Friday, April 12, 2013

रंग-रेखाओं में शिव


सुखद अनुभूति माने सुंदर। सुन्दरता का अर्थ भद्र और कल्याण का भाव ही तो है। सौंदर्य की अवधारणा आनंदानुभूति में है। सौन्दर्य में  शुचि, शुभ और भद्र की समन्विति है। मंगल की भावना है। कलाओं का हेतु सौन्दर्य के यह भाव ही तो है। सृष्टि के पहले जब कुछ भी नहीं था। तब केवल शिव  था। सौन्दर्य था। कहा भी तो है, ‘न सन्नासच्छिव एव केवलः।’ माने सृष्टि के आदिकाल में जब केवल अंधकार ही अंधकार था, न दिन था न रात्रि, न सत् यानी कारण था न असत् यानी कार्य। तब केवल निर्विकार शिव  ही विद्यमान थे। शिव सोंदर्य   के संवाहक हैं। तमाम कलाओं के प्रेरक। संगीत-गीत, वाद्य एवं नृत्य के आदि देव। आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनयों के साथ-साथ गायन-वादन-नर्तन आदि सभी कलाओं के प्रयोक्ता भगवान शिव  ही तो हैं। इसलिए उन्हें ‘विद्यातीर्थं महेष्वरम्’ से भी अभिहित किया गया है।
बहरहाल, शिव  शक्ति  का घर बिन्दुनाद है। बिन्दुनाद से ही तो तमाम कलाएं बढत करती है। जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों सिल्वी माहेष्वरी की भगवान शिव   कन्द्रित कला प्रदर्षनी का आस्वाद किया। लगा, रंगो और रेखाओं के अंतर्गत मूर्त-अमूर्त में भगवान षिव को कला में गहरे से जिया गया है। सिल्वी की कला की बड़ी विषेषता यह है कि वह कल्पनाओ के साथ भावनाओं के भव में रंग और रेखाओं को वीलीन करती है। ऐसा है तभी तो उसकी उकेरी आकृतियों में अंतर्मन संवेदनाओं का सूक्ष्म अंकन है। रंग है तो वह संवेदना से उपजे भीतर के निनाद का संवाहक है। रेखाएं हैं तो उनमें मन के सौन्दर्य की लय है।
सिल्वी के चित्र अध्यात्म भावों से लबरेज हैं। स्तुत्य देव की आराधना की राग वहां है परन्तु बहुत कुछ ऐसा भी है जो लगता है बगैर किसी प्रयास के स्वतःस्फुर्त है। वहां जो उकेरा गया है उसमें रंग-रेखाएं माध्यम जरूर है परन्तु उनका मूल आत्म की अभिव्यंजना है। चित्र है तो वहां संगीत है। भीतर का नृत्य है। नाट्य है और है जीवनानुराग। सिल्वी ने भोले भंडारी के कल्याण भावों को मन में बसाते। उनमें रमते-बसते किया है प्रदर्षनी में प्रदर्षित तमाम चित्रों का सर्जन। इसीलिए उसके चित्रों में रंग और रेखाएं होते हुए भी वें गौण हैं। उनमें निहित भाव वहां प्रधान है। सिल्वी का एक चित्र है जिसमें रंगों के बीच घंटी का प्रवाह है। नाद है और है रंगों की उत्सवधर्मिता। शिव  की यह सूक्ष्म सौन्दर्याभिव्यक्ति है। घंटी से निकलती ओंकार ध्वनि यहां जैसे रंग सजी सृष्टि नाद की संवाहक है। ऐसे ही एक और चित्र है जिसमें वृक्ष के नीचे ध्यान को संजोया गया है। चित्र और भी हैं जिनमें शिवलिंग, शिव  मंदिरों और शिव के  ध्यान-योग के बहाने भीतर उपजते भावों की अभिव्यंजना की गयी है। महत्वपूर्ण यह भी है कि अन्र्तनिहित सोच को रंगो से कैनवस पर जैसे पंख लगे हैं। इसीलिए तो सिल्वी के अध्यात्म प्रेरित इन चित्रों में औचक ही अनहद नाद का आभाष होता है।
सोचता हूं। यह भगवान शिव  ही हैं जो रावण रचित तांडवस्त्रोत पर नाच उठे थे। शिव  ने चैदह बार डमरू बजाया। पाणिनी ने इसी से तो व्याकरण की रचना की। तमाम हमारी कलाएं शिव  के रूप का ही तो विस्तार है।  शिव अनन्त है। नटराज काल-संहारशिव केवल अपने वैभव, शक्ति, शांति, संयम और ऐष्वर्य में ही सर्वोत्तम नहीं है, वे समय और स्थिति के आध्यात्मिक अतिक्रमण के भी प्रतीक हैं। इसीलिए तो वह महादेव हैं। जहां कहीं भी ‘ईष्वर’ अथवा ‘ईष’ शब्द बगैर किसी विषेषण के आया है उसका अर्थ शंकर ही तो है।...संसार में व्याप्त कला सौन्दर्य के स्त्रोत। शिव शंकर!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर भी आप इसे पढ़ सकते है। लिंक है-

Friday, April 5, 2013

लोक कलाओं से अपानापा


कलाओं का सूक्ष्म और बहुत से स्तरों पर मार्मिक विवेचन कहीं है तो वह हमारी लोक संस्कृति में है। इसलिए कि सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ उसका बिगसाव हुआ है। राजस्थान की ही बात करें। हमारे गांव आंज भी लोक के उजास में ही रचे-बसे हैं। कभी लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी ने लोक से जुड़ी कलाओं के अनमोल खजाने की तह में जाते उसका आस्वाद हमें भी कराया था। न जाने तब कहां-कहां से वह कलाओं और कलाकारों को ढूंढ कर लाए और उनसे हमारा नाता कराया। 
इधर उनकी इसी परम्परा को बीकानेर के डाॅ. श्रीलाल मोहता आगे बढ़ा रहे हैं। कुछ दिन पहले जब बीकानेर जाना हुआ तो लोक कलाओं को सहेजने, लुप्तप्रायः होती जा रही कलाओं और उनसे संबंधित कलाकारों की तलाश कर उन्हें आगे बढ़ाने के उनके कार्य को गहरे से जाना। लगा, अपनी ही धुन में संलग्न मोहता ने लोक की हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भावी पीढि़यों के लिए संजोने का महत्ती कार्य किया है। लोक संस्कृति का वास्तविक स्वरूप लोक के इतिहास बगैर संभव भी कहां है! सो मोहता ने बड़ा काम यह भी किया है कि लोप होती कलाओं  पर विमर्श की राहें खोली और ‘मरू-परम्परा’ संस्थान के जरिए राजस्थान के सुदूर क्षेत्रों में स्वयं पहुचकर लोक कलाओं को संजोया। लोक कलाकारों के रूप में विरासत के अनमोल मोती ही तो उन्होंने सहेजे हैं!
डा श्रीलाल मोहता ने कभी ‘मरू लोक संस्कृति कोष’ लेखन का महत्ती कार्य भी किया। इस कोश में व्यक्ति है तो व्यक्ति से जुड़े संस्कारों की सौरम भी है। संस्कृति के तमाम उपादान भी हैं। बड़ी बात यह भी है कि जो कुछ उन्होंने इस कोष में संजोया है वह केवल वर्णात्मक ही नहीं है, उसमें मोहता का लोक में बसा मन भी है। कहें, उन्होंने लोक को इतिहास नहीं रखते उसे आधुनिक समय संवेदना से भी जोड़ा है। इस कोश के साथ ही उन्होंने बीकानेर परिक्षेत्र में विकसित भारतीय चित्रकला परम्परा की विशिष्ट शैली मथेरण कलम से भी नई पीढ़ी को रू-ब-रू कराने का महत्ती कार्य भी किया है। बीकानेर चित्रशैली के रूप में अब तक मुगल चित्रकला की ही पहचान होती रही है जबकि मरूभूमि की संवेदना, परिवेश और स्थानीय रंगो के साथ लोक जीवन से जुड़ी बीकानेर की मूल शैली मथेरण कलम ही है। ‘मथेरण कलम’ से जुड़े चंद बचे कलाकारों से उन्हांेने स्वयं संवाद किया और एक तरह से लोप हो चुकी इस चित्रशैली को प्रकाश में लेकर आए। डाॅ. मोहता के साथ कुछ दिन पहले ‘मरू-परम्परा’ संस्थान में जाना हुआ तो उनके द्वारा किए लोक संस्कृति संरक्षण के उन कार्यों को भी जाना जो बगैर किसी को बताए वह अपने तई चुपके से करते रहे है। मसलन गांवों में विवाह, उत्सव पर बनने वाले लोक चित्र, संस्कारों से जुड़े मांडणे और अब केवल कुछ ही गांवों में बचे ख्याल, रम्मतों आदि के कलाकारों से संजोयी विशिष्ट बातों का इतिहास भी उनके पास एकत्र है।  
मुझे लगता है, लोक संस्कृति का उनका कर्म लोक साक्ष्यों का आधार तो लेता है परन्तु उसमें चिन्तन की संवेदना का राग भी है। लोक संस्कृति, लोक मुहावरों, लोक साहित्य को इतिहास के नवीन स्त्रोत के रूप में विकसित करने के उपक्रम के तहत उन्होंने ऐसे ऐसे कलाकारो को ढूंढ निकाला जो अन्यथा बिसरा दिए गए थे। जमाली बाई की मांड को परखा। उसे मंच दिया। हेला, ख्याल, हरजस, वाणी के सुदूर गांवो में बसने वाले कलाकारों के बीच गए और उन्हें ढूंढ निकाल उनके लिए कला प्रस्तुति के अवसर तलाशे। वह लोक के मौखिक और लिखित दोनों ही स्त्रोतों पर जाते हैं तो लोक संस्कृति के ऐसे मर्मज्ञ भी हैं जो लोक की बौद्धिक प्रक्रिया को संस्कृति के चिन्तन में रूपान्तरित करते हैं। कहें, मोहता व्यक्तित्व की अपनी अंतःप्रक्रिया में निरंन्तर सौन्दर्य की सर्जना करते लोक का आलोक लिए हैं।

