Friday, August 30, 2013

समय रचती कलाएं


संगीत, नृत्य, चित्र, नाट्य आदि तमाम कलाएं काल के अनंतर अपना अलग समय गढ़ती है। यह है तभी तो उनमें रमते, उनमें बसते बहुतेरी बार यह भी अनुभूत होता है कि यह वह समय नहीं है, जिसमें हम जी रहे हैं। यह तो कला का समय है। तो क्यों नहीं यह प्रस्तावित किया जाए कि समय कलाओं को नहीं बल्कि कलाएं समय को रचती है।

 कुछ दिन पहले राजस्थान विश्वविद्यालय में कलाओं से जुड़े देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापकों के पुन्शचर्या  पाठ्यक्रम में संबोधित करने जाना हुआ था। औचक ही ज़हन में कौंधा, यह कलाएं ही हैं जो काल से परे सौन्दर्य की सर्जना करती है।  

कला क्या है? आकार, रंग, स्पेस का सम्मिलित सौन्दर्य ही तो। ध्वनि का सामंजस्य संगीत का, लय का सामंजस्य कविता का, रंग-रूप का सामंजस्य चित्र का सौन्दर्य है। सामंजस्य का यह संसार ही अपने तई फिर समय की सर्जना करता है।

विचार करें, संध्या पहर कुछ सुन रहे हैं। ध्वनित राग सुबह का है। भोर की अनुभूति होगी। बारिश हो नहीं रही परन्तु मल्हार राग बूंदो से भीगो देता है। यही क्यों! प्रेक्षागृह में नाटक देखते अभिनय में  निहित करूणा अपनी हो जाती है। मन भारी हो जाता है। यही तो है कलाओं का रचा समय। कला-अुनभूति का समय देखने, सुनने के समय का सच हो जाता है। इस समय की तीव्रता इस कदर होती है कि जिस समय में व्यक्ति जी रहा होता है, उसके सच को बदल देता है। इसीलिए संगीत, नृत्य, चित्र, नाट्य को अपने में बसाते हम कला के समय में रूपान्तरित हो जाते हैं।  हम वह नही  रहते जो पहले थे। कला के समय का इससे बड़ा सच और क्या हो सकता है!

प्रश्न हो  सकता है कि फिर आधुनिकता क्या कला का समय नहीं है? आधुनिकता समय नहीं है। विचार है। कुछ अर्थों में तकनीक से जुड़ा विचार। कलाओं पर नियम-अनुशासन  लागू होते हैं परन्तु वे आदेशात्मक नहीं होते। माने तकनीक कला संप्रेषण को सुगम कर सकती है परन्तु वह उसे आदेशित नहीं कर सकती। इसलिए कि कलाएं तो अपना समय स्वयं गढ़ती है। 

हां, इस गढ़न में समाज से जुड़े संस्कार अपने आप ही तकनीक के रूप में जुड़ते चले जाते हैं और हम यह कहने लगते हैं कि समाज में हो रहे परिवर्तनों के समय का असर कला पर भी पड़ता है। ऐसा ही यदि होता तो कलाएं अपने स्वरूप में कार्यप्रेरक नहीं होती। वह भाषाओं, भौगोलिकता और व्यक्ति की सीमाओं से मुक्त नहीं होती। और इन सबके साथ व्यक्ति को रोबोटनुमा बनने से रोकती भी नहीं। यह कलाएं ही हैं जो व्यक्ति को संपूर्णता की ओर ले जाती संवेदना संपन्न किए रखती है। 

व्यक्ति में देखने, विचारने, चीजों और उसके समय को परखने की दीठ देती है। कलाओं का यदि अपना समय नही होता तो क्या संवेदना शून्य होते व्यक्ति स्वयं अपने में ही कभी के गुम नहीं हो जाते। मुझे लगता है, कला का समय समाज का सच रचता है। और इसका प्रभाव सूक्ष्म, अस्पष्ट परन्तु सर्वव्यापी होता है। मानव उसी से संस्कारित होता है। इसीलिए तो देश, भाषा और काल की सीमाओं को लांघती कलाएं संवेदनाओं का हममें वास कराती रोबोट बनने से हमें बचाती है। 

बहरहाल, संगीत एवं नाट्य विभागाध्यक्ष विदुषी  माया टाक और अर्चना श्रीवास्तव के आग्रह पर जब विश्वविद्यालय  में कलाओं पर कुछ बोलने की नूंत मिली तो संकट में था  कि क्या कुछ नया कर पाऊंगा परन्तु लगता है, यह कलाओं के समय में प्रवेश  ही रहा होगा जिससे विचार का वातायन यूं खुल पाया। 


Friday, August 23, 2013

सुरों के रस का सारंगी गान


तत्वाद्य है सारंगी। करूणा, प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, रूदन के साथ जीवन के तमाम रसों का नाद करता वाद्य। मानव कंठ सरीखा आलाप वहां है तो मींड और गमक भी वहां है। मुरकियांे के साथ खटका और तानें भी। माने कंठ से जो सधे, सारंगी उसे सजाए। कोई कह रहा था, अतीत का ‘सारिंदा’ सारंगी बन गया। ‘रावणहत्था’ से भी कोई इसे जोड़ता है। 
बहरहाल, यह जब लिख रहा हूं और पंडित रामनारायण की सारंगी के सुर ज़हन में बस रहे हैं। राग पीलू ठुमरी। सारंगी के स्वरों का जादू तन-मन को जैसे भीगो रहा है। ठुमरी के बोल की आवृतियां करती सारंगी। उल्टे-सीधे, छोटे-लम्बे गज। तानों में एक साथ कई सप्तकों की सपाट तान। सारंगी रच रही है दृश्य की भाषा। ठुमरी के रंग रच गए तो लो अब सारंगी के तारों पर पंडितजी ने राग जोगिया की तान छेड़ दी है। सारंगी जैस समझा रही है असार संसार का सार। राग मुल्तानी, किरवानी, मिश्र भैरवी और राग बैरागी भैरव! अतृप्त प्यास जगाते सारंगी के सुर। निरवता का गान। सब कुछ पा लेने के मोह से मुक्त ही तो करता है यह नाद! सुरों का अनूठा उजास है पंडितजी की सारंगी में। मन के अंदर तक घर करती है सारंगी की उनकी गूंज। सुनते लगता है, बीन और अंग के आलाप के साथ मन्द्र सप्तक से लेकर अतिसार सप्तकों तक वह सारंगी की बढ़त करते हैं। गज चलाना कोई उनसे सीखे! दोनों हाथों की अंगुलियों का संतुलित संचालन। सारंगी बजाते खुद भी वह जैसे खो जाते हैं और सुनने वालों को सुरों के समन्दर की जैसे सैर कराते हैं। एक लहर आती है, दूर तक बहा ले जाती है। दूसरी आती है और जैसे अपने में समा लेती है। भीगोती, पानी के छींटे डालती हुई। ...सच! पंडित रामनारायणजी की सारंगी बजती नहीं, गाती हुई हममें जैसे सदा के लिए बस जाती है।
पंडित रामनारायण जी उदयपुर में जन्में। और फिर बाद में मुम्बई में ही बस गए। सारंगी की शास्त्रीय पहचान का श्रेय उन्हीं को है।  कहें, वह नहीं होते तो सारंगी कब की हमसे विदा ले चुकी होती। पिता नाथूजी बियावत दिलरूबा बजाते पर  पंडितजी ने सारंगी अपनायी। उस्ताद वहीद खां से सुर, लय और ख्याल गायकी सीखी तो धु्रवपद को भी अपने तई साधा। आकाशवाणी में भी रहे पर सारंगी को स्वतंत्र पहचान दिलाने में नौकरी बाधा लगी सो छोड़ दी। वर्ष 1956 में पंडितजी ने मुम्बई के संगीत समारोह में पहली बार एकल सारंगी वादन किया। बस फिर तो देश-विदेश में उनकी सारंगी की धूम मच गयी। उस्ताद विलायत खां के साथ उनका एलपी रिकाॅर्ड आया। सारंगी के सुरों की वर्षा पहले पहल फिल्मों में उन्होंने ही की। याद करें ‘कश्मीर की कली’ का ‘दिवाना हुआ बादल...’ गीत। गीत की धुन में सारंगी के सुरों पर गौर करें। मन करेगा बस उन्हें गुनें। गुनते ही रहें। पंडितजी ने सत्यजीत राय की कुछेक फिल्मों के साथ तपन सिन्हा की ‘क्षुधित पाषाण’ का पाश्र्व संगीत भी दिया है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले पंडितजी जयपुर में थे तो कलाकार मित्र विनय शर्मा और महेश स्वामी के साथ उनसे खुब बतियाया हुआ। लगा, सारंगी में ही नहीं, उनकी बातों में भी अद्भुत रस है। होटल की खिड़की से बाहर झांकते तरण-ताल पर उनकी नजर गयी। उसके कम पानी को देख वह कहने लगे, ‘...स्विमंगपुल में इतना चुल्लूभर पानी है कि कोई आराम से इसमें डूब मरे!’ उनका कहन इतना धीमा, गंभीरता लिये था कि औचक समझ ही नहीं आया। जब समझे तो हंसी के मारे बुरा हाल था। फिर से पंडितजी ने फरमाया, ‘लो...हम तो आपकी इस हंसी पर ही मर मिटे।’ 

