Friday, February 22, 2013

रसमय नृत्य की सार्वभौम कला


                       
बैले फ्रांसीसी शब्द है। अर्थ है नृत्य करना। रंगमंचीय परम्परा से भी पहले संभवतः पन्द्रहवीं सदी में फ्रांस, इंगलैण्ड और रूस में समारोह नृत्य शैली के रूप में यह प्रचलन मंे आया। तब बड़े कक्षों में रंगमंचीय परम्परा में यह प्रदर्षित होता। संगीत की सुमधुर ध्वनियों के साथ अद्भुत लोच में लहराते बैले में समय के साथ इधर निरंतर विकास हुआ है। दूसरे बहुत से नृत्यों की शैलियों की आधारभूत तकनीकें इसमें निरंतर सम्मिलित जो होती रही है। 
बहरहाल, जयपुर में श्रुति मंडल नृत्य सम्राट उदयशंकर के नाम पर बैले समारोह अर्से से करता आ रहा है। बैले के साथ उदयषंकर का नाम इसलिए लिया जाता है कि इसमें भारतीयता के रंग उन्हांेने ही भरे। योरोप में पहले पहल वह जब बैले से रू-ब-रू हुए तो उसकी प्रदर्षन भूमिका से वह बेहद प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय, लोक एवं जनजातीय कथाओं, मिथकों को इस नृत्य में जोड़ कला की सर्वथा नवीनतम स्वरूप की कल्पना की। योरोप में तब नृत्य की उनकी इस शैली को ‘हाई डांस’ कहा गया। बकौल उदयषंकर यह ‘रचनात्मक नृत्य’ था। ऐसा जिसमें भारतीय शास्त्रीय, लोक और जनजातीय नृत्य शैलियों के आधारभूत तत्वों को पष्चिम की बैले नृत्य तकनीक से जोड़ा गया था। रूस की प्रख्यात बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा से वह जब मिले तो नृत्य की उनकी कला में क्रांतिकारी बदलाव आयसा। अन्ना तब भारतीय कलाओं के अध्ययन में रत थी। उदयषंकर ने उनके इस अध्ययन में मदद की और उनके साथ ही बाद में लंदन के सुप्रसिद्ध आॅपेरा हाउस में हिन्दु पौराणिक, धार्मिक आख्यानों की युगल प्रस्तुतियां भी की। अंजता, राजपूत, मुगल चित्र शैलियों और पौराणिक आख्यानों  को उन्होंने अपनी इन नृत्य प्र्रस्तुतियों में गहरे से जिया। बैले के साथ वह भारतीय नृत्यों की बारीकी में गए और इसी से नृत्य सम्राट भी कहाए।
अभी बहुत समय नहीं हुआ, वाराणसी जाना हुआ तो एलिस बोनर की कला दृष्टि में उदयषंकर की नृत्य कला से फिर से साक्षात् हुआ। भारत कला भवन में एक कलादीर्घा एलिस के नाम की ही है। इसमें एलिस के उदयषंकर के नृत्य से जुड़ाव और उनकी नृत्य भंगिमाओं के महत्वपूर्ण रेखांकन हैं। एलिस ने ज्यूरिख में वर्ष 1926 मंे उदय शंकर का नृत्य देखा था। बस फिर क्या था! स्विट्जरलैण्ड की यह मूर्तिकार अपनी मूर्तिकला छोड़ उनके नृत्य मंे ही जैसे रच-बस गई। वह लिखती है, ‘मैंने शंकर रचित नृत्य शैली को देखा।  लगा जैसे मन्दिरों की दीवारों पर लगी मूर्तियां सजीव हो उठी हो।’ सच! उदयषंकर का नृत्य ऐसा ही रहा है। पत्नी अमला शंकर के साथ बाद में 1948 में उन्होंने ‘कल्पना’ फिल्म भी निर्मित की। 
उदयषंकर मूलतः राजस्थान के थे। उदयपुर वह जन्मे पर योरोप में ही पले-बढे। उन्हीं की स्मृति में पिछले 18 सालों से श्रुतिमंडल ‘उदयषंकर बैले एवं नृत्य समारोह’ आयोजित करता आ रहा है। आरंभ से ही इससे जुड़े रहे संस्कृतिकर्मी ईष्वरदत्त माथुर बताते हैं, ‘कौषल भार्गव ने इस समारोह की शुरूआत की थी। उदयषंकर के चचेरे भाई सचिन शंकर, पुत्र आनंद शंकर और पुत्री ममता शंकर ने भी यहां प्रस्तुतियां दी।’ अतीत के गलियारों में ले जाते वह श्रीलंका के परफा केईबुल लाम की बैले नृत्य प्रस्तुति को भी याद करते हैं। और यह बताना भी नहीं भुलते कि पहले केवल यह बैले समारोह ही हुआ करता था परन्तु बाद में भारतीय और दूसरी स्थानीय नृत्य प्रस्तुतियों का समावेष भी इसमें होता चला गया और यह ‘उदषंकर बैले एवं नृत्य समारोह’ से जाना जाने लगा। 
बहरहाल, भारतीय नृत्यों के साथ तमाम अन्य भारतीय कलाओं की बहुरंगी छटाओं से उदषंकर ने ही पष्चिम को बैले के जरिए साक्षात् कराया। उनकी याद संजोते श्रुतिमंडल की यह पहल सच में सराहनीय है। रसमय आंगिक क्रिया की सार्वभौम कला ही तो है नृत्य। ऐसे ही करती रहे यह कला बढ़त। आमीन!

Friday, February 15, 2013

मोहे अपने ही रंग में रंग दे


सुगम संगीत माने जिसमें कहीं कोई बंधन नहीं हो। निर्बन्ध। कंठ से सहज निकले सरल स्वर। कहें, लोकप्रिय संगीत। लोकगीत, गजल, भजन सब सुगम संगीत ही तो है। सुनेंगे तो मन करेगा इन्हंे गुनें। लोक जीवन मंे प्रवाहित होकर ही तो आखिर कलाएं शास्त्रबद्ध होती है।
बहरहाल, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् द्वारा जवाहर कला केन्द्र में कुछ दिन पहले की एक सांझ सुगम संगीत को समर्पित थी। गायिका थी संगीता आर्य। उनकी सुमधुर गायकी में अभी भी मन जैसे बसा हुआ ही है। सुना उन्हें पहले भी है परन्तु इस बार जब सुना तो लगा, उनके स्वर माधुर्य में गजब की बढ़त है। बढ़त माने विस्तार। गजल, भजन और लोकगीतों के गान में स्वर भंगिमाओं की वहां अद्भुत वैविध्यता है। कहूं, सुरों की वह मौलिकता जिसमें सहज गीत, गजल के शब्दों में निहित भावों को जिया गया था। अमीर खुसरो की रचना ‘मोहे अपने ही रंग में रंग दे..’ जब संगीता गा रही थी तो लगा संगीत मन में भी कहीं गहरे से घट रहा है। यह भीतर का अनगढ है। कईं बार भले सुर बाहर नहीं आते परन्तु मन गाता है। सुरों की गहराई की यही तो अध्यात्म की हिलारें है। संगीता का गान भीतर की इन हिलोरों को जैसे बाहर लाता है। मुझे लगता है, यह हमारा संगीत ही है जिसमें तन और मन किसी के गायन से इस तरह से स्पन्दित होता है। यह संगीत ही तो है जो भीतर के हमारे भव को लयबद्ध करता है। अनंत की वाणी, अनंत के शब्दों का उजास। कहीं पढ़ा हुआ, ओषो का कहा याद आ रहा है। एक स्वर को दूसरे स्वर से जोड़ने वाला बीच का सेतु है संगीत। संगीता आर्य यही तो करती है। शास्त्रीय रागों को लोक संगीत से, लोक संगीत को जन-जन से स्वर दर स्वर जोड़ती है। संगीत का नया मुहावरा गढ़ते। आरोह-अवरोह में श्वास को साधते। कहीं कोई सुर वहां छूटता नहीं लगता। कभी उनके स्वरों में लोकगीत ‘नीम्बूड़ा’ सुना था। लगा, शब्द को लयबद्ध करती वह अनूठी लय अंवेरती है। आरोह से त्वरित अवरोह। अवरोह से त्वरित आरोह। 
बहरहाल, सुन रहा हूं। इन्हीं सुरों में वह गा रही है, ‘ऋतू राग रंग बरसाए...’, ‘सब जुदा सा लगता है...’ और सदाबहार राजस्थानी लोक गीत ‘केसरिया बालम...’। सुर जैसे गहने पहन श्रृंगार कर रहे हैं। छोटी-छोटी तानें। मुरकियां। 
संगीता आर्य के गाये लोकगीत मन को स्पन्दित करते हैं। ‘चिरमी’, ‘चैमासो’, ‘बन्ना’, ‘केसरिया बालम’ में राजस्थान की माटी की सहज सौंधी महक। लोक वेदना का मर्म। सुरीलेपन में शब्द के अन्र्तनिहित की साधना। गान में शब्दों का सागीतिक उजास। भावनाओं का अनुठा भव। जहन में गांव, गांव की संस्कृति से साक्षात्। तरूण पंवार के संगीत निर्देषन में संगीता का गाया ‘छोटी सी उमर परणाई रै बाबोसा...’ को याद करता हूं। अद्भुत स्वर माधुर्य। सुनेंगे तो लगेगा, वेदना से उपजे इस उलाहने में भीतर का दर्द जैसे स्वरों से छलक-छलक बाहर आ रहा है। सुना इसे दूसरे स्वरों मे पहले भी था परन्तु संगीता आर्य की साफ आवाज और स्वरों का सहज प्रवाह मन मंे घर करता है। शायइ इसलिए की धोरों की धरा, उसके परिवेष की सहज लय वहां अंवेरी गयी है। यही क्यों, सुगम संगीत में और दूसरे गीत, गजल भी संगीता के सुरों में सुनते मन करता है-उनमें रचें, वहीं बसें। वहां परम्परा के सहज रंग जो हैं! संगीत के रंगों में इसीलिए तो संगीता आर्य ‘ओळ्यू’ की संवाहक बनती राजस्थान की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की अपने तई ‘ओळख’ कराती है। आप क्या कहेंगे!