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार  एडिट पेज पर प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" में 5 अप्रैल को प्रकाशित
आप इसे इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं -
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/950551

Tuesday, April 2, 2013

सांस्कृतिक परम्पराओं का कला उजास


म्यूरल माने भित्ति चित्र। दीवार पर उभरे रूपाकार। फ्रेस्को पंेटिंग। पारम्परिक भारतीय शब्दावली में इन्हें आलागीला, मोराकषी भी कहा जाता है। भारत में म्यूरल की समृद्ध परम्परा आरंभ से ही रही है। किले-महलों में राग-रागिनियों के चित्र और मूगल पेंटिंग के अंतर्गत भांत-भांत के चितराम म्यूरल के जरिए ही तो बहुत से स्तरों पर बचे हुए हैं। लोक संस्कृति तो समृद्ध ही भित्तिचित्रों से ही हुई है। मुझे लगता है, सांस्कृतिकपरम्पराओं, पौराणिक, सामाजिक इतिहास का वातायन भित्तिचित्रण से ही तो खुलता नजर आता है।केन्द्रीय ललित कला अकादेमी ने अपनी पत्रिका ‘समकालीन कला’ के एक अंक का अतिथि सम्पादक इस नाचीज को बनाया। अंक में लीक से हटकर कुछ सामग्री देने के प्रयास के अंतर्गत प्रख्यात चित्रकार शांति दवे से संवाद के लिए ग्रेटर कैलास स्थित उनके निवास स्थान पर जाना हुआ। उनके निवास पर लगी कलाकृतियों में रंग पट्टियों में उभरता षिल्प और म्यूरल्स में उभरती मिनिएचर पेंटिंग सदा के लिए जैसे ज़हन में बस गई। इसलिए कि म्यूरल्स में वह अक्षरों को काठ में डाल चिपकाते है। उनके म्यूरल्स में लिपि के टूकड़े सरीखे अलग से देखने वालों का ध्यान खींचते हैं। वहां रंग और रेखाएं हैं तो षिल्प का अहसास भी होता है। परम्परा में आधुनिकता की उनकी इस दीठ से ही म्यूरल को नई पहचान भी मिली। मुम्बई, दिल्ली हवाई अड्डों पर बनाए उनके म्यूरल इसीलिए आज भी देखने वालों को लुभाते हैं।
बहरहाल, कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना नागपुर के समीप स्थत रामटेक नामक स्थल पर की थी। रामटेक स्थित कालिदास स्मारक जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर उनके महाकाव्य ‘मेघदूत’ आधारित चित्रों से भी साक्षात् हुआ। लगा, महाकवि का गीतिकाव्य आंखो के सामने जीवंत हो उठा है। भित्तिचित्रों की यही विषेषता है।श्बहुतेरी बार चलायमान होते दृष्य संस्कृति से जैसे हमारा संवाद कराते हैं। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भी प्रवेष करते हैं तो  प्रवेष कक्ष की चारों दीवारों पर बने म्यूरल औचक देखने वालों का ध्यान खींचते हैं। सतीष गुजराल, के.के. हेब्बार, ज्योति भट्ट और ष्यामबक्स चावड़ा जैसे मषहूर चित्रकारों द्वारा बनाए भित्तिचित्रों का अनूठा लोक विज्ञान भवन की अनुपम धरोहर है। अकबर द्वारा चलाए गए नवीन धर्म दीन-ए-इलाही, ह्वनेसांग की भारत यात्रा, फूलवालों की सैर और होली विषयों के म्यूरल देखते लगता है कला के सर्वथा नये लोक में हम प्रवेष कर गए हैं।
देष के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी राजकीय इमारतों पर म्यूरल की शुरूआत की थी। इस सोच के साथ कि इतिहास में हमारी इमारतें कला की दृष्टि से शून्य और नगण्य मानी जाएगी, यदि वहां सांस्कृतिक परम्पराओं  का उजास नहीं होगा। भित्ति चित्रण को प्रोत्साहन के पीछे पंडित नेहरू का उद्देष्य यह भी था कि आम आदमी जिसका कला से सीधे कोई नाता नहीं हो, वह भी कला के संपर्क में आकर कला में रूचि ले सके। तब निर्णय यह भी लिया गया था कि प्रत्येक सरकारी इमारत के खर्च का दो प्रतिषत इमारत में कला समावेष पर रखा जाए। सरकार द्वारा तब एक अलंकरण समिति की भी स्थापना की गयी थी। समिति ने सर्वप्रथम सज्जा कार्य के लिए विज्ञान भवन को चुना और और इसके प्रवेष द्वार की चारों दीवारों के लिए अलग-अलग षीर्षक चुने गए। देषभर के प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर भी इसी संदर्भ में म्यूरल के जरिए हमारी परम्पराओं को संजोया गया। जयपुर रेलवे स्टेषन पर देवकीनंदन शर्मा का ढोला-मारू म्यूरल बरसों तक यात्रियों को लुभाता रहा है। वनस्थली कला मंदिर की दीवारों पर भी राजा पुलकेषी दरबार, बोधिसत्व, पदमपाणी और अन्य जातक कथाओं पर बनाये उनके आरायष अपनी मौलिकता में भित्ति चित्रों की हमारी समृद्ध परम्परा के संवाहक हैं।
क्या ही अच्छा हो, सरकारी इमारतों में म्यूरल के जरिए सांस्कृतिक परम्पराओ ंके उजास की पंडित नेहरू की पहल पर फिर से सरकारें विचार करे। इसी से हम हमारी संस्कृति को सदा के लिए बचा रख पाएंगे। 

