Friday, April 25, 2014

पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं के चिंतन का चितेरा


चिंतक-चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन आज ही के दिन हमसे विदा हुए थे। उनसे साक्षात् का सुयोग कभी नहीं हुआ पर अपने से दूर भी वह कभी नहीं लगे। पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं की कला दीठ स्वामीनाथन की पाण ही है। सोचता हूं, यह सब तो कैनवस पर बहुत से और कलाकारों ने भी बनाए हैं फिर स्वामीनाथन से ही इनकी पहचान क्यों? शायद इसलिए कि रंग, रूप और विन्यस्त भावों की उनकी अंवेरी कैनवस लय विरल है। अनुभूति की सहज साधना लिए। वह कहते भी थे, ‘समूची कला ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्घाटन है।’ और स्वयं उन्होंने ऐसा करते जीवन से जुड़ी संवेदनाओं को अपनी कला में जैसे गहरे से बुना। यह है तभी तो आदिवासी कलाओं की तुतलाहट को भी पहचानते बखूबी उसे आधुनिक कलाओं के समानान्तरण उन्होंने विश्लेषित भी किया।
बहरहाल, सप्ताह भर पहले की ही बात है। एक भोर जलमहल की पाल पर प्रयाग शुक्ल के साथ था। औचक वहां की पहाड़ी, पेड़ और पक्षियों को निहारते प्रयागजी ने स्वामीनाथन के शब्द याद किए, ‘तमाम कलाएं मनुष्य को संबोधित है’। औचक जहन में कौंधा, यह शायद संभव ही नहीं है कि पहाड़, पेड़ और चिडि़या को एक साथ अनुभूत करते कोई स्वामीनाथन को याद न करे। उनका कला चिंतन, कैनवस पर उकेरी आकृतियां और हां, पहाड़ पर लिखी कविताएं भी-इसीलिए हम चाहकर भी बिसरा नहीं सकते। कैनवस पर वह जो बनाते उनमें दृश्य नहीं देखने के अनुभवों की अनवरत श्रृंखला जो है! लोक से जुड़ी अद्भुत व्यंजना भी। स्मृतियां के चाक्षुष रूप वहां हैं तो वह ब्रश, रंग और रेखाओं की कलाकारी भर नहीं है, अनुभव से सिंचिंत सुनहरी दीठ रूप में हैं। देखने के बाद यह आप-हम-सबकी बन जाती है। 
मुझे लगता है, जगदीश स्वामीनाथन प्रकृति की गुम हुई कला लय की तलाश के चितेरे है। और फिर यह उनका ही चिंतन हैं जिसमें आदिवासी कला को वह ‘जादुई लिपि’ से अभिहित करते उसे हमसे बंचवाते हैं। याद करें, आदिवासी अंचलों की अपनी यात्रा को कला अनुभूतियों में ‘द परसीविंग फिंगर्स’ पुस्तक में उन्होंने जिया तो भारत भवन में ‘रूपंकर’ के जरिए आदिवासी कला को आधुनिक कला के बरक्स विश्लेषण का समकाल भी रचा। उनका कला चिन्तन देखने के अनुभवों की विरल कथा है। ‘पहाड़’ कविता की उनकी पंक्तियां देखें, ‘कभी कभी जैसे यह पहाड़/धुंध मे दुबक जाता है/और फिर चुपके से/अपनी जगह लौटकर ऐसे थिर हो जाता है/मानो कहीं गया ही न हो।‘ देखने का यह विरल अनुभव उनकी कविता में ही नहीं कैनवस पर मांडी पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं में सदा के लिए जैसे बस गया है। भले वह इस समय सदेह हमारे साथ नहीं है पर कैनवस के अपने इन पात्रों के जरिए हमसे कभी दूर भी तो कहां हुए हैं!


Monday, April 21, 2014

जो रचेगा वही बचेगा

कलाकृति : सुनीत घिल्डियाल 

कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा शिल्प है। शिल्प का अर्थ आज का शिल्प नहीं। उसमें नृत्य, गायन, वादन, चित्र, मूर्ति, वास्तु सहित सभी हस्तककलाएं सम्मिलित है। शिल्प यानी कलाएं कारू (उपयोगी) भी है और चारू (कलात्मक) भी हैं। 

चित्रकला या मूर्तिकला में सादृश का अर्थ यथार्थ का अनुकरण है, वास्तव का बिंब। परन्तु अनुकरण कैसा? लौकिक नहीं। अनुकरण वह जिसमें अमूर्त को मूर्त करने के संदर्भ निहित होते हैं। एक कला का दूसरी कला से अंतःसंबंध। संगीत को चित्र में कैसे परिवर्तित करेंगे? वह तो अमूर्त है।...तो इस अमूर्त को बिंदु, वृत्त-उध्र्व-अधोमुखी रेखाओं और वृत्त चतुस्त्र परिमंडल के हर छोटे से छोटे भाग में, अंश में उसके स्वभाव को जब सांगीतिक रूप में खोजा जाएगा तो वह संगीत का चित्रण होगा। हेब्बार की रेखाओं को लें। घूंघरू बंधा पैर है पर वह नृत्य की पूरी संरचना का आभास करा देता है। देखने के हमारे अनुभव में उनकी रेखाएं आत्मरूप हो जाती हैं। और यह ऐसे ही नहीं होता है। इसके लिए कलाकार अपने को विसर्जित करता है। बगैर अपना विसर्जन किए किसी भी कला में पूर्णता संभव ही नहीं है। पूर्णता का अर्थ ही है-सृजन का विसर्जन। दर्शन की अभिव्यक्ति, रूप-प्रतिरूप और परारूप का चिरंतन ही तो है कला।

सुनीत घिल्डियाल काष्ठ पट्टिकाओं में अद्भुत कला रूप रचते हैं। इधर उन्होंने समय और जीवन को केन्द्र में रखते मोहक सर्जना की है। सूर्य और उसकी रश्मियों के साथ जीवन स्पन्दन से जुड़ा उनका एक चित्र विरल है। गाढे रंगों की उजास लय उसमें है। रंग संवेदना की भिन्न भंगिमाएं पर एक दूसरे में ओत-प्रोत।  यह विषय का एक तरह से निविषयीकरण है। सुनीत के कलाकर्म की यही बड़ी विशेषता है, वह रंगो की भाषा बंचाते हममें गहरे से बसते हैं। 
कलाकृति : सुनीत घिल्डियाल 

बहरहाल, कोई भी कला आकर्षित तभी करेगी जब उसमें कलाकार स्वयं कहीं नहीं रहेगा। वह अपना विसर्जन करेगा, तभी कुछ गढ पाएगा। रच पाएगा। सुनीत के कलाकर्म में यही है, वह स्वयं वहां कहीं नहीं है। इसी से शायद कला के वह इस तरह के विरल रूप गढ़ पाते होंगें। सर्जन और फिर विसर्जन हमारे ऐसे ही तो परम्परागत नहीं है। उसके गहरे निहितार्थ हैं। दूर्गा पूजा, गणेश पूजा के बारे में विचारें। मिट्टी की मूरत बनती है। उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है। श्रृंगार करके जब उसकी पूजा की जाती है तो उसमें शक्ति का वास हो जाता है। और फिर ऐसे वह जब ऊर्जा प्रदान करने लगती है, वंदन करते मन विभोर हो नाच उठता है। यह प्रतिमा के जीवन्त होने का क्षण होता है। जड़ के चेतन में परिवर्तित होने का क्षण। अनुष्ठान समाप्त होने के बाद ही यह अनिवार्य हो जाता है कि सजी-संवरी, प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा फिर से अमूर्त भूमंडल में विलीन हो जाए। इसीलिए विसर्जन होता है। फिर से सर्जन के लिए। तो कहें, बचेगा वही जो रचेगा।

