Friday, July 22, 2011

कला का अनूठा शब्द आस्वाद

मनीष पुष्कले मूलतः चित्रकार हैं परन्तु रचना प्रक्रिया को बयां करते वह अंतर्मन संवेदनाओं के अछूते, अनूठे लोक में ले जाते हैं। कला मर्मज्ञ मित्र पीयूष दईया ने कुछ समय पहले उनसे लम्बा संवाद किया था। उसकी परिणति ही है सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘सफ़ेद स(ा)खी’। पिछले दिनों मनीष ने जब यह भेजी तो सुखद अचरज हुआ। हिन्दी में कला पुस्तकों की बंधी-बंधायी लीक को तोड़ती, गद्य की अद्भुत लय अवंेरती है यह। संवाद में भले पीयूष ने इसमें अपने शब्दों को मौन कर केवल मनीष के कहे को ही धरा है परन्तु सृजन की उनकी गहरी दीठ को मनीष की रचना प्रक्रिया को खंगालने में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।

बहरहाल, कला में संवाद की प्रचलित अवधारणाओं के जड़त्व को तोड़ती पुस्तक मनीष के चित्रों, उनकी शैली के साथ ही कैनवस को परोटते रंग, रूपाकारों के व्यक्त, अव्यक्त का सर्वथा नया अर्थ विस्तार करती है। कला की शास्त्रीय अवधारणाओं से इतर मनीष का कैनवस चिन्तन वर्तमान संदर्भो के साथ ही अंतर्मन संवेदनाओं के बहुत से अनुभवों से संपृक्त होकर नई अर्थवत्ता लिये पुस्तक में हमारे सामने आता है। कला चिन्तन की समृद्ध परम्परा के साथ ही इतिहास, मिथक, आख्यान, किस्से-कहानियांे का सम्यक उपयोग करते मनीष ने पुस्तक के जरिये कला समझ की एक प्रकार से नई दीठ भी हमें दी है। इस दीठ में चित्रोद्भव की मनीष की तमाम संभावनाओं में कैनवस के निर्विकार सफेद की निर्गुणी स्मृतियां है। ‘रंग अदृश्य को ओढ़ने की चादर’ जैसी खूबसूरत अभिव्यंजना है तो गोगां की सकल चित्र-यात्रा में संश्लिष्ट रूपधर्मिता के एहसास की उनकी अलहदा अनुभूतियां भी है। मनीष इसमें नैन्सी हॉल्ट, रिचर्ड सेरां, लैग के साथ ही अनीष कपूर, डेमियन हर्स्ट, रोथको, रूसो, रोदां, मूर आदि की कला भाषा पर जाते हैं तो प्रभाकर कोलते, राजेन्द्र धवन नसरीन मोहमदी, रजा, जे.राम पटेल, अम्बादास, रामकुमार, गणेश हलोई के कला उत्स की बारीकियों से भी अनायास साक्षात्कार कराते हैं। स्वयं अपने चित्रों के बारे में वह कहते हैं, ‘मेरे चित्र होने के चित्र नहीं, न होने के चित्र हैं।’

गायतोण्डे से मनीष गहरे से प्रभावित रहे हैं। उनके पहले और अंतिम दर्शन, स्पर्श की अनुभूति की मनीष की अभिव्यंजना ‘सफ़ेद स(ा)खी’ में मर्म को गहरे से छूती है तो प्रियम्वदा और देवव्रत की कथा के जरिये वह अपने चित्रों की अनूठी साख भरते हैं। रेखाचित्रों पर उनका कहा जरा देखें, ‘...रेखा कागज के निरंजन सफेद को आविष्ट करती है, विचलित भी। यह सफेद को संहित करती है। और उसके असीम का अपने एक नन्हें से बिन्दु-रूप से सन्धान करती है। यही रेखा की विभूति है। मुझे रेखाचित्र इसीलिए भाता है कि यह सीधे-सीधे सफेद और काले का मेल है-मानो अपने विपर्याय की सन्धि।’ जल रंगों की उनकी व्याख्या भी अलग से लुभाती है, ‘जलरंग प्रभावी व अचूक है। जो चूके तो चित्र चातुर्य धरा रह जाय...जल-रंग शुरू से आखिर तक चैतन्य को एकाग्र रहने के लिए बाध्य करता है।..’ डेविड हॉकन, अज्ञेय, अशोक वाजपेयी, बर्वे, बावा, फ्रांसिस बेकन आदि के उद्धरणों से मनीष का कहन भी अलग से ध्यान खींचता है।

सच! ‘सफ़ेद स(ा)खी’ कला का अनूठा शब्द आस्वाद है। ऐसा कला वातायन भी जिससे छनकर आता है किसी कलाकार की अनुभूतियों, संवेदनाओं और विचारों का अनपेक्षित आलोक। मनीष के विचारों को शब्दों का गजब आकाश भी पीयूष ने इसमें बहुत से स्तरों पर दिया है। ऐसा करते वह कलाकार के मनोलोक के साथ ही स्वयं अपने चिन्तन में झांकने का स्पेस भी हमें देते हैं। हिन्दी में कला पर इस तरह की पुस्तक का आना एक नयी शुरूआत है। सुखद। इसलिये कि यह कला संवाद, चिन्तन और समझ के हमारे बहुत से पूर्वाग्रहों को तोड़ती है। अज्ञेय ने कभी अपने डायरी लेखन को ‘अंतः प्रक्रियाएं’ की संज्ञा दी थी। ‘सफ़ेद स(ा)खी’ पढ़ते अज्ञेय की यह संज्ञा गहरे से मन में घर करती है।

Friday, July 15, 2011

अभिनय शास्त्र में भाव लिपियों की सर्जना


संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम भारतीय कलाओं में सृष्टि का अनुकरण है। वहां सृष्टि के संदर्भ में विषेष दृष्टि है। कलाओं का तमाम हेतु यह विषिष्ट दृष्टि ही तो आखिर है। कभी ब्रांकुषी ने कहा था, ‘भारतीय कला संयम से निकलती है। वहां धारा का आवेग और तटों का सयंम है।’ सच भी यही है। कठिन होने के बावजूद यह प्रक्रिया हमारी कलाआंे में साध्य होती है। नाट्य को ही लीजिये। विषालता का वहां कोई छोर नहीं है। नाट्य के तीनों ही उपादानों वस्तु, पात्र और रस में नव उन्मेष की अनंत संभावनाएं हैं। हम नाटक देखते हैं तो आनंद, रूप रस और विराट का अवर्णनीय अनुभव ही तो होता है। कालिदास ने इसीलिए कहा भी कि भिन्न रूचि वाले लोगों के लिये नाट्य अनूठा समराधन है। माने जरूरी नहीं है कि आपमें नाट्य कौषल हो, जरूरी नहीं है कि आपमें नाट्यानुराग है, जरूरी नहीं है कि नाटक की आपको पूरी समझ हो फिर भी नाट्य का रस आप प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये कि वहां उदात्तता है। देष, काल और अन्विति पर वहां बल जो नहीं है। यह जब लिख रहा हूं भरत मुनि की याद औचक ही जहन में कौंध रही है। नाट्य शास्त्र की बात हो और उनका स्मरण न हो यह हो भी कैसे सकता है! भरतमुनि रचित नाट्य शास्त्र एक व्यक्ति का नहीं, पीढ़ियों के संचित अनुभव, चिंतन और ज्ञान को समाहित किये हुए है। इसमंे नाट्य की उत्पति की मिथक कथा में सृष्टा स्वंय ब्रह्मा कहते हैं, ‘नाट्यवेद में कहीं धर्म है, कहीं अर्थ है, कहीं क्रिडा, कहीं शाति अथवा श्रम, कहीं हंसी, कहीं युद्ध, कहीं काम और कहीं वध का अनुकरण है।...न कोई ऐसा ज्ञान है, न षिल्प है, न विद्या है, न कोई ऐसी कला है, न योग है और न ही कोई कार्य ही है, जो इस नाट्य में न प्रदर्षित किया जाता हो।’ सोचिए! रंगकर्म से समाज को संस्कारित करने की ऐस अपेक्षा क्या कहीं और किसी कला में मिल सकती है!

