Friday, February 14, 2014

कला मेला बने उत्सवधर्मिता का संवाहक


 कलाकृति : चिंतन उपाध्याय 
राजस्थान ललित कला अकादमी का कला मेला इस बार जवाहर कला केन्द्र के शिल्प ग्राम में हुआ। पिछली बार यह रवीन्द्र मंच पर हुआ था। इस बार मेले के स्टाॅलों पर सजी कलाकृतियों का आस्वाद करते लगा, स्थान विशेष की बजाय कलाकृतियों का अब वैश्विक मुहावरा बनता जा रहा है। कलाओं में रूपायन की विविधता जैसे सिमटती जा  रही है। कहीं ओर जो हो रहा है-वही हर छोर हो रहा है। वैश्विकरण के फायदे भी हैं परन्तु बड़ा नुकसान यह भी है कि विविधता की हमारी समृद्ध धरोहर से हम इसके कारण निरंतर वंचित भी होते जा रहे हैं।
बहरहाल, कला मेले का यह लाभ तो है कि राज्यभर के कलाकारों से एक स्थान पर ही संवाद, भेंट का अवसर हो जाता है। परन्तु कला मेले के आयोजन का जो तरीका है, मुझे लगता है उसमें बदलाव की दरकार है। कलाकारों से यह सुनना कि मेले में उनकी कलाकृतिया बिकी नहीं और इस दृष्टि से कलामेले की उपयोगिता पर बहस गैरजरूरी है। कलाकृतियां बिके पर कलामेलों में यह कार्य आर्ट गैलरी करे तो अधिक बेहतर है। बाजार में कलाकार स्वयं ही अपनी कलाकृतियां बेचने बैठ जाएगा तो फिर दूसरी वस्तुओं और कलाकृतियों के विक्रय में भेद ही क्या रह जाएगा! यह समझने की जरूरत है कि कलाकार बाजार का वह विक्रेता नहीं है जिसका उद्देश्य वस्तु को बेचकर अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। ऐसा ही अगर होगा तो फिर मेले में बिकने वाली कलाकृतियों में खरीदार की पसंद को लेकर ही भविष्य में कलाकृतियां सृजित नहीं होगी। यह अगर होता है तो फिर क्राफ्ट-कला के भेद का क्या होगा! आम तौर पर जिन कला मेलों में सम्मिलित होता रहा हूं, वहां पर कलाकृतियां तो होती है परन्तु कलाकारों को वहां अपनी कलाकृतियां बेचते नहीं देखा। आर्टगैलरी स्टाॅल लेती है, वहां जरूर अपनी कलाकृति के साथ बहुतेरी बार सबंधित कलाकार मिल जाता है। यही होना भी चाहिए। कलाकार इतना दीन-हीन नही ही दिखना चाहिए कि वह स्वयं स्टॅाल बुक कराए, उस पर बाकायदा बैठे और फिर अपनी कलाकृतियों की दर्शकों के लिए नुमाईश करे। 
राजस्थान ललित कला अकादमी की अध्यक्ष श्रीमती किरण सोनी गुप्ता स्वयं कला संवेदना से लबरेज व्यक्तित्व है, कलाकार है। कलाओं पर मौलिक सोच भी वह रखती ही हैं। ऐसे में उनके जरिए वर्षों से अकादमी में इस तरह की चली आ रही परम्पराओं में बदलाव की अपेक्षा तो बनती ही है। क्यों नहीं यह हो कि कला मेला हो परन्तु वहां कलाकार स्टाॅल पर बैठे रहने से मुक्त हो। वह सम्मान से वहां आए, अपने परिजनों को भी लाए और समूह में प्रदर्शित अपनी कलाकृतियांे का चाव से उन्हंे आस्वाद कराए। कला फिल्मों का दर्शक बनते कला बारीकियों में जाए, अपने तई कलाओं के संवाद में हिस्सा भी ले। यह हो सकता है। अकादमी को यह भर करना है कि कलाकारों से मेले के लिए कलाकृतियां मंगवाई जाए। जवाहर कला केन्द्र कलादीर्घाओं में बाकायदा उनका प्रदर्शन हो और शिल्पग्राम तब कला संवाद का मंच बने। आर्ट गैलरी, शिक्षण संस्थाओं, कला पुस्तक विक्रेताओं, कला प्रशिक्षण संस्थानों को अकादमी स्टाॅल दे और यह सब कलाकारों की कलाकृतियां का विपण्पन करे। कला प्रदर्शनी के साथ मेले में प्रतिदिन कलाओं की नवीन उभर रही प्रवृतियां, परम्परागत धरोहर और तमाम दूसरे विषयों पर कलासंवाद, फिल्म प्रदर्शन जैसी गतिविधियां की जा सकती है ताकि कलाओं पर लिखने वाले, कलाकार और कलाप्रेमियों के बीच संवाद की रहने वाली कमी को पाटा जा सके। 
कलाएं व्यक्ति में उत्सवधर्मिता का संचार करती है। कला मेलों के आयोजन का उद्देश्य भी शायद यही है तो फिर क्यों न इसके लिए अकादमी अपनी चली आ रही परम्पराओं में बदलाव कर कला के लिए कुछ सुखद की संवाहक बने!

Sunday, February 9, 2014

पुस्तक चर्चा में "रंग नाद"


राजस्थान पत्रिका, रविवारीय के आज के अंक में पुस्तक चर्चा में "रंग नाद" है.
आप भी करें आस्वाद-

http://epaper.patrika.com/c/2349105 

Friday, February 7, 2014

शास्त्रीय चिन्तन से जुड़ी कला

      डॉ. चित्रा शर्मा निर्मित वृत चित्र-कत्थक का रायगढ़ घराना

चित्रकला, मूर्तिकला, छायांकन या फिर ऐसी ही किसी अन्य दृश्य कला में सादृश का अर्थ यथार्थ का अनुकरण है, वास्तव का बिंब। परन्तु अनुकरण कैसा? लौकिक नहीं। अनुकरण वह जिसमें अमूर्त को मूर्त करने के संदर्भ निहित होते हैं। संगीत को चित्र में कैसे परिवर्तित करेंगे? वह तो अमूर्त है।...नृत्य की किसी भंगिमा को अमूर्त कैसे कहेंगे? वह तो दिख रही होती है! मुझे लगता है, मूत-अमूर्त हमारी मन:सिथति है। इसीलिए तो संगीत के अमूर्त को हर छोटे से छोटे भाग में, अंश में उसके स्वभाव को जब सांगीतिक रूप में खोजा जाएगा तो वह संगीत का चित्रण होगा। ऐसे ही नृत्य की की किसी भंगिमा में जुड़े कहन के किसी संदर्भों की तलाश करेंगे तो दृश्य में अदृश्य की खोज औचक ही हो जाएगी। नृत्य का अमूर्तन उसके रचे भाव छंदो में ही तो है!
बहरहाल, कथक के रायगढ़ घराने पर डा. चित्रा शर्मा ने अदभुत वृत्तचित्र दूरदर्शन के लिए बनाया है। इसका आस्वाद करते लगता है, कथक किसी भी घराने का हो, वह शास्त्रीयता के संदर्भों में जीवन के मर्म और संवेदनाओं को हमारे समक्ष उदघाटित करता है। वृत्तचित्र में राजा चक्रधर सिंह और उनके द्वारा प्रवर्तित कथक के रायगढ़ घराने पर सृक्ष्म सूझ है। संगीत, नृत्य मर्मज्ञ लेखिका डा. चित्रा शर्मा कथक के रायगढ़ घराने के अतीत में ले जाती हुर्इ कथक में नृत्य से जुड़े शब्दों के संस्कृत शास्त्रों की बारीकियों से रू-ब-रू कराती है। कथक नर्तकों से संवाद के जरिए, उनकी नृत्य प्रस्तुतियों के जरिए और हां, स्वयं के अनथक शोध के जरिए भी। कथक से जुड़े संदर्भों की भरमार तो खैर दूरदर्शन के उनके उस वृत्तचित्र में है ही पर बड़ी बात उसमें निहित कथक के रायगढ़ घराने से जुड़े अछूते वह संदर्भ हैं जिनमें कथक की शास्त्रीयता के साथ कहन की लय को अंवेरा गया है। चित्राजी ने राजा चक्रधरसिंह प्रवर्त कथक में बंदिषों, तोडो, परन आदि के साथ जो कुछ नया जोड़ा गया, उसके बारे में बहुत कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां दी है। यह जानकारियां भी संवाद के जरिए नहीं है बलिक नृत्य की भाव-भंगिमाओं के जरिए देने का प्रयास किया है। मैं मसझता हूं, किसी भी दृश्य चितराम के अमूर्त निहितार्थ यही है कि थोड़े में बहुत कुछ कहा जाए। ऐसा जिससे दृश्य के साथ-साथ उससे जुड़ा तमाम भी अमूर्त में आंखों के समक्ष जीवंत हो उठे। इस दीठ से कथक के रायगढ़ घराने पर चित्राजी के दूरदर्शन के लिए किये इस कार्य की कूंत होनी भी जरूरी है। इसलिए कि नृत्य, संगीत में जो कुछ होता है-अभी तक वह कुछेक लोगों की ही जैसे जागीर बन गया है।
डेली न्यूज़, 7 फरवरी, 2014 
रायगढ़ घराने के कथक की अमूर्तता में जाएंगे तो कथक के जयपुर घराने की भी याद आती है। जयपुर घराने में पांवो से शुद्ध बोल निकासी पर जोर है। माने हर बोल पैर से निकाला जाता है। पद संचालन पर वहां अधिक ध्यान है। लय बांधते हुए नर्तक पैर की भाषा जैसे रचता है। और यह भाषा अमूर्त होते हुए भी दृश्य के अनंत संसार से हमें रू-ब-रू कराती है। और फिर यह भी तो है कि कथक में नर्तक भाव-मुद्राओं से पूरी कहानी नहीं बांचता है। वह उसमें निहित किसी एक क्षण को ही जीवंत करता है। यही नृत्य का वह अमूर्तन है जिसमें दृश्य की किसी एक झलक की स्मृति भर जगायी जाती है।
कथक हमारे शास्त्रीय चिंतन और सरोकारों से जुड़ी कला है। डा. चित्रा शर्मा कहती हैं, 'लोकनाटयों की समृद्ध परम्परा को नृत्य की शास्त्रीय परम्परा से जोड़ा जा सकता है पर नाटय प्रस्तुतियों के साथ कोरियोग्राफी का खेल ही यदि नृत्य में होता है तो वह संस्कृति के साथ धीरे-धीरे अपसंस्कृति का प्रवेश ही होगा। इधर कथक के नाम पर जो कुछ अनर्गल हो रहा है, उसका सच क्या यही नहीं है! 



