Friday, January 10, 2014

सौन्दर्य की सांकेतिक भाषा


लयबद्ध थिरकती क्रिया है नृत्य। नाट्य और नृत्त का संयोग।... और इधर जब टीवी चैनलों पर नृत्य के जो प्रतिस्पद्र्धी कार्यक्रम देखता हूं, लगता है जैसे शरीर को हिलाने, गिराने, उठाने, पटकने को ही नृत्य मान लिया गया है। शारीरिक अंगो का दृष्यमय यह प्रदर्षन व्यायाम हो सकता है, मनोरंजन का अनर्गल हो सकता है पर नृत्य कैसे हो सकता है! नृत्य सौन्दर्य की सांकेतिक भाषा है। ऐसी जिसमें चित्रकला है, षिल्प है और अनुभूति से जुड़ी संवेदनाओं का संवेग संयोग भी। 
बहरहाल, नृत्य की बात करें तो अकेले कथक को ही लें। तकनीक के हिसाब से समय, काल, परिस्थितियों के अनुसार इसमें बहुत से परिवर्तन भी हुए पर संरचना में शारीरिक अंगो का प्रदर्शनभर यह कभी नहीं रहा। इसीलिए इसका सौन्दर्य कभी तिरोहित नहीं हुआ। मंदिरों में यह जन्मा। दरबारों में विकसित हुआ। दरबारी शैलियां ही बाद में घराने बने। जयपुर और लखनऊ घराने से कथक की पहचान विश्वस्तर पर पहुंची। कुछ बनारस घराने की भी बात करते हैं परन्तु लखनऊ और जयपुर घराने का मिश्रण सरीखा ही है यह। हां, कथक से राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ का नाम भी जुड़ा है। राजा चक्रधरसिंह ने अपने तई कथक में बंदिषों, तोडो, परन आदि को शास्त्रबद्ध करते संस्कृत शब्दावली में जो कुछ नया जोड़ा वह कथक के रायगढ़ घराने से जाना जाता है।
जो हो, मंदिरों, दरबारों और फिर घरानों से जुड़ा कथक सौन्दर्य की सर्जना के अपने मूल में आज भी लुभाता है। समय परिवर्तन के अनुसार इसमें बढ़त भी हुई। विषय-वस्तु, वेषभूषा और प्रस्तुति के लिहाज से पर इसकी शास्त्रीयता में कहां कमी आई! मुझे लगता है, वर्षों से जुड़ी आ रही परम्परा सहेजना जरूरी है पर परम्परा रूढ़ नहीं हो, जड़ नहीं हो, इसके प्रयास भी जरूरी है। नृत्य में गुरू क्या करता है? परम्परा से ही तो अवगत कराता है। नर्तक के लिए नृत्य से जुड़ी संभावनाओं को समझने मंे गुरू ही सबसे अधिक मदद भी करता है परन्तु स्वयं कलाकार जब नृत्य करता है तो उसे उसमें अपने आप की भी तलाष करनी होती है। जो हो चुका है, हो रहा है-उसमें नर्तक स्वयं कहां है, इसका अन्वेषण यदि वह करता है तभी परम्परा के जड़त्व को तोड़ वह आगे बढ़ सकता है। प्रेरणा श्रीमाली ने, शोवना नारायण ने, कुमुदिनी लाखिया आदि कलाकारों ने यही तो कथक में किया है। 
"डेली न्यूज़", 10 जनवरी, 2014 
बांग्ला-अंग्रेजी संवादों के साथ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मेल की शोवना नारायण की ‘कादंबरी’ इसी का उदाहरण है। प्रेरणा श्रीमाली ने कबीर को जीवंत करते उनके जुलाहे स्वरूप को भावाभिनय से अमूर्त में भी मूर्त किया है। पद संचालन में हाथकरघे की ध्वनि बुनते वह जैसे कथक के जयपुर घराने की पद भाषा से उसे गहरे से व्यंजित करती है। कुमुदिनी लाखिया ने कथक को पौराणिक कथाओं, आख्यानों, राधा-कृष्ण की परिधि से बाहर निकाल सामयिक परिवेष दिया। आधुनिक परिवेश में नृत्य के यह प्रयोग इसलिए अखरते नहीं है कि इनमें कथक की शास्त्रीयता, उसके सौन्दर्य से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई है। प्रेरणाजी के शब्द उधार लूं तो कहूं, कथक में सूफियाना कुछ हो सकता है पर ‘सूफी कथक’ उसे नहीं कहा जा सकता। कथक कथक है। इधर हो उलट रहा है। अंगों के चाहे जैसे प्रदर्शन के अनर्गल को शास्त्रीय से जोड़ उसे परिभाषित किया जा रहा है। शरीर के अंगो की गति के दुरूह प्रदर्षन को ही नृत्य मान लिया जा रहा है। यह कार्य तो मशीन अधिक बेहतर कर सकती है। इसके लिए देह को क्यों कष्ट दें! कलाएं संवेदनाओं का आकाष है, चमत्कार नहीं। चमत्कारिक ही कुछ करना है तो फिर उसे नृत्य नाम न दिया जाए!

Friday, January 3, 2014

परम्परा, आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता


समूह चित्र प्रदर्शनियों की बड़ी सीमा यह होती है कि उनसे किसी चित्रकार के कलाकर्म की संपूर्णता की दीठ नहीं मिलती। कुछेक श्रेष्ठ से तमाम कला का मूल्यांकन हो भी कैसे सकता है! पर देख रहा हूँ कोई दो दशक पहले अजमेर के पांच चित्रकारों की पहल से स्थापित ‘आकार’ समूह की सामुहिक चित्र प्रदर्शनी इस सीमा को लांघती है। कलाओं के गहन सरोकार लिए। बरस दर बरस समुह प्रदर्शनी में जिन चित्रकारों की कला से निरंतर साक्षात् होता रहा हूं, उनकी कलाकृतियां में आ रही परिपक्वता और समय के जुड़ते संदर्भ संभावनाओ के  नए द्वार खोलते हैं। 
बहरहाल, इस बार प्रदर्शनी में बहुत कुछ नया था। रंगों की ओप दीठ से, रेखाओं की लय से और समय से जुड़े संदर्भों की ओट से भी। मसलन कृष्ण की छवियों को नील रंग की सघनता में कैनवस पर उकेरते डा. अनुपम भटनागर ने कृष्णमय भावों को गहरे से अंवेरा है। भटनागर के चित्रों की बड़ी विशेषता  रंग और रेखाओं का माधुर्य है। ऐसा जिसमें परिवेश कथा, प्रसंग को उद्घाटित करता हममें बसता है। ‘आकार’ ग्रुप  के संस्थापकों में से एक लक्ष्यपालसिंह राठौड़ की कलाकृतियां भीड़ में भी अलग से दिखाई देती है। वजह है, उनमें बसा लोक का आलोक। धुंध से उभरती आकृतियों में राजस्थान का सुरम्य परिवेश  उनके चित्रों में ठौड़-ठौड़ है। मुझे लगता है, वह रेत के  हेत की संस्कृति के चितेरे हैं। प्रहलाद शर्मा की चित्र श्रृंखला की परियां रंगों की दीप्ती लिए जीवंतता की संवाहक बन पड़ी है तो अमित राजवंशी  घोड़ों की ऊर्जा कैनवस पर संजोते प्राचीन गुफा चित्रों की याद दिलाते हैं। धूसरित होते रंगों में उन्होंने महीन रेखाओं में विषय को सांगोपांग जिया है। अशोक  दीक्षित और अनिल मोहनपुरिया के चित्रों का सघन टैक्सचर और रेखाओं में रंगों का बहाव ध्यान खींचता है तो जलरंगों में देवेन्द्र खारोल ने पुष्कर की धरा में प्रकृति के अपनापे और पहाडि़यों के सौन्दर्य को जीवन्तता प्रदान की है। विनय त्रिवेदी परम्पराओं को सहेजते प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। उनके चित्रों के केन्द्र में प्रतीक रूप में उभरती मानवीय आकृतियां संवेदनाओं को गढ़ती है। सरल रेखाओं में वह जीवन से जुड़े द्वन्द और स्मृतियों को परम्पराओं में सहेजते हैं-मिनिएचर की दीठ लिए।
"डेली न्यूज़", सम्पादकीय पेज
(साप्ताहिक स्तम्भ "कला तट") 3 जनवरी, 2013 
राजाराम व्यास चित्र फलक में दृष्टि संपन्नता लिए हमसे जैसे बतियाते हैं। नीता कुमार लोक चित्रो की हमारी समृद्ध परम्पराओं से साक्षात् कराती कैनवस कोलाज हमारे समक्ष रखती है तो उमा शर्मा के पेपर कोलाज अमृत लाल वेगड़ की अनायास ही याद दिलाते  हैं। शैला शर्मा की मोर पंख पार्श्व  लिए आकृतियां एक तरह से रंग कहन ही है। सुरेश  प्रजापति ने ब्रह्मा के जरिए सृष्टि को अंवेरा है तो हितेन्द्र सिंह भाटी के लोक चित्र सरीखे आख्यानों में बढ़त है। अर्चना की सहज सरल आकृतियां और रमेश शर्मा के चित्र कैनवस कथा सुनाते रेखाओं की लय से हममें बसते हैं। दिनेश  मेघवाल और पुष्पकांत मिश्र के चित्रों में उभरते संभावना आकाश  को पढ़ा जा सकता है। कीर्ति चटर्जी के कृष्ण और एम.कुमार का साधू, चित्र साधना के संवाहक है। हां, शिवराज  सिंह कर्दम के स्कल्पचर में टैक्सचर और गढ़न के साथ संवेदनाओं का उद्घाटित होता अर्थ भी मन को स्पन्दित करता है।
बहरहाल, यह महत्वपूर्ण है कि अजमेर का ‘आकार’ समूह निरंतरता के साथ अपनी कला प्रदर्शनियो में परम्परा, आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता के ताने-बाने में कलाओं के हमारे समय से साक्षात् करा रहा है। 