Friday, August 9, 2013

लोक संस्कृति का गान

हरिमोहन भट्ट रेखाओ में सौन्दर्य की सर्जना करते हैं। लोक संस्कृति का गान करती उनकी रेखाएं जीवन की उत्सवधर्मी संवेदनाओं का नाद है। उनकी रेखाओं में रंग हैं, रूप है और है संवेदनाओं का आकाश। रेखाओं में सौन्दर्य का अन्वेषण करते भट्ट पारम्परिक प्रशिक्षित कलाकार नहीं है। वह रंगीन बालपोईन्ट पैन से उकेरते हैं रेखाएं। बाल्यकाल में कभी अपने लिखे को सजाने में इस कदर प्रवृत हुए कि बाद में तो उनका बालपोईन्ट पैन रेखाओं का सौन्दर्य संवाह ही बनता चला गया। अपनी कला में राजस्थान की उत्सवधर्मी संस्कृति में बिखरे भांत-भांत के रंगों के वह संवाहक हो गए। लोक संस्कृति में रचा-बसा उनका मन सर्जना में दृश्य ही नहीं बल्कि उसमें निहित संवेदना की बारीकियां की बढ़त करता है।
बहरहाल, कुछ दिन पहले ही हरिमोहन भट्ट के बालपोईन्ट पैन रेखाचित्रों का आस्वाद किया। लगा, रेखाओं में भांत-भांत के रंगों को घोलते वह दृश्य की हमारी संवेदना को ही नहीं बल्कि सुनने के हमारे माधुर्य को भी गहरे से छूते हैं। उनके रेखांकनों का आस्वाद करते सहसा ही राजस्थान के मांडणों की याद आती है। मांडणे सरीखे उनके रेखांकन बारिश के इस मौसम में अपने पंखों से रंगों की छटा बिखरते मोर की याद दिलाता है तो बरसती बूंदों की रिम-झिम के साथ आसमान में उभरते इन्द्रधनुष को भी औचक ही मन मे बसाता है। सांगीतिक आस्वाद कराती उनकी रेखाएं नृत्य करती हुई हममें प्रवेश करती है तो कभी गांव के उस परिवेश से भी हमारा अनायास साक्षात् करा देती है जिसमें मन बनावटीपन से कोसों दूर बस सहज सौन्दर्य का पान करता है। ज़हन में बचपन कौंधने लगा है।  तब शहर की चारदीवारी से दूर बड़ा सा बीकानेर के घर का हमारा आंगन हुआ करता था। आंगन के बीचोबीच उगा खेजड़ी का वृक्ष। त्योंहारों पर कच्चे आंगन पर गोबर पूतता। दादी चाव से आंगन संवारती। गैरू-गोबर से आंगन लीपती। इस लीपे पर फिर मांडणे मंडते। मनभावन मांडणे। मूढ़ से बनी घर की बड़े ओसार की दीवारें भी दादी के हाथों से तब अलंकृत होते देखता। अक्षर ज्ञान से कोसों दूर दादी रेखाओं में सधी माधुर्य की अनूठी लय अवंेरती। 
सोचता हूं, हरिमोहन भट्ट के बालपोईन्ट पैन से बने रेखाचित्र लोक मन में बसे ऐसे अलंकरण ही तो है! इनमें कहीं कोई बनावट नहीं है। जीव-जंतु, फल-फूल, प्रकृति और लोक आस्था के अनगिनत सुर। संवेदनाआंे को जगाते। हमसे बतियाते। इनमें रेखाओं का अद्भुत उजास है तो आत्मिक अनुभूतियां से जुड़े अनगिनत छलकते रसों के संदर्भ भी हैं। मुझे लगता है, लोक संस्कारों के सर्जनषील तत्वों को भट्ट शुद्ध व स्पष्ट रूप में हमारे समक्ष रखते हैं। वह बेल बूटों को इनमें सूक्ष्म उकेरते हैं तो बहुतेरी बार भारतीय शिल्प की गहराईयों में भी ले जाते दिखते हैं। अजन्ता की कलाओं का आस्वद यहां होता है तो मूगल चित्र शैलियों के अलंकरण तत्वों की सूक्ष्म दीठ भी यहां है। राजस्थान की राजपूत-मूगल शैली के साथ ही मिनिएचर तत्वों का अहसास ठौर-ठौर उनकी कला में है। सौन्दर्य से जुड़े मन के भावों के दृष्यों का अपने तई वह  आकाश ही तो रचते हैं! अलंकृत रेखाएं। कहीं कहीं वलयकार रेखाओं में सरल, सीधी रेखाओं का विलोप। मुल्कराज आनंद के शब्द उधार लेकर कहूं तो हरिमोहन भट्ट की बालपोईन्ट पैन  रेखाएं सौन्दर्य की सर्जना में बहुत से स्तरों पर ईष्वर की आषुलिपि है। रंग-बिरंगी रेखाएं मेंहदी सजे गौरी के हाथों की याद दिलाती उत्सवधर्मी हमारी संस्कृति का नाद भी तो करती है। लय का अनुसरण करती एक-दूसरे में समाती। एक दूसरी से ओत-प्रोत होती कब यह सौन्दर्य का आत्मरूप हो जाती हैं, कहां पता चलता है!


Friday, August 2, 2013

टेराकोटा छायाचित्रों का संवेदना आकाश



कलाएं संवेदना की सृष्टि करती है। भावनाओं के अनंत आकाश में व्यक्ति अपने होने को कलाओं में ही तो सार्थक करता है। शिल्प की ही बात करें। कलाकार जब कोई मूरत गढ़ रहा होता है तो वहां मूरत ही प्रधान नहीं होती कलाकार का स्व भी तो रूपान्तरित होता है। पाषाण, धातु और मिट्टी के शिल्प इसीलिए तो देखने वालों को लुभाते हैं कि वहां कलाकार का संवेदन मन भी कहीं निहित होता है। 

बहरहाल, हिम्मत शाह इस युग में मिट्टी के अनूठे सर्जक हैं। खंड खंड अखंड के मूर्तिशिल्पी। माने जो कुछ उन्होंने बनाया है, देखने में केवल वही नहीं बल्कि सर्जना के सर्वांग को हम उनके शिल्प में अनुभूत कर सकते हैं।

यहां उनके जिक्र की वजह यह भी है कि हाल ही उनके टेराकोटा का एक एलबम आया है, जिसमें शिल्प छायाचित्रों में मिट्टी की संवेदना को गुना गया है। टेराकोटा ऐसे जिन्हें देखा ही नहीं स्पर्श करके भी उनकी सर्जना को अनुभूत किया जा सकता है। कागज उभरे रंगीन चित्रों को स्पर्श करेंगे तो मिट्टी का भूरभूरापन, उसकी खुदाई, पक्काई के साथ शिल्प सर्जना जैसे आपके समक्ष जीवंत हो उठेगी। जो कुछ उन्होंने गढ़ा उस श्रेष्ठ की बानगी है उनका टेराकोटा एलबम, ‘टेराकोटा बाय हिम्मत शाह’।

लकड़ी के बोर्ड की जिल्द और उसमें आवरण पर गोल डिस्कनुमा कला। इस गोल में फिर से एक गोल। मिट्टी की छोटी सी मूरत। इस पर स्वयं हिम्मत शाह का लिखा अपना नाम। इसके बाद पृष्ठ खोलेंगे तो उनके स्कल्पचरं नजर आएंगे। एक नहीं पूरे 288 पन्नों पर मंडे स्कल्पचर के रंगीन चित्र। शिल्प के चित्र भर नहीं बल्कि उसमें निहित माटी से जुड़ी संवेदना भी। हाथ से स्पर्श करेंगे तो संवेदना से साक्षात् होगा। शिल्प का दृश्य ही नहीं स्पर्श रूपान्तरण। 

मिट्टी से अपनापा रखते भांत-भांत के रूप हिम्मत शाह ने गढ़े हैं। वह मिट्टी को मथते, उसे पकाते और फिर उसी में बसते रूप की अनथक यात्रा कराते हैं। गौर करेंगे तो पाएंगे उनकी मृण कला में राजस्थान के गांव, मरूस्थल, देवरे और ग्रामीण सभ्यता के चिन्ह भी बहुत से स्तरों पर हैं। मंदिरों है तो उस पर लहराती ध्वजा भी। दीवार है तो उससे जुड़ स्पेस भी। पाबूजी और दूसरे लोकदेवताओं के थान भी हैं। गांव के लोगों द्वारा इस्तेमाल में ली जाने वाली वस्तुएं हैं-पर यह सब वैसे ही नहीं जैसे कि दिखते हैं बल्कि इन सबका कुछ-कुछ आभास हैं उनका शिल्प कर्म। इसलिए कि वहां अर्थ का आग्रह नहीं है। इसीलिए जो कुछ जीवंत एलबम में रखा है, वहां कहीं कोई शीर्षक नहीं है। 