Tuesday, February 4, 2014

कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध



संगीत में स्वरों से भाव सृष्टि है तो चित्र में रूप-रेखाओं से। हमारे यहां तो स्वरों में भी रंगों का उल्लेख है। राग-रागिनियों का चित्रात्मक प्रदर्शन इसी का द्योतक है। मुझे लगताहै, कलाएं कलाकार की स्वानुभूति को रूपायित करती है। पर यह ऐसे ही नहीं होता। इसके लिए साधनारत होना पड़ता है। अपनी कला ही नहीं दूसरी कलाओं में भी जाना होता है। प्रकृति को अनुभूत करना होता है। इसी से मन के संवेग रंग-रेखाओं के साथ संगीत, नृत्य, नाट्य में परिणत होते हैं। तभी कोई कलाकृति समग्रता में हमें लुभा पाती है। 
सर्बरी राय चैधरी ने अपनी मूर्तिकला में बहुत से स्तरों पर संगीत की दृश्य छवियां निर्मित की हैं। यह ऐसी हैं जिनका आस्वाद करते संगीत से जुड़ी स्मृतियां औचक ही मन में झंकृत होने लगती है। इसके पीछे शायद उनकी वह दृष्टि रही है, जिसमें एक कला दूसरी कला को अपने तई अंवेरती है। एक दफा वह प्रख्यात सरोदवादक अली अकबर खां को अपनी मूर्तिकला में ढालना चाह रहे थे। उन्होंने देखा, वाद्य बजाते तो उनका चेहरा पूरी तरह बदल जाता। वह पूरी तरह से तल्लीन और केन्द्रित हो जाते। मानो किसी चिंतन में गहरे डूब गए हों। सर्बरी राय चैधरी लिखते हैं, ‘जब भी उन्हें वाद्य बजाते देखता, बुद्ध की तस्वीर नियत ढंग से मेरे दिमाग में बैठ जाती। मैं उस दृश्य को कैद करना चाहता था। इसीलिए मैंने उन्हें ऐसी मुद्रा में बैठने का आग्रह कर राजी किया। पर चेहरे का वैसा हाव-भाव मुझे दिखाई तब भी दिखाई नहीं दिया। दूसरे दिन उनका बेटा ध्यानेश उन्हीं का अनुकरण करते सरोद बजा रहा था। उसने गलत धुन बजाया। और बस मैंने पा लिया। मुझे जिस दृश्य की तलाश थी, मुझे मिल गया। मैं सम्मोहित हो गया। मेरे लिए यह ईश्वर को पा लेने जैसा था। मैंने उनकी मूर्ति बना ली।’


डेली न्‍यूज, 31 जनवरी, 2014

जिस दृश्य छवि को मूर्तिकार पाना चाहता था, उस्ताद अली अकबर खां को वैसी ही छवि में मूर्ति बनाने के लिए बैठाया भी गया परन्तु तब वह छवि अपनी कला के लिए कलाकार नहीं पा सका। क्यों? इसलिए कि कला में जो कुछ दिखाई देता है-वही सच नहीं होता। बड़ा यथार्थ वह नहीं होता जो हम देख रहे होते हैं, वह होता है जो देखने के बाद हमारे मन में घट रहा होता है। आनंद कुमार स्वामी ने शायद इसीलिए कलाओं को ट्रांसफाॅर्मेशन कहा है। क्योंकि वहां देखे हुए की नकल नहीं होती। वह रूपान्तरण होता है। एक प्रकार से पुनसर्जन। यह प्रभावी तभी होता है जब कलाकार का नाता अपनी कला से ही नहीं होता बल्कि तमाम दूसरी कलाओं से भी होता है। वह अपनी कला में रम रहा होता है परन्तु दूसरी कलाएं उसके लिए तब प्रेरणा के रूप में सर्जन को संवारने का काम कर रही होती है। यही किसी कला की समग्रता भी है।
कहते हैं, राजा रवि वर्मा सुबह चार बजे उठकर चित्र बनाते थे। प्रकाश-छाया के सूक्ष्म अध्ययन और आकलन के लिए यह समय शायद उनके लिए सर्वथा उपयुक्त रहता होगा। अंधेरे की विदाई, उजास का आगमन। प्रकृति की यात्रा दीठ के संवाहक बनकर ही उन्होंने प्रकाश-छाया को अपने चित्रों में जीवंत किया। कलाकार जब तक प्रकृति में घुले रंगों से तादात्म्य नहीं करेगा, वह अपने तई रंग-रेखाओं से चाहकर भी दृश्य की जीवंत छवियां उकेर ही नहीं पाएगा। माने प्रकृति में निहित जो कला है उससे भी कलाकार अपने को जोड़े। इसी से उसकी कला समृद्ध होगी। एक कला इसी तरह दूसरी कला को सदा समृद्ध करती है।



Friday, January 24, 2014

चिंतन उपाध्याय की कलाकृति "मार्चिंग टुवर्ड्स नो वेयर"

