलते मायनों का आलोक भी इसमें अलग से है।

मुझे लगता है, ‘आर्ट न्यूज एंड व्यूज’ भारतीय कला का ऐसा आईना है जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य को पढ़ा जा सकता है। कला की अकादमिक प्रकाशन प्रवृतियों से परे आलोचना की गहरी संवेदन आंख इसमें है। कलाकारों, कला मर्मज्ञों और कला पर लिखने वालों की संवेदन आंख। विक्रम बछावत की गहरी प्रकाशकीय दीठ को इसी से समझा जा सकता है कि पत्रिका के हर अंक में कला सर्जन, लेखन से जुड़ी किसी विशिष्ट शख्सियत से बतौर अतिथि सम्पादक पाठक रू-ब-रू होते हैं। इस संदर्भ में उनसे बात होती है तो कहते हैं, ‘हम चाहते हैं कि पत्रिका किसी विशेष सोच, दृष्टि में बंधी नहीं होकर कला की विचार संपन्नता की संवाहक बने।’ सच ही तो है! भारतीय कला में निहित उदात्त दृष्टि को क्योंकर सम्पादन की किसी एक दीठ से बांधा जाए। यह दृष्टि बहुलता ही तो हमारी कला थाती है और ‘आर्ट न्यूज एंड व्यूज’ इसी का तो प्रतिबिम्ब है।

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित
डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 11-3-2011

Friday, March 4, 2011

छायांकन में द्रश्य अनंतता का काव्य संवाद


दीवान मन्ना के छायाचित्रों में छवियों का अनूठा व्याकरण है। चित्रात्मक प्रवाह। यथार्थ में जो दिख रहा है,उसके दर्शाव का उपक्रम भर नहीं है उनके छायांकन बल्कि उससे परे संवेदना के बहुत से कोलाज उनमें हैं। द्रश्य की अनंत संभावनाएं लिए। आप छायाचित्र देख रहे हैं और जेहन में औचक कोई कहानी घुमने लगती है। दृष्य की अनंतता में अनूठी किस्सागोई लिए हैं उनके छायाचित्र। मानों किसी एक दृश्य    के बहाने आप उससे संबद्ध दृष्यों की पूरी की पूरी एक श्रृंखला का आस्वाद कर रहें हैं। कैमरे के उनके रूपाकारों के चाक्षुष अनुभव चलचित्र मानिंद हैं। उनमें पेंटिंग  की एप्रोच है। रंगों की अनूठी भाषा है और है अनुभवातीत गीतात्मकता।

दीवान मन्ना से पहले पहल चंडीगढ़ में भेंट  हुई थी। उनकी छायाचित्रकला से पहले पहल वहीं रू-ब-रू हुआ। बाद में उनके सौजन्य से ही उनके छायालोक का निंरतर घूंट-घूट आस्वाद किया। मुझे लगता है, देश  के वह पहले ऐसे छायाकार है जिन्होंने छायांकन में देह का व्याकरण रचा है। यह ऐसा है जिसमें छवि विज्ञान की अद्भुत सौन्दर्य सृष्टि है। इस सृष्टि में दीवान कला के उस संसार में हमें ले जाते हैं   जहां द्रश्य  हमसे काव्यमय संवाद करता हैं-समय संवेदना के अनगिनत दृष्टांत लिए।

अखबार में लिपटी स्त्री के छायांकन नेगेटिव प्रयोग में वह तारीखों का छायाचित्र इतिहास लिखते हैं तो कुछेक छायाचित्रों  के पार्श्व  में राजस्थान-जैन लघु चित्रषैलियों का उपयोग करते वह हमारी संस्कृति का भी अलग से गान करते हैं। युद्ध और आंतक से उपजे डर को उन्होंने कैनवस-कैमरे का संयोग करते सर्वथा नये अर्थअभिप्राय दिए हैं।