बहरहाल, ‘टेराकोटा बाय हिम्मतशाह’ का आस्वाद करते कबीर की साखी ‘माटी एक रूप धरी नाना’ ज़हन मंे कौंधती है।  कबीर के कहे को मूर्तिशिल्पों में जीवंत आप यहां देख सकते हैं, स्पर्श से अनुभूत कर सकते हैं। वहां बोतलें हैं, पेड़ के तन्ने हैं, गांव का हैडपंप सरीखा कुछ है तो हुक्का जैसा भी कुछ है पर कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे ठीक से हम शब्दों से व्यंजित कर सकंे। कोई अर्थ दे सकें। 


माने आप रूप के अर्थ और उसके भीतर के अर्थ तलाशते रहेंगें। एक बार देखने के बाद बार-बार देखे को देखना चाहेंगे। यही उनकी कला की विशेषता है। वह मिट्टी से जो गढ़ते हैं उसमें हमारा यह जीवन स्पन्दित होता है। मुझे लगता है, कागज पर शिल्प की स्पर्श संवेदना की ‘टेराकोटा बाय हिम्मत शाह’ अनूठी कल्पना है। 

एक साथ हिम्मत शाह के अद्भुत शिल्पों का आस्वाद करना हो तो, इससे आपको गुजरना होगा। मिट्टी की जीवंत मूर्तियों का संग्रह। लगेगा, कागज के पन्नों से हेाते हुए माटी षिल्प की किसी सभ्यता में हम प्रवेष कर गए हैं। इस सभ्यता में देवराज डाकोजी, ज्योति भट्ट, कुमार शाह, राघव कनेरिया, रघुराय, रवि शेखर, शेलन पार्कर के हिम्मत शाह के बनाए शिलप छायाचित्रों का कला आस्वाद भी अवर्णनीय है। हिम्मत शाह ने यह जीवंत शिल्प अपने मित्र रामूकाटकम को समर्पित किए हैं।


Friday, July 26, 2013

घूमर रमवा नै जावा दै...


लोक जीवन के ताने-बाने में ही गूंथी हुई है तमाम हमारी लोक कलाएं। संस्कृति के बीज बिखेरती। लोकगीत, नृत्य किसी एक जनपद का नहीं है, थोड़े बदलाव के साथ उसके सरोकार हर ओर मिलेंगे। घूमर ऐसा ही लोकनृत्य है। मूलतः राजस्थान का पर अब प्रांतीय सीमाओं से परे विष्वभर का। हाल ही एक अन्र्तराष्ट्रीय ट्रैवल पोर्टल ने दुनियाभर के जिन दस श्रेष्ठतम नृत्यों को परखा है, उसमें ‘घूमर’ को चैथा स्थान मिला है। राजस्थान की कला और संस्कृति का विष्व बिगसाव यही तो है!
बहरहाल, घूमर लोक संस्कारों से सिंचित नृत्य है। लोक से जुड़े समाज के सनातन मूल्यों को अंवेरता। घूमर माने घूमना। गोल वृत्ताकार में घूमते हुए किया जाने वाला लोक नृत्य। समूह की सर्जना। रूप विन्यास, भाव सौन्दर्य और पद कर संचालन, थिरकन की विविधता का अद्भुत नृत्य। प्रांजल मनोभावों की सुमधुर परिणति। एक ही स्थान पर घूमने की भ्रमर गति भी घूमर में है तो आगे-पीछे, दांए-बाएं नृत्य का सांगोपांग विस्तार भी है। पाष्र्व ध्वनियां की बजाय समूह पदचाप, स्वयं नृत्यांगनाओं का गान और गर्दन एवं नेत्रों का लयबद्ध संचालन। गाते हुए बोलों में नृत्यांगनाएं जैसे रम जाती हैं। गति में इसीलिए वहां भावानुरूप मंद और तेज प्रभाव स्वयमेव होता है। गीत और नृत्य में कोई भेद नहीं। नृत्य होगा तो घूमर गीत होगा और घूमर गीत होगा तो नृत्य होगा ही। कहें, अकेले घूमर या उसके गीत का कोई महत्व नहीं। 
घूमर का एक नृत्य गीत है जिसमें अविवाहित कन्या अपनी मां से कहती है मुझे फलां जगह, फला जाति मे मत ब्याहना। इसके साथ ही वह कारण भी बताती है। फिर कहती है चाहो तो वहां दे देना। इस कहन में वह लोगों और वहां के भौगोलिक परिवेष की तमाम विषेषताओं को उघाड़ती चली जाती है। गुण-दोषों के साथ। ऐसे ही ‘करियो’ में ढोला-मरवण में उस ऊंट की कहानी है जो ढोला को मरवण के पास ले गया था। घूमरें और भी हैं, उन पर जाएंगे तो न जाने कितने पन्ने भर जाएं पर कथ्य की नृत्य परिणति में जिस सौन्दर्य की सर्जना घूमर में होती है, वह किसी और में कहां! मुझे लगता है, नारी सौन्दर्य के शास्त्रगत आख्यानों का साकार है घूमर। कमर की लचक के साथ नाचने को सुजला। तीव्रतम गति का घेरदार घुमाव तो घूंघट के सौन्दर्य भावों का दर्षाव भी। नृत्य में घाघरे के दोनों कोनों को पकड़ पालनी मुद्रा जब नृत्यांगना अपनाती है तो लगता है मयूरी मगन हो नाच रही है। एक बार चारों ओर घूमने से घाघरा वृत्ताकार मे फैल जाता है। एक स्थान पर रहते हुए अंग प्रत्यंगों का तब जो संचालन नृत्य में दिखाई देता है, उसे चाह कर भी शब्द कहां बंया कर सकते है! घुमना तीव्रगति में भी और मंद गति में भी। कभी होले-होले मुंह से निकलते बोलों में पैरों की थिरकनभर। पग कर संचालन में एक ताल स्वयं पैदा होती है। माने ताल नृत्य में ही है, बाहर नहीं। अर्थगर्भित सौन्दर्य भावों की गमक। धीरे-धीरे घूमर तेज होती है और तब औचक लगता है, आंखे किसी शास्त्रीय नृत्य का आस्वाद कर रही है। सच! घूमर है ही लोक की शास्त्रीय अभिव्यंजना।  प्रकृति की गति से संगति। नृत्य नहीं साधना। नख-षिख अवयवों का मेल। 
याद पड़ता है, बचपन में स्टेडियम में विद्यालयी छात्राओं का घूमर देखने जाते थे। बीकानेर भर के तमाम विद्यालयों की छात्राओं का उसमें प्रतिनिधित्व होता। पूरा स्टेडियम घूमर के रंग से रंग जाता। तन-मन में तब अद्भुत सौन्दर्य छटा वास करती। धीरे-धीरे संस्कृति का यह चास बास भी लोप होता चला गया। घूमर अवसर-विषेष की औपचारिकता भर रह गया। हां, वीणा समूह के के.सी. मालू ने ‘घूमर’ को अपने तई फिर से जीवंत किया। लोक की सहज धुनों से बगैर किसी छेड़छाड़ करते। भले व्यावसायिक उद्देष्य से ही सही, ‘घूमर’ के सौन्दर्य को उन्होंने अपने डिटिलाईजेषन तकनीक से विष्वजनीन तो किया ही है!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़"  में प्रति  सप्ताह  प्रकाशित होने 
वाला स्तम्भ "कला तट" (दिनांक 26 जुलाई 2013) 
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/1397426


