Saturday, October 12, 2013

संस्कृति के सौन्दर्य चितराम

संस्कृति माने जीवन से जुड़े संस्कार। स्वाभाविक ही है, इसमें विचार, सूक्ष्म कल्पनाएं, भावनाएं आदि सभी कुछ के संस्कार निहित हैं। जब कभी किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा होता हूं, लगता है वहां प्रदर्शित-ध्वनित हमारी अनन्तरूपा संस्कृति से ही साक्षात् हो रहा होता हूं। उस संस्कृति से जो साहचर्य के गुणों से संपन्न है।  
बहरहाल, बिड़ला सभागार में कुछ दिन पहले पावरग्रिड कारपोरेशन आफ इण्डिया द्वारा क्षेत्रीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थी। पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड और ऐसे ही तमाम दूसरे प्रांतो से जुड़े उपक्रम के कार्मिक और उनके परिजन कलाकारों ने इसमें अपनी प्रस्तुतियां दी। प्रतियोगिता निर्णायक की भूमिका के रूप में भाग लेते संकट मेरे समक्ष यह था कि बेहतरीन प्रस्तुतियों में से कैसे किन्हीं तीन उत्कृष्ट प्रस्तुतियों को छांटा जाए। इसलिए कि पंजाब से आए दल ने भांगड़ा में खेतों में होने वाले श्रम के महत्व का सांगोपांग चितराम किया था तो उत्तराखंड के कलाकार दल ने हाल ही आयी वहां की त्रासदी को जीवंत करते भगवान शिव का अद्भुत नृत्य प्रस्तुत कर सभागार को सम्मोहित सा कर दिया। आगरा के दल ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को जीवन्त किया तो बल्लभगढ़, कानपुर, लखनऊ से आए कलाकारों ने अपने-अपने क्षेत्र की संस्कृति जुड़ी नृत्य, नाट्य प्र्रस्तुतियां दी। राजस्थान के दल ने उत्सवधर्मी राजस्थान के विविध रंगों को अपनी प्रस्तुतियों में गहरे से जिया। संस्कृति से जुड़ी इन तमाम प्रस्तुतियों का आस्वाद करते निर्णय के वक्त यह भी अनुभूत किया कि देश-काल-परिवेश से उत्पन्न विभिन्नताएं हमें भिन्न करने की बजाय एकसूत्रता के धागे में पिरोती है। यह भी कि यह वैविध्यता से सराबोर हमारी संस्कृति के ही रंग है जिनमें खंड सौन्दर्य का भी विराट दृश्यगत होता है। शायद इसलिए कि वहां रमणीयता है। क्षण क्षण में नवीन जान पड़ती रमणीयता।
सांस्कृतिक प्रतियोगिता में देश के विविध भागों से आए सांस्कृतिक दलों की प्रस्तुतियों में रमते हुए यह भी लगा कि संस्कृति समाज को मानवीय मूल्यों से जोड़ती है। ऐसा है तभी तो सरकारी उपक्रम के वह लोग जो निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होते रहते हैं परन्तु जहां रहते हैं, वहां के परिवेश में रच-बस जाते। उनके इस अपनापे से ही संवेदना के मूल्य फिर उनमें जगते हैं। मसलन राजस्थान मंे पदस्थापित कार्मिकों के सांस्कृतिक दल की प्रस्तुति को ही लें। राजस्थान की लोक संस्कृति से सीधे उनका कोई सरोकार जन्मजात नहीं रहा है परन्तु यहां रहते उन्होंने राजस्थानी संस्कृति को जैसे आत्मसात कर लिया। श्रेष्ठ तो श्रेष्ठ ही होता है सो अपने प्रांत की प्रस्तुति को प्रथम घोषित करने के संकोच के बावजूद निर्णय तो यही करना था! पर इस निर्णय मंे नहीं जाए तो भी यह कहा जा सकता है कि स्थान-विशेष  के नहीं होते हुए भी हर सांस्कृतिक दल ने वहां की संस्कृति से अपने को जोड़ा ही। पावरग्रीड के महाप्रबंधक एच.के.मलिक और उप महाप्रबंधक उपेन्द्र सिंह से संवाद हुआ तो यह भी पता चला कि सांस्कृतिक तैयारियों के लिए बाकायदा काॅरपोरेशन राष्ट्रीय स्तर पर बजट प्रावधान करता है। यही नहीं इस बजट के अंतर्गत कार्मिकों के परिजनों को प्रस्तुतियों का अवसर मिलता है। एक साथ मिल-बैठ बतियाने का मौका भी। माने कार्मिक के साथ उसके परिवारजन भी संस्कृति के विविध रंगों से अपने आप ही रंगते हैं। संस्कृति के सरोकारों का यह श्रेष्ठतम उदाहरण है। राजकीय सेवा में कार्यरत कार्मिक और उसके परिजनों को यदि संस्कृति से जुड़े सराकारों के श्रेष्ठतम प्रदर्शन की भावना से मंच पर आने के अवसर मिलते हैं, तो बहुत से स्तरों पर समाज में क्षीण होते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों का बिगसाव हो सकता है। आखिर, समय की बड़ी जरूरत आज यही तो है!   


Friday, October 4, 2013

राग में रूप की खोज

नादब्रह्म की उपासना है ध्रुवपद। संगीत के सप्तस्वरों का आदिरूप नादब्रह्म ओंकार ही तो है। ओंकार में शब्द भी है और स्वर भी। कहते हैं, सृष्टि की उत्पति इस नादब्रह्म से ही है । बहुश्रुत पद भी है, प्रथम आदि शिव शक्ति नादे परमेश्वर।’ इसीलिए तो कहते हैं, नाद से उत्पन्न रस ही संगीत है। और नाद की रहस्यमयी महिमा और संगीत शास्त्र से संबद्ध विषय का सांगोपांग कहीं है तो वह ध्रुवपद में ही हैं। ध्रुवपद को ज्ञान की परम्परा से शायद इसीलिए अभिहित किया गया है। 
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में ध्रुवपद संगीत समारोह में भाग लेते संस्कृत के कहन नादाधीनं जगत्को जैसे गहरे से अनुभूत किया। सच! असार जग का सार कहीं है तो वह संगीत में ही है। ध्रुवपद-धमार से जुड़े कलाकारों को सुनते लगा, संगीत बाहरी ही नहीं अंतर के सौन्दर्य का भी संवाहक है। समारोह में सुना तो और भी कलाकारों को पर डॉ मधु भट्ट तैलंग का ध्रुवपद मन में अभी भी गहरे से बसा है। लयकारी और सांसो पर उनका गजब का नियंत्रण है। गान में आलाप की साधना और स्वरों पर विलक्षण अधिकार और हां, गायकी की उनकी निरंतरता में शब्दों से जुड़े संस्कारों की ध्वनि ओप भी विरल है। जवाहर कला केन्द्र में उस दिन बूंदा-बांदी हो रही थी। अंदर प्रेक्षागृह में  मधुजी जब गाने लगी तो उनका गान भी जैसे भिगोने लगा। दुरूह होते हुए भी गान का सहज निभाव। गमक और मींडयुक्त उनका आलाप। लय वैचित्र्य के अंतर्गत उपज, बोलबांट, दुगुन-तिगुन आदि की विभिन्न लयकारियां। 

कोई कह रहा था, ध्रुवपद महिलाओ का गान नहीं है। गान में फेफड़ों पर जोर जो पड़ता है! दमदार और खुली आवाज से यह जो सधता है। भला, महिला स्वर में ध्रुवपद हो सकता है! शायद इसी सोच से ध्रुवपदको कभी मर्दाना गान कहा गया। इसका मतलब मधु भट्ट अपवाद हैं।  ध्रुवपद को उन्होंने अपने तई साधा है। स्वर, लय पर पूर्ण अधिकार के साथ। वह गाती है तो लगता है,  ध्रुवपद अपनी पूर्णता के साथ हृदय के अंतरतम में प्रवेश करता है। उनके स्वरों में सौन्दर्य का उजास भी है तो बेलौस खुलापन भी। स्वर माधुर्य के साथ काव्य का वह सुंदर प्रयोग करती है। विशेष लयकारी में वह गाने लगी थी, ‘घन घुमण्ड चण्ड प्रचण्ड...। झंकृत होने लगे मन के तार। लगा, संगीत के समुद्र की अतल गहराईयां नापते हैं उनके सुर। नाभि से उठता नाद। सच! सुरों की दुरूह साधना में वह ध्रुवपद को गहरे से जीती कलाकार हैं। आलाप के साथ स्वरों पर विलक्षण अधिकार लिए वह जब गा रही थी तो, अंतर से ध्वनित होती वाणी से ही जैसे साक्षात् हो रहा था। गमक में सुरों की अद्भुत धमक। सुनते हुए लगा, दूर से आते सुरों में वह अनंत की सैर कराती है। 

उनका आलाप सुनते यह भी लगा, होले-होले नदी, नाले, पर्वत, गली, संकड़ेपन के सफर में लय के साथ एक-एक कर आगे बढ़ते जा रहे हैं सुर। राग में रूप की खोज। मुझे लगता है, सधे सुरों में व्यक्ति अपने होने की तलाश कर सकता है। यह संगीत का ही सामर्थ्‍य है कि वह व्यक्ति को वहां ले जाता है, जहां चाहकर भी कोई जा नहीं सकता। सधे सुर ही तो करते हैं अनंत की चाह की राह आसान। ध्रुवपद गाने वाले कलावन्त कहे जाते हैं। माने कला के ज्ञाता। ज्ञान का अथाह सिलसिला ही तो है ध्रुवपद। ...और ऐसे दौर मे जब ध्रुवपद शनैः शनैः हमसे दूर होता जा रहा है, एक महिला गायिका गान की उस महान परम्परा से हमें जोड़े हुए हैं। अब बताईए, मधु भट्ट के होते, है कोई जो यह कहे-ध्रुवपद पुरूषों का ही गान है! 