कलाकृति में सौन्दर्य बढ़त

चिंतन उपाध्याय प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। ऐसे जिन्होंने कला में परम्परा में बढत करते हुए बाजार मूल्यों को बहुत से स्तरों पर तय भी किया है। कला दीर्घाओं में उनकी कलाकृतियां लाखों में नहीं करोड़ों में बिकती है। इसलिए कि उन्होंने जड़ होते जा रहे जीवन मूल्यों को अपने तई आधुनिकता का नया कैनवस दिया है। भले उनके कलाकर्म को बहुत से स्तरों पर आधुनिकता से जुड़ी पाश्चात्य संवेदना से अभिहित किया जाता रहा है परन्तु मुझे लगता है एक बड़ा सच उनकी कलाकृतियों का यह भी है कि उनमें भारतीय कला शैलियों की जीवन्तता है। लोक कलाओं का उजास है और हां, बड़ी बात यह है कि किसी एक शैली की बजाय उनमें तमाम भारतीय और योरोपीय शैलियां ध्वनित होती है। सूजा के चित्रों की नग्नता के कुछ अंश भी वहां है, माइकल एंजेलो की मांशपेशियां की याद भी उनके चित्र दिलाते हैं परन्तु मूल बात उनके चित्रों की है, उनमें निहित भारतीयता। पारम्परिक भारतीय चित्रों के सौन्दर्य को वह अपनी कलाकृतियों में ठौड़-ठौड़ अंवेरते हैं।  
कोई एक दशक से निरंतर उनकी कलाकृतियों का आस्वाद करता रहा हूं। याद पड़ता है, जवाहर कला केन्द्र में इंस्टालेशन आर्ट की एक प्रदर्शनी लगी थी। शीर्षक था, ‘टेटूंआ दबा दो’। भू्रण हत्या के केन्द्र में संस्थापन के अंतर्गत इसमें बहुत कुछ भदेस भी था। तब उसके इस संस्थान को देखकर कला में सदा ही सौन्दर्य की तलाश करने वाला मन कुछ विचिलत हुआ। चाहा था, कुछ लिखूं पर लिख कहां पाया! जिस सौन्दर्य को हम अपने तई परिभाषित करते हैं, लेखक मन उसी में जीना चाहता है। कुछ  पूर्वाग्रह चिन्तन की कला को लेकर तभी शायद उपजे और उसके बाद कभी उसके कलाकर्म पर कभी गहरे से गया ही नहीं। 
बहरहाल, मकर सक्रांति पर कलाकार मित्र विनय शर्मा के साथ चिन्तन के घर था। पतंग उड़ाने की उनकी नूंत के साथ। पतंग उड़ाना तो बहाना था, वहां एकत्र होने वाले कलाकारों के सान्निध्य की चाह प्रमुख थी। वहीं चिन्तन के स्टूडियो में उसकी कलाकृतियों से भी रू-ब-रू हुआ। आस्वाद हुआ, आर्ट समिट में भेजे जा रहे एक बड़े से स्कल्पचर का और इस सबसे अलग कुछ समय पहले सृजित उस बड़े कैनवस का भी जिसने चिन्तन के कलाकर्म को लेकर बने पूर्वाग्रहों को मुझसे विलग किया। उस कलाकृति को देख लगा, चिन्तन के कैनवस पर उकेरी मानव आकृतियां तेजी से कहीं बढ़ती जा रही है। किस ओर? कुछ तय नहीं। कसी हुई मांशपेशियांॅं, बल को दर्शाते कदम। दो भागों में विभक्त कैनवस का पाश्र्व लाल से पीलेपन में आगे बढ़ रहा है। गौर किया तो पाया, मार्चिंग के मध्य एक ट्रेन की छाया छवि है। और गौर किया तो अनुभूत हुआ छवियों का सूक्ष्म संसार।  लगा, चिन्तन की कलाकृतियों का नन्हा बालक हस्ट-पुस्ट मांशपेशियों के साथ यंत्रनुमा चलायमान है। गति है, बल है पर यह सब जैसा कि कैनवस का शीर्षक है, ‘कहीं नहीं की दिशा में अग्रसर’ है। 
चिन्तन की यह कलाकृति एक दृश्य के भीतर अनगिनत दृश्यों का लोक है। राजस्थान की मिनिएचर, मांडणे, शेखावटी के कुंओं का स्थापत्य, मुगल शैली के गुम्बद, मिनारें और सभ्यता के इतिहास से जुड़े और भी बहुतेरे अवशेष। कहें, कलाकृति में संस्कृति से जुड़ी संवेदनाओं के मर्म उद्घाटित हुए हैं। हरे पतों, बेलों में प्रकृति भी है पर, यह सब इस कलाकृति का आधा सच है। पूरा सच इसमें निहित वह आधुनिकता है, जिसमें कोरी हुई छाया-छवि में ‘मैकडानल्ड’, ‘टेटूआ दबा दो’ में निहित भ्रूण और कांक्रिट का वह जंगल है जिसमें संवेदना रहित मनुष्य जी रहा है। कलाकृति आधुनिकता की गति को जैसे गहरे से व्यंजित करती है। लगता है, मशीनीकरण में सब कुछ लोप हो रहा है-जीवन मूल्य, मनुष्यता और मनुष्य होने का एकमात्र बोध भी। और इस सबसे साक्षात् कराने वाले कलाकार हैं चिंतन। यह जब लिख रहा हूं, अनुभूत कर रहा हूं-सौन्दर्य हमारी दृष्टि में है। दीठ के विस्तार में! चिन्तन का कलाकर्म दीठ की बढ़त ही तो है!

Friday, January 17, 2014

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

उपभोक्तावादी संस्कृति का साहित्यिक सच 

जयपुर में एशिया का सबसे बड़ा कहा जाने वाला लिटरेचर फेस्टिवल प्रारंभ हुआ है। कुछ दिनों के लिए अब डिग्गी पैलेस देश-विदेश के साहित्य सर्जकों, कला मर्मज्ञों की उपस्थिति से भरा-भरा रहेगा। देखता आ रहा हूं, वर्ष 2006 से ही यह आयोजन हो रहा है। यह सही है, कला, संस्कृति और साहित्य जीवन मूल्यों का पोषण करते हैं। मनुष्य में संवेदनाआंे का वास, जीवन के प्रति उत्साह और उमंग के भाव इनसे ही जगते हैं। स्वाभाविक ही है कि साहित्य उत्सव जैसे आयोजन इसमें महत्ती भूमिका निभा सकते हैं परन्तु यह भी देखे जाने की जरूरत है कि इस तरह के आयोजनों में कौनसे संस्कार समाज को संप्रेषित किए जा रहे हैं? 
डेली न्यूज़, 17 जनवरी, 2014 
यह सच है, भारतीय भाषाओं और विदेशी लेखकों से संवाद का यह तब बेहतरीन मंच रहा परन्तु शनैः शनैः बहुतेरी स्तर पर यह उपभोक्तावाद की पाश्चात्य संस्कृति के प्रसार का संवाहक भी बनता चला गया। गत वर्ष हुए आयोजन को ही लें। साहित्य उत्सव में सम्मिलित होने आए लोगों को ‘ग्रेप फाॅर वेन’ के अंतर्गत शराब कैसे बनती है, इसके बारे में बताया गया। एक दिन आयोजन स्थल के अंदर लगे मूगल टैन्ट में ‘द ओरिजन आॅफ सेक्स’ माने काम क्रिया की उत्पति पर फारामेर्ज दाभोईवाला और विलियम डेलरिम्पेल का तथा टाटा स्टिल फ्रंट लाॅन में ‘सेक्स एंड सेंसिबलिटी: वूमिन इन सिनेमा’ विषय पर शबाना आजमी और प्रसून जोशी का संजोय राॅय से संवाद होते दिखा। और यही क्यों दूसरे विभिन्न सत्रों में लेखक जैसे पहले कभी नहीं कहा गया, वह कहने की होड़ कर रहे थे। केरल के लेखक जीत थाईल ने अपने उपन्यास ‘नारकोपोलिस’ के बतौर अंश गालियों का वाचन किया। स्कूल-काॅलेज विद्यार्थियों को कांचा इलैया ने बलात्कार की जड़ों को वैदिक संस्कृति से जुड़ा बताया और भी ऐसा बहुत कुछ पिछले साहित्य उत्सव में हुआ था।
बहरहाल, मुझे लगता है, कहने को साहित्य उत्सव के अंतर्गत नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने की कवायद के रूप में प्रचारित किया जाता है परन्तु सोचने की बात यह है कि नई पीढ़ी इस तरह के आयोजनों से क्या सीख लेगी? उन्हें पांच दिनी आयोजन में सपनो ंका इन्द्रधनुष दिखाई देता है। यह ऐसा है जिसमें लेखक बन तमाम तरह के ऐशो आराम की जिन्दगी को जिया जा सकता है। नई पीढ़ी सोचती है, उन्हें भी साहित्य की दुनिया में ही आना चाहिए। प्रेम करें और उसकी कहानी लिख दें। मन में जो आए, चाहे वह वर्जित ही हो-उसको अभिव्यक्त कर दें। यही तो लेखन है। अपरिपक्व युवा मन यही सब कुछ सोचता है और लेखन को ही आजीविका बनाने की भी सोच लेता है। पर सोचने की बात यह है कि भारत में कितने आज भी ऐसे लेखक हैं जो अकेले लेखन के बल पर जी रहे हैं? 
बहरहाल, साहित्य उत्सव वह पहल है जिसके अंतर्गत अभिजात्य, मध्यमवर्ग से लेकर आम जन को भोगवादी चकाचैंध अनुभूत करायी जाती है।  साहित्य शायद इसका माध्यम इसलिए बना है कि उस तक हर कोई बगैर किसी झिझक, संकोच के पहुंच जाए। जो छवि साहित्य उत्सव के जरिए साहित्य की बनती है, वह छवि नहीं है। वह गढ़ी गयी छवि है। दिखाई जाने के लिए कुछ समय के लिए गढ़ी गई। आम आदमी उस छवि में ही उलझ जाता है। वैसा ही अपने आपको समझने लगता है। ऐसे में हिन्दी और दूसरी भाषा के साहित्यकार जिन्हें स्थानीय आयोजक अपनी बुद्धि चातुर्य से बुलाते हैं, उनके समक्ष समस्या यह भी हो जाती है कि औचक ही वह अपने को उन व्यावसायिक लेखको के समक्ष समझने लगते हैं जो दरअसल इस छवि को गढ़ने वालों की भूमिका में वहां होते हैं। 