मुझे लगता है, यह नाट्य शास्त्र के रचियता भरतमुनि की उदात्त दीठ ही है जिसमें नाट्यकर्म मनोरंजन मात्र नहीं होकर संस्कार की एक अनूठी कला के रूप मंे हमारे समक्ष है।

बहरहाल, भरतमुनि के नाट्यषास्त्र की आलोचनात्मक विवेचना तो बहुत से स्तरों पर हुई है परन्तु कला समीक्षक और रंगकर्म से गहरे से जुड़े मित्र गौतम चटर्जी ने नाट्यषास्त्र के देषकाल की खोज कर इधर अनुठा शोध कार्य किया है। बनारस से पिछले दिनों जब वह जयपुर आये तो निवास पर भी आये। रंगकर्म भी खुब बतियाये भी। कहने लगे, भरतमुनि का ईसा पूर्व 463 में काषी मंे जन्म हुआ और वहीं उन्होंने नाट्यषास्त्र की रचना की थी। संगीत विमर्ष की तर्ज पर गौतम चटर्जी इधर अभिनय शास्त्र की भी रचना कर रहे हैं। नाट्य शास्त्र को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कैसे इस्तेमाल किया जाये, इसे ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने इससे 36 अभिनय सूत्र निकाले हैं। संगीत में जिस प्रकार स्वरलिपियां है, उसी तरह अभिनय के लिये भी वह भाव लिपियों के सर्जन का कार्य कर रहे हैं। विज्ञान और भाव प्रवणता के साथ गायन, नृत्य को जोड़ते वह अभिनय शास्त्र का जो नया आयाम बना रहे हैं, उसमें स्वयं उनके अनुभवों का विराट भव है। वहां अभिनय की बारीकियों के साथ ही परम्परा और आधुनिकता का सांगोपांग मेल भी है। अभिनय शास्त्र के अंतर्गत भाव लिपियों के आविष्कार का उनका यह कार्य रंग विचार को नया आलोक तो देगा ही, रंगकर्म की बुनियादी उलझनों के सुलझाव का भी मार्ग प्रषस्त करेगा। मुझे लगता है, रंग परम्परा का एक अनिवार्य संदर्भ भी इससे हमे मिल सकेगा। आप क्या कहेंगे!


Friday, July 8, 2011

सिनेमा की कला दीठ


तमाम कलाओं का हेतु संवेदना है। चित्रकला, काव्य, नृत्य, नाट्य और संगीत के साथ ही सिनेमा को आपस में जोड़ने का कार्य संवेदना ही करती है। मणी कौल ने तमाम अपनी फिल्मांे मंे यही किया है। कैमरे के जरिये दृष्य संवेदनाओं और अनुभूतियों का वह जो अनंत आकाष रचते रहे हैं, उनमें तमाम भारतीय कलाओं का सम्मिलन देखा जा सकता है। सिनेमा में स्थापत्य, संगीत, चित्रकला और भावों की बारीकियों में जाते उन्होंने चाक्षुष सौन्दर्य का सर्वथा नया मुहावरा हमारे समक्ष रखा है।

बहरहाल, पहले पहल बिज्जी की लोककथा आधारित कहानी ‘दुविधा’ के जरिये उनके सिनेमाई नजरिये से रू-ब-रू हुआ तो दृष्यों की गति की उनकी दीठ को लेकर बेहद खीझ भी हुई थी। संयोग देखिये! इसी फिल्म को जब दुबारा देखा तो लगा, चाक्षुष के अंतर्गत कहन की तमाम संभावनाओं को मणी कौल जिस षिद्दत से संयोजित करते हैं, वैसा पहले कभी अनुभूत ही नहीं किया। मसलन मौन दृष्य में अचानक ध्वनि उभरती है और तमाम खालीपन को भर देती है तो कहीं षिल्प, स्थापत्य में समय के अवकाष को पकड दिक्-काल के भेद को समाप्त किया जा रहा है। दूर तक भूखंड...दृष्य अनंतता। कैमरा बस मूव कर रहा है, औचक किसी पात्र की भंगिमा कहानी को आगे बढ़ा देती है। दृष्य कहन की यह बारिकी ही उनके सिनेमा संवेदना का मूल रही है।

‘दुविधा’ को ही लीजिए। दृष्य संवेदनाओं का अनंत आकाष वहां है। पात्र हैं और मौन में भी वह अपनी भूमिका निभा रहे है। कुछेक देर के लिए होंठ खुलते हैं फिर कैमरा किसी दृष्य पर केन्द्रित हो जाता है। दृष्यों, भंगिमाओं के जरिये संवेदनाओं को उभारता कैमरा कहानी को आगे बढ़ाता है...खाली दीवारें, उनकी छाया, पूते हुए रंग, पेड़ और उसकी परछाई में ही आप राजस्थान को, यहां की बनियावृत्ति को और राजा-महाराजाओं की संस्कृति को अनायास गहरे से अनुभूत कर लेते हैं। बिज्जी की ‘दुविधा’ पर अमोल पालेकर ने बाद में शाहरूख खान को लेकर ‘पहेली’ भी बनायी। ताम-झाम के बावजूद ‘पहेली’ नाटकीयता की अति में अंतर्मन संवेदनाओं को कहीं से जगाती नहीं लगती जबकि मणी कौल की ‘दुविधा’ में स्त्री की पीड़ा, उसके सौन्दर्य की भयावह परिणति और अर्थ लोलुपता की मार्मिक अभिव्यंजना मंे तिरोहित होते मूल्यों को दर्षक गहरे से अनुभूत कर लेता है। सांकेतिक दृष्य और बिम्ब का ऐसा रचाव ही मणी कौल की फिल्मों की विषेषता रही है। ठुमरी गायिका सिद्धेष्वरी देवी पर बनायी डाक्यूमेंट्री ‘सिद्धेष्वरी’ में उन्होंने श्रृव्य का गजब दृष्य रूपान्तरण किया तो  मोहन राकेष के नाटक ‘असाढ का एक दिन’ पर इसी शीर्षक से बनायी उनकी फिल्म में भी दृष्य संयोजन की प्रयोगधर्मिता का जो ताना-बाना है, उसे कभी बिसराया नहीं जा सकता।

चाक्षुष संदर्भों की भरमार में दृष्यों को संयोजित करते कौल कहन की तमाम संभावनाओं को कैमरे के जरिए इस खूबसूरती से संप्रेषित करते रहे हैं कि देखने के बाद भी आप उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाते हैं। ‘इडियट’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘ध्रुपद’, ‘नौकर की कमीज’, ‘ए मंकीज रेनकोट’ जैसी फिल्मों में उनका कैमरा गैर संवेगात्मक दृष्यों में मूव करता तमाम दूसरी कलाओं के अव्यक्त से भी साक्षात् कराता है। यह जताते कि तमाम कलाओ की आवाजाही के रूप विधान के बावजूद सिनेमा अद्वितीय विधा है।

बहरहाल, मोबाईल पर  पीयूष दईया ने जब मणी कौल के नहीं रहने की सूचना दी तो मन उनकी देखी फिल्मों में जाने के साथ ही हिन्दी सिनेमा के सामाजिक प्रभावों के अध्येता और जर्मन विद्वान डॉ. लोठार लुत्से के कहे उस कथन पर भी औचक चला गया जिसमें कभी उन्होंने हिन्दी सिनेमा को पांचवे वेद की संज्ञा दी थी। उनके कहे से गुरेज न करें तो क्या मणी कौल का जाना पंचम वेद के एक प्रमुख आधार स्तम्भ का जाना ही नहीं है!

Friday, July 1, 2011

न्यू मीडिया पर केन्द्रित ‘कैनवास’

कला के इस दौर में बहुत से स्तरों पर विचार और प्रतिक्रियाएं गहन आत्मान्वेषण से मुखरित होती कैनवस के बंधन से मुक्त है। रंग, रेखाओं के साथ डिजीटल इमेजेज और ध्वनियांे के कोलाज में दृष्यों को सर्वथा नये ढंग से रूपायित करने की कला की यह नयी दीठ न्यू मीडिया है। पिछले कोई एक दषक में कला क्षेत्र मंे न्यू मीडिया की दखल से बराबर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या कैनवस कल इतिहास बन जाएगा? क्या तकनीक भविष्य में कला कही जायेगी? और यह भी कि क्या तकनीक में रचनात्मकता की अनंत संभावनाएं पारम्परिक हमारी कलाओं को रूढ़ बना देगी? न्यू मीडिया से संबंधित इन तमाम सवालों का जवाब सद्य प्रकाषित हिन्दी की स्वतंत्र कला पत्रिका ‘कैनवास’ में ढूंढा जा सकता है।

बहरहाल, अव्वल तो हिन्दी में कला पत्रिकाएं हैं ही नहीं और जो हैं वे परम्परागत प्रकाषन की परिधि से चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाती है। ललित कला अकादमी की ‘समकालीन कला’ और स्वतंत्र रूप मंे प्रकाषित द्विभाषी ‘कलादीर्घा’ जैसी पत्रिकाओं को छोड़ दें तो हिन्दी में कला में स्तरीय ढंूढे से भी नहीं मिले। कला समीक्षक मित्र विनयकुमार के संपादन में प्रकाषित ‘कैनवास’ पत्रिका कुछ दिन पहले जब हस्तगत हुई तो एक साथ दो सुखद आष्चर्य हुए। पहला तो यही कि हिन्दी मंे भी अंग्रेजी सरीखी, बल्कि उससे कहीं बेहतर किसी पत्रिका का आगाज हुआ है और दूसरा यह कि ‘न्यू मीडिया’ से संबंधित तमाम उभर रहे द्वन्द, चुनौतियों और रचनात्मकता पर सांगोपांग विमर्ष लिए आलेख इसमें प्रकाषित किए गए हैं। मसलन प्रयाग शुक्ल ने न्यू मीडिया के अंतर्गत उभर रही कला के आकर्षण को रेखांकित करते उसकी रचनात्मक सामग्री को अपने तई व्याख्यायित किया है तो अनिरूद्ध चारी डिजीटल की प्रकृति, भ्रम और यथार्थ पर लिखते न्यू मीडिया को सामग्री और माध्यम दोनों का प्रतिनिधित्व बताते हैं। तान्या अब्राहम ने अपने आलेख में न्यू मीडिया को किसी बड़े और व्यापक सिद्धान्त और समझ को लोगों तक फैलाये जाने के लिए महत्वपूर्ण बताया है। वह जब यह लिखती है तो सहज ही यह समझा जासकमता है कि कला में तकनीक संप्रेषण का माध्यम तो हो सकती है परन्तु तकनीक को कला नहीं कहा जा सकता। डॉ. अवधेष मिश्र ने समकालीन कला के कल के अंतर्गत न्यू मीडिया की विसंगतियों को उभारा है तो समयानुकूल विषयों की रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इसे अपनाने पर जोर भी दिया है।