Friday, February 8, 2013

चिन्तन में संगीत


लय एवं ताल का व्यवस्थित रूप है संगीत। संगीत रत्नाकर के अनुसार गीत, वाद्य और नृत्य का समुच्य ही संगीत है। कहते हैं, ‘सम्यक् प्रकारेण यद् गीयते तत्संगीतम्’ माने संगीत वह जिसे सम्यक् प्रकार से गाया जा सके।  वह कला जिसमें स्वर और लय के जरिये भावों को प्रकट किया जाए। संस्कृति-निष्ठ ही तो है संगीत। इसलिए कि यह हमारी संस्कृति की पहचान कराता है। शायद इसीलिए संस्कृति पर चिन्तन को साथ लिए ही संगीत का विमर्ष हमारे यहां आगे बढ़ा है। कला की दृष्टि से संगीत पर संस्कृति से पृथक चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है। इस दृष्टि से मुकुन्द लाठ से संवाद संगीत के अनूठे अनभव भव में ले जाता है। वह संगीत के मर्मज्ञ हैं और कईं अर्थों में देष के एक मात्र आधिकारिक विद्वान भी। पंडित जसराज के षिष्य होने के साथ ही वह संगीत के विरल शब्द साधक हैं। उनके चिंन्तन में संगीत की परम्परागत अवधारणाओं की बजाय विचार की बढ़त है। राग, धुन, आलाप की संगीत शब्दावली के सैद्धान्तिक पक्ष की बजाय वह उसके वैचारिक अन्र्तनिहित में जाते चिन्तन का नया आलोक जो देते हैं। 
बहरहाल, अभी बहुत दिन नहीं हुए। याद करता हूं, वह भोर उत्सवधर्मी थी। यह मुकुन्दजी के निवास की भोर थी। उनका निवास भी निवास कहां है! संस्कृति का अनमोल खजाना है। देष-विदेष के कलाकारांे की कलाकृतियां। पुस्तकें। संगीत वाद्य और संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं का दुर्लभ संग्रह। उनके इस संस्कृति घर में उस भोर कला-संस्कृति से जुड़े बहुतेरे हम लोग जमा थे। अधिकतर विदेषी चेहरे। कुछ मुकुन्दजी के संगीत चिन्तन पर शोधरत तो कुछ स्वयं उनके षिष्य। मुकुन्दजी की धर्मपत्नी नीरजा लाठ अपनापे से स्वागतातुर। पता चला, कुछ खास नहीं बस ऐसे ही बतियाने, मिलने-मिलाने के लिए ही सभी को याद किया गया है। ऐसा भी होता है! सुखद। छायाकार मित्र महेष स्वामी के साथ के साथ मुकुन्दजी से हुए संवाद को गहरे से जिया गया।
मुकुन्दजी संगीत शब्द साधक हैं। संगीत को शब्द से साधने वाले। बेहद संकोची। अपने बारे में कुछ बताते, संगीतविद् कहाते संकोच में गड़ जाते हैं। पर संगीत के वह अद्भुत विचार संवाहक हैं। बातें हुई तो कहने लगे, ‘सामगान हमारा सबसे प्राचीन संगीत ही नहीं, परवर्ती राग-संगीत का जनक भी है। पर साम धुन है, और राग धुन से बिल्कुल अलग। यह कहते वह धुन की अपने तई जो व्याख्या करते हैं उसमें हमारे संस्कार जैसे आंखों के समक्ष घुमने लगते हैं। यह वह संस्कार हैं, जिन्हें बरतते बरतते ही हम बहुत से स्तरों पर धुन के स्वयमेव सर्जक हो जाते हैं। उन्हें सुनते औचक लगता है, संगीत जीवन से जुड़ा राग ही तो है! ऐसे ही आलाप की उनकी व्याख्या देखें, ‘आलाप का अर्थ है बदल-बदल कर बढ़ना। स्वरों के नये नये बनाव, नई उपज, नये विस्तार, चलने के नये रास्ते, इन पर चलना। आलाप की इस व्याख्या के साथ ही वह स्वरों की संगति में संगीत की तलाष करते हैं। कहते हैं, ‘स्वरों की अपनी संगति में, संगीत की अपनी मर्यादाओं और संभावनाओं में, हम औचित्य की कसौटियों की खोज कर सकते हैं।’ 
बहरहाल, हमारे यहां संगीत सुनते तो उसे गुना गया है परन्तु चिन्तन में संगीत कहीं नहीं दिखता। मुकुन्दजी इसे दिखाते हैं। वह संगीत को परम्परागत सैद्धान्तिक दायरों से बाहर निकाल उसमें विचार के नए उन्मेष जगाते हैं। काव्य संग्रह ‘अनरहनी रहने दो’ की एक कविता में संगीत-नृत्य को अंवेरते वह लिखते हैं, ‘...नृत्य के पूरे वलय का/देह-घेरे, देह बाहर/जागता है अंगहार/नृत्य के आकाष में/अनदिख/हमारे देखने के शून्य भीतर/नाचता है..।’ आपको नहीं लगता, संगीत चिन्तन की उनकी इस चेतना, मीमांसा में अनुभव की अद्भुत व्याख्या है! 

