Saturday, July 28, 2012

रेखाओं में गूंथे जीवन बिम्ब

नई दिल्ली की गैलरी आर्ट शास्त्र ने कुछ समय पहले हिम्मतषाह के रेखांकनों की एक प्रदर्षनी का आयोजन किया था। प्रदर्शनी का शीर्षक रखा गया, ‘अवलोकिता’। झेन दर्षन में बुद्ध के एक नाम से अभिहित करते उनकी ड्राइंग का अंतरंग वहां था। प्रदर्शनी में प्रदर्शित चित्रों का आस्वाद करते मुझे लगा, यह हिम्मत शाह  ही हैं जो रेखांकनों में वस्तुओं और जीवों के सादृष्य का विचार किए बगैर शुद्ध आत्मिक अभिव्यक्ति करते है। भले इसे किसी दर्शन से जोड़ दिया गया हो परन्तु मूलतः वहां कोई विचार या दर्षन का आग्रह नहीं होकर रूपांकन की सहज स्फूर्त क्रियाषीलता है। 
वैसे भी कलाकृतियां अनुभूतियों से ही तो जुड़ी होती है। देखने की भी और उसे रचने की भी। किसी एक अर्थ से जोड़कर उन्हें चाहकर भी कहां व्याख्यायित किया जा सकतो है! यह इसलिए है कि बहुत सी दूसरी संभावनाएं वहां बार-बार जग रही होती है। कोई उसके बारे में कहे कि वह कैसी है तो शायद ठीक वैसे ही उसे व्यक्त किया ही नहीं जा सकता। वह उसी को होती है जो अनुभूत करता है।
बहरहाल, हिम्मत शाह के शिल्प पर तो बहुत कुछ लिखा गया है परन्तु न जाने क्यों उनके  रेखांकनों पर आलोचकों का ध्यान खास गया ही नही। मुझे लगता है, देश के वह उन विरले कलाकारों मंे से हैं जो अपने तई विचार संपन्न आकृतियों का सर्जन करते रेखाओं की अलौकिक सामर्थ्यता की अनुभूति कराते हैं। भले उनके रेखांकनों में स्वयं उनके बनाए स्कल्पचर देखे जाने का अहसास भी है वहां टैक्सचर की तमाम संभावनाएं भी हैं। उनके रेखांकन ऐसे भव में हमे ले जाते हैं जहां मानवाकृतियां जीव-जंतुआंे की प्रकृति में समाहित होती प्रतीत होती है तो बहुतेरी बार विभिन्न जीव-जंतुओं की मूल प्रकृति मानव आकृतियों में समाहित होती दृष्य का सर्वथा नया बोध कराती हैै। व्यक्ति के भीतर चल रहे द्वन्द, उससे संबद्ध तमाम विसंगतियां, आधुनिकता के बनावटीपन और यांत्रिकता में जकड़ते जा रहे विचारों के केन्द्र में हिम्मत शाह कला की जो दुनिया रचते हैं, उसमें भावपूर्ण रूपांकन यत्र-तत्र-सर्वत्र है। मसलन जापानीज इंक ऑन पेपर को ही लें। वहां रूप की स्पष्टता तो है परन्तु विचारों का सघन जंगल है। रेखाओं का अनूठा उजास है तो रेखांकनों में खंड-खंड रचित कोलाज में विस्मय के साथ गति का अनूठा प्रवाह है। लाईनों से उभारे टेढे-मेढे चार पैरों के साथ ऊपर उभरती ऊंट, घोड़े जैसी आकृतियों में पीछे पूंछ की बजाय दिखाई देते व्यक्ति के जरिए वह जैसे भीतर की अपनी संवेदनाओं का सब कुछ बाहर निकाल देना चाहते हैं। 
ऐसी ही ड्राइंग की उनकी एक आकृति में रेखाओं, रेखाओ के गोलों, बिन्दुओं के जरिए रोबोटनुमा आकृति का सर्जन किया गया है। एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था होती ऐसी आकृति में आकृति के भीतर से निकलती और आकृतियां मनुष्य की जटिलता, यांत्रिकता के बंधनों के साथ ही सभ्यता से उपजे तमाम विषादों को भी जैसे हमारे सामने रखती है। इसे देखते लगता है, हिम्मत शाह किसी एक आकृति में भी विचार की तमाम संभावनाओं को गहरे से जताने का सामर्थ्य रखते हैं। 
मुझे लगता है यह हिम्मतषाह ही हैं जिनकी ड्राइंग देखने का पूरा एक वातावरण निर्मित करती है। इस वातावरण के अंतर्गत देखे हुए दृष्यों की बहुत सारी  स्मृतियां औचक कौंधती है। इसीलिये उनकी ड्राइंग में बहुतेरी बार जॅक्सन पोलाक के बनाये चित्रों के व्यापक प्रभाव चित्रण की तरह वस्तुनिरपेक्षता और व्याकुलता का आभाष भी होता है तो रेखाओ में गंूथी शारीरिक बल्ष्ठिता से माइकिलेन्जलो का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। उनके चित्रों को देखते हुए दर्षक स्वयं को अनोखे वातावरण में परिवेष्टित अनुभव करता है और इसी से कलाकृति को चित्रकार की दृष्टि से नहीं बल्कि दर्षकीय दीठ से नया अर्थ अनायास ही मिल जाता है। 


Friday, July 20, 2012

कला का सिनेमाई रूपान्तरण


विद्यासागर उपाध्याय के रंग कोलाज 

विद्यासागर उपाध्याय रंगों के उत्सवधर्मी कलाकार हैं। कैनवस पर वह जो बनाते हैं, उनमें सीधे सपाट दृष्य नहीं मिलेंगे। मिलेंगे तो बिम्ब कोलाज। संकेतों में रंगों का अद्भुत रचाव। आरंभ के उनके रेखांकन और बाद के चित्रफलक पर विचारता हूं तो अनुभूत होता है कि उनकी कलाकृतियों में एक अजीब सी व्याकुलता रंगों के सांगीतिक आस्वाद के साथ देखने वाले में सदा ही जिज्ञासा जगाती रही है। कहें, अपने दौर से अलग कुछ करने के उनके कला चिंतन से उपजी कलाकृतियां रंगों का मनभावन रूपान्तरण है। भले अमूर्तन की उनकी रंग दृष्टि समकालीनता का अतिक्रमण करती रही है परन्तु संप्रेषण के नये आयामों में उसका आस्वाद लुभाता भी है। उनके रंग लोक में तैरती अनुभूतियों, स्मृतियां भीतर के हमारे रितेपन को जैसे भरती भी है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले उपाध्याय के रंग सरोकारों पर ‘कलानेरी’ आर्ट गैलरी ने विनोद भारद्वाज और रोहित सूरी निर्मित फिल्म ‘कलर सिम्फनी’ के प्रदर्षन की पहल की। फिल्म के शीर्षक को देखकर जिज्ञासा हुई सो देखने जाना ही था परन्तु फिल्म देखकर निराषा हुई। इसलिये कि विद्यासागर उपाध्याय की कला में रंगों का अद्भुत रचाव है। रंगों के उनके सरोकार भी किस एक मुकाम की बजाय निरंतर बदलते रहे हैं। बंधी-बंधायी लीक की बजाय वहा समय का अपनापा हैं। माने वहां परम्परा भी है तो आधुनिकता के गहन सरोकार भी। चटख रंगों में झिलमिलाते उनके रंग कैनवस का पारदर्षीपन भी अलग से ध्यान खींचता है। बल्कि मुझे तो उनकी रंगधर्मिता में चलचित्रनुमा जो एप्रोच है, वह भी सदा से आकर्षित करती रही है। लगता है, उनके कैनवस का अर्मूतन पानी में तैरता है। उसमें गत्यात्मक प्रवाह जो है। कैनवस स्थिर है परन्तु रंग दृष्यों का चलायमान भाव वहां है। कलाकृतियां देखते हुए लगेगा कैनवस नहीं किसी फिल्म को हम देख रहे हैं। और इस पर सच में यदि फिल्म बने तो उसमें कुछ खास की गुजांईष तो रहती ही है परन्तु ‘कलर सिम्फनी’ से वह ‘खास’ गायब है। शायद इसलिये भी कि फिल्म अभिकल्पन में तात्कालिकता की प्रबलता है। लगता है, कुछेक पंेटिंग के इर्दगिर्द ही फिल्म का ताना-बाना बुन, दृष्य शूट कर लिये गये और बगैर किसी सोच, शोध के उन दृष्यों को रख दिया गया है। 
पूरी फिल्म में विद्यासागर उपाध्याय की कलाकृतियों के रंग सरोकारों की शास्त्रीयता को विनोद कहीं भी पकड़ नहीं पाये। इसीलिये फिल्म देखते समय जो अधुरेपन की शुरूआत होती है, वही इसके समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है। कलाकार की बजाय कुछेक कलाकृतियों का चलचित्र बनकर रह गयी है,  बीस मिनट की यह पूरी फिल्म। आरंभ में कैनवस पर कलाकृति रचते, रंग बिखेरते कलाकार के कुछेक शाॅट इसमें है, अंतराल पश्चात चुनिन्दा कलाकृतियां पर कैमरा फोकस होता है। बीच में स्क्रिन पर उपाध्याय के जन्म और कलाधर्मिता पर कुछेक पंक्तियां उभरती है और फिर से पहले जो कलाकृतियां दिखाई गयी थी, उन्हीं पर कैमरा फोकस होता है। उनके स्टूडियों के पुराने दरवाजे की सांकल के पास खुद उनके खड़े होने के शाॅट की मुग्धता में कलाकार की कला यहां जैसे गौण हो गयी है। 
बहरहाल, सिनेमा चलायमान दृष्यों की विधा है और कैमरा उसकी भाषा है। यह इतनी शसक्त है कि थोड़े में भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, बषर्ते कि आप उसमें रमें, उसे जियें। इस दीठ से ‘कलर सिम्फनी’ लगता है पूरी तरह से चूक गयी है। हाॅं, विद्यासागर उपाध्याय की कलाकृतियों के दृष्यों के पाष्र्व मंे राग बिहाग में पंडित विद्याधर व्यास का शास्त्रीयगान जरूर रंगों की उत्सवधर्मिता को बंया करता कुछ सुकून देता है।  