Sunday, March 24, 2013

दृश्य संवेदना की सौन्दर्य सर्जना

शिवजी के छाया-चित्र 

कलाएं भीतर की हमारी संवेदना को चक्षु देती है। बहुतेरी बार वस्तुएं, दृष्य और अवस्थाएं ठीक हमारे सामने होती है परन्तु उन्हें हम खुली आंखो से भी देख नहीं पाते हैं, समझ नहीं पाते हैं। कला की दीठ संवेदना के जो चक्षु देती है, उसी से तब बात बनती है। छायाकंन की ही बात करें। वहा यथार्थ का सादृश्य ही तो कैमरा दिखाता है परन्तु उसे बरतने वाला यदि कलाकार है तो वह दृश्य में निहित उस सौन्दर्य से भी हमारा साक्षात् करा देता है, जो नंगी आंखों से चाहकर भी हम देख नहीं पाते हैं।
बहरहाल, शिवनारायण जोशी ‘शिवजी’ देश के प्रख्यात छायाचित्रकार हैं। कुछ दिन पहले वह जब जयपुर में थे तो उनके छायाचित्रों से साक्षात्कार हुआ। संवाद भी हुआ। लगा, छायाचित्रों में वह दृश्य की संवेदना में जाकर उसमें निहित सौन्दर्य को वह पकड़ते हैं। मसलन बहुतेरी बार वस्तुएं,  दृष्य और अवस्थाएं ठीक हमारे सामने होती है परन्तु उन्हें हम समझ नहीं पाते हैं। षिवजी अपने छायाचित्रों से हमें जैसे वह अवस्थाएं समझाते हैं। ऐसे बहुत से उनके छायाचित्रों में से एक है, मंदिर मे हुई आरती के बाद का। आरती होने के बाद बहुत सारे हाथ एक साथ आरती लेने को उत्सुक है। पाष्र्व में आरती और उसको लेने को खड़े हाथ। इसे देखते मंदिर में होती आरती जैसे हमारी आंखों के समक्ष जीवनत हो उठती है। रोजमर्रा में ऐसे बहुत से दृष्यों से हम साझा होते हैं परन्तु उनमे निहित इस प्रकार की संवेदना को हम क्या पकड़ पाते हैं! ऐसे ही एक छायाचित्र है, ऊपर श्वेतिमा ओढ़े पहाड़, नीचे हरितिमा से आच्छादित धरित्रि और दाहिने-बांये छितराए बादल। गौर करता हूं तो पाता हूं, हिन्दुस्तान का नक्षा मांड दिया गया है। षिवजी ने यह छायाचित्र बद्रीनाथ मंदिर के ठीक सामने दूर छोटी पहाड़ी पर औचक उभरते से भारत के नक्षे सरीखे लगते दृष्य को अनुभूत कर लिया था।  हिमाच्छादित पहाड़ी और इर्द-गिर्द छाए बादल और हरियाली का काॅन्ट्रास्ट। दृष्य में उभरी छायाकंन की इस भरपूर संभावना को एक संवेदनषील कलाकार मन ही पकड़ सकता है! 
ऐसा ही एक और छायाचित्र है, बारिष में भीगते जोधपुर के ऐतिहासिक दुर्ग मेहरानगढ़ का। पत्थरीली चट्टान पर मेहरानगढ़ वर्षा की बूंदों से भीग रहा है। उजाड़ की निरवता में सौन्दर्य कहां! सो भीगते मेहरानगढ के इस दृष्य को पाष्र्व में करते गुलाबी चुनर ओढ खड़ी महिला को इसका हिस्सा बना दिया। घटाटोप छाए बादल, बारिष, पहाड़ी पर मूक भीगता पाषाण दुर्ग और इस सबके विरोधाभाष में चटख रंग की चुनर ओढ़े महिला। छायाचित्र देखते लगता है, औचक इतिहास फीज़ा से रंगीन हो हमसे बतियाने लगा है। 
शिवजी का कैमरा दृष्य में निहित गति को भी गहरे से पकड़ता है। एक चित्र में  हाथ से रिक्षा चलाता व्यक्ति तेजी से रिक्षे को भगाए लिए जा रहा है परन्तु न तो दृष्य में रिक्षा स्पष्ट है और न ही उसे भागते हुए ले जाने वाला व्यक्ति। है तो बस गतिमान आकृतियों की धूंध। प्रेत सरीखा कुछ। कैमरे की भाषा में ये पैनिक इफेक्ट है। आदमी नहीं उसक प्रतिछाया जैसे दृष्य में भागी जा रही है। दृष्य का छाया में यही तो रूपान्तरण है। मुझे लगता है,षिवजी अपने छायाचित्रों में समय की गति को अपने तई रूपान्तरित करते हैं। इसलिए कि उनके छायाचित्रों में गति के साथ जीवन की सूक्ष्म अभिव्यंजना हुई है। वह वस्तुओं के प्रेत की गहराई में जाते उनसे हमारा नाता कराते हैं। इसलिए उनके चित्रों में पहाड़ ही नहीं पहाड़ों में औचक छितराकर आने वाले बादल, धूंध, धुंआ, अदृष्य ताप, दौड़ती-भागती जिन्दगी के दृष्यों का पल में होता लोप भी हमसे जैसे बतियाता है। 

Friday, March 15, 2013

छायाकला आकाश


छायाकार दिखाई दे रहे रूप को अपने तई अर्थपूर्ण बनाता है। वह यथार्थ का अपने कैमरे से रूपान्तरण ही नहीं करता बल्कि उसमें छिपे रंग, स्पेस, रेखाओं के जरिए तमाम कलात्मक संभावनाओं का आकाष हमारे समक्ष खोलता है। औचक ज़हन में कईं प्रष्न घुमड़ने लगे हैं। शब्द प्रकाष को चाह कर भी क्या पकड़ पाते हैं? गति को चाह कर भी क्या व्यंजित कर पाते हैं? झरने के झर-झर, पानी के उथलेपन को ठीक वैसे ही क्या जता पाते हैं? नहीं ना! परन्तु छायाकला में यह सब संभव है। इसलिए कि वहां छायाकार दृष्य की छवि अंकित करने के साथ अनुभूति के उस अपूर्व का भी रूपान्तरण कर रहा होता है, जिस तक शब्द चाहकर भी पहुंच नहीं पाते। मुझे लगता है, छायांकन चित्रों की मूक भाषा है। ऐसी जिसे हर कोई समझ सकता है। छवि को अंकित करते छायाकार वहां कैमरे का ही सहारा नहीं ले रहा होता बल्कि मनष्चक्षु से दिख रही छवियों को अपने तई पुर्नसृजित भी कर रहा होता है। वह दृष्य के साथ उसके अनूठे सौन्दर्यबोध से भी हमारा नाता जो करा रहा होता है! 

बहरहाल, मालवीय नेषनल इन्स्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलोजी की फोटोग्राफी क्लब क्रिएटिव सोसायटी संभवतः देष का पहला ऐसा उद्यम कहा जा सकता है जो विद्यार्थियों को छायाकंन के जरिए कला संवेदनाओं से गहरे से जोड़ता है। सर्वाधिक सक्रिय क्लब। इस मायने में कि हर वर्ष इसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर की फोटोग्राफी प्रदर्षनी के साथ प्रतिस्पद्र्धा आयोजित होती है। क्लब की सक्रियता और आयोजनधर्मिता के पीछे जिस संवेदनषील कला शख्स की अहम भूमिका है, वह है चर्चित छायाकार महेष स्वामी। महेष छायांकन को कला संवेदना से जोड़ने के उपक्रमों में जुनून की हद तक अपने को एक प्रकार से झोंके हुए हैं।  मालवीय संस्थान के फोटोग्राफी क्लब के अंतर्गत देष के भिन्न-भिन्न  प्रांतों के विद्यार्थियों की छायाकला प्रदर्षनी के साथ विषयवार छायाचित्रों से चुनिंदा का चयन कर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है। खास बात यह कि यह क्लब पूर्णतः स्वप्रेरणा से कार्य करती है। फोटो प्रदर्षनी के आयोजन से लेकर उसके समापन तक की तमाम औपचारिकताओं में विद्यार्थी ही प्रमुख होते हैं और उनकी इस भूमिका को पंख दे रहे होते हैं, क्लब के सलाहकार महेष। इस बार स्वामी के प्रयासों से नई पहल यह भी हुई कि देष के सुप्रसिद्ध छायाकार षिवनारायण जोषी ‘षिवजी’ विद्यार्थियों से रू-ब-रू हो सके। महेष के आग्रह पर प्रदर्षनी समापन पर खाकसार ने भी विद्यार्थियों से संवाद किया। सुखद लगा यह अनुभूत कर कि तकनीकी षिक्षा के छात्र-छात्राएं कलाओं के मर्म की गहराई में जाना चाहते हैं। संवाद में इन पंक्तियों के लेखक ने प्रस्तावित भी किया कि रोजमर्रा के जीवन से दृष्यों को हम छायाकला में जीएं। दृष्य में निहित  संवेदना को पकडें़, दृष्य में निहित गति के अदृष्य को छूएं। इसी से वस्तुओं के प्रेत हमसे बतियाएंगे। यथार्थ स्मृतियों में रूपान्तरित होकर हमसे संवाद करेगा। 