Friday, April 11, 2014

शिक्षण से जुड़े कलाओं के संस्कार

कलाएं शिक्षण में बोझिलता को दूर करती है। संस्कारों की सूझ देती हुई। यह है तभी तो राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में कुछ समय पहले शिक्षण में कलाओं को जोड़े जाने की बात कही गई थी। पर कुछेक संस्थानों को छोड़ अधिकांश  में अभी भी यह दूर की कौड़ी है। प्रतिवर्ष शिक्षण संस्थाओं से युवाओं की जो खेप निकलती है, उसका अंतिम लक्ष्य नौकरी प्राप्त करना भर होता है। पढ़ाई शायद इसीलिए व्यक्तित्व निर्माण, संस्कारों की खेती नहीं कर पाती और जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे युवा भटक भी जाते हैं। पढ़ाई नौकरी की विवशता नहीं, संस्कारों की संवाहक बने। स्वाभाविक ही है, कलाओं से जुड़ाव इसमें मदद कर सकता है। 

उच्च शिक्षण संस्थानों में अतिथि अध्यापन के अंतर्गत निरंतर जाना रहता है और पाता हूं, बोझिल पढ़ाई की यंत्रणा जैसे वहां चेहरों पर झांक रही है। पर देखता हूं, कला संस्कृति से जुड़ा कोई आयोजन वहां होता है तो विद्यार्थी खिल-खिल जाते हैं।सोचता हूं, क्या ही अच्छा हो इस तरह का उल्लास शिक्षण के दौरान भी रहे। यह कठिन  नहीं है, बशर्ते  तकनीक में कलाओं का छोंक भर लगा दिया जाए। मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में छायांकन के कला सरोकारों पर विद्यार्थियों को व्याख्यान देने के लिए इस बार जाना हुआ तो इसे गहरे से महसूस किया। कक्षा में दाखिल हुआ था तब चेहरे बुझे-बुझे साफ दिखाई दे रहे थे। जैसे कह रहें हो, ‘लो...झेलो, फिर एक पाठ! सच भी है, सुनने की विवशता उदासी ओढाती है। पर जब किस्से-कहानियों में उनसे बतियाया, कला-संस्कृति के उनके भीतर बसे संसार को बाहर निकाला तो पता ही नहीं चला कब मिनट घंटो में तब्दील हो गए। दो घंटे बीते तो, सुकून इस बात का नहीं था कि संप्रेषित हुआ हूं, यह था कि बूझे चेहरे खिले हुए थे। सोचता हूं, पढाई में कला संस्कृति सरोकार जुड़ेंगे तभी ना यह सुनना यंत्रणा भरा न होगा। छायांकन तकनीकी शिक्षा का अंग है पर उसका अध्ययन कैमरे रूपी यंत्र की समझाईश  भरा ही होगा तो उसके कला सरोकार गौण नहीं हो जाएंगे!

बहरहाल, यह सुखद है कि एम.एन.आई.टी. फोटोग्राफी क्लब के सलाहकार छायाकार महेश  स्वामी छायांकन को कला स्थापित करने के आंदोलन में पिछले कईं वर्षों से लगन से जुड़े हैं। उनकी पहल ही इस तकनीकी संस्थान में छायांकन कला को जिन्दा रखते विद्यार्थियों में उल्लास का वास करती रही है। इस बार फोटो प्रतिस्पद्र्धा में निर्णायकों के चयन से बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा। उसमें फोटो जर्नलिस्ट हिमांशु व्यास थे, इन्दौर के सुप्रसिद्ध छायाकार हेमशंकर  पाठक थे और कलाकार नवल सिंह चौहान  थे। माने फोटो पत्रकारिता नजर थी और कलात्मक सौन्दर्य दीठ भी थी। यह महत्वपूर्ण तो है ही कि कोई शिक्षण संस्थान छायांकन के इन सरोकारों से भविष्य के छायाकारों की नींव तैयार कर रहा है।


Friday, April 4, 2014

लीक तोड़ मौलिकता रचते कलाकार

राष्ट्रीय कला कार्यशाला, पटना 

कलाएं विचार परिष्करण की संवाहक है। सोचता हूं, कलाओं की पाण ही तो घुम्मकड़ी परवान चढ़ी है। और हर बार इससे ही नव्यतम कुछ पाने के अनुभव भी पुनर्नवा हुए ही हैं। पिछले सप्ताह एक दिन के लिए पटना में था। संस्कृति विभाग और बिहार ललित कला अकादमी ने वहां राष्ट्रीय कला कार्यशाला आयोजित की थी। महत्वपूर्ण पहल यह भी थी कि देश के तीन कला समीक्षकों को भी आमंत्रण था। कोलकता से अनिरूद्ध चारी थे, लखनऊ से अवधेश मिश्र और जयपुर से यह नाचीज़ था। कलाओं के अन्र्तसंबंधों पर बोलते लगा, कलाकारों में अपने काम के साथ दूसरों के सर्जन की अन्तःप्रक्रियाओं को जानने की गहन जिज्ञासा है। सो चित्रकला के संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु और मूर्तिकला से जुड़े संबंधों पर संवाद करते जैसे खुद भी उनमें रमा। 


कला कार्यशाला पूर्वाग्रहों से मुक्त करने वाली थी। पहले लगता था, इस तरह के आयोजन सर्जन स्वतंत्रता को बांधते हैं। पर जब कैनवस पर कलाकारों को कुछ करते हुए उसीमें खोया पाया तो यह भी लगा कि बहुतेरी बार चाहकर भी जो स्वतंत्र रूप में कलाकार नहीं कर पाता, इस प्रकार के आयोजन अनुशासन में हो जाता है। अनुशासन अंतर्मन विचारों, संवेदनाओं को पंख ही तो लगाता हैं! यह सही है, इस तरह की कला कार्यशालाओं में बंधन होता है-नियत समय में कलाकृति बनाकर देने का। पर सोचता हूं, समय पर कुछ कर देने की विवशता नहीं हो तो क्या स्वयं इतना लिख पाता! कलाकारों के साथ भी तो यही होता होगा ना कि समय पर कुछ देने की सीमा में वह बहुतेरी बार बहुत कुछ महत्वपूर्ण कर देते हैं। लीक तोड मौलिकता रचते। बल्कि कला कार्यशालाएं कईं बार कुछ नहीं कर पाने के रंज भी मिटाती ही है। 

बहरहाल, कार्यशाला में हैदराबाद की अंजनी रेड्डी ने आकृतिमूलकता में अपनापे को बुना, रंग पट्टिकाओं में युसूफ ने जीवन संदर्भ दिए, विनय शर्मा ने अतीत राग सुनाया, खबरों की कैलीग्राफी में मेघाली गोस्वामी ने रंगों की उत्सवधर्मिता को जिया। मिलनदास, अजीत शील, रहीम मिर्जा, मनोज बच्चन, अमरेश कुमार, शैलेन्द्र कुमार, अर्चना,  रजत घोष आदि सभी के कलाकर्म से रू-ब-रू होते लगा, कैनवस सुहानी दीठ ही तो है! तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि कला परख में क्या सहेजूं, क्या छोड़ दूं। प्रेक्षागृह में जब बोल रहा था तो पता ही नहीं चला, क्या और कैसे बहुत कुछ बोल गया। बाद में मेघाली गोस्वामी ने रागमाला चित्र श्रृंखला के शोध मुजब कुछ पूछा तो समालोचक अवधेश अमन ने भारतीय रागमाला चित्रों की सूक्ष्म सूझ दी। वेदप्रकाश की कला सामयिकता अकुलाहट और अकादमी अध्यक्ष आनंदीप्रसाद बादल की धीर गंभीरता मन में अभी भी बस रही है। पटना से लौट आया हूं, पर मन अभी भी वहां के कलाकारों, कला में ही अटका है।