Friday, September 27, 2013

प्रौद्योगिकी, छायांकन एवं कला

छायांकन स्मृतियों का सौन्दर्य अंकन हैं। कहें, यह वह दृश्य कला है जिससे आप अतीत को बांच सकते है। सच! गुजरे हुए कल के पल की स्मृति के सुनहरे लेख ही तो है छायाचित्र। तमाम हमारी कलाएं व्यक्ति और वस्तु की अंतःविषयक प्रकृति को प्रतिबिम्बित करती है। ऐसे दौर में जबकि हमारा जीवन पूरी तरह से विज्ञान और तकनीक से ही आबद्ध होता जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है कि प्रौद्योगिकी से जुड़े होने के बावजूद छायाकंन में संवेदनाओं की सीर बची हुई है। माने वहां रोबटनुमा होने की बजाय व्यक्ति भीतर के अपने द्वन्द, भावनाओं, सर्जन संभावनाओं से जुड़ा रहता है। 
बहरहाल, मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वास्तुकला एवं नियोजन विभाग ने कुछ समय पहले डच वास्तुकला के अंतर्गत जल प्रबंधन, शहरी फैलाव और बड़ी तादाद में भवन निर्माण की आवष्यकता से संबद्ध छायाचित्रों की एक प्रदर्षनी का आयोजन किया था। इसमें प्रदर्षित छायाचित्रों का आस्वाद करते ही यह सब ज़हन में कौंधने लगा है। मुझे लगता है, विज्ञान और तकनीक में संवेदनाओं की खेती छायांकन से ही की जा सकती है। और विडम्बना देखिए, देषभर के प्रौद्योगिकी संस्थानों में तकनीकी यंत्र के रूप कैमरे के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद छायाकंन के कला महत्व को दरकिनार किया हुआ है। तकनीकी षिक्षा में कला सरोकारों का माध्यम कैमरा बनता है और छायांकन के कला पहलुओं पर भी वहां अगर शिक्षण की पहल होती है तो प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में आने वाली तकनीकी युवा पौध संवेदना के मानवीय गुणों से सर्जना के नए आयाम गढ़ सकती है। उनके किए कार्य, चाहे वह वास्तुकला या अन्य प्रौद्योगिकी निर्माण के हों, वहां का तमाम सर्जन सौन्दर्य का संवाहक भी नहीं हो जाएगा! कांकरिट के जंगल उगाते मन के इस युग की बड़ी आवष्यकता आज यही तो है। और नहीं तो प्रौद्योगिकी संस्थानों के वास्तु और नियोजन विभाग तो यह कर ही सकते हैं। आखिर वहां भवन विन्यास, आकल्पन के कार्य में कैमरे रूपी यंत्र का ही तो सहारा प्रमुख होता है।
इस दीठ से मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वास्तु और नियोजन विभाग के विभागाध्यक्ष रामनिवास शर्मा की पहल बहुत से स्तरों पर प्रभावित करती है। उनकी लगाई ‘नीदरलैण्ड आर्किटेक्चर इन्स्टीट्यूट’ के छायांकनों की प्रदर्षनी में वास्तुकला में छायाकंन की अहमियत तो है ही, प्रदर्शनी के सुव्यवस्थितकरण की उनकी सूझ भी लूंठी हैं। विभाग के बारादरी गलियारे को ही छायांकन दीर्घा बनाते उन्होंने छायाकला के वास्तुकला रूपान्तरण की दीठ का सुअवसर जो दिया! छायाकार मित्र महेष स्वामी आग्रह कर प्रदर्षनी दिखाने जब ले गए थे, तब तकनीकी संस्थान के इस प्रदर्षन की बेरूखी भी ज़हन में थी। परन्तु वास्तुकला और छयाकन के रिश्तों की संवेदना  में जाते यह भी लगा कि प्रदर्शनी यदि नहीं देखता तो एक बड़ा अवसर गंवाता ही। मुझे लगता है, छायांकन विज्ञान और तकनीक में कलात्मक सौन्दर्य का रस घोलती कला है। कभी बिनाॅय बहल ने अजंता की गुफाओं, उनकी छतों और भित्तिचित्रों को विस्तृत रूप में फोटो रूप में ही प्रलेखित किया था। वास्तुकला और मूर्तिकला के अंतर्गत उनका यह संग्रह आज भी इन्दिरा गाॅंधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के ‘कलानिधि’ संकाय में संग्रहित है। ललित कला की एक शाखा के रूप में उपयोगिता की दृष्टि से भले ही वास्तुकला भवन निर्माण तक ही सीमित हो गई हो परन्तु सामाजिक बदलाव और विकास के परिप्रेक्ष्य में इसके कला से जुड़े महत्व पर भी हमें गौर करना होगा। आखिर तमाम कलाओ की जननी कभी यही वास्तुकला ही तो रही है। यही वह कला है जिसके तहत तकनीकी ज्ञान संपन्न संवेदनाओं से उपजे सर्जक मन की सुविकसित रचनाओं का आकाष गहरे से रचा जा सकता है। बल्कि कहें, आधुनिक सभ्यता का सांचा वास्तुकला से ही निर्मित है। इसमें छायांकन से जुड़ी कला संवेदना का वास हो जाए तो सोने में सुहागा नहीं हो जाएगा!

Friday, September 20, 2013

अतीत का सौन्दर्यान्वेषण

तमाम हमारी कलाएं सौन्दर्य का अन्वेषण है। कहें, मन के भीतर नया कुछ रचने, गढ़ने के लिए चलने वाली अकुलाहट। दैनिन्दिनी जीवन में जो कुछ हम देखते-सुनते हैं, क्षण-क्षण में उसमें परिवर्तन होता है। तेजी से बदलते इस समय की गति को पकड़ते नया जो रचा, वही तो कला है। पुराने पते झड़ते हैं, नए उगते हैं। प्रकृति का यही नियम है। सर्जन का सच भी तो यही है।

बहरहाल, यह जब लिख  रहा हूं, जीर्ण-शीर्ण स्टेम्प पेपर पर ठुकी रियासतों के अतीत से जुड़े राजस्थान की राजमुद्राएं दिखाई दे रही है। जयपुर, भोपाल, बूंदी, टोंक, अलवर, बीकानेर, उदयपुर राज्यों के एक आने, दो आने के स्टेम्प पेपर और उन पर ब्लाॅक्स की छपाई। स्याही के पैन से संस्कृत, फारसी, उर्दू, अरबी, के साथ साथ खास बीकानेरी ‘बाणिका’, मुरडि़या लिपि  और उस पर अंगूठे, अंगूलियों के लिए निशान। पर यह सब कैनवस का पाश्र्व है। इस पाश्र्व पर आम आदमी भी है। उसके जीवन से जुड़े सरोकार भी और इन्हें अंतर्मन संवेदना से भांत-भांत के रूपों मंे जिया है कलाकार मालचन्द पारीक ने। गणपति प्लाजा स्थित ‘समन्वय’ कलादीर्घा में पारीक की कला प्रदर्शनी ‘द स्टेम्प आॅफ लाईफ’ के अंतर्गत इस सबका आस्वाद करते यह भी लगा कि अंतःप्रक्रियाओं में यह कलाकार ही है जो कालातीत को समय के सर्वथा नूतन संदर्भ देने की क्षमता रखता है। 

मालचन्द पारीक ने पुराने जमाने में कोट-कचहरी के कार्यों, लेन-देन में प्रयुक्त होने वाले स्टेम्प पेपर को केन्द्र में रखते कैनवस पर आम आदमी के सपनों, उसके संघर्ष के साथ ही अदम्य जिजीविशा को प्रदर्शनी में अपने तई सांगोपांग रूपायित किया है। एक अदद घर का सपना यहां है। उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग, ठेला ठेलने वाला, रिक्शा चलाने वाला या फिर मजदूरी करता श्रमिक-सबका सपना अपने घर का है। पुराना स्टेम्प पेपर आज की मुद्रा का प्रतीक है, और उस पर उकेरा व्यक्ति घर की चाह में भटकता आम आदमी।