Friday, January 10, 2014

सौन्दर्य की सांकेतिक भाषा


लयबद्ध थिरकती क्रिया है नृत्य। नाट्य और नृत्त का संयोग।... और इधर जब टीवी चैनलों पर नृत्य के जो प्रतिस्पद्र्धी कार्यक्रम देखता हूं, लगता है जैसे शरीर को हिलाने, गिराने, उठाने, पटकने को ही नृत्य मान लिया गया है। शारीरिक अंगो का दृष्यमय यह प्रदर्षन व्यायाम हो सकता है, मनोरंजन का अनर्गल हो सकता है पर नृत्य कैसे हो सकता है! नृत्य सौन्दर्य की सांकेतिक भाषा है। ऐसी जिसमें चित्रकला है, षिल्प है और अनुभूति से जुड़ी संवेदनाओं का संवेग संयोग भी। 
बहरहाल, नृत्य की बात करें तो अकेले कथक को ही लें। तकनीक के हिसाब से समय, काल, परिस्थितियों के अनुसार इसमें बहुत से परिवर्तन भी हुए पर संरचना में शारीरिक अंगो का प्रदर्शनभर यह कभी नहीं रहा। इसीलिए इसका सौन्दर्य कभी तिरोहित नहीं हुआ। मंदिरों में यह जन्मा। दरबारों में विकसित हुआ। दरबारी शैलियां ही बाद में घराने बने। जयपुर और लखनऊ घराने से कथक की पहचान विश्वस्तर पर पहुंची। कुछ बनारस घराने की भी बात करते हैं परन्तु लखनऊ और जयपुर घराने का मिश्रण सरीखा ही है यह। हां, कथक से राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ का नाम भी जुड़ा है। राजा चक्रधरसिंह ने अपने तई कथक में बंदिषों, तोडो, परन आदि को शास्त्रबद्ध करते संस्कृत शब्दावली में जो कुछ नया जोड़ा वह कथक के रायगढ़ घराने से जाना जाता है।
जो हो, मंदिरों, दरबारों और फिर घरानों से जुड़ा कथक सौन्दर्य की सर्जना के अपने मूल में आज भी लुभाता है। समय परिवर्तन के अनुसार इसमें बढ़त भी हुई। विषय-वस्तु, वेषभूषा और प्रस्तुति के लिहाज से पर इसकी शास्त्रीयता में कहां कमी आई! मुझे लगता है, वर्षों से जुड़ी आ रही परम्परा सहेजना जरूरी है पर परम्परा रूढ़ नहीं हो, जड़ नहीं हो, इसके प्रयास भी जरूरी है। नृत्य में गुरू क्या करता है? परम्परा से ही तो अवगत कराता है। नर्तक के लिए नृत्य से जुड़ी संभावनाओं को समझने मंे गुरू ही सबसे अधिक मदद भी करता है परन्तु स्वयं कलाकार जब नृत्य करता है तो उसे उसमें अपने आप की भी तलाष करनी होती है। जो हो चुका है, हो रहा है-उसमें नर्तक स्वयं कहां है, इसका अन्वेषण यदि वह करता है तभी परम्परा के जड़त्व को तोड़ वह आगे बढ़ सकता है। प्रेरणा श्रीमाली ने, शोवना नारायण ने, कुमुदिनी लाखिया आदि कलाकारों ने यही तो कथक में किया है। 
"डेली न्यूज़", 10 जनवरी, 2014 
बांग्ला-अंग्रेजी संवादों के साथ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मेल की शोवना नारायण की ‘कादंबरी’ इसी का उदाहरण है। प्रेरणा श्रीमाली ने कबीर को जीवंत करते उनके जुलाहे स्वरूप को भावाभिनय से अमूर्त में भी मूर्त किया है। पद संचालन में हाथकरघे की ध्वनि बुनते वह जैसे कथक के जयपुर घराने की पद भाषा से उसे गहरे से व्यंजित करती है। कुमुदिनी लाखिया ने कथक को पौराणिक कथाओं, आख्यानों, राधा-कृष्ण की परिधि से बाहर निकाल सामयिक परिवेष दिया। आधुनिक परिवेश में नृत्य के यह प्रयोग इसलिए अखरते नहीं है कि इनमें कथक की शास्त्रीयता, उसके सौन्दर्य से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई है। प्रेरणाजी के शब्द उधार लूं तो कहूं, कथक में सूफियाना कुछ हो सकता है पर ‘सूफी कथक’ उसे नहीं कहा जा सकता। कथक कथक है। इधर हो उलट रहा है। अंगों के चाहे जैसे प्रदर्शन के अनर्गल को शास्त्रीय से जोड़ उसे परिभाषित किया जा रहा है। शरीर के अंगो की गति के दुरूह प्रदर्षन को ही नृत्य मान लिया जा रहा है। यह कार्य तो मशीन अधिक बेहतर कर सकती है। इसके लिए देह को क्यों कष्ट दें! कलाएं संवेदनाओं का आकाष है, चमत्कार नहीं। चमत्कारिक ही कुछ करना है तो फिर उसे नृत्य नाम न दिया जाए!

Friday, January 3, 2014

परम्परा, आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता


समूह चित्र प्रदर्शनियों की बड़ी सीमा यह होती है कि उनसे किसी चित्रकार के कलाकर्म की संपूर्णता की दीठ नहीं मिलती। कुछेक श्रेष्ठ से तमाम कला का मूल्यांकन हो भी कैसे सकता है! पर देख रहा हूँ कोई दो दशक पहले अजमेर के पांच चित्रकारों की पहल से स्थापित ‘आकार’ समूह की सामुहिक चित्र प्रदर्शनी इस सीमा को लांघती है। कलाओं के गहन सरोकार लिए। बरस दर बरस समुह प्रदर्शनी में जिन चित्रकारों की कला से निरंतर साक्षात् होता रहा हूं, उनकी कलाकृतियां में आ रही परिपक्वता और समय के जुड़ते संदर्भ संभावनाओ के  नए द्वार खोलते हैं। 
बहरहाल, इस बार प्रदर्शनी में बहुत कुछ नया था। रंगों की ओप दीठ से, रेखाओं की लय से और समय से जुड़े संदर्भों की ओट से भी। मसलन कृष्ण की छवियों को नील रंग की सघनता में कैनवस पर उकेरते डा. अनुपम भटनागर ने कृष्णमय भावों को गहरे से अंवेरा है। भटनागर के चित्रों की बड़ी विशेषता  रंग और रेखाओं का माधुर्य है। ऐसा जिसमें परिवेश कथा, प्रसंग को उद्घाटित करता हममें बसता है। ‘आकार’ ग्रुप  के संस्थापकों में से एक लक्ष्यपालसिंह राठौड़ की कलाकृतियां भीड़ में भी अलग से दिखाई देती है। वजह है, उनमें बसा लोक का आलोक। धुंध से उभरती आकृतियों में राजस्थान का सुरम्य परिवेश  उनके चित्रों में ठौड़-ठौड़ है। मुझे लगता है, वह रेत के  हेत की संस्कृति के चितेरे हैं। प्रहलाद शर्मा की चित्र श्रृंखला की परियां रंगों की दीप्ती लिए जीवंतता की संवाहक बन पड़ी है तो अमित राजवंशी  घोड़ों की ऊर्जा कैनवस पर संजोते प्राचीन गुफा चित्रों की याद दिलाते हैं। धूसरित होते रंगों में उन्होंने महीन रेखाओं में विषय को सांगोपांग जिया है। अशोक  दीक्षित और अनिल मोहनपुरिया के चित्रों का सघन टैक्सचर और रेखाओं में रंगों का बहाव ध्यान खींचता है तो जलरंगों में देवेन्द्र खारोल ने पुष्कर की धरा में प्रकृति के अपनापे और पहाडि़यों के सौन्दर्य को जीवन्तता प्रदान की है। विनय त्रिवेदी परम्पराओं को सहेजते प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। उनके चित्रों के केन्द्र में प्रतीक रूप में उभरती मानवीय आकृतियां संवेदनाओं को गढ़ती है। सरल रेखाओं में वह जीवन से जुड़े द्वन्द और स्मृतियों को परम्पराओं में सहेजते हैं-मिनिएचर की दीठ लिए।
"डेली न्यूज़", सम्पादकीय पेज
(साप्ताहिक स्तम्भ "कला तट") 3 जनवरी, 2013 
राजाराम व्यास चित्र फलक में दृष्टि संपन्नता लिए हमसे जैसे बतियाते हैं। नीता कुमार लोक चित्रो की हमारी समृद्ध परम्पराओं से साक्षात् कराती कैनवस कोलाज हमारे समक्ष रखती है तो उमा शर्मा के पेपर कोलाज अमृत लाल वेगड़ की अनायास ही याद दिलाते  हैं। शैला शर्मा की मोर पंख पार्श्व  लिए आकृतियां एक तरह से रंग कहन ही है। सुरेश  प्रजापति ने ब्रह्मा के जरिए सृष्टि को अंवेरा है तो हितेन्द्र सिंह भाटी के लोक चित्र सरीखे आख्यानों में बढ़त है। अर्चना की सहज सरल आकृतियां और रमेश शर्मा के चित्र कैनवस कथा सुनाते रेखाओं की लय से हममें बसते हैं। दिनेश  मेघवाल और पुष्पकांत मिश्र के चित्रों में उभरते संभावना आकाश  को पढ़ा जा सकता है। कीर्ति चटर्जी के कृष्ण और एम.कुमार का साधू, चित्र साधना के संवाहक है। हां, शिवराज  सिंह कर्दम के स्कल्पचर में टैक्सचर और गढ़न के साथ संवेदनाओं का उद्घाटित होता अर्थ भी मन को स्पन्दित करता है।
बहरहाल, यह महत्वपूर्ण है कि अजमेर का ‘आकार’ समूह निरंतरता के साथ अपनी कला प्रदर्शनियो में परम्परा, आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता के ताने-बाने में कलाओं के हमारे समय से साक्षात् करा रहा है। 