Friday, July 6, 2012

सौन्दर्य के कला देव शिव


शिव सौन्दर्य के कला देव हैं। मन के सौन्दर्य देवता। सौन्दर्य वह नहीं है, जिसके हम आदि हैं। सौन्दर्य वह जिसमें मन रमता है। कलात्मक सौन्दर्य। सोचता हूं, अकेले शिव ही ऐसे देवता हैं जो नंग-धड़ंग पूजे जाते हैं। और कुछ नही ंतो लंगोटी की जगह चमड़े का टुकड़ा ही लपेट लिया। गहनों के नाम पर गले में सांप धारण कर लिया। चिता की राख लपेटे भी वह हमें लुभाते हैं। आप खुद ही सोचिए! उनकी सवारी भी कोई और नहीं सांड है। आप-हम उसके पास जाते हुए भी डरें।
 भंग-धतुरा उनका भोजन है। कंठ में विष की भंयकर ज्वालाएं। भूतभावन। समुद्र मंथन में जब हलाहल निकला तो उसे कौन पिए। भोले भंडारी को ही आगे किया गया। कहा गया, आप ही हैं महादेव। अब पिएं यह हलाहल। शिव बोले, हां महादेव तो मैं ही हूं। दूषण हलाहल उनके कंठ में पहुंच भूषण बन गया। नीलकंठ। वाह रे कला देव! गंगा के प्रचण्ड वेग को कौन धारण करें। यहां भी शिव आगे। कर लिया अपनी जटाओं में उसे धारण। कलंकी चन्द्रमा किसके पास जाए! शिव ने उसे भी अपने सर पर स्थान दिया।...तो दूषण सारे शिव के पास पहुंच भूषण हो गये। इसी से तो है शिव का सौन्दर्य। कला का अद्भुत रूप! शिव लिंग जहां है वहां शिव की मूर्ति कहां है! माने वह मूर्त भी है और अमूर्त भी। जिस भी भेष में, रूप मंे हम दर्शन करना चाहें, प्रकट हो वह दर्शन दे देंगे। प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्ण रूप! आशुतोष जो हैं इसलिये प्रसन्न तो होंगे ही। 
श्रावण मास को ही लें। इस मास में शिव से संबंधित किसी भी लीला का वर्णन शास्त्र-पुराणों में नहीं है पर शिव को यही मास प्रिय है। हिमाचल की पुत्री के रूप में जब सती फिर से जन्मी तो श्रावण मास में ही शिव की विधिवत् पूजा-अर्चना की। शिव प्रसन्न हो पुनः पति रूप में उन्हें प्राप्त हो गये। फिर क्या था। श्रावण शिव का प्रिय मास हो गया। श्रावण में ही होती है, शिव भक्तों द्वारा कांवड़ की कला यात्रा। शिव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन यात्रा। हरिद्वार के रास्ते भर में कंधे पर रंग-बिरंगे कांवड़ उठाकर पैदल जाते भक्त दिखेंगे। अकेले या समूह में। रंगीन कागजों से, मोम से, चमचमाते पोलिथिन से। मोर पंखों से कलात्मक सजे कांवड़। देखेंगे तो लगेगा रंग कोलाज हैं भांत भांत के कावड़। गंगाजल भरे ये पवित्र कांवड़ जमीन पर नहीं रखे जाते। कांवड़िये विश्राम करते हैं तो सड़क के किनारे पेड़ों की शाखाओं से बने तख्तों पर इन्हें रखा जाता है। 
बहरहाल, शिव का रूद्रावतार कला का पर्याय है। संगीत कला का पर्याय। कहते है। इसी अवतार में उन्होंने कभी नारद को संगीत कला का ज्ञान दिया था। नारद ने संगीत के पूर्ण ज्ञान के लिये भगवान शिव की तपस्या जो की थी। रूद्रप्रयाग जाएं। भगवान शिव के रूद्रावतार की मूर्ति के दर्शन होंगें। 
‘संगीत मकरंद’ में शिव की कला का गान है। शिव नृत्य करते हैं तो ब्रह्मा ताल देते हैं, विष्णु ढोल, सरस्वती वीणा, सूर्य-चन्द्र बांसूरी, अप्सराएं और गंधर्व तान देते हैं, नंदी और भृंगिरिडि मृद्दल बजाते हैं और नारद गाते हैं। महर्षि अरविन्द कहते हैं, दक्षिण में चिदम्बरम् स्थित मंदिर जाएं तो ध्यान दें। नटराज वहां पंचम प्राकार के अंदर है। यहां है उनका आकाश-स्वरूप। माने कहीं कोई अवकाश नहीं। यहां है संगीत के आद्य प्रवर्तक तुम्बुरू और देवकथा के गायक नारद। यह संगीत, व्याकरण और नृत्य की त्रिवेणीरूप साधनास्थली है। यह शिव ही हैं जो निर्गुण निराकार हैं तो माया की उपाधि से सगुण निराकार। उनका लिंगरूप निराकार और मूर्तिरूप साकार बोधक है। शिव। माने संपूर्णता। समग्रता। सत्यमं शिवं सुन्दरम्। 

Friday, June 29, 2012

स्वर और लय की रस सृष्टि


संगीत माने स्वर और लय की कला। रस की सृष्टि। सुनने के रस की सृष्टि। आंग्ल भाषा में संगीत के लिये ‘म्यूजिक’ शब्द प्रचलित है। ‘म्यूज’ से बना है म्यूजिक। ‘म्यूज’ दरअसल यूनानी शब्द है। शब्द कोश खंगालता हूं तो म्यूज का अर्थ ‘द इन्सपायरिंग गॉडेज ऑफ सॉंग’ पाता हूं। माने गान की प्रेरक देवी। म्यूज ज्यौस की कन्या है। ज्यौस माने स्वर्ग। यानी संगीत स्वर्ग की कन्या है। सोचता हूं, संगीत रस का पान जब कर रहे होते हैं तो मन में स्वर्गिक सुखानुभति ही तो होती है। संगीत के लिये अरबी और फारसी में मौसीकी शब्द है। सुनने में ही संगीत का आस्वाद नहंी होता! 
बहरहाल, हमारे यहां गान की प्रेरक देवी सरस्वती है। संगीत के आदिदेव शिव हैं। इसीलिये तो नटराज स्तुति में कहा है, ‘गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्मंडना, नित होत नाद प्रचंडना, नटराज राज नमो नमः। मााने यह संपूर्ण विश्व आपके मृदंग की ध्वनि से ही संचालित होता है। इस संसार में व्याप्त प्रत्येक ध्वनि के श्रोत आप ही हैं। हे नटराज आपको नमन है! 
संगीत की उत्पति वेदों से मानी गयी है। सामवेद तो संगीत से ही संबद्ध है। ऋग्वेद की ऋचाएं सामवेद का आधार है। वहां शब्द ऋग्वेद से लिये गये हैं और स्वर स्वयं का है। इस अर्थ में साम का अर्थ है ऋचाओ के आधार पर किया गया गान। 
ध्वनि, स्वर और ताल संगीत के ही अंग है। जो संगीतोपयोगी नाद है, वही ‘स्वर’ है। इसीलिये संगीतज्ञों ने एक स्वर से उसमें दुगनी ध्वनि तक के क्षेत्र में ऐसे संगीतोपयोगी कुल बाईस नाद बताये हैं। यही श्रुतियां हैं। ध्वनि की प्रारंभिक अवस्था यह श्रुतियां हैं और इनका गुंजन स्वर। स्व वह नाद है जो स्वयं मधुर हो। संगीत ग्रंथ ‘संगीत दर्पण’ में कहा गया है, ‘श्रुति के पश्चात उत्पन्न होने वाला स्निग्ध, अनुरणनात्मक, स्वयं रंजक नाद ‘स्वर’ है।’ ...और सात शुद्ध स्वरों का समूह जब बन जाता है तो वह सप्तक हो जाता है। नाद से श्रुति, श्रुति से स्वर, स्वर से सप्तक और सप्तक से थाट। थाट हैं-बिलावल, यमन, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, भैरवी, तोड़ी आदि। इन्हीें के अंतर्गत वर्गीकृत हैं तमाम हमारे संगीत के राग। राग माने स्वर और वर्ण से विभूषित चित्त का रंजन करने वाली मधुर ध्वनि। रागों का उनके अंगों के अनुसार विभाजन करने वाले पहले भारतीय संगीतज्ञ हैं पं. विष्णु नारायण भातखंडे। राग वर्णन के लियें उन्होंने ही हमें उठाव, चलन, पकड़, आरोह, अवरोह आदि का प्रयोग दिया। कहें, रागों का थाटों में विभाजन करते उसका विवरण दिया। ऐसा विवरण जिसमें ख्याल, धु्रपद, धमार, साधरा, तराना आदि रचनाएं निबद्ध होती है। कहें हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के वह पहले ऐसे गायक थे जिन्होंने राग में पकड़ अंग का निर्माण किया।  भारतीय संगीत की उन्नति और प्रचार का महत्ती कार्य भातखंडेजी ने ही अपने तई किया। लखनऊ में उन्होंने ही कभी ‘मैरिस म्यूजिक कॉलेज’ की स्थापना की। यही कॉलेज आज उनके नाम से ‘भातखंडे यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूजिक’ के नाम से विश्वभर में जाना जाता है। ग्वालियर का माधव संगीत विद्यालय और बड़ौदा का संगीत महाविद्यालय भी उन्हीं की देन है।
बहरहाल, हमेशा की तरह इस बार भी पिछले सप्ताह विश्व संगीत दिवस आया और परम्परा निभाते संगीत आयोजनों की धूम भी मची। इन आयोजनों में संगीत रस का आस्वाद करते ही पं. विष्णु नारायण भातखंडे बहुत याद आए। संगीत सुनते और गुनते भातखंडे जी के संगीत अवदान को ही याद कर रहा था। सोचता हूं, उन्होंने ही तो भारतीय संगीत को क्रमबद्ध किया, व्यवस्थित किया। वह नहीं होते तो संगीत की हमारी समृद्ध विरासत के बहुत से पहलुओं से क्या हम यूं रू-ब-रू हो पाते!

