Friday, August 20, 2010

चाक्षुष बिम्बों में भावों का सम्प्रेषण

कलाओं में परस्पर द्वैत नहीं अंर्तसम्बन्ध होते हैं। एक कलाकार जब सर्जन करता है तो रचना में निहित उसकी अनुभूति और संवेदना ही उसे उदात्त बनाती है, कईं मायनों में सर्वग्राही भी। फोटोग्राफी को ही लें। चित्रकला की भांति इसमें जो दिख रहा है, वही यदि उभरकर सामने आता है तो उसका कोई कला अर्थ नहीं है परन्तु भावग्राही दीठ वहां है तो वही उसका कला आधार बन जाता है।

बहरहाल, छायाकारी ही नहीं बल्कि किसी भी कला के रूप मंे परिवर्तन होते रहना उस कला को सचेत व प्रभावी रखने के लिए आवश्यक है। पहले पहल जब कैमरा अस्तित्व में आया तब उसका प्रमुख ध्येय जो कुछ दिख रहा है, उसे हूबहू प्रस्तुत करना ही रहा होगा परन्तु जैसे-जैसे उसका विस्तार हुआ, कला माध्यम के रूप में भी उसने अपनी पहचान बनायी। भले ललित कला अकादमी फोटोग्राफी को अभी भी कला नहीं मानें परन्तु माध्यम के रूप में फोटोग्राफी को कोरी यांत्रिक प्रक्रिया भर नहीं कहा जा सकता। रघुराय, ज्योति भट्ट, अकबर पदमसी के छायाचित्रों को ही लेें। क्या वहां कला नहीं है? कैमरा जब यथार्थ में अन्र्तनिहित संवेदनाओं का सृजन करता है तो उस क्रिया में साधारण चीजें कला रूपान्तरण के रूप में ही हमारे सामने आती है। तब तस्वीरों में उभरने वाले अजीबोगरीब दृश्य हमारे अवचेतन मन को छूने लगते हैं। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर छायाकार महेश स्वामी की छाया-कला प्रदर्शनी ‘यात्रा’ से रू-ब-रू होते भी लगा उसकी खींची तस्वीरें यथार्थ का अंकन भर नहीं है। वहां दृश्य में निहित संवेदनाओं, भावनाओं और उस सौन्र्दबोध को भी छुआ गया है जो हमारे अन्तर्मन को झकझोरते कुछ सोचने को विवश करता है। मसलन स्कल्पचर को कैमरे से पकड़ते उसने उसके आकाश, बुलन्द इमारत को भी इस खूबसूरती से प्रस्तुत किया है कि वह यथार्थ में जो दिख रहा है, उससे परे अमूर्त संवेदना का चाक्षुष बिम्ब बन गया है। इसी तरह समारोहों की हलचल में कदमताल को आउट आॅफ फोकस करते जो दृश्य संयोजन किए गए हैं, उनमें एक नये तरह का भावबोध संप्रेषित होता है। यही नहीं ऐतिहासिक इमारत के पानी में पड़ते अक्स, वास्तु धरोहर में परिन्दों के बास, प्रकृति दृश्यावलियों में अन्र्तनिहित सौन्दर्य के बिम्ब कला का सर्वथा नया मुहावरा ही रचते हैं।

मुझे लगता है, संवेदनाओं के चाक्षुष बिम्ब उकेरने वाला छायाचित्रकार भी सर्जक, चित्रकल्पी ही होता है। भावग्राही दृष्टि के अंतर्गत फोटोग्राफी और चित्रकला में परस्परावलम्बता है। दोनों में ही जब सर्जक यथार्थ को एक निजी अनुभव की तरह समझता है तो जीवन के नये तथा अद्वितीय बिम्ब हमारे सामने उभरकर सामने आते हैं और ऐसे बिम्बों के जरिए ही अनंत के बारे में एक जागरूकता विकसित होती है।...तो अब भी क्या फोटोग्राफी को हम कला नहीं कहेंगे!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 20-8-2010

Saturday, August 14, 2010

पौराणिक, ऐतिहासिक चित्रों के रूपक

सर्जनशील कला परम्परा से पोषित होने के बावजूद कलाकार की स्वतंत्र आंतरिक प्रेरणा से ही जन्म लेती है। तैलरंगीय चित्रों को ही लें। कला की यह शैली विदेश से भारत आयी है परन्तु कला की अभिव्यक्ति का सामर्थ्य और सर्जनात्मक ऊंचाईयां इस कला को भारतीय कलाकारों ने अपनी स्वतंत्र आंतरिक प्रेरणा से ही प्रदान की।

राजा रवि वर्मा, बीपी बनर्जी, एम.ए. घोष, माधव विश्वनाथ, जामिनी प्रकाश आदि चित्रकारों की जवाहर कला केन्द्र की सुकृति कला दीर्घा में लगी ‘टिन्ट टू दी मास’ प्रदर्शनी का आस्वाद करते लगा भारतीय कला ने सर्वव्यापी व शाश्वत तत्वों को अपने सम्मुख आदर्श के रूप में रखा है। वहां कलाकार कला के बाह्य रूप तक ही सीमित नहीं रहे हैं बल्कि यथार्थ, आख्यान के भीतर निहित संवेदना, उसके उत्स और भावनाओं पर अधिक गए हैं। यही कारण है कि दर्शकीय दीठ में चित्रकार दार्शनिक और कवि रूप में भी प्रायः मिलता है। क्रोमोलिथोग्राफ्स और ओलियोग्राफ्स तकनीक से मुद्रित शिव-पंचायत, राधा-कृष्ण, नृसिंह भगवान, विष्णु, सिद्वी विनायक और ऐसे ही पौराणिक आख्यान के दूसरे चित्रो की भाव-भंगिमाएं रूपकों की निर्मिती करती हैं। ऐतिहासिक चरित्रों के भी जो चित्र तब कलाकारों ने बनाए वे व्यक्ति चित्र नहीं होकर किसी आख्यान को नाटकीय रूप में उजागर करते हैं। तत्कालीन लोक जीवन की अनुगूंज भी इन चित्रो में विशेष रूप से दिखायी देती है। रामदरबार के एक प्रिंट में यहां राम मूंछो सहित है। लोकाख्यान की यह कला परिणति बहुत से स्तरों पर दूसरे ओलियोग्राफ्स में भी दिखायी देती है। लगभग सभी चित्रों में रेखाओं की रंगसंगति चमकीली व आकर्षक है परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि पश्चिम से प्रेरणा के बाद भी कला की इस शैली में भारतीय परम्परा कहीं विलुप्त नहीं हुई है।