Friday, December 27, 2013

साहित्य, कला और संस्कृति का लोकतंत्र

लोकतंत्र की परम्परा और उसकी विशिष्टता जनभागीदारी की सतत तलाश है। और यह केवल और केवल किसी भी समाज में कला, संस्कृति और साहित्य के स्वस्थ मूल्यों से ही हो सकती है। व्यापक अर्थ में संस्कृति परम्पराओं, साहित्य, ज्ञान, विचारधाराएं, सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं, कानून और क्षमताओं के साथ व्यक्ति की आदतों का मिला-जुला रूप ही तो है। वर्ष बीतने को है। सालभर का लेखा-जोखा संचार माध्यम कर ही रहे हैं, पर इससे परे साहित्य और संस्कृति के सनातन मूल्यों के लिहाज से आकलन करें तो पाएंगे बहुत कुछ ऐसा महत्वपूर्ण है जिससे हम धीरे-धीरे विलग हो रहे हैं। सृजन को जीवन की अभिव्यक्ति मान लिया गया है पर ऐसा नहीं है। सृजन स्वयं जीवन है। ऐसा जिसे कोई भी सत्ता, राजनीति चाहकर भी बाधित नहीं कर सकती। माने सृजन की स्वायत्ता पर कहीं कोई पहरा नहीं हो सकता। यह ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें हर व्यक्ति अपना स्वयं शासक है। सोचिए! साहित्य और कलाएं ही तो है जिनमें कहीं कोई आरक्षण नहीं है। सबके लिए यह क्षेत्र समान रूप से खुला है। यहां कोई है भी तो वह अपनी योग्यता और अपनी क्षमता से ही है। साहित्य खेमों में बांटते दलित या इसी तरह के अन्य किसी लेखन की बात कोई करता है तो उससे बड़ी बौद्विक दरिद्रता हो नहीं सकती। कबीर, रैदास, गालिब के लिखे को फिर क्या कहेंगे! इसीलिए कहें, साहित्य में न जाति है, न धर्म। महत्वपूर्ण यदि लिखा गया है, कलाकृति में सिरजा गया है, संगीत में गुना गया है तो वह कालजयी ही होगा। 

सरकारें यह दावा कर सकती है कि कला, साहित्य और संस्कृति के लिए कला-संस्कृति विभाग बनाए हुए हैं। ललित कला अकादेमी, साहित्य अकादेमी, संगीत नाटक अकादमियां में प्रतिवर्ष करोड़ों का बजट इसीलिए दिया जाता है कि साहित्य-संस्कृति का पोषण हो सके। पर गंभीरता से विचारें, क्या वास्तव में इनसे संस्कृति, साहित्य और कलाओं का भला हुआ है!  होता प्रायः यह भी है कि अकामियों की स्वायत्ता के नाम पर अकादमी के लिए चुने गए व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हितों और अपनों का पोषण करने लग जाते हैं। बीतते जा रहे वर्ष में राजस्थान साहित्य अकादेमी ने तो इसकी मिशाल पेश की है। वर्तमान में जो अध्यक्ष हैं उन्होंने साहित्य के तमाम मूल्यों को ताक पर रखते हुए जैसे इतिहास ही रचा। पूरे कार्यकाल में सामंती सोच को धिक्कारते वाले अध्यक्ष महाशय साहित्य अकादेमी को मठ के रूप में स्थापित करते उसके जरिए सामंती सोच से पुरस्कार की रेवडि़यारं बांटते रहे। सता के समक्ष सामथ्र्य जताते जिसे जैसे चाहे नियमों को ताक पर रखकर दिया। स्वायत्ता के नाम पर उनका पूरा कार्यकाल बंजर विचारों की खेती ही करता रहा। सांस्कृतिक जागरण के नाम पर सस्कृति का चीर-हरण और साहित्य के नाम पर कृतार्थ की मंशा की परिणति अमृत सम्मान समारोह, कला मेले जैसे आयोजनों में उड़ाया सरकारी धन कहा जा सकता है। 

कलाओं की दृष्टि से बीतते जा रहे वर्ष में राजस्थान में बहुत कुछ नया हुआ भी। मसलन जयपुर में पहली बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कला उत्सव प्रोगे्रसिव आर्ट ग्रूप के जरिए हुआ। ललित कला अकादेमी ने साल बीतते बीतते छायांकन की एक प्रदर्शनी अपने यहां आयोजित कर छायाचित्र कला को कुछ तो मान्यता दी ही। हां, नर्मदा के अनथक यात्री और प्रसिद्ध कलाकार अमृतलाल वेगड़जी के एक व्याखान के लिए अकादेमी को अपना स्थान उपलब्ध कराने के लिए आग्रह किया तो उसकी लाज रखते हुए तुरता-फुरत में आयोजन अकादेमी परिसर में हुआ भी परन्तु उसके लिए भी अकादेमी की कोई गंभीरता नहीं दिखी। यानी विचारों के लिए वहां भी पूरे बरस शून्यता ही पसरी रही। हां, इस वर्ष कलाविद् सम्मान बरसों बाद फिर से प्रारंभ होन सुखद है।

नाट्य की दृष्टि से यह स्वर्णिम वर्ष रहा है। रवीन्द्र रंगमंच और जवाहरकला केन्द्र में वर्षपर्यन्त महत्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ। नाट्य से जुड़े विचारों पर मंथन भी हुआ और बड़ी उपलब्धि यह भी रही है कि पणिक्कर नाट्य समारोह के जरिए संस्कृत नाटकों की समृद्ध परम्परा का आस्वाद जयपुर ने किया। जयरंगम और कथारंग जैसे आयोजन बदलते समय के साथ नाट्यकला में आए परिवर्तनों के संवाहक रूप में भी कम याद नहीं किए जाएंगे।

राजस्थानी भाषा अकादेमी ने आयोजनों की अच्छी पहल की। सुदूर स्थानों तक राजस्थानी भाषा के आयोजन हुए। बल्कि पुरस्कार बांटे जाने की बंधी-बंधायी दलीय परिपाटी में ही आबद्ध रहने की छवि को बहुत से स्तरों पर अकादेमी ने तोड़ा भी पर अंत बुरा रहा। राजस्थान साहित्य अकादेमी अध्यक्ष के चकारिये में विवादों के घेरे में इस कदर घिरी कि बाहर निकल ही नहीं पाई। और हां, बीतते वर्ष के आरंभ में हर बार की तरह जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भी चर्चा का विषय रहा। साहित्य के नाम पर उपभोक्तावाद के चरम रूप में संस्कृति की जड़ों को भले ही वह हिलाता आ रहा है परन्तु मीडिया प्रायोजकों के रूप में तमाम प्रचार तंत्र को अपने साथ मिलाकर उसने आयोजन के नए सूत्रों का बीजारोपण तो जयपुर में किया ही है। 

बहरहाल, बीतता जा रहा यह वर्ष साहित्य, संगीत और कलाओं के लिहाज से सोशल मीडिया के नाम भी कम नहीं रहा है। सृजन के जरिए जो कभी नहीं पहचाने गए, उन्होंने इस मीडिया का जमकर इस्तेमाल अपने को स्थापित करने में किया। इससे गढ़ी छवि दीर्घकाल तक भले ही न भी रहे परन्तु साहित्य और कलाओं से जुड़े तथाकथित मठाधिशों ने इससे भ्रम फैलाकर बहुत कुछ हासिल तो किया ही है! विडम्बना बीतते वर्ष की यह भी है कि हिन्दी से कमाने खाने वाले लोगों ने अंग्रेजी में लिखे को जमकर पोषित किया। एक कारण यह भी है कि वर्ष 2013 में उस साहित्य की अधिक चर्चा हुई जो हिन्दी, राजस्थानी में नहीं लिखा जाकर अंग्रेजी या दूसरी योरोपीय भाषाओं में लिखा गया। जो हो आईए साहित्य और संस्कृति के लोकतंत्र को नमन करें! यहां कोई आरक्षण नहीं है। यहां कोई है, रह रहा है या भविष्य में भी रहेगा तो केवल और केवल अपने बूते। कोई यहां अपनी पीठ आप ठोकता भी है तो उसे स्वयं के अधिकारों की लड़ाई चाहकर भी बना नहीं सकता। आखिर, यही तो है सच्चा लोकतंत्र!