पूर्वोत्तर भारत में न्यू मीडिया पर पत्रिका में ढ़ेर सारी सामग्री है। मेघाली गोस्वामी न्यू मीडिया की परिधि में पूर्वोत्तर भारत को समेटते वहां की उग्रवाद की समस्या की प्रतिक्रिया में कला और उसके सरोकारों पर चिंतन करती न्यू मीडिया के अस्थायित्व की समस्या को भी गहरे से उठाती है। प्रणामिता बोरगोहेन, मनोज कुलकर्णी, संध्या बोर्डवेकर, वंदना सिंह द्वारा प्रस्तुत सामग्री भी मौजूं है।

हां, न्यू मीडिया की तमाम चर्चाओं के बीच भी विनयकुमार हेब्बार के जन्मषती वर्ष पर ज्योतिष जोषी का आलेख देना नहीं भुले है और देषभर मंे आयोजित कला गतिविधियों की जानकारियां देने की पहल भी ‘कैनवास’ के जरिये की है। प्रोफाइल के अंतर्गत समीत दास, कनु पटेल, शैलेन्द्र कुमार, कमल पंड्या, प्रतीक भट्टाचार्य, सुषांत मंडल, प्रतुल दास का कहन पत्रिका का रोचक पक्ष है। हां, पत्रिका की आधी सामग्री अनुदित है। संपादक चाहकर भी हिन्दी में कला की वांछित सामग्री जुटा नहीं पाये होंगे, इसीलिए शायद ‘कैनवास’ को अगले अंक से द्विभाषी किये जाने की घोषणा की गयी है। ष्

जो भी हो, इस बात से तो इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि स्तरीय कला पत्रिका के अभाव की ‘कैनवास’ षिद्दत से पूर्ति करती है। किसी एक विषय को लेकर उस पर गहन चिंतन, मंथन की यह पहल कला पत्रिका प्रकाषन के सुखद भविष्य का संकेत ही क्या नहीं है!

Friday, June 24, 2011

सर्वमंगला रूद्र वीणा के माधुर्य का यह मौन

 स्वरों पर अवलम्बित अद्भुत कला है संगीत। पूरी तरह से नियमबद्ध। सात शुद्ध और पांच विकृत स्वरांे को मिलाकर इसके कुल बारह स्वर हैं। बाईस श्रुतियों से निकले हैं ये स्वर। प्राचीन संगीत सिद्धान्त के अनुसार छः राग और छत्तीस रागिनियां हमारे यहां है परन्तु इनका अस्तित्व स्वरों पर ही निर्भर है। भले गायन हो या फिर वादन, स्वरों के प्रति समर्पण ही किसी कलाकार को अद्वितीय बनाता है। संगीत रत्नाकर की टीका में कल्लीनाथ मत्कोकिला को लोक में स्वरमंडल की संज्ञा देते हैं। स्वरमंडल माने स्वरों का साथ देने वाला। वीणा का उपयोग नारद स्वरमंडल रूप में ही शायद करते रहे हैं। यह सब सोचते ही ध्यान रूद्रवीणा पर जा रहा है। उस्ताद असद अली खां जेहन में कौंधने लगे हैं। कंधे पर रूद्रवीणा में श्रुति-दर-श्रुति आलाप, जोड़, झाले के बाद बंदिष पर जाते मन के तारों को झंकृत करते। सबसे बड़ी बात यह कि वह ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी तमाम उम्र रूद्रवीणा की साधना को ही समर्पित की।

रूद्र वीणा माने बीन। नारदकृत संगीत मकरंद में इसका विषेष उल्लेख है। सारिकाओं के मौलिक अंतर को छोड़ दें तो लगता है किन्नरी का ही परिष्कृत रूप कभी रूद्रवीणा रहा है। संगीतसार के अनुसार भगवान षिव को यह अत्यधिक प्रिय है। शायद इसीलिए इसे रूद्र वीणा कहा गया परन्तु पौराणिक ग्रंथ कहते हैं रूद्रवीणा में तमाम देवताओं का वास है। इसके दंड में षिवजी का, तांत में पार्वती का, कुकुभ में विष्णु, तुम्बों में ब्रह्माजी, नाभि में सरस्वती व मोरों में वासुकी नागराज का निवास है। सभी देवताओं से युक्त है यह। सर्वमंगला।

इसी सर्वमंगला के साधक असद अली खां के चिरमौन होने पर बीन की भारतीय परम्परा का ही जैसे लोप हो रहा है। पिछले पचास से भी अधिक सालों से लगातार कंधे पर रख रूद्रवीणा की विषुद्ध परम्परा को उन्होंने अपने तई ही संजोया। कहना अतिषयोक्तिपूर्ण न होगा कि उनके निधन के साथ ही धु्रपद और बीन की परम्परा के एक युग का अवसान हो गया है। उस युग का जिसमें कभी अकबर के दरबारी कलाकार मिश्रीसिंह तानसेन के धु्रपद गायन के साथ वीणा की संगत किया करते थे। बीन परम्परा के अतीत पर जाएं तो पाते हैं, जयपुर के बन्दे अली खां और रजब अली खां कभी मषहूर बीनकार रहे। रजब अली के षिष्य मुषर्रफ खां ने भी बीन को परवान चढ़ाया और बाद में उनके पुत्र सादिक अली खां ने बीन का पुराना बाज सुरक्षित रखा परन्तु जब उनका देहान्त हुआ तो लगा था कि बीन की समृद्ध परम्परा कहीं लुप्त न हो जाए। संयोग देखिए कि उनके पुत्र असद अली खां ने न केवल बीन की उस समृद्ध परम्परा को परवान चढ़ाया बल्कि रूद्रवीणा वादन जैसे कठिन साज को अपने तई सदा ही जिया।

असद अली खां सच्चे सुर साधक थे। ऐसे जिन्हांेने सदा ही इसे कंधे पर रखकर सुर सजाए, गोद में रखकर नहीं। शागीर्द भी उनके बहुत हुए परन्तु कोई सितार बजाता है, कोई सरोद...रूद्रवीणा जैसे कठिन वाद्य को किसी ने नहीं निभाया। कहते थे, ‘रूह सुर मांगती है-सच्चा सुर। आपका गाना-बजाना ऐसा हो कि पहला सुर लगते ही राह हाथ जोड़कर खड़ा हो जाए और कहे कि लीजिए मैं हाजिर हूं।...आपका सुर असरदार है तो संगीत लुभाएगा।’

बहरहाल, ध्रुपद की चार बानियों में से एक है, खंडारबानी। कहते हैं राजस्थान के के योद्धाओ के धारदार शस्त्र ‘खांडे’ से ही कभी ध्रुपद की इस बानी का नामकरण हुआ। खांडे की ही तरह धारदार और शुद्ध। खंडारबानी के बीनकार असद अली खां की रूद्रवीणा भी धारदार, शुद्ध हर आम और खास के लिए असरदार थी। रागों के साथ ही उन पर लगने वाले स्वरों पर उनका गजब का अधिकार जो था। बहाउद्दीन के बाद नाद के शुद्धतर विष्व से साक्षात् कराती रूद्रवीणा का माधुर्य अब और कहां मिलेगा!

Friday, June 17, 2011

नमन रामायण। नमन!