Monday, June 18, 2012

चले भी आओ ...



मेंहदी हसन साहब के गान में अजीब तरह की एक बैचेनी और एक अनकहे खालीपन को अनुभूत किया है। गान में बोल के टूकड़े करते उसे अपने तई निभाते वह बहुतेरी बार चमत्कारिक अहसास भी कराते रहे है। उनके इस अहसास में न जाने क्यों हर बार गजल के शब्दों के भीतर के ओज से अपनापा भी हुआ है। वह गाते तो गजल के शब्दों को अपने तई आवाज का जैसे लिबास पहनाते। याद करता ह तो उनकी गायी ‘रफ्ता-रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामां हो गये...’ गजल बहती हवा के सुरमय झोंको का अहसास कराती मन को अजीब सा सुकून देती है तो दूसरी तरफ ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो...’ सुनकर जो अहसास होता है उसे बंया ही नहीं किया जा सकता। 
अभी बहुत समय नहीं हुआ फरहत शहजाद की लिखी गजल उनके स्वर में सुनी थी, ‘भूल भी जाओ पागल लोगों/क्या-क्या खोया, क्या क्या पाया है।’ सुनते हुए उनके गान के मखमलीपन और पुरकशिश अंदाज मंे जैसे खो सा गया। यह अंदाज उनका अपना है। गान की यही उनकी वह मौलिकता है जिसने उनकी आवाज के असंख्य दिवाने बनाए। मीर तकी मीर ने कभी एक गजल लिखी थी, ‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है’। बी.आर. ईशारा निर्देशित ‘एक नजर’ फिल्म में मजरूह ने इस गजल की शुरूआती पंक्तियां लेते हुए गीत लिखा और उसे गाया लता मंगेशकर और रफी ने। मीर तकी मीर की असल गजल को मेंहदी हसन ने अपने अंदाज में गाया है। इसे सुनते हैं तो फिल्मी गीत को भूलने का मन करता है। मीर तकी मीर के एक-एक शब्द को जैसे मेंहदी हसन ने इस गजल में जिया है। मुझे लगता है, यह मेंहदी हसन ही हैं जो गजल के शब्दों के उस अनकहे पर भी जाते हैं जिसमें संगीत का अवकाश होता है। माने जहां शब्द नहीं पहुंचते वहां मेंहदी हसन की आवाज पहुंच जाती है। संगीत और काव्य का यही तो वह मेल है जिसमें कोई कलाकार अपने होने का यूं अहसास कराता है।
प्रायः सभी गायी उनकी गजलें मकबूले-आम है परन्तु फैज अहमद फैज की लिखी ‘...चले भी आओ कि, गुलशन का कारोबार चले...’ सुनते जैसे उन्हंे गुनने का मन करता है। वह अपने गाये में लिखे हुए के भावों या रस को अक्षुण रखते हैं। गजल गान के उनके आलाप में स्वरों के उतार-चढ़ाव का जादू उनके गाये से हमें जुदा नहीं होने देता। इसीलिये उनके बहुत नहीं परन्तु थोड़े बहुत गाये को जैसे भी सुना है वह जेहन में बार-बार औचक उस सुर निभाव के साथ कौंधता है।  शब्द की स्थूल लौकिकता स्वरों में वहां तिरोहित जो हो जाती है। मेंहदी हसन साहब 20 के थे तब बंटवारे के दौरान पाकिस्तान के हो गये। उस मुल्क की नाकद्री देखिए शंहशाहे गजल का मोल उसने पहचाना ही नहीं। शायद यही कारण था कि वह भारत के लिये सदा बैचेन रहे। मुझे नहीं पता इसमें कितना सच है परन्तु कहते हैं मेंहदी हसन के गान को कभी लता ने ईश्वर की आवाज बताया था। हां, इसमें कोई शक नहीं कि यह मेंहदी हसन ही थे जिन्होंने उस दौर में अपनी पहचान अपने तई बनायी जब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर जैसे गायकों को सुनने के लिये अवाम टूट पड़ती थी।
बहरहाल, मेंहदी हसन ने अपने पिता उस्ताद अजीम खान साह और चाचाइस्माईल खान साहब से गान की तालिम ली थी। जगतीत उन्हें सुनकर ही कभी पाकिस्तान जा पहंुचे थे, उनसे मिलने। जगतीत तो बाद में जहां से ही चले गये परन्तु यह नहीं पता था कि उनके बाद अब इतना जल्दी मेंहदी हसन भी इस जग को छोड़कर यूं चले जाएंगे!


लहर-लहर सौन्दर्य की सर्जना


महेश शर्मा शिरा अपने चित्रों में प्रकृति सौन्दर्य का स्मृति रूपान्तरण करते हैं। ऐसा करते वह कैनवस को जो ओप देते हैं, उसमें प्रकृति के बहुविध रूप है। मसलन वहां ओस की बूंदों, सागर की लहरों, दूधिया झरनें, नभ मंे उड़ते खग, बर्फ से ढके पर्वत, पहाड़, और हरियाली की चादर ओढे धरित्री का अनूठा स्मृति भव है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ, पहले मुम्बई के जहांगीर आर्ट गैलरी में उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित हुई थी।

कुछ समय पहले दिल्ली में आईफा गैलरी में भी उनके चित्र देखे थे। सहज स्फूर्त क्रियाषीलता के अंतर्गत आत्मिक भावों के उनके ऐसे रूपांकन में सादृष्य से स्वतः अपनापा होता है। इसलिये कि रंग आच्छादकता का उनका यह लोक सांगीतिक आस्वाद कराता हमें देखे हुए को गुनने का अवसर देता है। प्रकृति जैसी है, उसका यथार्थ अंकन करने की बजाय वह उसमें स्मृतियों की संवेदनाओं को परोटते हैं।  कैनवस पर उनके दृष्य कोलाज कोहरा छंटाती धूप की मानिंद हमारे समक्ष जैसे-जैसे प्रकट होते हैं, हम उनमें प्रकृति और जीवन के अपने अनुभवों की तलाष करने लगते हैं। घना जंगल, कोहरा ढका आकाष, पहाड़ों पर इतराती धूप और जीव जंतुओं के उनके कैनवस चितराम अदृष्य से दृष्य की एक प्रकार से यात्रा है। आरंभ में कैनवस पर रंगों की पारदर्षी लेयर भर नजर आती है। झीने प्रकाष में आवृत फिर धीरे-धीरे कहीं कोई चिड़िया, कहीं कोई पहाड़, कहीं कोई झरना दिखाई देने लगता है। वस्तुओं, प्राणियों में सादृष्य का विचार किए बगैर वह रंगों, रेखाओं में आकारों की ऐसे ही अनूठी सौन्दर्य निर्मिति करते हैं।