बहरहाल, ओलियोग्राफ यानी तैलरंगीय छाप चित्रों के अंतर्गत पहले पहल फ्लेमिश कलाकार यान वान आइक ने चमकीलापन डाला। उनके इस प्रयोग को बाद में इटली के चित्रकार आंतोनेलो द मेस्सिना ने भी अपनाया और बाद में तो निम्न परत, मोटी परत, सूक्ष्म छटांकन आदि तरीको ंको अपनाते हुए तैल चित्रण पद्धति पूर्णतः विकसित होती चली गयी। थिओडोर जेन्सन नाम के इंगलिश चित्रकार से तैलरंगचित्रण पद्धति की शिक्षा प्राप्त करने के बाद राजा रवि वर्मा ने भारतीय जीवन, व्यक्ति व पौराणिक विषयों को सांगोपांग ढंग से उकेरा। तैलरंगीय चित्रों को भारत मंे शास्त्रीयता प्रदान करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। उन्होंने ही कला की इस तकनीक को बहुसर्जक और एक प्रकार से मनोहारी भी बनाया। उनके बाद ऐसे चित्रों की एक प्रकार से हमारे यहां परम्परा सी ही बन गयी और घरों में आज भी दीवारों पर ऐसे बनाए चित्रों की प्रतिकृतियां के कैलेण्डर टंगे हम देख सकते हैं।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 13-08-10

Friday, August 6, 2010

अनुकृति नहीं, कला सृष्टि

कला अरूप से रूप का सृजन करती है। मानवीय क्रियाओं एवं विचारों का पोषण,  संवर्धन कला ही करती है।    जब से विज्ञान ने कलाओं के दरवाजे पर दस्तक दी है, वे नित नए रूपों में और अधिक लुभाती मन को भाने लगी है। एनिमेशन फिल्मों को ही लें।   परिकल्पनाओं को यथार्थ धरातल पर उतारती कार्टून चरित्रों की यह कला आज विश्वभर में सर्वाधिक लोकप्रिय हो रही है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ, जवाहर कला केन्द्र की एक कला दीर्धा में बाकायदा एनिमेशन चरित्रों की कला प्रदर्शनी लगायी गयी थी। बच्चा बनता मन इसे देख जैसे इसी में खो सा गया था और तभी याद आने लगी थी ढ़ेरो एनिमेशन फिल्में। गोल-गोल, लव-कुश, रोड साईड रोमियो, अलादिन, विक्रम-बेताल, जंबो, दशावतार, कृष्णा, बाल गणेश, हनुमान, हनुमान रिटर्न आदि एनिमेशन फिल्में बनी जरूर बच्चों के लिए है परन्तु इन्हें देखने का लोभ बच्चों के साथ मैंने भी कभी छोड़ा नहीं। इन्हें देखते लगा, यह इनमें निहित कला ही है जो प्रबल मनोवेगों का सहज भावाद्रेक कराती है।  

‘एनीमेट’ का अर्थ है अनुप्राणित करना और इसी से बना है-एनिमेशन। कार्टून कैरीकेचर के रूप में धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक किरदारों को आधुनिक रंग में रंगे देखते लगता है एनिमेशन के जरिए हमारे जेहन में बसे चरित्रों का कार्टून बनाने वालों और फिर कम्प्यूटर के जरिए उन्हें सिनेमा के पर्दे पर जीवंत करने वाले तकनीकी कलाकारों ने पुनराविष्कार कर दिया है। बच्चों के साथ ही बड़ों के लिए भी विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय एनिमेशन चरित्र मिकी माउस का ही है। इतना कि जब कभी यह स्क्रिन पर आता है, दर्शक उसमें डूब-डूब जाते हैं। वाल्ट डिज्नी ने चार्ली चैपलिन की प्रेरणा से यह नायाब कार्टून करेक्टर गढ़ा था। डिज्नी ने अपने सहयोगी एनिमेटर अब आइवक्र्स के साथ मिलकर जब इस चरित्र को गढ़ा था तब इसका नाम था-मोर्टिमर। मजे की बात यह है कि यह नाम डिज्नी की पत्नी लिलियन को बिल्कुल भी नहीं सुहाया। लिहाजा इस कार्टून करेक्टर का नाम हुआ-मिकी। हम सभी जानते हैं यह अब हमारे बीच कितना लोकप्रिय है।

बहरहाल, भावों का संशोधन, चिन्तन की गहनता और कल्पनाशीलता के साथ एनिमेशन कला आज विश्वभर में छा गयी है। यह जब लिख रहा हूं, लियोनार्डो दा विंची बहुत याद आ रहे हैं। कभी उन्होंने ही कहा था, ‘कलाकार अनुकृति नहीं वरन सृष्टि करता है।’ मिथकों, पौराणिक, ऐतिहासिक चरित्रों के साथ ही बहुत सी दूसरी परिकल्पनाओं को इधर आधुनिक यथार्थ के ताने-बाने में बुनती एनिमेशन फिल्में क्या इस दीठ से कला की पुनः सृष्टि ही नहीं है!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 6-8-2010

Saturday, July 31, 2010

पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति

सभी कलाओं का मूल उद्गम लोक है। भारतीय कलाओं में लोक की अनुगूंज हर ओर, हर छोर है। लोक दृश्यों का वहां अक्षय भंडार जो है। दरअसल यह लोक ही है जो आधुनिक और पारम्परिक कलाओं में आनुष्ठानिक उद्देश्यों और चिन्तन के व्यापक अर्थ समाहित करता है।