Friday, July 19, 2013

संस्कृति, संस्कार और कलाएं


नाट्यशास्त्र यानी तौर्यत्रिक ग्रंथ। नाट्य के साथ गायन, वादन और नृत्य का मेल। भरतमुनि रचित नाट्यशास्त्र और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के परिप्रेक्ष्य में कलाओ के अन्र्तसंबंधों पर बहुत से स्तरों पर निरंतर चर्चा होती रही है। आखिर मनोरंजन का बड़ा आधार हमारी यह कलाएं ही तो हैं। मनोरंजन माने मन को रंजित करना। मन का रंगना।  बड़ी बात यह है कि मनोरंजन के कला पक्ष को उससे जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों से कैसा देखा जाए? भाषा के स्तर पर विचारें तो संस्कृत इसका बड़ा आधार हो सकती है। इसलिए कि मनोरंजन की जो विधाएं समाज में पुष्पित और पल्लवित हुई हैं, उनके पीछे कलाओं का ही मजबूत आधार रहा है। 
कहानी कहना भी तो एक कला है। विष्णु शर्मा रचित ‘पंचतंत्र’ को ही लें। ‘पंचतंत्र’ में कहानियां है पर कहन की कला का सौन्दर्य भी है। कुशल पारंगत गुरू मूढ शिष्यों को भी विवेकवान बना सकता है, यही इन कथाओं का आधार है। मूर्ख राजपुत्रों को जीव जंतुओं की कथा के जरिए नीति के महत्वपूर्ण संदेश इसमें दिए गए हैं। साहित्य के साथ मनोरंजन से जुड़ी कलाओं ने ही हमारी संस्कृति को बहुत से स्तरो ंपर समृद्ध किया है।  मसलन आज की पहेलियों को ही लें। कभी दरड़ी ने ‘काव्यादर्श’ में सोलह प्रकार की प्रहेलिकाएं बतायी थी। कहते हैं उसी से बाद में खुसरो ने ‘बूझ पहेली’ और ‘बिन बूझ पहेलियां’ गढ़ी। संगीत की बात करें ंतो धु्रवपद में ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ जैसे निर्थक शब्द भी कुछ इसी तरह से आए। कहते हैं अमीर खुसरो जब भारत आए तो उन्हें ध्रुवपद की भारतीय परम्परा बहुत भायी पर इसमें संस्कृत के श्लोकों को देख वह घबराए। खुसरो अरबी विद्वान थे। उन्होंने धु्रवपद में निर्थक शब्द ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ गढ़ कर तरह-तरह के हिन्दुस्तानी राग गाए। यही बाद में तराने हुए। 
मुझे लगता है, संस्कृित का अभिजात दक्षिण भारत के कलात्मक रूप में ही तो परिणत हुआ है। संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि दक्षिण की समृद्ध कलाएं संस्कृत से ही शास्त्रीय हुई। आधुनिक मनोरंजन विधाओं का बहुत से स्तरों पर संस्कृतिकरण बाद में इन कलाओं ने ही किया। परन्तु बड़ी विडम्बना यह भी है कि आज के दौर में मनोरंजन का अर्थ पूरी तरह से हास्य से लिया जाने लगा है। सोचिए! हंसना ही क्या मनोरंजन है? हास्य मनोरंजन के एक पक्ष की स्थूल अभिव्यक्ति जरूर है पर यह पूरी तरह से मनोरंजन तो नहीं ही है। टीवी चैनल इधर यही कर रहे हैं। हंसाने के नाम पर दर्शकों को वहां निरंतर भोंडापन परोसा जा रहा है! माने वक्ट काटना है। कैसे भी कटे परन्तु वक्ट काटना क्या मनोरंजन है? वक्ट काटने के अर्थ में ही यदि मनोरंजन लें तो उसका परिणाम मन में उपजे क्षोभ, विषाद से अतिरिक्त कुछ न होगा। वक्ट कटे पर भौंडेपन से उपजे हास्य से नहीं, इस तरह से कि वक्ट से व्यक्ति ऊपर उठ जाए। मनोरंजन हो पर मन को रंजित करता। स्वस्थ मनोरंजन। कलाएं यही करती है। मन उनसे रंजित ही नहीं होता, सृजन के लिए निरंतर प्रेरित भी होता है। 
नाट्य, नृत्य, संगीत के ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक संदर्भ है। इन संदर्भों में जीवनानुभूतियां है। संस्कार हैं और है हमारी संपन्न संस्कृति का आधार। सोचिए! सांस्कृतिक संदर्भ खोकर आखिर कोई समाज कैसे आगे बढ़ सकता है! कालिदास ने रंगमंच को ‘चाक्षुस यज्ञ’ की संज्ञा दी थी। जयपुर में कुछ समय पहले के.एन. पणिक्कर के निर्देशित नाटकों का महत्ती समारोह हुआ। तभी उनके निर्देशन में कालिदास रचित ‘मालविकाग्निमित्र’ का आस्वाद किया था। ‘मालविकाग्निमित्र’ में नृत्य रस का जो बखान है, उसके संदर्भों से मुक्त होकर कलाओ की हमारी समृद्ध संस्कृति की चर्चा क्या की जा सकती है! 

Friday, July 12, 2013

रेखाओं में नदी संस्कृति का इतिहास


दृष्य अभिव्यक्ति का प्रभावी रूप है रेखांकन। बहुतेरी बार रेखाएं जो आकार ग्रहण करती है उनमें भले ही सब कुछ स्पष्ट नहीं होता फिर भी वहां दृष्य की अनंतता में सौन्दर्य छवियों को अनुभूत किया जा सकता है। माने कोई एक दृष्य नहीं उससे जुड़ा तमाम परिवेष वहां उद्घाटित होता है। मुझे लगता है, थोड़े में बहुत कुछ कहने का प्रभावी कला माध्यम है रेखांकन। स्मृतियों को दृष्य में रूपान्तरित करती रेखाएं कला में अनंत की खोज ही तो है। 
बहरहाल, अमृतलाल वेगड़ नर्मदा पद यात्राओं के शब्द सर्जक ही नहीं है बल्कि  रेखाओं के अद्भुत सौन्दर्य सृष्टा भी हैं। अभी बहुत समय नहीं हुआ, भोपाल में एक आयोजन पर जब उन्होंने नर्मदात्रयी की अपनी पुस्तकें भेंट की तो उनके रेखांकनों पर भी गहन संवाद हुआ। बाद में जब रेखाओं में उकेरे उनके पदयात्रा सौन्दर्य चितराम पर गया तो लगा,  नर्मदा और उसके तट पर बसे लोगों के सार्थक और जीवंत चित्रण उन्होंने रेखाओं से किए हैं। प्रकृति, व्यक्ति और क्षणों के दृश्यों में वह रेखाओं का सांगीतिक आस्वाद कराते हैं। उनके रेखांकनों की बड़ी विषेषता यह है कि वहां जनजीवन के बाह्य रूप की अपेक्षा उससे जुड़ी संवेदना के साथ जीवन से जुड़े सत्यों का अन्वेषण है। माने अपने रेखांकनों में उन्होंने नदी और उसके तट पर बसे लोगों का सांस्कृतिक इतिहास लिखा है। रेखाओं में संस्कृति का इतिहास आसान नहीं है। वही लिख सकता है जिसे संस्कृति के सूक्ष्म पहलुओं को अंवेरना आता हो। वेगड़जी इसे बखूबी करते हैं। संस्कृति, लोक संस्कृति और जीवन से जुड़े उसके संस्कारों की वह गहरी सूझ रखते हैं। इसीलिए तो अपनी नर्मदा पद यात्राओं में प्रकृति, व्यक्ति और वस्तुओं का सत्यान्वेषण कला की अपनी दीठ से उन्होंने किया है। मसलन यात्रा की एक स्मृति में छोटी पहाड़ी के एक दृष्य में रमते वह उसे पेपरवेट की संज्ञा देते हैं। उनका दृष्य वर्णन देखें, ‘...सारा दिन उस पहाड़ी पर रहे। उसका लघु आकार उसे एक विषेष जीवन्तता प्रदान करता था। यह पहाड़ी पेपरवेट जैसी लग रही थी। आस-पास के खेत कहीं उड़ न जाए, इसलिए उन पर रखा पहाड़ी पेपरवेट!’ 
दृष्य से साक्षात् और फिर उसकी यह अभिव्यंजना कला में डूबा कोई ऋषि ही कर सकता है। वेगड़जी इस दृष्टि के कलाऋषि हैं। उनका चित्रकार मन प्रकृति में रंगों की तलाष करता एक स्थान पर लिखता है, ‘...हरे रंग का तो समुद्र है चारों ओर। हरे रंग के कितने अखाड़े हैं! खेतों का हरा अलग। धान का खेत हरे रंग का जूना अखाड़ा है। रमतीला का पीला तो मुझमें अजीब सी उत्तेजना भर देता। उनके पीले खेतों से चलता तो लगता मैं वान गाॅग के खेत में ही जा रहा हूं।’ 
प्रकृति और जीवन के शब्द कहन की उनकी यह दृष्य लय ही उनके रेखांकनों समृद्ध करती रही है। नदी के साथ उससे जुड़े तमाम परिवेष को रेखाओं में सूक्ष्म दीठ देने वाले वह अद्वितीय कलाकार हैं। इसीलिए तो नर्मदा में कपड़े धोते, नर्मदा में स्नान करते, नर्मदा के पानी से सूर्य को अर्ग देती स्त्रियों के साथ ही वहां के पक्षी, वहां की धरा का सौन्दर्य उनकी अल्प उकेरी रेखाओं में भी पूर्णता के साथ अभिव्यंजित हुआ है। पदयात्रा से सृजित एक रेखाचित्र में मंडला से अमरकंटक के किसी दृष्य का रेखांकन है। चंद रेखाओं में उकेरी गयी पहाडि़यां। बल खाती नदी।...और उसका बहाव। रेखांकन नहीं रेखाओं की यह रूप गोठ है। माने कोलाज। 
  नदी और तट पर बसे लोगों की सभ्यता ऐसे ही उनके हर रेखांकन में बसी है। व्यक्ति रेखांकनों में वह संस्कृति का अनहद नाद करते है। यह ऐसे हैं जिन्हें देखते लगता है, आदिवासी समाज और उससे जुड़े संदर्भों की अनंत यात्रा पर हम निकल पड़े हैं। कुछ चित्र है जिनमें नदी में नहाने के बाद अपनी धोती सूखोती आदिवासी स्त्री, सर पर बोझा रखे चलती स्त्रियां, ताप सेकते-बतियाते, घर के आंगन में मांडणे लिपती औरतें हैं।... कहूं, नर्मदा पद परिक्रमा के उनके रेखांकन स्वयं में एक स्वायत्त कला रूप है। 