धर्म, अध्यात्म और साधना की छांव मंे पला-बढ़ा है हमारा पारम्परिक भारतीय संगीत। बाद में इसी संगीत ने परिमार्जित कला का रूप भी धारण किया। भजन, हरजस के साथ तुलसी, सुर, मीरा की संगीतबद्ध पदावलियों सुनें तो मन उसे गुनें। अनुभूत होता है, शास्त्रीय संगीत से निकली धाराएं कहां-कहां जा पहुंची है। साहित्य की हमारी कालजयी कृतियों को संगीत की इन धाराओं ने ही तो कभी घर-घर पहुंचाया। संगीत की परिवर्तनषीलता का यही वह गुण है जिससे इसकी जड़े हर युग में हरी रहती है।

बहरहाल, मन्ना डे के स्वर माधुर्य में मधुषाला से मन आज भी झंकृत होता है। जयषंकर प्रसाद की कामायनी, गालीब की संगीतबद्ध शायरी सुनें तो मन न भरें। लिखे को लोकप्रिय कर कंठों में उसे गुनगुनाने का अवसर संगीत ने ही सदा दिया है। रामायण को ही लीजिए। कितनी बार, कितने संगीतकारों ने इसे सुरों पुनर्नवा किया है। पार्ष्वगायक मुकेष के स्वरों में सुनी इसकी चौपाईयां की याद को इधर जयपुर के संगीतकार दीपक माथुर के संगीत ने फिर से हरा किया। कैलाष परवाल ने रामायण के सात काण्डों को सरल हिन्दी रूप दिया और इन्हें नयी दीठ से संगीतबद्ध किया है दीपक माथुर ने।

रामायण संगीत की जो धुनें हमारे मन में अर्से से रची-बसी है, उससे इतर नयी धुनों में संवारने की चुनौती भी कम नहीं रही है। दीपक ने इसे स्वीकारते परम्परा के साथ प्रगतिषीलता के संगीत के सहज गुणों से भी जैसे अनायास साक्षात्कार कराया है। राग यमन, बागेष्वरी, भीम पलाषी, तोड़ी, भैरवी आदि के साथ ही शास्त्रीय संगीत की समृद्ध भारतीय परम्परा उनकी संगीतबद्ध रामायण के पदों में हर ओर, हर छोर है। खास बात यह भी है कि उन्होंने इसमें मिश्रित वाद्य यंत्रांे का प्रयोग करते चौपाईयों में निहित संवेदना के भावों को गहरे से जिया है। मसलन बाल काण्ड, अवध काण्ड, सुन्दर काण्ड, उत्तर काण्ड और वनवास काण्ड के अंतर्गत सितार, बासूंरी, स्वरमंडल का बेहद खूबसूरत उपयोग उन्होंने किया है तो लंका काण्ड में युद्ध को रणभेरी और नगाड़ों के वाद से जीवंत किया है। यही कारण है कि रामायण के उनके श्रव्य में औचक ही दृष्य का आस्वाद होता है। वंदनाओं, सीता स्तुति, श्रीरामचन्द्र आरती, रामायण आरती को भजनमाला के अंतर्गत अलग से भी यहां संजोया गया है। जड़त्व को तोड़ते संगीत का नया उजास रचते। रकाब, हारमोनियम, स्वरमंडल, जलतरंग के साथ ही रामायण की इस नयी संगीत सर्जना में अजय प्रसन्ना की बांसूरी की तान भी अलग से ध्यान खींचती है।

मुझे लगता है, दीपक शब्द संवेदना को संगीत का नया आकाष देते स्वयं भी उसमें रचते-बसते हैं। यह है तभी तो उनकी संगीतबद्ध यह रामायण सहज कानों में रस घोलती है। वह कहते हैं, ‘पिछले तीन-चार साल से निंरतर रामायण की संगीत सर्जना में ही लगा हुआ था। हमने प्रतिदिन 4 से 10 घंटे तक इसकी रिकॉर्डिंग की है। इस बात को ध्यान में रखते कि परम्परा में आधुनिकता हावी नहीं हो जाए।’

रामायण के सात काण्डों की दीर्घ संगीत रचना को सुनता हूं तो, अनुभूत भी करता हूं कि उन्होंने इसमें नवीनता के साथ शास्त्रीयता को कहीं अलग-थलग नहीं होने दिया है। राम जन्म, सीता से विवाह, वनवास, लंका दहन, सेतु रचना, रावण वध, राम के अयोध्या आगमन और राम-भरत मिलाप के प्रसंगों का संगीत रूपान्तरण करते दीपक परम्परागत संगीत वाद्यों में आधुनिक वाद्यों का गजब का मिश्रण करते है। यह ऐसा है जिसमें आनंद का वही अपनापा है, जिसकी कि आप-हमको चाह होती है।

बहरहाल, आकाषवाणी जयपुर के एफएम रेडियो पिंकसिटी का शीर्षक संगीत दीपक का ही है तो लोकप्रिय दूरदार्षन धारावाहिक भारतायन की संगीत रचना भी उन्हीं की है। उनके संगीतबद्ध मीरा, सुर, तुलसी के भजनों को तो सदा सुनता ही रहा हू परन्तु मुझे लगता है, रामायण को उनके संगीत ने परवान चढ़ाया है। संगीत शख्स की इस कला को नमन! नमन रामायण। नमन।

Friday, June 10, 2011

घोड़े बेच सदा के लिए सो गए हुसैन

टीवी चैनल समाचार प्रसारित कर रहा है, हुसैन नहीं रहे। मैं चौंक पड़ता हूं।...सोचता हूं, हुसैन कैसे कहीं जा सकते हैं।...रेखाओं की अद्भुत गत्यात्मकता में शक्ति रूपक उनके घोड़े तो हमारे पास हैं। नहीं, उनकी रेखाएं, उनके रंग और जीवन जीने का ढंग कहीं नहीं यहीं है। यहीं। अभी कल ही तो अखिलेष का लिखा पढ़ रहा था, ‘हुसैन से मिलना पूरी एक सदी से मिलने जैसा है।’ मन ही मन इस लिखे में संषोधन हुआ था, ‘हुसैन के चित्रों से मिलना कला की पूरी एक सदी से मिलना है।

जन-मानस की सोच, लोक संस्कृति में विन्यस्त उनके रूपाकार युगीन संदर्भों की अनवरत श्रृंखला हमारे समक्ष रखते हैं। रेखाओं का जादूई सम्मोहन वहां है तो रंगों का अद्भुत उजास भी है। उनके रचे कैनवस में बिम्ब और प्रतीकों में बनते-बिगड़ते अक्षरों के एक नहीं अनेक अर्थ हैं तो रेखाओं का सम्मोहन संवेदनाओं के गहरे मर्म स्पर्ष कराता है।

बहरहाल, पंढ़रपुर गांव में हुसैन जन्में। इन्दौर में उनका बचपन बीता और एन.एस. ब्रेन्द्रे से कला की उन्हांेने प्रारंभिक षिक्षा प्राप्त की। साईकिल पर रात-बेरात लालटेन लिए घुमते आरंभ में उन्होंने खूब लैण्डस्केप बनाये। कविता, फिल्म से भी उनके सरोकार कम नहीं रहे। शमषेर बहादुर सिंह की कविता ‘पतझर’ पर बनाया उनका उनका चित्र जेहन में अभी भी कौंध रहा है तो स्वयं उनकी लिखी कविता पंक्तियां ‘मुझे आसमान की बर्फ ढकी चादर भेजो/जिस पर कोई दाग न हो/तुम्हारी अनन्त उदासी के घेरे को/मैं सफेल फूलों से कैसे चित्रित करूं?’ पंक्तियां आज भी मन में हलचल मचाती है। याद पड़ता है, अर्सा पहले उनसे मुम्बई में भेंट हुई थी। मुस्कुराते हुसैन ने जब जाना कि कला पर लिखता हूं तो कलाकृतियों की अपनी एक पुस्तिका मय हस्ताक्षर भेंट की। उनकी दी यह धरोहर सहेजे यह जब लिख रहा हूं तो डायरी के उन पन्नों को भी खंगाल रहा हूं जिनमें उनका बताया लिखा पड़ा झांक रहा है, ‘मैं जीवन को समग्रता में कैनवस पर उकेरता हूं। चाहता हूं कि अब कुछ ऐसा बने जो पहले कभी न बना हो। जो बने उसमें कुछ भी बंधन नहीं हो। कुछ ऐसा जिसे देखकर खुद चमत्कृत हो सकूं।’

सच ही तो है। उनका सर्जन बंधन रहित है। वहां कोई बनावट नहीं, सहजता का अपनापा है। भले वह उनकी बनायी मषहूर पेंटिंग ‘बिटविन स्पाईडर एंड लैंप’ हो या फिर अमेरिका के इराक पर हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप बनायी ‘द थीफ ऑफ बगदाद’ हो। फिल्मों का लगाव सदा उनके साथ रहा है। ‘गजगामिनी’, ‘मीनाक्षी: तीन शहरो की कहानी’ उन्होंने बनायी तो ‘हम आपके हैं कौन’ को 65 बार देखा। ‘थ्रू द आईज ऑफ ए पंेटर’ जब देखी तो लगा, फिल्म निर्माण की बारीकियों में जाते उन्होंने कला की गहराईयों को इसमें जिया है। बहुतों को यह जान हैरानी हो सकती है कि 1955 में आयोजित राष्ट्रीय कला प्रदर्षनी में ललित कला अकादेमी ने उन्हें जिस ‘जमीन’ पंेटिंग पर पहला राष्ट्रीय कला सम्मान दिया, वह विमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ से प्रेरित है। यह हुसैन ही हैं जिन्हांेने पहले पहल रामायण, महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों को आत्मसात करते इन पर पूरी की पूरी चित्र श्रृंखलाओं का निर्माण किया परन्तु अचरज इस बात का भी है कि बाद में यही हुसैन देवी-देवताओं के बनाए चित्रों पर ही विवादों के चर्म पर पहुंचे। कभी संस्कृति का इतिहास रचती ‘थ्योरामा’ श्रृंखला के अंतर्गत 12 फूट से लेकर 40 फूट तक की लम्बी पेंटिंग भी बना उन्होंने कला सर्जना का सर्वथा नया मुहावरा भी रचा।

बहरहाल, कैनवस पर उकेरे घोड़ों, उनमें निहित फोर्स और ऊर्जा से वह जब शौहरत की बुलन्दियों पर पहुंचे तो किसी ने उनसे सवाल किया, ‘आजकल क्या कर रहे हैं आप?’ मकबुल ने माकुल जवाब दिया, ‘घोड़े बेचकर सो रहा हूं।’ विश्वास नहीं हो रहा,...अब वह सदा के लिए ही सो गए हैं!