Friday, February 1, 2013

सरोद में माधुर्य रस की वर्षा


कानों से होता हुआ संगीत मन तक पहुंचता है। लय और ताल में बंधा स्वर प्रवाह वहां जो है! कालिदास इसीलिए तो कहते हैं, ‘अहो रागबद्ध चित्तवृति आलिखित इव सर्वतो रंगः’ माने राग के माधुर्य से हृदय आकर्षित होने से श्रोता चित्रलिखित-से निश्चल बैठे रहते हैं। सच ही तो है, आरोह-अवरोह का नादब्रह्म है संगीत। जवाहर कला केन्द्र में बुधवार सांय उस्ताद अल्लादिया खां शास्त्रीय संगीत समारोह में पंडित बसन्त काबरा जब अपनी प्रस्तुति दे रहे थे तो तारों से कंपित उनके सरोद वादन में ही मन जैसे बस गया। 
पहुंचा तो, सरोद के तारों पर पंडित काबरा राग श्री की तान छेडने लगे थे। माधुर्य का अद्भुत प्रवाह तन-मन को झंकृत करने लगा। लगा, प्रार्थना के स्वर बढ़त कर रहे हैं। चहुंदिशा में गूंजायमान होते। आलाप के साथ खिलने लगा राग। ऐसे जैसे कली से शनै शनै खिल रहा हो फूल। पंखूरी दर पंखूरी झरता। तारों से उपजा गान। सरोद में स्वयं भी लीन हो पंडित काबरा सुनने वालों को सुरों की यात्रा कराने लगे। मींड और गमक में राग का विलम्बित लय में विस्तार। ...आलाप, जोड़, झाला, झपताल। धीरे-धीरे आरोह-अवरोह में बढ़ता सप्तक का कारवां। तंत्रकारी के साथ गायकी अंग का अद्भुत सुरीलापन। संगीत में रचता-बसता मन। राग श्री में पंडित काबरा जैसे प्रभु अर्चना कर रहे हैं। तेजी से चलती उनकी अंगुलियां। तारों में कंपन्न की दूर तक ले जाती सम्मोहक गूंज। मंदिर में जैसे आरती की धुन। बढ़ती हुई। औचक, काबरा के सरोद में एक नहीं अनेक वाद्यों की ध्वनियां जैसे निनादित होने लगी। घंटियां। ढोल-मंजिरे। प्रार्थना स्वरों का अनुष्ठान। स्वरों का पवित्र सौन्दर्य! 
मुझे लगता है, पंडित बसन्त काबरा सरोद में मार्धुय की अद्भुत सर्जना करते हैं! सरोद सुनते लगता है, संगंीत जीवनानुराग है। जीवन की नश्वरता का भान कराता ईश्वर की अर्चना को प्रेरित करता। यह संगीत ही है जिसमें ईश्वर से साक्षात् की अनुभूति होती है। फिर, राग श्री तो संगीत के आदि देव भगवान शिव से जुड़ा राग है। मोह-माया से मुक्त करता। आनंद की अनुभूति कराता। गुरू ग्रंथ साहब में कुल 31 राग है और वहां ‘राग श्री’ ही सबसे पहले आता है। नानक, गुरू रामदास, गुरू अर्जुन आदि ने इसी को आधार बना सबद गान किया। 
सरोद के साथ तबले पर उस्ताद अकरम खान की संगत भी कम प्रभावी नहीं थी। लय-ताल का सांगोपांग मेल। पंडित जी ने राग श्री के बाद राग मिश्र पीलू का वादन किया। स्वरों की अद्भुत रंजकता। मन को आंदोलित करती। रूपक मध्यलय में गत बजा जैसे उन्होंने राग मिश्र पीलू में उत्सव का आगाज किया। एक में घुला दूसरा। दूसरे में तीसरा। तीसरे में चैथा...। परस्पर घुलते, मोहकता का जादू बिखेरते सरोद के स्वर। संगीत की कभी न भुला देने वाली यात्रा। झूला। झरने। नदी। पहाड़ों के रास्ते। भांत-भांत के खिले फूल। पानी के बूलबूलों सा होता मन।...और फिर लोरीनुमा होले-होले थपकियां। सच! संगीत मन को अवर्णीय यात्रा कराता है। वहां ले जाता है जहां चाहकर भी कोई नहीं जा सकता। माधुर्य के आह्वान का अनुष्ठान है संगीत। सरोद वादन करते काबरा संगीत तत्व के बोल और झाला का अद्भुत निभाव करते हैं। मुझे लगतां है, बगैर किसी दिखावे के उन्होंने सरोद में अपने को साधा है। बाद में जब संवाद हुआ तो उनकी सहजता और संकोच में डूबी विनम्रता में ही राग रंग को अपने तई गुना।
बहरहाल, प्राचीनतम वाद्य है सरोद। रबाब का परिस्कृत रूप। कहते हैं ईरान-अफगानिस्तान के रास्ते कभी यह भारत आया। और पंडित बसन्त काबरा का सरोद तो माधुर्य रस की जैसे वर्षा करता है। संगीत से अपनापा कराता। चाहकर भी उनके सुने को कोई बिसरा सकता है!



Sunday, January 20, 2013

नृत्य में सौन्दर्य के दृश्य चितराम


भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी समग्रता में देखती है। उसमें जीवन के सभी पक्ष समाहित जो है! कला की दीठ से वहां संगीत है, चित्रकला है और नृत्य है। आपस मंे घुली यह तमाम कलाएं ही एक दूसरे को रूप देती है। बावजूद इसके, हर कला की अपनी स्वायत्ता भी है।  नृत्य की ही बात करें। नृत्य माने ताल और लय पर थिरकता सौंदर्यपूर्ण अंग संचालन। नाट्य और नृत्त का संगम। गीत में अन्र्तनिहित को देह की थिरकन वहां मूर्त करती है।...और भरतनाट्यम तो नृत्य में अभिनय भाव संजोए कला की सूक्ष्म दीठ है। इधर प्रख्यात नृत्यांगना मालविका सारूकाई ने भरतनाट्यम में अपने तई प्रयोगधर्मिता के नए ताने-बाने बुने हैं। परम्परा को समय सरोकारों से जोड़ते वह नृत्य में गजब की बढ़त करती है। कला के गहरे सरोकार रखने वाली विदूषी टिम्मीकुमार ने पिछले दिनों उसके नृत्य की सार्वजनिक प्रस्तुति कराई तो इसे गहरे से अनुभूत किया। 
नृत्य आस्वाद करते लगा, भरतनाट्य में मालविका दृष्य दर दृष्य की अद्भुत सौन्दर्य सर्जना करती है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर बनती गंगा और पर्वतों, पठारों से बहता उसका वेग मालविका के ‘गंगा अवतरण’ नृत्य में जीवंत होता है। नृत्य देखते लगता है, गंगा और उसक प्रचण्ड प्रवाह को हम सच में करीब से महसूस कर रहे हैं। नृत्य में हाथों की थिरकन और आंगिक चेष्टाओं की विषेष गति। सच! ताल-लय का मंत्रमुग्ध करता निःषब्द आवर्तन है मालविका का नृत्य।
बाह्यमुखी रंजकता में भीतर के ध्यान और नृत्यांगना की साधना को मालविका के नृत्य में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। गंगा पतित पावनी तो है ही, जन्म-मृत्यु और फिर से जन्म के जीवन चक्र की भी तो संवाहक है! मालविका अपने नृत्य में इसी दर्शन का नाद करती है। भाव मुद्राओं में वह अनूठा स्पेस सृजित करती है और तात्कालिक परिवेश को गहरे जीती है। सूक्ष्म भाव अभिनय के साथ वहां कोमल कल्पनाएं, विचार की गहरी सूझ दिखाई देती है। गंगा अवतरण के बाद की मालविका की बेहतरीन प्रस्तुति थी, ‘ठुमक चलत रामचन्द्र’। डी.बी. पलुस्कर की संगीतबद्ध इस रचना का मालविका का शब्दों पर रचा भाव संसार मन मोहने वाला था। हस्तमुद्राओं, नजर, मुस्कमान और अंगुलियों के मोहक बर्ताव में दृश्य के अनगिनत रूपाकार गढती मालविका ने श्रीरामचन्द्र के बाल्यकाल के अद्भुत चितराम नृत्य में उकेरे।  मुझे लगता है, संगीत में निहित बोल और ध्वनियों पर थिरकते अंगों से वह एकाभिनय नहीं अनेकाभिनय का अहसास कराती है। एक और प्रस्तुति ‘वंदेमातरम्’ वह जब कर रही थी तो जैसे भारतीय संस्कृति, परिवेश के तमाम पहलुओं को उसने अपने में समाहित कर लिया था। यथार्थ के रूपान्तरण का सशक्त दृश्य-श्रव्य माध्यम भी जिस सौन्दर्य को ठीक से व्यंजित नहीं कर सकता, वह अकेले मालविका अपने नृत्य में कर देती है। एक कलाकार अपने तई कितने-कितने पात्रों को अपने मंे समाहित कर भावपूर्ण दृश्यों का रचाव करता है, इसे मालविका के भरतनाट्यम से जाना जा सकता है।
बहरहाल, टिम्मीकुमार शहर की कलाकार, कला रसिक उद्यमी हैं। संगीत, नृत्य के बहुतेरे आयोजनों से सांस्कृतिक आयोजनों में पसरी एकरसता को उन्होंने तोड़ा है। मालविका सारूकाई उनकी मित्र भी हैं सो उन्हीं के सौजन्य से छायाकार मित्र महेश स्वामी के साथ जब इस नृत्यांगना से प्रस्तुंित के बाद संवाद हुआ तो भरतनाट्यम में  प्रयोगधर्मिता के उनके बहुत से अनछुए पहलुआंे से भी रू-ब-रू हुआ। कैसे किसी नृत्य में शरीर संतुलन के साथ नृत्यांगना अंतर्मन ध्यान को परिणत करती है, उसे भी तब गहरे से समझा। मालविका ने इस नाचीज से कहा भी, ‘नृत्य करते अपने आप से ही नहीं अनंत व्योम से, समय से और परिवेश से भी संवाद होता है।’ 