Friday, July 5, 2013

सौन्दर्य की शिल्प सर्जना

कलाएं जीवन की उत्सवधर्मिता का नाद हैं। कहें, यह कलाएं ही हैं जो मानव मन की एकरसता को तोड़ उसमें आनन्द रस उपजाती है। आखिर हमारा यह जीवन कलाओं के उजास से ही तो स्पन्दित है।  शिल्पकला में शिल्पी  सौन्दर्य को अपने तई गढ़ता ही तो है। रूपाकारों की उसकी गढ़न यथार्थ का अंकन भर ही नहीं होती बल्कि उसमें परिवेश से जुड़ी सोच, संवेदना को भी गुना और बुना जाता है। इसीलिए तो मूर्ति में निहित विषय ही महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि उसके गढ़न तत्वों की सौन्दर्य सर्जना का आस्वाद भी मन को बहुतेरी बार स्पन्दित करता है। 
बहरहाल, रूपाकार में ही क्यों  शिल्प में निहित गढ़न तो अमूर्त में  भी स्मृतियों में अनन्त काल तक बसती ही है। यह जब लिख रहा हूं, देश के प्रख्यात कलाकार अनिलकुमार के उकेरे  शिल्प स्मृतियों को जैसे झंकृत रहे हैं। कुछ दिन पहले भोपाल में जनजातीय संग्रहालय के उद्घाटन अवसर पर उनके मूर्तिशिल्पसे साक्षात् हुआ था। लगा, यह वह मूर्ति शिल्प नहीं है जिसका पहले कभी आस्वाद किया था।  शिल्प का यह नया आकाश हैं। ऐसा जिसमें वस्तुओं से अधिक उसका अर्थ हममें बसता है। सोचता हूं, सौन्दर्य का अर्थ आस्वाद ही तो लिए है अनिलकुमार का तमाम  शिल्पकर्म। 
अनिलकुमार ने भोपाल के जनजातीय संग्रहालय की स्थापना में महत्ती योगदान दिया है। वहां प्रदर्शित  शिल्प के बहुत से स्तरों पर वह संवाहक रहे हैं परन्तु स्वयं उनका  शिल्प भी तो अद्भुत है। कहें, स्टोन-स्टील में वह मूर्ति शिल्प देखने की हमारी एकरसता को तोड़ते हैं। देश  के वह चुनिंदा ऐसे कला शिल्पी  हैं जिन्होंने अपने अद्भुत रूपाकारों के कलाकर्म में सौन्दर्य के मर्म को गहरे से छुआ है। उनका  शिल्प संसार हमें  निर्माण के अपूर्व  में ले जाता है। ऐसे संसार में जिसमें मार्बल, ग्रेनाईट, जैसलमेर सैण्ड स्टोन के साथ स्टेनलेस स्टील में देश -काल-परिवेश  अभिव्यंजित हुआ है। मूर्ति शिल्प की प्रचलित परम्पराओं से इतर रोजमर्रा के जीवन में बरती जाने वाली वस्तुओं से प्रेरणा ले उसमें वह कलात्मकता का नया इतिहास रचते हैं। धवल मार्बल का उनका एक शिल्प आंखों में बस रहा है। मार्बल की विषिष्ट गढ़न। इसमें स्टेनलेस स्टील की रोपी हुई कीलें। कहीं भी इसे रखेंगे-छाया के अद्भुत लोक से साक्षात् होगा। ऐसे ही हरे ग्रेनाईट में सर्जित कल्पनाओं के आकाश  में नारियल के टूकड़ों सरीखा पात्र। इस रूपाकृति में स्टील के आभुषण। देखते हुए मन करता है-रूप को सदा के लिए आंखों में बसा लें। जैसलमेर के सैण्ड स्टोन की एक रूपाकृति की उनकी गढ़न में प्रयुक्त स्टील की गोलियां और उनमें प्रतिबिम्बित दृष्य। अद्भुत सौन्दर्य! और ऐसे ही हरे ग्रेनाईट, सैण्ड स्टोन की मूसली सरीखी आकृति में रखा वृत्ताकार स्टील का पारदर्शीपन । अनीष कपूर के स्काई क्लाउड की भी औचक ही यहां याद आती है। ऐसे ही एक और ग्रेनाईट-स्टील शिल्प में चांद सरीखी आकृति का रचाव सौन्दर्य के अपूर्व संसार में ले जाता है। 
मुझे लगता है, आकारों के सरलीकरण में अनिल रेखाओं की लय अवेंरते  हैं। प्रदर्शित रूप से अधिक उसका आशय वहां महत्वपूर्ण है। कहें वह अर्थगर्भित शिल्प के सर्जक हैं। पत्थर और स्टील के संयोग से वह जो गढ़ते हैं उनमें गजब का छाया प्रवाह है। माने उनके शिल्प को कहीं रखेंगे तो उसका सौन्दर्य उसके पड़ रहे छाया-प्रभाव में भी औचक महसूस होगा। रेखाचित्रों की मानिंद उनमें गतिमय दिशाओं  का अंकन जो है! लहराती, एक दूसरे में विलीन होती रेखाएं। उनके शिल्प में स्थापत्य है  नाट्य भंगिमाएं हैं और है सांगीतिक लय। सोचता हूं, सभ्यता का हमारा इतिहास पाषाण  रचित शिल्प से ही तो जुड़ा है!  इस दीठ से अनिलकुमार गढ़न का सौन्दर्य इतिहास ही तो लिख रहे हैं। आयताकार, चैकोर में वह खंड-खंड सौन्दर्य की सर्जना करते हैं!

Friday, June 28, 2013

रंगकर्म अनुभूतियों के दृष्यालेख

प्रदर्शनकारी कलाओं में रंगकर्म आरंभ से ही हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। इसीलिए अथर्ववेद, सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद के साथ ही पांचवा वेद नाट्यषास्त्र कहा गया है। 
संस्कृत ने नाट्य की हमारी परम्परा को निरंतर समृद्ध किया परन्तु अब जब इस भाषा के संस्कार ही हम भुलाते जा रहे हैं, संस्कृत नाटकों का मंचन कहां से हो! हां, केरल में कूडिआट्टम से़ संस्कृत नाटकों की परम्परा जरूर कुछ आगे बढ़ी। कावलम नारायण पणिक्कर इधर संस्कृत की समृद्ध नाट्य परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। रवीन्द्र मंच पर पिछले दिनों ‘रंग पणिक्कर’ समारोह के तहत पणिक्कर के रंगकर्म अवदान को गहरे से अनुभूत किया। इससे पहले उनके बारे में पढ़-सुन भर रखा था परन्तु जब उनके निर्देषन में नाटकों का आस्वाद किया तो लगा भारतीय रंगकर्म की वह अपने तई पुनःसृष्टि करते हैं। अपने अद्भुत रंग प्रयोगों के जरिए। इन प्रयोगों में परम्परा है परन्तु उसमें लोकधर्मिता की सहज छोंक भी है। इसीलिए रंगकर्म की उनकी दृष्टि में रस की अपूर्व व्यंजना हैं। संस्कृत नाट्य रचनाओं ‘मालविकाग्निमित्र’, ‘मध्यमव्यायोग’, ‘कर्णभारम्’ और ‘उत्तररामचरितम्’ की उनकी मंच प्रस्तुतियां विरल है। रंग परिकल्पना के अंतर्गत दृष्य के साथ अदृष्य की सत्ता से वह अनायास ही साक्षात् कराते हैं। अपने नाटकों में वह दर्षकों को स्मृतियों के दृष्यालेख बंचवाते हैं। भवभूति रचित ‘उत्तररामचरितम्’ की उनकी नाट्य प्रस्तुति को ही लें। यह राम के राज्याभिषेक के बाद सीता निर्वसन और फिर से मिलन की कथा है। रामायण की मूल कथा दुखान्त है परन्तु भवभूति की सुखान्त। पणिक्कर के रंग निर्देषन में नाटक और नाटक के भीतर एक और नाटक जीवंत हो जैसे देखने वालों से संवाद करता है।
संयोग देखिए! भवभूति के इस नाटक का 1913 में सत्यनारायण कविरत्न का किया अनुवाद मिलता है। इस वर्ष जब उनके किए इस कार्य के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं कवि, कथाकार उदयन वाजपेयी के लिखे आलेख में इसे मंच पर देखने का सुयोग हुआ। वाजपेयी ने संप्रेषण की दीठ से भवभूति के कथ्य को अपने तई गुना और बुना है। अभिव्यक्ति की पारम्परिक परन्तु जीवंत परम्परा के साथ।
बहरहाल, मलयालम कलाकारों की संवाद भाषा से नाटक भले ही मुक्त नहीं हो पाया परन्तु यह खलता नहीं बल्कि नाटक को और अधिक रमणीय कर देता है। पणिक्कर की रंग दृष्टि भाषीय जड़ताओं से मुक्त जो है! कहें वह रस के रंगकर्म सर्जक हैं। नाट्य चरित्रों के भावाभिनय के साथ उनकी स्थिति, गति और प्रयुक्त पाष्र्व ध्वनियोें में वह दृष्य के अद्भुत अर्थ संकेत देते हैं। ‘उत्तररामचरितम्’ अनुभवातीत भव्यता लिए है। रंग षिल्प ऐसा जिसमें कलाकार दृष्यमय होता अदृष्य को भी बहुतेरी बार जीने लगता है तो अदृष्य होता दृष्य का अहसास कराता है। अपने आंतरिक समय को जीते हुए। 
नाटक के एक दृष्य में वन देवी वासंती राम के ठीक पीछे आती कहती है, ‘मैं तुम्हारा पीछा करता प्रष्न हूं।’ भले वह यहां दर्षकों को सदेह दिखाई देती है परन्तु प्रष्न रूप में उसका अदृष्य ही अनुभूति में बसता है। पणिक्कर रंगकर्म के अंतर्गत नाटक के कथ्य के साथ उसके परिवेष को भी गहरे से जीते हैं। इसीलिए तो पात्रों की वेषभूषा, अंग संचालन और संवाद के समानान्तर वह परिवेष के अर्थ संकेत गहराई से रचते हैं। पाष्र्व ध्वनियां के साथ पात्रों का मंद गति से तैरते हुए से प्रवेष। बहुत अधिक ताम-झाम नहीं। मंच से जुड़ी मोहक कल्पनाएं दृष्य अनुभव का अद्भुत सौन्दर्य से साक्षात् कराती। काव्य, संगीत और चित्रकला का भी वह अपने रंगकर्म में भरपूर उपयोग करते हैं। सच! उनके नाट्यकर्म का आस्वाद संवेदना के मर्म में उतरते हुए दृष्य से जुड़ी अनगिनत रंग अनुभूतियों से साक्षात् होना ही तो है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक 28-6-2013, आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं-