ब्हरहाल, छायाकला वह दर्पण जिसमें झांकने वाला स्वयं ही प्रतिबिम्बित होता है। आरोन शोर्फ ने अपनी पुस्तक ‘आर्ट एंड फोटोग्राफी’ और आल्फ्रेड स्टाइग्लिट्ज ने अपनी पत्रिका ‘कैमरा वर्क’ के जरिए कभी छायाकंन को कला का स्थान दिलाने की नींव रखी थी। आज तमाम दूसरे माध्यमों में छायाकंन की कला भूमिका साफ दिखाई दे रही है। क्या ही अच्छा हो, मालवीय नेषनल इन्स्टीट्यूट आॅफ टेकनोलोजी  के फोटोग्राफी क्लब के संरक्षक और वहां के सृजनषील निदेषक प्रो. आई.के. भट्ट छायांकन से संबंधित कुछ व्याख्यान तमाम अपने छात्र समुदाय के लिए आयोजित करे। तकनीकी षिक्षण संस्थाओं में इस तरह की पहल इसलिए भी जरूरी है कि इसी से छात्र भविष्य के संवेदनषील अभियंता के रूप में समाज को अपूर्व दिषा दे सकने मंे समर्थ हो सकेंगे।

Saturday, March 9, 2013

संस्कृति का अनहद नाद


नीरज गोस्वामी कैनवस पर रंगो और रेखाओं का अनूठा भव रचते हैं। कैनवस पर म्यूरलनुमा संरचनाओं में वह एक प्रकार से सभ्यता और संस्कृति का अनहद नाद अपनी कला में करते हैं। उनका कैनवस अतीत की स्मृतियां कराता है परन्तु यह खण्डहरनुमा नहीं है, रंग संगति में रेखाओं के उजास में यह भविष्य की बुनघट है। काल को ध्वनित करते उनके चित्र कोई कथा, कोई व्यथा या दृष्टांत के औचक ही संवाहक बनते हैं। हम उन्हें देखते हंै और समय के, परिवेश के संदर्भ अपने आप ही हमसे तब जुड़ने लग जाते हैं। 
बहरहाल, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी ने कुछ दिन पूर्व ही अजमेर में राष्ट्रीय कला शिविर का आयोजन किया था। इस शिविर में नीरज गोस्वामी के चित्रों से जब साक्षात् हुआ तो लगा, वह जो बनाते हैं, उसमें रंग और रेखाओं के उजास के साथ शिल्प का माधुर्य है। अलंकारिक वस्तुनिष्ठ चित्रों को वह हमारे समक्ष रखते आकृतियों से अपनापा कराते हैं। कैनवस पर व्यक्ति और वस्तुओं के रहस्यमय अस्तित्व को वह जैसे अपने तई उद्घाटित करते हैं। 
नीरज की कला का आस्वाद करते मार्शल मैक्लुहान के उस कहे की औचक याद हो आती है जिसमें उन्होंने शिल्प विज्ञान को मानव के मस्तिष्क और हाथों की क्षमता बढ़ाने की बात कही थी। सोचता हूं, शिल्प व्यक्ति की सोच में बढ़त करता है। माने शिल्पी जब कुछ गढ़ रहा होता है तो वह केवल मूर्ति की आकृति ही नहीं  स्वयं अपने को भी गढ़ रहा होता है। शिल्पी के मन की थाह कहां कोई ले सका है! अजन्ता, एलोरा और कोर्णार्क के साथ तमाम हमारे शिल्प पर जाते हैं तो लगता है शिल्पी पत्थर पर आकृतियो को गढते संगीत, नृत्य और चित्रकला को भी अपने तई जी ही तो रहा होता है। इस दीठ से नीरज रेखाओं और रंगों में शिल्प की गढ़त करते हैं। यह गढ़त ही उनकी कला की बढ़त है।  वहां दृश्य की शिल्प सिराओं को सहज पकड़ा जा सकता है। 
दृश्य सौन्दर्य में वहां लोक कलाओं का उजास है, माया सभ्यता की समृद्ध संस्कृति वहां उद्घाटित होती है तो भारतीय शिल्पकला का माधुर्य भी वहां है। रेखीय संरचनाओं का ज्यामीतिय आयाम लिए नीरज की कलाकृतियां सुनहरे आवरण में ढकी देखने के हमारे सौन्दर्य प्रतिमानों को सवाया करती है। उनके चित्र देखते कलाकृतियों को देखने का हमारा एकरसता का ढंग बदल जाता है। औचक, लगता है-कला का एक सौन्दर्य प्रतिमान यह भी है। 
मातिस के चित्रों की मानिंद नीरज के चित्रों में प्रकाश के स्थान पर रंगो का समरूप प्रयोग भी अद्भुत है। रंगो से वह अवकाश की रचना करते संयोजन और अंकन की सहज सरलता पर अनायास ही जाते लगते हैं। उनके चित्रों से साक्षात् होते बार-बार यह अहसास भी होता है कि जो कुछ वह बनाते हैं, उसमें स्वयं की उनकी आत्मिक अभिव्यक्ति है। वहां परम्परा है परन्तु वह जड़ रूप में नहीं। आधुनिकता है पर वह प्रदर्शन की चमक लिए नहीं। सौम्यत्या में व्यक्ति-वस्तु के बाह्य रूप से आन्तरिक सत्य का साक्षात् कराते उनके चित्र आकारों के सरलीकरण के साथ उनमें निहित सौन्दर्य से मन में गहरे से बसते हैं। मैक्सिन भित्ति-चित्रण में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति में योरपीय पच्चीकारी से लेकर अर्नुवो शैली का जिस तरह से सहारा रिवेरा, ओरोस्को आदि कलाकारों ने लिया, ठीक उसी तरह से नीरज के चित्रों में भारतीय शिल्प, यहां के मिनिएचर, अध्यात्मक की परम्परा, ध्यान आदि का सम्मिश्रण है। नीरज के चित्रों में स्मृतियों की व्याकुलता है परन्तु वह ऐसी है जिसमें किसी प्रकार की छटपटाहट और भागमभाग नहीं है। शांत! चित्रों में ध्यान के साथ भीतर के ज्ञान का जैसे चित्र दर चित्र वह प्रवाह करते हैं। 


Friday, February 22, 2013

रसमय नृत्य की सार्वभौम कला


                       
बैले फ्रांसीसी शब्द है। अर्थ है नृत्य करना। रंगमंचीय परम्परा से भी पहले संभवतः पन्द्रहवीं सदी में फ्रांस, इंगलैण्ड और रूस में समारोह नृत्य शैली के रूप में यह प्रचलन मंे आया। तब बड़े कक्षों में रंगमंचीय परम्परा में यह प्रदर्षित होता। संगीत की सुमधुर ध्वनियों के साथ अद्भुत लोच में लहराते बैले में समय के साथ इधर निरंतर विकास हुआ है। दूसरे बहुत से नृत्यों की शैलियों की आधारभूत तकनीकें इसमें निरंतर सम्मिलित जो होती रही है। 
बहरहाल, जयपुर में श्रुति मंडल नृत्य सम्राट उदयशंकर के नाम पर बैले समारोह अर्से से करता आ रहा है। बैले के साथ उदयषंकर का नाम इसलिए लिया जाता है कि इसमें भारतीयता के रंग उन्हांेने ही भरे। योरोप में पहले पहल वह जब बैले से रू-ब-रू हुए तो उसकी प्रदर्षन भूमिका से वह बेहद प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने भारतीय शास्त्रीय, लोक एवं जनजातीय कथाओं, मिथकों को इस नृत्य में जोड़ कला की सर्वथा नवीनतम स्वरूप की कल्पना की। योरोप में तब नृत्य की उनकी इस शैली को ‘हाई डांस’ कहा गया। बकौल उदयषंकर यह ‘रचनात्मक नृत्य’ था। ऐसा जिसमें भारतीय शास्त्रीय, लोक और जनजातीय नृत्य शैलियों के आधारभूत तत्वों को पष्चिम की बैले नृत्य तकनीक से जोड़ा गया था। रूस की प्रख्यात बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा से वह जब मिले तो नृत्य की उनकी कला में क्रांतिकारी बदलाव आयसा। अन्ना तब भारतीय कलाओं के अध्ययन में रत थी। उदयषंकर ने उनके इस अध्ययन में मदद की और उनके साथ ही बाद में लंदन के सुप्रसिद्ध आॅपेरा हाउस में हिन्दु पौराणिक, धार्मिक आख्यानों की युगल प्रस्तुतियां भी की। अंजता, राजपूत, मुगल चित्र शैलियों और पौराणिक आख्यानों  को उन्होंने अपनी इन नृत्य प्र्रस्तुतियों में गहरे से जिया। बैले के साथ वह भारतीय नृत्यों की बारीकी में गए और इसी से नृत्य सम्राट भी कहाए।
अभी बहुत समय नहीं हुआ, वाराणसी जाना हुआ तो एलिस बोनर की कला दृष्टि में उदयषंकर की नृत्य कला से फिर से साक्षात् हुआ। भारत कला भवन में एक कलादीर्घा एलिस के नाम की ही है। इसमें एलिस के उदयषंकर के नृत्य से जुड़ाव और उनकी नृत्य भंगिमाओं के महत्वपूर्ण रेखांकन हैं। एलिस ने ज्यूरिख में वर्ष 1926 मंे उदय शंकर का नृत्य देखा था। बस फिर क्या था! स्विट्जरलैण्ड की यह मूर्तिकार अपनी मूर्तिकला छोड़ उनके नृत्य मंे ही जैसे रच-बस गई। वह लिखती है, ‘मैंने शंकर रचित नृत्य शैली को देखा।  लगा जैसे मन्दिरों की दीवारों पर लगी मूर्तियां सजीव हो उठी हो।’ सच! उदयषंकर का नृत्य ऐसा ही रहा है। पत्नी अमला शंकर के साथ बाद में 1948 में उन्होंने ‘कल्पना’ फिल्म भी निर्मित की। 
उदयषंकर मूलतः राजस्थान के थे। उदयपुर वह जन्मे पर योरोप में ही पले-बढे। उन्हीं की स्मृति में पिछले 18 सालों से श्रुतिमंडल ‘उदयषंकर बैले एवं नृत्य समारोह’ आयोजित करता आ रहा है। आरंभ से ही इससे जुड़े रहे संस्कृतिकर्मी ईष्वरदत्त माथुर बताते हैं, ‘कौषल भार्गव ने इस समारोह की शुरूआत की थी। उदयषंकर के चचेरे भाई सचिन शंकर, पुत्र आनंद शंकर और पुत्री ममता शंकर ने भी यहां प्रस्तुतियां दी।’ अतीत के गलियारों में ले जाते वह श्रीलंका के परफा केईबुल लाम की बैले नृत्य प्रस्तुति को भी याद करते हैं। और यह बताना भी नहीं भुलते कि पहले केवल यह बैले समारोह ही हुआ करता था परन्तु बाद में भारतीय और दूसरी स्थानीय नृत्य प्रस्तुतियों का समावेष भी इसमें होता चला गया और यह ‘उदषंकर बैले एवं नृत्य समारोह’ से जाना जाने लगा। 
बहरहाल, भारतीय नृत्यों के साथ तमाम अन्य भारतीय कलाओं की बहुरंगी छटाओं से उदषंकर ने ही पष्चिम को बैले के जरिए साक्षात् कराया। उनकी याद संजोते श्रुतिमंडल की यह पहल सच में सराहनीय है। रसमय आंगिक क्रिया की सार्वभौम कला ही तो है नृत्य। ऐसे ही करती रहे यह कला बढ़त। आमीन!