मुझे लगता है, कैमरा उनकी कला की तकनीक और माध्यम जरूर है परन्तु छायांकन में मानवीय अनुभुतियों का जो लोक वह रचते हैं उनमें हमारी विचार संपन्न संस्कृति हर ओर, हर छोर उद्घाटित होती है। मसलन स्त्री-पुरूष देह के उनके छायाचित्र। नग्न देह के अनगिनत रूपकों में कल्पनाशीलता  के उर्वर प्रयोगों का उनका यह कला आकाश  द्रश्य  के अनूठे बिम्ब हमारे समक्ष रखता है। यहां जंगल होता मन है तो बोडी रंगांकन में संवेदनाओं का अनूठा उत्स भी। महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे तमाम छायाचित्रों में अपने मॉडल स्वयं दीवान मन्ना ही हैं। स्वयं को अपनी ही संवेदन आंख से देखते कैमरे को टाईपोड  करके लिए है उनके यह छायाचित्र।

बहरहाल, दीवान मन्ना प्रयोगधर्मिता की अनूठी अनुभवजन्यता में छायांकन के जरिए भीतर के अपने कलाकार को बार-बार बाहर लाते हैं। अस्सी के दशक  में दीवान ने श्वेत-श्याम  छायाचित्रों के अंतर्गत समय के अवकाष को पकड़ते मानवाकृतियों के जरिए भिन्न भाव-भंगिमाओं के साथ ही छवि स्थापन्न संवेदना को अपने कैमरे से मुखरित किया था तो 1985 के दौरान देश  में हुए साम्प्रदायिक दंगों, हिंसा की तीव्रता को छायाचित्र विषय बनाते उन्होंने पेंटिंग  और छायाचित्रों का एक प्रकार से फ्यूजन किया था। तब चित्रों के नेगेटिव अक्सों के साथ ही रक्ताभ आकाष में, काले घने अंधेरे, अखबार में लिपटेपन में हिंसा के उनके छायाचित्र प्रतीक और बिम्ब छायांकन को सर्वथा नये अर्थ दे रहे थे। कभी उन्होंने अपरिचय के समुद्र को व्याख्यायित करती छायाचित्रों की एक सीरीज बनायी थी। झीने आवरण में लिपटी नारी देह के बहाने तब उन्होंने प्रवाहमय रूपाकारों का सुगठित संयोजन अपने कैमरे से किया था।

दीवान मन्ना के छायाचित्र विचार संपन्न संस्कृति का अनूठा प्रवाह लिए हैं। इस प्रवाह में देह का व्याकरण है, हिंसा और शांति का चाक्षुष रूप है, पारदर्शिता  में अपरिचय की परिभाषा है और है मनुष्य की अंर्तनिहित भावनाओं, संवेदनाओं का अनूठा उजास भी। शब्द संवेदना के साथ चित्रात्मकता का सांगीतिक आस्वाद कराते दीवान छायांकन के जरिए कला की नई भाषा गढ़ते है। इस नई भाषा में कैनवस और चलचित्र का आस्वाद होता है। भले उनके छायाचित्र बहुत से स्तरों पर सामाजिक सीमाओं को लांघते भी हैं परन्तु संवेदना की हमारी आंख को छायाकला की नई रौशनी  भी अनायास ही देते हैं।

डॉ.राजेश कुमार व्यास का राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर
 प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" 5-3-2011

Friday, February 25, 2011

अर्थ के आग्रह से मुक्त कलाकृतियां


हिम्मत शाह की कला में अर्थ का आग्रह नहीं है। चित्रकृति बनायी है तो किसी खास विषय, विचार को उसमें संप्रेषित नहीं करते हुए वह उसमें सदा कुछ नये की तलाश करते रहे हैं और स्कल्पचर बनायें है तो वह भी पारम्परिक आकारोें की ऐकमेकता से मुक्त रहे हैं। उनकी सामग्री, माध्यम और तकनीक निरंतर बदलती रही है। खंड-खंड अनुभवों की समग्रता के साथ उनकी हर कलाकृति में स्पेस की प्रतीति अलग से होती है। सर्जन में वह व्यक्तियों, चीजों को जैसी है, वैसी नहीं दिखाकर बल्कि उससे भी आगे किसी एक अर्थ से मुक्त करते सर्वथा नये रूपों में उद्घाटित करते रहे हैं।