सोचता हूं, मालचन्द कैनवस पर जीवन का रूपक गढ़ता कलाकार है!  इस रूपक में सौन्दर्य सर्जना के अंतंर्गत कला की हमारी लोक परम्परा को भी गहरे से संजोया गया है। मसलन ‘द स्टेम्प आॅफ लाईफ’ की एक कलाकृति में जलरंगों की प्रक्रिया में आदि जैन पुराण का मोहक चितराम है। पड़ की मानींद। पुराण कथा से जुड़े चित्रों का कोलाज। दूसरी और कलाकृतियां में स्टेम्प पेपर पर रिक्शे पर, ठेले पर, तांगे, बैलगाड़ी, टैम्पो पर बहुमंजिला इमारते ढोता आम आदमी है तो चाक से घर गढ़ता किसान भी है, बैण्ड वादक भी है और हां, सांप की पिटारी से सांप नहीं बीन बजाकर बहुमंजिला इमारत निकालता सपेरा भी है। कहीं स्टेम्प पेपपर को पाश्र्व में रखते तारों का जाल बुना गया है और उसमें उलझे पक्षियों का कलरव सुनाया गया है तो खण्डहर होता अतीत भी यहां गा रहा है। हवेलियों के ध्वस्त होते झरोखों में बीता अतीत कलाकृतियो में जैसे ध्वनित हो रहा है। माने रंग-रूप के साथ उनमें निहित संवेदना के अंतर्गत संगीत की अंर्तध्वनियां भी है।

मालचन्द बहुआयामी चित्रकार है। चित्रो की इस प्रदर्शनी में उसके मूर्तिशिल्प और एक बड़ा सा घूमता हुआ इन्स्टालेशन ‘मिरर-कर्टेन’ भी समय संदर्भों को अंवेरता देखने वालों को स्पन्दित करता है। तमाम मूर्तिशिल्पों के केन्द्र में टीवी डिश है। यह पेड़ के तने पर लगी है, झोपड़ी पर भी और सांची के स्तूप, पीरामीड और बैठने की कुर्सी तक में। माने कहीं कोई जगह नहीं बची है, जहां बुद्धुबक्शा की पहुंच नहीं हुई है।

कला के इन भांत-भांत के रूपों को देखते औचक ही यह भी अनुभूत होता है कि भिन्न माध्यमों में समय को रूपायित करते कलाकार अजीब सी अकुलाहट में जीता है। इस अकुलाहट में ही शायद वह माध्यम के साथ संदर्भों के अन्वेषण में कला की बढ़त भी करता है। कला में माध्यम के साथ संदर्भ की तलाश जरूरी भी है परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं को रूपायित करते निरंतर उत्कृष्टता की ओर उन्मुख होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी कलाकार के भविष्य की राह आखिर इसी से तो तय होती है! मालचन्द इसी राह पर आगे बढ़ रहा है। आप क्या कहंगें!

Friday, September 13, 2013

रमणीयता बोध कराते चित्र

कलाएं भीतर के हमारे सौन्दर्यबोध को जगाती है। रस की तन्मयता जो वहां है! माने यह कलाएं ही हैं जो सब कुछ भुलाकर हमें रस विलीन करती 'भावो भावं नुदति विषयाद इसीलिए तो कहा गया है। यानी भावों की प्रेरणा के पीछे जो भाव रह जाए। रागबन्ध। 
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में सुधीर वर्मा के चित्रों को देखना संगीत को सुनना, नृत्य से सराबोर हो जाना ही है।
रेखाओं की अदभुत लय अंवेरते वह मन को रससिक्त करते हैं। उनके चित्र सुन्दर नहीं रमणीय हैं। माधुर्य का आस्वाद कराते। मुझे लगता है, रंगों में घुली उनकी रेखाएं संगीत में आलाप लेने सरीखी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। भले ही चित्रों का उनका मूल आधार नायिका भेद है परन्तु इसमें सब कुछ सादृश्य है। माने रेखाएं आकृतियों को जीवन्त करती मोहक छटाओं का छन्द रचती है। 
कुछेक चित्रों पर जाएंगे तो पाएंगे उनमें घोड़ों के साथ नायिका है। अलग से भी वह है परन्तु घोड़ों के साथ का लावण्य मन को मोहता है। नारी शुलभ चंचलता मंडी रेखाओं में यथार्थ की बजाय भाव-भंगिमाएं ही वहां प्रधान है। कहें, नारी नहीं उसके आत्मीय गुणों को रेखा दर रेखा वह रंगों में घोलते आप-हम से साक्षात कराते हैं। बिहारी सतसर्इ का आधार लेते कुछेक नारी चित्रों में पाश्र्व में उभरे पन्ने और उसमें मंडी लिपियां भी वहां है। सर्जना की अनवरत प्यास का संयोग निर्मित करती। रूप को अलंकृत करती।
सुधीर के नायिका चित्र दरअसल परकीया प्रेम की गंध में मानिनीरूप लिए हैं। बकौल बिहारी सतसर्इ वह धीर है, अधीर है ओर धीराधीर भी है। और अचरज! सुधीर नायिका भेद के इस वण्र्य को अपने तर्इ आविष्कृत करते रमणीयता का बोध जगाते हैं। उनकी नायिका की कमर, अधर, भाल, नेत्र आदि सभी कुछ इस कदर मधुर हैं कि वहां रेखाओं के पीछे अर्थ दौड़ता है। माने वहां आकृतियां है परन्तु उनमें निहित लय में रात, चांदनी, धूप, बरसात और ऋतु संबंधी तमाम अनुभूतियों भी हैं। मुझे लगतां है, ऋतुओं को यदि देखना हो तो सुधीर वर्मा के चित्र हमारी मदद करते हैं। यही क्यों? नृत्य, संगीत की सहोदरा भी है उनकी यह कला। प्रारंभिक रंग मूलत: पांच हैं। श्वेत, पीला, काला, नीला और लाल। इनकी संगति से ही दूसरे रंग उपजते हैं। सुधीर की रेखाओं में प्रारंभिक इन पांच रंगों के सुव्यवसिथत संयोजन में कलाकृतियां संगीत और नृत्य का आस्वाद ही तो कराती है। इसलिए कि सूर्य के सात घोड़ों, मयूर के साथ ही तमाम दूसरे बिम्ब, प्रतीकों के साथ रेखाओं में घूले रंगों में सुधीर के नायिका भेद चित्रों से संगीत निकलता है। लय का अनुसरण करती रेखाएं नृत्य को जीवंत करती देखने वालों में बसती भी है। 
सुधीर के उकेरे घोड़ों पर ही जाएं। घोड़ों का उनका वेग रेखाओं की चंचलता लिए है। माने घोड़े हैं परन्तु उनमें निहित ऊर्जा माधुर्य से उपजी है। शकित की बजाय वह मन की उत्सवधर्मिता से जुड़ी है। सोचें, सूर्य नही हो तो सब कुछ निस्तेज नहीं हो जाएगा! इसीलिए कहूं, सुधीर की आकृतियां भीतर के हमारे रिक्तपन या कहें निस्तेजपन को दूर करती है। हुसैन ने कभी 'बूंदी की नायिका शीर्षक से एक चित्र उकेरा था। सुधीर के नायिका चित्रों का आस्वाद करते न जाने क्यों वह औचक ही ज़हन में उभरा है। माने सुधीर की रेखाओं में हुसैन की एप्रोच भी है और हां, पिकासो की रेखाओं के वेग का संवेग भी। सादृश्य में रंग घूली रेखाओं में लावण्य के चितेरे तो वह हैं ही। इसीलिए तो सौन्दर्य नहीं रमणीयता का बोध कराते वह मन को रमाते हें। क्षण क्षण में रेखाओं का नव रूप दिखाते।