Saturday, January 12, 2013

कला का उजास


आत्मान्वेषण की सूक्ष्म अभिव्यंजना है चित्रकला। स्मृतियों, कल्पनाओ और स्वप्न संकेतों में वहां अर्न्तनिहित का सुगठित संयोजन जो होता है! चित्रकार रंग-रेखाओं में जो कुछ बनाता है, उसमें स्वयं उसकी अभिव्यक्ति व्याकुलता के साथ जीवनगत सौन्दर्य से जुड़े संस्कार भी तो होते हैं। प्रकाष, छाया तथा संदर्ष की अनगिनत छवियां कलाकार जब आंकता है तब उन्हें देखने वाले अपने तई अर्थ तलाषते हैं। कला का यही तो है आनंद हेतु। 
पिछले दिनों मनन चतुर्वेदी के रंग सरोकारों के साथ किसी कलाकार के आनंद हेतु से भी जैसे सीधे साक्षात् हुआ। यह ऐसा था जिसमें किसी कला मन के उर की उमंग उन बच्चों के लिए समर्पित थी, जिनका इस जहां में कोई नहीं है। ऐसा, जिसमें लगातार 72 घंटे रंगो में प्यार और स्नेह की छांव संजोयी जा रही थी। सोचता हूं, बच्चे इस जग में प्यार के फरिष्ते ही तो हैं! निराश्रित और परित्यक्त बच्चों के लिए कुछ करने के ‘एंजिल ऑफ लव’ केन्द्रित कला उपक्रम के बारे में भारतीय पुलिस सेवा के बेहद संजिदा, मगर कलाकार मन अधिकारी बी.एल. सोनी ने जब बताया तो मनन की कलाकृतियांे से रू-ब-रू होने का औचक ही मन हुआ था। 
ठिठुरती सुबह में धूप के ताप का तब सुखद आगाज हुआ ही था, जब मनन की बन रही कलाकृतियांे को देखने औचक पहुंच गया था। ढेरों बने चित्रों में उभरती मूर्त-अमूर्त आकृतियों में जीवन का उल्लास जैसे बंया हो रहा था। अनुभूत किया, वहां लोक का उजास भी था। जीवन से जुड़े संघर्ष थे तो जो है, उसे सहेजने का जतन भी और जो नहीं है, उसे बिसारने की सहज उत्कंठा भी। हरे, पीले, नीले-चटक, धुसरित रंगों में जीवन रचाव को देखने जब पहुंचा तब मनन की अनवरत कलायात्रा के 68 घंटे व्यतीत हो चुके थे। पता चला, मनन इस दौरान न सोयी है, न थक कर बैठ विश्राम किया है। बस कलाकृतियों के रचाव में ही लगी रही है। मगन मनन रच रही थी रंगों से कैनवस।  बगैर ब्रष। उंगलियों के पोरों से। हाथों की थाप से। उपस्थिति का बगैर भान कराये कुछ देर यह नाचीज़ मनन की अनथक कला में ही खोया रहा। देखा, वह कैनवस पर कभी रंग छिड़क रही थी तो कभी हाथों से रंगों का लेप़ करती जैसे अपने को ही उनमें बुन रही थी। औचक, एक चित्र में नन्हीं सी कोई बच्ची झूला झूलती उभरी तो दूजी में धुसरित रंगों में गांव और गांव का जीवन बंया हो रहा था। वहां हरे खेत थे, मृण पात्र थे और थे जीवन से जुड़े तमाम सरोकार।  
मनन समाज सेवा से मन से जुड़ी कलाकार है। बच्चों में रमती, उनमें ही बसती। पता चला, कभी निराश्रित एक बच्चे को वह अपने घर ले आयी थी। उसे पालते-पोषते ही कलाकार मन को लगा, ऐसे बच्चे जहां में और भी हैं जिनका कोई नहीं। क्यों नहीं, उन्हें भी प्यार की छांव दी जाए। बस इस सोच से ही नींव डाली मनन ने सुरमन आश्रम की। आज इस बाल आश्रम में परित्यक्त, निराश्रित 88 बच्चें हैं। स्वाभाविक ही है, मनन के कलाकार मन में भी यही बच्चे बसते हैं। इसीलिए तो उसकी कलाकृतियों में बच्चों की ईच्छाओं, उनकी हंसी के रंग हैं तो जीवन से जुड़ा वह दर्द भी औचक बंया होता है जिसमें नन्हीं कोंपलों के लिए आसमान की छत के सिवा कोई और सहारा नहीं। रंगों से जुड़े जीवन सरोकारों की अपनी कलाकृतियों की बिक्री से मनन नन्हीं कांेपलों के सुखद भविष्य के स्वप्न संजोए हुए हैं। उनके यह स्वप्न पूरे हों। आमीन! 
बहरहाल, किसी कलाकार की यह अद्भुत सर्जना ही तो है, जिसमें अपने लिए नहीं दूसरों के लिए कुछ करने का आत्मान्वेषण रंगों से यूं बंया हुआ है। आप क्या कहेंगे!


Sunday, January 6, 2013

बचा है कुछ हरा



पेड़ों में 
बचे हैं 
अभी भी 
हरे पत्ते; 
नम आंखों में 
बचे हैं 
अभी भी 
बहुत-से सपने; 
धूप में 
बची है 
अभी भी 
थोड़ी-सी छांव; 
रीतते मन में 
बचा है 
अभी भी 
बीता अतीत; 
उदासी में 
बची है 
अभी भी 
थोड़ी-सी मुस्कान; 
बाहर नही तो अंदर 
बचा है 
अभी भी 
कुछ हरा। 
नहीं, 
अभी तो 
कुछ भी 
नहीं झरा।

Friday, December 28, 2012

रेखाओं की ध्वनि

जीवन से जुड़ी विद्रूपताओं  के सूक्ष्म अंकन की कला है व्यंग्यचित्र। कहें, यह वह संकते लिपि है जिसमें रेखाओं की ध्वनि को सुना जा सकता है। चित्रकला की ऐसी शैली जिसमें आकृतियां गुदगुदाती है, करारा प्रहार करती है तो कभी सोच का नया आकाश भी अनायास ही दे देती हे। मुझे लगतां है, यह व्यंग्यचित्र ही है जिसमें न्युनतम  रेखाओं में कहन की विराटता देखी जा सकती है।
बहरहाल, व्यंग्यचित्रों में प्रायः किसी समाचार के बहाने या फिर घटना जन्य परिस्थिति से बनी रेखाएं बहुत से स्तरो ंपर मारक प्रहार करती है तो कभी हास्य की अवर्णनीय स्थिति भी उत्पन्न करती है। इसीलिए तो कहते हैं, हजारों हजार शब्द जो नहीं कह सकते वह न्युनतम रेखाएं व्यंग्यचित्रों में कह देती है। यही नहीं, सब कुछ कहने के बाद भी बहुत कुछ फिर से वहां सोचने के लिए जेहन में रख दिया जाता है। स्वाभाविक ही है, इसके लिए रेखाओं की समझ ही पर्याप्त नहीं है-वह दृष्टि भी होनी चाहिए जिससे घटना या समाचार के वर्तमान के साथ उसके भविष्य को भी पढ़ा जा सके।

कार्टून और कैरिकेचर में महीन भेद है। कार्टून घटनाओं की पड़ताल करते जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति करते हैं जबकि कैरिकेचर व्यक्ति विशेष को उघाड़ते हैं। माने व्यक्ति के बाहरी ही नहीं अंदर के जगत की भी वहां तलाश होती है। वहां संवाद नहीं होता परन्तु शालिनता में रेखाएं बहुत कुछ कहती है। शिष्ट में चुभन और हास्य देने वाली परिस्थितियां औचक ही वहां पैदा होती है। कैरिकेचर के अतीत में जाए तो लगेगा, यह कला आज की नहीं राजा-महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है।

इतालवी भाषा में कैरिकेचर कैरेक्टर है और स्पेनिश में कारा। अर्थ है-चेहरे। वैसे  नहीं जो सामान्यतः दिखाई  देते हैं, वह जिनमें व्यक्ति पूरी तरह से रंगा होता है। यानी व्यक्ति का चरित्र जिससे बंया हो। आसान नहीं है यह। कम से कम रेखाओं में व्यक्ति का बाहरी ही नहीं भीतरी भी बंया करना। कहते हैं, लियोनार्दो द विंचि ने कैरिकेचर कला की तलाश की थी। तब सिक्कों पर शासकों के चेहरे बने होते थे। विंचि ने देखा, सिक्के जब घिस जाते हैं तो शासको की छवियां भी विदु्रप हो जाती। कभी किसी शासक की ठूड्डी अजीब हो जाती तो कभी किसी की नाक। बस फिर क्या था, लियोनार्दो ने सिक्कों से प्रेरणा लेते हुए ही तत्कालीन विशिष्ट व्यक्तियों के कुछेक कैरिकेचर बनाए। लोगों ने उन्हें बहुत पंसद किया। बाद में तो यह कला विश्वभर में खूब पनपी।