Friday, February 15, 2013

मोहे अपने ही रंग में रंग दे


सुगम संगीत माने जिसमें कहीं कोई बंधन नहीं हो। निर्बन्ध। कंठ से सहज निकले सरल स्वर। कहें, लोकप्रिय संगीत। लोकगीत, गजल, भजन सब सुगम संगीत ही तो है। सुनेंगे तो मन करेगा इन्हंे गुनें। लोक जीवन मंे प्रवाहित होकर ही तो आखिर कलाएं शास्त्रबद्ध होती है।
बहरहाल, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् द्वारा जवाहर कला केन्द्र में कुछ दिन पहले की एक सांझ सुगम संगीत को समर्पित थी। गायिका थी संगीता आर्य। उनकी सुमधुर गायकी में अभी भी मन जैसे बसा हुआ ही है। सुना उन्हें पहले भी है परन्तु इस बार जब सुना तो लगा, उनके स्वर माधुर्य में गजब की बढ़त है। बढ़त माने विस्तार। गजल, भजन और लोकगीतों के गान में स्वर भंगिमाओं की वहां अद्भुत वैविध्यता है। कहूं, सुरों की वह मौलिकता जिसमें सहज गीत, गजल के शब्दों में निहित भावों को जिया गया था। अमीर खुसरो की रचना ‘मोहे अपने ही रंग में रंग दे..’ जब संगीता गा रही थी तो लगा संगीत मन में भी कहीं गहरे से घट रहा है। यह भीतर का अनगढ है। कईं बार भले सुर बाहर नहीं आते परन्तु मन गाता है। सुरों की गहराई की यही तो अध्यात्म की हिलारें है। संगीता का गान भीतर की इन हिलोरों को जैसे बाहर लाता है। मुझे लगता है, यह हमारा संगीत ही है जिसमें तन और मन किसी के गायन से इस तरह से स्पन्दित होता है। यह संगीत ही तो है जो भीतर के हमारे भव को लयबद्ध करता है। अनंत की वाणी, अनंत के शब्दों का उजास। कहीं पढ़ा हुआ, ओषो का कहा याद आ रहा है। एक स्वर को दूसरे स्वर से जोड़ने वाला बीच का सेतु है संगीत। संगीता आर्य यही तो करती है। शास्त्रीय रागों को लोक संगीत से, लोक संगीत को जन-जन से स्वर दर स्वर जोड़ती है। संगीत का नया मुहावरा गढ़ते। आरोह-अवरोह में श्वास को साधते। कहीं कोई सुर वहां छूटता नहीं लगता। कभी उनके स्वरों में लोकगीत ‘नीम्बूड़ा’ सुना था। लगा, शब्द को लयबद्ध करती वह अनूठी लय अंवेरती है। आरोह से त्वरित अवरोह। अवरोह से त्वरित आरोह। 
बहरहाल, सुन रहा हूं। इन्हीं सुरों में वह गा रही है, ‘ऋतू राग रंग बरसाए...’, ‘सब जुदा सा लगता है...’ और सदाबहार राजस्थानी लोक गीत ‘केसरिया बालम...’। सुर जैसे गहने पहन श्रृंगार कर रहे हैं। छोटी-छोटी तानें। मुरकियां। 
संगीता आर्य के गाये लोकगीत मन को स्पन्दित करते हैं। ‘चिरमी’, ‘चैमासो’, ‘बन्ना’, ‘केसरिया बालम’ में राजस्थान की माटी की सहज सौंधी महक। लोक वेदना का मर्म। सुरीलेपन में शब्द के अन्र्तनिहित की साधना। गान में शब्दों का सागीतिक उजास। भावनाओं का अनुठा भव। जहन में गांव, गांव की संस्कृति से साक्षात्। तरूण पंवार के संगीत निर्देषन में संगीता का गाया ‘छोटी सी उमर परणाई रै बाबोसा...’ को याद करता हूं। अद्भुत स्वर माधुर्य। सुनेंगे तो लगेगा, वेदना से उपजे इस उलाहने में भीतर का दर्द जैसे स्वरों से छलक-छलक बाहर आ रहा है। सुना इसे दूसरे स्वरों मे पहले भी था परन्तु संगीता आर्य की साफ आवाज और स्वरों का सहज प्रवाह मन मंे घर करता है। शायइ इसलिए की धोरों की धरा, उसके परिवेष की सहज लय वहां अंवेरी गयी है। यही क्यों, सुगम संगीत में और दूसरे गीत, गजल भी संगीता के सुरों में सुनते मन करता है-उनमें रचें, वहीं बसें। वहां परम्परा के सहज रंग जो हैं! संगीत के रंगों में इसीलिए तो संगीता आर्य ‘ओळ्यू’ की संवाहक बनती राजस्थान की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की अपने तई ‘ओळख’ कराती है। आप क्या कहेंगे!