Friday, December 27, 2013

साहित्य, कला और संस्कृति का लोकतंत्र

लोकतंत्र की परम्परा और उसकी विशिष्टता जनभागीदारी की सतत तलाश है। और यह केवल और केवल किसी भी समाज में कला, संस्कृति और साहित्य के स्वस्थ मूल्यों से ही हो सकती है। व्यापक अर्थ में संस्कृति परम्पराओं, साहित्य, ज्ञान, विचारधाराएं, सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं, कानून और क्षमताओं के साथ व्यक्ति की आदतों का मिला-जुला रूप ही तो है। वर्ष बीतने को है। सालभर का लेखा-जोखा संचार माध्यम कर ही रहे हैं, पर इससे परे साहित्य और संस्कृति के सनातन मूल्यों के लिहाज से आकलन करें तो पाएंगे बहुत कुछ ऐसा महत्वपूर्ण है जिससे हम धीरे-धीरे विलग हो रहे हैं। सृजन को जीवन की अभिव्यक्ति मान लिया गया है पर ऐसा नहीं है। सृजन स्वयं जीवन है। ऐसा जिसे कोई भी सत्ता, राजनीति चाहकर भी बाधित नहीं कर सकती। माने सृजन की स्वायत्ता पर कहीं कोई पहरा नहीं हो सकता। यह ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें हर व्यक्ति अपना स्वयं शासक है। सोचिए! साहित्य और कलाएं ही तो है जिनमें कहीं कोई आरक्षण नहीं है। सबके लिए यह क्षेत्र समान रूप से खुला है। यहां कोई है भी तो वह अपनी योग्यता और अपनी क्षमता से ही है। साहित्य खेमों में बांटते दलित या इसी तरह के अन्य किसी लेखन की बात कोई करता है तो उससे बड़ी बौद्विक दरिद्रता हो नहीं सकती। कबीर, रैदास, गालिब के लिखे को फिर क्या कहेंगे! इसीलिए कहें, साहित्य में न जाति है, न धर्म। महत्वपूर्ण यदि लिखा गया है, कलाकृति में सिरजा गया है, संगीत में गुना गया है तो वह कालजयी ही होगा। 

सरकारें यह दावा कर सकती है कि कला, साहित्य और संस्कृति के लिए कला-संस्कृति विभाग बनाए हुए हैं। ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादेमी, संगीत नाटक अकादमियां में प्रतिवर्ष करोड़ों का बजट इसीलिए दिया जाता है कि साहित्य-संस्कृति का पोषण हो सके। पर गंभीरता से विचारें, क्या वास्तव में इनसे संस्कृति, साहित्य और कलाओं का भला हुआ है!  होता प्रायः यह भी है कि अकामियों की स्वायत्ता के नाम पर अकादमी के लिए चुने गए व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हितों और अपनों का पोषण करने लग जाते हैं। बीतते जा रहे वर्ष में राजस्थान साहित्य अकादेमी ने तो इसकी मिशाल पेश की है। वर्तमान में जो अध्यक्ष हैं उन्होंने साहित्य के तमाम मूल्यों को ताक पर रखते हुए जैसे इतिहास ही रचा। पूरे कार्यकाल में सामंती सोच को धिक्कारते वाले अध्यक्ष महाशय साहित्य अकादेमी को मठ के रूप में स्थापित करते उसके जरिए सामंती सोच से पुरस्कार की रेवडि़यारं बांटते रहे। सता के समक्ष सामथ्र्य जताते जिसे जैसे चाहे नियमों को ताक पर रखकर दिया। स्वायत्ता के नाम पर उनका पूरा कार्यकाल बंजर विचारों की खेती ही करता रहा। सांस्कृतिक जागरण के नाम पर सस्कृति का चीर-हरण और साहित्य के नाम पर कृतार्थ की मंशा की परिणति अमृत सम्मान समारोह, कला मेले जैसे आयोजनों में उड़ाया सरकारी धन कहा जा सकता है। 

कलाओं की दृष्टि से बीतते जा रहे वर्ष में राजस्थान में बहुत कुछ नया हुआ भी। मसलन जयपुर में पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कला उत्सव प्रोगे्रसिव आर्ट ग्रूप के जरिए हुआ। ललित कला अकादेमी ने साल बीतते बीतते छायांकन की एक प्रदर्शनी अपने यहां आयोजित कर छायाचित्र कला को कुछ तो मान्यता दी ही। हां, नर्मदा के अनथक यात्री और प्रसिद्ध कलाकार अमृतलाल वेगड़जी के एक व्याखान के लिए अकादेमी को अपना स्थान उपलब्ध कराने के लिए आग्रह किया तो उसकी लाज रखते हुए तुरता-फुरत में आयोजन अकादेमी परिसर में हुआ भी परन्तु उसके लिए भी अकादेमी की कोई गंभीरता नहीं दिखी। यानी विचारों के लिए वहां भी पूरे बरस शून्यता ही पसरी रही। हां, इस वर्ष कलाविद् सम्मान बरसों बाद फिर से प्रारंभ होन सुखद है।

नाट्य की दृष्टि से यह स्वर्णिम वर्ष रहा है। रवीन्द्र रंगमंच और जवाहरकला केन्द्र में वर्षपर्यन्त महत्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ। नाट्य से जुड़े विचारों पर मंथन भी हुआ और बड़ी उपलब्धि यह भी रही है कि पणिक्कर नाट्य समारोह के जरिए संस्कृत नाटकों की समृद्ध परम्परा का आस्वाद जयपुर ने किया। जयरंगम और कथारंग जैसे आयोजन बदलते समय के साथ नाट्यकला में आए परिवर्तनों के संवाहक रूप में भी कम याद नहीं किए जाएंगे।

राजस्थानी भाषा अकादेमी ने आयोजनों की अच्छी पहल की। सुदूर स्थानों तक राजस्थानी भाषा के आयोजन हुए। बल्कि पुरस्कार बांटे जाने की बंधी-बंधायी दलीय परिपाटी में ही आबद्ध रहने की छवि को बहुत से स्तरों पर अकादेमी ने तोड़ा भी पर अंत बुरा रहा। राजस्थान साहित्य अकादेमी अध्यक्ष के चकारिये में विवादों के घेरे में इस कदर घिरी कि बाहर निकल ही नहीं पाई। और हां, बीतते वर्ष के आरंभ में हर बार की तरह जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी चर्चा का विषय रहा। साहित्य के नाम पर उपभोक्तावाद के चरम रूप में संस्कृति की जड़ों को भले ही वह हिलाता आ रहा है परन्तु मीडिया प्रायोजकों के रूप में तमाम प्रचार तंत्र को अपने साथ मिलाकर उसने आयोजन के नए सूत्रों का बीजारोपण तो जयपुर में किया ही है। 

बहरहाल, बीतता जा रहा यह वर्ष साहित्य, संगीत और कलाओं के लिहाज से सोशल मीडिया के नाम भी कम नहीं रहा है। सृजन के जरिए जो कभी नहीं पहचाने गए, उन्होंने इस मीडिया का जमकर इस्तेमाल अपने को स्थापित करने में किया। इससे गढ़ी छवि दीर्घकाल तक भले ही न भी रहे परन्तु साहित्य और कलाओं से जुड़े तथाकथित मठाधिशों ने इससे भ्रम फैलाकर बहुत कुछ हासिल तो किया ही है! विडम्बना बीतते वर्ष की यह भी है कि हिन्दी से कमाने खाने वाले लोगों ने अंग्रेजी में लिखे को जमकर पोषित किया। एक कारण यह भी है कि वर्ष 2013 में उस साहित्य की अधिक चर्चा हुई जो हिन्दी, राजस्थानी में नहीं लिखा जाकर अंग्रेजी या दूसरी योरोपीय भाषाओं में लिखा गया। जो हो आईए साहित्य और संस्कृति के लोकतंत्र को नमन करें! यहां कोई आरक्षण नहीं है। यहां कोई है, रह रहा है या भविष्य में भी रहेगा तो केवल और केवल अपने बूते। कोई यहां अपनी पीठ आप ठोकता भी है तो उसे स्वयं के अधिकारों की लड़ाई चाहकर भी बना नहीं सकता। आखिर, यही तो है सच्चा लोकतंत्र!