मूर्त के साथ अमूर्तन के उनका कला लोक सर्वथा नये चाक्षुष अनुभव के भव में प्रवेश कराता है। स्कल्पचर की उनकी सर्जन प्रक्रिया में कभी रचनात्मकता की अनंत खोज में उन्होंने मूर्ति से निकले, उभरे कईं तरह के हाथ दिखाए थे। बाद में उन्होंने ‘हैड्स’ का अनोखा संसार भी रचा। चेहरोें के इस भव में मुखाकृतियांे में आदिम मानव के साथ ही आधुनिकता भी हर ओर, हर छोर व्याप्त है। रेखाओं से उनका सघन नाता आरंभ से ही रखा है। लाईन वर्क की गहराईयों में जाते वह उनसे खेलते रहे हैं, उनमें रमते रहे हैं, उनके जरिए अपने भीतर के तनाव और बाहर के जगत के संत्रास को निरंतर उद्घाटित भी करते रहे हैं। उनकी कलाकृतियांे को किसी एक अर्थ नहीं दिया जा सकता। आशय की तलाश उनमें की भी नहीं जानी चाहिए क्योंकि उनकी कला और कलाकृतियां किसी एक समग्र का ही अनुभव हैै। किसी एक अर्थ में परिभाषित नहीं किया जा सकता। खंड-खंड उनसे पिछले कुछ समय के दौरान निरंतर संवाद हुआ, कहने लगे, ‘मैं आशयहीनता में ऊर्जा की तलाश करता हूं।’

खास बात यह भी है कि अपनी कला को प्रचारित करने की भी कभी कोई चाह उनमें नहीं रही है। कुछ समय पहले ही उन्होंने स्कल्पचर की नयी श्रृंखला निर्मित की है ‘होमेज टू राजस्थान’। ब्रोंज के उनके बहुत से रूपाकारों के शीर्ष पर एक पताका लगी हुई है। ठीक वैसी ही जैसे मंदिरों में लगी होती है।... हर रूपाकार में पारम्परिक मंदिर स्थापत्य और राजस्थान की पारम्परिक हवेलियों, घरों के स्थापत्य शिल्प की स्मृतियां हैं। इसे देखते मुझे लगता ंहै वह राजस्थान की समृद्ध स्थापत्य परम्पराओं, घरों के बाहर मांडे जाने वाले मांडणों और लोकचित्रकृतियों के लाईन वर्क को भी उनमें जी रहे हैं परन्तु ऐसा करते हुए भी उनकी रूपाकृतियों में औचक उभरे नये प्रतीक और बिम्ब लुभाते हुए देखने की नयी दीठ देते हैं। स्कल्पचर का उनका कला संसार बहुआयामी है। वह एक अधबने स्कल्पचर को दिखाने लगते हैं। लम्बी लैम्पनुमा आकृति, किसी पेड़ की भांति टेढ़ी-मेढ़ी परन्तु अडिग होते हुए भी औचक ऊंचाई में मोड़ लेती हुई। सतह में दो-तीन लकड़ीनुमा सहारे। पूरे ही स्कल्पचर में किसी कलाकृति में होने वाले लाईन वर्क, गाफ्रिक्स की बारीकी को भी अनुभूत किया जा सकता है और एक अलग तरह का स्पेस भी वहां दिखाई देता है। मुझे लगता है, हिम्मत शाह स्कल्पचर में ड्राईंग करते हैं। वह ब्रोंज, मिट्टी, प्लास्टर आॅव पेरिस संे लेकर बहुत से स्तरो ंपर रूपाकार रचते हैं। उनकी पहले की आकृतियां में ‘हैड’ की प्रधानता थी।... आशय मुक्त रूपाकारों में टैक्सचर, स्थापत्य और शिल्प सौन्दर्य को एक प्रकार से उन्होंने साधा है। एक अनूठा सौन्दर्य बोध भी उनकी आकृतियां लिए है। इस सौन्दर्यबोध में उभरे प्रतीक और बिम्ब हमारे भीतर की संवेदना को जगाते हैं।