साहित्य, संस्कृति और कला विश्लेषण 2013, 
"डेली न्यूज़" सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित, दिनांक 27-12-2013 
  http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/2125727 

Friday, December 20, 2013

लोक की अनूठी शिल्प -चित्र विरासत

यह जानना सुखद है कि इस बार गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में होने वाली परेड में प्रदेश के ख्यातनाम कलाकार हरशिव शर्मा निर्मित कावड़ कला की झांकी प्रदर्शित  होगी। कावड़ कला राजस्थान की समृद्ध लोक धरोहर है। ऐसे दौर में जब हम अपनी परम्पराओं को विस्मृत करते जा रहे हैं, राष्ट्रीय पर्व लुप्त होती कलाओं को सहेजने का जैसे संदेष ही देता है। 
बहरहाल, कावड़ लोक की अनूठी शिल्प -चित्र विरासत है। कावड़ माने धार्मिक, ऐतिहासिक और लोक कथाओं में गुंफित शिल्प का चित्रघर। डिब्बेनुमा काष्ठ आकृति जिसकी दरो-दिवारों पर कथाओं का मनोरम चित्रण। कावड़ में गाथाओं को बुना जाता है और फिर जब यह तैयार हो जाती है तो बुने को बांचते हुए गुना भी जाता है। काष्ठ निर्मित कलात्मक रूपाकारों में ईसर, तोरण, बाजोट, मुखौटे और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी होती है। कविता के छंद की भांति क्रमबध मंडे चित्र और चमकदार रंगों का सौन्दर्य वहां प्रधान होता है। एक रंग दूसरे का पूरक बनता इसीलिए मन को वहां भाता है। कावड़ में षिल्प की गढ़न के साथ चित्रांकन की सूक्ष्म दीठ होती है।  कहें,  वास्तु और शिल्प का मेल है कावड़। परत दर परत कपाटों से खुलता है चित्रों का कथा कोलाज। कावड़ बांचने वाले कपाट खोलते इसे ही बांचते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप किसी कलादीर्घा की वर्चुअल सैर कर रहे हैं। विविध कपाटों में परत दर परत मनोरम चित्रों के जरिए प्रभु की झांकी के पाट खुलते बंद होते धार्मिक कथा को यहां जीवंत करते हैं। इसीलिए कहें, कावड़ चलता फिरता देवघर है। 
कहते हैं, कावड़ कला की शुरूआत घर पर तीर्थ पुण्य प्रदान करने की सोच से कभी हुआ। ऐसे लोग जो तीर्थ नहीं जा पाते, प्रभु स्वयं पहुंचकर कावड़ के जरिए उन्हें तीर्थ लाभ देते। कावड़ के पाट खुलने का अर्थ ही है, पुण्य की प्राप्ति। उसे भी जो कावड़ चित्र कोलाज देखता है और उसे भी जो कावड़ बांचता है। पड़ की तरह कावड़ बांचते भाट मोर पंख का स्पर्श  कराके कावड़ के पाट खोलते-बंद करते ही कथा पूरी करता है। सभी प्रकार के कपाट खुलने पर अंत में राम-सीता के दर्शन होते हैं। कथा की इस पूर्णता के साथ ही आरती के साथ कावड़ पूरी हो जाती है। बैलगाडि़यों पर सजी-संवरी कावड़ कभी गांव-गांव, शहर-शहर  घूमती। 
बहरहाल, कावड़ डेढ़ से दो इंच की भी होती है और बीस फीट की बड़ी भी होती है। प्रायः यह अरडू, धाक, धोरनी, खिरनी, आम की लकड़ी से बनती है। पर इधर घरों में सजावट के लिहाज से सागवान से भी निर्मित होने लगी है। गोपीचंद-भरतरी, रामायण, महाभारत, लोक देवी-देवताओं ऐतिहासिक कथाओं के साथ ही इधर प्रयोगधर्मिता के चलते सम-सामयिक संदर्भो के चित्र भी कावड़ में बनने लगे हैं। रंग जो प्रयुक्त होते हैं उनमें लखारी यानी लाल रंग प्रमुख होता है। फिर इसमें हरतल यानी हरा, प्यावड़ी यानी पीला, काजल यानी काला आदि रंग मिलाए जाते हैं। आवश्यकतानुसार रंगों को गोंद  मिलाकर घोंटा लगाया जाता है। घोंटा यानी इंटाला। सूखने पर फिर से उसमें गोंद मिलाकर विविध पारम्परिक रंगो से क्रमवार कथाओं का चित्रण होता है। कथा चित्रों को सजाने के लिए मांडणे तथा अन्य अलंकरणों में लोक सौन्दर्य के चितराम भी काष्ठ पर मांडे जाते हैं। कहते हैं, कावड़ कला का उद्गम चित्तौड़ के बस्सी गांव से हुआ। वहां के रावत गोविन्ददास ही पहले पहल कावड़ कलाकार प्रभातजी सुथार को 1652 में मालपुरा टोंक से लेकर आए थे। उन्होंने तब बहुतेरी काष्ठकलाकृतियां बनाकर  रावत गोविन्ददास और महाराणा मेवाड़ को भेंट की। बस्सी काष्ठ कला का आज भी गढ़ है।...वहीं जन्मी जगचावी लोक कला कावड़ के उजास से इस बार पूरा देष नहाएगा।


Friday, December 13, 2013

सांस्कृतिक नीति के लिए हो चिंतन

कलाओं का मूल आधार संस्कृति है। जीवन से जुड़े संस्कारों की नींव संस्कृति से ही तो तैयार होती है। साहित्य, संगीत आदि कलाएं संस्कृति का ही रूप है और हमारा आंतरिक इनसे ही तो उद्घाटित होता है। परन्तु हमारी जीवन पद्धति और मूल्य भी तो संस्कृति का ही हिस्सा है। स्वाभाविक ही है कि संस्कृति प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। या कहें उसमें हरेक की भागीदारी जरूरी है।
इस समय की बडी चुनौती तेजी से खत्म होते जा रहे जीवन मूल्य ही है। बड़ा कारण इसका संस्कृति के जीवंत मूल्यों से निरंतर हो रही हमारी दूरी भी है। प्रदेश में नई सरकार का आगमन हुआ है। बहुत सारे कार्य आने वाले समय में इस सरकार के जिम्मे है परन्तु संस्कृति को जीवन के व्यापक संदर्भों से जोडने की पहल की दिशा में यदि सर्वोच्च प्राथमिकता से कार्य हो तो दूसरे कार्यों में इससे अपने आप ही शुरूआत हो जाएगी। सरकारी अकादमियां और संस्थाएं सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का कार्य कथित रूप में करती भी है परन्तु उनकी प्राथमिकताओं में संस्कृति से जुड़े पहलुओं का स्थूल रूप भर है। यानी साहित्य अकादेमी साहित्य के लिए, संगीत नाटक अकादेमी संगीत, नृत्य और नाट्य के लिए, ललित कला अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए कार्य करती है परन्तु संस्कृति इनसे ही नहीं है। संस्कृति समुदाय के आचरण से है। संस्कृति मनुष्य का व्यवहार और जीवन जीने का ढंग है। जैसे बीज हम बोएंगे-फल वैसा ही मिलेगा। इस दीठ से संस्कृति भविष्य की नींव तैयार करती है। 
सांस्कृतिक आयोजन श्रव्य, दृश्य से जुड़े होते हैं परन्तु सांस्कृतिक चेतना के अंतर्गत संस्कृति व्यापक संदर्भों के साथ जीवन को पोषित करती है। स्वाभाविक ही है कि इसके लिए सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही कार्य हो सकता है। नई सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता रखते हुए इस ओर पहल करे तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। और फिर संस्कृति और सत्ता को अलग नहीं किया जा सकता। राज्य में सरकार को जो अपार जनमत मिला है, उसकी भी मांग शायद यही है कि राज्य की अपनी एक सांस्कृतिक नीति बने। संस्कृति मूल्यों की सृष्टा और संपोषक जो है! साहित्य और कला अकादमियों के गठन और वहां पर अध्यक्ष, सदस्यों के मनोनयन या फिर किसी तरह के साहित्य, कला उत्सव करने से संस्कृति पोषित नहीं होती। साहित्य और कला के साधनों और सुविधाओं का विकास तो एक बात है परन्तु इससे भी बडी जरूरत यह है कि कलाएं अभिजात या फिर सीमित वर्ग तक की पहुंच के साथ तमाम जनता तक पहुंचे। स्वस्थ और दीर्घकालीन नीति यदि संस्कृति की बनती है तो उसमें साहित्य और कलाओं का ही नहीं व्यक्ति की सोच बदलने तक की ताकत है। यह बड़ी बात है पर पहली आवश्यकता तो अभी यही है कि प्रदेश की अपनी सांस्कृतिक नीति हो, ऐसी जिसमें साहित्य और कलाएं व्यापक संदर्भों से जुडे। 
साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं में जो मठाधीश लोग हैं, उनकी बजाय सर्जन के सरोकारों से जुडे मूल लोगों को जोडते हुए, उनसे परामर्श करते हुए राज्य की सांस्कृतिक नीति बनायी जाए। ऐसी सांस्कृतिक नीति जिसमें मायड भाषा राजस्थानी के लिए कार्य हो, जिसमें संगीत, नृत्य चित्रकला और खासतौर से लोक कलाओं का जमीनी स्तर पर संरक्षण हो। संस्कृति की जीवंतता किससे  है? अंतर्विरोधों की पहचान से ही तो! अच्छे-बुरे की समझ से। इसलिए जरूरी यही है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होते हुए हम एक सुनियोजित सांस्कृतिक नीति के तहत सांस्कृतिक हों। संस्कृति जिससे जीवंत हो जीवाश्म न बने। आखिरकार तमाम हमारी कलाओं और दर्शन पर संस्कृति का ही तो प्रभाव रहता है। वह समृद्ध होगी तो हम भी समृद्ध-जीवंत रहेंगे। सरकार बदली है, संस्कृति के संबंध में यह चिंतन तो हो ही। आम जन की अपेक्षा यही है।