Friday, February 8, 2013

चिन्तन में संगीत


लय एवं ताल का व्यवस्थित रूप है संगीत। संगीत रत्नाकर के अनुसार गीत, वाद्य और नृत्य का समुच्य ही संगीत है। कहते हैं, ‘सम्यक् प्रकारेण यद् गीयते तत्संगीतम्’ माने संगीत वह जिसे सम्यक् प्रकार से गाया जा सके।  वह कला जिसमें स्वर और लय के जरिये भावों को प्रकट किया जाए। संस्कृति-निष्ठ ही तो है संगीत। इसलिए कि यह हमारी संस्कृति की पहचान कराता है। शायद इसीलिए संस्कृति पर चिन्तन को साथ लिए ही संगीत का विमर्ष हमारे यहां आगे बढ़ा है। कला की दृष्टि से संगीत पर संस्कृति से पृथक चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है। इस दृष्टि से मुकुन्द लाठ से संवाद संगीत के अनूठे अनभव भव में ले जाता है। वह संगीत के मर्मज्ञ हैं और कईं अर्थों में देष के एक मात्र आधिकारिक विद्वान भी। पंडित जसराज के षिष्य होने के साथ ही वह संगीत के विरल शब्द साधक हैं। उनके चिंन्तन में संगीत की परम्परागत अवधारणाओं की बजाय विचार की बढ़त है। राग, धुन, आलाप की संगीत शब्दावली के सैद्धान्तिक पक्ष की बजाय वह उसके वैचारिक अन्र्तनिहित में जाते चिन्तन का नया आलोक जो देते हैं। 
बहरहाल, अभी बहुत दिन नहीं हुए। याद करता हूं, वह भोर उत्सवधर्मी थी। यह मुकुन्दजी के निवास की भोर थी। उनका निवास भी निवास कहां है! संस्कृति का अनमोल खजाना है। देष-विदेष के कलाकारांे की कलाकृतियां। पुस्तकें। संगीत वाद्य और संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं का दुर्लभ संग्रह। उनके इस संस्कृति घर में उस भोर कला-संस्कृति से जुड़े बहुतेरे हम लोग जमा थे। अधिकतर विदेषी चेहरे। कुछ मुकुन्दजी के संगीत चिन्तन पर शोधरत तो कुछ स्वयं उनके षिष्य। मुकुन्दजी की धर्मपत्नी नीरजा लाठ अपनापे से स्वागतातुर। पता चला, कुछ खास नहीं बस ऐसे ही बतियाने, मिलने-मिलाने के लिए ही सभी को याद किया गया है। ऐसा भी होता है! सुखद। छायाकार मित्र महेष स्वामी के साथ के साथ मुकुन्दजी से हुए संवाद को गहरे से जिया गया।
मुकुन्दजी संगीत शब्द साधक हैं। संगीत को शब्द से साधने वाले। बेहद संकोची। अपने बारे में कुछ बताते, संगीतविद् कहाते संकोच में गड़ जाते हैं। पर संगीत के वह अद्भुत विचार संवाहक हैं। बातें हुई तो कहने लगे, ‘सामगान हमारा सबसे प्राचीन संगीत ही नहीं, परवर्ती राग-संगीत का जनक भी है। पर साम धुन है, और राग धुन से बिल्कुल अलग। यह कहते वह धुन की अपने तई जो व्याख्या करते हैं उसमें हमारे संस्कार जैसे आंखों के समक्ष घुमने लगते हैं। यह वह संस्कार हैं, जिन्हें बरतते बरतते ही हम बहुत से स्तरों पर धुन के स्वयमेव सर्जक हो जाते हैं। उन्हें सुनते औचक लगता है, संगीत जीवन से जुड़ा राग ही तो है! ऐसे ही आलाप की उनकी व्याख्या देखें, ‘आलाप का अर्थ है बदल-बदल कर बढ़ना। स्वरों के नये नये बनाव, नई उपज, नये विस्तार, चलने के नये रास्ते, इन पर चलना। आलाप की इस व्याख्या के साथ ही वह स्वरों की संगति में संगीत की तलाष करते हैं। कहते हैं, ‘स्वरों की अपनी संगति में, संगीत की अपनी मर्यादाओं और संभावनाओं में, हम औचित्य की कसौटियों की खोज कर सकते हैं।’ 
बहरहाल, हमारे यहां संगीत सुनते तो उसे गुना गया है परन्तु चिन्तन में संगीत कहीं नहीं दिखता। मुकुन्दजी इसे दिखाते हैं। वह संगीत को परम्परागत सैद्धान्तिक दायरों से बाहर निकाल उसमें विचार के नए उन्मेष जगाते हैं। काव्य संग्रह ‘अनरहनी रहने दो’ की एक कविता में संगीत-नृत्य को अंवेरते वह लिखते हैं, ‘...नृत्य के पूरे वलय का/देह-घेरे, देह बाहर/जागता है अंगहार/नृत्य के आकाष में/अनदिख/हमारे देखने के शून्य भीतर/नाचता है..।’ आपको नहीं लगता, संगीत चिन्तन की उनकी इस चेतना, मीमांसा में अनुभव की अद्भुत व्याख्या है! 

Friday, February 1, 2013

सरोद में माधुर्य रस की वर्षा


कानों से होता हुआ संगीत मन तक पहुंचता है। लय और ताल में बंधा स्वर प्रवाह वहां जो है! कालिदास इसीलिए तो कहते हैं, ‘अहो रागबद्ध चित्तवृति आलिखित इव सर्वतो रंगः’ माने राग के माधुर्य से हृदय आकर्षित होने से श्रोता चित्रलिखित-से निश्चल बैठे रहते हैं। सच ही तो है, आरोह-अवरोह का नादब्रह्म है संगीत। जवाहर कला केन्द्र में बुधवार सांय उस्ताद अल्लादिया खां शास्त्रीय संगीत समारोह में पंडित बसन्त काबरा जब अपनी प्रस्तुति दे रहे थे तो तारों से कंपित उनके सरोद वादन में ही मन जैसे बस गया। 
पहुंचा तो, सरोद के तारों पर पंडित काबरा राग श्री की तान छेडने लगे थे। माधुर्य का अद्भुत प्रवाह तन-मन को झंकृत करने लगा। लगा, प्रार्थना के स्वर बढ़त कर रहे हैं। चहुंदिशा में गूंजायमान होते। आलाप के साथ खिलने लगा राग। ऐसे जैसे कली से शनै शनै खिल रहा हो फूल। पंखूरी दर पंखूरी झरता। तारों से उपजा गान। सरोद में स्वयं भी लीन हो पंडित काबरा सुनने वालों को सुरों की यात्रा कराने लगे। मींड और गमक में राग का विलम्बित लय में विस्तार। ...आलाप, जोड़, झाला, झपताल। धीरे-धीरे आरोह-अवरोह में बढ़ता सप्तक का कारवां। तंत्रकारी के साथ गायकी अंग का अद्भुत सुरीलापन। संगीत में रचता-बसता मन। राग श्री में पंडित काबरा जैसे प्रभु अर्चना कर रहे हैं। तेजी से चलती उनकी अंगुलियां। तारों में कंपन्न की दूर तक ले जाती सम्मोहक गूंज। मंदिर में जैसे आरती की धुन। बढ़ती हुई। औचक, काबरा के सरोद में एक नहीं अनेक वाद्यों की ध्वनियां जैसे निनादित होने लगी। घंटियां। ढोल-मंजिरे। प्रार्थना स्वरों का अनुष्ठान। स्वरों का पवित्र सौन्दर्य! 
मुझे लगता है, पंडित बसन्त काबरा सरोद में मार्धुय की अद्भुत सर्जना करते हैं! सरोद सुनते लगता है, संगंीत जीवनानुराग है। जीवन की नश्वरता का भान कराता ईश्वर की अर्चना को प्रेरित करता। यह संगीत ही है जिसमें ईश्वर से साक्षात् की अनुभूति होती है। फिर, राग श्री तो संगीत के आदि देव भगवान शिव से जुड़ा राग है। मोह-माया से मुक्त करता। आनंद की अनुभूति कराता। गुरू ग्रंथ साहब में कुल 31 राग है और वहां ‘राग श्री’ ही सबसे पहले आता है। नानक, गुरू रामदास, गुरू अर्जुन आदि ने इसी को आधार बना सबद गान किया। 
सरोद के साथ तबले पर उस्ताद अकरम खान की संगत भी कम प्रभावी नहीं थी। लय-ताल का सांगोपांग मेल। पंडित जी ने राग श्री के बाद राग मिश्र पीलू का वादन किया। स्वरों की अद्भुत रंजकता। मन को आंदोलित करती। रूपक मध्यलय में गत बजा जैसे उन्होंने राग मिश्र पीलू में उत्सव का आगाज किया। एक में घुला दूसरा। दूसरे में तीसरा। तीसरे में चैथा...। परस्पर घुलते, मोहकता का जादू बिखेरते सरोद के स्वर। संगीत की कभी न भुला देने वाली यात्रा। झूला। झरने। नदी। पहाड़ों के रास्ते। भांत-भांत के खिले फूल। पानी के बूलबूलों सा होता मन।...और फिर लोरीनुमा होले-होले थपकियां। सच! संगीत मन को अवर्णीय यात्रा कराता है। वहां ले जाता है जहां चाहकर भी कोई नहीं जा सकता। माधुर्य के आह्वान का अनुष्ठान है संगीत। सरोद वादन करते काबरा संगीत तत्व के बोल और झाला का अद्भुत निभाव करते हैं। मुझे लगतां है, बगैर किसी दिखावे के उन्होंने सरोद में अपने को साधा है। बाद में जब संवाद हुआ तो उनकी सहजता और संकोच में डूबी विनम्रता में ही राग रंग को अपने तई गुना।
बहरहाल, प्राचीनतम वाद्य है सरोद। रबाब का परिस्कृत रूप। कहते हैं ईरान-अफगानिस्तान के रास्ते कभी यह भारत आया। और पंडित बसन्त काबरा का सरोद तो माधुर्य रस की जैसे वर्षा करता है। संगीत से अपनापा कराता। चाहकर भी उनके सुने को कोई बिसरा सकता है!