Friday, March 28, 2014

चाक्षुष यज्ञ में वैचारिक भाष्य



कल विश्व रंगमंच दिवस था। संचार माध्यमों में सामयिक रंगचर्या पर बहुत कुछ था पर रंगमंच की वैचारिकी कहीं नहीं थी। माने चर्चाओ में मंचीय प्रस्तुतियों तो रहती है परन्तु विचार संप्रेषण गौण होता है। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि जो कला कभी वैचारिक उन्मेष का सशक्त माध्यम रही है, उसी में विचार को दरकिनार कर दिया गया है।
बहरहाल, रंगकर्म चाक्षुषयज्ञ है। माने आंखो का अनुष्ठान। आंखे जो दिखाती है, वहां दृश्य के साथ विचार भी दीपदीपाता है। पर विचारें, इधर मंच प्रस्तुति के ताम-झाम से आगे क्या हिन्दी नाटक आगे बढ़ पाया है? बाकी की तो पता नहीं पर हिन्दी रंगकर्म की तो असल विडम्बना यही है। प्रस्तुति की कलात्मकता पर तो फिर भी बहुत से स्तरों पर यहां जोर है परन्तु वैचारिकता गौण है। नाट्य प्रशिक्षण का भी तो मूल संकट यही है। वहां प्रस्तुति विधान की ही सैद्धान्तिकी अधिक है। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है पर उसकी व्यावहारिकी नदारद है। माने वैचारिक लोक संकेतों को हमने वहां से भी बिसरा दिया। और भारतेन्दु का ‘अंधेर नगरी’ हिन्दी का आरंभिक नाटक है पर वहां लोक की व्यावहारिकी है। याद करें, नाटक में इंदर सभा बंदर सभा में बदलती है तो शब्द में अक्षरों का उलट-पुलट करते मनोरंजन का जबरदस्त तड़का है। इसलिए कि भारतेन्दु का लेखन रंगकर्म से जुड़ा रहा है। प्रसाद का नहीं जुड़ा रहा, इसलिए उनके नाटक जन से नहीं जुड़ पाए। 
डेली न्यूज़ में प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" 
रंगकर्म में आनंद के साथ विचार जरूरी है। निर्देशन और अभिनय में भी। ब्रेख्त ने रंगकर्म में अलग-अलग समय में आनंद का स्वरूप उस समय की समाज व्यवस्था के अनुरूप होने पर जोर दिया था। अब उलट हो रहा है। नाटक हो रहे हैं पर सभी कथ्य के जीवंत प्रदर्शन में अपनी ताकत झोंके हुए हैं। इसीलिए नाटक देखने के बाद कथा तो याद रहती है परन्तु उसमें निहित विचार कहीं नहीं ठहरता। मंचन के लिए भी वही नाटक चुने जाते हैं जिनमें विचार की अधिक माथापच्ची नहीं हो। नंदकिशोर आचार्य का ‘देहांतर’ इस दृष्टि से विरल है। पुत्र से प्राप्त यौवन ले उसका भोग जब शर्मिष्ठा के साथ होता है तो वह जिस मनःस्थिति से गुजरती है, उस नाट्य विचार को क्या कोई भुला सकता है! नाटक उपन्यास या कहानी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि नाट्य लेखक का रंगमंच चिन्तन जरूरी है। ऐसे ही नाटक से जुड़े लोगों का साहित्य की संवेदना से जुड़ाव जरूरी है। आखिर नाट्य केवल अभिनय भर ही तो नहीं है। वहां कथन के साथ वैचारिक उन्मेष जुड़ा होगा तभी दर्शक उससे जुड़ सकंेगें। और यह तभी होगा जब रंगकर्म मजबूरी या शौकिया ही नहीं हो। इसलिए नहीं हो कि वह रोजगार देने वाला है बल्कि इसलिए हो कि उसमें स्वयं रंगकर्मी आनंद लेता हो। कलाकार, लेखक स्वयं आनंद का विचार करेगा तभी ना दूसरों को आनंद के साथ उसकी अनुभूति करा पाएगा!


Friday, March 21, 2014

रंगों की भाषा में उत्सवधर्मिता गान

वैश्वीकरण से कलाओं में आदान-प्रदान की सूझ तो बढ़ी है, पर वैविध्यता का लोप भी हुआ है। चित्रकला को ही लें। निरंतर एक जैसे ही विषय, रूपाकारों में रंगाच्छादन देखते बहुतेरी बार ऊब सी होती है। ऐसे में युवा कलाकार सुरेन्द्र सिंह के कैनवस पर बरते रंग, रेखाओं का उजास और बिम्बों में बसी स्मृतियां मन में औचक ही घर करती है। इसलिए कि एकरसता से परे भिन्न छटाओं में प्रकृति से जुड़े अनुभवों की अनथक यात्रा सरीखे हैं, उसके चित्र। कुछ दिन पहले सद्य बनाए उसके चित्रों और छाया-छवियों का आस्वाद करते यह भी लगा कि आंतरिक सौन्दर्यानुभति में वह स्मृतियों को कैनवस पर जीवंत करता है। लोक राग घोलते। इसलिए भी कि वहां मौलिक दृष्य प्रभाव भी है और रूप तत्वों का सांगीतिक आस्वाद भी।
बहरहाल, सुरेन्द्र के सद्य बनाए चित्रों की कला प्रदर्शनी ‘बियोन्ड टेक्सचर’ कलानेरी कलादीर्घा में प्रारंभ हुई है। कला पेटे इधर कैनवस पर जो कुछ सिरजा जा रहा है, उसमें सुरेन्द्र सिंह के चित्र अपनी मौलिक दीठ से भविष्य की उम्मीद जगाते हैं। हो सकता है, कोई इन्हें एब्सट्रेक्ट कहेे पर वहां रूप का सौन्दर्य है। यथार्थ के गहरे सौन्दर्य संकेत जो वहां है! वास्तविक रूप भले न हो पर चित्रित क्षेत्र के आकार व रंग में जीवन से जुड़े अनवरत संदर्भों की कहानियां दृष्य कहन सरीखी ही हैं। चित्रों में उभरे रंगालेपों में कहीं मंदिर में हो रही प्रार्थना की ध्वनियां हैं, मांडणा सज्जित घर और उससे जुड़ी यादों के संदर्भ हैं तो ठौड़-ठौड़ अंवेरा रेत का हेत भी है। कैनवस पर समतल पर विभाजित रंग आकारों और उनके आभास में आधुनिकता की लय के बावजूद सुरेन्द्र के चित्रों में पारम्परिक भारतीय चित्र शैलियों की दीठ है। और हां, लोक कलाओं के जो अलंकरण वहां है, उनमें मिट्टी की सौंधी महक भी है। कुछेक चित्रों में फूल और पंखुडि़यों के साथ लहराती पत्तियों में प्रकृति के अपनापे को जैसे बुना गया है तो कुछेक में लहरों की वक्रता के साथ गतित्व की सुनहरी आभा मन को सुकून देती है। पर कुछेक चित्रों में आकृतियों  के साथ उभरे आधुनिक जीवन बिम्ब अखरते भी हैं। सहज सौन्दर्य की लय तोड़ते।
बहरहाल, इधर बनाए सुरेन्द्र के चित्रों की बड़ी विशेषता  यह तो है ही कि उनमें किसी शैली विशेष या कलाकार का कहीं कोई अनुकरण नहीं है। अंतर की प्रेरणा में भारतीय जीवन दर्शन के साथ वह लोक कला की सहजता में अपने तई बढ़त करता है। चित्र देखते वान गो के चित्रों की भी याद हो आती है।...शायद इसलिए कि रंगों का वहां प्रतिकात्मक महत्व है। माने बचपन की यादों के साथ वर्तमान जीवन से जुड़ी आपा-धापी भी रंगों से ध्वनित होती है। तमाम उसके चित्र रंग भाषा में स्मृतियों और अनुभूतियों की एक तरह से व्यंजना है। सोचता हूं, वान गो ने ही तो कभी चित्रकला में रंगों की भाषा समझाई थी। इस दीठ से सुरेन्द्र के चित्र अंतर्मन संवेदनाओं की अनुकूल रंग संगति तो है ही, हमारी सांस्कृतिक कला विरासत में स्मृतियों के जीवंत दस्तावेज सरीखे भी हैं।सेजान की मानींद सुरेन्द्र के चित्रों में प्रचलित का अध्ययन तो है पर रूप परिवर्तन की मौलिक दीठ भी है। माने जो कुछ कला में दिख रहा है, उसकी एकरसता तोड़ते वह बाह्य प्रभावों से परे कैनवस पर सौन्दर्य को एक तरह से सिरजता हैं। 
‘बियोन्ड टेक्सचर’ श्रृंखला के सुरेन्द्र सिंह के चित्र लोक राग लिए प्रकृति घुले रंगों से अपनापा कराते हैं। इसीलिए मन को मोहते हैं।  कैनवस पर सधे-संयोजित रंग देख मन में काव्य की पंक्तियां हिलोरे ले रही है। स्मृतियों और अनुभूतियों के दृष्यालेखों में ऐसे ही होता होगा-उत्सवधर्मिता का गान। 