Friday, June 21, 2013

कला प्रदर्शनियों के सरोकार


कला का सौन्दर्य सत्य का स्वरूप है। वहां सौन्दर्य की हरेक में अलग-अलग प्रतीती होती है। मुझे लगता है, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकलाएं देखने के समय से ही जुड़ी हुई नहीं है, उनका सत्य हमारी स्मृतियों से भी जुड़ा है। कहें, यह कलाएं ही हैं जिनका सौन्दर्य देख-सुन कर ही महसूस नहीं किया जाता बल्कि स्मृतियों में भी सदा स्पन्दित करता है।
बहरहाल, अभी बहुत समय नहीं हुआ ख्यात कला क्यूरेटर अलका रघुवंशी से साक्षात् हुआ था। कला प्रदर्शन में अलका ने कुछ नए प्रयोग किए है। ख्यात कलाकारों की कलाकृतियों को क्यूरेट करते वह उनमें रमती है, बसती है। परम्परा के साथ आधुनिकता के नए कला संदर्भ जोड़ते हुए। इसलिए भी कि समकालीन कला जीवन से गहरे से जुड़े। आधुनिक कला को दैनिन्दिनी जीवन से जोड़ने के तहत आयोजित ‘अहसास’ प्रदर्शनी का आस्वदा करते कलाओं के अन्र्तसंबंधों को भी जैसे गहरे से जिया। संवाद हुआ तो कहने लगी, ‘यह सही है कि क्राफ्ट ने जिन्दगी को खूबसूरत किया है परन्तु सामयिक कला भी जिन्दगी को हसीन कर सकती है। इसीलिए मैंने ‘एहसास’ के तहत आधुनिक कला को दैनिन्दिनी जीवन से जुड़े परिधानों से जोड़ने का उपक्रम किया। यह जो प्रयोग था उसमें नर्तक, संगीतकार, कलाकार सभी जुड़े और इसी से यह सार्थक हुआ।’ अलका जब यह कहती है तो कलाओ के उनके बहुआयामी सरोकारों पर सहज ही मन जाता हैं। लोक कलाओं से लेकर शास्त्रीय कलाओं में उनकी गहरी पैठ हो है!
अलका की उपस्थिति कलाकृतियों के प्रदर्शन के बहाने बढ़ते क्यूरेटरों की भूमिका पर भी सवाल उठाती है। सवाल यह भी उठता है कि कलाकारों की कलाकृतियां कलादीर्घाओं में निंरतर प्रदर्शित हो रही है परन्तु स्मृतियों में इनमें से बहुत थोड़ी ही क्यों बसती है? शायद इसलिए कि वहां क्यूरेटर कलाओं के प्रदर्शन की व्यावहारिक सोच से नहीं जुड़ा होता।  अलका की भूमिका इस संबंध में महत्वपूर्ण है। वह देश की पहली प्रशिक्षित महिला कला क्यूरेटर है। गोल्डस्मिथ काॅलेज, लंदन और आॅक्सफोर्ड के म्यूजियम आॅफ मोर्डन आर्ट से दक्ष अलका ने इसीलिए भारतीय कलाओं को भिन्न आयामों में प्रदर्शित करने की भी अपने तई पहल की है। स्वयं भी वह कलाकार है। रंगो और रेखाओं की अद्भुत लय अवंेरती कलाकार। इसीलिए क्यूरेटर के रूप में उनके किए कार्य को खासतौर से याद किया जाता है। कलादीर्घाओं में कलाकृतियों के  प्रदर्शन को वह चुनौतीपूर्ण कार्य मानती है। कहती है, ‘कला प्रदर्शनी में क्यूरेटर की भूमिका का अर्थ यही थोड़े ना है कि आप कलाकार से कलाकृतियां ले लें और उनका प्रदर्शन कर दें। क्यूरेट करने का अर्थ है दृश्यात्मकता को क्रिएट करना। कलाकृतियों में ंजो दिख रहा है, उसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए कलाकृतियां का मेल करना। उनकी संबद्धता करना। इसी से शो में नूतनता आती है। यह जरूरी नहीं है कि एस्थेटिक सेंस हर लेखक में हो ही। है भी तो यह जरूरी नहीं है कि आप दृश्य को देखने वालों के अनुरूप नूतन करते हुए कलाकृतियां को हर आम और खास से साझा कर सकें। करना और सोचना अलग है।’ 
अलका के इस कहे में जाते हुए ही याद करता हूं, कलादीर्घाओं में प्रदर्शित वह कला प्रदर्शनियां भी जिनमें असंबद्ध दृश्यों की कलाकृतियां एक साथ मिली बहुत से सवाल पैदा करती है। सच ही है! किसी कलाकार की कला प्रदर्शनी क्यूरेट करने का अर्थ है, कलाकृतियों की प्रासंगिकता में जाना। उनकी परस्पर संबद्धता और कलाकार के समय सरोकारों से देखने वालों का नाता कराना। विरोधाभाषी चीजें भी साथ रहकर कैसे अलग होती है-इस चुनौती से कोई कला क्यूरेटर जूझता है और फिर कलाओं के सौन्दर्य की दर्शकीय दीठ पर जाता है-तभी ना उसकी सार्थकता है! आखिर कला मात्र दीवार पर टांगने की चीज ही तो नहीं है, जिदंगी का अहम हिस्सा है। 