Friday, September 6, 2013

रेत राग रमा कमायचा

सरोद और सांरगी से कुछ-कुछ मिलता हुआ वाद्य है कमायचा। सुनेंगे तो मन करेगा गुनें। गुनते ही रहें। बहती हवा में रेत के धोरों में खड़ताल, ढोलक अलगोजा के साथ कमायचा बजे तो थार जैसे सजे। और थार के सौन्दर्य को अपने कमायचे में समाते धुनों का जो लोक साकर खां रचते, उसे चाहकर भी कहां कोई बिसरा सकता है।
सोचता हूं, अब जबकि साकर खां नहीं रहे, थार क्या वैसे ही सजेगा! यह साकर खां ही थे जिन्होंने कमायचे में रेत का हेत संजोया था। वह कमायचा बजाते और लगता रेत धोरों के भांत-भांत के रंगों को गाने लगी है। लोक संस्कृति में व्याप्त संस्कारों का संवाहक ही तो था उनका कमायचा। यह जब लिख रहा हूं, साकर खां के कमायचे से निकली मूमल, हालरिया, बनड़ा, घूमर, बायरो और भी न जाने कितनी-कितनी लोक धुनें ज़हन में बसने लगी है। लग रहा है, होले बहती हवा में उड़ती रेत के कणों से झरता उनका कमायचा मरूस्थल की प्यास का गान कर रहा है।...रेत की अनगिनत छवियां उकेरता। उनका कमायचा बजता तो पेपे खां की सुरनई भी मन के तार झंकृत करती। उनका कमायचा कभी विरह का रूदन करता तो कभी उत्सवधर्मी रंगों की छटा बिखेरता मन में अवर्णनीय उमंग, उत्साह का संचार करता। लगता यही कि कमायचा नहीं धोरे गा रहे हैं। मिट्टी की सौंधी महक में जो रचा-बसा था उनका कमायचा! 
बहरहाल, साकर खां पाकिस्तानी सरहद के पास बसे गांव हमीरा के थे। वह जब ग्यारह वर्ष के थे तभी पिता का देहान्त हो गया। पिता से विरासत में और तो कुछ मिला नहीं, कमायचा मिला। इस विरासत में लोक धुनों को उन्होंने अपने तई साधा। उसमें बढ़त की। उन्होंने जो धुने निकाली लोक में सजी वह शास्त्रीयता की धुने थी। यही कारण था कि देश-विदेश में राजस्थान के पारम्परिक लोक वाद्य कमायचा को बाद में उन्हीें के कारण अपार लोकप्रियता भी मिली। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया तो केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी, राजस्थान संगीत नाटक अकादेमी आदि से भी उनकी कला को निरंतर सम्मान मिलता रहा। अभी कुछ दिन पहले देश के सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित रामनारायणजी जब जयपुर में थे तो उनसे साकर खां के कमायचे पर भी संवाद हुआ। कहने  लगे, ‘साकर खां को सुना है। उसके कमायचे में लोक धुनों की आत्मीयता में खोने का मन करता था। राजस्थान के लोक संगीत को तो लंगा, मंागणियारो नें ही तो सहेजा है।’ 
कमायचा सारंगी की तरह गज से बजने वाला वितत् वाद्य है। आम शीशम की लकड़ी से गोलाकार तबली का इसका ऊपरी भाग खाल से मढ़ा होता है। मुझे लगता है, साकर खां ने राजस्थान के इस पारम्परिक वाद्य को सुदूर देशों तक पहंुचाया ही नहीं बल्कि रेत की धुनों से हर आम और खास का नाता भी कराया। याद पड़ता है, मरू महोत्सव में कभी उनके कमायचे से निकली मांड सुनी थी। लगा, धोरे विभोर हो अपने पास बुला रहे हैं। राजस्थान की जगचावी धुन ‘पधारो म्हारे देस...’ बज रही थी और लग रहा था कि राजस्थान के तमाम रंग सुनने वालों को भीगो रहे हैं।  रेत जैसे अपने हेत से रंगने की नूंत दे रही थी। होले-होले गज से छिड़े कमायचा के सुर मन में घर कर रहे थे। मुझे लगता है, यह साकर खां का कमायचा ही था जिनकी धुनें लोक से अपनापा कराती मन में यूं घर करती थी। रेत राग रमा ही तो था उनका कमायचा!

Friday, August 30, 2013

समय रचती कलाएं


संगीत, नृत्य, चित्र, नाट्य आदि तमाम कलाएं काल के अनंतर अपना अलग समय गढ़ती है। यह है तभी तो उनमें रमते, उनमें बसते बहुतेरी बार यह भी अनुभूत होता है कि यह वह समय नहीं है, जिसमें हम जी रहे हैं। यह तो कला का समय है। तो क्यों नहीं यह प्रस्तावित किया जाए कि समय कलाओं को नहीं बल्कि कलाएं समय को रचती है।

 कुछ दिन पहले राजस्थान विश्वविद्यालय में कलाओं से जुड़े देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापकों के पुन्शचर्या  पाठ्यक्रम में संबोधित करने जाना हुआ था। औचक ही ज़हन में कौंधा, यह कलाएं ही हैं जो काल से परे सौन्दर्य की सर्जना करती है।  

कला क्या है? आकार, रंग, स्पेस का सम्मिलित सौन्दर्य ही तो। ध्वनि का सामंजस्य संगीत का, लय का सामंजस्य कविता का, रंग-रूप का सामंजस्य चित्र का सौन्दर्य है। सामंजस्य का यह संसार ही अपने तई फिर समय की सर्जना करता है।

विचार करें, संध्या पहर कुछ सुन रहे हैं। ध्वनित राग सुबह का है। भोर की अनुभूति होगी। बारिश हो नहीं रही परन्तु मल्हार राग बूंदो से भीगो देता है। यही क्यों! प्रेक्षागृह में नाटक देखते अभिनय में  निहित करूणा अपनी हो जाती है। मन भारी हो जाता है। यही तो है कलाओं का रचा समय। कला-अुनभूति का समय देखने, सुनने के समय का सच हो जाता है। इस समय की तीव्रता इस कदर होती है कि जिस समय में व्यक्ति जी रहा होता है, उसके सच को बदल देता है। इसीलिए संगीत, नृत्य, चित्र, नाट्य को अपने में बसाते हम कला के समय में रूपान्तरित हो जाते हैं।  हम वह नही  रहते जो पहले थे। कला के समय का इससे बड़ा सच और क्या हो सकता है!

प्रश्न हो  सकता है कि फिर आधुनिकता क्या कला का समय नहीं है? आधुनिकता समय नहीं है। विचार है। कुछ अर्थों में तकनीक से जुड़ा विचार। कलाओं पर नियम-अनुशासन  लागू होते हैं परन्तु वे आदेशात्मक नहीं होते। माने तकनीक कला संप्रेषण को सुगम कर सकती है परन्तु वह उसे आदेशित नहीं कर सकती। इसलिए कि कलाएं तो अपना समय स्वयं गढ़ती है। 

हां, इस गढ़न में समाज से जुड़े संस्कार अपने आप ही तकनीक के रूप में जुड़ते चले जाते हैं और हम यह कहने लगते हैं कि समाज में हो रहे परिवर्तनों के समय का असर कला पर भी पड़ता है। ऐसा ही यदि होता तो कलाएं अपने स्वरूप में कार्यप्रेरक नहीं होती। वह भाषाओं, भौगोलिकता और व्यक्ति की सीमाओं से मुक्त नहीं होती। और इन सबके साथ व्यक्ति को रोबोटनुमा बनने से रोकती भी नहीं। यह कलाएं ही हैं जो व्यक्ति को संपूर्णता की ओर ले जाती संवेदना संपन्न किए रखती है। 

व्यक्ति में देखने, विचारने, चीजों और उसके समय को परखने की दीठ देती है। कलाओं का यदि अपना समय नही होता तो क्या संवेदना शून्य होते व्यक्ति स्वयं अपने में ही कभी के गुम नहीं हो जाते। मुझे लगता है, कला का समय समाज का सच रचता है। और इसका प्रभाव सूक्ष्म, अस्पष्ट परन्तु सर्वव्यापी होता है। मानव उसी से संस्कारित होता है। इसीलिए तो देश, भाषा और काल की सीमाओं को लांघती कलाएं संवेदनाओं का हममें वास कराती रोबोट बनने से हमें बचाती है। 

बहरहाल, संगीत एवं नाट्य विभागाध्यक्ष विदुषी  माया टाक और अर्चना श्रीवास्तव के आग्रह पर जब विश्वविद्यालय  में कलाओं पर कुछ बोलने की नूंत मिली तो संकट में था  कि क्या कुछ नया कर पाऊंगा परन्तु लगता है, यह कलाओं के समय में प्रवेश  ही रहा होगा जिससे विचार का वातायन यूं खुल पाया। 