बहरहाल, महेष शर्मा षिरा खैरागढ़ स्थित देष के एक मात्र इन्दिरा कला और संगीत विष्वविद्यालय में कला संकाय के अधीष्ठाता हैं। खैरागढ़ जाना हुआ तो उनके चित्रों से गहरे से रू-ब-रू हुआ। मुझे लगा, भीतर की अपनी कला संवेदनाओं का कैनवस रूपान्तरण करते वह प्रकृति और जीवन की अपने तई खोज करते हैं। कभी पिकासो ने कला को ‘खोज की यात्रा’ ही तो कहा था। इस दीठ से मुझे लगता है, महेष शर्मा के चित्र प्रकृति और जीवन की कैनवस खोज है। परछाईनुमा आकृतियों में वह रंगों के पारदर्षीपन में स्मृतियों का अनूठा निरूपण करते है। समुद्र की लहरें, उनमें बसती-तैरती मछलियां, पहाड़, पेड़, फूल-पत्तियां और अनंत नभ में उड़ते खग। इन सबका उनका कैनवस एक प्रकार से गान है। प्रकृति निनादित उनके इस कैनवस गान में सफेद में पीला, नीला, हरा, लाल रंग जैसे हमसे बतियाता है। रंगो से दीप्त एक चित्र में फूल-पत्तियों से औचक पक्षी की आकृति झांकती है तो दूसरे चित्र में ओस की बूंदो के पार्ष्व में हरियाली के अक्ष उभरते हैं। ऐसे चित्र और भी हैं। मसलन कहीं गुफा से झांकता आधा चांद नीले-काले में अद्भुत सौन्दर्य से साक्षात् कराता है तो कहीं धूंए में लिपटी जंगली जीव-जन्तुओं की आकृतियां गत्यात्मक प्रवाह में तेजी से भागती औचक आंखों से ओझल हो जाती है। प्रकृति और जीवन के ऐसे ही जीवन्त दृष्यों में महेष शर्मा षिरा नैसर्गिक रूप का अनुकरण करते कहीं गाढ़े तो कहीं हल्के रंगों में अंगीकृत छाया लोक का सृजन करते हैं। माने उनके तमाम चित्र छाया-आच्छादित हैं। इनमें देखे गये दृष्य नहीं बल्कि उनका प्रभाव हैं। रंग आच्छादकता मे कैनवस पर सफेद को प्राथमिकता है परन्तु तमाम रंगों का अपना अलग अस्तित्व भी है। इस अस्तित्व में कभी नीला प्रमुख हो जाता है तो कभी लाल तो कभी हरा तो कभी पीला। दृष्य में परिणामकारक प्रभाव लिये भी हैं उनके चित्र।

मुझे लगता है, प्रकृति को अपने तई रंग कैनवस में बरतते वह लहर-लहर सौन्दर्य की सर्जना करते हैं। रगों की अनूठी सांगीतिक लय है। धूंध से उभरती आकृतियों में पक्षियों के कलरव को वहां सुना जा सकता है तो मछलियों के तैरने को अनुभूत भी किया जा सकता है।


Friday, June 8, 2012

सहज मन के सुरों में प्रकृति की धुन



सम और गीत से बना शब्द है संगीत। सम माने सहित और गीत का अर्थ है गान। कोयल की कूक सुनते हैं तो मन में मीठी सी कोई हूक जगती है न! झरनों का झर-झर, नदियों का कल-कल, बरसात की बूंदों की रिम-झिम यह सभी सुनें तो मन करे अंदर से इन्हें गुनें। प्रकृति की यह धुनें ही तो हैं संगीत का आदिम स्त्रोत। आपने महसूस किया होगा, मन पाखी भी तो प्रकृति में विचरते बहुतेरी बार औचक गाने लगता है। कईं बार प्रकृति की कोई धुन मन के भीतर इस कदर उतरती है कि बार-बार उसे सुनने को, गुनने को मन करता है। प्रकृति की धुन माने वह सच्चे हृदय से उपजी हो। जिसमें कोई बनावट नहीं हो। सहज जो सुनायी दे।
बहरहाल, कुछ दिन पहले पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा लिखी उनकी आत्मकथा ‘रस यात्रा’ का आस्वाद कर रहा था। इसमें वह लिखते हैं, ‘अच्छा संगीत श्रोताओं को भावों के उच्चासन पर पहुंचा देता है।’ सच ही तो है! यह संगीत ही है जिसमें मन सांसारिकता से दूर एक अलग दुनिया में चला जाता है। भौतिकता की उपस्थिति वहां नहीं रहती। हरिओम शरण को सुनते ऐसा ही लगता है। सांसारिकता में होते भी लगता है, मन उससे अलग अपने भीतर की तलाष में पहुंच गया है। भले वहां शास्त्रीयता की सौन्दर्य परिणति नहीं है परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं के गान की गहन अनुभूती है। कहें, सहज, सरल शब्दो में आप-हम सबका मन वहां जैसे गाता है। मन करता है, बार-बार उन्हें सुनें। शायद इसलिये कि उनके सुरों मंे प्रकृति की धुन है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। अपने को संप्रेषित करने का कहीं कोई आग्रह नही। वहां प्रभु अर्चना है। मन की वेदना है। व्यर्थ किये का सच्चा पश्चाताप है। और है एक साधक की साधना। मुझे लगता है, संगीत की प्रकृति को सही से समझना है तो उन्हें सुनना ही चाहिए। इसलिये कि उन्हें सुनते एकरसता से परे हर बार नव आनंद की प्राप्ति होती है। संस्कृत में कहा गया है, ‘स्थाने-स्थाने यत नवतम् उपैति/तदैव रूपम रमणीयताया।’ नवीनता का सौन्दर्य निकष। क्षण-क्षण की रूप रमणीयता। सुर, राग, बोल सभी वही परन्तु सुनने में सदा नये की अनुभूति।
बहरहाल, भजन संगीत की हमारी समृद्ध परम्परा को हरिओम शरण ने अकेले अपने बूते संपन्न किया। वह ऐसे हैं जिन्हें आज भी उसी चाव से सुना जाता है। सादगी के उनके गान पर मन न्योछावर होता है। सच्चे अर्थों की सुर अभ्यर्थना वहां जो है। यह लिख रहा हूं और उनका गाया जेहन में गहरे से बस रहा है, ‘निर्मल वाणी पाकर तुझसे, नाम न तेरा गाया। नैन मूंदकर हे परमेष्वर, कभी न तुझको ध्याया।’ शब्द भर नहीं, शब्दों के भीतर का गान है यहां। बहुत छोटा था तब। अलसुबह घर में दादी को हरजस गाते सुनता था। न जाने कहां से आए थे उनके हरजस के वे बोल। मैंने बहुत से लिखे हुए भी है परन्तु उनका स्त्रोत अभी भी नही जान पाया परन्तु उनमें सच्चे अर्थों की अभिव्यंजना को आज भी अनुभूत करता हूं। दादी को संगीत का ज्ञान कहां था! वह तो हरि स्मरण करती थी। ऐसा करते बोलों के निभाव में वह अपने को भी जैसे तब भूल जाती। उनकी उस तंद्रा को याद करते लगता है, संगीत के सच्चे सुरों में अपने को भूलना जरूरी होता है। हरिओम शरण का गान ऐसा ही है जिसमें उन्होंने जो भी गया अपने को भूलकर गाया। ‘दाता एक राम’, ‘प्रभु हम पे दया करना’, ‘तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार’, ‘उद्धार करो भगवान’ जैसे गाये उनके भजन सुनते मन नहीं भरता। प्रार्थना। अर्चना। याचना। करूणा। और मनुष्य होने का मामूलीपन। अबोध और निर्दोष भाव। कहें, सच्चे मन की सुराजंलि। जो गाया अंतर्मन से। उनका गाया सांस और संगीत का मेल है। यही तो है प्रकृति के सुर। विष्वास नहीं हो तो उन्हें सुनें। मन करेगा उन्हें गुनें। 

Friday, June 1, 2012

लोक नाट्यों में है तमाम हमारी कलाओं का मेल


लोक विश्वास, परम्परा, मनोरंजन और जीवन की उत्सवधर्मिता का सांगोपांग चितराम कहीं हैं तो वह लोकनाट्यों में है। सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक कथानकों का सीधी सरल भाषा में रोचक रूप में सहज संप्रेषण वहां जो है। लोकनाट्यों की समृद्ध संस्कृति देशभर में रही है। महाराष्ट्र में यह तमाशा है तो उत्तरप्रदेश में रास-लीला, नौटंकी, भाण। मध्यप्रदेश में यह मांच है तो बंगाल में जात्रा और गंभीरा। दक्षिण भारत में यक्षगान और विथि नाटकम लोकनाट्य के ही रूप हैं। राजस्थान में यह ख्याल, रम्मत, नौटंकी, स्वांग के रूप में हैं। नाट्य के सभी तत्व इनमें मिलेंगे परन्तु ताम-झाम नगण्य।  