बहरहाल, हमारी लोक संस्कृति की जड़े आज भी इतनी हरी है कि यही पूरे देश को एकता के सूत्र मंे बांधे भी रखती है। लोक कलाओं के प्रतीक, बिम्ब और संस्कारों में ही जीवन मूल्यों के हमारे आदर्श निहित हैं। लोक संस्कृति पर लेखन से जुड़ी कमलेश माथुर ने पिछले दिनों अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ जब भेजी तो उसका आस्वाद करते लगा, आधुनिक कलाओं में भी यदि लोक का दर्शन नहीं हो तो वे रूखी-रूखी सी बेस्वादी ही लगेगी। मुझे लगता है, जिन आधुनिक कलाकारो ने लोक संस्कृति की परम्पराआंे को अपने सृजन में परोटा हैं, वे ही अधिक चर्चित हुई हैं। यह सही है कि भौतिकता की भागम-भाग के इस दौर में बहुत से स्तरों पर हमारी इन कलाओं का क्षय भी हुआ है परन्तु स्थान-विशेष के संदर्भ में उनकी महक अभी भी बरकरार है।

बहरहाल, लेखिका कमलेश माथुर लोक संस्कृति के गहरे सरोकारों से जुड़ी रही हैं। लोक कलाओं और परम्पराओं पर बहुविध उनके लेखन में मिट्टी की सौंधी महक को सहज अनुभूत किया जा सकता है। ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ पुस्तक में हालंाकि बहुत सी सामग्री पहले भी आयी हुई है परन्तु ग्रामीण अंचलांे में महिलाओं द्वारा घरों में बनायी जाने वाली मिट्टी की महलनुमा कलाकृतियां विषयक ‘वील’, काष्ठ के चित्ताकर्षक चलते-फिरते देवघर ‘कावड़’, भित्ति चित्रण की ‘पड़’, पारम्परिक ‘थेवा’ आदि कलाओं के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रांे मंे बहुप्रचलित ‘घूरा पूजन’, आदिवासियों से संबद्ध ‘भगोरिया प्रणय पर्व’, ‘गवरी’, आदि की परम्पराओं पर उनके मौलिक लेखन की दीठ भी सहज लुभाती है। उनकी इस पुस्तक में लोक कलाओं के विभिन्न अनछुए पक्ष भी अनायास ही उद्घाटित हुए हैं हालांकि उनकी संक्षिप्तता खटकती भी है। ऐेसे में मन मंे कहीं यह भाव भी अनायास ही आता है कि ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में लोक से जुड़ी परम्पराओं को सहेजते हुए उनको व्यापक अर्थों में उद्घाटित करने के व्यापक प्रयास हों तो लोक कलाओं, बेषकीमती धरोहर और उससे जुड़ी हमारी संस्कृति का सही मायने में संरक्षण हो सकता है। ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ इस संदर्भ में गहरी आष जगाती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 30-07-2010

Friday, July 23, 2010

स्वर, राग और ताल का अनूठा आस्वाद

वाद्य संगीत में स्वर, राग और ताल का कहीं परिपूर्ण मेल है तो वह है बीन में। बीन माने वीणा। तार वाद्यों के सम्पूर्ण संकुल की द्योतक। अव्यवहित आकर्षण में संगीत का समग्रता में सृजन करती हुई। यह वीणा ही है जो शब्दों से परे नाद सौन्दर्य में व्यक्ति और वस्तु के बीच की विसंधि को वीलिन करती है। इसलिए कि प्रकट संगीतीय अभिव्यक्ति कंठ माध्यम की अपेक्षा वीणा अधिक प्रांजल जो है।

बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों जब अखिल भारतीय रूद्र वीणा समारोह का आयोजन हुआ तो कर्नाटक से आयी देश की पहली महिला रूद्र वीणा वादक ज्योति हेगड़े को सुनते नाद सौन्दर्य को जैसे गहरे से जिया। रूद्र वीणा वादन में वह ध्वनि में अन्र्तनिहित सौन्दर्य की जैसे बढ़त करती है। वह वीणा बजा रही थी परन्तु लग ऐसे रहा था जैसे वह गा रही है। वाद्य संगीत को कंठ संगीत की प्रतिकृति करते वह स्वरों के पूर्ण प्रलंबों और सूक्ष्म गमक में मन को भीतर तक झंकृत करती है। अपनेपन से भरते। राग मीया मल्हार का उनका रूद्र वीणा वादन सुना तो लगा स्वरों की बढ़त में जैसे वह हर बार अपने आपको ही रचती हैं। उनका यह रचना ऐसा है जिसमें संगीतीय अन्तरावधियों की समग्रता को सहज अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, यह रूद्र वीणा ही है जिसमें संगीतीय मुहावरे के साथ-साथ उसकी गति को सुनने वाला अनुभूत कर सकता है। उस पर नजर रख सकता है।

ज्योति हेगड़े ने रूद्र वीणा में अपने आपको पूर्णतः साधा है। गत में लय को क्रमशः बढ़ाते हुए रूद्र वीणा पर चलती उनकी अंगुलियां राग और ताल को एकमेक करती अनूठा रस प्रदान करती है। राग मीया मल्हार में वर्षा की गिरती टप-टप बूंदों को उसने इस करीने से रूद्र वीणा में साधा कि बंद प्रेक्षागृह में भी झमा-झम का अहसास होने लगा। रूद्र वीणा के तारों में जब वह बढ़त कर उसे क्लाइमेक्स पर ले जाती है तो उत्तेजना के विपरीत प्रशांति पर बल देती है। वादन का उनका यह संगीतीय मुहावरा ही उन्हें ओरों से जुदा करता है।

बहरहाल, प्राचीन एवं मध्यकालीन संगीत शास्त्रीय ग्रंथों में अलापिनी, घोष, चित्रा, किन्नरी, सरस्वती वीणा, त्रितंत्री, सार वीणा, नारद वीणा, विपंची और रूद्र वीणा का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है। शिव के एक नाम से व्युत्पन्न और शिव द्वारा सृजित होने के कारण रूद्र वीणा बाहर और भीतर से सौन्दर्य की प्रतीक है। इसे सुनते लगता है, वाद्य संगीत अनायास ही शब्दों से परे नाद के शुद्धतर विश्व से साक्षात् कराता है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 23-7-2010

Friday, July 16, 2010

अर्थपूर्ण स्पष्टता में भावों का सघन संचरण

चित्रकला में रंग, रेखाएं, टैक्सचर और स्थापत्य मिलकर बिंबो और रूपकों को रचते है। इस दृष्टि से युवा चित्रकार सुरेन्द्र सिंह के चित्रों का कला आकाश विशेष रूप से लुभाता है। उसके चित्रों में रूपकों की तलाश में दृष्टियों की बहुलता है। किसी एक थीम की बजाय एक साथ बहुत से विषयों को कैनवस पर निरूपित करते उसके चित्रों की बड़ी विशेषता यह है कि आकृतिमूलकता में अमूर्तन का रोचक अध्याय है। सद्य बनायी उसकी ‘प्रकृति’ श्रृंखला चित्रों को देखते मुझे लगता है, माध्यम से अधिक आशय की अर्थवत्ता में वह कला की बारीकियों में गया है।