Friday, December 6, 2013

कलाओं में गूंथे जीवन के मर्म


कलाएं अंतरतम विचार, भावों का रहस्योद्घाटन है। मुंशी  प्रेमचन्द की कहन कला को ही लें। कहानी विधा के रूप में वहां साहित्य प्रधान है परन्तु कहानियों के मर्म में उतरेंगे तो पाएंगे कहन में जीवन से जुड़े सरोकार यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। भाषायी अदाकारी में जीवन से जुड़े मर्म की तलाश  ही तो है उनकी कहानियां!  लूंठी-अलूंठी दृष्टि-संपन्न्ता में वहां पूरी की पूरी एक विचारधारा समय का सच उघाड़ती हममें जैसे बतियाती है। 
बहरहाल, यह सच है कि कहानियां जीवन को बयां तो करती है परन्तु जीवन नहीं हो सकती। जीवन तो कलाओं से ही है। इसीलिए तो कहते हैं-संगीत, नृत्य, चित्र और नाट्य जीवन को रंजित ही नहीं करते गहरे से बंया करते हैं। यह बात इसलिए कि कुछ दिन पहले प्रेमचन्द की एक कहानी का नाट्य रूपान्तरण देखा था।  लगा, कहानी को मंच देकर उसे जीवन्त करने की कला नाट्य से ही उपजी है। याद पड़ता है, व्यवस्था प्रसूत विसंगतियों पर लिखी उनकी कहानी ‘नमक का दरोगा’ विद्यालयी दिनों में ही पढ़ी थी। कथा में प्रेमचन्द द्वारा वेतन को पूर्णमासी का चांद की उपमा देकर महिने में एक बार ही दिखने की संज्ञा आज भी कहां भूल पाया हूं। पढ़ने के बाद कहानी के इस तरह के संवाद ज़हन में निरंतर कौंधते हैं। कुछ दिन पहले इस कहानी के नाट्य रूपान्तरण का आस्वाद करते इसमें निहित घटनाओं का दृष्टा भी बना। 
कहानी का नाट्य रूपान्तरण और प्रस्तुति सिद्धहस्त नाट्यकर्मियों ने नहीं करके राजस्थान पुलिस अकादेमी के प्रेक्षागृह में वहां के प्रशिक्षुओं ने किया। पुलिस अकादेमी के निदेशक बी.एल. सोनी के आमंत्रण पर उनके साथ इस कहानी का नाट्य आस्वाद करते लगा, प्रेमचन्द के कहन को कला में पात्रों ने गहरे से जिया है। पुलिस सेवा के प्रशिक्षुओं ने कहानी के मर्म में उतरते नाट्यकला से जुड़ी संवेदनाओं को जैसे आत्मसात किया था। ‘नमक का दरोगा’ कहानी के केन्द्र में ईमानदारी और बेईमानी की ताकत है। ईमानदार पात्र वंशीधर और जमींदार पंडित अलोपीदीन  इसके मुख्य पात्र है। कहानी में अच्छाई की हार के बावजूद अंततः अच्छेपन के सम्मान के मार्मिक प्रसंगों की जीवन्त और मार्मिक नाट्य प्रस्तुति ने मन में कुछ सवाल भी पैदा किए। मसलन पुलिस प्रशिक्षण अकादेमियों में संबद्ध प्रशिक्षण के साथ ही प्रशिक्षुओं में निहित नैसर्गिक प्रतिभाओं को तराषने के अवसर दिये जाएं तो वहां बगैर किसी उपदेष, व्याख्यान के ही मानवीय गुणों का विकास किया जा सकता है। 
अमूमन देखा यह गया है कि प्रशिक्षण अकादेमियों में अधिकारी अपनी नियुक्ति को लेकर खास कोई उत्साहित नहीं होते हैं। ऐसे में प्रायः प्रशिक्षण औपचारिकताओं की भेंट चढ़ता प्रशिक्षुओं को भविष्य के अपने कार्य के प्रति जोश  नहीं जगाकर कार्य आरंभ करने से पहले ही उसके बोझ का ही निरंतर अहसास कराता है। स्वाभाविक ही है कि प्रशिक्षण उपरान्त पुलिस के सामाजिक सरोकारों के नतीजों में स्वाभाविक मानवीय गुणों का लोप ही तब अधिक दिखाई देता है। इस दीठ से विचार यह भी आया कि क्यों नहीं आवश्यक  प्रशिक्षण  के साथ कलाओं से जुड़े सरोकार भी प्रशिक्षण का हिस्सा हों। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और राजस्थान पुलिस अकादेमी के इस समय के निदेशक बी.एल. सोनी की पहल इस दृष्टि से उदाहरण बन सकती है। वह स्वयं मानवीय संवेदनाओं से लबरेज व्यक्तित्व है, इसलिए उनकी पहल से ही अकादेमी में साहित्य और कलाओं से जुड़े सरोकारों की इस तरह की पहल हुई है। क्या ही अच्छा हो, तमाम दूसरे प्रशिक्षण  संस्थानों में विषय संबद्ध प्रशिक्षण  के साथ कलाओं से जुड़े सरोकारों को इसी तरह से जोड़ा जाए। 
यह सही है,प्रशिक्षण  व्यक्ति को संवारकर दक्षता प्रदान करता है परन्तु कलाओं से जुड़े सरोकार प्रषिक्षण में सम्मिलित होंगे तो व्यक्ति जीवन से जुड़े गुणों का पाठ भी स्वतः ही कर सकेगा। रोबोटी होते दौर में संवेदनाओं का वास आखिर कलाएं ही करा सकती है।  


Friday, November 29, 2013

जीवन से जुड़े कला के प्रश्न

डॉ राजेश कुमार व्यास, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, प्रयाग शुक्ल और मंगलेश डबराल  
कला के प्रश्न जीवन के प्रश्न है। जीवन स्थितियों और जीवन प्रवृतियों से जुड़े प्रश्न। कुछ दिन पहले जयपुर में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रूप द्वारा राज्य सरकार के साझे से आयोजित वृहद कला आयोजन में देश के ख्यातनाम कलाकारों से संवाद, उनकी कलाकृतियों से रू-ब-रू होने का अवसर मिला तो सुखद लगा। कला समीक्षक, कलाकार आर.बी. गौतम, विनोद भारद्वाज, विद्यासागर उपाध्याय, मृदल भसीन, टिम्मीकुमार और उनके जैसे ही और कलाकारों के उत्साह से ही आयोजन परिणत हो पाया। पर, आवश्यकता नहीं होते हुए भी हिन्दीभाषी क्षेत्र में आंग्लभाषा का बोलबाला यहां भी अखरा।
बहरहाल, सुखद यह है कि साहित्य के साथ कलाओं पर भी जयपुर देश के बड़े संवाद केन्द्र के रूप में उभर रहा है। कलाओं से जुड़े जीवन प्रश्नों के एक सत्र में कवि, संपादक मंगलेश डबराल, प्रयाग शुक्ल, संस्कृत मर्मज्ञ कलानाथ शास्त्री के साथ एक सत्र में इस नाचीज ने भी भागीदारी की। सुखद यह था कि इस सत्र पर अंग्रेजी की छाया  नहीं थी। यह भी कि यही वह सत्र था जिसमें कला व्यापार से जुड़े सवालों की बजाय कला की संवेदनशीलता, उसमें निहित संवेगों और कलाकृतियों के अन्र्तनिहित पर बहुतरे मसलों पर विषद् चर्चा हुई। प्रयाग शुक्ल की ‘कला के अयोचित क्षेत्र’ की सूक्ष्म दीठ में कलाकारों को अनछूए के अन्वेषी, अयाचित क्षेत्रों का संदेशग्रहणकर्ता जैसी लयात्मक अभिव्यंजा मोहक थी। वह जब स्वामीनाथन, रामकुमार की यात्राओं और गायतोण्डे के महिनों तक कैनवस के समक्ष बैठकर सृजित उनकी कलाकृतियों पर बोल रहे थे तो बहुतेरी कलाकृतियां भी आंखो के समक्ष जैसे उद्घाटित हो रही थी। प्रयागजी कलाकृतियों और यात्राओं में गहरे से रमते हैं। ऐसा है तभी तो  उनका कहन मन को छूता है।
इसी सत्र में मंगलेश डबराल ‘कला में देखना’ से जब नाता करा रहे थे तो डच कलाकार फरमीर और खिड़की से आने वाले प्रकाश स्त्रोत के बहाने कलाओं के सर्जन को गहरे से जैसे जिया। कलाकृति का स्त्रोत कुछ भी हो सकता है, खिड़की से आता प्रकाश भी और औचक घटित कोई अनुभूति का क्षण भी। इसीलिए उन्होंने यह भी कहा कि कलाएं देखने की सघनता पर निर्भर करती है। मंगलेशजी कवि हैं सो उन्होंने जब कहा कि कविता हमारे समक्ष उड़ती-मंडराती रहती है-जो देख ले वह कवि। सच ही तो है! देखना दृश्य की संवेदना से ही जुड़ा भर नहीं है, इसमें अनुभूति को आत्मसात करने की दीठ भी तो है। रोंदे, रामकिंकर बैज, हिम्मत शाह, मदन लाल जैसे मूर्तिशिल्पियों ने जो घड़ा उसमें दिखने वाली वस्तु ही महत्वपूर्ण कहां है? वहां दृश्य से परे जीवन से जुड़ी उस छाया का अधिक महत्व है जिसे देखने वाला अपने तई सदा ही दूसरों से अलग व्यंजित करता रहा है।
    बहरहाल, जरूरी है कि भविष्य में भी कलाओं पर संवाद की इस तरह की परम्परा कायम रखी जाए। हाॅं, कलाओं पर विमर्श के लिए विषय चयन में भारतीयता और हमारी अपनी भाषा हिन्दी को न बिसराया जाए। विडम्बना यह है कि इधर अंग्रेजी की चमक-दमक से हर कोई मोहित है। अंग्रेजी लेखन, अंग्रेजी परिवेश की भयाक्रान्तता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि उस अंग्रेजी लेखन को पूजा जा रहा हैं-जिसमें हमारा अपना न तो अतीत है, न भविष्य और न अपनी भाषा हिन्दी में लिखे के भविष्य की किसी प्रकार की कोई आहट। भाषा का ज्ञान, बल्कि किसी भी क्षेत्र का ज्ञान व्यक्ति को संपन्न ही करता है परन्तु जब दैनिन्दिनी जीवन में हम अपनी भाषा को जीते हैं, उसी में हमारी सहजता है तो फिर क्या ऐसी मजबूरी है कि ऐसे आयोजनों का परिदृश्य और परिवेश अंग्रेजी में रचा-बसा ही हो! कहीं यह हमारी अपनी ही हीन भावना तो नहीं!