Friday, August 23, 2013

सुरों के रस का सारंगी गान


तत्वाद्य है सारंगी। करूणा, प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, रूदन के साथ जीवन के तमाम रसों का नाद करता वाद्य। मानव कंठ सरीखा आलाप वहां है तो मींड और गमक भी वहां है। मुरकियांे के साथ खटका और तानें भी। माने कंठ से जो सधे, सारंगी उसे सजाए। कोई कह रहा था, अतीत का ‘सारिंदा’ सारंगी बन गया। ‘रावणहत्था’ से भी कोई इसे जोड़ता है। 
बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं और पंडित रामनारायण की सारंगी के सुर ज़हन में बस रहे हैं। राग पीलू ठुमरी। सारंगी के स्वरों का जादू तन-मन को जैसे भीगो रहा है। ठुमरी के बोल की आवृतियां करती सारंगी। उल्टे-सीधे, छोटे-लम्बे गज। तानों में एक साथ कई सप्तकों की सपाट तान। सारंगी रच रही है दृश्य की भाषा। ठुमरी के रंग रच गए तो लो अब सारंगी के तारों पर पंडितजी ने राग जोगिया की तान छेड़ दी है। सारंगी जैस समझा रही है असार संसार का सार। राग मुल्तानी, किरवानी, मिश्र भैरवी और राग बैरागी भैरव! अतृप्त प्यास जगाते सारंगी के सुर। निरवता का गान। सब कुछ पा लेने के मोह से मुक्त ही तो करता है यह नाद! सुरों का अनूठा उजास है पंडितजी की सारंगी में। मन के अंदर तक घर करती है सारंगी की उनकी गूंज। सुनते लगता है, बीन और अंग के आलाप के साथ मन्द्र सप्तक से लेकर अतिसार सप्तकों तक वह सारंगी की बढ़त करते हैं। गज चलाना कोई उनसे सीखे! दोनों हाथों की अंगुलियों का संतुलित संचालन। सारंगी बजाते खुद भी वह जैसे खो जाते हैं और सुनने वालों को सुरों के समन्दर की जैसे सैर कराते हैं। एक लहर आती है, दूर तक बहा ले जाती है। दूसरी आती है और जैसे अपने में समा लेती है। भीगोती, पानी के छींटे डालती हुई। ...सच! पंडित रामनारायणजी की सारंगी बजती नहीं, गाती हुई हममें जैसे सदा के लिए बस जाती है।
पंडित रामनारायण जी उदयपुर में जन्में। और फिर बाद में मुम्बई में ही बस गए। सारंगी की शास्त्रीय पहचान का श्रेय उन्हीं को है।  कहें, वह नहीं होते तो सारंगी कब की हमसे विदा ले चुकी होती। पिता नाथूजी बियावत दिलरूबा बजाते पर  पंडितजी ने सारंगी अपनायी। उस्ताद वहीद खां से सुर, लय और ख्याल गायकी सीखी तो धु्रवपद को भी अपने तई साधा। आकाशवाणी में भी रहे पर सारंगी को स्वतंत्र पहचान दिलाने में नौकरी बाधा लगी सो छोड़ दी। वर्ष 1956 में पंडितजी ने मुम्बई के संगीत समारोह में पहली बार एकल सारंगी वादन किया। बस फिर तो देश-विदेश में उनकी सारंगी की धूम मच गयी। उस्ताद विलायत खां के साथ उनका एलपी रिकाॅर्ड आया। सारंगी के सुरों की वर्षा पहले पहल फिल्मों में उन्होंने ही की। याद करें ‘कश्मीर की कली’ का ‘दिवाना हुआ बादल...’ गीत। गीत की धुन में सारंगी के सुरों पर गौर करें। मन करेगा बस उन्हें गुनें। गुनते ही रहें। पंडितजी ने सत्यजीत राय की कुछेक फिल्मों के साथ तपन सिन्हा की ‘क्षुधित पाषाण’ का पाश्र्व संगीत भी दिया है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले पंडितजी जयपुर में थे तो कलाकार मित्र विनय शर्मा और महेश स्वामी के साथ उनसे खुब बतियाया हुआ। लगा, सारंगी में ही नहीं, उनकी बातों में भी अद्भुत रस है। होटल की खिड़की से बाहर झांकते तरण-ताल पर उनकी नजर गयी। उसके कम पानी को देख वह कहने लगे, ‘...स्विमंगपुल में इतना चुल्लूभर पानी है कि कोई आराम से इसमें डूब मरे!’ उनका कहन इतना धीमा, गंभीरता लिये था कि औचक समझ ही नहीं आया। जब समझे तो हंसी के मारे बुरा हाल था। फिर से पंडितजी ने फरमाया, ‘लो...हम तो आपकी इस हंसी पर ही मर मिटे।’ 

Friday, August 9, 2013

लोक संस्कृति का गान

हरिमोहन भट्ट रेखाओ में सौन्दर्य की सर्जना करते हैं। लोक संस्कृति का गान करती उनकी रेखाएं जीवन की उत्सवधर्मी संवेदनाओं का नाद है। उनकी रेखाओं में रंग हैं, रूप है और है संवेदनाओं का आकाश। रेखाओं में सौन्दर्य का अन्वेषण करते भट्ट पारम्परिक प्रशिक्षित कलाकार नहीं है। वह रंगीन बालपोईन्ट पैन से उकेरते हैं रेखाएं। बाल्यकाल में कभी अपने लिखे को सजाने में इस कदर प्रवृत हुए कि बाद में तो उनका बालपोईन्ट पैन रेखाओं का सौन्दर्य संवाह ही बनता चला गया। अपनी कला में राजस्थान की उत्सवधर्मी संस्कृति में बिखरे भांत-भांत के रंगों के वह संवाहक हो गए। लोक संस्कृति में रचा-बसा उनका मन सर्जना में दृश्य ही नहीं बल्कि उसमें निहित संवेदना की बारीकियां की बढ़त करता है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले ही हरिमोहन भट्ट के बालपोईन्ट पैन रेखाचित्रों का आस्वाद किया। लगा, रेखाओं में भांत-भांत के रंगों को घोलते वह दृश्य की हमारी संवेदना को ही नहीं बल्कि सुनने के हमारे माधुर्य को भी गहरे से छूते हैं। उनके रेखांकनों का आस्वाद करते सहसा ही राजस्थान के मांडणों की याद आती है। मांडणे सरीखे उनके रेखांकन बारिश के इस मौसम में अपने पंखों से रंगों की छटा बिखरते मोर की याद दिलाता है तो बरसती बूंदों की रिम-झिम के साथ आसमान में उभरते इन्द्रधनुष को भी औचक ही मन मे बसाता है। सांगीतिक आस्वाद कराती उनकी रेखाएं नृत्य करती हुई हममें प्रवेश करती है तो कभी गांव के उस परिवेश से भी हमारा अनायास साक्षात् करा देती है जिसमें मन बनावटीपन से कोसों दूर बस सहज सौन्दर्य का पान करता है। ज़हन में बचपन कौंधने लगा है।  तब शहर की चारदीवारी से दूर बड़ा सा बीकानेर के घर का हमारा आंगन हुआ करता था। आंगन के बीचोबीच उगा खेजड़ी का वृक्ष। त्योंहारों पर कच्चे आंगन पर गोबर पूतता। दादी चाव से आंगन संवारती। गैरू-गोबर से आंगन लीपती। इस लीपे पर फिर मांडणे मंडते। मनभावन मांडणे। मूढ़ से बनी घर की बड़े ओसार की दीवारें भी दादी के हाथों से तब अलंकृत होते देखता। अक्षर ज्ञान से कोसों दूर दादी रेखाओं में सधी माधुर्य की अनूठी लय अवंेरती। 
सोचता हूं, हरिमोहन भट्ट के बालपोईन्ट पैन से बने रेखाचित्र लोक मन में बसे ऐसे अलंकरण ही तो है! इनमें कहीं कोई बनावट नहीं है। जीव-जंतु, फल-फूल, प्रकृति और लोक आस्था के अनगिनत सुर। संवेदनाआंे को जगाते। हमसे बतियाते। इनमें रेखाओं का अद्भुत उजास है तो आत्मिक अनुभूतियां से जुड़े अनगिनत छलकते रसों के संदर्भ भी हैं। मुझे लगता है, लोक संस्कारों के सर्जनषील तत्वों को भट्ट शुद्ध व स्पष्ट रूप में हमारे समक्ष रखते हैं। वह बेल बूटों को इनमें सूक्ष्म उकेरते हैं तो बहुतेरी बार भारतीय शिल्प की गहराईयों में भी ले जाते दिखते हैं। अजन्ता की कलाओं का आस्वद यहां होता है तो मूगल चित्र शैलियों के अलंकरण तत्वों की सूक्ष्म दीठ भी यहां है। राजस्थान की राजपूत-मूगल शैली के साथ ही मिनिएचर तत्वों का अहसास ठौर-ठौर उनकी कला में है। सौन्दर्य से जुड़े मन के भावों के दृष्यों का अपने तई वह  आकाश ही तो रचते हैं! अलंकृत रेखाएं। कहीं कहीं वलयकार रेखाओं में सरल, सीधी रेखाओं का विलोप। मुल्कराज आनंद के शब्द उधार लेकर कहूं तो हरिमोहन भट्ट की बालपोईन्ट पैन  रेखाएं सौन्दर्य की सर्जना में बहुत से स्तरों पर ईष्वर की आषुलिपि है। रंग-बिरंगी रेखाएं मेंहदी सजे गौरी के हाथों की याद दिलाती उत्सवधर्मी हमारी संस्कृति का नाद भी तो करती है। लय का अनुसरण करती एक-दूसरे में समाती। एक दूसरी से ओत-प्रोत होती कब यह सौन्दर्य का आत्मरूप हो जाती हैं, कहां पता चलता है!