Friday, June 3, 2011

शास्त्रीयता की लोक लय


कंठ में अद्भुत माधुर्य। सुनें तो मन न भरे। संगीत के सुर और उनके साथ हाथों और पावों की सहज थिरकन भी। शास्त्रीय संगीत की पारम्परिक रागों की लोक लय। जोग वस्त्रों में ढलती उम्र में भी गान के साथ यह नाच है। नृत्य नहीं परन्तु बंधे घुंघरूओं के साथ होले-होले उठते पांव। गति नहीं परन्तु संगीत और नृत्य का गत्यात्मक प्रवाह। एकटक स्क्रिन पर ही नजर टीकी है। छोटी सी कालीन और उसके चारों ओर सारंगी, तबला, हारमोनियम वादक और सहयोगी कलाकार। यह तमाषा है। कलाकार है गोपीकृष्ण भट्ट ‘गोपीजी’। रिकॉर्डिंग आज की नहीं है, 1988 की है। थोडे़ अंतराल में ही साजिन्दों के मध्य जोग वस्त्र पहने बैठे रंगकर्मी, संगीत-नाट्य कलाकार ईष्वरदत्त माथुर उठते हैं और गोपीजी के सुरों के साथ मिला देते हैं अपना सुर। जोगी-जोगन तमाषा में गुरू गोरखनाथ आख्यान परवान चढ़ने लगा है।...

पिछले दिनों पिंकसिटी प्रेस क्लब में लोक नाट्य तमाषा देखने का यह संयोग अनायास ही बना। गोपीजी के साथ बहुत से तमाषा में कलाकार के रूप में भाग लेने वाले ईष्वरदत्त माथुर ने एक अनूठी पहल की, उनकी कला के सम्मान की और जयपुर के तमाम कलाकार, रचनाधर्मी उनके साथ जुटते चले गए। उम्र की ढ़लान पर गोपीजी का अभिनंदन हो रहा था और वह भी शासन द्वारा नहीं, कलाकारों, सृजनधर्मियों द्वारा। मंच पर बच्चों की सी मासुमियत लिए गोपीकृष्ण भट्ट को देखते न जाने क्यों उस्ताद बिस्मिला खां की याद हो आई। वही सहजता। वही फक्कड़पन।

कला समालोचक विजय वर्मा ने तुर्रा कलंगी, खयाल और नाच की लोक परम्पराओं के साथ जयपुर तमाषा की बारीकियों में ले जाते जब यह कहा कि इसमें पंजाब के प्रेमाख्यान, वहां के परिवेष के साथ ही हिन्दुस्तान के बहुत से दूसरे अंचलों की लोक परम्पराओं की भी सुगन्ध है तो लगा यह लोक कलाएं ही हैं जिनमें जीवन की विविधता की सांगोपांग लय है। फिर जयपुर तमाषा तो ऐसा है जिसमें गंभीर शास्त्रीय गान में लोक की अनूठी लय है। गोरखनाथ और लोक में प्रचलित तमाम दूसरे आख्यानों की कथाएं वहां है परन्तु उनमें हंसी ठट्ठे को नहीं ढूंढा जा सकता। ईष्वरदत्त कहते हैं, ‘गोपीजी तमाषा करते वक्त एक ही समय में किसी लोक आख्यान को तमाम शास्त्रीय रागों में निभा सकते थे।’ तमाषा की उनकी रिकॉर्डिंग देखते इसे गहरे से अनुभूत भी किया।

मूलतः तमाषा महाराष्ट्र की नाट्य विधा है। जयपुर खयाल और ध्रुवपद की बारीकियां लिए इस कला को हमारे यहां पं. बंषीधर भट्ट और उस्ताद फूलजी भट्ट ने परवान चढ़ाया। गोपीजी ने इस परम्परा को निरंतर जीवंत रखा। लैला-मंजनू, जोगी-जोगन, उद्धव, हीर-रांझा जैसे कथानकों पर तमाषा निरंतर होता रहा है। भले गोपीजी के परिवार की नई पीढ़ी अभी भी इस परम्परा को सहेजे हुए है परन्तु लोक की इस विरासत को कब आधुनिकता की आंधी उड़ा ले जाएगी, कहा नहीं जा सकता।

बहरहाल, तमाषा लोक नाट्य की ऐसी परम्परा है जो शास्त्रीय संगीत की भिन्न-भिन्न रागों, नृत्य से प्रसूत अद्भुत लोक लय लिए है। यह ऐसी है जिसमें लोकसत्संग से प्राप्त बुद्धि का कलाकार अपने तई सांगीतिक अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में पुरखों के ज्ञान, उनकी परम्पराओं से व्यक्ति खुद को जोड़ता है। कहते हैं, अखाड़े में जब तमाषा किया जाता था तो बाकायदा उससे पहले कलाकार भभूत लगाते। कला की इस विधा में रचने-बसने के लिए। महज मनोरंजन ही नहीं बल्कि कला की अनूठी साधना के रूप में भी तब इसे देखा जाता रहा है। देवर्षि कलानाथ शास्त्री तमाषा का गहराई से विवेचन करते हैं। मैं उन्हें सुनता हूं और तमाषा, गुरू गोरखनाथ और जोगी-जोगन की याद मन में बसाए औचक लोक को वेदों से जोड़ने लगता हूं। आखिर दोनों ही प्रत्यक्ष ज्ञान से ही तो शक्ति अर्जित करते रहे हैं। मनुष्य को लोक-चेतस् दृष्टि देते। आप क्या कहेंगे!

Friday, May 27, 2011

कला का हमारा सौन्दर्यबोध

ललित कलाओं और उपयोगी तमाम कलाओं का आविष्कार मनुष्य ने अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए किया है। कोई सुगम संगीत में आनंद की खोज करता है, कोई शास्त्रीय संगीत में शब्दों के अमूर्तन में खोना चाहता है तो कोई नृत्य की भंगिमाओं का आस्वाद करते उसमें ही अपनी तलाष करने लगता है तो मुझ जैसा अंकिचन कैनवस पर समय के अवकाष की तलाष करते मूर्त-अमूर्त में दृष्य की अनंतताओं पर अनायास ही चला जाता है।

बहरहाल, विचारों के सघन जंगल की मीठी सुवास कहीं ढूंढनी हो तो आपको कलाओं के पास ही जाना होगा। आप जाईए, वहां आपको नवीनतम विचारों का उत्स मिलेगा। सधी हुई सोच का प्रवाह वहां है तो सौन्दर्य का अनूठा बोध वहां है। गौर करें, सुरों का आपको खास कोई ज्ञान नहीं है परन्तु संगीतसभा में बेसुरा कोई भी यदि होता है तो आप तत्काल पहचान लेते हैं। नृत्य में जरा भी भाव-भंगिमाएं, ताल बिगड़ती है तो आप पहचान लेते हैं। चित्रकला में जरा भी कुछ अनर्गल और भद्दा है तो आप उससे तुरंत विरक्त हो जाते हैं। जीवन की यही तो वह लय है, जिसे बिगड़ती देखते ही अंतर्मन अनुभूति त्वरित पकड़ लेती है।

यही तो है सौन्दर्य बोध। शास्त्रीय संगीत को सुनते हैं तो वहां क्या शब्दों की सहायता की जरूरत होती है! शब्दों के अमूर्तन में ही हम वहां भीतर का उजास पा लेते हैं। चित्रकला में सब कुछ सीधा-साधा और करीने से कोरा हुआ ही थोड़े ना होता है। वहां टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं, रंगों का छितरापन और ढुलमुलापन बल्कि बहुत से स्तरों पर आकृतियों का बिखराव, रेखाओं की टूटन में भी हम देखने के सुख को भीतर से अनुभूत कर लेते हैं। सर्जन के क्षणों में कलाकार नहीं जानता है कि वह क्या कर रहा है परन्तु श्रोता और दर्षक उसकी उस निर्वेयक्तिक बोद्धिकता को पहचान लेते हैं।