Friday, March 14, 2014

गळियां में आवै गौरा झूमती

जब-जब होली का त्योंहार नजदीक आता है, मन अवर्णनीय उमंग, उल्लास से भर उठता है। यह उमंग होली के रंग खेलने से कहीं अधिक उन 15 दिनों को जीने की होती है, जिसमें आस-पड़ौस कभी गवर पूजे जाने के दिनों की याद जुड़ी हुई है। इधर होलीका दहन हुआ, उधर गवर पूजन शुरू। सामुहिक स्वर माधुर्य, ‘पातळिया ईसर, गळियां में आवै गौरा झूमती’ और ऐसे ही दूसरे गवर गीतों से ही भोर की आंख खुलती। संगीत स्वरों की वह सुबह इस कदर सुहानी होती कि मन चाहकर भी उसे कहां बिसरा पाया है! पर उत्सवधर्मिता के दिन पंख लगाकर उड़ जाते। पखवाड़े बाद गणगौर मेले में गवर विसर्जन के साथ ही जैसे उमंग-उत्साह के दिन बीत जाते। 
गणगौर ऐसा ही लोक पर्व है। संस्कृति की लय अंवेरता। मां से पूछता हूं, अभी भी बीकानेर में गवर पूजते लड़कियां 15 दिन सुबह उठकर वैसे ही सामुहिक गीत गाती है? मां का जवाब हां भी होता है और ना भी। भाव यह है कि गणगौर पर्व पखवाड़ा होता तो अभी भी है परन्तु उसमें वह उमंग, उत्साह और लड़कियों के गान के दिन अब नहीं रहे। 
बहरहाल, गणगौर में दो शब्द है। गण और गौर। ‘गण’ माने शिव और ‘गौर’ यानी पार्वती। कन्याएं शिव समान अच्छे वर के लिए गवर पूजती है। पर इस पूजन भाव में भक्ति वाला गांभीर्य नहीं है, यहां सखी-भाव प्रधान हैै और पूजने की बजाय ‘खेलने’ पर अधिक जोर है। मौहल्ले-गली की लड़कियांे एकत्र होकर सामुहिक रूप में गवर पूजने के बहाने जैसे आपस में घुल-मिल खेलती है। याद पड़ता है, होली के बाद जब सोते तो आंख घर के पास से आते सामुहिक गीतों के मधुर स्वरों से ही खुलती थी। पता चल जाता, बहन पहले ही उठ गणगौर पूजने चली गई है। पूरे पखवाड़े तक सुबह गवर गीतों से ही सुहानी होती। सामुहिक सोल्लास भोर भर ही नहीं बल्कि पूरे 15 दिन तक अनुभूत होता। महिलाएं-कन्याएं गीत गाती हुई दूब लाने जाती और गणगौर का श्रृंगार करती। होली की राख के पींडे बनाए जाते और उन्हें पूजन के बहाने सजाय संवारा जाता। लड़कियां गीत गाती जाती और गान के साथ-साथ ही गुलाल के विभिन्न रंगों के मांडणे धरा पर मांडती। 
बीकानेर पाटों का शहर है सो गली-मौहल्ले में पाटों पर ‘ईसर-गणगौर’ की लकड़ी की गहनों, कपड़ों से सजी सुन्दर प्रतिमाएं सजती। रंग-बिरंगे वस्त्र, गहने, साज-श्रृंगार से सजी एक से बढकर एक सुन्दर गवरें। पूरे 15 दिन बहने गवर पूजती और उनके साथ हम भी जैसे उनके उमंग और उत्साह के साथी होते। कहें तब मन में अवर्णनीय उत्साह, उमंग गवर को लेकर रहता और गणगौर मेले में यह उत्साह चरम पर पहुंच जाता परन्तु यह गवर विदा का समय होता। अलसुबह ही कुआंरी कन्याएं, महिलाएं, बूढी दादियां एकत्र हो जाती। मिट्टी के पालसिए में उगाए ज्वारे और गुलाल लिए गवर का विसर्जन करने पास के कुओं, तालाबों में मेला सा भरता।
डेली न्यूज़, 14 मार्च, 2014 
मुझे लगता है, गणगौर समुह भावना को जीवंत करता पर्व है। एक दिन नहीं पूरे 15 दिन तक के लिए। इसमें संगीत है, नृत्य है और है लोकानुरंजन। और हां, जीवन से जुड़ा अनुराग भी। जयपुर में आए एक दशक से अधिक का समय हो गया है। मित्र कहते हैं, अब तो मूल निवास प्रमाण पत्र भी चाहो तो यहां का बन सकता है। पर कोई बताये, महानगर होते जयपुर में परम्परा की वह सोंधी महक कहाँ से मिले!  सोचता हूँ, अब जबकि होली नजदीक है, गणगौर गान के सामंुहिक स्वरों से जुड़ी उन यादों का क्या करूं। कोई बताए कहां से पाऊ माधुर्य का वह राग और उससे जुड़ा अनुराग! आप ही बताईए, भौतिकता की अंधी दौड़ में क्या हम अपने से ही लगातार ऐसे ही दूर नहीं हुए जा रहे हैं! 