Tuesday, November 26, 2013

सौन्दर्य संवाहक चांद

कलाएं अंतरतम विचार, भावों का रहस्योद्घाटन है। अंतर के उजास की अभिव्यक्ति। सौन्दर्य का प्रकाष तभी है जब अंतर में उजास हो। अंतर का उजास भी तभी है जब कलाओं का हममें वास हो। इसीलिए तो कहें, कलाओं से ही है यह जीवन! सोचता हूं, चांद का सौन्दर्य उसकी कलाओं से ही तो है। उसमें से कलाओं का लोप होते ही अंधकारमय हो डराने लगती है रात। अमावस में चंद्रमा तमाम अपनी कलाओं को खो देता है, परिणति में ही विलुप्त होता वह काला और कुरूप हो जाता है। 

बहरहाल, पूर्णिमा में चांद की कलाएं लौट आती है। कलाओं से दीप्त होता वह फिर से लुभाता मन को भाने लगता है। कला का पर्व ही तो कार्तिक पूर्णिमा। अंतर के उजास का संवाहक। नदी, सरोवर में इसी दिन प्रवाहित होते हैं दीप। अंधकार को हरने।

कहते हैं, कार्तिक पूर्णिमा पर रात्रि में आसमान में जब स्वच्छ तारे निकलते रहते हैं तभी समृद्धि प्रदायिनी लक्ष्मी उपस्थित होती है। अंधकार हरने के लिए जले दीपकों को निहारने ही धरा पर आती है लक्ष्मी। जहां-जहां दीप वहां-वहां लक्ष्मी का वास। घर-घर जलते हैं दीप। देव मंदिर में, नदी के तीर पर। ऊंची-नीची, संकरी-दुर्गम तमाम जगहों पर जहां भी अंधकार का वास वहीं-वहीं जलता है दीप। दिया जलता है कि उजास हो। अंधियारे जीने के हम आदि प्रकाष से नहाएं। कार्तिक नहान माने अंतर उजास का स्नान।
Artist Vinay Sharma's Painting

पूर्णिमा में दीपदान से बड़ा और क्या दान! पूर्णमासी को ही तो गंगाजी जन्मी। तुलसी जन्मी। गंगास्नान को इसीलिए तो पूर्णिमा को उमड़ पड़ते हैं लोग। कहते हैं, इस दिन किया स्नान, दिया हुआ दान, जप और तप अक्षय होते हैं। अखूट। कभी नहीं समाप्त होने वाले। संयोग ही था कि इस बार कार्तिक पूर्णिमा में षिव के घर था, हरिद्वार।  हरिद्वार यानि हर द्वार। महादेव का घर। ऋषिकेष में वेगवती होकर अपनी प्रखरता जताती गंगा हरिद्वार में शांत और सौम्य है। गतिप्रिया। अविरल बहती गंगा यहां जीवन गति की ही तो संवाहक है। सांझ में गंगा घाटों पर विचरते औचक नजर चन्द्रमा पर ठहर गई। उसकी कलाओं से जैसे साक्षात् हुआ। अमावस के मुरझाए, तेजहीन चांद को देखा था। पूर्णिमा में उसे यूं ओज में देख सुखद लगा। लगा, चांद होले-होले मुस्करा रहा है। चांदनी बरसाता। कमल की भांति सुन्दर। यह खिला-खिला चांद था। अपनी तमाम कलाओं के साथ विराजमान।

कहते हैं, ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो चन्द्रमा ही उनकी सुन्दरतम रचना थी। चन्द्रमा रूप में मनुष्य को सौन्दर्य की सौगात ही तो दी थी ब्रह्मा ने। कोई कह रहा था, चांद हमेषा प्रसन्न रहता है इसीलिए उसे देखते सुख मिलता है। सुख वही तो दे सकता है, जो अपने से संतुष्ट हो। पर कुछ ऐसा हुआ कि चन्द्रमा उदास रहने लगा। अंदर ही अंदर उसके अंदर कुछ ऐसा घटा कि वह कुम्हलाने लगा। तेजहीन होता वह मुरझा गया। सिकुड़ने लगा। अमावस आते-आते वह लोप होता  काला और कुरूप हो गया। उसकी समस्त कलाएं समाप्त जो हो गयी! चन्द्रमा की यह दुर्दषा देख ब्रह्मा को दुःख हुआ। उन्होंने चांद को समझाया, ‘क्यों बना रखी है यह रोनी सूरत! हंसता-मुस्कराता क्यों नहीं? रोने से जिंदगी नहीं कटती। रोने से थोड़े ना होता है समस्याओं का हल। दुख हो, अभाव हो फिर भी तुम्हें मुस्कराना है। यही है जीवन। उसका सौन्दर्य।’ चन्द्रमा को बात समझ आ गयी। उसने फिर से मुस्कराना प्रारंभ कर दिया। लौट आई फिर से उसकी तमाम कलाएं। अमावस का अंधेरा छंट गया था। पूर्णिमा आते-आते इसीलिए वह फिर से अपने पूर्ण सौन्दर्य में निखर हमें मोहने लगता है। सोचिए, तमाम कलाएं है, तभी तो है चांद का यह सौन्दर्य।

Thursday, November 7, 2013

हवाओं को सुनें, रेशमा गुनगुनाती मिलेगी


रेशमा नहीं रही! जिन्होंने रेशमा को सुना है, उनमें से बहुतों के ज़हन में ‘लम्बी जुदाई...’ या फिर ‘हाय ओए रब्बा नहीं ओ लगदा दिल...’ गीत ही गूंज रहे होगें पर सच इतना ही नहीं है! वह गाती तो लगता, सुरों के कायदे को दरकिनार करता कोई बेपरवाह गा रहा है। उसे सुनते आरंभ के स्त्री सुरों के मर्दानापन की अनुभूति कुछ ऐसी ही होती पर थोड़ी देर में ही मन सुरों में लिपटे अलहदे फक्कड़पन, विरह के भावों में कुछ इस कदर रमता कि गान का वह बावरापन सदा के लिए हममें बस जाता। माटी की सौंधी महक में रेशमा के सुरों में आंधी उड़ाती रेत, पाकिस्तान लगती राजस्थान की सीमाओं से जुड़ी विरानगी, और खानाबदोश जीवन से जुड़ी संवेदनाओं को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। कल्पना करें, पाकिस्तान लगते जैसलमेर-बीकानेर की सीमा की किसी ढाणी की। रेत कंटिले तारों से उस पार उड़कर चली जा रही है। इस पार चली आ रही है। आती-जाती या कहें, उड़ती रेत में आंधी की तेजी भी है तो कभी दूर तक कहीं किसी के न होने का सन्नाटापन भी। रेशमा के अलहदे सुर ऐसे ही हैं। नाजुकता में भारीपन। उड़ती रेती की गूंज। कहीं  किसी एक जगह न रूक ठौड़-ठौड़ भटकने का अलमस्तपन। फक्कड़ता। कहीं कोई सधी हुई बुनावट नहीं। जो है, बस वैसा ही जैसा प्रकति ने गढ़ा है। सच! यही तो है प्रकृति का संगीत।
बहरहाल, याद पड़ता है, तब रेशमा कार्यक्रम देने जयपुर आयी थी। उनसे बातचीत हुई तो लगा, अरे! यह तो हमारे बीकानेर की ही हैं। बोल के वही अंदाज। वही मस्ती। मुंह में पान की लाली। एकदम घरेलू। कोई साज-सिंगार नहीं। खानाबदोश मिजाज। ‘आप भैन-भाई प्यार से सुनते रहे हैं। अला की खिदमत है।’ ....गायन पर बातें हुई पर लगा अपने ज़हन में बसे डेरे, पीर-फक्कीर, मजारें, कबीलों, मेले-मगरियों में उनका मन अटका हुआ था। मुझंे लगता है, रेशमा के सुरों में लोकसंगीत की सहजता इसीलिए अंत तक बची रही कि उसने अपने अतीत को कभी बिसराया नहीं। मांड में बसे रेशमा के सुरों में लोक का अनूठा आलोक है। गाया रेशमा ने गुजराती में भी है, सिंधी में भी और उर्दू में भी है पर पंजाबी और राजस्थानी के बोलों में जो माधुर्य का रस टपकता है, वह सच में अनूठा है। धोरां धरा में गूंजती रेत के सुरों का अपनापन उसमें है तो पंजाब की मिट्टी की मस्ती भी। इस बार रेशमा को सुनें तो गौर करें, ‘उठ गए गवांढों यार...’ या फिर ‘अखिया नूं रैण दे...’ गीत। हृदय के तारों को जैसे यह छूते हैं। संगीत में बसी रूह। 
यह विडम्बना नही ंतो और क्या है! रतनगढ़ के लोहा गांव में जन्मी खानाबदोश परिवार की रेशमा का कबीला देश विभाजन के समय हिजरत करके पाकिस्तान पहुंच गया था। वह भारत में ही होती तो उसकी आवाज को मिलने वाली मुहब्बत से क्या उसकी कला और नहीं निखरती! पाकिस्तान उसकी कला की कद्र कर ही कहां पाया! सुरों में निहित विरह की उसकी संवेदना और फक्कड़पन को सुनते लगता है धरती आसमां को बुला रही है। सोचता हूं, वह भारत में होती तो संगीत में आसमां का मुकाम ही पाती। ‘लम्बी जुदाई...’ से ही वह दिलों में छा गई तो सोचिए दूसरा जो उसने गाया है, उससे रेशमा को क्या पहचान मिलती! और फिर मुल्क की सीमाओं को लांघता रेशमा का खानाबदोश मन रमा तो सदा भारत में ही। सच! रेशमा कहीं नहीं गई है। वह हममें ही बसी है। हवाओं को सुनें, रेशमा आपको गुनगुनाती ही मिलेगी।

Monday, November 4, 2013

दीया जलाएं, पर जतन से...