बहरहाल, पिछले दिनों राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष अर्जुनदेव चारण के आमंत्रण पर मेड़तारोड़ में कुचामणी ख्याल यात्रा आयोजन संगोष्ठी में भाग लेते लोकनाट्यों की हमारी परम्परा को गहरे से जिया। लगा, यह लोक नाट्य ही हैं जिनमें तमाम हमारी कलाओं का मेल है। किसी एक कला में नहीं बल्कि तमाम कलाओं में लोक कलाकार निष्णात होते हैं। निष्णात न भी कहें तो अभ्यासी कह सकते हैं। लम्बे-लम्बे संवाद भी सहज सांगीतिक रूप में अदा करते वह कहन की अपनी शैली से चमत्कृत करते हैं। मुझे लगता है, कलाओं के अंन्र्तसंबंधों को व्यवहार में यदि जानना है तो लोकनाट्य हमारी मदद कर सकते हैं। मित्र शैलेन्द्र उपाध्याय के साथ हमने दूरदर्शन के लिये ब्रह्माणी मंदिर परिसर में कुचामणी ख्याल राजा हरिष्चन्द्र को षूट किया। बगैर पूर्वाभ्यास के कलाकार लोकनाट्य विधा को जैसे अपने में आत्मसात किये थे। संवादों की अनूठी लय अदायगी। चरित्र को अपने में समाहित करने की गजब जीवंतता। ख्याल में भूमिका निभाने वाले कलाकार संगीतज्ञ होते हैं। अभिनेता होते हैं। नर्तक होते हैं और गायक भी होते हैं। माने तमाम कलाओं का मेल कहीं है तो वह इन लोक नाट्यों में ही हैं। विडम्बना देखिए, बावजूद इस समृद्धता के आधुनिकता की आंधी बहुत से लोकनाट्यों को उड़ा भी ले गयी है। शायद इसका कारण यह भी है कि लोकनाट्यों में समय सरोकार समाप्त से होते चले गये है।

बहरहाल, कभी देवीलाल सामर ने कुचामणी ख्याल में आधुनिक समय के संदर्भ डालते फिर से उन्हें रचा। मसलन मीरा को अपने तई ‘म्हाने चाकर राखोजी’ से उन्होंने पुनर्नवा किया। धुनें वही रखी। नाचने गाने की शैली वही रखी। यहां तक कि नगाड़े, ढोलक की तालें भी वहीं रखी गयी परन्तु कुछेक प्रतिकात्मक रंगमंचीय सामग्री का प्रयोग अधुनातन परिवेश के हिसाब से किया गया। देशभर में ख्याल की उनकी यह प्रस्तुति खासा लोकप्रिय हुई। देवीलाल जी ने इसी तरह के प्रयोग ढोलामारू, मूमल-महेन्द्र के नाम से राजस्थान की चिड़ावा शैली में भी किये और उनमें उनको अपार सफलता भी मिली। ख्याल, नोटंकी, स्वांग, रम्मतों आदि लोकनाट्यों को समय के हिसाब से इसी तरह से पुनर्नवा करना होगा। माने पारम्परिक कथानक के स्थान पर नवीन कथानक लिया जा सकता है। समाज की नवीन समस्याएं ली जा सकती है। परिवेश नया हो सकता है परन्तु कला का मूल वही रखें। इस से होगी लोकनाट्यों की हमारी समृद्ध परम्परा का सही में संरक्षण। 

संगीत नाटक अकादमी और दूसरी संस्थाओं को यह भी चाहिए कि लोकनाट्यों से जुड़े पारम्परिक कलाकारों में से कुछेक को चिन्हित करें। लोकनाट्य गुरूओं के रूप में। राज्य स्तर पर लोकनाट्य प्रशिक्षण के लिये उन्हें बुलाया जा सकता है। आधुनिक समय संदर्भों से यदि लोकनाट्य होते है तो लोग उन्हें पसंद भी करेंगे क्यांेकि लोक नाट्य में पद्यांशों की बंदिशें परम्परागत स्वरबद्ध होती है। ये बंदिशे गायी अवश्य जाती है परन्तु वे कुछ इस तरह से बंधी हुई होती है कि सीधे संवादो की तरह असर करती है। पात्रो को अपनी कल्पना के हिसाब से गद्य में भी पद्य़ की मानिंद वहां बहुत करने की छूट होती है। इसी से होती है दर्शकों की भागीदारी। 

Friday, May 25, 2012

बचा रहे शास्त्रीय कलाओं का हमारा मूल


कल आनंदकुमार स्वामी को पढ़ रहा था। वह स्थापित करते हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं, नवीन होने में है।’ इस समय जब भारतीय शास्त्रीय कलाओ पर विचारता हूं तो उनका यह कहा गहरे से घर करता है। शास्त्रीय नृत्य, चित्रकला का मूल वही है, शास्त्रीय गायन,वादन में मूल राग वही है जो बरसों से हम सुनते आए हैं फिर भी इन शास्त्रीयकलाओं में कलाकार सदा प्रस्तुति में नवीन करता है। इस नवीन में ही रसानुभूति हैं। फिर से कुछ सुनने, फिर से कुछ गुनने की। परन्तु अपसंस्कृति के इस समय में शास्त्रीय कलाओं का यह मूल हमसे जैसे निरंतर दूर भी हो रहा है।
बहरहाल, भारतीय दर्षन में कलाओं को शुद्ध रूप से जीवन से अभिहित किया गया है। ऐसा जब है तो फिर क्या यह विचारणीय नहीं है कि हम अपनी शास्त्रीय कलाओ के नवीनता के उस मूल को कितना बचाए रख पा रहे हैं? मुझे लगता है, कुछेक लोकप्रिय कलाओं को छोड़ हम बहुतेरी हमारी सांस्कृतिक कलाओं से लगातार दूर और दूर हुए जा रहे हैं। कभी राजस्थान के मांगणियारों, लंगो का लोक संगीत धोरों की अनूठी रेत राग से मेल कराता कानों में शहद घोलता था, उसे नवीन बनाने के चक्कर में सूफी संगीत लोक संगीत बन गया है। इसी तरह शास्त्रीय संगीत के स्वर भी बहुत से स्तरों पर फ्यूजन में कनफ्यूज हो रहे हैं। शास्त्रीय नृत्यों को कोरियोग्राफी के नाम बिगाड़ शारीरिक लयकारी में तब्दील किया जा रहा है। चित्रकला में इन्स्टालेषन के नाम पर मनमानी हो ही रही है। सोचता हूं, ऐसा ही होता रहा तो आने वाली पीढ़ी में कलाओं का हमारा मूल क्या कुछ बचा भी रहेगा! 
कुछ समय पहले अषोक वाजपेयी के नेतृत्व में पं. बिरजू महाराज, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद जाकिर हुसैन, पं. राजन-साजन मिश्र, पं. षिवकुमार शर्मा, टी.एन. कृष्णन, सुधा रघुनाथन, यू.श्रीनिवासन आदि कलाकारो के एक दल ने मिलकर षास्त्रीय कलाओं के संरक्षण के लिये संसद भवन में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। इसके तहत शास्त्रीय कलाओं को प्रोत्साहित करने के लिये बड़े व्यावसायिक घरानों की एक प्रतिषत आय को आयकर मुक्त कर उसे सांस्कृतिक गतिविधियों मंे लगाने, अलग से सांस्कृतिक टेलीविजन चैनल स्थापित करने आदि की मांग की गयी थी। इन मांगों पर सरकार ने क्या किया है और क्या कुछ करने जा रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता परन्तु सोचने की बात यह भी है कि शास्त्रीय कलाओ के लिये खुद समाज क्या कर रहा है? स्पीक मैके, श्रुति मंडल और सरकारी संस्थाएं, अकादमियां अपने स्थायी आयोजनों में कलाओं का प्रदर्षन, प्रोत्साहन के उपक्रम करती भी हैं परन्तु शास्त्रीय कलाओं के आयोजन से ही क्या हम हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मूल रूप में सहेज पाएंगे? शास्त्रीय कलाओं के अपसंस्कृतिकरण, अरूपीकरण को क्या इससे रोका जा सकता है? इन पर गहरे से विचारने की जरूरत है। 
यह सही है कि शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक कलाओं के आयोजनों से इन कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है परन्तु इतना ही सच यह भी है कि इनसे नया कोई श्रोता वर्ग, दर्षक वर्ग खड़ा नहीं किया जा रहा। वही है जिनकी रूचि शास्त्रीय कलाओं में है। फिर से गौर करें, रसिकता नया बनाने से नहीं नये होने से ही पैदा की जा सकती है। इसका अर्थ है, आयोजनों के पार्ष्व में भी इस ‘नये होने’ पर विचार करना होगा। सोचता हूं, अभिनेता आमीर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ में वही कुछ कहा है, उसी पर ध्यान दिलाया है जिस पर अरसे से कहा, ध्यान दिलाया जाता रहा है परन्तु प्रस्तुति के और मंषा के उनके नयेपन से उनके शो ने अधिसंख्य लोगों का ध्यान खींचा है। शास्त्रीय कलाओं की प्रस्तुतियों के साथ कलाओं की सहज समझ, जानकारियां, रसिकता के लिये भी कुछ ऐसा ही नया करना होगा। 
उस्ताद अमीर खॉं, पं. भीमसेन जोषी, पं. जसराज ने वही राग गाए हैं जो उनसे पहले गायक गाते आए हैं, पं. बिरजू महाराज ने वह नृत्य किया जो पहले होता रहा परन्तु इन सबने अपने को मूल में साधा। पुनर्नवा किया। आनंद कुमार स्वामी इसीलिये फिर से याद आ रहे हैं, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं नवीन होने में है।’ शास्त्रीय कलाओं को बचाने, उनके संरक्षण के लिये यही मूल मंत्र हो सकता है। 