थामस रोलेण्ड ने 19 वंी सदी में बड़ी-बड़ी हस्तियों के ऐसे चित्र बनाकर अपार लोकप्रिय प्राप्त की। विलियम होकार्थ वह कलाकार है जिसने पहले पहल एडिटोरियल कार्टून और कॉमिक स्ट्रिप की शुरूआत की।  होगार्थ ने जब ब्रिटिश समाज के आडम्बरपूर्ण चरित्रों को देखा तो उनके मन में सहज ही उनके प्रति आक्रोश उत्पन्न हुआ। परिणति में ही उन्होंने कला में शाश्वत विषयों की बजाय तात्कालीन विषयों पर रेखाओं से मारक प्रहार किये।
भारत में कार्टून कला के भीष्म पितामह शंकर हैं। कार्टून में पहले पहल विचार शंकर ही लेकर आए। इधर प्रायः सभी समाचार पत्रो के मुख्यपृष्ठ का एक कोना कार्टून का ही होता है। याद करें, आर.के. लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’, सामू का ‘बाबूजी’, कदम का ‘टोपीधारी’ और सुधीर तैलंग का जींस पहनने वाला झोलाधारी-सबके सब चरित्र हममें इस कदर बस गए हैं कि इनके बिना कोई घटना इन दिनांे अधूरी नहीं लगतीि!
बहरहाल, कुछ दिन पहले लोकेन्द्र नाहर के बनाए व्यंग्यचित्रों, कैरिकेचर की प्रदर्शनी देखी तो यह सब जैसे याद आया। कार्टून, कैरिकेचर की उसकी प्रदर्शनी देखते लगा, इसमें उसके अंदर का कलाकार उसकी मदद करता है। इसीलिए भी कि वह जो बनाता है उसमें रेखाओं का सुघड़पन और उनकी कोमलता देंखने का न भूलाने वाला प्रभाव पैदा करती हैं। कैरिकेचर ऐसी कला है जिसमें कंपोजिशन सेंस तो खैर जरूरी है ही, ब्रश-स्ट्रोक भी मारक होना जरूरी है। यह जब लिख रहा हूं, हुसैन का बनाया लोकेन्द्र का कैरिकेचर और लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’ याद कर रहा हूं। याद करंेगे तो आपको भी बहुत कुछ याद आने लगेगा!


Thursday, December 20, 2012

परम्परा का कलानुराग


लोक कलाएं निर्बन्ध हैं। माने वहां किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं है। चित्र है तो वहां कथा भी है। नृत्य है तो गान भी है। कहें, हर कला से थोड़ा कुछ लेते ही लोककलाएं बढ़त करती है। कथोपकथनों को गेय में व्यक्त करती। जीवन की उत्सवधर्मिता का नाद लिए। मनोरंजन के साधन जब नहीं थे, तब लोकलाओं का यह उजास ही तो मानव मन के रीतेपन को हरता था। 
बहरहाल, पिछले दिनों शहर के एक पांच सितारा होटल में लोक परम्पराओं के उजास को अनुभूत कर अजीब सा सुकून मिला। होटल में आधुनिक चकाचौंध और तड़क-भड़क के बावजूद छत का एक कोना जयपुर की परम्परा का संवाहक बना हुआ था। आंग्ल भाषा में इस आयोजन को नाम दिया गया था, ‘जयपुर टेल्स’। माने जयपुर बता रहा है। आमंत्रित आस्वादक भी हिन्दी बोलने, समझने के बावजूद अंग्रेजी दां थे। सो बताने वालों के बारे में घोषणा अंग्रेजी में ही हुई। सुखद यह था कि विरासत को बांचने वाले या कहें सुनाने वाले हिन्दी में बोले। लोकानुरंजन के तब के दौर को याद करते हुए जयपुर की कलाओं और वस्त्र परम्परा पर डॉ. चन्द्रमणीसिंह ने कुछ अनछुए पहलू बताए तो वास्तुकला से संबंधित जानकारियां गोपालसिंह नंदीवाल ने साझा की। स्वाभाविक ही था, इस दौरान राजा-महाराजाओं के कलानुराग का गान भी हुआ। जयपुर की मूर्तिकला से जुड़े पहलू तो खैर परम्परा की बात में आए ही परन्तु खाने के बाद पान का शौक फरमाने और लोकनाट्य की तमाशा परम्परा की बात चली तो लगा कुछ और भी था जो बंया किया जाना चाहिए था। एक साथ विरासत से जुड़ी बहुत सी परम्पराओं के पोषण को एक साथ रखे जाने की बड़ी सीमा आखिर यह तो होती ही है कि वक्त कम पड़ जाता है। जब तक कहने वाले की भूमिका बनती है, तब तक उसका समय समाप्त हो जाता है। सो रोचक कहन को सुनते यह बात अखरी। 
खैर...। पान खाने की जयपुर की परम्परा पर विरासत से जुड़ी दुकान के जुगलकिशोर ने पान के शौक से जुड़े लागों के बहुत से रोचक किस्से सुनाए। उनके इस सुनाने में लोकानुरंजन तो था ही, वह किस्सागोई भी थी जो अब धीरे-धीरे लोप हो रही है। वह सुना रहे थे, पान लेने आने वाले के साथ यदि कोई बच्चा आता तो उनके वालिद माधो उसे भी अपनी ओर से पान खिलाते। और ऐसे कब वह बच्चों में ‘माधोबाबा’ बन गए पता ही नहीं चला। उनकी दुकान भी फिर इसी नाम से जानी जाने लगी। यह सब सुनते पान का पारम्परिक स्वाद भी सुनने वालों को माधोबाबा की दुकान से चखवाया गया। इस दौरान संयोजक विनोद जोशी ने भी जयपुर की परम्परा को शिद्दत से बंया किया।
आयोजन में किस्से, कहानियां और भी थी। परन्तु भट्ट परिवार की परम्परा को निभाते आ रहे दिलीप भट्ट जब तमाशा के बारे में बताने लगे तो लगा वक्त थम गया है। लोकनाट्य की तमाशा शैली को भट्ट परिवार ने सींचा है। गोपीजी और  उनके पुरखों की परम्परा को दिलीप भट्ट के मुंह से सुना और तमाशा की उनकी प्रस्तुति से उसे गुना भी। पारम्परिक वेशभूषा में हारमोनियम, सारंगी और तबले की थाप पर भट्ट ने तमाशा किया। उनका पद संचालन और बुलंद आवाज मन में गहरे से जैसे बस गई है। 
तमाशा मूलतः लौकिक नाट्य है। वहां लोककथाएं हैं, पौराणिक आख्यान है, प्रेमाख्यान है और वर्तमान हालात का सांगीतिक चितराम भी है। दिलीप भट्ट इस आधुनिक दौर में भी तमाशा का निर्वहन और उसमें रेखांकित की जाने वाली भाववस्तु को अपने तई जीते हैं। उन्हें सुनते, भावाभिव्यक्ति करते देखते और अपनी कला में खोते हुए पाते व्यक्ति और समूह के अंतःसंबंधों की पहचान होती है। सोचता हूं, लोकानुरंजन के अंतर्गत एक प्रकार से लोक का यह वह अनुष्ठान ही है जिसमें परम्पराओं का पोषण हेाता है। हमारी विरासत में बहुत कुछ अभी भी ऐसा है, जो हममें से बहुतों के लिए नया है। जिसे सुना जा सकता है। गुना जा सकता है। बशर्ते, वक्त हो!