Friday, August 2, 2013

टेराकोटा छायाचित्रों का संवेदना आकाश



कलाएं संवेदना की सृष्टि करती है। भावनाओं के अनंत आकाश में व्यक्ति अपने होने को कलाओं में ही तो सार्थक करता है। शिल्प की ही बात करें। कलाकार जब कोई मूरत गढ़ रहा होता है तो वहां मूरत ही प्रधान नहीं होती कलाकार का स्व भी तो रूपान्तरित होता है। पाषाण, धातु और मिट्टी के शिल्प इसीलिए तो देखने वालों को लुभाते हैं कि वहां कलाकार का संवेदन मन भी कहीं निहित होता है। 

बहरहाल, हिम्मत शाह इस युग में मिट्टी के अनूठे सर्जक हैं। खंड खंड अखंड के मूर्तिशिल्पी। माने जो कुछ उन्होंने बनाया है, देखने में केवल वही नहीं बल्कि सर्जना के सर्वांग को हम उनके शिल्प में अनुभूत कर सकते हैं।

यहां उनके जिक्र की वजह यह भी है कि हाल ही उनके टेराकोटा का एक एलबम आया है, जिसमें शिल्प छायाचित्रों में मिट्टी की संवेदना को गुना गया है। टेराकोटा ऐसे जिन्हें देखा ही नहीं स्पर्श करके भी उनकी सर्जना को अनुभूत किया जा सकता है। कागज उभरे रंगीन चित्रों को स्पर्श करेंगे तो मिट्टी का भूरभूरापन, उसकी खुदाई, पक्काई के साथ शिल्प सर्जना जैसे आपके समक्ष जीवंत हो उठेगी। जो कुछ उन्होंने गढ़ा उस श्रेष्ठ की बानगी है उनका टेराकोटा एलबम, ‘टेराकोटा बाय हिम्मत शाह’।

लकड़ी के बोर्ड की जिल्द और उसमें आवरण पर गोल डिस्कनुमा कला। इस गोल में फिर से एक गोल। मिट्टी की छोटी सी मूरत। इस पर स्वयं हिम्मत शाह का लिखा अपना नाम। इसके बाद पृष्ठ खोलेंगे तो उनके स्कल्पचरं नजर आएंगे। एक नहीं पूरे 288 पन्नों पर मंडे स्कल्पचर के रंगीन चित्र। शिल्प के चित्र भर नहीं बल्कि उसमें निहित माटी से जुड़ी संवेदना भी। हाथ से स्पर्श करेंगे तो संवेदना से साक्षात् होगा। शिल्प का दृश्य ही नहीं स्पर्श रूपान्तरण। 

मिट्टी से अपनापा रखते भांत-भांत के रूप हिम्मत शाह ने गढ़े हैं। वह मिट्टी को मथते, उसे पकाते और फिर उसी में बसते रूप की अनथक यात्रा कराते हैं। गौर करेंगे तो पाएंगे उनकी मृण कला में राजस्थान के गांव, मरूस्थल, देवरे और ग्रामीण सभ्यता के चिन्ह भी बहुत से स्तरों पर हैं। मंदिरों है तो उस पर लहराती ध्वजा भी। दीवार है तो उससे जुड़ स्पेस भी। पाबूजी और दूसरे लोकदेवताओं के थान भी हैं। गांव के लोगों द्वारा इस्तेमाल में ली जाने वाली वस्तुएं हैं-पर यह सब वैसे ही नहीं जैसे कि दिखते हैं बल्कि इन सबका कुछ-कुछ आभास हैं उनका शिल्प कर्म। इसलिए कि वहां अर्थ का आग्रह नहीं है। इसीलिए जो कुछ जीवंत एलबम में रखा है, वहां कहीं कोई शीर्षक नहीं है। 

बहरहाल, ‘टेराकोटा बाय हिम्मतशाह’ का आस्वाद करते कबीर की साखी ‘माटी एक रूप धरी नाना’ ज़हन मंे कौंधती है।  कबीर के कहे को मूर्तिशिल्पों में जीवंत आप यहां देख सकते हैं, स्पर्श से अनुभूत कर सकते हैं। वहां बोतलें हैं, पेड़ के तन्ने हैं, गांव का हैडपंप सरीखा कुछ है तो हुक्का जैसा भी कुछ है पर कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे ठीक से हम शब्दों से व्यंजित कर सकंे। कोई अर्थ दे सकें। 


माने आप रूप के अर्थ और उसके भीतर के अर्थ तलाशते रहेंगें। एक बार देखने के बाद बार-बार देखे को देखना चाहेंगे। यही उनकी कला की विशेषता है। वह मिट्टी से जो गढ़ते हैं उसमें हमारा यह जीवन स्पन्दित होता है। मुझे लगता है, कागज पर शिल्प की स्पर्श संवेदना की ‘टेराकोटा बाय हिम्मत शाह’ अनूठी कल्पना है। 

एक साथ हिम्मत शाह के अद्भुत शिल्पों का आस्वाद करना हो तो, इससे आपको गुजरना होगा। मिट्टी की जीवंत मूर्तियों का संग्रह। लगेगा, कागज के पन्नों से हेाते हुए माटी षिल्प की किसी सभ्यता में हम प्रवेष कर गए हैं। इस सभ्यता में देवराज डाकोजी, ज्योति भट्ट, कुमार शाह, राघव कनेरिया, रघुराय, रवि शेखर, शेलन पार्कर के हिम्मत शाह के बनाए शिलप छायाचित्रों का कला आस्वाद भी अवर्णनीय है। हिम्मत शाह ने यह जीवंत शिल्प अपने मित्र रामूकाटकम को समर्पित किए हैं।


Friday, July 26, 2013

घूमर रमवा नै जावा दै...


लोक जीवन के ताने-बाने में ही गूंथी हुई है तमाम हमारी लोक कलाएं। संस्कृति के बीज बिखेरती। लोकगीत, नृत्य किसी एक जनपद का नहीं है, थोड़े बदलाव के साथ उसके सरोकार हर ओर मिलेंगे। घूमर ऐसा ही लोकनृत्य है। मूलतः राजस्थान का पर अब प्रांतीय सीमाओं से परे विष्वभर का। हाल ही एक अन्र्तराष्ट्रीय ट्रैवल पोर्टल ने दुनियाभर के जिन दस श्रेष्ठतम नृत्यों को परखा है, उसमें ‘घूमर’ को चैथा स्थान मिला है। राजस्थान की कला और संस्कृति का विष्व बिगसाव यही तो है!
बहरहाल, घूमर लोक संस्कारों से सिंचित नृत्य है। लोक से जुड़े समाज के सनातन मूल्यों को अंवेरता। घूमर माने घूमना। गोल वृत्ताकार में घूमते हुए किया जाने वाला लोक नृत्य। समूह की सर्जना। रूप विन्यास, भाव सौन्दर्य और पद कर संचालन, थिरकन की विविधता का अद्भुत नृत्य। प्रांजल मनोभावों की सुमधुर परिणति। एक ही स्थान पर घूमने की भ्रमर गति भी घूमर में है तो आगे-पीछे, दांए-बाएं नृत्य का सांगोपांग विस्तार भी है। पाष्र्व ध्वनियां की बजाय समूह पदचाप, स्वयं नृत्यांगनाओं का गान और गर्दन एवं नेत्रों का लयबद्ध संचालन। गाते हुए बोलों में नृत्यांगनाएं जैसे रम जाती हैं। गति में इसीलिए वहां भावानुरूप मंद और तेज प्रभाव स्वयमेव होता है। गीत और नृत्य में कोई भेद नहीं। नृत्य होगा तो घूमर गीत होगा और घूमर गीत होगा तो नृत्य होगा ही। कहें, अकेले घूमर या उसके गीत का कोई महत्व नहीं। 
घूमर का एक नृत्य गीत है जिसमें अविवाहित कन्या अपनी मां से कहती है मुझे फलां जगह, फला जाति मे मत ब्याहना। इसके साथ ही वह कारण भी बताती है। फिर कहती है चाहो तो वहां दे देना। इस कहन में वह लोगों और वहां के भौगोलिक परिवेष की तमाम विषेषताओं को उघाड़ती चली जाती है। गुण-दोषों के साथ। ऐसे ही ‘करियो’ में ढोला-मरवण में उस ऊंट की कहानी है जो ढोला को मरवण के पास ले गया था। घूमरें और भी हैं, उन पर जाएंगे तो न जाने कितने पन्ने भर जाएं पर कथ्य की नृत्य परिणति में जिस सौन्दर्य की सर्जना घूमर में होती है, वह किसी और में कहां! मुझे लगता है, नारी सौन्दर्य के शास्त्रगत आख्यानों का साकार है घूमर। कमर की लचक के साथ नाचने को सुजला। तीव्रतम गति का घेरदार घुमाव तो घूंघट के सौन्दर्य भावों का दर्षाव भी। नृत्य में घाघरे के दोनों कोनों को पकड़ पालनी मुद्रा जब नृत्यांगना अपनाती है तो लगता है मयूरी मगन हो नाच रही है। एक बार चारों ओर घूमने से घाघरा वृत्ताकार मे फैल जाता है। एक स्थान पर रहते हुए अंग प्रत्यंगों का तब जो संचालन नृत्य में दिखाई देता है, उसे चाह कर भी शब्द कहां बंया कर सकते है! घुमना तीव्रगति में भी और मंद गति में भी। कभी होले-होले मुंह से निकलते बोलों में पैरों की थिरकनभर। पग कर संचालन में एक ताल स्वयं पैदा होती है। माने ताल नृत्य में ही है, बाहर नहीं। अर्थगर्भित सौन्दर्य भावों की गमक। धीरे-धीरे घूमर तेज होती है और तब औचक लगता है, आंखे किसी शास्त्रीय नृत्य का आस्वाद कर रही है। सच! घूमर है ही लोक की शास्त्रीय अभिव्यंजना।  प्रकृति की गति से संगति। नृत्य नहीं साधना। नख-षिख अवयवों का मेल। 
याद पड़ता है, बचपन में स्टेडियम में विद्यालयी छात्राओं का घूमर देखने जाते थे। बीकानेर भर के तमाम विद्यालयों की छात्राओं का उसमें प्रतिनिधित्व होता। पूरा स्टेडियम घूमर के रंग से रंग जाता। तन-मन में तब अद्भुत सौन्दर्य छटा वास करती। धीरे-धीरे संस्कृति का यह चास बास भी लोप होता चला गया। घूमर अवसर-विषेष की औपचारिकता भर रह गया। हां, वीणा समूह के के.सी. मालू ने ‘घूमर’ को अपने तई फिर से जीवंत किया। लोक की सहज धुनों से बगैर किसी छेड़छाड़ करते। भले व्यावसायिक उद्देष्य से ही सही, ‘घूमर’ के सौन्दर्य को उन्होंने अपने डिटिलाईजेषन तकनीक से विष्वजनीन तो किया ही है!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़"  में प्रति  सप्ताह  प्रकाशित होने 
वाला स्तम्भ "कला तट" (दिनांक 26 जुलाई 2013) 
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/1397426