Friday, May 18, 2012

परकोटों से झांकता अतीत

उपयोगिता में सौन्दर्य की सृष्टि का प्रयास माने कला। किले, गढ़ और महल रहने के लिये, सुरक्षा के लिये बनाये गये परन्तु वहां कलात्मकता का भी कोई ओर-छोर नहीं है। हवेलियों को ही लें। जैसलमेर और बीकानेर की हवेलियां सौन्दर्य में अप्रतिम है। आवासीय उपयोगिता और कलात्मकता का अद्भुत मेल जो वहां है।
 ‘स्थपतेः कर्म स्थापत्यम्’ यानी स्थापन का कार्य स्थापत्य है। नगरों की बसावट में स्थापत्य और वास्तु कला का योग ही तो रहा है। पुराने लगभग सभी नगर कलात्मक परकोटों से घिरे मिलेंगे। अलंकारयुक्त परकोटों से। भले बेतहाषा बढ़ती आबादी में परकोटों को तोड नगर अपनी सीमाएं बढ़ा रहे है परन्तु नगरों के भीतर के परकोटे द्वार आज भी निर्माण की कला की जैसे गवाही देते हैं।  
परकोटों से घिरा जयपुर  विष्व का कभी सर्वाधिक सुनियाजित षहर रहा है। कनक वृन्दावन स्थित मंदिरों में जब भी जाता हूं, आमेर घाटी से दूर तक दिखाई देने वाला षहर का सुन्दर से परकोटे का अंष मन मोह लेता है। औचक, मन में यह अहसास भी होता है कि किसी नगर का रक्षा कवच ही नहीं बल्कि सुन्दर वस्त्राभूषण परकोटा ही तो रहा है।
बहरहाल, परकोटे अब अतीत बन रहे हैं। जनसंख्या बढ़ी तो शहर की सुरक्षा के यह पहरेदार गिरा भी दिए गए। कहीं अभी भी परकोटे हैं परन्तु शहर से बाहर नहीं शहर के अंदर। यानी पुराना शहर। नया वह जो इस परकोटे से बाहर बसा है। जैसलमेर का सोनार किला विष्व में शायद पहला ऐसा दुर्ग है जहां आज भी किले में आबादी रहती है। घेरदार घाघरे की मानिंद परकोटे से घिरा विषाल दुर्ग और अंदर आबादी। बाहर से देखें तो किले के कलात्मक परकोटे से आभाष ही नहीं होता कि अंदर पूरी की पूरी एक सभ्यता वास कर रही होगी.. परन्तु सच यही है। 
परकोटों को ओढ़े षहरों में मेरा अपना षहर बीकानेर भी है। परकोटे के द्वारों से गुजरता हूं। कितने द्वार परकोटे के रहे हैं, शायद बता ही नहीं सकूं परन्तु कोटगेट के तीन द्वार, जस्सूसर गेट के तीन द्वार और नत्थूसर गेट और भी न जाने कितने द्वार अपने परकोटे सौन्दर्य से अभिभूत करते हैं। अब तो खैर सभी स्थानों पर आबादी भी इतनी हो चुकी है कि परकोटो वाले षहर और परकोटे के बाहर वाले शहर का भेद ही नहीं रहा। कभी पुराना और नया षहर कहकर जो अंतर परकोटे और परकोटे विहिन षहर का किया जाता था वह भी खत्म हो चुका है। हां, जोधपुर में परकोटे के भीतर एक षहर है और बाहर दूसरा। जालौरी गेट, सोजती गेट जैसे कितने ही गेट परकोटे से घिरे षहर में अभी भी प्रवेष कराते हैं।
भारत के साथ विष्व के दूसरे देष भी परकोटे की कला संजोए हैं। पुर्तगाल का ओबिडोस कस्बा पहाड़ी पर बसा है। परकोटे से घिरा। दूर से देखें तो किले का सा अहसास कराता। ऐसा ही इजरायल की राजधानी के साथ भी है। पवित्र नगरी जेरूषलम परकोटे से घिरा बेहद खूबसूरत ष्षहर है। हां, वहां भी परकोटे से बाहर बसावट हो चुकी है परन्तु परकोटे के भीतर अभी भी पुराना ष्षहर इतिहास की अपनी विरासत को संजोए है। यूनाईटेड किंगडम की यार्क सिटी भी परकोटे से घिरी है। यह षहर बारहवीं से चौदहवीं वीं सदी में चारों तरफ बनी लम्बी दीवार से घिरा है। चीन के झियान षहर के परकोटे का तो कहना ही क्या! परकोटे की दीवारें इतनी चौड़ी है कि आराम से वहां वाहन चल सकते हैं। ग्यारहवीं ष्षताब्दी के आस-पास बना पष्चिमी स्पेन का एविला षहर भी परकोटों की शान लिए है। इस षहर की प्राचीर में नौ द्वार बने हुए हैं और 88 टॉवर है। भूमध्य के पर्यटन स्थलों मे से एक क्रोएषिया का एतिहासिक नगर डबरोवनिक परकोटे के सौन्दर्य का अप्रतिम उदाहरण है। एड्र्यिाटिक सागर तट पर बने इस षहर को इसीलिये ‘एडियाटिक का मोती’ कहा जाता है।
जो हो, इस बात से इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि हमारी जो प्राचीन सभ्यताएं रही हैं, उनमें सुरक्षा उपयोगिता में भी कला का अद्भुत मेल किय गया था। कला की यही तो सौन्दर्य सृष्टि है। इसीलिये तो हमारे यहां कला को जीवन से जुड़ा बताया गया है। 


Saturday, May 5, 2012

सिनेमा में झांकता कला संसार


दृष्य से अदृष्य की सत्ता बड़ी होती है। दृष्य में यथार्थ की दीठ भर होती है परन्तु अदृष्य स्मृतियों, अनुभूतियों का अनंत आकाष जो लिये होता है। इसीलिये शायद कभी अज्ञेय ने कहा भी, ‘स्मृति ही वह गतिषील सर्जनात्मक तत्व है, जो काल, इतिहास, साहित्य और हां, भाषा के नये परिदृष्य रचती चलती है।’ यह स्मृतियां ही हैं जो सर्जना में काल के गाल विगत-वर्तमान का अंतर पाटती है। विनय शर्मा के चित्रों पर जब भी विचार करता हूं, कैनवस पर मूल कैलिग्राफी में झांकती स्मृतियां रोमांचित करती है। उनका कैनवस अतीत से जुड़ी चीजों का वस्तुगत यथार्थ नहीं होकर स्मृतियों के निजी संवेदन संज्ञान के रूप में हमारे समक्ष उद्घाटित होता है। मूल कैलिग्राफी में तड़कते कागजों की पुरानी बहियां, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, जन्मपत्रियों आदि के साथ ही इस्तेमाल कुछ वैसे ही रंगो में भीतर के संवेदन को रूपायित करने की उनकी क्षमता अद्भुत है।
बहरहाल, हाल ही उनके कला के इस आयाम पर ख्यात फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज और रोहित सूरी ने लघु फिल्म ‘रिम्बेर्म्स ऑफ थिंग्स पास्ट: द वर्ल्ड ऑफ विनय शर्मा’ बनायी है। इसका आस्वाद करते चित्रकला, संगीत और सिनेमा के रिष्तों को गहरे से जिया जा सकता है। पंडित विद्याधर व्यास के स्वरों में राग बागेश्री के गान में संजोयी इस फिल्म की शुरूआत सांगानेर स्थित कागज के कारखाने से होती है। लुगदी से कागज बन रहा है। इस बन रहे कागज में चित्र सर्जन की तमाम संभावनाएं तलाषते स्वयं विनय कागज को अपने तई आकार देते मूल कैलिग्राफी में अतीत से जुड़ी वस्तुओं को सहेज रहे हैं। दृष्य बदलता है। विनय का जन्म स्थल लालसोट दिखाई देता है। कस्बाई गली, पुराना घर और उसके अंदर रखा बड़ा सा संदूक। पितामह आत्मानंद सरस्वती के बड़े से संदूक से पुराने ग्रंथ, पोस्टकार्ड, स्टाम्प पेपर, पुराने कागजाद निकालते विनय अपनी कला यात्रा की जैसे यहां गवाही दे रहे हैं। सर्जन की तलाष आगे बढ़ती है। रेखाओं के रंग आच्छादित कैनवस में संवाद करती स्मृतियां से अनायास अपनापा होने लगता है। गाढे रंगों में मूल कैलिग्राफी के अंतर्गत प्रकृति के चितराम हैं तो जीवनगत सरोकार भी हैं। फिल्म के एक दृष्य में विनय स्टूडियों में काम कर रहे हैं। कला मगन मुद्रा का रोहित सूरी का लॉन्ग शॉट और उसकी बारीकी मन को छूती है।  दृष्य और भी हैं जिनमें कैनवस अलंकरण करते कलाकार की भाव मुद्राएं हैं तो हाल का विनय का वह संस्थापन भी है जिसमें पुरानी लालटेन, कलम दवात और दूसरी अतीत की चीजें उनके कला संवेदन को गहरे से हमारे समक्ष रखता है। पूरी फिल्म में कहीं कोई संवाद नहीं है, दृष्य ही देखने वाले से जैसे संवाद करते हैं। 
विनय देष के संभवतः ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अतीत से जुड़ी चीजों को मूल कैलिग्राफी में सर्जन का हिस्सा बनाते स्मृतियॉं के अंकन का सर्वथा नया कला भव निर्मित किया है। वह अतीत से जुड़ी किसी एक वस्तु को उसकी पूर्णता में नही बल्कि उसके किसी आयाम को निकालकर भीतर के अपने भावों के अनुसार उसका रूपाकार गढ़ते हैं। ऐसा करते अंतर्मन संवेदना के संप्रेष्य के तमाम आयामों का भरपूर इस्तेमाल उनकी सर्जना में होता है। कहें, लघु फिल्म उनके सर्जन के इस आयाम को गहरे से उद्घाटित करती है।
सिनेमा और चित्रकर्म का आरंभ से ही गहरा रिष्ता रहा है। कभी गोपी गजवानी ने ‘द टाईम’ और ‘द एंड’ शीर्षक से कला फिल्में बनायी थी। हुसैन और विवान सुन्दरम निर्मित कला फिल्में कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहती हैं। इनमंें कहीं कोई कथा नही थी परन्तु विषय का जो ट्रिटमेंट है, उसे गहरे से जिया गया है। कला और कलाकार पर फिल्म निर्मिती में दृष्य के साथ कलाकार की संवेदना के तमाम आयामों को बहुत कम समय में छूना ही तो होता है। इस दृष्टि से विनय के कला संसार पर निर्मित यह फिल्म कलाकार की भीतर की संवेदना से देखने की हमारी संवेदना को गहरे से जोड़ती है। उनकी कला से साक्षात्कार कराती है।