बहरहाल, उसके चित्रों से रू-ब-रू होते यह अहसास स्पष्ट ही होता है कि वह किसी खास संकल्पना और विचार को लेकर कार्य प्रारंभ नहीं करता। जो कुछ हो रहा है, वह उसके कैनवस पर भी वैसे ही घटित होता है। हां, महत्वपूर्ण यह जरूर है कि प्रतिकात्मकता मंे कैनवस पर फूल और पत्तियों के जरिए ही वह संवाद करता है। पार्श्व में हल्के काले रंग को धूसरित करते वह औचक कहीं लाल और कहीं हरे रंगों में अनूठे बिम्बों की सर्जना करता है। एक्रेलिक, ऑयल और जल रंगो के उसके चित्रों में त्रिआयामी प्रभाव भी है। यह ऐसा है जिसमें लोक चित्रो में प्रयुक्त अलंकरण, फूल-पत्तियों की सौरभ तो है ही समकालीन बोध की विशिष्ट अर्थ छवियां भी है। खास बात यह जरूर है कि अमूर्तन होते हुए भी उसके ऐसे चित्रों मे आधुनिकता द्वारा पैदा विभ्रम नहीं है। मुझे लगता है समकालीन सरोकारों के अपने कला बोध में वह अपने चित्रों में प्रकृति और जीवन को सर्वथा नये ढंग से रूपायित करता है। यही उसके चित्रों की वह विशेषता है जो उसे अपने समकालीनों में भी सर्वथा अलग पहचान देता है।

प्रकृति के पंचभुत तत्वों में अग्नि, जल, वायु को अपने चित्रों में केन्द्र में रखते वह कला के गतिशील प्रवाह की सृष्टि भी करता है। कैनवस पर चित्रों का उसका लोक इसलिए भी लुभाता है कि उसमें स्वयंमेव प्रतिष्ठित होने का आग्रह नहीं है। मैटेलिक कलर के पार्श्व में उसके बहुतेरे चित्रों में गहरे से हल्के होते रंगों के बीच उभरते मोर पंख, रंग बिरंगे फूूल और परम्परा बोध के तहत उकेरी गयी पत्तियां में अनुभव का अनूठा भव है। विषय वस्तु में चित्र यहां आकारनिष्ठ हुए भी यहां रूपों को नैसर्गिकता प्रदान करते हैं। ग्राफिक में मटमेले होते रंगों में सुरेन्द्र सिंह के चित्रों में अर्थपूर्ण स्पष्टता और भावों का सघन संचरण है। किसी भी कला का वैशिष्ट्य और उसकी सफलता व्यक्तिगत आनंद की यह समाजगत अनुभूति करा देना ही क्या नहीं है!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 16-07-2010

Friday, July 9, 2010

अविगत गति कछु कहति न आवै...

बारिश की बूंदे मन को गढ़ती है, कुछ रचने के लिए। आसमान से टप-टप गिरती बूंदे जैसे हमें जगाती है-कुछ करने के लिए। इस बार जब बारिश हों तो आप उसे देखें नहीं, उसे सुनें और गुनें। आपको लगेगा प्रकृति गा रही है। प्रकृति के इस मधुर गान में, लगेगा आपके भीतर का कलाकार भी गा रहा है। मन तब जो गाता है, वही अनाहत नाद है। साहित्य, संगीत और कलाओं का अग्रज यह भीतर का हमारा अनाहत नाद। अंर्तध्वनि का प्रतीक यह सधे हुए वाद्य वृन्द की भांति बजता है। यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद के रूप में बज पड़ता है। अनाहद नाद का मूल स्त्रोत हमारी अनुभूति है। प्रकृति को महसूस करने की हमारी दृष्टि है। भावात्मक होने से अव्यक्त यानी अविगत है यह। इसीलिए अनाहत नाद भी अव्यक्त है। कहा भी तो गया है, ‘अविगत गति कछु कहति न आवै।...’

संगीत के इतिहास लेखक सांबमूर्ति कहते हैं, ‘अनाहत नाद को हमे महत्व देना चाहिए। नाद से ही यह समस्त विश्व निनादित जो है।’ सच ही तो कहते हैं सांब! बारिश जब होती है तो मोर बोलते हैं। कोयल गाती है। चिड़ियाएं चहचहाती हैं। प्रकृति मौन में भी अनूठे संगीत का आस्वाद कराने लगती है। कलाकृति प्रकृति के इन गुणों से ही क्या नहीं निकलती!

इस बार की बारिश में मन के भीतर के इस नाद को सुनें। आपको लगेगा आप वह नहीं है जो हैं। आप अपने भीतर के कलाकार को पहचानने लग जाएंगे। आपको लगेगा, आप भी कुछ रच सकते हैं। संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं का जन्म आपके भीतर के कलाकार से ही तो होता है। वह प्रकृति से ही तो प्रेरणा ग्रहण करता है। इसीलिए तो हमारे यहां कहा गया है, कलाएं केवल शरण्य ही नहीं हैं। आश्रय भी हैं। जिनमें अपने आपको अभिव्यक्त करते बहा जा सकता है। तैरा जा सकता है। सच्ची कला आपको वहां ले जाती है जहां आप पहले कभी न गए हों।...भले कईं बार वह जानी-पहचानी जगह पर भी ले जाती है परन्तु तब उस स्थान को अप्रत्याशित ढंग से देखने के लिए वह आपको विचलित भी करती है। यह प्रकृति है, बारिश की बूंदे हैं जो परम्पराओं के भान में स्मृतियों का गान कराती है।

आईए, इस बार बारिश को देखें नहीं उसे सुनें भी। इस सुनने मंे जो सुकून है, उसे अनुभूत करें। प्रकृति के अनाहत नाद में बचेगा वही जो रचेगा।...तो आईए, बारिश की बूंदों को रचें। कैनवस पर उकेरे सृष्टि के इस अनुभव के भव को। प्रकृति कितना दे रही है। हम क्या उससे उतना ले रहे हैं!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित
डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 9-7-210