साहित्य, संस्कृति और कला विश्लेषण 2013, 
"डेली न्यूज़" सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित, दिनांक 27-12-2013 
  http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/2125727 

Friday, December 20, 2013

लोक की अनूठी शिल्प -चित्र विरासत

यह जानना सुखद है कि इस बार गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में होने वाली परेड में प्रदेश के ख्यातनाम कलाकार हरशिव शर्मा निर्मित कावड़ कला की झांकी प्रदर्शित  होगी। कावड़ कला राजस्थान की समृद्ध लोक धरोहर है। ऐसे दौर में जब हम अपनी परम्पराओं को विस्मृत करते जा रहे हैं, राष्ट्रीय पर्व लुप्त होती कलाओं को सहेजने का जैसे संदेष ही देता है। 
बहरहाल, कावड़ लोक की अनूठी शिल्प -चित्र विरासत है। कावड़ माने धार्मिक, ऐतिहासिक और लोक कथाओं में गुंफित शिल्प का चित्रघर। डिब्बेनुमा काष्ठ आकृति जिसकी दरो-दिवारों पर कथाओं का मनोरम चित्रण। कावड़ में गाथाओं को बुना जाता है और फिर जब यह तैयार हो जाती है तो बुने को बांचते हुए गुना भी जाता है। काष्ठ निर्मित कलात्मक रूपाकारों में ईसर, तोरण, बाजोट, मुखौटे और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी होती है। कविता के छंद की भांति क्रमबध मंडे चित्र और चमकदार रंगों का सौन्दर्य वहां प्रधान होता है। एक रंग दूसरे का पूरक बनता इसीलिए मन को वहां भाता है। कावड़ में षिल्प की गढ़न के साथ चित्रांकन की सूक्ष्म दीठ होती है।  कहें,  वास्तु और शिल्प का मेल है कावड़। परत दर परत कपाटों से खुलता है चित्रों का कथा कोलाज। कावड़ बांचने वाले कपाट खोलते इसे ही बांचते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप किसी कलादीर्घा की वर्चुअल सैर कर रहे हैं। विविध कपाटों में परत दर परत मनोरम चित्रों के जरिए प्रभु की झांकी के पाट खुलते बंद होते धार्मिक कथा को यहां जीवंत करते हैं। इसीलिए कहें, कावड़ चलता फिरता देवघर है। 
कहते हैं, कावड़ कला की शुरूआत घर पर तीर्थ पुण्य प्रदान करने की सोच से कभी हुआ। ऐसे लोग जो तीर्थ नहीं जा पाते, प्रभु स्वयं पहुंचकर कावड़ के जरिए उन्हें तीर्थ लाभ देते। कावड़ के पाट खुलने का अर्थ ही है, पुण्य की प्राप्ति। उसे भी जो कावड़ चित्र कोलाज देखता है और उसे भी जो कावड़ बांचता है। पड़ की तरह कावड़ बांचते भाट मोर पंख का स्पर्श  कराके कावड़ के पाट खोलते-बंद करते ही कथा पूरी करता है। सभी प्रकार के कपाट खुलने पर अंत में राम-सीता के दर्शन होते हैं। कथा की इस पूर्णता के साथ ही आरती के साथ कावड़ पूरी हो जाती है। बैलगाडि़यों पर सजी-संवरी कावड़ कभी गांव-गांव, शहर-शहर  घूमती। 
बहरहाल, कावड़ डेढ़ से दो इंच की भी होती है और बीस फीट की बड़ी भी होती है। प्रायः यह अरडू, धाक, धोरनी, खिरनी, आम की लकड़ी से बनती है। पर इधर घरों में सजावट के लिहाज से सागवान से भी निर्मित होने लगी है। गोपीचंद-भरतरी, रामायण, महाभारत, लोक देवी-देवताओं ऐतिहासिक कथाओं के साथ ही इधर प्रयोगधर्मिता के चलते सम-सामयिक संदर्भो के चित्र भी कावड़ में बनने लगे हैं। रंग जो प्रयुक्त होते हैं उनमें लखारी यानी लाल रंग प्रमुख होता है। फिर इसमें हरतल यानी हरा, प्यावड़ी यानी पीला, काजल यानी काला आदि रंग मिलाए जाते हैं। आवश्यकतानुसार रंगों को गोंद  मिलाकर घोंटा लगाया जाता है। घोंटा यानी इंटाला। सूखने पर फिर से उसमें गोंद मिलाकर विविध पारम्परिक रंगो से क्रमवार कथाओं का चित्रण होता है। कथा चित्रों को सजाने के लिए मांडणे तथा अन्य अलंकरणों में लोक सौन्दर्य के चितराम भी काष्ठ पर मांडे जाते हैं। कहते हैं, कावड़ कला का उद्गम चित्तौड़ के बस्सी गांव से हुआ। वहां के रावत गोविन्ददास ही पहले पहल कावड़ कलाकार प्रभातजी सुथार को 1652 में मालपुरा टोंक से लेकर आए थे। उन्होंने तब बहुतेरी काष्ठकलाकृतियां बनाकर  रावत गोविन्ददास और महाराणा मेवाड़ को भेंट की। बस्सी काष्ठ कला का आज भी गढ़ है।...वहीं जन्मी जगचावी लोक कला कावड़ के उजास से इस बार पूरा देष नहाएगा।


Friday, December 13, 2013

सांस्कृतिक नीति के लिए हो चिंतन

कलाओं का मूल आधार संस्कृति है। जीवन से जुड़े संस्कारों की नींव संस्कृति से ही तो तैयार होती है। साहित्य, संगीत आदि कलाएं संस्कृति का ही रूप है और हमारा आंतरिक इनसे ही तो उद्घाटित होता है। परन्तु हमारी जीवन पद्धति और मूल्य भी तो संस्कृति का ही हिस्सा है। स्वाभाविक ही है कि संस्कृति प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। या कहें उसमें हरेक की भागीदारी जरूरी है।
इस समय की बडी चुनौती तेजी से खत्म होते जा रहे जीवन मूल्य ही है। बड़ा कारण इसका संस्कृति के जीवंत मूल्यों से निरंतर हो रही हमारी दूरी भी है। प्रदेश में नई सरकार का आगमन हुआ है। बहुत सारे कार्य आने वाले समय में इस सरकार के जिम्मे है परन्तु संस्कृति को जीवन के व्यापक संदर्भों से जोडने की पहल की दिशा में यदि सर्वोच्च प्राथमिकता से कार्य हो तो दूसरे कार्यों में इससे अपने आप ही शुरूआत हो जाएगी। सरकारी अकादमियां और संस्थाएं सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का कार्य कथित रूप में करती भी है परन्तु उनकी प्राथमिकताओं में संस्कृति से जुड़े पहलुओं का स्थूल रूप भर है। यानी साहित्य अकादेमी साहित्य के लिए, संगीत नाटक अकादेमी संगीत, नृत्य और नाट्य के लिए, ललित कला अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए कार्य करती है परन्तु संस्कृति इनसे ही नहीं है। संस्कृति समुदाय के आचरण से है। संस्कृति मनुष्य का व्यवहार और जीवन जीने का ढंग है। जैसे बीज हम बोएंगे-फल वैसा ही मिलेगा। इस दीठ से संस्कृति भविष्य की नींव तैयार करती है। 
सांस्कृतिक आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ जीवन को पोषित करती है। स्वाभाविक ही है कि इसके लिए सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही कार्य हो सकता है। नई सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता रखते हुए इस ओर पहल करे तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। और फिर संस्कृति और सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता। राज्य में सरकार को जो अपार जनमत मिला है, उसकी भी मांग शायद यही है कि राज्य की अपनी एक सांस्कृतिक नीति बने। संस्कृति मूल्यों की सृष्टा और संपोषक जो है! साहित्य और कला अकादमियों के गठन और वहां पर अध्यक्ष, सदस्यों के मनोनयन या फिर किसी तरह के साहित्य, कला उत्सव करने से संस्कृति पोषित नहीं होती। साहित्य और कला के साधनों और सुविधाओं का विकास तो एक बात है परन्तु इससे भी बडी जरूरत यह है कि कलाएं अभिजात या फिर सीमित वर्ग तक की पहुंच के साथ तमाम जनता तक पहुंचे। स्वस्थ और दीर्घकालीन नीति यदि संस्कृति की बनती है तो उसमें साहित्य और कलाओं का ही नहीं व्यक्ति की सोच बदलने तक की ताकत है। यह बड़ी बात है पर पहली आवश्यकता तो अभी यही है कि प्रदेश की अपनी सांस्कृतिक नीति हो, ऐसी जिसमें साहित्य और कलाएं व्यापक संदर्भों से जुडे। 
साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं में जो मठाधीश लोग हैं, उनकी बजाय सर्जन के सरोकारों से जुडे मूल लोगों को जोडते हुए, उनसे परामर्श करते हुए राज्य की सांस्कृतिक नीति बनायी जाए। ऐसी सांस्कृतिक नीति जिसमें मायड भाषा राजस्थानी के लिए कार्य हो, जिसमें संगीत, नृत्य चित्रकला और खासतौर से लोक कलाओं का जमीनी स्तर पर संरक्षण हो। संस्कृति की जीवंतता किससे  है? अंतर्विरोधों की पहचान से ही तो! अच्छे-बुरे की समझ से। इसलिए जरूरी यही है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हुए हम एक सुनियोजित सांस्कृतिक नीति के तहत सांस्कृतिक हों। संस्कृति जिससे जीवंत हो जीवाश्म न बने। आखिरकार तमाम हमारी कलाओं और दर्शन पर संस्कृति का ही तो प्रभाव रहता है। वह समृद्ध होगी तो हम भी समृद्ध-जीवंत रहेंगे। सरकार बदली है, संस्कृति के संबंध में यह चिंतन तो हो ही। आम जन की अपेक्षा यही है।