Friday, March 7, 2014

नीरवता में रोशनी की आहट


Photo : Anurag Sharma
छायांकन में छवि का अंकन भर ही यदि होता है तो इसमें सृजनात्मक कुछ भी नहीं है। छायांकन कला का मूलाधार छवि अंकन में निहित वह दृष्टि है जिसमें दिख  रहे दृश्य को कला की दीठ से जिया जाता है। कैमरा छाया प्रकाश संतुलन के साथ छवि का सौन्दर्यांकन कर सकता है। यथार्थ-प्रकृति रंगों को मनोनुकूल भी उसमें किया ही जा सकता है पर उससे कलाकृति नहीं सिरजी जा सकती। कैमरा यदि कलाकृति निर्मित करता है तो यह वह आंख और उससे देखना, अनुभूत करना है जिसमें दृश्य के समानान्तर संवेदनाओं का सृजन किया जाता है। 
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में कुछ दिनों पहले अनुराग शर्मा के जयपुर केन्द्रित छाया-चित्रों का आस्वाद करते लगा, छायाचित्र वैसे नहीं थे, जैसे आमतौर पर कैमरे से लिए जाते हैं। धरती नहीं, आसमान से निहारी छवियां। साफ-सुथरी। पुराना जयपुर, नया जयपुर और तेजी से पैर पसारती महानगरीय संस्कृति। महत्वपूर्ण यह कि जो कुछ उन्होंने कैमरे से सिरजा उसमें दूरलघुदृश्यता में सौन्दर्य को ठौड़-ठौड़ जैसे अंवेरा गया है। 
छायाचित्र प्रदर्शनी में तमाम चित्रों के कोण, प्रकाश-छाया अंकन, संयोजन के साथ ही स्थापत्य में निहित बारीकी को अनुराग ने गहरे से जिया है। माने हवामहल, जलमहल, बिड़ला मंदिर, मोतीडूंगरी ही नहीं वल्र्ड ट्रेड पार्क और फ्लाईओवरों की निर्मिती के मर्म को उनके कैमरे ने गहरे से छूआ है। यह सब छायाचित्र तो खैर सौन्दर्य की सीर लिए है ही परन्तु मोतीडूंगरी के परकोटे की दिवारों, बुर्ज का जो अंकन अनुराग ने किया है, वह तो अद्भुत है। छायाचित्र आस्वाद करते लगता है, कैमरे ने पाषाण रेखाओं की लय को पकड़ते अतीत के मौन को सुनते उसे अपनी कला दृष्टि से कैमरे में से बुना है। यह है तभी तो परकोटे का लाईन वर्क और बारिश से भीग-भीग कर पत्थरों में भरी काई का भूरभूरापन मन को जैसे आंदोलित करने लगा। लगा, स्थापत्य में जो कुछ दिखता है उससे परे सधी रेखाएं भी मंडती है और प्रकृति इन रेखाओं में जो रंग घोलती है, उसे कोई कला ही संजो सकती है। सच!  कैमरे से जुड़ी कला ही यह कर सकती है।  मन में औचक खयाल आता है, छायांकन कला अतीत और उसमें घूले प्रकृति रंगों के मौन को एक तरह से रिकाॅर्ड कर फिर से हमें सुना सकती है। माने अतीत को वहां देखा ही नहीं, सुना भी जा सकता है। क्यों नहीं कला विमर्श में छायांकन कला की इस विशिष्टता पेटे ही कहीं कोई बात आगे बढ़े। 
Photo : Anurag Sharma 
बहरहाल, अनुराग की छाया-कला दृष्टि इस रूप में भी मन को लुभाती है कि वहां रात्रि में पसरे सन्नाटे के साथ ही पेड़ों पर पड़ती रोशनी की हरितिमा और दूर तक जाती काली नागिन सी सड़क का खालीपन भी हमसे संवाद करता है। अंधेरे की नीरवता में रोशनी की आहट और सड़क का दूर तक का खालीपन। चैराहों की धातु मूर्तियों की नृत्य छवियांे का मौन सौन्दर्य भी। मुझे लगता है, अनुराग शहरी स्थापत्य की भागती-दौड़ती जिन्दगी के नहीं, मौन और दूर तक पसरे खालीपन के छायाचित्र सौन्दर्य संवाहक हैं। और हां, अपने छायाचित्रों में वह आसमान से पकड़ी दृश्य की अनूठी सौन्दर्य लय तो अंवेरते  ही है साथ ही जो कुछ दिख रहा है, उसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े भावों को भी जैसे हमसे साझा करते हैं। हवामहल, मोतीडूंगरी के अतीत के साथ ही वर्तमान विकास से जुड़े दृश्य चित्रों के साथ वह बड़ी इमारतों, माॅल्स की निर्माण लय में जैसे भविष्य की आहट बुनते हैं। छायाचित्रों की उनकी सूझ में दिख रही चलचित्र के दृश्यों की मानिंद मन में हलचल करती हममें जैसे बसती है।


Friday, February 28, 2014

रंग परतों के अनूठे बिम्ब


कलाएं यथार्थ में जो दिख रहा है, उसके अन्र्तनिहित सच में हमें प्रवेश कराती हैं। माने वहां दृश्य से अधिक अदृश्य की सत्ता होती है। शायद इसीलिए कोई चित्र हम देख रहे होते हैं तब और उस देखने के बाद के अन्तराल मंे दृश्य की हमारी अनुभूतियां बदल जाती है। अभी बहुत समय नहीं हुआ, कला प्रदर्शनी में देश के ख्यात चित्रकार यूसुफ  के चित्रों का आस्वाद किया था। लगा, उनके चित्रों की रेखाओं का उजास और रंगालेप लीक से हटकर दृश्य अनुभूतियों के अनछूए संदर्भों से हमें साक्षात् कराता है। कैनवस पर वह जो रचते हैं, उसकी बड़ी विशेषता यह भी है कि वहां पक्षी, रूंख, जीव जंतुओं, कीट-पतंगों सरीखी आकृतियांे की अनुभति तो बहुत से स्तरो ंपर होती है परन्तु ठीक से यह नहीं कहा जा सकता कि जो कुछ उन्होंने मांडा हैं, वह वही है। माने उनके चित्र दृश्य जगत से जुड़ी संवेदनाओं की मन में बढत करते हैं। बल्कि कहें, देखने के बाद के समय में भी उनके चित्र मन में निरंतर ध्वनित होते हैं। आप चित्र देखते हैं तो कुछ अंतराल बाद फिर से उसे देखने का आपका मन करेगा। 
यह ‘देखना’ ही उनकी कला का मूल है। स्वयं युसुफ के लिए भी और देखने वाले के लिए भी।
बहरहाल, यूसुफ  चित्र दिखाते नहीं, बंचाते हैं। माने जो कुछ वह कैनवस पर सृजित करते हैं, उसे देखा ही नहीं रेखाओं की लय में पढ़ा जा सकता है।  न जाने क्यो मुझे उनके चित्रों का आस्वाद करते रवीन्द्र नाथ ठाकुर के चित्रों की याद हो आती है। रवीन्द्र की ही भांति यूसुफ के चित्रों में  पक्षी की जो आकृतियां मंडी हैं, उस पक्षी की ठीक से कोई पहचान हम नही ंकर पाते हैं। ऐसे ही जो दूसरी आकृतियां हैं, वह हमारे परिवेश का जाना-पहचाना हिस्सा तो लगती है परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि वह हैं क्या? उनक चित्रों में जो कुछ है वह उड़ान लिए या फिर तैरते हुए से है। तितली, पक्षी, भुजाएं फैलाए मानव, कीट-पतंगे और भी इस तरह की रेखाओं के जाल में उलझी-सुलझी बहुत सी आकृतियां। तानों में रचे रंग छन्द! परत दर परत रंगालेप। 