Friday, July 2, 2010

कबीर का अनहत नाद, कुमार गंधर्व का गान

चौंसठ  कलाओं में सर्वश्रेष्ठ और पहली कला संगीत है। इसलिए कि यह संगीत ही है जो बगैर किसी मध्यस्थ के सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करता है। संगीत के हर अलाप में ध्वनि से भावों की व्यंजना की जाती है। कुमार गंधर्व को जब भी सुनता हूं, संगीत के इन गुणों को जीने लगता हूं। मुझे लगता है संगीत के जरिए वह मन के भीतर झांकने का अवसर देते हैं। अशोक वाजपेयी के शब्दों मे कहूं तो वह जब गाते हैं तो समय ही नहीं बल्कि समयातीत भी बोलता है। मित्र सुनीत मुखर्जी के बहाने उनकी गायी कबीर की वाणी ‘उड़ जायगा हंस अकेला...’ फिर से सुनी तो लगा संगीत श्रव्य सुख ही प्रदान नहीं करता मन की आंखों को जगाने का कार्य भी करता है। यह कुमार गंधर्व ही हैं जो श्रव्य में मनःदृश्य का ऐसा आस्वाद कराते हैं।

बहरहाल, कबीर की वाणी अनहत नाद है। अलायदा फक्कड़पन लिए वह जब कहते हैं, ‘गुरू की करनी गुरू जायेगा, चेले की करनी चेला...’ तो जीवन का मर्म गहरे से समझ आने लगता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। शब्दों का व्यर्थ आडम्बर नहीं। सीधे सपाट जो कहना है, कहा है..और कबीर के शब्दों में कुमार गंधर्व ‘ज्यों की त्यों धर दीनी...’ की तरह संगीत में उसे वैसे ही सुनने वालों के सामने रख देते हैं। शास्त्रीय गान में अमूर्तन से परे कुमार गंधर्व अनूठी वाचिकता प्रदान करते हैं। ऐसी जिसमें मन की आंखे खुल जाती है। तब असार जीवन का जो चित्र उभरता है, उसमें लगता है सारे पड़पंच व्यर्थ है। कर्म गति का गंधर्व गान अलभ्य कलात्मकता से मन के भीतर अनूठा आलोक देता है।

सच! यह कुमार गंधर्व ही हैं जिन्होंने  कबीर की रचनाओं को शास्त्रीय रागरूप प्रदान करते उसके भीतर के मर्म को इस गहराई से छुआ है। सुनने वाला उनके गान में कबीर के फक्कड़पन, दिगंबरत्व को सहज अनुभूत कर सकता है।

कबीर तो लोकोन्मुखी ही थे परन्तु उनकी वाणी का शास्त्रीय संगीत में लोकोन्मुखीकरण करने का कार्य कुमार गंधर्व ने ही किया। अलंकार रहित उनके गान में साजों पर ध्यान नहीं जाता, इसलिए कि वहां उनका गायन प्रमुख है। आरोह-अवरोह के उनके भाव महत्वपूर्ण है। वह कबीर को अपने गान में हृदय की अंतरतम गहराईयों से जीते हैं। कबीर के सीधे सपाट शब्द वहां हैं परन्तु उनके अचूक अर्थों की अनुभूति संगीत स्वतः कराता है। कबीर की वाणी का अनहत नाद ही क्या सृष्टि के संगीत का सच नहीं है!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट"
दिनांक 2-07-2010

Friday, June 25, 2010

कैनवस पर प्रकृति का गान

अदिति चक्रवर्ती के चित्रों में अमूर्तन की सर्वथा नयी व्यंजना है। प्रकृति को सम्पूर्ण फलक पर अपने तई आधुनिकता में परोटते वह रंगों और रूप के सर्वथा नये बिम्ब रचती है। उसके कैनवस पर एक दूसरे से जुड़ते-विलग होते अनेक रंगों के थक्के हैं। अमूर्तन में वह अलंकारों का अधिक रचाव नहीं करते हुए भी सूक्ष्म दृष्टि में अद्भूत लैण्डस्केप की निर्मिती करती है। यह ऐसा है जिसमें दूर तक के पहाड़, चट्टानें, नदियां, कल-कल बहता झरना, धरित्री पर दूर तक पसरी हरितिमा और पक्षियों के कलरव को साफ सुना जा सकता है।...रंगों के आलोक में वह दूरी और नैकट्य का, सन्निधि का कैनवस पर बेहद खूबसूरत संयोजन करती है।

कैनवस पर एक्रेलिक रंगों में ‘वेली आॅफ जॉय’, ‘वाईल्ड फ्लोवर’, ‘स्प्रेडिंग लाईट’ जैसे अपने चित्रोें में अदिति कैनवस प्रकृति का एक प्रकार से पुनराविष्कार करती है। उसका एक बेहद खूबसूरत सा चित्र है, ‘ग्रीन पॉयम’। पर्वतों पर उमड़ते-घुमड़ते काले, भूरे बादल, हरियाली से लदे पहाड़, उनमें बहते झरने, धरती पर कल-कल बहती नदी और पक्षियों की उड़ान और इन सबके साथ प्रकृति के संगीत को कैनवस पर यहां कुची से जैसे साधा गया है। कैनवस पर रंग उड़ेलते इस कलाकृति में सृष्टि के सौन्दर्य को इस कदर जीवन्त किया गया है कि मन करता है, निहारते रहें कलाकृति।