Friday, June 14, 2013

ग्राम्य संस्कृति की दृश्य लय


छायाचित्र क्षण को पकड़ने की अद्भुत कला है। कैमरेनुमा यंत्र को बरतने वाले में यदि कलात्मक बोध हो तो वह क्षण को अपने तई सौन्दर्य में रूपान्तरित कर सदा के लिए उसे जीवंत कर सकता है। किसी घटना, अवसर के छायाचित्रों की कलानिहितता इस बात में ही तो है कि वहां किसी खास क्षण में निहित संवेदना के मर्म को छुआ जाता है।
अभी बहुत समय नहीं हुआ। छायाकार ओम मिश्रा के छायाचित्रों की प्रदर्षनी का आस्वाद किया था। लगा, ग्राम्य जीवन, प्रकृति, घटनाओं और बीते अतीत को कैमरे से जीवंत करते वह रेत, रेत से जुड़े सरोकार और ग्रामीण परिवेश का सच उद्घाटित करते। यह ऐसा है जिसे देखकर भी प्रायः हम अनदेखा कर देते हैं। वही दृश्य जो पहले देखा हुआ है परन्तु उसे कैमरे से बरतते ओम औचक ही विशिष्ट बना देते हैं। मुझे लगता है, इधर के छायाकारों में वह ऐसे हैं जिन्होंने राजस्थान के ग्राम्य जीवन को गहराई से अपने कैमरे और संवेदना की समझ से उकेरा है। इसलिए कि उनके ग्राम्य छायाचित्रां में उभरे दृश्य कला का सर्वथा नव्य सौन्दर्यबोध हमें देते हैं।
उनका एक छायाचित्र है गांव के गोबर लीपे घर का। घर का आंगन और गोबर लीपी सीढि़यों पर बच्चे बैठे हुए हैं। सहज मुस्कान के साथ। इन बच्चों को छायाचित्र के लिए बाकायदा तैयार कर बिठाया गया है परन्तु इसमें ग्रामीण परिवेश को जिस खूबसूरती से बंया किया गया है, वह चाहकर भी कोई भुला नहीं सकता। बावजूद बहुत से दृश्यों की निर्मिती में संलग्नता के ओम मिश्रा के छायाचित्रों की कलात्मकता इस बात से है कि उनमें दृश्य की बजाय उसमें निहित परिवेश की संवेदना को गहरे से जिया गया है। वह दृश्य को अपने तई बहुतेतरी बार अपने चित्रों में निर्मित कराते मिलते हैं परन्तु वहां तब विषय में बच्चे, स्त्रियां गौण होकर उनके पाश्र्व का परिवेश होता है। एक छायाचित्र में दूर तक पसरी रेत पर एक युवती पारम्परिक राजस्थानी लंहगे-चुनी में नृत्य कर रही है। नृत्य करते उसके पैर रेत के धोरों में धंस रहे हैं। ओम मिश्रा ने धोरों में धंसते उसके पैरों के बहाने रेत पर उभरी स्वयं रेत की नृत्य भंगिमाओं को बेहद खूबसूरती से कैद किया है। लगता है युवती के साथ रेत भी थिरक रही है। होले-होले। पवन के झोंको के साथ रेत मंडे पगलिए। छायाचित्र को देखते मन उसी में अटक जाता है। एक छायाचित्र देखते कबीर की साखी जेहन में कौंधने लगी है, ‘माटी एक रूप धरी नाना’। चाक पर घड़ा घड़ते कुम्हार के मिट्टी सने हाथ दिखाई दे रहे हैं। पोर-पोर अंगुलियां। माटी सनी। माटी मूरत उकेरती। ओम सर्जन के इस दृश्य की बारीकी में गए हैं। कैमरे से दृश्य मंे निहित संवेदन को गहरे से छुआ है और उसे छवि में सदा के लिए अंकित कर दिया है।  
ओम मिश्रा दृश्य नहीं दृश्य की अंतरंगता को पकड़ते उसे हमारे समक्ष खास ढंग से उद्घाटित करते हैं। छायाकला की समझ के साथ प्रयोगधर्मिता का कलात्मक संयोजन अपने छायाचित्रों में वह करते हैं। ग्रामीण जीवन के उनके छायाचित्रों में रोशनी के साथ अपरचर तथा स्पीड संयोजन की विशेषता भी आकृष्ट करती है। उनकी छाया-छवियों में दृश्य बहुतेरी बार चलायमान होता प्रतीत होता है तो कईं बार अंधेरे से उभरती रोशनी संवेदना की नई आंख देती है। छायाचित्रों में यथार्थ के साथ दृश्य प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है। दृश्य तो वही होते हैं जिनसे बहुतेरी बार हमारा सामाना हुआ होता है परन्तु उस दृश्य में निहित वह महत्वूर्ण ही तो छायाकार तलाशता है जिसमें स्वयं उसकी कलात्मक सोच छुपी होती है। ओम मिश्रा यही करते हैं। वह छायांकन की अपनी कला में संवेदना की सीर के छायाचित्रकार हैं।

Friday, June 7, 2013

भोपाल में जनजातीय संग्रहालय


इतिहास, परम्पराओं और संस्कृति की जड़ोें से जुड़ी है तमाम हमारी कलाएं। इनके मूल में ही सभ्यताओं का नाद है। इधर आधुनिकता में पनप रही एकीकृत विष्व-संस्कृति की विडम्बना यह है कि विरासत से जुड़ी जनजातीय कलाओं की हमारी थाती से हम निरंतर दूर भी होते जा रहे हैं। इसी से समूहों की सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्ध जनजातीय परम्पराओं में निहित कलाओं का लोक निरंतर क्षीण भी होता जा रहा है। जरा सोचें, कलाओं का उद्भव लोक भावनाओं से ही तो हुआ है। चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि तमाम कला-रूपों में जनजातीय समुदाय की सहभागिता का जो योगदान है, उससे क्या हम मुंह मोड़ सकते हैं! रूपंकर कलाएं आखिर व्यक्ति विषेष की रचना नहीं होकर अनेक अर्थों में सामुहिक ही तो रही है। इस दीठ से परम्पराओं की हमारी समृद्ध धरोहर को सहेजना ही आज सबसे बड़ी जरूरत है। यह सच है कि देश में स्थापित संग्रहालयों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी भी है परन्तु बेशकीमती कलाओं को संजोने वाले यह आलय भी आज पुरा वस्तुओं के आगार भर बन कर रह गए हैं। ऐसे में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में श्यामला हिल्स पर स्थापित जनजातीय संग्रहालय से कुछ आश जरूर जगती है। इसलिए कि वहां वस्तुओं की बजाय मानवीय अस्मिता को रेखांकित करने पर अधिक ध्यान दिया गया है।
इसलिए भी कि संग्रहालय की स्थापना के साथ उससे संस्कृतिकर्मियों, लेखकों को भी जोड़ा जा रहा है। संग्रहालय सांस्कृतिक चेतना के संवाहक है परन्तु संस्कृति बिगसाव के संदर्भ भी यदि उनसे जुड़ते हैं तो उनकी और अधिक सार्थकता है। संग्रहालय स्थापना आयोजन से जुड़े अषोक मिश्र बताते हैं, ‘दो वर्षों के सृजनात्मक परिश्रम से स्थापित संग्रहालय में आंचलिकता की जगह मानवीय अस्मिता को केन्द्र में रखा गया है।’ संग्रहालय की बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें आदिवासी कलाओं से जुड़े कलाकारों ने काम किया है। बाकायदा आदिवासी सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक जीवन्त माॅडल यहां प्रदर्षित किए गए हैं। देष के ख्यात कलाकार अनिलकुमार से संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘जनजातीय संस्कृति के साथ समृद्ध कलाओं का यह देषभर का अनूठा संग्रहालय है।’ वह जब यह कहते हैं तो औचक संग्रहालयों की उस भूमिका पर भी मन जाता है जिसमें संस्कृति संपन्न समाज की नींव निहित होती है। जनजातीय संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं को जीवंत किए जाने की ही तो आज अधिक जरूरत है। बाकायदा इसके लिए कलाधर्मिता के आयोजनों की भी वहां दरकार है। इतिहास, अतीत और वर्तमान की दूरियों को कम करने का बड़ा कार्य जब संग्रहालय करते हैं तो क्यों नहीं उनके जरिए वर्तमान पीढ़ी में सांस्कृतिक बोध का भी संचार हो। 
बहरहाल, जनजातीय परम्पराओं, उनकी संस्कृति और विरासत पर देष में ब्रिटिष उपनिवेष और राजा-रजवाड़ों के दौर में तो फिर भी कुछ काम हुआ था परन्तु आदिवासियों के समूह पर समग्रता से विस्तारपूर्वक कहीं कोई विष्लेषण, विवरण अभी भी नहीं मिलता। इस दृष्टि से समाज की जीवन शैली, परंपरा और विरासत को व्यष्टि और समष्टि रूप से समझने और अध्ययन करने में जनजातीय संग्रहालय की विशिष्ट भूमिका आने वाले समय में रहेगी। इसलिए कि उसके प्रकल्प में देश के जनजातीय इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं पर प्रकाशन के साथ ही वृत्तचित्रों के निर्माण आदि के उद्देश्य भी रखे गए हैं। इसी से सांस्कृतिक बोध को हम बचाए रख पाएंगें। संस्कृतिमूलक बीज प्रष्नों का समाधान भी आदिवासी और लोक कलाओं, परम्पराओ ंको सहेजने में ही निहित है। इसी से हमारी समृद्ध संस्कृति में जनजातीय कला की पहुंच सुनिष्चित होगी और संस्कृति का सृजन और उपयोग मानवीय अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित होगा। आधुनिकता जरूरी है परन्तु इतनी ही जरूरत इस बात की भी है कि हम हमारी जातीय स्मृतियों से वंचित नहीं रहें। सांस्कृतिक चेतना परम्परा को विस्मृत नहीं होने दें। 