सच! उन्होंने जो किया है, वह हमारे यहां न तो चित्रकला में हुआ है और न ही मूर्तिकला में। बंधी बंधायी लीक से परे। किसी शैली विशेष से मुक्त। उनके यहां अपनी कला के किसी अर्थ का आग्रह नहीं है। संवाद होता है तो कहते हैं, ‘शैली ठहराव लाती है। आप फिर उससे आगे बढ़ नहीं सकते। कोई बिन्दु, कोई क्षण यदि ठहर गया तो फिर शेष रहेगा ही क्या! अंत है फिर तो।’
डॉ. राजेश कुमार व्यास का "डेली न्यूज़" में प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ  "कला तट" दिनांक 25-2-2011

Saturday, February 19, 2011

कला, कलाकार और कलाकृतियां की यादों का वातायन




अखिलेश  के यहां स्म्रतियों की अनूठी कैनवस भाषा  हैं। ऐसी जिसमें संवेदनाओं का अपनापा है। मानव मन के उत्सवधर्मिता कोलाज की चित्रभाषा के अपने कहन में वह संवाद के लिए निरंतर हमें उकसाते है। प्रथमतः उनकी कलाकृतियों का आस्वाद करते यही धारणा बनती है। संयोग देखिए, उनके लिखे की पढ़त में इसकी पुष्टि  भी हो जाती है। राजकमल प्रकाशन ने हाल ही उनकी ‘अचम्भे का रोना’ जो पुस्तक प्रकाशित  की है उसमें कैनवस के समानान्तर, उससे इतर कला और कलाकारों के अंतरंग और बहिरंग में जाते कला अनुभवों की एक नई भाषा जैसे उन्होंने विकसित की है। अपनी इस भाषा में वह रजा, अम्बादास, रामकुमार, हुसैन, मनीश  पुस्कले, प्रभाकर बर्वे, नागजी पटेल, जनगणसिंह श्याम अवधेष यादव, मनजीत बावा जैसे ख्यात कलाकारों के अंतरंग में भी गए हैं और बहिरंग में भी।

कला और कलाकृतियों के यादों के अपने वातायन में वह द्रष्टि  स्पष्टता  में रंग और रेखाओं की ही नहीं बल्कि उन्हें बरतने वालों के मन के भीतर जाते, उनकी सोच से भी अनायास ही साक्षात् कराते हैं। मसलन वह जे.स्वामीनाथन की कलाकृतियों की वस्तुहीनता पर जाते रूप के विलोपन में इंच दर इंच चित्रित उनके कैनवस की बारीकियों को बांचते हैं तो हुसैन के कलाकर्म को उनके व्यक्तित्व के आईने से निहारते वह सहज उनकी कविताओं को याद करते हैं, किस्सागोई का बयान करते हैं और बहुत से वह अनछुए पहलू भी बताते हैं जिनमें उनके चित्रों में निहित संकेताक्षरों की कथा है, याद दिलाने पर वादा निभाने के लिए मुम्बई से औचक दिल्ली पहुंचने की दास्तां भी। अनुभूति के इस खरेपन में अखिलेश  कलाकारों के चित्र संस्कारों से भी अनायास ही साक्षात् करा देते हैं।