Saturday, December 1, 2012

इक्कीसवीं सदी में कला


कलाओं को हमारे यहां रूप की सृष्टि कहा गया है। वहां दृश्य का ही नहीं जो कुछ अदृश्य है, उसका भी अनुकरण करते रूप को उभारा जाता है। पार्कर ने इसीलिए कभी कला को इच्छा के काल्पनिक व्यक्तिकरण की संज्ञा दी थी। और अब तो कला कैनवस तक ही सीमित नहीं रह गयी है, उसके अभिव्यक्ति सरोकार भी बदल गए हैं।  किसी स्थान विशेष की संवाहक होने की बजाय वह बाजार जनित मूल्यों में संवेदना से परे बहुत से स्तरों पर जीवन से दूर भी हुए जा रही है। कैनवस हासिए पर है। रंग और रेखाओं की सर्जना में ब्रश-प्लेट गायब है। डिजिटल तकनीक के साथ संस्थापन में जो चाहे किया जाने लगा है। संभवतः इसी से कला-अकला का द्वन्द भी इधर तेजी से उभरा है।
राजस्थान हिन्दी गं्रथ अकादमी के पुस्तक पर्व में  ‘इक्कीसवीं सदी में कला का अंत’ सत्र शायद यही सोचकर रखा गया था। कला में उभरी नवीनतम प्रवृतियों के एक प्रकार से निश्कर्षनुमा इस षीर्शक विमर्श में प्रयाग शुक्ल, विनोद भारद्वाज के साथ इस नाचीज से संवाद किया गया था। ‘कला के अंत’ पर भला कोई सहमत होगा? सो इस बाबत जब ममता चतुर्वेदी ने सवाल किया तो आनंद कुमार स्वामी के कहे पर ही गया, ‘नवीनता नवीन बनाने में नहीं नवीन होने में है।’ नवीन जो बनाया जा रहा है, उसमें कलाकार और हम स्वयं कितना नवीन होते हैं। असल मुद्दा यह है। यूं भी कला माने जिसका कलन होता हो। काल में जिसकी गणना की जा सके। काल से जुड़े का भी अंत हो सकता है! मुझे लगता है, यह कला ही तो है जो अपनी व्यापक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के तहत समाज में तमाम अपनी स्मृतियां, विस्मृतियां, विशेषताओं और बेशक खामियों के साथ हर दौर में मौजूद रहती है। इसलिए उसमें नवीनता जब-जब होती है, पुराने को न छोड़ पाने के मोह के कारण ऐसे सवाल भी उठते रहते हैं।
विनोद भारद्वाज ने इसीलिए ‘कला के अंत’ की बजाय कैनवस के अंत के प्रश्न को मौजूं बताते कहा कि सत्र का शीर्षक कुछ ऐसा ही होना चाहिए था। इसके बहाने उन्होंने बदलते समय में कलाकार के जीवन मूल्यों में आए बदलाव की ओर ईषारा किया। उनका कहना था, पहले कलाकार के पास कैनवस था तो समय था अब जब माध्यम बदल गया है तो बाजार भी प्रमुख हो गया है। कैनवस छूटने के साथ ही कलाकार के पास अब समय ही नहीं है। वह बाजार की दौड़ में इस कदर भाग रहा है कि अपने और अपनोें से ही दूर हुए जा रहा है। हुसैन की हर अदा मीडिया में साया होती तो गायतोण्डे और अम्बादास जैसे महत्वपूर्ण कलाकारों के अंत से भी मीडिया अनजान बना रहा। प्रयाग शुक्ल ने कला में आए बदलावों के साथ छीजती संवेदनाओं पर गहराई से रोशनी डाली।
बहरहाल, ‘इक्कीसवीं सदी में कला का अंत’ पर विमर्श के बहाने कला में उभरती नवीनतम प्रवृतियां और बाजार मूल्यों की गहरे से पड़ताल हुई। संवाद में इन पंक्तियों के लेखक ने टाईम मैगजीन में 1923 में प्रकाशित मशहूर कला आलोचक क्रिस्टल के उस लेख की भी याद दिलाई जिसमें कलाकारों के पागल हुए जाने की बात कही गयी थी। अप्रत्यक्षतः कला के अंत का ही प्रश्न उसमें उठाया गया था। माने हर दौर में जब भी कुछ नया होता है, लीक से हटकर कुछ किया जाता है तो उसमें इसी तरह के प्रश्न शायद उठते हैं। ‘कला के अंत’ की बात बहुत से लोगों को भले अखरी होगी परन्तु यह वह सांस्कृतिक प्रतिक्रिया है जिसमें बदलते रूप माध्यमों में कला नए आयाम ले रही है। बेशक आयाम के इस सफर में बहुत कुछ खराब भी हो रहा है परन्तु खराब की डर से क्या कला अभिव्यक्ति की बेहतरीन संभावनाओं को नकारा जा सकता है! 

Saturday, November 24, 2012

सुर की अद्भुत लय


ध्वनि माने नाद। संगीत की बात करें तो नाद वहां ध्वनि भर नहीं है। वहां लय है, ताल है और है जीवन का राग। सोचता हूं, संगीत की लय यदि जीवन मंे नहीं हो तो क्या यह संसार असार नहीं हो जाएगा! राग ही तो कराता है जीवन से अनुराग। 
बहरहाल, नाद से स्वर और स्वरों से है सप्तक। संस्कृत की धातु रंज् से बना है ‘राग’। माने रंगना। कल की ही बात है। पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर को सुना। लगा, उनके गाये में पूरी तरह से रंग गया हूं। मीराबाई का जो भजन उन्होंने गाया है, उसके बोल हैं, ‘मत जा मत जा रे जोगी, पांव पड़ुंगी मैं तेरे’। गाया इसे ओरों ने भी है पर मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में यह सुनंेगे तो लगेगा तन-मन झंकृत हो उठा है। शब्दों की कोरी ताल निबद्धता ही वहां नहीं है, एक-एक गाये शब्द का अर्थ जैसे स्वर दर स्वर खुलता है। राग भैरवी में इसे गाते पंडित जी मीरा की भावना के सारतत्व की गहन अनुभूति कराते हैं। आरोह, अवरोह में किसी एक स्थान पर ले जाकर औचक जब वह ‘मत जा मत जा’ शब्दों के स्वर छोड़ते हैं तो अद्भुत सौन्दर्य रचाव होता हैं। यह अध्यात्म का सौन्दर्य है। लगता है, उनकी अंवेरी लय सदा के लिए मन में बस गयी है। भैरवी प्रातःकाल का राग है परन्तु पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में ‘मत जा जोगी’ को किसी भी समय सुनेंगे, मन करेगा उसे गुनें। एक-एक शब्द की गहराई मंे ले जाते वह स्वरों की अद्भुत पकड़ करते हैं। 
मल्लिकार्जुन मंसूर के आलमप्रभु, चैन्नबसव, अक्कामहादेवी जैसे संतों के वचनों का गान भी अंतर अकथ से हुलसित करता है। बसवन्ना की विनय-पत्रिका ‘हे प्रभु,/देह की डंडी बनाओ/तुम्बा हो सर का/नाड़ियों की तंत्री बने/अंगुलियों का मिजराब/साधकर अपने दो और तीस राग/मेरे हृदय को छेड़ो...’ सुनेंगे तो लगेगा आप किसी ओर जहां में चले गए हैं। सच! यह मसंूर ही हैं जिनका गान अर्थनिरपेक्ष होता सूक्ष्म से सूक्ष्मतर समाधि भंगिमा की ओर बढ़ता है। वह अपना सारा गान भगवान शिव को समर्पित करते हैं। मुझे लगता है, अन्तः और बाह्य जगत के तमाम संदर्भ उनके गान में समाहित हैं। धुन लगते ही हम जैसे उसमें रमने लग जाएंगे। 
बीकानेर के ऊर्जावान और समझ वाले अपेक्षाकृत युवा प्रकाशक प्रशान्त बिस्सा ने इधर सूर्य प्रकाशन मंदिर के तहत पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा ‘रसयात्रा’ का प्रकाशन किया है। मूल कन्नड़ में लिखी ‘रसयात्रा’ बकौल अशोक वाजपेयी ‘तीर्थगायक की रसयात्रा’ है। मंसूर इसमें लिखते हैं, ‘ताल और राग के सटीक मिलाप से ही धीरे-धीरे राग-पुष्पित होते हैं।’  उन्हें सुनते हुए इसे गहरे से अनुभूत भी किया जा सकता है। 
‘रसयात्रा’ में एक जगह वह संगीत की मौलिकता पर कहते हैं, ‘परम्परा के सारतत्व पर अधिकार के बाद ही मौलिकता को प्रवाहित होना चाहिए।’ स्वयं पंडितजी ने तमाम अपने गान में यही तो किया है! वहां परम्परा के सारत्व पर अधिकार है परन्तु स्वयं उनकी सिरजी मौलिकता भी है। उनके गुरू मांजी खान साहब कहते, ‘हर कुजे नियामत’। माने हर पात्र में कुछ न कुछ प्रसाद जरूर होता है। इसकी गांठ बांधते उन्होंने संगीत में सबसे कुछ न कुछ ग्रहण किया परन्तु उसमें अपना मिलाते सहज आलाप के अद्भुत सुरीलेपन की सौगात हमें दी। ‘रसयात्रा’ में अपने गायन के बारे में बताते वह लिखते हैं, ‘तानपुरे पर स्वर सुनते ही मैं इस सांसारिकता से दूर एक अलग दुनिया में प्रवेश करता हूं। भौतिक उपस्थिति को भुलाकर मेरे मन की आंखे केवल सुर की लय को देखती है....मेरे लिए तो जिन्दगी खुद सुरों से सजी एक महफिल है।’ उन्हें सुनते, ‘रसयात्रा’ को पढ़ते औचक मुंह से यही तो निकलेगा ‘सच ही तो है!’