जब कभी प्रकृति के लैण्डस्केप देखता हूं, मुझे लगता है सच में प्रकृति के करीब आ गया हूं। घंटो लैण्डस्केप निहारते रहने का भी अनुभव कम नहीं रहा है और ऐसा करते बहुतेरी बार तो यह भी हुआ कि चित्र मुझसे जैसे संवाद करने लगा। मुझे लगता है, वहां मूर्त-अमूर्त का भेद ही नहीं है। हम जिसे अमूर्त कहते हैं, वास्तव में क्या वह है! अमूर्त माने जिसकी कोई मूरत नहीं हो परन्तु चित्र रूपाकार तो होता ही है। भले वह ऐसा हो जिसे सीधे सीधे व्याख्यायित नहीं किया जा सके। या यूं कहें कि किसी निष्चित प्रारूप में उसे परिभाषित नहीं किया जा सके परन्तु उसे देखकर मन में बहुत कुछ हलचल तो होती ही है बल्कि कईं बार यथार्थ के चित्रण में इसलिए मन रूचि नहीं ले पाता है कि वहां देखने को खास कुछ नहीं होता। जिससे हमारा नाता रहा है, जिसे प्रायः देखते रहे हैं उसकी छाया ही तो वहां होती है। वह चित्र नहीं प्रतिकृति है। कईं बार हम प्रकृति के विध्वंष को भी देखना चाहते हैं, अलग सौन्दर्य बोध मे। यह वह नहीं है जिसमें प्रकृति खिली-खिली हमें लुभाती है बल्कि वह है, जिसमें कला की दीठ है। तब प्रकृति का रूप बदल जाता है। असुन्दर और कुरूपता वहां होती है परन्तु देखने का सौन्दर्यबोध भी वहां होता है। कला में उसे अनुभूत कर हम कभी रोते हैं, कभी बेहद भावुक हो जाते हैं तो कभी यही असुन्दरपन हमें वर्तमान को नये सिरे से देखने की आंख देने लगता है। जो बीत गया है, उसके आलाप में भविष्य को बुनने लगते हैं। कला की यही विषेषता है, वह हमें नवीन सोच देती है। कला देखे हुए को, भोगे हुए को, अनुभूत किए हुए को उसकी सहजता के गुणों के साथ एक प्रकार से फिर से रचती है। यही सर्जन है। यही तो है भीतर का हमारा सौन्दर्यबोध।

Friday, May 20, 2011

गीतों की भोर, रंगों की सांझ

ऐसे समय में जब देश  भर में महा कवि रवीन्द्र की 150 वीं जन्मषती के आयोजन हो रहे हैं, उनकी बनायी कलाकृतियों पर भी खास तौर से ध्यान जा रहा है। अचरज की बात है कि कविवर रवीन्द्र नाथ टैगौर ने उम्र के 67 वें वर्श के बाद चित्रकर्म की शुरुआत की। संयोग देखिए, कविता लिखते वक्त शब्दों  या पंक्तियों की तराश-खराश करते हुए उनके द्वारा यह शुरुआत हुई। फाउन्टेन पैन से वह कविताएं लिखते थे और इसी से वह चित्र निर्मिती की ओर भी प्रवृत हुए। शब्दों  को मिटाते, उन पर नया शब्द  रखते रेखाओं को मिलाने के उपक्रम में उन्हें लगा कि शब्द रेखाएं बहुत से दूसरे आकारों के लिए छटपटा रही है, उनमें बहुत से आकार छुपे हुए हैं। स्वयं सिद्ध आकारों के अनुभव के इस भव के अंतर्गत फाउन्टेन पैन ही फिर उनकी कूची बन गया। अकल्पित आकारों में दृष्य की अनंत संभावनाएं तलाषते पशु-पक्षियों और मनुश्यों की अनूठी आकृतियां का उन्होंने सृजन किया। जिस कविता ने उन्हें विष्व कवि के रूप में ख्यात किया, उसी से प्रसूत रेखाओं के आकारों ने उनके चित्रकार को भी अनायास जन्म दिया। यह चित्रकार रवीन्द्र ही हैं जिन्होंने पहले पहल कलाकृतियों में कपड़ो के टूकड़ों या फिर उंगलियों को स्याही में डुबोकर दो या तीन छटाओ में कलाकृतियों की सर्जना की।

बहरहाल, रेखाओं की मुक्ति के निमित कला की उनकी यात्रा प्रारंभ में कविता की अद्भुत लय है। रवीन्द्र एक स्थान पर कहते भी है, ‘मेरी चित्रकला की रेखाओं में मेरी कविता है जो अवचेतन की गहराईयो में डूबकर कागज में व्यक्त हुई है।’ पैरिस की गैलरी पिगाल में 1930 में उनके चित्रों की प्रथम प्रदर्शनी  जब लगी तो महाकवि के चित्रकर्म पर भी औचक विष्व का ध्यान गया। बाद में लंदन, बर्लिन और न्यूयार्क में भी उनके चित्र प्रदर्षित हुए। यूनेस्को द्वारा आयोजित अन्तर्राश्ट्रीय आधुनिक कला प्रदर्शनी में भी उनके चार चित्र खास तौर से सम्मिलित किए गए।
रवीन्द्र के चित्रों की खास संरचना, उनमें निहित संवेदना और अंतर्मुखवृति ने सदा ही मुझे आकर्षित  किया है। याद पड़ता है, पहले पहल रवीन्द्र का बनाया जब ‘मां व बच्चा’ कलाकृति देखी तो लगा जीवन को कला की अद्भुत दीठ से व्याख्यायित करते उनके चित्र कला की अनूठी  दार्शनिक  अभिव्यंजना है। मसलन उन्हीं का बनाया एक बेहद सुन्दर चित्र है ‘सफेद धागे’। इसमें स्मृतियों का बिम्बों के जरिए अद्भुत स्पन्दन है। ‘थके हुए यात्री’, ‘स्त्री-पुरूश’ जैसे मानव चित्रो के साथ ही पक्षियों के उनके रेखांकन में एक खास तरह की एकांतिका तो है परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं की सौन्दर्यसृश्टि भी है। सहजस्फूर्त रेखाओं के उजास में रवीन्द्र के कलाकर्म की रंगाकन पद्धति, सामग्री में निहित रेखाओं की आंतरिक प्रेरणा को सहज अनुभूत किया जा सकता है। महत्वपूर्ण यह भी है कि उनकी कलाकृतियों में ठेठ भारतीयपन है। अंग्रेज जोड़े का चित्र भी उन्होंने बनाया है तो उसमें निहित सोच और रेखाओं की लय की देषजता अलग से देखने वाले का ध्यान खींचती है। नैसर्गिक भावनाओं के उद्गार उनके चित्र हैं, जिनमें जीवन की आंतरिक लय को सहज पहचाना जा सकता है। रंगों का उनका लोक भी तब सर्वथा नया था जिसमें कभी न मिटने वाली स्याहियां, चमड़ा रंगने में काम आने वाले बहुतेरे रंग, पानी और पोश्टर रंग, पेड़ों की पत्तियों और फूलों की पंखुड़ियों के रस के साथ ही पानी मंे घुलने वाले और दूसरे तमाम प्रकार के प्राकृतिक रंगों का उपयोग वह करते थे। कविता से चित्रकर्म की यात्रा पर हुए संवाद में कभी उन्होनें कहा था, ‘मेरे जीवन का प्रभात गीतों भरा था अब षाम रंगभरी हो जाए।’ सच भी यही है। यह रवीन्द्र ही है जिनके गीतों की भोर भीतर से हमें जगाती है तो चित्रों का उनका लोक सुरमयी सांझ में सदा ही सुहाता है। आप क्या कहेंगे!
20-5-2011

Saturday, May 14, 2011

न्याय व्यवस्था की कलात्मक दीठ

संग्रहालय वह टाईम मषीन है जो हमें हमारी समृद्ध कला-संस्कृति के अतीत के गलियारों में ले जाती है। यह संग्रहालय ही तो हैं जो इतिहास का वर्तमान से नाता कराते हैं। वायसराय लार्ड कर्जन और पुरातत्व सर्वेक्षण के अध्यक्ष सर जॉन मार्षल ने पहले पहल हमारे यहां संग्रहालयों की नींव रखी थी। जब भी संग्रहालयों की स्थापना के निहित में जाता हूं, मुझे लगता है सांस्कृतिक उत्स के स्त्रोतों को जानने के उत्सुक अनुसंधानकर्ताओं की इतिहास से संबद्धता स्थापित करने की सोच ने ही संभवतः इन्हें मूर्त रूप दिया होगा। अतीत की हमारी जो शानदार चित्रकलाएं रही है, मूर्तिकला की जो समृद्ध परम्पराएं रही है, प्राचीन सिक्के, अस्त्र-षस्त्र, रहन-सहन, पहनावे की हमारी समृद्ध संस्कृति सहेजे यह संग्रहालय ही हैं जिनमें प्रवेष करते ही इन सबके जरिए गुजरा हुआ कल जैसे आंखों के सामने तैरने लगता है। घुम्मकड़ी के स्वभाव ने देष के भिन्न-भिन्न स्थानो के इतने संग्रहालय दिखाए हैं कि उन्हें याद कर लिखने बैठूं तो पता नहीं कितने पन्ने भर जाए।