Friday, May 31, 2013

शब्द संवेदना का दृश्य रूपान्तरण

कालिदास हमारे सांस्कृतिक वैभव के अनूठे चितेरे हैं। उनके लिखे में कलाओं के सौन्दर्यबोध की अन्तःसलिला सहज अभिव्यंजित हुई है। वन, प्रकृति के साथ नगर, प्रासादों के षिल्प-स्थापत्य का कालिदास ने अपने लिखे में अद्भुत चितराम ही तो किया है। लिखे में कला सौन्दर्य के उल्लसित भाव वह कुछ इस कदर उडेलते हैं कि बांचते हुए सब कुछ अनायास जैसे दृष्यमय हो जाता है। ‘मेघदूत’ को ही लें। प्रकृति प्रत्यय मेघ के जरिए प्रेम संदेष के साथ ही विरह वेदना की जो अभिव्यक्ति कालिदास ने इसमें की है, वह अनुपम है। संस्कृत छन्दों का अद्भुत लय-लालित्य। विरह वेदना का सांगीतिक आस्वाद। मुझे लगता है, कला और काव्य की समग्र पूर्णता कहीं है तो वह ‘मेघदूत’ में ही है। 
 ख्यात कलाकार कन्हैयालाल वर्मा ने इधर ‘मेघदूत’ को अपने उकेरे चित्रों में गहरे से जिया है। कालिदास रचित श्लोकों के सौन्दर्य में निहित भावों में जाते उन्होंने यक्ष की विरह वेदना, अलकापुरी के स्थापत्य को रंगो और रेखाओं से जीवंत किया है। रेखाआंे के गत्यात्मक प्रवाह में उन्होंने रंगो को घोलते श्रृंगार रस को जो चित्रात्मकता प्रदान की है वह अपूर्व है। 
‘मेघदूत’ का रम्य काव्य यूं भी आरंभ से ही कलाओं की प्रेरणा स्त्रोत रहा है। मेघदूत की कथा अलकापुरी के महाराज कुबेर की सेवा में रहने वाले यक्ष से जुड़ी है। कार्य दोष के कारण एक वर्ष के लिए उसे अपनी प्रियतमा से अलग रहना पड़ता है। रामगिरी पर्वत पर बिछोह काटते यक्ष की आषाढ़ माह में घुमड़ने वाले बादलों से विरह वेदना औचक बढ़ जाती है। वह मेघ से अपनी प्रियतमा को संदेश भिजवाता है। मेघ को दिया संदेश ही ‘मेघदूत’ की कथा का मूल है। कथा में आए अलकापुरी के महलों के स्थापत्य सौन्दर्य, भगवान शिव के भालचन्द्र की चांदनी, उमड़ते-घुमड़ते बादलों, हवाओं की उड़ान, पपीहे के गान के साथ ही कालिदास अभिव्यंजित तमाम प्रसंगों को कन्हैयालाल वर्मा ने अपने चित्रों में सांगोपांग स्वर दिया है। इस महाकाव्य को यू ंतो उन्होंने पूरा का पूरा ही अपने चित्रों में उकेरा है परन्तु उनके उकेरे कुछेक चित्र आंखों में बसते हैं। मसलन एक चित्र है जिसमें मेघ से की गयी यक्ष की अनुनय-विनय में कृषिक बालाओं के उनके सत्कार और खेतों में वर्षा करके प्रियतमा की ओर बढ़ जाने का आह्वान है। अलंकृत मेघों के वृत्त के पाश्र्व का नीला-काला रंग और उसके अंदर कृषक बालाओं का मनोहारी चितराम।  उड़ते पखेरू और बरसते जलज! धरित्री का क्रोड। ऐसा ही एक और चित्र है जिसमें चातक पक्षी के चांेच ऊपर करके पानी की लेती बूंदों और मेघों की गर्जना से डकर सहचरियों से आंलिगनबद्ध होते पुरूषों को अभिव्यंजित किया गया है। चित्र नहीं चित्र कोलाज। रंग-रेखाओं की रूप गोठ। चित्र और भी हैं। प्रदोषकाल में भगवान आशुतोष की भव्य आरती, घनघोर अंधेरे में बिजली रूपी रेखा की चमक, पुष्प बरसाते मेघ, नटेश के अट्टहास की रूप व्यंजना, शिव-पार्वती विचरण, यक्ष के वियोग में उनींदी पृथ्वी पर लेटी उसकी प्रियतमा। इन सबमें कन्हैयाल वर्मा ने कालिदास के श्लोकों के सौन्दर्य का अद्भुत चित्र रूपान्तरण किया है। ऐसा करते वह यक्ष की विरह वेदना में निहित संवेदना के मर्म को भी गहरे से छुआते हैं। 
सच! वर्मा कालिदास लिखित सौन्दर्य के सत्यान्वेषक हैं। चित्रांे में उन्होंने कालिदास लिखित सांस्कृतिक वैभव को ठौर-ठौर उद्घाटित ही नहीं किया है बल्कि रंगीय योजना, आकार संयोजन, प्रकाश पुंजों, छाया प्रभाव और कोण सज्जा में गहरे से जिया है। कालिदास कला अंर्तसंबंधों के संवाहक है। उनके लिखे शब्द दर शब्द को चित्रों में उभारते कन्हैयाला वर्मा ने इसीलिए तो रंग-रेखाओं में संगीत के सुरों की अनुभूति करायी है। भाव-भंगिमों नृत्य रस को भी जीवंत किया है। मुझे लगता है, कालिदास ने शब्द सौन्दर्य की अद्भुत कला सर्जना की है तो कन्हैयालाल वर्मा ने उस सौन्दर्य को अपने चित्रों से संस्कारित किया है।


Saturday, May 25, 2013

नृत्य छवि का सार्वभौम


नद् धातु से निस्पन्न है नाद। माने अव्यक्त शब्द। उत्सवधर्मिता का नाद आखिर जीवन में संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं से ही तो है। कल की ही बात है। श्रुतिमंडल की ओर से आयेाजित आठवे रघु सिन्हा स्मृति समारोह में सोनल मानसिंह की नृत्य प्रस्तुति हुई। सुबह समाचार पत्रो के आस्वाद में नृत्यमय देवी रूपों की उनकी प्रस्तुति का ही गुणगान था। पर सच में क्या सोनल मानसिंह ने अपनी इस प्रस्तुति में नृत्य किया? कथासृत्रों में नृत्य सरीखा अहसास कराना और किसी कथा को नृत्य में जीना दोनों अलग-अलग है। इधर हो यही रहा है। भले उस प्रस्तुति को सोनल मानसिंह की नृत्य प्रस्तुति कहा जाए परन्तु नृत्य का सर्वांग वहां कहां है! हां, नृत्य के भीतर की भंगिमाएं वहां है। भाव है परन्तु देह की गति, लोच कहां से आए! और नृत्य तो है ही देह से देह की गत्यात्मक यात्रा। माने नृत्य करते नृत्यंागना या नर्तक खुद कहीं नहीं होता, उसके भीतर की तमाम सर्जना देह में रूपान्तरित हो जाती है। 
बहरहाल, एक वय के बाद देह की थिरकन मंद पड़ जाती है। नृत्य की मति होती है परन्तु गति कहां से आए! और गति के बगैर जोश नहीं होता। बगैर इसके नृत्य का होना न होना एक ही है। इधर हो यही रहा है। सोनलजी की ही तरह अधिक वय की अधिकांश नृत्यांगनाएं नृत्य के नाम पर कथाओं की नाट्य प्रस्तुतियां कर रहीं है। कोई कहे हमने वहां भरपुर रस पाया तो रस तो नाट्य में भी होता ही है ना! नृत्य क्या है? मानवीय अभिव्यक्तियों का गत्यात्मक रसमय प्रदर्शन। सार्वभौम कला है यह। ऐसी जिसे देखते हुए भी अंग प्रत्यंग औचक थिरकने लगते हैं। देह की सुंदरतम अभिव्यक्ति। एक प्रकार का उत्सव। देह से देह की यात्रा का उत्सव। भले नृत्य में कथा का रूपक कुछ भी बने परन्तु भीतर का अरूप भी सज-धज कर इसमें देह से प्रकट हो ही जाता है। 
सोचता हू, देह से परे क्या नृत्य हो सकता है! फिर क्यों कर हो ऐसा प्रयास। सोनल मानसिंह के नृत्य का आरंभ से ही कायल रहा हूं। वह नृत्य में अंग-प्रत्यंग के साथ सदा ही भावों का अनूठा रस बिखेरती रही है परन्तु इधर बतौर नृत्य जो सामुहिक प्रस्तुति वह करती हैं, उसमें कथा का ही उत्स होता है, नृत्य का नहीं। प्रस्तुति का मोह ही है उनसे यह सब करवाता होगा परन्तु नृत्य आस्वादक मन उनकी इस सर्जना से कहां संतुष्ट हो पाता है। नृत्य का मायना आखिर भाव भंगिमाओं का प्रदर्शन ही तो नहीं है, देह से उनको जीना भी है।  
बहरहाल, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला, छायांकन को मैं ‘रंग नाद’ प्रस्तावित करता हूं। रंग के साथ नाद जरूरी है। नृत्य में देह साथ नहीं दे तो फिर वहां नाद तो होगा परन्तु रंग गायब होगा। और नाद तभी अंतर्मन को भाता है जब उसमें रंग माने उत्सवधर्मिता का उजास हो। बाहर का ही नहीं अंदर का नाद भी उससे ही बजता है। वही तो है रंग-नाद।  अंर्तध्वनि का प्रतीक। यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद रूप में बज पड़ता है। सधे हुए वाद्य वृंद की भांति। ...तो नृत्य में गत्यात्मकता होगी और देह का गान होता तभी ना वह बजेगा! रंग-नाद का मूल स्त्रोत आखिर भीतर की हमारी कला आस्वादक चेतना ही तो है! यह चेतना ही अंतर के आनंद की अनुभूति कराती है। शब्द और अर्थ भी कलाओं की हमारी इस रसानुभूति के ही अधीन हैं। इसी से पूर्व का विसृजन हो नवीन का निर्माण होता है। नृत्य कला में नवीन का निर्माण नए कलाकारों से होगा। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों से होगा। कथाओं की भाव भंगिमाओं से नहीं। सोनलजी नृत्य कला की देश की विरल प्रतिभा है। क्या ही अच्छा हो, अपने जैसी ही विरल नृत्य प्रतिभाओं का वह संभावनाओं का खुला आकाश रचे।