Friday, July 19, 2013

संस्कृति, संस्कार और कलाएं


नाट्यशास्त्र यानी तौर्यत्रिक ग्रंथ। नाट्य के साथ गायन, वादन और नृत्य का मेल। भरतमुनि रचित नाट्यशास्त्र और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के परिप्रेक्ष्य में कलाओ के अन्र्तसंबंधों पर बहुत से स्तरों पर निरंतर चर्चा होती रही है। आखिर मनोरंजन का बड़ा आधार हमारी यह कलाएं ही तो हैं। मनोरंजन माने मन को रंजित करना। मन का रंगना।  बड़ी बात यह है कि मनोरंजन के कला पक्ष को उससे जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों से कैसा देखा जाए? भाषा के स्तर पर विचारें तो संस्कृत इसका बड़ा आधार हो सकती है। इसलिए कि मनोरंजन की जो विधाएं समाज में पुष्पित और पल्लवित हुई हैं, उनके पीछे कलाओं का ही मजबूत आधार रहा है। 
कहानी कहना भी तो एक कला है। विष्णु शर्मा रचित ‘पंचतंत्र’ को ही लें। ‘पंचतंत्र’ में कहानियां है पर कहन की कला का सौन्दर्य भी है। कुशल पारंगत गुरू मूढ शिष्यों को भी विवेकवान बना सकता है, यही इन कथाओं का आधार है। मूर्ख राजपुत्रों को जीव जंतुओं की कथा के जरिए नीति के महत्वपूर्ण संदेश इसमें दिए गए हैं। साहित्य के साथ मनोरंजन से जुड़ी कलाओं ने ही हमारी संस्कृति को बहुत से स्तरो ंपर समृद्ध किया है।  मसलन आज की पहेलियों को ही लें। कभी दरड़ी ने ‘काव्यादर्श’ में सोलह प्रकार की प्रहेलिकाएं बतायी थी। कहते हैं उसी से बाद में खुसरो ने ‘बूझ पहेली’ और ‘बिन बूझ पहेलियां’ गढ़ी। संगीत की बात करें ंतो धु्रवपद में ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ जैसे निर्थक शब्द भी कुछ इसी तरह से आए। कहते हैं अमीर खुसरो जब भारत आए तो उन्हें ध्रुवपद की भारतीय परम्परा बहुत भायी पर इसमें संस्कृत के श्लोकों को देख वह घबराए। खुसरो अरबी विद्वान थे। उन्होंने धु्रवपद में निर्थक शब्द ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ गढ़ कर तरह-तरह के हिन्दुस्तानी राग गाए। यही बाद में तराने हुए। 
मुझे लगता है, संस्कृित का अभिजात दक्षिण भारत के कलात्मक रूप में ही तो परिणत हुआ है। संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि दक्षिण की समृद्ध कलाएं संस्कृत से ही शास्त्रीय हुई। आधुनिक मनोरंजन विधाओं का बहुत से स्तरों पर संस्कृतिकरण बाद में इन कलाओं ने ही किया। परन्तु बड़ी विडम्बना यह भी है कि आज के दौर में मनोरंजन का अर्थ पूरी तरह से हास्य से लिया जाने लगा है। सोचिए! हंसना ही क्या मनोरंजन है? हास्य मनोरंजन के एक पक्ष की स्थूल अभिव्यक्ति जरूर है पर यह पूरी तरह से मनोरंजन तो नहीं ही है। टीवी चैनल इधर यही कर रहे हैं। हंसाने के नाम पर दर्शकों को वहां निरंतर भोंडापन परोसा जा रहा है! माने वक्ट काटना है। कैसे भी कटे परन्तु वक्ट काटना क्या मनोरंजन है? वक्ट काटने के अर्थ में ही यदि मनोरंजन लें तो उसका परिणाम मन में उपजे क्षोभ, विषाद से अतिरिक्त कुछ न होगा। वक्ट कटे पर भौंडेपन से उपजे हास्य से नहीं, इस तरह से कि वक्ट से व्यक्ति ऊपर उठ जाए। मनोरंजन हो पर मन को रंजित करता। स्वस्थ मनोरंजन। कलाएं यही करती है। मन उनसे रंजित ही नहीं होता, सृजन के लिए निरंतर प्रेरित भी होता है। 
नाट्य, नृत्य, संगीत के ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक संदर्भ है। इन संदर्भों में जीवनानुभूतियां है। संस्कार हैं और है हमारी संपन्न संस्कृति का आधार। सोचिए! सांस्कृतिक संदर्भ खोकर आखिर कोई समाज कैसे आगे बढ़ सकता है! कालिदास ने रंगमंच को ‘चाक्षुस यज्ञ’ की संज्ञा दी थी। जयपुर में कुछ समय पहले के.एन. पणिक्कर के निर्देशित नाटकों का महत्ती समारोह हुआ। तभी उनके निर्देशन में कालिदास रचित ‘मालविकाग्निमित्र’ का आस्वाद किया था। ‘मालविकाग्निमित्र’ में नृत्य रस का जो बखान है, उसके संदर्भों से मुक्त होकर कलाओ की हमारी समृद्ध संस्कृति की चर्चा क्या की जा सकती है! 