एक चित्र है जिसमें करीने से मांडी हुई लाईनें हैं-सीधी सट। रेखा पाश्र्व को भूरे गहरे रंगों में संयोजित करते यूसुफ ने नीचे से ऊपर या कहें ऊपर से नीचे एक श्रृंखला में पक्षी सरीखी आकृतियां रची है। ऐसे ही एक अन्य चित्र में सुनहरे पाश्र्व में भी रेखाएं है परन्तु इनसे जो उभरे दृश्य हैं उनसे खिड़की, दिवार और दरवाजों सा कुछ दृश्य सामने प्रकट होता है। ऐसे ही एक अन्य में उड़ान है परन्तु वहां इस उड़ान में संयोजित बहुतेरे घुले रंगों के थक्के दृश्य के भीतर भी बहुत से दूसरे दृश्यों को समेटते पृथ्वी, जल और आकाश को ही जैसे रच रहे हैं। 

आकृतियों की ऐसी अनुभूतियां और भी होती हैं जिनमें करीने से लोक चित्रों सरीखी चैकोर सज्जा और बीच में गोल्डन में गोल। और फिर रेखा विभाजन। मुझे लगता है, यूसुफ  के चित्र परतों में निहित सौन्दर्य के संवाहक हैं। वह कैनवस पर पारदर्शी रंग परतों में आकृतियों के अनूठे बिम्ब हमारे समक्ष रखते हैं। रेखाओं की सौन्दर्य लय अवंेरते वह पारदर्शी सतहों में बहते रंगों को रोकते झीनेपन में अपने को सिरजते हैं। सहसा कबीर की स्मृति होती है। रंगालेप देख कबीर की साखियां मन में गूंजने लगती है। चित्र हैं परन्तु उनमें कबीर सा फक्कड़पन भी है। आकृति का कोई मोह जो वहां नहीं है। रेखाओं के ताने-बाने में बुनी अर्थ के आग्रह से मुक्त रूपाकृतियों का सुनहरा लोक ही तो है यूसुफ  के चित्र।

Friday, February 14, 2014

कला मेला बने उत्सवधर्मिता का संवाहक


 कलाकृति : चिंतन उपाध्याय 
राजस्थान ललित कला अकादमी का कला मेला इस बार जवाहर कला केन्द्र के शिल्प ग्राम में हुआ। पिछली बार यह रवीन्द्र मंच पर हुआ था। इस बार मेले के स्टाॅलों पर सजी कलाकृतियों का आस्वाद करते लगा, स्थान विशेष की बजाय कलाकृतियों का अब वैश्विक मुहावरा बनता जा रहा है। कलाओं में रूपायन की विविधता जैसे सिमटती जा  रही है। कहीं ओर जो हो रहा है-वही हर छोर हो रहा है। वैश्विकरण के फायदे भी हैं परन्तु बड़ा नुकसान यह भी है कि विविधता की हमारी समृद्ध धरोहर से हम इसके कारण निरंतर वंचित भी होते जा रहे हैं।
बहरहाल, कला मेले का यह लाभ तो है कि राज्यभर के कलाकारों से एक स्थान पर ही संवाद, भेंट का अवसर हो जाता है। परन्तु कला मेले के आयोजन का जो तरीका है, मुझे लगता है उसमें बदलाव की दरकार है। कलाकारों से यह सुनना कि मेले में उनकी कलाकृतिया बिकी नहीं और इस दृष्टि से कलामेले की उपयोगिता पर बहस गैरजरूरी है। कलाकृतियां बिके पर कलामेलों में यह कार्य आर्ट गैलरी करे तो अधिक बेहतर है। बाजार में कलाकार स्वयं ही अपनी कलाकृतियां बेचने बैठ जाएगा तो फिर दूसरी वस्तुओं और कलाकृतियों के विक्रय में भेद ही क्या रह जाएगा! यह समझने की जरूरत है कि कलाकार बाजार का वह विक्रेता नहीं है जिसका उद्देश्य वस्तु को बेचकर अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। ऐसा ही अगर होगा तो फिर मेले में बिकने वाली कलाकृतियों में खरीदार की पसंद को लेकर ही भविष्य में कलाकृतियां सृजित नहीं होगी। यह अगर होता है तो फिर क्राफ्ट-कला के भेद का क्या होगा! आम तौर पर जिन कला मेलों में सम्मिलित होता रहा हूं, वहां पर कलाकृतियां तो होती है परन्तु कलाकारों को वहां अपनी कलाकृतियां बेचते नहीं देखा। आर्टगैलरी स्टाॅल लेती है, वहां जरूर अपनी कलाकृति के साथ बहुतेरी बार सबंधित कलाकार मिल जाता है। यही होना भी चाहिए। कलाकार इतना दीन-हीन नही ही दिखना चाहिए कि वह स्वयं स्टॅाल बुक कराए, उस पर बाकायदा बैठे और फिर अपनी कलाकृतियों की दर्शकों के लिए नुमाईश करे। 
राजस्थान ललित कला अकादमी की अध्यक्ष श्रीमती किरण सोनी गुप्ता स्वयं कला संवेदना से लबरेज व्यक्तित्व है, कलाकार है। कलाओं पर मौलिक सोच भी वह रखती ही हैं। ऐसे में उनके जरिए वर्षों से अकादमी में इस तरह की चली आ रही परम्पराओं में बदलाव की अपेक्षा तो बनती ही है। क्यों नहीं यह हो कि कला मेला हो परन्तु वहां कलाकार स्टाॅल पर बैठे रहने से मुक्त हो। वह सम्मान से वहां आए, अपने परिजनों को भी लाए और समूह में प्रदर्शित अपनी कलाकृतियांे का चाव से उन्हंे आस्वाद कराए। कला फिल्मों का दर्शक बनते कला बारीकियों में जाए, अपने तई कलाओं के संवाद में हिस्सा भी ले। यह हो सकता है। अकादमी को यह भर करना है कि कलाकारों से मेले के लिए कलाकृतियां मंगवाई जाए। जवाहर कला केन्द्र कलादीर्घाओं में बाकायदा उनका प्रदर्शन हो और शिल्पग्राम तब कला संवाद का मंच बने। आर्ट गैलरी, शिक्षण संस्थाओं, कला पुस्तक विक्रेताओं, कला प्रशिक्षण संस्थानों को अकादमी स्टाॅल दे और यह सब कलाकारों की कलाकृतियां का विपण्पन करे। कला प्रदर्शनी के साथ मेले में प्रतिदिन कलाओं की नवीन उभर रही प्रवृतियां, परम्परागत धरोहर और तमाम दूसरे विषयों पर कलासंवाद, फिल्म प्रदर्शन जैसी गतिविधियां की जा सकती है ताकि कलाओं पर लिखने वाले, कलाकार और कलाप्रेमियों के बीच संवाद की रहने वाली कमी को पाटा जा सके। 
कलाएं व्यक्ति में उत्सवधर्मिता का संचार करती है। कला मेलों के आयोजन का उद्देश्य भी शायद यही है तो फिर क्यों न इसके लिए अकादमी अपनी चली आ रही परम्पराओं में बदलाव कर कला के लिए कुछ सुखद की संवाहक बने!