Friday, December 6, 2013

कलाओं में गूंथे जीवन के मर्म


कलाएं अंतरतम विचार, भावों का रहस्योद्घाटन है। मुंशी  प्रेमचन्द की कहन कला को ही लें। कहानी विधा के रूप में वहां साहित्य प्रधान है परन्तु कहानियों के मर्म में उतरेंगे तो पाएंगे कहन में जीवन से जुड़े सरोकार यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। भाषायी अदाकारी में जीवन से जुड़े मर्म की तलाश  ही तो है उनकी कहानियां!  लूंठी-अलूंठी दृष्टि-संपन्न्ता में वहां पूरी की पूरी एक विचारधारा समय का सच उघाड़ती हममें जैसे बतियाती है। 
बहरहाल, यह सच है कि कहानियां जीवन को बयां तो करती है परन्तु जीवन नहीं हो सकती। जीवन तो कलाओं से ही है। इसीलिए तो कहते हैं-संगीत, नृत्य, चित्र और नाट्य जीवन को रंजित ही नहीं करते गहरे से बंया करते हैं। यह बात इसलिए कि कुछ दिन पहले प्रेमचन्द की एक कहानी का नाट्य रूपान्तरण देखा था।  लगा, कहानी को मंच देकर उसे जीवन्त करने की कला नाट्य से ही उपजी है। याद पड़ता है, व्यवस्था प्रसूत विसंगतियों पर लिखी उनकी कहानी ‘नमक का दरोगा’ विद्यालयी दिनों में ही पढ़ी थी। कथा में प्रेमचन्द द्वारा वेतन को पूर्णमासी का चांद की उपमा देकर महिने में एक बार ही दिखने की संज्ञा आज भी कहां भूल पाया हूं। पढ़ने के बाद कहानी के इस तरह के संवाद ज़हन में निरंतर कौंधते हैं। कुछ दिन पहले इस कहानी के नाट्य रूपान्तरण का आस्वाद करते इसमें निहित घटनाओं का दृष्टा भी बना। 
कहानी का नाट्य रूपान्तरण और प्रस्तुति सिद्धहस्त नाट्यकर्मियों ने नहीं करके राजस्थान पुलिस अकादेमी के प्रेक्षागृह में वहां के प्रशिक्षुओं ने किया। पुलिस अकादेमी के निदेशक बी.एल. सोनी के आमंत्रण पर उनके साथ इस कहानी का नाट्य आस्वाद करते लगा, प्रेमचन्द के कहन को कला में पात्रों ने गहरे से जिया है। पुलिस सेवा के प्रशिक्षुओं ने कहानी के मर्म में उतरते नाट्यकला से जुड़ी संवेदनाओं को जैसे आत्मसात किया था। ‘नमक का दरोगा’ कहानी के केन्द्र में ईमानदारी और बेईमानी की ताकत है। ईमानदार पात्र वंशीधर और जमींदार पंडित अलोपीदीन  इसके मुख्य पात्र है। कहानी में अच्छाई की हार के बावजूद अंततः अच्छेपन के सम्मान के मार्मिक प्रसंगों की जीवन्त और मार्मिक नाट्य प्रस्तुति ने मन में कुछ सवाल भी पैदा किए। मसलन पुलिस प्रशिक्षण अकादेमियों में संबद्ध प्रशिक्षण के साथ ही प्रशिक्षुओं में निहित नैसर्गिक प्रतिभाओं को तराषने के अवसर दिये जाएं तो वहां बगैर किसी उपदेष, व्याख्यान के ही मानवीय गुणों का विकास किया जा सकता है। 
अमूमन देखा यह गया है कि प्रशिक्षण अकादेमियों में अधिकारी अपनी नियुक्ति को लेकर खास कोई उत्साहित नहीं होते हैं। ऐसे में प्रायः प्रशिक्षण औपचारिकताओं की भेंट चढ़ता प्रशिक्षुओं को भविष्य के अपने कार्य के प्रति जोश  नहीं जगाकर कार्य आरंभ करने से पहले ही उसके बोझ का ही निरंतर अहसास कराता है। स्वाभाविक ही है कि प्रशिक्षण उपरान्त पुलिस के सामाजिक सरोकारों के नतीजों में स्वाभाविक मानवीय गुणों का लोप ही तब अधिक दिखाई देता है। इस दीठ से विचार यह भी आया कि क्यों नहीं आवश्यक  प्रशिक्षण  के साथ कलाओं से जुड़े सरोकार भी प्रशिक्षण का हिस्सा हों। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और राजस्थान पुलिस अकादेमी के इस समय के निदेशक बी.एल. सोनी की पहल इस दृष्टि से उदाहरण बन सकती है। वह स्वयं मानवीय संवेदनाओं से लबरेज व्यक्तित्व है, इसलिए उनकी पहल से ही अकादेमी में साहित्य और कलाओं से जुड़े सरोकारों की इस तरह की पहल हुई है। क्या ही अच्छा हो, तमाम दूसरे प्रशिक्षण  संस्थानों में विषय संबद्ध प्रशिक्षण  के साथ कलाओं से जुड़े सरोकारों को इसी तरह से जोड़ा जाए। 
यह सही है,प्रशिक्षण  व्यक्ति को संवारकर दक्षता प्रदान करता है परन्तु कलाओं से जुड़े सरोकार प्रषिक्षण में सम्मिलित होंगे तो व्यक्ति जीवन से जुड़े गुणों का पाठ भी स्वतः ही कर सकेगा। रोबोटी होते दौर में संवेदनाओं का वास आखिर कलाएं ही करा सकती है।  