दरअसल, रंगों को बरतने का अदिति का अपना अंदाज है। इस अंदाज में वह कैनवस पर रंग बहाती है। इन बहते हुए रंगों में ही वह कैनवस पर माप व आकारों को विकसित करती है। उसके चित्रों पर गौर करें तो पाएंगे कि वहां प्रकृति का पूरा एक नाट्यवृत्त तैयार होता है। समृद्ध और गैर पारम्परिक रंगों के अंतर्गत वह विभिन्न रंगों का एक साथ प्रतिरोधी रूप भी तैयार करती है, ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति पल-पल में अपना रंग और रूप बदती कभी विकराल होती है तो कभी सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि करती है। काले रंग में भी वह प्रकृति का रूपान्तरण बेहद खूबसूरती से करती है तो हरे, नीले, लाल, पीले रंगों का उसका प्रयोग भी सर्वथा नयापन लिए है। उसके कैनवस पर जंगल की हरियाली, बहती नदी, फूल, पत्तियां, झरनों और सूर्य की रोशनी के अद्भुत बिम्ब हैं। इन बिम्बों की खास बात है-आकारों की असीमितता, स्वच्छन्द संयोजन और विषय वस्तु की स्वतंत्रता। मूर्त-अमूर्त के बीच संघर्ष का नाद यहां है तो विषय की समग्रता में व्याप्ति भी है। हॉं, बिम्बों की पुनरावृति भी अदिति के चित्रों में है परन्तु नयेपन की व्यंजना के कारण उसकी पुनरावृति खलती नहीं है बल्कि हर बार अनूठा भावबोध देती है। मुझे लगता है, एक्रेलिक रंगों में चित्रों की उसकी अमूर्तता चित्त और चेतस् को हरने वाली है। सच! सौन्दर्य के प्रतीकों की सृष्टि में अदिती अपने चित्रों में सांगीतिक आस्वाद कराती है। मन करता है, कैनवस पर प्रकृति के उसके इस कला गान को सुनें और फिर निरंतर गुनें।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 25-6-2010

Friday, June 18, 2010

कला चिन्तन की समृद्ध परम्परा का आलोक

 हमारे यहां ललितकलाओं, उनकी परम्परा और पद्धतियों पर प्रेमचन्द, जयशंकरप्रसाद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, विद्यानिवास मिश्र, गुलेरी, भदन्तआनंद कौसल्यायन, दिनकर, राय कृष्णदास, गुलाम मोहम्मद शेख, वासुदेवशरण अग्रवाल, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल आदि ने निरंतर लिखा है। कला के प्रतिमानों, उसके मूल्यों, उपयोगिता और कला पद्धतियों के विश्लेषण की दीठ से यह लिखा बेहद महत्वपूर्ण है परन्तु विडम्बना यह भी रही है कि अंग्रेजी और अंग्रेजीदां लोगों द्वारा निरंतर हिन्दी कला आलोचना की भाषा को दरिद्र और व्यवस्थित नहीं कहकर एक साजिश के तहत उसे हासिये पर रखा जाता रहा है। इसका बड़ा कारण शायद यह भी है कि हिन्दी में कला आलोचना कर्म का व्यवस्थित संग्रहण नहीं हुआ है।

‘समकालीन कला’ के संपादक और आलोचक ज्योतिश जोशी कहते हैं, ‘...हिन्दी और दूसरी भाषाओं में लिखने वालों ने पूरे मनोयोग से कला समीक्षा की भाषा स्थिर की, उसके मूल्यांकन के नए प्रतिमान बनाए और पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कला समीक्षा को विकसित करने की चेष्टा की। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हिन्दी की अपनी सहज शैली में विवरण, विश्लेषण, संवाद और अध्ययन की तार्किकता के साथ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामाने लाकर वर्तमान संदर्भ में कला परम्पराओं, पद्धतियों और उसका समेकित आशय करने वाली यह परम्परा हाशिए पर चली गई।’

जोशी ने इधर इस दृष्टि से बेहद महत्वूर्ण कार्य किया है। भारतीय कला चिन्तन के अंतर्गत हिन्दी मंे गत सौ वर्षों में लगभग पांच सौ निबंधों के पांच हजार पृष्टों में से कोई बारह सौ पृष्ठों का ‘कला विचार’, ‘कला परम्परा’ और ‘कला पद्धति’ शीर्षक से तीन खंडों में जोशी ने जो संपादन कार्य किया है, वह सर्वथा अनूठा है। इस दृष्टि से भी कि इसमें उन्होंने देशभर की साहित्य, संस्कृति अकादमियों, संस्थानों के साथ ही साथ विभिन्न नगरों मे रह रहे कलाविदों और कलाप्रेेमियों के निजी संग्रहों से भी व्यक्तिगत प्रयास कर सामग्री जुटायी है।

मुझे लगता है, भारत में कला के चिन्तन, कला परख की भाषा और उसकी परम्परा पर जोशी का यह कार्य हिन्दी में कला आलोचना का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जो लोग हिन्दी में कला आलोचना की अपनी भाषा और परम्परा नहीं होने का रोना रोते है, उनको भी जोशी का यह संपादित कार्य एक बेहतरीन जवाब है।

 "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 18-6-2010

Friday, June 11, 2010

श्रीनाथजी के चित्रों में परम्परा का पुनराविष्कार

श्रीनाथजी के चित्रों से रंग एवं रंगतों के निरूपण को नये आयाम देते डॉ. सुभाष मेहता ने परम्परा का जैसे इधर पुनराविष्कार किया है। उनके ऐसे चित्रों को देखने का पिछले दिनो जब सुयोग हुआ तो लगा, रंगों की सघनता के साथ ही रूपाकारों एवं भावनाओं की यथार्थवादी परिकल्पना में उनके चित्रों के एक-एक संघात में जैसे विशेष अर्थ छुपा हुआ है।

मुझे लगता है, श्रीनाथजी के उनके चित्रों में लयबद्ध गति के साथ लौकिक स्पन्दन है। कैनवस पर फ्रेस्को तकनीक की अनुगूंज, किसनगढ़ और दूसरी राजस्थानी चित्र शैलियों का सांगोपांग मेल और इन सबके साथ चटकिले रंगों का उन्मुक्त और स्वछन्द प्रयोग करते उन्होंने परम्परा के साथ आधुनिकता को भी जैसे निरंतर जिया है। विशेष रूप से उनके चित्रों की कैलीग्राफी में मधुराष्टकम्, यमुनाष्टकम के साथ ही वेद मंत्रों, ऋचाओं, प्राचीन लिपियों के रचनात्मक आधार में श्रीनाथजी, उनकी गायों और भक्तों का जो रूप अंकन हुआ है वह कला की दीठ से सर्वथा नया है। श्रीनाथजी का रूपांकन करते उन्होंने उनकी मुखाकृतियों को स्वीकृत परम्परागत लक्षणों एवं प्रमाणों के घेरे से भले दूर नहीं जाने दिया है परन्तु आधुनिक एवं कला की नव प्रवृत्तियों का लयबद्ध एवं स्वच्छन्द प्रयोग करते उन्होंने इनमें रचनात्मक सौन्दर्य के जो भाव संजोए हैं वे कला की आधुनिक संवेदना लिए अलग से आकृष्ट करते हैं। उन्होंने अपनी ऐसी कलाकृतियों में स्पेस को विभक्त करती रेखाएं अलग से खींची है। रस्सी सी ये रेखाएं कहीं चित्र के ठीक बीच में से गुजरती है तो कहीं ऊपर और कहीं नीचे चित्र के स्पेश को विभाजित करती छवि और उसे देखने वाले के बीच महीन भेद करती बहुत कुछ कहती है। ऐसे चित्रो को बगैर रेखा देखने की जब कल्पना करता हूं तो लगता है उनमें सहज सौन्दर्य जैसे औचक लोप हो गया है। मुझे लगता है, स्पेश विभाजन की यह रेखाएं ही हैं जो उनके चित्रों में आधुनिकता का गहरा सौन्दर्यबोध जगाती है।