जनगण के चित्रों को वॉन गॉग के बरक्स रखते वह दोनों की ही चित्रकला की रूढ़ियां तोड़ने की विशेषताओं  में हमें ले जाते हैं तो रजा के कैनवस को रंगों का घर बताते है। अम्बादास के चित्रों में भटकते शुक्राणु  रूप संधान में वह रचने के क्षण के सौन्दर्य को अनायास ही पकड़ते हैं तो प्रभाकर बर्वे के चित्रों की उन बारीकियां में भी हमें ले जाते हैं जिनमें कोई चित्रात्मक कविता समय और अवकाश  के संबंधों को गहरे से व्याख्यायित करती है। प्रकृति प्रदत्त सहज बोध से देह के द्रश्य  को चित्रित करते कलाकार के रूप में वह रामकुमार को याद करते हैं और नागजी पटेल को हेनरी मूर के समक्ष रखते है। मनीश पुश्कले के चित्रों को कविताओं की तरह पढ़ना संभव बताते वह मनजीत बावा के रूपाकारों, रंग के अचरज लोक  में उनके व्यक्तित्व की तलाश करते हैं तो स्वयं अपनी रचना प्रक्रिया को कैनवस के अंतिम सत्य तक पहुंचने की खोज बताते वह कला की खोज को सत्य की खोज बताते हैं। पुस्तक के अंत में अशोक  वाजपेयी का अखिलेश  से बेहद महत्वपूर्ण संवाद है। इसमें वह कहते हैं कि कला के एकान्त में ही सार्वजनिकता जन्म लेती है।

हमारे यहां कलाकारों ने दूसरों की कला और उनके व्यक्तित्व पर कम ही लिखा है। इस दीठ से ‘अचम्भे का रोना’ किसी कलाकार की उदात्त चेतना में कला और कलाकारों के बारे में हमें सर्वथा नये अर्थबोध देती अनुठी कला पुस्तक है। इसमें दूसरे की कलाकृतियों, उनके अपनापे में जाते सहज, सरल और आत्मीय हैं हमारे अखिलेश!
"डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश  कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 18-02-2011


Friday, February 11, 2011

फोटोग्राफी का नहीं छाया-कला का सम्मान


छायांकन की सुदीर्घ यात्रा का यह वह दौर है जब छापाचित्र, पेंटिग और मूर्तिशिल्प इन तीनों में ही छायाकारी का प्रभाव देखा जा सकता है। कभी घटिया मानकर भले फोटोग्राफी को कला मंे स्वीकार नहीं किया गया परन्तु कला स्वरूपों की सृजन प्रक्रिया का आज छायांकन ही प्रमुख आधार बनता जा रहा है। इधर न्यू मीडिया आर्ट की जो अवधारणा उभरी है, उसका तो प्रमुख आधार ही फोटोग्राफी ही है।

बहरहाल, पिछले दिनों पद्म अलंकरणों की सूची में होमाई व्यारावाला का नाम देखकर सुखद अचरज हुआ। चलो, फोटोग्राफी आखिर कला का दर्जा पाते सम्मानित हो ही गयी। होमाई व्यारावाला आजादी से पहले से छायांकन कर रही है। देश की पहली महिला फोटोग्राफर। आजादी से पहले और आजादी के बाद के भारत के बेहद संवेदनशील क्षणों को उन्होंने निरंतर अपनी छाया-कला में संजोया है। जब-तब पत्र-पत्रिकाओं में उनके बारे में पढ़ते उनके छायाचित्रों सेे रू-ब-रू भी होता रहा हूं परन्तु संयोग देखिए, कुछ समय पहले ही जब दिल्ली मंे था तब नेशनल मॉर्डन गैलरी ऑफ आर्ट में पहली बार उनकी छायाचित्र प्रदर्शनी को देखने का भी सुअवसर मिल गया।