Monday, April 30, 2012

अंतर्मन संवेदना जगाते चित्र



कला का यह वह दौर है जिसमें कैनवस पर प्रयोगधर्मिता  का ताना-बाना बुनने की होड़ मची है तो संस्थापन में अचम्भित करने की। मानव मन संवेदना के साथ कला की सहज सौन्दर्य सृष्टि इसी से बहुतेरे स्तरों पर तिरोहित भी हो रही है। माने संवेदना से स्वतः होने वाली अभिव्यक्ति की बजाय कला प्रयासों की यांत्रिकता में गुम हो रही है। सब ओर इसी एकरसता को जैसे जिया जा रहा है। 
बहरहाल, पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में युवा कलाकार मालचन्द पारीक के चित्रों से रू-ब-रू होते सुखद लगा। बंधी-बंधायी चित्र परम्परा की बजाय वहां अंतर्मन संवेदना को सर्वथा नये ढंग से उजागर जो किया गया था। प्रयोगधर्मिता परन्तु खाली प्रयोग के लिये ही नहीं। विषय-वस्तु की संवेदना भी वहां थी। मिश्रित माध्यम के पारीक के चित्रकर्म में भीतर की उसकी संवेदना का उजास तो है ही अभिव्यक्ति व विषुद्ध सौन्दर्य की खोज के बीच का द्वन्द भी दिखाई दिया। इसी से रूपायित ‘क्रांकीट जंगल’ की उसकी चित्र श्रृंखला देखने के बाद भी जेहन में बसती है।
बढ़ती आबादी के साथ कटते जंगल और उस पर इमारतों का खड़ा होता क्रांकीट संसार इन चित्रों के केन्द्र में है। खास बात यह है कि मालचन्द ने आत्मिक अनुभूति में जीवन के बदलते ढर्रे और तेजी से आ रहे बदलाव को सर्जन में गहरे से सहेजा है। शहरों की मॉल और फ्लेट संस्कृति पर एक प्रकार से अपनी कला से प्रष्न भी खड़े किये है। प्रष्न यह कि किस किमत पर हम इस संस्कृति के रहनुमा बन रहे हैं? प्रष्न यह कि सुकून का हमारा मापदंड क्या आधुनिक सुख सुविधाएं ही हैं? प्रष्न यह कि जंगल साफ कर अदेखे आकाष में हम कौनसे सपने चुन रहे हैं? तमाम उसके चित्रों का आस्वाद करते ऐसे ही सवाल और जेहन में कौंधते हैं। मुझे लगता है, चित्र सर्जन की यही वह मुखरता होनी चाहिए जिसमें दृष्य हमसे संवाद करे, भीतर की हमारी संवेदना को जगाए।
मालचन्द के चित्राकाष में खूबसूरत इमारतों में एक के ऊपर दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी और भी बहुत सी और खड़ी मंजिलों में गुम होते आकाष में वस्तुनिरपेक्ष रूप में विचारों का अनूठा प्रवाह है। इस प्रवाह में भौतिकता की दौड़ में तेजी से आ रहे मूल्यों के बदलाव को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। बाह्य रूप के सादृष्य में प्रतीकात्मक रूप मंे सौन्दर्य की अनूठी सृष्टि यहां है तो प्रकृति के गुम होते मूल्यों का रूदन भी है। ‘क्रांकीट जंगल’ श्रृंखला का रंग लोक भी अनूठा है। गहरे, हल्के और धूसरित के रंग बिम्ब। जल रंग, तेलीय, एक्रेलिंग का मिश्र प्रयोग। ज्यामीतिय संरचना में विषय-वस्तु के सूक्ष्म चितराम के अंतर्गत अंतर्मन संवेदना को इनमें गहरे से जिया जो गया है।
बहरहाल, मालचन्द के इन चित्रों को देखते हुए जेहन में वस्तु चित्रकार शार्द की याद आती है तो पौल सेजान के बनाए चित्र भीं औचक कोंधने लगते हैं। इसलिये कि दृष्य प्रभाव के साथ ही रूप तत्व को भी उसके चित्रों में तीव्रता से अनुभूत किया जा सकता है। मसलन बहुमंजिला एक इमारत के चित्र में मरे हुए शेर की खाल केन्द्र में है, पार्ष्व में जंगली जीवों के सफाया किये जाने के तमाम औजार आधुनिकता की चकाचौंध से झांकते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे ही फिष एक्वेरियम, गोल्डन मेमरी, एडजस्टेबल हैप्पीनेस, चेंज द हाउस, इट्स एनफ आदि चित्रों में जंगल काट बनायी इमारतों, बिजली के बेतरतीब झुलते तारों, होर्डिंग्स के बहाने जीवन के उस सच को मुखरित किया गया है जिसमें प्रकृति से दूर जीवन में यांत्रिकता का अनायास वरण हो रहा है।  
इन चित्रों को देखते कहीं पढ़ा औचक याद आ रहा है, ‘कला वास्तव के नैसर्गिक दृष्य रूप व काल्पनिक प्रतिकात्मक रूप के बीच घड़ी के  लंगर के समान झूलती रहती है।’ 