श्रीनाथजी की विभिन्न झांकियों के उनके चित्रों में एक चित्र में बालकृष्ण के समक्ष सुरदास तानपुरा लिए गा रहे हैं। मंद मुस्काते बालकृष्ण उनके गान में इस कदर खो गए हैं कि मुरली वाला उनका हाथ अपने आप ही नीचे चला गया है...श्रीनाथजी के विराट का ऐसा मोहक रूप देखने वाले से जैसे संवाद करता है। मिनिएचर से प्रेरणा लेते उनके लगभग सभी ऐसे चित्र कला के उस आधुनिकबोध की ओर प्रवृत हुए हैं जिसमें रंग और रेखाएं देखने वाले की दृष्टि में कला की नयी सृष्टि करती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमर व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 11-6-2010

Friday, June 4, 2010

कला, कलाकार और रूप


भारतीय चित्रकला की परम्परा में रूप के स्पष्टीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। मूर्त ही नहीं अमूर्त भी यदि कुछ बनाया गया है तो उसके पीछे एक सोच, एक दृष्टि और उसकी स्पष्टता जरूरी है। शायद इसीलिए हमारे यहां कलाकार अपने अनुभवों, स्मृतियों को आकार देते हुए रूप को निरंतर सरलीकृत करते रहे हैं। रेखाचित्रों में तो यह बात विशेष रूप से रही है। सहज, सरल रेखाओं की ऐसी कलाकृतियां सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की संवाहक बनती मानव मन को झकझोरती है। व्यक्ति चित्र और जो कुछ दिखायी देता है, उस यथार्थ के अंकन में भी वहां कलाकार की कला की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता स्प्ष्ट नजर आती है। अनुभव और संवेदनाओं के अमूर्तन में भी कलाकार का अपना निजत्व वहां बरकरार मिलेगा।

बहरहाल, इधर नये कलाकारों का लाईन वर्क में जरा भी रूझान नहीं दिखायी देता। लगता है, मस्तिष्क और हाथ के अनुशासन में उनकी कोई रूचि ही नहीं है। यही कारण है कि आधुनिक कलाकृतियों के नाम पर जो कुछ बन रहा है, उनमें लय नहीं है। रूप की जटिलता पर वहां ज्यादा जोर है। कुछ ऐसा बने जो समझ से परे हो। अमूर्तन के नाम पर स्पष्टता को जैसे निरंतर बिसराया जा रहा है। कैनवस पर अनुभव और संवेदनाओं के बिम्ब प्रकट में भले सूक्ष्म और अमूर्त लगे परन्तु वास्तव में इनका एक आकार और एक निश्चित स्वरूप होता है। देखने वाले को यह स्पष्ट नजर आना चाहिए। यदि इसमंे अस्पस्टता है तो फिर आकृतियों मे चाहे जैसे रंगो का सुन्दर प्रयोग कर दिया जाए, रंगों के थक्कों के अतिरिक्त देखने वाला वहां कुछ अनुभूत नहीं करेगा। अमूर्त यदि स्प्ष्ट है तो देखने वाला रंग नहीं होते हुए भी किसी कलाकृति में कलाकार के संवेदना बिम्बों के जरिए रेखाओं में रंगों की लय का सांगीतिक आस्वाद कर सकता है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ, के.के. हेब्बार की एक पुस्तक आयी थी, ‘द सिंगिंग लाईन’। अभी भी यह मस्तिष्क पर जैसे छायी हुई है। पुस्तक में हेब्बार के कम से कम रेखाओं द्वारा अधिकतम प्रभाव के ऐसे रेखांकन हैं जिनमें संगीत और नृत्य को अनुभूत किया जा सकता है। वहां रूप की जटिलता नहीं है। फार्म को सर्वथा सरलीकृत करते हेब्बार ने जो चित्र बनाए हैं, उनमें रेखाओं का अनूठा प्रवाह है, आकृतियों की सुस्पष्टता है। संवेदना, अनुभूतियां और स्मृतियों के अनेक बिम्ब वहां हैं परन्तु सब कुछ स्पष्ट है। अस्पष्ट नहीं। अमूर्तन में भी सहजता ऐसी कि हर कोई देखकर सुकून महसूस करे। कला का परम सत्य क्या यही नहीं है? जो कुछ कलाकार बनाए, उसमें अर्थ गांभीर्य तो हो परन्तु अस्पष्टता की संपे्रषणीय बाधा नहीं हो।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश  कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 4-6-2010

Friday, May 28, 2010

कला, कलाकार और बाज़ार


हाल में हुसैन की एक कलाकृति भारतीय दामों मे करोड़ों  में बिकी है। कला बाजार में मंदी के बावजूद उनकी इस कलाकृति के इतने दामों को लेकर कलाजगत में खासी चर्चा रही। दरअसल ख्यात-विख्यात कलाकारों की कलाकृतियां लाखों-करोड़ों में बिकने का यह ऐसा दौर है जिसमें कला की बजाय कलाकार की खाति बिकने लगी है। कलादीर्घाएं इसी आधार पर कलाकृतियांे का मूल्यांकन करने लगी है कि यदि किसी बड़े कलाकार ने कलाकृति बनायी है तो वह बहुत अच्छी ही होगी...स्वाभाविक ही है उसके दाम भी बाजार में अच्छे निर्धारित होंगे। यानी कलाकार प्रमुख हो गया है, कला पीछे चली गयी है। बड़े-बड़े होटल, घराने, संस्थान भी उन्हीं कलाकृतियों को अपने यहां लगाना चाहते हैं, जो किसी विशिष्ट कलाकार ने बनायी हो, भले वह कलाकृति कैसी भी हो।