अलकाजी फाउण्डेशन द्वारा राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय में प्रदर्शित उनके छायाचित्रों को देखते मुझे लगा, जो चित्र होमाई व्यारावाला ने अपने कैमरे से लिए हैं, वे इतिहास के दस्तावेज भर नहीं है बल्कि उनमें कलात्मक सौन्दर्य, अंतर्मन संवेदना का अनूठा भव भी है। मसलन लॉर्ड माउन्टबेटेन, मार्शल टीटो, एजिलाबेथ, रिचर्ड निक्सन, डायना, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपिता महात्मा गॉंधी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, विजयलक्ष्मी पंडित, इन्दिरा गॉंधी के जीवन के जो प्रसंग उन्होंने अपने कैमरे से कैद किए हैं, उनमें यथार्थ का अंकन भर नहीं है बल्कि समय के साथ व्यक्तियों, वस्तुओं के रूप, टैक्सचर की अनुभूत गति को भी उन्होंने भीतर की अपनी संवेदना आंख से गहरे से पकड़ा है। फोटो जब कोई खिंचवाता है तो सजग हो जाता है, उसकी यह सजगता छायाकारी की स्वाभाविकता को भंग कर देती है।...एक प्रकार से खींचे गए फोटो में तब संवेदना तिरोहित हो जाती है। वह साधारण दृश्य चित्र भर रह जाता है परन्तु होमाई व्यारावाला के छायाचित्रों का आकाश इससे परे है। उन्होंने अपने कैमरे से ऐतिहासिक क्षणों को भी कैद किया है तो अपनी उस तीसरी संवेदन आंख का सदा सहारा लिया है जिसमें समय के अवकाश को पकड़ा जाता है। मसलन महात्मा गॉंधी की शवयात्रा के क्षणों को कैद करते उनके कैमरे ने हजारों-हजार नम आंखों का जो दर्शाव किया है, उसमें निहित भावनाओं को देखने वाला आसानी से पढ़ सकता है। मुझे लगता है, यह उनकी तीसरी संवेदन आंख ही है जिसमें राजनीतिक घटनाक्रमों को कैद करते हुए भी उन्होंने सूक्ष्म वस्तुओं, दृश्यों के बहाने तत्कालीन परिवेश का एक प्रकार से छायांकन इतिहास रचा है। इसमें कलात्मक सौन्दर्य है। उनके छायाचित्रों के अद्भुत लोक में जाते औचक आंख ठहर जाती है जब संजय गॉंधी के जन्मदिन पर बिल्ली का मुखौटा लगाए पं. नेहरू को हम देखते हैं। तब भी ऐसा ही होता है जब जिन्ना भारत में अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेस करते हुए विभाजन के बोये बीज का अंकुर फूटा रहे हैं। छायांकन के इस लोक में तमाम दूसरे वह घटनाक्रम भी हैं जिनमें किसी विशेष समारोह के बहाने उसमें निहित विषय की संवेदना को स्वर दिया गया है।

होमाई व्यारावाला 98 वर्ष की हैं। पदम् अलंकरण कैमरे के पीछे की उनकी उस तीसरी संवेदन आंख का सम्मान है जिसमें उन्होंने इतिहास की घटनाओं, प्रसंगों को भीतर के अपने कलात्मक बोध से जिया है। फोटोग्राफी का नहीं यह छाया-कला का सम्मान है।
(कला तट, 11-2-2011)

Friday, February 4, 2011

रेखाचित्रों में गति का आख्यान



चारकोल माने मुलायम कोयले की शलाका। कागज और कैनवस पर इस माध्यम से हमारे यहां चित्र बनाने की सुदीर्घ परम्परा रही है परन्तु कला में यह चकाचैंध का वैश्विक दौर है। चमक-दमक में पारम्परिक रेखाएं जैसे कहीं लुप्त होती जा रही है। ऐसे में पिछले दिनों शिमला के कलाकार हिम चटर्जी के चारकोल जैसे पारम्परिक माध्यम में कागज और कैनवस पर किए कार्य को देखकर सुखद अचरज हुआ। लगा, जो बात श्वेत-श्याम में कईं बार रेखाएं कह देती है वह शायद रंगों के जरिए कही ही नहीं जा सकती थी।

बहरहाल, हिमाचल प्रदेश मंे शिमला, सोलन, मंडी, हमीरपुर आदि स्थानों में प्राचीन काल से ही भैंसो के मलयुद्ध की परम्परा रही है। हिम चटर्जी इधर शिमला के पास ही हिवान गांव में वास कर रहे हैं। उन्हें यह परम्परा इतनी भायी कि रेखीय चित्रों की पूरी की पूरी ‘फैलो-बफेलो’ श्रृंखला ही बना दी। रेखाओं की लय और स्वाभाविक सौन्दर्य में उन्होंने भैंसो के मलयुद्ध को अपने तई जीते आंखों के सामने इस परम्परा के दृश्यों को जैसे साकार किया है। इन्हें देखते औचक पिकासो के बुल की भी याद आती है। वही फोर्स, वही गति। रेखाओं का वही सधा हुआ रूप सौन्दर्य।