अंधकार से लड़ने की कला का पर्व है दीपावली। उपनिषद कहते है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ माने अंधकार से प्रकाश की ओर गमन हो। आलोक की यही तो है हमारी आराधना। दीपावली इस आराधना का ही तो संवाहक पर्व है। हमारी संस्कृति में प्रातः सूर्य को अध्र्य देकर दिनचर्या प्रारंभ होती है। सूर्य को अध्र्य देकर यही तो कहा जाता है, हे सूर्य! तम को हर आलोकित करें। करते ही रहें। आपके तेज का अंश ग्रहण कर धरा भी आलोकित हो। और यही क्यों, सूर्य गमन के साथ ही संध्या फिर से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हम करते हैं, दीप नमन। भाव होते हैं, ‘शुभम् करोति, कल्याणं, आरोग्यं, सुख-सम्पदा आत्म-वृद्धि प्रकाशाय, दुष्ट बुद्धि विनाशाय, दीपक ज्योति नमोस्तुते।’ प्रकाश के प्रति हमारा यह प्रणम्य भाव ही तो हमारी संस्कृति है। 
कथा आती है। चलते-चलते सूरज थक गया। निराश हो सोचने लगा, अंधेरे में चलने वाले को कौन दिखाएगा राह! आराम की चाह पर राह कहां! औचक उठ एक नन्हे से दीप ने विनम्रता से कहा, ‘आप जाएं सूर्यदेव! आराम करें। आपके आने तक प्रयास करूंगा कि अंधेरा जीवन पर हावी न हो। भले स्वयं इसके लिए मुझे मिटना पड़े।’ आश्वस्त हो सूर्यदेव घर की ओर चले। लौटे तो देखा बाती समाप्त प्राय हो चली थी। पर फिर भी अपने को जला, लौ को प्रज्ज्वलित किए था नन्हा सा वह दीप। सूर्य को देख बुझती लौ और तेजी से प्रकाशित हो शांत हो गई। दीपक बूझ चुका था परन्तु सूर्य मंे समाहित उसका तेज फिर से जीवन को आलोकित कर रहा था। 
यही तो है जीवन के उदात्त भाव। उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। माने उठो, जागो, जो श्रेयस्कर कार्य है, उसे पहचानो। सोचता हूं, कैसा होगा वह क्षण जब मृत्युशय्या पर लेटे होंगे बुद्ध। मन में विचार आ रहे हैं, उनका प्रिय शिष्य आनंद समीप खड़ा है। बुद्ध का बिछोह उसे सहन नहीं हो रहा है। दुखी मन से वह रोने लगा। शांत बुद्ध पूछ रहे होंगे, ‘अरे! रो रहे हो!’ आनंद ने तब कहा होगा, ‘प्रभु आप जा रहे हैं! अभी तो मुझे पूरा ज्ञान भी नहीं मिला!’ तभी बुद्ध ने शायद कहा होगा, ‘अत्तदीपो भव’ यानी अपने दीपक आप बनो। सच भी यही है! हमें अपने दीपक आप ही बनना है। अंतर आलोकित होगा तो सर्वत्र उजास ही उजास पाएंगे। याद करें, कभी रैदास ने भी तो कहा, ‘प्रभुजी तुम दीपक, हम बाती।’ दीपक की बाती बन हम आलोक के संवाहक बनें। 
दीपावली! यानी कार्तिक अमावस की घनघोर रात। यह वह रात्रि है जब चांद और सूरज एक राशि में आ जाते हैं। चांद अपनी तमाम कलाओं को खो देता है। इसी से पसर जाता है धरा पर घटाटोप अंधेरा। धरा के तम को हरने ही तो जलाते हैं हम दीप। घर-आंगन एक साथ असंख्य दीपकों की झिलमिल से रोशन हो उठता है संसार। अंधेरे की अब क्या बिसात! दीपावली के झिलमिलाते दीप मन में अवर्णनीय आनंद का ही तो उजास करते हैं। 
प्रकाश हो तो अंधकार का अस्तित्व ही न हो। कोई कह रहा था, अंधकार ने एक बार ब्रह्माजी से प्रकाश की शिकायत की। कहने लगा, यह हर वक्त मेरा पीछा करता रहता है। इसे रोकिए! ब्रह्माजी ने तुरंत प्रकाश को बुला भेजा। कहने लगे, ‘अंधकार ने तुम्हारी शिकायत की है।’ प्रकाश हैरान, बोला, ‘अंधकार ने! पर मैं तो उसे जानता ही नहीं। कभी उसे देखा ही नहीं। आप सामने लाईए।’ अंधकार को प्रकाश के सामने आने को कहा गया। कहते हैं, ब्रह्माजी तब से इन्तजार ही कर रहे हैं। प्रकाश के सामने अंधकार आने का अर्थ है, उसका अस्तित्व ही न रहना। फिर बताईए, वह आता भी कैसे! जहां ज्ञान है, वहीं तो प्रकाश है। अज्ञान के अंधेरे की प्रकाश के सामने आने की हिम्मत हो  भी कैसे सकती है! ज्ञान की ज्योति जल जाए तो फिर अज्ञान कहां ठहरेगा।
तो आईए, इस दीपावली मन से जलाएं एक नन्हा सा दीप। भीतर के अपने तम को हरने। संस्कृति का यही तो चिंतन है। चिरंतन। कालिदास इसीलिए तो कहते हैं, दीपक शरीर है। प्रकाश प्राण। एक दीप की लौ से दूसरा दीपक और दूसरे से तीसरा।...प्रकाश की लौ पकड़ कर ही हम बढ़ते जाएं आगे। और आगे। अंधकार को दूना होने दें। प्रकाश इसी से और अधिक शक्तिमान हेागा। आईए, दीया जलाएं। पर जतन से। यह दिया सत्य पर टिका हो। इसमें तप से तेल मिले। बाती दया से पूरी गयी हो। क्षमा की लौ हो।...तो आईए, इस दीपावली जलाएं-अंतर को आलोकित करता नन्हा सा एक दीप।