कला का यह भारतीय दृष्टिकोण कभी नहीं रहा है। हमारे यह आरंभ से ही कला महत्वपूर्ण रही है, उसे बनाने वाला नहीं। अजन्ता, एलोरा के गुफा चित्र हों या फिर विभिन्न शैलियो के अन्य लोकप्रिय चित्र, उनको बनाने वाला कौन है, कोई नहीं जानता परन्तु अनमोल कला धरोहर के रूप में इन्हें सभी जानते हैं। वैसे भी हर युग की कला में अपने समय की अनुगूंज होती है। युग के तमाम विश्वासों से, तमाम उत्सवों, संघर्षों, जीवन की तमाम आपदाओं-विपदाओं से अनेक प्रकार के संचारियों से, अनेक प्रकार के रचे मिथकों से वह जुड़ी होती है। इसी से फिर कला में नूतनता का आर्विभाव होता है परन्तु इधर जो कलाकृतियों करोड़ों, अरबों में बिकती है, उन्हें देखकर यह कहा नहीं जा सकता कि वे किस युग का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। बाजार केवल इसलिए उनका बड़ा दाम निर्धारित करता है कि उनको बनाने वाला अपने आपको चर्चित करने में माहिर हैं। आर्ट गैलरियां निंरतर खुल रही है, परन्तु वे मूलतः दुकानें हैं। कला व्यवसाय निरंतर बढ़ रहा है परन्तु अच्छी कला के बावजूद अपनी मार्केटिंग नहीं कर सकने वाले कलाकार अभी भी हासिए पर हैं। जब कभी किसी बड़े कलाकार की कलाकृति के करोड़ों में बिकने की सूचना आती हैं, वे भी आस संजोते हैं। सरकारी कला दीर्घाओं में अपने पैसे व्यय कर प्रदर्शनियों का आयोजन करते हैं, कलाकृतियों की फ्रेमिंग करवाते हैं और फिर इन्तजार करते हैं कि उनकी कलाकृति के भी लाख नहीं तो कुछ हजार तो मिल ही जाएंगे परन्तु वे बाजार की कलाकारी नहीं जानते। वहां कलाकृति मंे निहित कला बारीकियां नहीं बल्कि ब्राण्ड जो बिकता है। जितना बड़ा ब्राण्ड उतना अधिक दाम। निःसंदेह कलाकृतियां लाखों-करोड़ों मे बिकने लगी है परन्तु उनकी ही जो अपने आपको बेचना जानते हैं। आम कलाकार तो आज भी वहीं खड़ा है।...आपको नहीं लगता?
डॉ.राजेश कुमार व्यास का प्रति शुक्रवार को "डेली न्यूज़" में प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक 28-5-2010

Friday, May 21, 2010

दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते चित्र

अमित कल्ला ने सम-सामयिक कला में इधर अपनी सर्वथा नयी पहचान बनायी है। अभिनव अंतर्दृष्टि और तकनीक की सुस्पष्टता के साथ ही सौम्य, संवेदी और अबाध रेखाओं के उसके चित्रों में परिकल्पित रंग संयोजन भी अलग से ध्यान खींचता है। लगभग सभी चित्रांे में हरे, नीले, काले, पीले, लाल आदि सभी रंग हल्के, ऐंद्रिक और नियंत्रित हैं। शास्त्रीय परिवेश में आधुनिकता को परोटते अमित अपने चित्रों के प्रतीक और बिम्बों के जरिए जैसे खुद के सर्जक मन की आकांक्षाओं की तीव्रता का उद्गार करते है।

कुछ साल पहले जयपुर में ही अमित के घर पर बने स्टूडियों में कवि, आलोचक नंदकिशोर आचार्य एवं प्रयाग शुक्ल के साथ जाना हुआ था। उसकी कलाकृतियों में अंतर्निहित शक्ति, एंेद्रिकता और वस्तुपरकता ने पहले पहल तभी प्रभावित किया था। बाद में तो कला प्रदर्शनियों और अन्य संदर्भों में निरंतर उसकी कलाकृतियों से साक्षात्कार हेाता रहा है। हर बार उसके चित्रों की तात्विकता और निजता ने आकर्षित किया है। अमित के चित्रो में स्वर लहरियों का उभरता अमूर्तन भी बेहद आकर्षक है। आरोह-अवरोहण के ऐसे ही उसके एक चित्र में काले, पीले, नीले और लाल रंग से उभरते रंगीय थक्कों में आकाश और पृथ्वी की ऊर्जा के प्रतीक के रूप में उभरते ग्रह, नक्षत्र, तारे, चांद और भिन्न आकृतियो के फूलों में सर्वथा नया अर्थोन्मेष हैं। यहां सफेद पिरामिड में उभरते बिन्दु कैनवस की अनंत ऊर्जा के  जैसे संवाहक बने हैं। उनका यह चित्र ऐसा है जिसमें प्रकृति और जीवन का संगीत है। रंगों के प्रवाह में जीवन को गहरे अर्थों में व्याख्यायित करते ऐसे ही उसके दूसरे चित्रों में मोरपंख, प्रवाल भित्तियां, शंख, सीपी और आदिवासी कला की मांडनाकृतियां सरीखे बिम्ब और प्रतीक दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते हैं।

अमित ने कभी एनर्जी चित्र श्रृंखला बनायी थी। इसमें आकृतियों की जकड़न है परन्तु तकनीकी की जटिलता नही है। गहरे नीले रंग की एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होती आकृतियों की ज्यामितीय संरचना में मौलिकता में अनूठी कल्पनाशीलता है। ऐसे उसके चित्रों की जटिल संरचनाओं में भी रेखाएं सौम्य, संवेदी और अबाध रूप में प्रवाहपूर्ण है। व्यक्तिगत मुझे लगता है, अमूर्तन में स्पष्टता लिए उसके चित्रों में अनूठी गीतात्मकता है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २१-५-2010