गत्यात्मक प्रवाह में भैंसों की लड़ाई की चारकोल निर्मित हिम चटर्जी की छाया सदृश्य आकृतियों की कंपोजीशन इस कदर सधी हुई है कि दृश्य को सहज पढ़ा जा सकता है। कहीं कोई बनावट नहीं। वास्तविक की प्रस्तुति के बहाने रेखीय आकृतियों में वह अमूर्तन के जरिए मलयुद्ध के दौरान आवाजों के शोर को भी जैसे कागज और कैनवस पर ध्वनित करते हैं। भैंसे लड़ रहे हैं। इस लड़ाई में इस्तेमाल योद्धाओं के बल को उन्होंने कैनवस और कागज पर गहरे से पकड़ा है और फिर उसे गढ़ा है। यथार्थ के इस पुनर्सृजन में लाईन कार्य में भैंसों और उन्हे लड़ाने वाले लोगों का जो रूपकात्मक संयोजन वह करते हैं, उसमें वास्तविकता के प्रति स्वतः ही औत्सुक्य भाव पैदा होता है।

बारीक बाह्य रेखाओं में भैसों की भीड़न्त के दृश्यों में हिम चटर्जी आकारों के सरलीकरण के बावजूद गति का गजब दर्शाव करते है। वह दृश्य की गति को पकड़ते रेखाओं से उसे स्पन्दित करते आंखों के सामने जीवन्त करते हैं। सीधी सहज रेखा गति के दर्शाव में कब धूंआ सरीखी होती गत्यात्मक प्रवाह की संवाहक बन जाती है, पता ही नहीं चलता। खास बात यह भी कि उनकी रेखाओं में शास्त्रीयता का सौष्ठव तो है परन्तु आधुनिक कला की प्रयोगधर्मिता का ताना-बाना भी है। भैंसो को गुत्थम-गुत्था होते दिखाते वह आस-पास उड़ती मिट्टी की भी रेखीय अनुभूति कराते हैं तो उन्हें भीड़ाने वाले लोगों के उत्तेजकता की भी दृश्य अनुभूति कराते हैं। ऐसा करते रेखाओं को जोड़ते, एकमेक करते अनायास ही वह हमारे भीतर के सौन्दर्यबोध को जगाते हैं। गति के आभास की निर्मिती में वह मलयुद्ध परम्परा के सूक्ष्म और व्यापक अर्थ संदर्भ भी अनायास ही देते हैं। लड़ाई के दौरान भैंसों के पांवो, उसके सिंगो और तमाम दूसरी हरकतों और अन्र्मुखता के उनके दृश्य दर दृश्य रेखीय संयोजन की खास बात यह भी है कि कैनवस और कागज आपको चलचित्र का सा अहसास कराते हैं। यूं लगता है, आप स्वयं मलयुद्ध देखने पहुंच गए हैं।

पहाड़ की संस्कृति का व्यापक फलक प्रस्तुत करते है ‘फैलो-बफेलो’ श्रृंंखला के चटर्जी के यह चित्र। यह रेखाएं ही हैं जो दृश्य के संयोजन को सुगठित करती है। इस दीठ से लयबद्ध रेखाओं के आलेख में चटर्जी भैंसों के मलयुद्ध के बहाने परम्परा के एक काल को प्रत्यक्ष रूप से हमारे समक्ष जीवन्त करते हैं। मुझे लगता है, उनके यह रेखांकन स्वयं में एक स्वायत्त कला रूप हैं। गति का अनूठा आख्यान हैं इनमें। बेशक इन्हें देखा ही नहीं जा सकता, पढ़ा भी जा सकता है।
(कला तट 4-11-2011)