Sunday, February 9, 2014

पुस्तक चर्चा में "रंग नाद"


राजस्थान पत्रिका, रविवारीय के आज के अंक में पुस्तक चर्चा में "रंग नाद" है.
आप भी करें आस्वाद-

http://epaper.patrika.com/c/2349105 

Friday, February 7, 2014

शास्त्रीय चिन्तन से जुड़ी कला

      डॉ. चित्रा शर्मा निर्मित वृत चित्र-कत्थक का रायगढ़ घराना

चित्रकला, मूर्तिकला, छायांकन या फिर ऐसी ही किसी अन्य दृश्य कला में सादृश का अर्थ यथार्थ का अनुकरण है, वास्तव का बिंब। परन्तु अनुकरण कैसा? लौकिक नहीं। अनुकरण वह जिसमें अमूर्त को मूर्त करने के संदर्भ निहित होते हैं। संगीत को चित्र में कैसे परिवर्तित करेंगे? वह तो अमूर्त है।...नृत्य की किसी भंगिमा को अमूर्त कैसे कहेंगे? वह तो दिख रही होती है! मुझे लगता है, मूत-अमूर्त हमारी मन:सिथति है। इसीलिए तो संगीत के अमूर्त को हर छोटे से छोटे भाग में, अंश में उसके स्वभाव को जब सांगीतिक रूप में खोजा जाएगा तो वह संगीत का चित्रण होगा। ऐसे ही नृत्य की की किसी भंगिमा में जुड़े कहन के किसी संदर्भों की तलाश करेंगे तो दृश्य में अदृश्य की खोज औचक ही हो जाएगी। नृत्य का अमूर्तन उसके रचे भाव छंदो में ही तो है!
बहरहाल, कथक के रायगढ़ घराने पर डा. चित्रा शर्मा ने अदभुत वृत्तचित्र दूरदर्शन के लिए बनाया है। इसका आस्वाद करते लगता है, कथक किसी भी घराने का हो, वह शास्त्रीयता के संदर्भों में जीवन के मर्म और संवेदनाओं को हमारे समक्ष उदघाटित करता है। वृत्तचित्र में राजा चक्रधर सिंह और उनके द्वारा प्रवर्तित कथक के रायगढ़ घराने पर सृक्ष्म सूझ है। संगीत, नृत्य मर्मज्ञ लेखिका डा. चित्रा शर्मा कथक के रायगढ़ घराने के अतीत में ले जाती हुर्इ कथक में नृत्य से जुड़े शब्दों के संस्कृत शास्त्रों की बारीकियों से रू-ब-रू कराती है। कथक नर्तकों से संवाद के जरिए, उनकी नृत्य प्रस्तुतियों के जरिए और हां, स्वयं के अनथक शोध के जरिए भी। कथक से जुड़े संदर्भों की भरमार तो खैर दूरदर्शन के उनके उस वृत्तचित्र में है ही पर बड़ी बात उसमें निहित कथक के रायगढ़ घराने से जुड़े अछूते वह संदर्भ हैं जिनमें कथक की शास्त्रीयता के साथ कहन की लय को अंवेरा गया है। चित्राजी ने राजा चक्रधरसिंह प्रवर्त कथक में बंदिषों, तोडो, परन आदि के साथ जो कुछ नया जोड़ा गया, उसके बारे में बहुत कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां दी है। यह जानकारियां भी संवाद के जरिए नहीं है बलिक नृत्य की भाव-भंगिमाओं के जरिए देने का प्रयास किया है। मैं मसझता हूं, किसी भी दृश्य चितराम के अमूर्त निहितार्थ यही है कि थोड़े में बहुत कुछ कहा जाए। ऐसा जिससे दृश्य के साथ-साथ उससे जुड़ा तमाम भी अमूर्त में आंखों के समक्ष जीवंत हो उठे। इस दीठ से कथक के रायगढ़ घराने पर चित्राजी के दूरदर्शन के लिए किये इस कार्य की कूंत होनी भी जरूरी है। इसलिए कि नृत्य, संगीत में जो कुछ होता है-अभी तक वह कुछेक लोगों की ही जैसे जागीर बन गया है।
डेली न्यूज़, 7 फरवरी, 2014 
रायगढ़ घराने के कथक की अमूर्तता में जाएंगे तो कथक के जयपुर घराने की भी याद आती है। जयपुर घराने में पांवो से शुद्ध बोल निकासी पर जोर है। माने हर बोल पैर से निकाला जाता है। पद संचालन पर वहां अधिक ध्यान है। लय बांधते हुए नर्तक पैर की भाषा जैसे रचता है। और यह भाषा अमूर्त होते हुए भी दृश्य के अनंत संसार से हमें रू-ब-रू कराती है। और फिर यह भी तो है कि कथक में नर्तक भाव-मुद्राओं से पूरी कहानी नहीं बांचता है। वह उसमें निहित किसी एक क्षण को ही जीवंत करता है। यही नृत्य का वह अमूर्तन है जिसमें दृश्य की किसी एक झलक की स्मृति भर जगायी जाती है।
कथक हमारे शास्त्रीय चिंतन और सरोकारों से जुड़ी कला है। डा. चित्रा शर्मा कहती हैं, 'लोकनाटयों की समृद्ध परम्परा को नृत्य की शास्त्रीय परम्परा से जोड़ा जा सकता है पर नाटय प्रस्तुतियों के साथ कोरियोग्राफी का खेल ही यदि नृत्य में होता है तो वह संस्कृति के साथ धीरे-धीरे अपसंस्कृति का प्रवेश ही होगा। इधर कथक के नाम पर जो कुछ अनर्गल हो रहा है, उसका सच क्या यही नहीं है! 



Tuesday, February 4, 2014

कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध



संगीत में स्वरों से भाव सृष्टि है तो चित्र में रूप-रेखाओं से। हमारे यहां तो स्वरों में भी रंगों का उल्लेख है। राग-रागिनियों का चित्रात्मक प्रदर्शन इसी का द्योतक है। मुझे लगताहै, कलाएं कलाकार की स्वानुभूति को रूपायित करती है। पर यह ऐसे ही नहीं होता। इसके लिए साधनारत होना पड़ता है। अपनी कला ही नहीं दूसरी कलाओं में भी जाना होता है। प्रकृति को अनुभूत करना होता है। इसी से मन के संवेग रंग-रेखाओं के साथ संगीत, नृत्य, नाट्य में परिणत होते हैं। तभी कोई कलाकृति समग्रता में हमें लुभा पाती है। 
सर्बरी राय चैधरी ने अपनी मूर्तिकला में बहुत से स्तरों पर संगीत की दृश्य छवियां निर्मित की हैं। यह ऐसी हैं जिनका आस्वाद करते संगीत से जुड़ी स्मृतियां औचक ही मन में झंकृत होने लगती है। इसके पीछे शायद उनकी वह दृष्टि रही है, जिसमें एक कला दूसरी कला को अपने तई अंवेरती है। एक दफा वह प्रख्यात सरोदवादक अली अकबर खां को अपनी मूर्तिकला में ढालना चाह रहे थे। उन्होंने देखा, वाद्य बजाते तो उनका चेहरा पूरी तरह बदल जाता। वह पूरी तरह से तल्लीन और केन्द्रित हो जाते। मानो किसी चिंतन में गहरे डूब गए हों। सर्बरी राय चैधरी लिखते हैं, ‘जब भी उन्हें वाद्य बजाते देखता, बुद्ध की तस्वीर नियत ढंग से मेरे दिमाग में बैठ जाती। मैं उस दृश्य को कैद करना चाहता था। इसीलिए मैंने उन्हें ऐसी मुद्रा में बैठने का आग्रह कर राजी किया। पर चेहरे का वैसा हाव-भाव मुझे दिखाई तब भी दिखाई नहीं दिया। दूसरे दिन उनका बेटा ध्यानेश उन्हीं का अनुकरण करते सरोद बजा रहा था। उसने गलत धुन बजाया। और बस मैंने पा लिया। मुझे जिस दृश्य की तलाश थी, मुझे मिल गया। मैं सम्मोहित हो गया। मेरे लिए यह ईश्वर को पा लेने जैसा था। मैंने उनकी मूर्ति बना ली।’