Friday, November 29, 2013

जीवन से जुड़े कला के प्रश्न

डॉ राजेश कुमार व्यास, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, प्रयाग शुक्ल और मंगलेश डबराल  
कला के प्रश्न जीवन के प्रश्न है। जीवन स्थितियों और जीवन प्रवृतियों से जुड़े प्रश्न। कुछ दिन पहले जयपुर में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रूप द्वारा राज्य सरकार के साझे से आयोजित वृहद कला आयोजन में देश के ख्यातनाम कलाकारों से संवाद, उनकी कलाकृतियों से रू-ब-रू होने का अवसर मिला तो सुखद लगा। कला समीक्षक, कलाकार आर.बी. गौतम, विनोद भारद्वाज, विद्यासागर उपाध्याय, मृदल भसीन, टिम्मीकुमार और उनके जैसे ही और कलाकारों के उत्साह से ही आयोजन परिणत हो पाया। पर, आवश्यकता नहीं होते हुए भी हिन्दीभाषी क्षेत्र में आंग्लभाषा का बोलबाला यहां भी अखरा।
बहरहाल, सुखद यह है कि साहित्य के साथ कलाओं पर भी जयपुर देश के बड़े संवाद केन्द्र के रूप में उभर रहा है। कलाओं से जुड़े जीवन प्रश्नों के एक सत्र में कवि, संपादक मंगलेश डबराल, प्रयाग शुक्ल, संस्कृत मर्मज्ञ कलानाथ शास्त्री के साथ एक सत्र में इस नाचीज ने भी भागीदारी की। सुखद यह था कि इस सत्र पर अंग्रेजी की छाया  नहीं थी। यह भी कि यही वह सत्र था जिसमें कला व्यापार से जुड़े सवालों की बजाय कला की संवेदनशीलता, उसमें निहित संवेगों और कलाकृतियों के अन्र्तनिहित पर बहुतरे मसलों पर विषद् चर्चा हुई। प्रयाग शुक्ल की ‘कला के अयोचित क्षेत्र’ की सूक्ष्म दीठ में कलाकारों को अनछूए के अन्वेषी, अयाचित क्षेत्रों का संदेशग्रहणकर्ता जैसी लयात्मक अभिव्यंजा मोहक थी। वह जब स्वामीनाथन, रामकुमार की यात्राओं और गायतोण्डे के महिनों तक कैनवस के समक्ष बैठकर सृजित उनकी कलाकृतियों पर बोल रहे थे तो बहुतेरी कलाकृतियां भी आंखो के समक्ष जैसे उद्घाटित हो रही थी। प्रयागजी कलाकृतियों और यात्राओं में गहरे से रमते हैं। ऐसा है तभी तो  उनका कहन मन को छूता है।
इसी सत्र में मंगलेश डबराल ‘कला में देखना’ से जब नाता करा रहे थे तो डच कलाकार फरमीर और खिड़की से आने वाले प्रकाश स्त्रोत के बहाने कलाओं के सर्जन को गहरे से जैसे जिया। कलाकृति का स्त्रोत कुछ भी हो सकता है, खिड़की से आता प्रकाश भी और औचक घटित कोई अनुभूति का क्षण भी। इसीलिए उन्होंने यह भी कहा कि कलाएं देखने की सघनता पर निर्भर करती है। मंगलेशजी कवि हैं सो उन्होंने जब कहा कि कविता हमारे समक्ष उड़ती-मंडराती रहती है-जो देख ले वह कवि। सच ही तो है! देखना दृश्य की संवेदना से ही जुड़ा भर नहीं है, इसमें अनुभूति को आत्मसात करने की दीठ भी तो है। रोंदे, रामकिंकर बैज, हिम्मत शाह, मदन लाल जैसे मूर्तिशिल्पियों ने जो घड़ा उसमें दिखने वाली वस्तु ही महत्वपूर्ण कहां है? वहां दृश्य से परे जीवन से जुड़ी उस छाया का अधिक महत्व है जिसे देखने वाला अपने तई सदा ही दूसरों से अलग व्यंजित करता रहा है।
    बहरहाल, जरूरी है कि भविष्य में भी कलाओं पर संवाद की इस तरह की परम्परा कायम रखी जाए। हाॅं, कलाओं पर विमर्श के लिए विषय चयन में भारतीयता और हमारी अपनी भाषा हिन्दी को न बिसराया जाए। विडम्बना यह है कि इधर अंग्रेजी की चमक-दमक से हर कोई मोहित है। अंग्रेजी लेखन, अंग्रेजी परिवेश की भयाक्रान्तता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि उस अंग्रेजी लेखन को पूजा जा रहा हैं-जिसमें हमारा अपना न तो अतीत है, न भविष्य और न अपनी भाषा हिन्दी में लिखे के भविष्य की किसी प्रकार की कोई आहट। भाषा का ज्ञान, बल्कि किसी भी क्षेत्र का ज्ञान व्यक्ति को संपन्न ही करता है परन्तु जब दैनिन्दिनी जीवन में हम अपनी भाषा को जीते हैं, उसी में हमारी सहजता है तो फिर क्या ऐसी मजबूरी है कि ऐसे आयोजनों का परिदृश्य और परिवेश अंग्रेजी में रचा-बसा ही हो! कहीं यह हमारी अपनी ही हीन भावना तो नहीं!

Tuesday, November 26, 2013

सौन्दर्य संवाहक चांद

कलाएं अंतरतम विचार, भावों का रहस्योद्घाटन है। अंतर के उजास की अभिव्यक्ति। सौन्दर्य का प्रकाष तभी है जब अंतर में उजास हो। अंतर का उजास भी तभी है जब कलाओं का हममें वास हो। इसीलिए तो कहें, कलाओं से ही है यह जीवन! सोचता हूं, चांद का सौन्दर्य उसकी कलाओं से ही तो है। उसमें से कलाओं का लोप होते ही अंधकारमय हो डराने लगती है रात। अमावस में चंद्रमा तमाम अपनी कलाओं को खो देता है, परिणति में ही विलुप्त होता वह काला और कुरूप हो जाता है। 

बहरहाल, पूर्णिमा में चांद की कलाएं लौट आती है। कलाओं से दीप्त होता वह फिर से लुभाता मन को भाने लगता है। कला का पर्व ही तो कार्तिक पूर्णिमा। अंतर के उजास का संवाहक। नदी, सरोवर में इसी दिन प्रवाहित होते हैं दीप। अंधकार को हरने।

कहते हैं, कार्तिक पूर्णिमा पर रात्रि में आसमान में जब स्वच्छ तारे निकलते रहते हैं तभी समृद्धि प्रदायिनी लक्ष्मी उपस्थित होती है। अंधकार हरने के लिए जले दीपकों को निहारने ही धरा पर आती है लक्ष्मी। जहां-जहां दीप वहां-वहां लक्ष्मी का वास। घर-घर जलते हैं दीप। देव मंदिर में, नदी के तीर पर। ऊंची-नीची, संकरी-दुर्गम तमाम जगहों पर जहां भी अंधकार का वास वहीं-वहीं जलता है दीप। दिया जलता है कि उजास हो। अंधियारे जीने के हम आदि प्रकाष से नहाएं। कार्तिक नहान माने अंतर उजास का स्नान।
Artist Vinay Sharma's Painting

पूर्णिमा में दीपदान से बड़ा और क्या दान! पूर्णमासी को ही तो गंगाजी जन्मी। तुलसी जन्मी। गंगास्नान को इसीलिए तो पूर्णिमा को उमड़ पड़ते हैं लोग। कहते हैं, इस दिन किया स्नान, दिया हुआ दान, जप और तप अक्षय होते हैं। अखूट। कभी नहीं समाप्त होने वाले। संयोग ही था कि इस बार कार्तिक पूर्णिमा में षिव के घर था, हरिद्वार।  हरिद्वार यानि हर द्वार। महादेव का घर। ऋषिकेष में वेगवती होकर अपनी प्रखरता जताती गंगा हरिद्वार में शांत और सौम्य है। गतिप्रिया। अविरल बहती गंगा यहां जीवन गति की ही तो संवाहक है। सांझ में गंगा घाटों पर विचरते औचक नजर चन्द्रमा पर ठहर गई। उसकी कलाओं से जैसे साक्षात् हुआ। अमावस के मुरझाए, तेजहीन चांद को देखा था। पूर्णिमा में उसे यूं ओज में देख सुखद लगा। लगा, चांद होले-होले मुस्करा रहा है। चांदनी बरसाता। कमल की भांति सुन्दर। यह खिला-खिला चांद था। अपनी तमाम कलाओं के साथ विराजमान।

कहते हैं, ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो चन्द्रमा ही उनकी सुन्दरतम रचना थी। चन्द्रमा रूप में मनुष्य को सौन्दर्य की सौगात ही तो दी थी ब्रह्मा ने। कोई कह रहा था, चांद हमेषा प्रसन्न रहता है इसीलिए उसे देखते सुख मिलता है। सुख वही तो दे सकता है, जो अपने से संतुष्ट हो। पर कुछ ऐसा हुआ कि चन्द्रमा उदास रहने लगा। अंदर ही अंदर उसके अंदर कुछ ऐसा घटा कि वह कुम्हलाने लगा। तेजहीन होता वह मुरझा गया। सिकुड़ने लगा। अमावस आते-आते वह लोप होता  काला और कुरूप हो गया। उसकी समस्त कलाएं समाप्त जो हो गयी! चन्द्रमा की यह दुर्दषा देख ब्रह्मा को दुःख हुआ। उन्होंने चांद को समझाया, ‘क्यों बना रखी है यह रोनी सूरत! हंसता-मुस्कराता क्यों नहीं? रोने से जिंदगी नहीं कटती। रोने से थोड़े ना होता है समस्याओं का हल। दुख हो, अभाव हो फिर भी तुम्हें मुस्कराना है। यही है जीवन। उसका सौन्दर्य।’ चन्द्रमा को बात समझ आ गयी। उसने फिर से मुस्कराना प्रारंभ कर दिया। लौट आई फिर से उसकी तमाम कलाएं। अमावस का अंधेरा छंट गया था। पूर्णिमा आते-आते इसीलिए वह फिर से अपने पूर्ण सौन्दर्य में निखर हमें मोहने लगता है। सोचिए, तमाम कलाएं है, तभी तो है चांद का यह सौन्दर्य।