Friday, November 16, 2012

काशी और एलिस बोनर



काशी  मंदिरों की नगरी ही नहीं कला भूमि भी है। ललित कला अकादेमी और जे.कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन के आमंत्रण पर कुछ दिन पहले एक व्याख्यान देने वाराणसी जाना हुआ था। बनारस हिन्दू विश्वविध्यालय  स्थित कला भवन भी गया। लगा, संगीत, नृत्य, चित्रकला और संस्कृति की हमारी परम्पराएं अभी भी वहां जीवंत है। कलाविद् ‘एलिस बोनर’ के बारे में  काशी   जाने से पहले भी पढ़ा था परन्तु बनारस में उनकी दृष्टि से जैसे अपनापा हुआ। उनकी कला दीठ में काषी के घाटों से साक्षात् हुआ, एलोरा के गुफा चित्रों के बारे में जैसे नई समझ मिली और सुप्रसिद्ध नर्तक उदयशकर की नृत्य भंगिमाओं के बहाने संगीत, नृत्य, शिल्प, वास्तु और अध्यात्म के भारतीय सरोकारों को पश्चिम के किसी कलाकार की मौलिक दृष्टि से फिर से जाना।
अचरज भी हुआ। किसी भारतीय ने नहीं, पाष्चात्य कलाकार ने भारतीय कला और संस्कृति को अपनी कला में इस गहरे से जिया है! फिर सोचता हूं, कला का यही तो वह परम सत्य है जिसमें सर्जक जीवन की अपने तई तलाष करता है। एलिस ने यही किया। अपनी अनुभवी दृष्टि से भारतीय कला के रहस्यों में प्रवेश  करते उसने चित्रों में, मूर्ति में, नृत्य में अर्न्तनिहित को अपने तई समझा। कला की अपनी दीठ दी। उसने संसार की दृष्टिगत होने वाली वस्तुओं प्रकृति, मनुष्य, पषु तथा पेड़-पौधों को अपनी कला में मूर्त रूप ही नहीं दिया बल्कि भारतीय नृत्य की भंगिमाओं को आत्मसात करते रेखाओं, रंगों के साथ ही मूर्तियों में उन्हें जिया भी। 
विष्वास नहीं होता! भारतीय नृत्य के आस्वाद में कोई इतना खो जाए कि तमाम अपना जीवन ही उसके लिए समर्पित कर दे। पर सच यही है! एलिस इसी का उदाहरण है। ज्यूरिख में वर्ष 1926 में एलिस ने प्रख्यात नर्तक उदयषंकर का नृत्य देखा। नृत्य की उनकी भंगिमाएं और लालित्य की सुंदरता ने उसे जैसे मोहित कर दिया। एलिस को लगा, मंदिरों पर उत्कीर्ण होने वाली मूर्तियां उदयषंकर के नृत्य में जीवंत हो उठी है। बस, यहीं से एलिस का भारतीय कलाओं में रूझान बढ़ा और अगले पांच वर्षों तक वह उदयषंकर के कलाकर्म के साथ ही जीवन के उनके तमाम आयामों से जैसे एकाकार हो गयी। उनके नाट्य प्रदर्षन, पत्राचार, वेषभूषा के साथ ही योरोप और अमेरिका की उनकी यात्राओं की व्यवस्थाएं उसने की।एलिस के अनुसार, ‘यह वास्तव में भारत के बहुरंगीय जीवन का मेरे लिए एक सजीव चित्र था।’
बहरहाल, बाद में वाराणसी को एलिस ने अपना घर भी बनाया। वह बनारस के अस्सी घाट में रही। यहां रहते उसने काषी की महिमा को गुना और और उसे अपने चित्रकर्म, मूर्तिषिल्प में गुना भी। यहीं से बाद में वह उत्कल भूमि भी गयी। उड़िसा  में बिखरे षिल्प की तलाष करते ही उसने  ताड़पत्रों की अप्रकाषित पाण्डुलिपियां खोज निकाली। पण्डितों और षिल्पियों का सहयोग लिया और 12 वीं सदी में लिखे गये उड़िसा के तंत्र युग ग्रंथ ‘षिल्प प्रकाष’ का अनुवाद भी किया। प्रतिमा के सिद्धान्त का विधिवत एवं प्रतिकात्मक ज्ञान जैसे इससे उन्हें मिला। एलिस ने कहा भी, ‘कलाएं सौन्दर्य आस्वाद के लिए ही नहीं है, उनके जरिए आत्मा को एकाग्रचित किया जा सकता है। इसलिए कि वे सत्य हैं।’
 एलोरा पर एलिस ने जो लिखा है, वह विरल है। गुफा षिल्प पर लिखी उनकी सूक्ष्म कला दृष्टि पर जाता हूं तो यह भी लगता है कि यह एलिस ही थी जिसने एलोरा की गुफाओं के अर्थ संकेतों को पकड़ते प्रतिमाओं के अर्न्तनिहित को अपनी दीठ दी। इस दीठ मंे बाह्य सौन्दर्य के आकर्षण से प्रभावित होना ही कला की समझ की संपूर्णता नहीं है बल्कि जीवन के आंतरिक भाव को व्यक्त करना भी है। कहें, उसने कला और जीवन की गतिषीलता की आत्मा को पहचाना। इसीलिए बाद में जब एलिस  ने नर्तक, संगीतकारों के चित्र, मूर्तियां बनायी तो उनमें भारतीय संस्कृति जीवंत हो उठी। 
काषी से लौटे इतने दिन हो गये परन्तु एलिस की कला, उसकी भारतीय कला दृष्टि का प्रकाष अभी भी जेहन में रह-रह कर कौंध रहा है। एलिस ही क्यों, काषी की दूसरी कला अनुभूतियां भी तो इतनी है कि उन पर लिखूं तो कई सौ पृष्ठ भी कम नहीं पड़ जाएंगे! यही सब सोच रहा हूं कि मन में विचार आ रहा है, काषी का अर्थ भी तो प्रकाष ही है। काष् धातु है। अर्थ है-ज्योतित करना।  दृष्टि में जो ज्योतित है, उन्हें क्या शब्दांे में व्यक्त किया जा सकता है!  