Friday, October 25, 2013

सुर जो सजे

विश्वास नहीं हो रहा, मन्ना डे नहीं रहे! अभी कल की ही तो बात लगती है, वह जयपुर आए थे। गायन से पहले होटल में उनसे मुलाकात हुई तो ढेरांे बातें हुई थी। उनकी जिन्दादिली को तब गहरे से जिया था। उनकी मनुहार को भी तो अब तक कहां भूल सका हूं! कार्यक्रम का समय हो चला था उन्होंने साथ ही चलने की नूंत दी थी। बाद में तो तीन-चार दिन उनके साथ  रहने का भी सुयोग हुआ। लगा, गान में ही नहीं असल जिन्दगी की भी उनकी रेंज का कोई पार नहीं था!
याद पड़ता है, जयपुर में खुले आकाश के नीचे हल्की ठंड में रवीन्द्र मंच के ओपन थिएटर में वह गाने लगे थे। उनके सुर सजे तो सजते ही चले गए। पता ही नहीं चला था कब सांझ रात में तब्दील हो गई थी। उनके गान की वह अद्भुत सांझ थी। स्वयं भी वह जयपुर की फिजाओं में विभोर हो गए थे। हारमोनियम बजाते वह गा रहे थे, ‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम-तुम मिले तो वीराने में भी आ जाएगी बहार’ सच में उनके गान से तब बहार आ गई थी। बच्चन की ‘मधुशाला’ भी तब उन्होंने मन से सुनाई। वह घड़ी भी आई जब उन्होंने गाया, ‘जिन्दगी कैसी है पहेली हाय...।’ लगा, जिन्दगी की पहेली का हल ढूंढते ही उनके सुर फिल्म संगीत में सजे। सजते ही रहे।
 मन्ना डे यानी प्रबोधचन्द्र डे। हिन्दी फिल्म संगीत के ऐसे गायक जिन्होने दुरूह से दुरूह गीत को गान से संवारा। हर रेंज के गीत गाए। आवाज का विरूपण करने की अद्भूत क्षमता उनमें जो थी! कभी अनिल बिश्वास ने यूं ही तो नहीं कहा था, ‘मन्ना डे की आवाज बहते झरने सा अहसास कराती है।’ सच भी है। रवीन्द्र संगीत, बाउल संगीत और खयाल गायकी से गायन का सफर प्रारंभ करते मन्ना डे ने फिल्म संगीत में स्वर की मौलिकता को सदा बरकरार रखा। शास्त्रीय ही नहीं रोमांटिक, तेज संगीत के गीत, कव्वाली, देशभक्ति, दर्शन, प्यार-रोमांस सभी तरह के गीत तो गाए हैं मन्ना डे ने। सब के सब सुरीले। पर उनके साथ ट्रेजिडी यह भी रही कि उन्हें सदैव वे गीत दिए जाते रहे हैं जो या तो किसी गायक कलाकार की रेंज से बाहर होता या फिर जो फिल्म में नायक की बजाय अतिरिक्त नायक या फिर फिल्म की थीम सांग होता। 
फिल्मों में गायन की सुर यात्रा के पहले एक दशक में उन्हें या तो उपदेश से भरे बोलों के गीत दिए जाते या फिर कठिन धुनों पर आधारित गीत। और तो और जो गीत उन्हें गाने को दिए जाते वे लोकप्रिय सिचुएशनों में उपयोग नहीं किए जाते थे बल्कि अक्सर चरित्रों के नैतिक संकट को सुलझाने के लिए किए जाते थे। बावजूद इसके उनके गाए उस दौर के गीतों केा भी विशेष पहचान मिली। यह वह दौर था जब मन्ना डे संगीतकार सचिनदेव बर्मन, के.सी.डे. और खेमचन्द प्रकाश के सहायक के रूप में काम किया करते थे। राजकपूर अभिनीत जितनी भी फिल्मों में मन्ना डे ने गाया, वे सभी फिल्में गीतों के कारण ही खासी सराही गई। लोक संगीत पर आधारित नौशाद के संगीत में ‘मदर इंडिया‘ का गीत ‘चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए रे...‘ गीत हो या संवाद शैली का शंकर-जयकिशन का संगीतबद्ध ‘मेरा नाम जौकर का‘ गीत ‘ए भाई जरा देख के चल.‘ या आवाज में शोखी लिए ‘उजाला‘ फिल्म का ‘झूमता मौसम मस्त महीना, चांद सी गोरी एक हसीना...‘ या ‘श्री 420‘ का ‘प्यार हुआ इकरार हुआ..‘ जैसा गीत या फिर ‘पड़ोसन‘ का ‘यक चतुर नार कर के सिंगार...‘ और ‘पगला कहीं का‘ फिल्म का ‘मेरी भैंस को डंडा क्येां मारा..‘जैसा सदाबहार हास्य गीत। मन्ना डे ने हर गीत को अपने गान में गहरे से जिया। 
बहरहाल, ‘मेरा नाम जोकर’ के ‘ए भाई जरा देख के चलो...’ पर उन्हें  अवार्ड मिला। मजे की बात यह कि यह वह गीत था जिसे उन्होंने कभी गीत माना ही नहीं। याद पड़ता है, इसकी याद दिलाने पर उन्होंने इन पंक्तियो ंके लेखक से कहा, ‘अरे भई, यह गीत है कहां! सीधा-सादा, कोई सुर, लय तो इसमें है ही नहीं।’ मैंने तपाक से तब अगला प्रश्न किया था, ‘...तो फिर आप कौनसा वह गीत मानते हैं जो अवार्ड का हकदार है?’ तुरंत उन्होंने जवाब दिया, ‘पूछो न कैसे मैने रेन बिताई...,’ ‘लागा चुनरी में दाग...’ जैसे बहुत से गीत हैं।’ 
याद करता हूं, कभी भीमसेन जोशी के साथ उन्होंने ‘‘केतकी गुलाब जूही.....’ गीत गाया था। संगीतकार शंकर-जयकिशन ने पं. भीमसेन जोशी के साथ इस गीत को गाने के साथ ही गायन में पं. भीमसेन जोशी को हराने की बात भी बताई थी। मन्ना डे हैरान। यह कैसे हो सकता है! पर करना तो था ही सो उन्होंने जमकर रियाज किया। गायन की धुन में यह पता ही नहीं चला कि कब उन्हांेने पं. भीमसेन जोशी को हरा दिया था। इस बार जरा गौर से सुनेें इस गीत को, आपको भी हार-जीत समझ आएगी। पडित भीमसेन जोशी जी से भी इन पंक्तियो के लेखक ने कभी इस पर प्रश्न किया था तो उन्होंने कहा था ‘शास्त्रीय गीत को फिल्मी गीत में भी मन्ना डे वैसे ही हद तक ले गए थे।’ सच! उनके गान की यही तो खूबी थी। वह जो गाते उसे आत्मसात कर लेते।  
सोचता हूं, ‘सुर न सजे क्या गाऊं मै, सुर के बिना जीवन सूना...’ गीत जब मन्ना डे ने गाया था तब क्या किसी ने यह सोचा था कि उनके सुर इतने सजेंगे, इतने सजेंगे कि उनके बगैर फिल्मी गीतों की चर्चा ही नहीं की जा सकेगी!
बहरहाल, सच यही है। उनकी आवाज का जादू फिजाओं में आज भी गायन के प्रति उनकी दिवानगी को ही बंया करता हम में बसता है। प्रबोध चन्द डे फिल्मी दुनिया के अकेले ऐसे गायक रहे हैं जिनकी आवाज में खुद की निजता सदा बरकरार रही। हर काल, परिस्थिति में। सुनने वाले को आंनदानुभूति का अहसास कराते। भले आज वह देह से हमारे साथ नहीं है परन्तु गान में सदा ही वह हममें बसे रहेंगे। कहें, मन्ना डे ने जो गाया, उसमे -सुर जो सजे, सजते ही रहे। सजते ही रहेंगे।


Friday, October 18, 2013

पंचम वेद की दृश्य संवेदना

प्रदर्शनकारी कलाओं में नाटक ही वह विधा है जिसमें तमाम दूसरी कलाओ का उत्स है। चार वेदों के बाद पांचवे वेद के रूप में इसीलिए नाटक ही अभिहित है। पर इस समय हिन्दी नाटको के साथ विडम्बना यह है कि पर्याप्त मात्रा में खेले जाने के बावजूद दर्शकों का हर ओर टोटा है। भले यह कहें कि सिनेमा, टीवी और दूसरे माध्यमों के कारण ऐसा हुआ है परन्तु बड़ा कारण क्या यह नहीं है कि अच्छे नाटकों के प्रदर्शन के साथ प्रेक्षागृह में दर्शकों को उन्हें दिखाने के आग्रह गौण हो रहे है! कुछ समय पहले पणिक्कर नाट्य समारोह जब हुआ तो बावजूद संस्कृत और कन्नड़ भाषाओं में नाट्य प्रस्तुतियों के प्रतिदिन ही रवीन्द्र मंच दर्शकों से खचाखच भरा रहा। 
बहरहाल, नाटक द्विज है। माने दूसरा जन्म। जो बीत गया है, उसे फिर से मंच पर जीवन्त करने की कला। जीवन से जुड़े तमाम रंग जो वहां होते हैं! अंतर्मन संवेदनाओं का आकाश लिए। रवीन्द्र मंच स्वर्णजयन्ती समारोह में अशोक राही के निर्देशन और अभिनय में ‘सेल्विन का केस’ नाटक देखा था। लगा, राही नाटक के मर्म में जाते उसमें निहित तमाम संभावनाओं को अपने तई जीते हैं। ‘सेल्विन का केस’ का मंचन दुरूह है।  कहानी रोचक है पर बदलते दृश्यों में बार-बार फ्लेश बैक में ले जाती हुई। सिनेमा में यह सुविधा है कि वहां एक ही समय में अनेकों कालखंड दिखाए जा सकते हैं। दृश्य परिवर्तित होते वहां सैकण्ड लगते हैं पर मंच पर यह कैसे संभव हो! पर राही ने इसे संभव किया। नाटक में एक हत्यारे को निर्दोष जान ख्यात लेखक लियोनार्ड लंडन मानवाधिकार से जुड़ी लेखकीय दलीलों से हत्या के जुर्म से उसे बरी करा देता है। उसे इसके लिए अपार यश और नोबल पुरस्कार तक मिलता है। बाद में लंडन को पता चलता है कि जिसे उसने बचाया वास्तव में वही खूनी था। अब क्या किया जाए! नाटक लेखक का संघर्ष, द्वन्द, पीड़ा, विडम्बना के मध्य संवेदना की सूक्ष्म अभिव्यंजना है। राहीजी के नाटक पहले भी देखे हैं पर मुझे लगता है, इधर उन्होंने अपनी जो रंगभाषा ईजाद की है वह अद्भुत है। यह ऐसी है जिसमें रंगमंच से जुड़े बाहरी आवरण नहीं बल्कि वह स्वयं और उनका अभिनय प्रधान है। प्रदर्शन में खुलेपन के साथ सहजता। ऐसी जिससे दर्शक सीधे मंच से जुडें। 
माना यह जाता है कि थिएटर में स्थानीय संदर्भ डालने से दर्शक अधिक उसका हिस्स बनते हैं परन्तु राही अपने रंगकर्म में इस मिथक को तोड़ते हें। ‘सेल्विन का केस’ ही लें। अमूमन ऐसे नाटकों में प्लेबैक थिएटर होता है। माने कहानी दर्शक को सुनाई जाती है ताकि वे स्वयं ही अपेक्षित निर्णय पर पहुंच जाएं। परन्तु राही ने कहानी से नहीं अपने अभिनय से यह संभव किया कि वह दर्शको को प्रभावी रूप मंे संप्रेषित हो जाएं। अनुभूतियों और भीतर के द्वन्द को वह भाव भंगिमाओं से व्याख्यायित करते चरित्र में रमते हैं। हां, निर्देशक के रूप में उनके पास दृश्यों की संगत की भी प्रभावी दीठ है। इसीलिए फ्लेश बैक दृश्यों में अतीत का वर्तमान से नाता कराते वह कहीं कोई अवरोध नहीं आने देते। यही तो किसी नाटक की बड़ी विशेषता होती है।
मुझे लगता है, रंगमंच मूलतः अभिनेता का ही माध्यम है। इसलिए कि वहां चरित्र को जीते वह अपना स्पेस तलाशता एक प्रकार से उसमें अपने को घोल देता है। स्वयं की सीमाओं को लांघते हुए। यही उसका द्विज है। जो इसे साध ले वही तो होता है सच्चा अभिनेता। तो कहें, इस दीठ से अशोक राही सधे हुए अभिनेता, निर्देशक हैं!