Friday, July 12, 2013

रेखाओं में नदी संस्कृति का इतिहास


दृष्य अभिव्यक्ति का प्रभावी रूप है रेखांकन। बहुतेरी बार रेखाएं जो आकार ग्रहण करती है उनमें भले ही सब कुछ स्पष्ट नहीं होता फिर भी वहां दृष्य की अनंतता में सौन्दर्य छवियों को अनुभूत किया जा सकता है। माने कोई एक दृष्य नहीं उससे जुड़ा तमाम परिवेष वहां उद्घाटित होता है। मुझे लगता है, थोड़े में बहुत कुछ कहने का प्रभावी कला माध्यम है रेखांकन। स्मृतियों को दृष्य में रूपान्तरित करती रेखाएं कला में अनंत की खोज ही तो है। 
बहरहाल, अमृतलाल वेगड़ नर्मदा पद यात्राओं के शब्द सर्जक ही नहीं है बल्कि  रेखाओं के अद्भुत सौन्दर्य सृष्टा भी हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, भोपाल में एक आयोजन पर जब उन्होंने नर्मदात्रयी की अपनी पुस्तकें भेंट की तो उनके रेखांकनों पर भी गहन संवाद हुआ। बाद में जब रेखाओं में उकेरे उनके पदयात्रा सौन्दर्य चितराम पर गया तो लगा,  नर्मदा और उसके तट पर बसे लोगों के सार्थक और जीवंत चित्रण उन्होंने रेखाओं से किए हैं। प्रकृति, व्यक्ति और क्षणों के दृश्यों में वह रेखाओं का सांगीतिक आस्वाद कराते हैं। उनके रेखांकनों की बड़ी विषेषता यह है कि वहां जनजीवन के बाह्य रूप की अपेक्षा उससे जुड़ी संवेदना के साथ जीवन से जुड़े सत्यों का अन्वेषण है। माने अपने रेखांकनों में उन्होंने नदी और उसके तट पर बसे लोगों का सांस्कृतिक इतिहास लिखा है। रेखाओं में संस्कृति का इतिहास आसान नहीं है। वही लिख सकता है जिसे संस्कृति के सूक्ष्म पहलुओं को अंवेरना आता हो। वेगड़जी इसे बखूबी करते हैं। संस्कृति, लोक संस्कृति और जीवन से जुड़े उसके संस्कारों की वह गहरी सूझ रखते हैं। इसीलिए तो अपनी नर्मदा पद यात्राओं में प्रकृति, व्यक्ति और वस्तुओं का सत्यान्वेषण कला की अपनी दीठ से उन्होंने किया है। मसलन यात्रा की एक स्मृति में छोटी पहाड़ी के एक दृष्य में रमते वह उसे पेपरवेट की संज्ञा देते हैं। उनका दृष्य वर्णन देखें, ‘...सारा दिन उस पहाड़ी पर रहे। उसका लघु आकार उसे एक विषेष जीवन्तता प्रदान करता था। यह पहाड़ी पेपरवेट जैसी लग रही थी। आस-पास के खेत कहीं उड़ न जाए, इसलिए उन पर रखा पहाड़ी पेपरवेट!’ 
दृष्य से साक्षात् और फिर उसकी यह अभिव्यंजना कला में डूबा कोई ऋषि ही कर सकता है। वेगड़जी इस दृष्टि के कलाऋषि हैं। उनका चित्रकार मन प्रकृति में रंगों की तलाष करता एक स्थान पर लिखता है, ‘...हरे रंग का तो समुद्र है चारों ओर। हरे रंग के कितने अखाड़े हैं! खेतों का हरा अलग। धान का खेत हरे रंग का जूना अखाड़ा है। रमतीला का पीला तो मुझमें अजीब सी उत्तेजना भर देता। उनके पीले खेतों से चलता तो लगता मैं वान गाॅग के खेत में ही जा रहा हूं।’ 
प्रकृति और जीवन के शब्द कहन की उनकी यह दृष्य लय ही उनके रेखांकनों समृद्ध करती रही है। नदी के साथ उससे जुड़े तमाम परिवेष को रेखाओं में सूक्ष्म दीठ देने वाले वह अद्वितीय कलाकार हैं। इसीलिए तो नर्मदा में कपड़े धोते, नर्मदा में स्नान करते, नर्मदा के पानी से सूर्य को अर्ग देती स्त्रियों के साथ ही वहां के पक्षी, वहां की धरा का सौन्दर्य उनकी अल्प उकेरी रेखाओं में भी पूर्णता के साथ अभिव्यंजित हुआ है। पदयात्रा से सृजित एक रेखाचित्र में मंडला से अमरकंटक के किसी दृष्य का रेखांकन है। चंद रेखाओं में उकेरी गयी पहाडि़यां। बल खाती नदी।...और उसका बहाव। रेखांकन नहीं रेखाओं की यह रूप गोठ है। माने कोलाज। 
  नदी और तट पर बसे लोगों की सभ्यता ऐसे ही उनके हर रेखांकन में बसी है। व्यक्ति रेखांकनों में वह संस्कृति का अनहद नाद करते है। यह ऐसे हैं जिन्हें देखते लगता है, आदिवासी समाज और उससे जुड़े संदर्भों की अनंत यात्रा पर हम निकल पड़े हैं। कुछ चित्र है जिनमें नदी में नहाने के बाद अपनी धोती सूखोती आदिवासी स्त्री, सर पर बोझा रखे चलती स्त्रियां, ताप सेकते-बतियाते, घर के आंगन में मांडणे लिपती औरतें हैं।... कहूं, नर्मदा पद परिक्रमा के उनके रेखांकन स्वयं में एक स्वायत्त कला रूप है। 


Friday, July 5, 2013

सौन्दर्य की शिल्प सर्जना

कलाएं जीवन की उत्सवधर्मिता का नाद हैं। कहें, यह कलाएं ही हैं जो मानव मन की एकरसता को तोड़ उसमें आनन्द रस उपजाती है। आखिर हमारा यह जीवन कलाओं के उजास से ही तो स्पन्दित है।  शिल्पकला में शिल्पी  सौन्दर्य को अपने तई गढ़ता ही तो है। रूपाकारों की उसकी गढ़न यथार्थ का अंकन भर ही नहीं होती बल्कि उसमें परिवेश से जुड़ी सोच, संवेदना को भी गुना और बुना जाता है। इसीलिए तो मूर्ति में निहित विषय ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि उसके गढ़न तत्वों की सौन्दर्य सर्जना का आस्वाद भी मन को बहुतेरी बार स्पन्दित करता है। 
बहरहाल, रूपाकार में ही क्यों  शिल्प में निहित गढ़न तो अमूर्त में  भी स्मृतियों में अनन्त काल तक बसती ही है। यह जब लिख रहा हूं, देश के प्रख्यात कलाकार अनिलकुमार के उकेरे  शिल्प स्मृतियों को जैसे झंकृत रहे हैं। कुछ दिन पहले भोपाल में जनजातीय संग्रहालय के उद्घाटन अवसर पर उनके मूर्तिशिल्पसे साक्षात् हुआ था। लगा, यह वह मूर्ति शिल्प नहीं है जिसका पहले कभी आस्वाद किया था।  शिल्प का यह नया आकाश हैं। ऐसा जिसमें वस्तुओं से अधिक उसका अर्थ हममें बसता है। सोचता हूं, सौन्दर्य का अर्थ आस्वाद ही तो लिए है अनिलकुमार का तमाम  शिल्पकर्म। 
अनिलकुमार ने भोपाल के जनजातीय संग्रहालय की स्थापना में महत्ती योगदान दिया है। वहां प्रदर्शित  शिल्प के बहुत से स्तरों पर वह संवाहक रहे हैं परन्तु स्वयं उनका  शिल्प भी तो अद्भुत है। कहें, स्टोन-स्टील में वह मूर्ति शिल्प देखने की हमारी एकरसता को तोड़ते हैं। देश  के वह चुनिंदा ऐसे कला शिल्पी  हैं जिन्होंने अपने अद्भुत रूपाकारों के कलाकर्म में सौन्दर्य के मर्म को गहरे से छुआ है। उनका  शिल्प संसार हमें  निर्माण के अपूर्व  में ले जाता है। ऐसे संसार में जिसमें मार्बल, ग्रेनाईट, जैसलमेर सैण्ड स्टोन के साथ स्टेनलेस स्टील में देश -काल-परिवेश  अभिव्यंजित हुआ है। मूर्ति शिल्प की प्रचलित परम्पराओं से इतर रोजमर्रा के जीवन में बरती जाने वाली वस्तुओं से प्रेरणा ले उसमें वह कलात्मकता का नया इतिहास रचते हैं। धवल मार्बल का उनका एक शिल्प आंखों में बस रहा है। मार्बल की विषिष्ट गढ़न। इसमें स्टेनलेस स्टील की रोपी हुई कीलें। कहीं भी इसे रखेंगे-छाया के अद्भुत लोक से साक्षात् होगा। ऐसे ही हरे ग्रेनाईट में सर्जित कल्पनाओं के आकाश  में नारियल के टूकड़ों सरीखा पात्र। इस रूपाकृति में स्टील के आभुषण। देखते हुए मन करता है-रूप को सदा के लिए आंखों में बसा लें। जैसलमेर के सैण्ड स्टोन की एक रूपाकृति की उनकी गढ़न में प्रयुक्त स्टील की गोलियां और उनमें प्रतिबिम्बित दृष्य। अद्भुत सौन्दर्य! और ऐसे ही हरे ग्रेनाईट, सैण्ड स्टोन की मूसली सरीखी आकृति में रखा वृत्ताकार स्टील का पारदर्शीपन । अनीष कपूर के स्काई क्लाउड की भी औचक ही यहां याद आती है। ऐसे ही एक और ग्रेनाईट-स्टील शिल्प में चांद सरीखी आकृति का रचाव सौन्दर्य के अपूर्व संसार में ले जाता है। 
मुझे लगता है, आकारों के सरलीकरण में अनिल रेखाओं की लय अवेंरते  हैं। प्रदर्शित रूप से अधिक उसका आशय वहां महत्वपूर्ण है। कहें वह अर्थगर्भित शिल्प के सर्जक हैं। पत्थर और स्टील के संयोग से वह जो गढ़ते हैं उनमें गजब का छाया प्रवाह है। माने उनके शिल्प को कहीं रखेंगे तो उसका सौन्दर्य उसके पड़ रहे छाया-प्रभाव में भी औचक महसूस होगा। रेखाचित्रों की मानिंद उनमें गतिमय दिशाओं  का अंकन जो है! लहराती, एक दूसरे में विलीन होती रेखाएं। उनके शिल्प में स्थापत्य है  नाट्य भंगिमाएं हैं और है सांगीतिक लय। सोचता हूं, सभ्यता का हमारा इतिहास पाषाण  रचित शिल्प से ही तो जुड़ा है!  इस दीठ से अनिलकुमार गढ़न का सौन्दर्य इतिहास ही तो लिख रहे हैं। आयताकार, चैकोर में वह खंड-खंड सौन्दर्य की सर्जना करते हैं!