डेली न्‍यूज, 31 जनवरी, 2014

जिस दृश्य छवि को मूर्तिकार पाना चाहता था, उस्ताद अली अकबर खां को वैसी ही छवि में मूर्ति बनाने के लिए बैठाया भी गया परन्तु तब वह छवि अपनी कला के लिए कलाकार नहीं पा सका। क्यों? इसलिए कि कला में जो कुछ दिखाई देता है-वही सच नहीं होता। बड़ा यथार्थ वह नहीं होता जो हम देख रहे होते हैं, वह होता है जो देखने के बाद हमारे मन में घट रहा होता है। आनंद कुमार स्वामी ने शायद इसीलिए कलाओं को ट्रांसफाॅर्मेशन कहा है। क्योंकि वहां देखे हुए की नकल नहीं होती। वह रूपान्तरण होता है। एक प्रकार से पुनसर्जन। यह प्रभावी तभी होता है जब कलाकार का नाता अपनी कला से ही नहीं होता बल्कि तमाम दूसरी कलाओं से भी होता है। वह अपनी कला में रम रहा होता है परन्तु दूसरी कलाएं उसके लिए तब प्रेरणा के रूप में सर्जन को संवारने का काम कर रही होती है। यही किसी कला की समग्रता भी है।
कहते हैं, राजा रवि वर्मा सुबह चार बजे उठकर चित्र बनाते थे। प्रकाश-छाया के सूक्ष्म अध्ययन और आकलन के लिए यह समय शायद उनके लिए सर्वथा उपयुक्त रहता होगा। अंधेरे की विदाई, उजास का आगमन। प्रकृति की यात्रा दीठ के संवाहक बनकर ही उन्होंने प्रकाश-छाया को अपने चित्रों में जीवंत किया। कलाकार जब तक प्रकृति में घुले रंगों से तादात्म्य नहीं करेगा, वह अपने तई रंग-रेखाओं से चाहकर भी दृश्य की जीवंत छवियां उकेर ही नहीं पाएगा। माने प्रकृति में निहित जो कला है उससे भी कलाकार अपने को जोड़े। इसी से उसकी कला समृद्ध होगी। एक कला इसी तरह दूसरी कला को सदा समृद्ध करती है।



Friday, January 24, 2014

चिंतन उपाध्याय की कलाकृति "मार्चिंग टुवर्ड्स नो वेयर"

कलाकृति में सौन्दर्य बढ़त

चिंतन उपाध्याय प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। ऐसे जिन्होंने कला में परम्परा में बढत करते हुए बाजार मूल्यों को बहुत से स्तरों पर तय भी किया है। कला दीर्घाओं में उनकी कलाकृतियां लाखों में नहीं करोड़ों में बिकती है। इसलिए कि उन्होंने जड़ होते जा रहे जीवन मूल्यों को अपने तई आधुनिकता का नया कैनवस दिया है। भले उनके कलाकर्म को बहुत से स्तरों पर आधुनिकता से जुड़ी पाश्चात्य संवेदना से अभिहित किया जाता रहा है परन्तु मुझे लगता है एक बड़ा सच उनकी कलाकृतियों का यह भी है कि उनमें भारतीय कला शैलियों की जीवन्तता है। लोक कलाओं का उजास है और हां, बड़ी बात यह है कि किसी एक शैली की बजाय उनमें तमाम भारतीय और योरोपीय शैलियां ध्वनित होती है। सूजा के चित्रों की नग्नता के कुछ अंश भी वहां है, माइकल एंजेलो की मांशपेशियां की याद भी उनके चित्र दिलाते हैं परन्तु मूल बात उनके चित्रों की है, उनमें निहित भारतीयता। पारम्परिक भारतीय चित्रों के सौन्दर्य को वह अपनी कलाकृतियों में ठौड़-ठौड़ अंवेरते हैं।  
कोई एक दशक से निरंतर उनकी कलाकृतियों का आस्वाद करता रहा हूं। याद पड़ता है, जवाहर कला केन्द्र में इंस्टालेशन आर्ट की एक प्रदर्शनी लगी थी। शीर्षक था, ‘टेटूंआ दबा दो’। भू्रण हत्या के केन्द्र में संस्थापन के अंतर्गत इसमें बहुत कुछ भदेस भी था। तब उसके इस संस्थान को देखकर कला में सदा ही सौन्दर्य की तलाश करने वाला मन कुछ विचिलत हुआ। चाहा था, कुछ लिखूं पर लिख कहां पाया! जिस सौन्दर्य को हम अपने तई परिभाषित करते हैं, लेखक मन उसी में जीना चाहता है। कुछ  पूर्वाग्रह चिन्तन की कला को लेकर तभी शायद उपजे और उसके बाद कभी उसके कलाकर्म पर कभी गहरे से गया ही नहीं। 
बहरहाल, मकर सक्रांति पर कलाकार मित्र विनय शर्मा के साथ चिन्तन के घर था। पतंग उड़ाने की उनकी नूंत के साथ। पतंग उड़ाना तो बहाना था, वहां एकत्र होने वाले कलाकारों के सान्निध्य की चाह प्रमुख थी। वहीं चिन्तन के स्टूडियो में उसकी कलाकृतियों से भी रू-ब-रू हुआ। आस्वाद हुआ, आर्ट समिट में भेजे जा रहे एक बड़े से स्कल्पचर का और इस सबसे अलग कुछ समय पहले सृजित उस बड़े कैनवस का भी जिसने चिन्तन के कलाकर्म को लेकर बने पूर्वाग्रहों को मुझसे विलग किया। उस कलाकृति को देख लगा, चिन्तन के कैनवस पर उकेरी मानव आकृतियां तेजी से कहीं बढ़ती जा रही है। किस ओर? कुछ तय नहीं। कसी हुई मांशपेशियांॅं, बल को दर्शाते कदम। दो भागों में विभक्त कैनवस का पाश्र्व लाल से पीलेपन में आगे बढ़ रहा है। गौर किया तो पाया, मार्चिंग के मध्य एक ट्रेन की छाया छवि है। और गौर किया तो अनुभूत हुआ छवियों का सूक्ष्म संसार।  लगा, चिन्तन की कलाकृतियों का नन्हा बालक हस्ट-पुस्ट मांशपेशियों के साथ यंत्रनुमा चलायमान है। गति है, बल है पर यह सब जैसा कि कैनवस का शीर्षक है, ‘कहीं नहीं की दिशा में अग्रसर’ है। 
चिन्तन की यह कलाकृति एक दृश्य के भीतर अनगिनत दृश्यों का लोक है। राजस्थान की मिनिएचर, मांडणे, शेखावटी के कुंओं का स्थापत्य, मुगल शैली के गुम्बद, मिनारें और सभ्यता के इतिहास से जुड़े और भी बहुतेरे अवशेष। कहें, कलाकृति में संस्कृति से जुड़ी संवेदनाओं के मर्म उद्घाटित हुए हैं। हरे पतों, बेलों में प्रकृति भी है पर, यह सब इस कलाकृति का आधा सच है। पूरा सच इसमें निहित वह आधुनिकता है, जिसमें कोरी हुई छाया-छवि में ‘मैकडानल्ड’, ‘टेटूआ दबा दो’ में निहित भ्रूण और कांक्रिट का वह जंगल है जिसमें संवेदना रहित मनुष्य जी रहा है। कलाकृति आधुनिकता की गति को जैसे गहरे से व्यंजित करती है। लगता है, मशीनीकरण में सब कुछ लोप हो रहा है-जीवन मूल्य, मनुष्यता और मनुष्य होने का एकमात्र बोध भी। और इस सबसे साक्षात् कराने वाले कलाकार हैं चिंतन। यह जब लिख रहा हूं, अनुभूत कर रहा हूं-सौन्दर्य हमारी दृष्टि में है। दीठ के विस्तार में! चिन्तन का कलाकर्म दीठ की बढ़त ही तो है!