Sunday, January 20, 2013

नृत्य में सौन्दर्य के दृश्य चितराम


भारतीय दृष्टि जीवन को उसकी समग्रता में देखती है। उसमें जीवन के सभी पक्ष समाहित जो है! कला की दीठ से वहां संगीत है, चित्रकला है और नृत्य है। आपस मंे घुली यह तमाम कलाएं ही एक दूसरे को रूप देती है। बावजूद इसके, हर कला की अपनी स्वायत्ता भी है।  नृत्य की ही बात करें। नृत्य माने ताल और लय पर थिरकता सौंदर्यपूर्ण अंग संचालन। नाट्य और नृत्त का संगम। गीत में अन्र्तनिहित को देह की थिरकन वहां मूर्त करती है।...और भरतनाट्यम तो नृत्य में अभिनय भाव संजोए कला की सूक्ष्म दीठ है। इधर प्रख्यात नृत्यांगना मालविका सारूकाई ने भरतनाट्यम में अपने तई प्रयोगधर्मिता के नए ताने-बाने बुने हैं। परम्परा को समय सरोकारों से जोड़ते वह नृत्य में गजब की बढ़त करती है। कला के गहरे सरोकार रखने वाली विदूषी टिम्मीकुमार ने पिछले दिनों उसके नृत्य की सार्वजनिक प्रस्तुति कराई तो इसे गहरे से अनुभूत किया। 
नृत्य आस्वाद करते लगा, भरतनाट्य में मालविका दृष्य दर दृष्य की अद्भुत सौन्दर्य सर्जना करती है। देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर बनती गंगा और पर्वतों, पठारों से बहता उसका वेग मालविका के ‘गंगा अवतरण’ नृत्य में जीवंत होता है। नृत्य देखते लगता है, गंगा और उसक प्रचण्ड प्रवाह को हम सच में करीब से महसूस कर रहे हैं। नृत्य में हाथों की थिरकन और आंगिक चेष्टाओं की विषेष गति। सच! ताल-लय का मंत्रमुग्ध करता निःषब्द आवर्तन है मालविका का नृत्य।
बाह्यमुखी रंजकता में भीतर के ध्यान और नृत्यांगना की साधना को मालविका के नृत्य में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। गंगा पतित पावनी तो है ही, जन्म-मृत्यु और फिर से जन्म के जीवन चक्र की भी तो संवाहक है! मालविका अपने नृत्य में इसी दर्शन का नाद करती है। भाव मुद्राओं में वह अनूठा स्पेस सृजित करती है और तात्कालिक परिवेश को गहरे जीती है। सूक्ष्म भाव अभिनय के साथ वहां कोमल कल्पनाएं, विचार की गहरी सूझ दिखाई देती है। गंगा अवतरण के बाद की मालविका की बेहतरीन प्रस्तुति थी, ‘ठुमक चलत रामचन्द्र’। डी.बी. पलुस्कर की संगीतबद्ध इस रचना का मालविका का शब्दों पर रचा भाव संसार मन मोहने वाला था। हस्तमुद्राओं, नजर, मुस्कमान और अंगुलियों के मोहक बर्ताव में दृश्य के अनगिनत रूपाकार गढती मालविका ने श्रीरामचन्द्र के बाल्यकाल के अद्भुत चितराम नृत्य में उकेरे।  मुझे लगता है, संगीत में निहित बोल और ध्वनियों पर थिरकते अंगों से वह एकाभिनय नहीं अनेकाभिनय का अहसास कराती है। एक और प्रस्तुति ‘वंदेमातरम्’ वह जब कर रही थी तो जैसे भारतीय संस्कृति, परिवेश के तमाम पहलुओं को उसने अपने में समाहित कर लिया था। यथार्थ के रूपान्तरण का सशक्त दृश्य-श्रव्य माध्यम भी जिस सौन्दर्य को ठीक से व्यंजित नहीं कर सकता, वह अकेले मालविका अपने नृत्य में कर देती है। एक कलाकार अपने तई कितने-कितने पात्रों को अपने मंे समाहित कर भावपूर्ण दृश्यों का रचाव करता है, इसे मालविका के भरतनाट्यम से जाना जा सकता है।
बहरहाल, टिम्मीकुमार शहर की कलाकार, कला रसिक उद्यमी हैं। संगीत, नृत्य के बहुतेरे आयोजनों से सांस्कृतिक आयोजनों में पसरी एकरसता को उन्होंने तोड़ा है। मालविका सारूकाई उनकी मित्र भी हैं सो उन्हीं के सौजन्य से छायाकार मित्र महेश स्वामी के साथ जब इस नृत्यांगना से प्रस्तुंित के बाद संवाद हुआ तो भरतनाट्यम में  प्रयोगधर्मिता के उनके बहुत से अनछुए पहलुआंे से भी रू-ब-रू हुआ। कैसे किसी नृत्य में शरीर संतुलन के साथ नृत्यांगना अंतर्मन ध्यान को परिणत करती है, उसे भी तब गहरे से समझा। मालविका ने इस नाचीज से कहा भी, ‘नृत्य करते अपने आप से ही नहीं अनंत व्योम से, समय से और परिवेश से भी संवाद होता है।’ 


Saturday, January 12, 2013

कला का उजास


आत्मान्वेषण की सूक्ष्म अभिव्यंजना है चित्रकला। स्मृतियों, कल्पनाओ और स्वप्न संकेतों में वहां अर्न्तनिहित का सुगठित संयोजन जो होता है! चित्रकार रंग-रेखाओं में जो कुछ बनाता है, उसमें स्वयं उसकी अभिव्यक्ति व्याकुलता के साथ जीवनगत सौन्दर्य से जुड़े संस्कार भी तो होते हैं। प्रकाष, छाया तथा संदर्ष की अनगिनत छवियां कलाकार जब आंकता है तब उन्हें देखने वाले अपने तई अर्थ तलाषते हैं। कला का यही तो है आनंद हेतु। 
पिछले दिनों मनन चतुर्वेदी के रंग सरोकारों के साथ किसी कलाकार के आनंद हेतु से भी जैसे सीधे साक्षात् हुआ। यह ऐसा था जिसमें किसी कला मन के उर की उमंग उन बच्चों के लिए समर्पित थी, जिनका इस जहां में कोई नहीं है। ऐसा, जिसमें लगातार 72 घंटे रंगो में प्यार और स्नेह की छांव संजोयी जा रही थी। सोचता हूं, बच्चे इस जग में प्यार के फरिष्ते ही तो हैं! निराश्रित और परित्यक्त बच्चों के लिए कुछ करने के ‘एंजिल ऑफ लव’ केन्द्रित कला उपक्रम के बारे में भारतीय पुलिस सेवा के बेहद संजिदा, मगर कलाकार मन अधिकारी बी.एल. सोनी ने जब बताया तो मनन की कलाकृतियांे से रू-ब-रू होने का औचक ही मन हुआ था। 
ठिठुरती सुबह में धूप के ताप का तब सुखद आगाज हुआ ही था, जब मनन की बन रही कलाकृतियांे को देखने औचक पहुंच गया था। ढेरों बने चित्रों में उभरती मूर्त-अमूर्त आकृतियों में जीवन का उल्लास जैसे बंया हो रहा था। अनुभूत किया, वहां लोक का उजास भी था। जीवन से जुड़े संघर्ष थे तो जो है, उसे सहेजने का जतन भी और जो नहीं है, उसे बिसारने की सहज उत्कंठा भी। हरे, पीले, नीले-चटक, धुसरित रंगों में जीवन रचाव को देखने जब पहुंचा तब मनन की अनवरत कलायात्रा के 68 घंटे व्यतीत हो चुके थे। पता चला, मनन इस दौरान न सोयी है, न थक कर बैठ विश्राम किया है। बस कलाकृतियों के रचाव में ही लगी रही है। मगन मनन रच रही थी रंगों से कैनवस।  बगैर ब्रष। उंगलियों के पोरों से। हाथों की थाप से। उपस्थिति का बगैर भान कराये कुछ देर यह नाचीज़ मनन की अनथक कला में ही खोया रहा। देखा, वह कैनवस पर कभी रंग छिड़क रही थी तो कभी हाथों से रंगों का लेप़ करती जैसे अपने को ही उनमें बुन रही थी। औचक, एक चित्र में नन्हीं सी कोई बच्ची झूला झूलती उभरी तो दूजी में धुसरित रंगों में गांव और गांव का जीवन बंया हो रहा था। वहां हरे खेत थे, मृण पात्र थे और थे जीवन से जुड़े तमाम सरोकार।  
मनन समाज सेवा से मन से जुड़ी कलाकार है। बच्चों में रमती, उनमें ही बसती। पता चला, कभी निराश्रित एक बच्चे को वह अपने घर ले आयी थी। उसे पालते-पोषते ही कलाकार मन को लगा, ऐसे बच्चे जहां में और भी हैं जिनका कोई नहीं। क्यों नहीं, उन्हें भी प्यार की छांव दी जाए। बस इस सोच से ही नींव डाली मनन ने सुरमन आश्रम की। आज इस बाल आश्रम में परित्यक्त, निराश्रित 88 बच्चें हैं। स्वाभाविक ही है, मनन के कलाकार मन में भी यही बच्चे बसते हैं। इसीलिए तो उसकी कलाकृतियों में बच्चों की ईच्छाओं, उनकी हंसी के रंग हैं तो जीवन से जुड़ा वह दर्द भी औचक बंया होता है जिसमें नन्हीं कोंपलों के लिए आसमान की छत के सिवा कोई और सहारा नहीं। रंगों से जुड़े जीवन सरोकारों की अपनी कलाकृतियों की बिक्री से मनन नन्हीं कांेपलों के सुखद भविष्य के स्वप्न संजोए हुए हैं। उनके यह स्वप्न पूरे हों। आमीन! 
बहरहाल, किसी कलाकार की यह अद्भुत सर्जना ही तो है, जिसमें अपने लिए नहीं दूसरों के लिए कुछ करने का आत्मान्वेषण रंगों से यूं बंया हुआ है। आप क्या कहेंगे!