बहरहाल, छायाकार मित्र महेष स्वामी ने कुछ दिन पहले जब जयपुर स्थित राजस्थान उच्चतम न्यायालय के कानून संग्रहालय और अभिलेखागार के बारे में बताया था तो खास कोई रूचि उसे देखने की नहीं जगी थी। शायद इसलिए कि काननू सदा ही मेरे लिए शुष्क विषय रहा है। औचक संयोग से किसी कारण से जब इस संग्रहालय को देखने का मौका मिला तो न देखने की चाह के सारे पूर्वाग्रह ही नहीं टूटे बल्कि इस बात का अफषोष भी हुआ कि अब तक इसे देख क्यो नहीं पाया। न्यायमूर्ति आर.एस. चौहान की कला संपन्न दृष्टि ने इसे मूर्त रूप दिया है। वेद, उपनिषद्, धर्मषास्त्र, के साथ ही मनुस्मृति में उल्लेखित न्याय की हमारी संस्कृति के अनछूए पहलुओं से साक्षात् करते इसकी सैर के अंतर्गत यह जानकर कम हैरत नहीं हुई कि जयपुर जैसी बड़ी रियासत की बजाय हाईकोर्ट की स्थापना पहले पहल धौलपुर रियासत में वहां के राजा रामसिंह ने 1903 में कर दी थी। तब यह महकमा खास या नरेन्द्र सभा कहा जाता था और रियासत में सुनवाई का वही उच्चतम स्थान होता था। धौलपुर रियासत के तब के उच्चतम न्यायालय के प्रतीक और चिन्ह के साथ ही संग्रहालय में कोटा, बूंदी, झालावाड़, जयपुर, टोंक, भरतपुर, अलवर, करौली के कलात्मक राज चिन्हों और उनमें निहित आदर्ष न्याय वाक्यों का यहां बेषकीमती संग्रह है तो राजा-महाराजाओं द्वारा रियासतों में कानून एवं न्याय व्यवस्था संबंधी जारी फरमानों, न्याय साहित्य से जुड़ी कलात्मक चीजें भी करीने से सहेज कर रखी गयी हैं।

मुझे लगता है, यह न्यायमूर्ति आर.एस. चौहान के गहन कला सरोकार ही हैं जिनसे यह संग्रहालय स्थापना रस्म की खानापूर्ति नहीं होकर कला की दृष्टि से इतना शानदार स्वरूप ले सका है। इससे बड़ी इसकी और क्या मिषाल होगी कि उनके प्रयासों से ही संग्रहालय में आजादी से पहले के वक्त मे न्यायालयों में शपथ हेतु प्रयोग ली जाने वाली कलात्मक गंगाजली को बाकायदा यहां सहेजा गया है। बाकायदा इसमें गंगा का तब का एकत्र पवित्र जल भी जस का तस रखा हुआ है। भारतीय संविधान की मूल प्रति यहां है तो औरंगजेब द्वारा षिवाजी को भेजा गया फरमान और आमेर के राजा रायसिंह को शाहजंहा द्वारा भेजा शाही फरमान भी इसकी धरोहर है। राजाषाही में न्याय प्रसंगों से संबद्ध चित्र, छायाचित्र भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। संग्रहालीय में प्रवेष करते ही वह शानदार स्कल्पचर अलग से आंखों में बस जाता है जिसमें स्तम्भ पर अलंकार रूप के ऊपर षिल्प धाम कोर्णाक के समय प्रतीक पहिये के ऊपर उड़ते सफेद शांति कपोत दर्षाये गए हैं। यह षिल्प जैसे हमसे कह रहा है, जहां न्याय है वहीं शांति की उड़ान है। कला की यही तो गहरी दीठ है। आप क्या कहेंगे!
चायचित्र : महेश स्वामी /13 may, 2011

Friday, May 6, 2011

व्यष्टि नहीं समष्टि का पर्व

अन्तःसत्ता से संबद्ध व्यक्ति की आनन्दवृत्तिमूलक सर्जना ही हमारी तमाम कलाओं का हेतु है। बाहरी सौन्दर्य का महत्व ही वहां नहीं है बल्कि आंतरिक भावों का गहरा अंकन उनमें है। सच ही तो है! कलाओं का अर्थ कहना नहीं है, व्यंजित और ध्वनित होना है। समय के अनवरत प्रवाह की द्योतक यह भारतीय कलाएं ही हैं जिनमें व्यस्टि के स्थान पर समष्टि के भाव हैं। आस्थाओं, विष्वास से उपजी हमारी कलाएं दर्षिता विष्वरूपा है। लौकिक उत्सवों में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।

बहरहाल, आज वैषाख शुक्ला तृतीया है। माने आखातीज। अक्षय तिथि। कलाओं की संपन्नता का, उत्सवधर्मिता का पर्व। कहते हैं, त्रेतायुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ। इसी से यह युगादि तिथि मानी जाती है। अबूझ दिन। तीन प्रमुख अवतार नर-नारायण, परषुराम और हयग्रीव इसी दिन हुए। बद्रीनाथ के कपाट इसी दिन खुलते हैं तो वृन्दावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्षन वर्ष में एक बार इसी दिन होते हैं। किसी भी कार्य को करने का अनपूछा मुहूर्त है आखातीज।

कलाओं के सर्जन का पर्व भी तो है यह आखातीज। अलंकृत घड़े, खड़ाऊ, छत्ते आदि दान करते यत्र-तत्र सर्वत्र लोग दिखाई देंगे। घड़े का, भांत-भांत की पंखियों का निर्माण-यह सब कलाओं का सर्जन ही तो है। अक्षयतृतीया पर लक्ष्मी सहित नारायण की पूजा का विधान है । वाणी जब सुसंस्कृत होती है, तब उसे सरस्वती का स्वरूप प्राप्त होता है परन्तु शब्दों को फटक-फटक कर भाषा का जब निर्माण हुआ तो लक्ष्मी ने ही वाणी को निधि समर्पित की। वाणी, निधि सभी प्रतीक हैं। गूढ, मनोगत अर्थों को प्रकट करते इन्हीं में तो रूप सादृष्य का अभिप्राय होता है। मनुष्य की रसिकता, मंगलकामना और आध्यात्मिकता को नवजीवन और पोषण देते प्रायः सभी उत्सवों में हम प्रतीकों का ही तो वरण करते हैं।

आखातीज पर प्रतीक रूप में पतंग उड़ाने का भी रिवाज है। जी हां, बीकानेर में कड़ी धूप, तेज चलती लू में भी घरों की छतें इस दिन आबाद होती है। पतंगे उड़ती है। स्थानीय भाषा में इन्हें किन्ना कहते हैं। वैषाख शुक्ला बीज, 1545 के शनिवार के दिन बीकानेर शहर की स्थापना हुई थी। स्थापना की उमंग में बीकानेर में उत्सव मनाया गया। घरों में खीचड़ा बना। घी भर इसे लोगों ने खाया और जीभर पिया ईमली का सर्बत। आखातीज पर राव बीका ने खुषी का ईजहार करते, आसमान में उड़ते मनों के प्रतीक रूप में बड़ा सा चिन्दा यानी बड़ी पतंग उड़ायी। बस तभी से परम्परा हो गयी। पूरे विष्व में शायद बीकानेर एक मात्र जगह है जहां तपते तावड़े में छत पर चढ़कर लोग पतंगे उड़ाते हैं। कागज पर कोरे चित्र, आकृतियों से सजी कलात्मक पतंगे। इन्हें उड़ाना भी अपने आप में कला है। आसमान में गोते खाती पतंगों के उड़ाके तगड़े लड़ाके होते हैं। दूसरे की पतंग काटने में मजबूत डोर नहीं बल्कि कला की दीठ वहां होती है। ऐसी जिसमें कलाबाजियों खिलाते पतंग को अनायास ढील या औचक कसते हुए काटने के गुर निहित जो होेते हैं।

...तो मन के उत्साह, उमंग की अभिव्यक्ति का पर्व है आखातीज। सच्ची कला यही तो है जिसमें अनायास मानव मन अपने अंतःकरण को प्रसन्न करने की जुगत कर बैठता है। व्यष्टि नहीं समष्टि की भावना के साथ। ऐसे ही जागृत होती है भीतर की हमारी उदात्त भावनाएं । यही तो है कला का सत्यं, षिवं और सुन्दरम्। आप क्या कहेंगे!