Saturday, October 12, 2013

संस्कृति के सौन्दर्य चितराम

संस्कृति माने जीवन से जुड़े संस्कार। स्वाभाविक ही है, इसमें विचार, सूक्ष्म कल्पनाएं, भावनाएं आदि सभी कुछ के संस्कार निहित हैं। जब कभी किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा होता हूं, लगता है वहां प्रदर्शित-ध्वनित हमारी अनन्तरूपा संस्कृति से ही साक्षात् हो रहा होता हूं। उस संस्कृति से जो साहचर्य के गुणों से संपन्न है।  
बहरहाल, बिड़ला सभागार में कुछ दिन पहले पावरग्रिड कारपोरेशन आफ इण्डिया द्वारा क्षेत्रीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थी। पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड और ऐसे ही तमाम दूसरे प्रांतो से जुड़े उपक्रम के कार्मिक और उनके परिजन कलाकारों ने इसमें अपनी प्रस्तुतियां दी। प्रतियोगिता निर्णायक की भूमिका के रूप में भाग लेते संकट मेरे समक्ष यह था कि बेहतरीन प्रस्तुतियों में से कैसे किन्हीं तीन उत्कृष्ट प्रस्तुतियों को छांटा जाए। इसलिए कि पंजाब से आए दल ने भांगड़ा में खेतों में होने वाले श्रम के महत्व का सांगोपांग चितराम किया था तो उत्तराखंड के कलाकार दल ने हाल ही आयी वहां की त्रासदी को जीवंत करते भगवान शिव का अद्भुत नृत्य प्रस्तुत कर सभागार को सम्मोहित सा कर दिया। आगरा के दल ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं को जीवन्त किया तो बल्लभगढ़, कानपुर, लखनऊ से आए कलाकारों ने अपने-अपने क्षेत्र की संस्कृति जुड़ी नृत्य, नाट्य प्र्रस्तुतियां दी। राजस्थान के दल ने उत्सवधर्मी राजस्थान के विविध रंगों को अपनी प्रस्तुतियों में गहरे से जिया। संस्कृति से जुड़ी इन तमाम प्रस्तुतियों का आस्वाद करते निर्णय के वक्त यह भी अनुभूत किया कि देश-काल-परिवेश से उत्पन्न विभिन्नताएं हमें भिन्न करने की बजाय एकसूत्रता के धागे में पिरोती है। यह भी कि यह वैविध्यता से सराबोर हमारी संस्कृति के ही रंग है जिनमें खंड सौन्दर्य का भी विराट दृश्यगत होता है। शायद इसलिए कि वहां रमणीयता है। क्षण क्षण में नवीन जान पड़ती रमणीयता।
सांस्कृतिक प्रतियोगिता में देश के विविध भागों से आए सांस्कृतिक दलों की प्रस्तुतियों में रमते हुए यह भी लगा कि संस्कृति समाज को मानवीय मूल्यों से जोड़ती है। ऐसा है तभी तो सरकारी उपक्रम के वह लोग जो निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होते रहते हैं परन्तु जहां रहते हैं, वहां के परिवेश में रच-बस जाते। उनके इस अपनापे से ही संवेदना के मूल्य फिर उनमें जगते हैं। मसलन राजस्थान मंे पदस्थापित कार्मिकों के सांस्कृतिक दल की प्रस्तुति को ही लें। राजस्थान की लोक संस्कृति से सीधे उनका कोई सरोकार जन्मजात नहीं रहा है परन्तु यहां रहते उन्होंने राजस्थानी संस्कृति को जैसे आत्मसात कर लिया। श्रेष्ठ तो श्रेष्ठ ही होता है सो अपने प्रांत की प्रस्तुति को प्रथम घोषित करने के संकोच के बावजूद निर्णय तो यही करना था! पर इस निर्णय मंे नहीं जाए तो भी यह कहा जा सकता है कि स्थान-विशेष  के नहीं होते हुए भी हर सांस्कृतिक दल ने वहां की संस्कृति से अपने को जोड़ा ही। पावरग्रीड के महाप्रबंधक एच.के.मलिक और उप महाप्रबंधक उपेन्द्र सिंह से संवाद हुआ तो यह भी पता चला कि सांस्कृतिक तैयारियों के लिए बाकायदा काॅरपोरेशन राष्ट्रीय स्तर पर बजट प्रावधान करता है। यही नहीं इस बजट के अंतर्गत कार्मिकों के परिजनों को प्रस्तुतियों का अवसर मिलता है। एक साथ मिल-बैठ बतियाने का मौका भी। माने कार्मिक के साथ उसके परिवारजन भी संस्कृति के विविध रंगों से अपने आप ही रंगते हैं। संस्कृति के सरोकारों का यह श्रेष्ठतम उदाहरण है। राजकीय सेवा में कार्यरत कार्मिक और उसके परिजनों को यदि संस्कृति से जुड़े सराकारों के श्रेष्ठतम प्रदर्शन की भावना से मंच पर आने के अवसर मिलते हैं, तो बहुत से स्तरों पर समाज में क्षीण होते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों का बिगसाव हो सकता है। आखिर, समय की बड़ी जरूरत आज यही तो है!   


Friday, October 4, 2013

राग में रूप की खोज

नादब्रह्म की उपासना है ध्रुवपद। संगीत के सप्तस्वरों का आदिरूप नादब्रह्म ओंकार ही तो है। ओंकार में शब्द भी है और स्वर भी। कहते हैं, सृष्टि की उत्पति इस नादब्रह्म से ही है । बहुश्रुत पद भी है, प्रथम आदि शिव शक्ति नादे परमेश्वर।’ इसीलिए तो कहते हैं, नाद से उत्पन्न रस ही संगीत है। और नाद की रहस्यमयी महिमा और संगीत शास्त्र से संबद्ध विषय का सांगोपांग कहीं है तो वह ध्रुवपद में ही हैं। ध्रुवपद को ज्ञान की परम्परा से शायद इसीलिए अभिहित किया गया है। 
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में ध्रुवपद संगीत समारोह में भाग लेते संस्कृत के कहन नादाधीनं जगत्को जैसे गहरे से अनुभूत किया। सच! असार जग का सार कहीं है तो वह संगीत में ही है। ध्रुवपद-धमार से जुड़े कलाकारों को सुनते लगा, संगीत बाहरी ही नहीं अंतर के सौन्दर्य का भी संवाहक है। समारोह में सुना तो और भी कलाकारों को पर डॉ मधु भट्ट तैलंग का ध्रुवपद मन में अभी भी गहरे से बसा है। लयकारी और सांसो पर उनका गजब का नियंत्रण है। गान में आलाप की साधना और स्वरों पर विलक्षण अधिकार और हां, गायकी की उनकी निरंतरता में शब्दों से जुड़े संस्कारों की ध्वनि ओप भी विरल है। जवाहर कला केन्द्र में उस दिन बूंदा-बांदी हो रही थी। अंदर प्रेक्षागृह में  मधुजी जब गाने लगी तो उनका गान भी जैसे भिगोने लगा। दुरूह होते हुए भी गान का सहज निभाव। गमक और मींडयुक्त उनका आलाप। लय वैचित्र्य के अंतर्गत उपज, बोलबांट, दुगुन-तिगुन आदि की विभिन्न लयकारियां। 

कोई कह रहा था, ध्रुवपद महिलाओ का गान नहीं है। गान में फेफड़ों पर जोर जो पड़ता है! दमदार और खुली आवाज से यह जो सधता है। भला, महिला स्वर में ध्रुवपद हो सकता है! शायद इसी सोच से ध्रुवपदको कभी मर्दाना गान कहा गया। इसका मतलब मधु भट्ट अपवाद हैं।  ध्रुवपद को उन्होंने अपने तई साधा है। स्वर, लय पर पूर्ण अधिकार के साथ। वह गाती है तो लगता है,  ध्रुवपद अपनी पूर्णता के साथ हृदय के अंतरतम में प्रवेश करता है। उनके स्वरों में सौन्दर्य का उजास भी है तो बेलौस खुलापन भी। स्वर माधुर्य के साथ काव्य का वह सुंदर प्रयोग करती है। विशेष लयकारी में वह गाने लगी थी, ‘घन घुमण्ड चण्ड प्रचण्ड...। झंकृत होने लगे मन के तार। लगा, संगीत के समुद्र की अतल गहराईयां नापते हैं उनके सुर। नाभि से उठता नाद। सच! सुरों की दुरूह साधना में वह ध्रुवपद को गहरे से जीती कलाकार हैं। आलाप के साथ स्वरों पर विलक्षण अधिकार लिए वह जब गा रही थी तो, अंतर से ध्वनित होती वाणी से ही जैसे साक्षात् हो रहा था। गमक में सुरों की अद्भुत धमक। सुनते हुए लगा, दूर से आते सुरों में वह अनंत की सैर कराती है। 

उनका आलाप सुनते यह भी लगा, होले-होले नदी, नाले, पर्वत, गली, संकड़ेपन के सफर में लय के साथ एक-एक कर आगे बढ़ते जा रहे हैं सुर। राग में रूप की खोज। मुझे लगता है, सधे सुरों में व्यक्ति अपने होने की तलाश कर सकता है। यह संगीत का ही सामर्थ्‍य है कि वह व्यक्ति को वहां ले जाता है, जहां चाहकर भी कोई जा नहीं सकता। सधे सुर ही तो करते हैं अनंत की चाह की राह आसान। ध्रुवपद गाने वाले कलावन्त कहे जाते हैं। माने कला के ज्ञाता। ज्ञान का अथाह सिलसिला ही तो है ध्रुवपद। ...और ऐसे दौर मे जब ध्रुवपद शनैः शनैः हमसे दूर होता जा रहा है, एक महिला गायिका गान की उस महान परम्परा से हमें जोड़े हुए हैं। अब बताईए, मधु भट्ट के होते, है कोई जो यह कहे-ध्रुवपद पुरूषों का ही गान है!