Sunday, April 22, 2012

आलागीला और पक्षी चित्रण की नयी दीठ


आरायस , आलागीला, मोराकसी। आप सोच रहे होंगे ये शब्द मैं कहां से ले आया। हिन्दी में फ्रेस्को पेंटिंग के लिये यही शब्द प्रयुक्त होते हैं। भित्ति चित्रण पद्धति की इस परम्परा पर जब भी विचार करता हूं, देवकी नंदन शर्मा याद आते हैं। कहूं, यह शर्मा ही थे जिन्होंने फ्रेस्को का भारतीय दीठ से एक प्रकार से पुनराविष्कार किया। फ्रेस्को ही क्यों बातिक, पेपरमेषी और तमाम दूसरी परम्परागत कलाओं को जीवित करने, उनमे युगानुकूल  परिवर्ततन के साथ प्रयोगधर्मिता के जो तान-बाने उन्होंने बुने, उन्हीं से तो यह सब कलाएं फिर से सामयिक हुई।
बहरहाल, सात साल पहले इसी अप्रैल माह की 24 तारीख को वह चिरमौन हुए। कुछ दिन पहले जवाहर कला केन्द्र में ख्यात कलाकार नाथूलाल वर्मा के निर्देषन में फ्रेस्को पेंटिंग का षिविर आयोजित हुआ तो देवकी नंदनजी की यादें जेहन में कौंधने लगी थी। ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और उनकी परम्परा में बढ़त करने वाले कलाकार भवानीषंकर शर्मा से संवाद हुआ। मैंने सुझाव दिया कि देवकी नंदन शर्मा के कला आयामों पर अकादमी क्यों नहीं एक व्याख्यान माला ही आयोजित करे। आखिर जड़ों सींच कर ही तो कला का पेड़ हरा हो सकता है!
बहरहाल, देवकी नंदन शर्मा ने वह किया जो कोई ओर नहीं कर सका। अजन्ता के भित्ति चित्रों के साक्षात् में उनके मिटते अस्तित्व ने उन्हें जैसे उद्धेलित किया। उन्होंने जैसे तभी यह तय कर लिया कि भित्ति चित्रों की अतीत की विरासत को वह सहेजेंगे। यह वर्ष 1949 की बात है। वनस्थली के कच्चे भवनों का पक्के में उनके प्रयासों से ही रूपान्तरण हुआ। इनमें अजन्ता चित्रों की अनुकृतियां के साथ ही भित्ति चित्रण के सर्वथा नवीन प्रयोग हुए। शैलेन्द्रनाथ डे, बिनोद बिहारी मुखर्जी सरीखे कला आचार्यों को वनस्थली बुला भित्ति चित्रण की परम्परा का उनके हथूके पुनराविष्कार हुआ। 
वनस्थली में पचास के दषक से ही देवकी नंदन शर्मा ने फ्रेस्को के विधिवत् प्रषिक्षण षिविर भी आयोजित करवाने प्रारंभ किये। कला षिक्षण को इससे नये आयाम मिले। यही नहीं बातिक, पेपरमेषी जैसी पारम्परिक कलाओं की समृद्ध परम्परा में युगानुकूल परिवर्तन करते उन्होंने लुप्त होती इन कलाओं को एक प्रकार से जीवनदान दिया। जयपुर रेलवे स्टेषन पर फ्रेस्को तकनीक से बनायी उनकी ढोला-मारू कलाकृति बरसों तक यात्रियों को लुभाती रही। वनस्थली कला मंदिर की दीवारों पर राजा पुलकेषी दरबार, बोधिसत्व, पदमपाणी और अन्य जातक कथाओं पर बनाये उनके आरायष अपनी मौलिकता में भित्ति चित्रों की हमारी समृद्ध परम्परा के ही संवाहक हैं।
फ्रेस्को को जीवित करने के साथ ही पक्षी चित्रण का भी देवकी नंदनजी ने सर्वथा नया मुहावरा हमें दिया। उनके उकेरे कबूतर, मोर, भांत-भांत की चिड़ियाओं, कोव्वों को देखते दीठ संवेदना के सर्वथा नये बिम्बों से साक्षात्कार होता है। ऐसा है तभी तो कभी ब्रिटिष इन्फॉर्मेषन सर्विस ने उन्हें विष्व के 18 सर्वश्रेष्ठ पक्षी चित्रकारों की सूची में शुमार किया था। 
प्रकृति, लोक एवं पौराणिक आख्यानों को देवकी नंदन शर्मा ने अपने चित्रों में सर्वथा नयी दीठ दी। फ्रेस्को तकनीक को नयी पहचान दी। कला के विभिन्न माध्यमों में काम करते उनके चित्रों को जब भी देखता हूं, प्रकाष और छाया प्रभाव का भी लयात्मक नाद वहां पाता हूं। परम्परागत चित्रों में प्रयोगधर्मिता करते के साथ उन्हें सामयिक करने का महत्ती कार्य ही देवकी नंदन शर्मा ने नहीं किया बल्कि दैनिन्दिनी जीवन के अनुभवों को चित्रों में परोटते जीवन दर्षन की लय को बेहद षिद्दत से उन्होंने अपने चित्रों में पकड़ा है। मुझे लगता है, यह देवकी नंदन शर्मा ही हैं जिन्होंने पेड़ो ंपर चहचहाती चिड़िया, कबूतर, कौव्वे, मोर आदि की अपने तई वैयक्तिक पुनर्व्याख्या की है। मानवीय अनुभव अपने आस-पास के परिवेष को सिर्फ आंख से देखना भर ही तो नहीं है वह महसूस करना भी है जो आंख की पूतली की परिधि से परे भी दिखाई देता है। देवकी नंदन शर्मा का चित्रलोकयही तो महसूस कराता है। 


Friday, April 13, 2012

शताब्दी बिहार महोत्सव में मिट्टी की सौंधी महक


मानव सभ्यता की सहचरी कालजयी हैं तमाम हमारी कलाएं। माने काल पर उनका कोई वष नहीं है। युग की पीड़ा, हर्ष, प्रथा-गाथा, धर्म-संस्कार के तमाम स्वर एक साथ वहां है। लोक का आलोक लिये। नृत्य, संगीत, चित्रकला, नाट्य आदि में कलाओं की सौरम को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।
हरहाल, जवाहर कला केन्द्र के मुक्ताकाष, रंगायन सभागार और कलादीर्घाओं में पिछले दिनों शताब्दी बिहार महोत्सव में कलाओं की इसी सौंधी महक में मन जैसे रम गया था। बिहारमय राजस्थान की मेरे लिये यह अलग दीठ थी। ऐसी जिसमें लोक नृत्य, नाट्य, गीत, संगीत, चित्रकला प्रदर्षनी के जरिये संस्कृति के अनूठे चितराम आंखे देख रही थी। लगा, यह कलाएं ही हैं जिनमें जीवन की उदात्ता है। आत्मीयता का अपनापा है। जीवन का रस है। संस्कृति की जीवंतता है। रंजना सरकार और अपूर्वा सृष्टि के कथक, नलिनी मिश्रा के कुचीपुड़ी, शारदा सिन्हा के लोकगीत माधुर्य के साथ ही लोक नाट्य फूल नौटंकी विलास देखे। हर प्रस्तुति में कला समृद्ध बिहार ही जैसे आंखों के समक्ष जीवंत हो रहा था।
षिल्पग्राम के खुले मंच पर देष की ख्यात लोकगायिका शारदा सिन्हा ‘अमवा महुअवा के झूमे डलिया, तनी ताक न बलमवा...’ गा रही थी। लगा, यह लोकमानस ही है जिसमें स्वतंत्रता और उन्मुक्ति की ऐसी उर्वरता है। सहजता का गान है। इस गान में मिट्टी की सौंधी महक है। फालतू के आदर्ष नहीं है और न ही शास्त्र बंधे नियम वहां है। ओढ़ी हुई दानषमंदी की बजाय वहां प्रकृति उपजे भावों का सहज स्पन्दन है। शारदा सिन्हा के स्वरों में लोक की अद्भुत मिठास है। स्वरों में खोते अनुभूत होता है जैसे बिहार का लोकजीवन आंखों के समक्ष साकार हो रहा है। दूसरे दिन मनोरंजन ओझा ने अपनी लोकगायकी में भी कुछ ऐसे ही रंग बिखेरे।
रंगायन सभागार में अपूर्वा सृष्टि का कथक भी उर में आनंद के भाव देने वाला था। उसके नृत्य से रू-ब-रू होते लगा सीखे हुए में वह अपने तई बढ़त करती है। नई नई परनों और नये नये टूकड़ों का अद्भुत रचाव वहां है। ताल को गहरे से जीते उसके घुंघरूओं की खनक और ‘ता थेई थेई...तत’ में चमत्कारिक पद संचालन। षिव स्तुति में नृत्य की उसकी मोहक छटा में ही मन जैसे रच-बस गया। अंग-प्रत्यंग उपांगों से अपूर्वा सृष्टि भावों की प्रस्तुति में नृत्य रस की समग्रता का आस्वाद करा रही थी। इससे ठीक पहले सभागार में कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के उत्तराधिकारी राजकुमार सिद्धार्थ की पत्नी ‘गोपा’ पर केन्द्रित नृत्य नाटिका में यषोधरा की अंतर्मन व्यथा, त्याग को कलाकारों ने अपने अभिनय से जीवंत किया। ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ के संगीत स्वरो के साथ ही पारिजात कलादीर्घा में मधुबनी, भागलपुर षिल्प और बिहार की दूसरी पारंपरिक चित्रकलाओं की समृद्ध परम्परा का आस्वाद भी अनूठा है।
बहरहाल, बिहार शताब्दी समारोह अनूठा आयोजन था। बिहार के कला संस्कृति विभाग के प्रमुख शासन सचिव अंजनी कुमार सिंह और राजस्थान के पुलिस आयुक्त बी.एल. सोनी शताब्दी समारोह की समापन सांझ में षिल्पग्राम के खुले मंच पर कलाकारों की प्रस्तुतियों से भाव विभोर थे। राजस्थान और बिहार की संस्कृति समानताओं पर उन्हें बतियाते देख लगा, कलाएं काल निरपेक्ष ही नहीं स्थान निरपेक्ष भी होती है। भीतर के आनंद का ओज जो वहां है! विष्व के पहले बड़े लोकतंत्र, भगवान बुद्ध और जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर की जन्मस्थली है बिहार। कहीं पढ़ी किवदंती याद हो आयी। रेगिस्तानी इलाकों से कभी बिहार पहुंचे ऊंट सवार वहां की हरियाली देख खुषी से चिल्ला उठे ‘बहार है बहार!’ कहते हैं यही बहार बाद में बिहार हो गया। यह कितना सच है, कह नहीं सकता परन्तु शताब्दी समारोह में बिहार की बहार अभी भी मन अनुभूत कर रहा है।