Friday, April 29, 2011

अनुभूतियों की सघनता का उजब़क न्यास

अवधेष मिश्र के चित्र भीतर की हमारी संवेदना को जगाते हैं। उनके चित्र अंतर्मन अनुभवों और परिवेष की सच्चाई को जीते हैं और आत्म-अनात्म के साथ कला के तमाम आनुषांगिक तत्वों को बेहद खूबसूरती से हमारे समक्ष रखते हैं। समय की संवेदना गहरे से जीते इधर उन्होंने चित्रों की जो श्रृंखला तैयार की है, उसमें खेतों में खड़े रहने वाले बिजूके को माध्यम बनाया है।
अवधेष ने बिजूके के उजब़क न्यास में समय और समाज की तीव्रतम अनुभूतियों की सघनता को अनुभूत किया जा सकता है। वैसे भी बिजूका खेत-खलिहानों में खड़ा हमारी आंखों से ओझल हुआ भी कहां है! दिन में वह खेत की रक्षा करने वाले रक्षक के रूप में दिखाई देता है तो सुनसान जंगल में पेड़ों के बीच से झांकने पर वह जंगली जानवर सरीखा प्रतीत होता है। दोनों हाथ फैलाए कभी लगता है, वह हमें अपने पास बुला रहा है तो कभी अंधेरी रातों में उसकी आकृति भयावह, डरावनी लगती है। अजीबोगरीब शक्ल अख्तियार करता वह कभी विदूषक की भूमिका के रूप मंे हमारे सामने आता है। कभी सच तो कभी धोखा लगता है परन्तु खेत में उसका होना हमारी संतुष्टि है। भले वह कुछ कर नहीं सकता परन्तु कुछ कर सकने की साक्षी जरूर देता है और इस साक्षी से ही कईं बार पषु पक्षी भ्रम में पड़ खेत से दूर रूख कर लेते हैं।...बिजूका निरीह है परन्तु दीठ से भयावह भी, सभ्य भी और खेत की रक्षा कर सकने वाला संस्कारी भी। शायद इसीलिए अवधेष ने बिजूके को माध्यम बनाते हुए उसके जरिए जीवन की उथल-पुथल, विषमताओं, विद्रुपताओं, विडम्बनाओं और तिरोहित होते मूल्यों को रूपायित किया है। भले बिजूके के रूप में उन्होंने कैनवस पर यह सब जिया है परन्तु रंग और रेखाओं की लय में उनका बिजूका मनुष्य की सोच और बदलते समय की धारणाओं का प्रतिनिधित्व करता है। विद्रुपताओं और विडम्बनाओं का निरूपण करते हुए भी अवधेष ने बिजूका को कैनवस पर सर्वथा नया परिवेष दिया है। एक बार नहीं। बार-बार। उनके बिजूके को देखना नयेपन में जाना है।
अवधेष का बिजूका और साथ की आकृतियों, पार्ष्व के रंगों, रेखाओं के अर्थ और अभिप्राय धीरे-धीरे प्रकट होते है। भले अवधेष ने खेत में खड़े बिजूका के उजब़क आकार को अपने अवचेतन मन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है परन्तु इसमें रंगों की संपन्नता भी अलग से ध्यान खींचती है। उनके बरते रंग, रेखाओं की कोमलता, सहजता और यथार्थ ऐन्द्रियबोध की उनकी समग्र सृजनात्मकता को भी अलग से प्रतिबिम्बित करती है। किसी एक रंग की बजाय अवधेष का कैनवस बहुत से ऐसे चटख रंगों से भी सज्जित हैं, जिन्हें आम तौर पर बरता नहीं जाता है। गाढ़े चटख बैंगनी, गहरे हरे, नीले, लाल, पीले रंगों के जरिए विषम परिस्थितियों में भी रहने वाली ग्रामीण उत्सवधर्मिता को जैसे कैनवस पर जीते हैं। उनका बिजूका प्रतीक है उस सभ्यता का जिसमें हम जी रहे हैं और जो कईं स्तरों पर हमें जी रही है।
बिजूका चित्र श्रंखला में अवधेष का टेक्सचर बेहद समृद्ध है। बारीक रेखाएं टैक्सचर की पूरक है। शायद इसका कारण यह भी है कि वह रेखांकन और चित्रण दोनों ही एक साथ करते हैं। उनके बिजूका के साथ के दृष्यों की गतिमयता की सूक्ष्म से सूक्ष्म सचलता को भी पकड़ा जा सकता है। मसलन उजब़क आकार के बिजूका के पास मंडरा रही चिड़िया, साथ खड़ा कोई जानवर, दूर झांकता चांद या सूरज, लहलहाती फसलें, पास, बहती नदी, दूर तक जाती कच्ची सड़क और भी बहुत सारी चीजें। मुझे लगता है अंतरंग की अविच्छिन्नता के स्थायित्व के अंतर्गत अवधेष के बिजूका की उपस्थिति से बड़ा कला का और मानवीय प्रमाण भला और क्या होगा!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 29-4-2011

Monday, April 25, 2011

संस्कृति और इतिहास का दृष्य-श्रव्य आख्यान



इतिहास की अविरल धारा में संस्कृति और कलाएं हमें ज्ञानोन्मुख करती भविष्य की नवीन दीठ देती है। चिरंतन और लौकिक है हमारा इतिहास। मात्र तथ्यों का संकलन भर नहीं है इतिहास बल्कि साक्ष्य, दस्तावेज और अवषेषों की उपलब्धता में यह हमसे हर समय जैसे संवाद करता है। हमारी जो संस्कृति, परम्पराएं, और कलाएं हैं, उनके अतीत से ही तो सृजित हुआ है यह वर्तमान। माने वर्तमान की नींव हमारा अतीत है, बीता हुआ कल है।

बहरहाल, बात करें राजस्थान के इतिहास की। यह रंग-बिरंगी धोरां धरती की उत्सवधर्मी संस्कृति और गौरवमयी परम्पराओं का जैसे अनूठा गान है। पिछले दिनों दूरदर्षन, जयपुर द्वारा प्रसारित वृत्तचित्र ‘मैं राजस्थान हूं’ का आस्वाद करते लगा, इतिहास तथ्यों का संकलन भर नहीं है बल्कि गुजरे हुए कल का कला की दीठ से व्याख्यात्मक पुनर्निमाण है। शैलेन्द्र उपाध्याय ने अपनी कला संपन्न दृष्टि से राजस्थान के इतिहास को गहरे से संजोया है। शब्दों से उसे जीते दृष्य-श्रव्य में धोरां धरती की संस्कृति और समृद्ध कलाओं का रोचक आख्यान ही एक प्रकार से उन्होंने इस वृत्तचित्र में प्रस्तुत किया है। इतिहास के प्रसंगों, घटनाओं के ब्योरों मंे ले जाते वृत्तचित्र की खास बात यह है कि इसमें शब्दों की दृष्यचित्रात्मकता में अतीत से वर्तमान की कदमताल है। राणा प्रताप की आन-बान और शान के साथ ही ‘इला न देणी, आपणी हालरियो हुलराय’ का दृष्य-श्रव्य चितराम हो या फिर आजादी के लिए आऊवा के बलिदान के बहाने खुलते अतीत के वातायन में इतिहास के साथ संस्कृति के बहुतेरे अछूते प्रसंग। सब में हमारी संस्कृति की जीवंतता है। डाक्यूमंेट्री 1857 की क्रांति में राजस्थान की भूमिका का रोचक डॉक्यूड्रामा भी है तो इसमें मानगढ़ का सिंहनाद, ऊपरमाल की अनुगूंज, एकी का अनुष्ठान, नवयुग के नव अवतार, स्वाधीनता का सूर्योदय, पंचायतीराज की शुरूआत जैसे रोचक दृष्य खंड राजस्थान के अतीत की मनोरम झांकी है। शैलेन्द्र उपाध्याय स्वयं कवि, साहित्यकार हैं सो उन्होंने अपने तई वृत्तचित्र में रेत के धोरों के कहन को कलात्मक सौन्दर्य भी अनायास ही दिया है। इस सौन्दर्य में ऋग्वेद की ऋचाओं में आए मरूप्रदेष का जिक्र है तो यहां के लोगों की उत्सवधर्मी संस्कृति का अनूठा शब्द कैनवस भी है। वृत्तचित्र के जरिए ऐतिहासिक आख्यान को लोकनृत्य, लोक संगीत और चित्रकला से हर ओर, हर छोर से संवारा गया है। मसलन घटनाओं की राजस्थानी चित्रषैलियों की साक्षी और रेखाचित्रों, कविताओं से दृष्यों का पुनर्सजन। ऐसा करते वृत्तचित्र की पारम्परिक बुनावट की जड़ होती परम्परा को तोड़ा भी गया है। सम्पूर्ण डाक्यूमेंट्री गत्यात्मक प्रवाह की सृजनषीलता में इतिहास के ब्योरों, सूचनाओं, घटनाओं और प्रसंगों का रोचक आस्वाद कराती है। खंडहर महलों से झांकते इतिहास के गलियारों से वर्तमान में हुए राजस्थान के विकास वातायन में राजस्थान के कलामय जीवन की सांगीतिक अनुगूंज भी इस वृत्तचित्र की वह बड़ी विषेषता है जो हमें बांधे रखती है।

रेतघड़ी में इतिहास की करवटों को इसमंे बखूबी संजोया गया है। इसीलिए वृत्तचित्र दरअसल चलचित्र दृष्य कोलाज के अनूठे बिम्ब और प्रतीक लिए देखने वाले से बतियाता है। अर्सा पहले राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी हुसैन की फिल्म ‘थ्रू द आईज ऑफ एक पंेटर’ देखी थी। इसमें कोई कहानी नहीं थी बस इम्प्रेषंस हैं। कुछ शक्लें, सूरतें, छतरी, लालटेन, महलों के साथ कला के सुर और लय। ‘मैं राजस्थान हूं’ देखते न जाने क्यों वह फिल्म याद आ गयी! शायद इसलिए कि इसमें दृष्य-श्रव्य कोलाज के अंतर्गत इतिहास के कला-संस्कृति प्रभावों की अनूठी कला दीठ जो है। प्रसारण में व्यावसायिकता के इस चरम दौर में दूरदर्षन जैसे सार्वजनिक प्रसारण माध्यम से ही अब इस प्रकार के सृजनात्मक वृत्तचित्रों के प्रसारण की उम्मीद की जा सकती है वरना इतिहास और संस्कृति की सूझ की ऐसी बूझ ओर कहां!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास
 का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 22-4-2011