Sunday, January 6, 2013

बचा है कुछ हरा



पेड़ों में 
बचे हैं 
अभी भी 
हरे पत्ते; 
नम आंखों में 
बचे हैं 
अभी भी 
बहुत-से सपने; 
धूप में 
बची है 
अभी भी 
थोड़ी-सी छांव; 
रीतते मन में 
बचा है 
अभी भी 
बीता अतीत; 
उदासी में 
बची है 
अभी भी 
थोड़ी-सी मुस्कान; 
बाहर नही तो अंदर 
बचा है 
अभी भी 
कुछ हरा। 
नहीं, 
अभी तो 
कुछ भी 
नहीं झरा।

Friday, December 28, 2012

रेखाओं की ध्वनि

जीवन से जुड़ी विद्रूपताओं  के सूक्ष्म अंकन की कला है व्यंग्यचित्र। कहें, यह वह संकते लिपि है जिसमें रेखाओं की ध्वनि को सुना जा सकता है। चित्रकला की ऐसी शैली जिसमें आकृतियां गुदगुदाती है, करारा प्रहार करती है तो कभी सोच का नया आकाश भी अनायास ही दे देती हे। मुझे लगतां है, यह व्यंग्यचित्र ही है जिसमें न्युनतम  रेखाओं में कहन की विराटता देखी जा सकती है।
बहरहाल, व्यंग्यचित्रों में प्रायः किसी समाचार के बहाने या फिर घटना जन्य परिस्थिति से बनी रेखाएं बहुत से स्तरो ंपर मारक प्रहार करती है तो कभी हास्य की अवर्णनीय स्थिति भी उत्पन्न करती है। इसीलिए तो कहते हैं, हजारों हजार शब्द जो नहीं कह सकते वह न्युनतम रेखाएं व्यंग्यचित्रों में कह देती है। यही नहीं, सब कुछ कहने के बाद भी बहुत कुछ फिर से वहां सोचने के लिए जेहन में रख दिया जाता है। स्वाभाविक ही है, इसके लिए रेखाओं की समझ ही पर्याप्त नहीं है-वह दृष्टि भी होनी चाहिए जिससे घटना या समाचार के वर्तमान के साथ उसके भविष्य को भी पढ़ा जा सके।

कार्टून और कैरिकेचर में महीन भेद है। कार्टून घटनाओं की पड़ताल करते जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति करते हैं जबकि कैरिकेचर व्यक्ति विशेष को उघाड़ते हैं। माने व्यक्ति के बाहरी ही नहीं अंदर के जगत की भी वहां तलाश होती है। वहां संवाद नहीं होता परन्तु शालिनता में रेखाएं बहुत कुछ कहती है। शिष्ट में चुभन और हास्य देने वाली परिस्थितियां औचक ही वहां पैदा होती है। कैरिकेचर के अतीत में जाए तो लगेगा, यह कला आज की नहीं राजा-महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है।

इतालवी भाषा में कैरिकेचर कैरेक्टर है और स्पेनिश में कारा। अर्थ है-चेहरे। वैसे  नहीं जो सामान्यतः दिखाई  देते हैं, वह जिनमें व्यक्ति पूरी तरह से रंगा होता है। यानी व्यक्ति का चरित्र जिससे बंया हो। आसान नहीं है यह। कम से कम रेखाओं में व्यक्ति का बाहरी ही नहीं भीतरी भी बंया करना। कहते हैं, लियोनार्दो द विंचि ने कैरिकेचर कला की तलाश की थी। तब सिक्कों पर शासकों के चेहरे बने होते थे। विंचि ने देखा, सिक्के जब घिस जाते हैं तो शासको की छवियां भी विदु्रप हो जाती। कभी किसी शासक की ठूड्डी अजीब हो जाती तो कभी किसी की नाक। बस फिर क्या था, लियोनार्दो ने सिक्कों से प्रेरणा लेते हुए ही तत्कालीन विशिष्ट व्यक्तियों के कुछेक कैरिकेचर बनाए। लोगों ने उन्हें बहुत पंसद किया। बाद में तो यह कला विश्वभर में खूब पनपी।

थामस रोलेण्ड ने 19 वंी सदी में बड़ी-बड़ी हस्तियों के ऐसे चित्र बनाकर अपार लोकप्रिय प्राप्त की। विलियम होकार्थ वह कलाकार है जिसने पहले पहल एडिटोरियल कार्टून और कॉमिक स्ट्रिप की शुरूआत की।  होगार्थ ने जब ब्रिटिश समाज के आडम्बरपूर्ण चरित्रों को देखा तो उनके मन में सहज ही उनके प्रति आक्रोश उत्पन्न हुआ। परिणति में ही उन्होंने कला में शाश्वत विषयों की बजाय तात्कालीन विषयों पर रेखाओं से मारक प्रहार किये।
भारत में कार्टून कला के भीष्म पितामह शंकर हैं। कार्टून में पहले पहल विचार शंकर ही लेकर आए। इधर प्रायः सभी समाचार पत्रो के मुख्यपृष्ठ का एक कोना कार्टून का ही होता है। याद करें, आर.के. लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’, सामू का ‘बाबूजी’, कदम का ‘टोपीधारी’ और सुधीर तैलंग का जींस पहनने वाला झोलाधारी-सबके सब चरित्र हममें इस कदर बस गए हैं कि इनके बिना कोई घटना इन दिनांे अधूरी नहीं लगतीि!
बहरहाल, कुछ दिन पहले लोकेन्द्र नाहर के बनाए व्यंग्यचित्रों, कैरिकेचर की प्रदर्शनी देखी तो यह सब जैसे याद आया। कार्टून, कैरिकेचर की उसकी प्रदर्शनी देखते लगा, इसमें उसके अंदर का कलाकार उसकी मदद करता है। इसीलिए भी कि वह जो बनाता है उसमें रेखाओं का सुघड़पन और उनकी कोमलता देंखने का न भूलाने वाला प्रभाव पैदा करती हैं। कैरिकेचर ऐसी कला है जिसमें कंपोजिशन सेंस तो खैर जरूरी है ही, ब्रश-स्ट्रोक भी मारक होना जरूरी है। यह जब लिख रहा हूं, हुसैन का बनाया लोकेन्द्र का कैरिकेचर और लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’ याद कर रहा हूं। याद करंेगे तो आपको भी बहुत कुछ याद आने लगेगा!