Friday, November 9, 2012

दीपक ज्योति नमोस्तुते


पर्व-त्योंहार आखिर किसलिए मनते हैं! इसीलिए ना कि जीवन का उजास, उत्सवधर्मिता का नाद उनमें है। और दीपावली तो है ही उजाले की प्रतीक। सोचिए! अमावस्या के अंधकार को हरने ही तो जलता है, नन्हा सा एक दीप। 
दीप पर्व दीपावली अंतर्मन उजास का संवाहक है। मुझे लगता है भारतीय संस्कृति का यह अनूठा कला पर्व है। इस पर्व पर भीतर का हमारा सर्जक जाग उठता है। दीपावली इसीलिए तो हरेक के मन को भाती है कि इस एक पर्व में कलात्मक सृजन के भांत-भांत आयामों को हम अनायास छू लेते हैं। रंग-रोगन कराते कलाकार नहीं होते हुए भी घर के किसी कोने को अपने भीतर के कलामन से संवारने की दीठ आप मंे अनायास जगती है। गांवों मंे तो दीप पर्व से पहले ही घरों को गोबर से लिपने-पोतने का कला कर्म शुरू हो जाता है। मिट्टी और गोबर का मेल। उसमें हिरमिच और हल्दी का घोल। घर-आंगन में मंडते कलात्मक मांडणे।...और यही क्यों लक्ष्मी पूजा स्थल तक कुकुंम से लक्ष्मी के अलंकारिक पगलियों भी तो मांडे जाते हैं।...दीपकों की जो रोशनी घर-परिवार में होती है वह भी तो मिट्टी के आकर्षक दियों से ही होती है। कुम्हार की चाक से ढले मिट्टी के दीपक पानी से धोकर साफ करते हैं और फिर उनकी खूशबू के साथ यत्र-तत्र सर्वत्र उजास फैलता है।
दीप पर्व में जीवन को आलोकित करने का मंतव्य गहरे से निहित है। आज से नहीं। युग-युगों से। मुअन-जो-दड़ो की खुदाई से इंटो के घरों में दीपक जलाने की परम्परा ज्ञात हुई है और अंधेरी गुफाओं में निर्मित बारीक चित्रों को देखकर भी सहज यह अनुमान होता है कि दीपक तब भी थे। मुझे लगता है, सभ्यता और संस्कृति के अनहद नाद हैं दीपक। पंचतत्वों से एक अग्नि का प्रतीक दीपक। जन्म से लेकर मृत्य के बाद तक की रश्में निभाता दीपक। अंधकार से मुक्ति का आह्वान करता। मर्त्य में अमर्त्य दीपक। 
दीपक अंतर्मन प्रकाश की खिड़की खोलने का संदेश देते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए, वाराणसी जाना हुआ था। काशी की एक सांझ गंगा में नाव में विचरते दीपमालिकाओं से साक्षात् हुआ। लगा, एक साथ पंक्तिबद्ध जलते दीपकों में जीवन की लय को गहरे से अंवेरा गया है। तभी मन में खयाल यह भी आया...अंधेरा नहीं हो तो इस रोशनी को क्या हम इस रूप मंे देख पाते! माने अंधकार में ही प्रकाश की शोभा है।...तो सृजन के लिए जरूरी है अंधकार। दिन के बाद रात न हो तो! यह दीपक ही है जो रात्रि के अंधेरे में अपने होने को जताता जैसे हमें अपने भीतर झांकने का यूं अवसर देता है। बनारस में गंगा आरती के अद्भुत दृश्य में रमते जैसे हम अपने होने की ही तलाश कर रहे थे। नाव पर बैठे गंगा आरती की दिव्यता और भव्यता में ही डूबे थे कि पास ही आ लगी एक और छोटी सी नाव। हाथ में मिट्टी के दीपक और घी से सनी बाती के साथ छोटे-छोटे बच्चे उन्हें खरीद गंगा मंे प्रवाहित करने का आग्रह कर रहे थे। हमने दीपक ले, बाती को प्रकाशित किया। जगमग दीपकों को जब गंगा में प्रवाहित किया तो लगा कुछ अनूठा अनायास ही हो गया है। पंक्तिबद्ध रोशनी बिखरते दीपक थोड़ी देर में ही पानी की एक लहर के साथ हमसे दूर चले गये।...परन्तु उनका उजास!  मन में जैसे अभी भी बसा हुआ है। 
कहीं पढ़ा हुआ, औचक जेहन में कौंध रहा है। निर्वाण समय बुद्ध शांत लेटे हुए हैं। उनका शिष्य आनंद विलाप कर रहा है, ‘हमें छोड़कर क्यों जा रहे हैं! अब कौन करेगा हमारा पथ प्रशस्त?’ बुद्ध के मुंह से निकलता है, ‘अप्प दीपो भव’ माने स्वयं अपना प्रकाश बनो। जलो ताकि आलोकित हो रूप। दीपावली में हम सब यही संकल्प लें। अपनी ज्योति आप बनें। ‘दीपक ज्योति नमोस्तुते।’ 


Saturday, November 3, 2012

...और चले गए साखलकर जी



कला मर्मज्ञ रत्नाकर विनायक साखलकरजी नहीं रहे! यह सूचना आहत करने वाली थी। ललित कला अकादेमी के निमंत्रण पर कला के एक व्याखान कार्यक्रम के अंतर्गत तब वाराणसी में था। सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ। कल की ही तो बात है, इसी स्तम्भ में उनके कला चिंतन पर लिखा था। लगा, कलाओं में रमने, उन्हीं में बसने वाला हमसे यूं दूर कैसे जा सकता है! देह से भले वह चले गये परन्तु उनका कलाकर्म, चिन्तन तो सदा हमारे साथ रहेगा ही।
बहरहाल, भारतीय कला के अर्न्तनिहित में जाते यह साखलकरजी ही थे जिन्होंने कला चिन्तन में सदा ही बढ़त की। भारतीय चित्रकला, मूर्तिकला और तमाम हमारी लोककलाओं को समझ की अपनी दृष्टि दी। पाठ्यपुस्तकों के जरिए शिक्षार्थियों तक कला के सरोकार पहुंचाने का भी बड़ा  उपक्रम किया। हिन्दी में कला की पाठ्यपुस्तकों की बड़ी सीमा यह है कि उनमें अधिकतर पाश्चात्य कला दर्शन का ही रूपान्तरण है। ऐसे में यह साखकरजी ही थे जिन्होंने आधुनिक भारतीय कला को हिन्दी में मौलिक दृष्टि से लिखा परन्तु इस लिखे की कूंत कभी शायद हो ही नहीं पायी। साखलकरजी के साथ तो विडम्बना यह भी रही कि उनका चित्रकार और पाठ्यपुस्तक लेखक उनके कला आलोचक पर सदा भारी रहा। राज्य ललित कला अकादेमी ने चित्रकार के रूप में उन्हें कलाविद् की उपाधि से सम्मानित किया परन्तु कला आलोचना की उनकी दृष्टि का मूल्यांकन शायद सही ढंग से किसी स्तर पर नहीं हुआ। 
याद पड़ता है, हुसैन की भारतीय देवी-देवताओं को लेकर बनायी गयी कुछ आपत्तिजनक कलाकृतियांे को लेकर जब पूरे देश में बवाल मचा हुआ था, साखलकरजी ने उनकी कलाकृतियों के निहितार्थ में जाते तर्क सहित प्रचार की उनकी भूख को पाठकों के समक्ष रखा था। यही नहीं उन्हें पढंेगे तो पाठकों को बार-बार यह अहसास भी होता है कि जो उन्होंने लिखा उसमें कला के भारतीय दर्शन को गहरे से छुआ है। मसलन अजन्ता के कला वैभव, खजुराहो की नग्न प्रतिमाओं पर लिखते हुए उन्होंने शास्त्र, पुराणों के शिल्प मंतव्य भी गहरे से उद्घाटित किए हैं। मंदिरों पर यौन प्रतिमाओं को लेकर उनके भारतीय दर्शन पर जब भी जाता हूं, आनंदकुमार स्वामी का कला चिन्तन भी गहरे से मन में कौंधता है। मंदिरों में नग्न प्रतिमाओं, मिथुन आकृतियों को भारतीय कला में कभी गलत नहीं माना गया, इसलिये कि यह व्यक्ति को कुंठाओं से मुक्त करता है, पवित्रता से पहले कुंठाओं से मुक्ति जरूरी है। साखलकरजी कला के भारतीय दर्शन में जाते विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के साथ ही शिल्पशास्त्र और तमाम दूसरे कला आख्यानों की गहराई को अपने लिखे में जीते। इसी से उन्होंने पाश्चात्य और भारतीय कला का अपने तई सांगोपांग मूल्यांकन किया और भारतीय कलाकारों पर जो लिखा उसमें रंग और रेखाओं की गहराई में जाते कला की सोच को व्यापक परिप्रेक्ष्य में हमारे समक्ष रखा। 
अज्ञेय के कला चिन्तन पर कभी प्रभात प्रकाशन ने वत्सल निधि के तहत हुए व्याख्यानों को संजोते एक पुस्तक का प्रकाशन किया था। परन्तु हाल ही सस्ता साहित्य मंडल ने सुप्रसिद्ध आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन मंे कला पर समय-समय पर लिखी अज्ञेय की टिप्पणियों को प्रकाशित किया है। उससे पता चलता है कि भारतीय कला पर अज्ञेय कितनी गहराई से सोचते थे। निर्मल वर्मा को पढते हैं तो उनके बरते शब्दों में कला ही कला बिखरी दिखाई देती है। क्या ही अच्छा हो, रत्नाकर विनायक साखलकरजी के कला चिन्तन पर एक संपादित पुस्तक ही कोई बड़ा प्रकाशक प्रकाशित करे। हिन्दी में कला आलोचना नहीं होने का रोना रोने वाले आखिर जाने तो सही कि हिन्दी कला आलोचना किस मुकाम पर है!