Friday, May 30, 2014

चित्त शिक्षित हो, मन सर्जक


सांस्कृतिक संसाधनों को शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से कभी देश में संस्कृति मंत्रालय के अधीन सीसीआरटी यानी सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई थी। अपने तई सांस्कृतिक शिक्षण के लिए प्रशिक्षण की पहल भी एनसीईआरटी के सहयोग से संस्थान ने कुछ समय पहले की परन्तु व्यावहारिक रूप में अपने उद्देश्य में अब तक यह पूरी तरह से विफल ही रही है। इससे बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा कि बहुत से स्तरों पर स्वयं इस संस्थान की पहचान भी अभी तक बन नहीं पाई है।  
बहरहाल, शिक्षण में बड़ी जरूरत इस समय चित्त शिक्षित हो और मन सर्जक बनने की है। हो उलट रहा है। शिक्षण संस्थान रोजगार की होड़ जगा रहे हैं। सांस्कृतिक मूल्य वहां दरकिनार है। संस्कारों से जुड़ी सोच वहां कहीं नहीं है। मानवीयता का पाठ जैसे वहां सिरे से गायब कर दिया गया है। इसीलिए तो सहजता, अपनापे के भावों का शिक्षण में कोई मोल नहीं है। शिक्षण माने ऐसा रोबोट तैयार करना जो प्रौद्योगिकी से जुड़ा भौतिक विकास जुटाए। दीर्घकाल में यह प्रवृति मानवीय विकास विरोधी ही है। सोचिए जब संवेदना ही नहीं होगी तो जीवन में रंग कहां से आएंगे! 
इस समय जो संस्कृति है वह बाजार के तीव्र परिवर्तनों से प्रभावित है। क्षणिक। शास्वत वह है जो प्रकृति प्रदत्त है। प्रकृति माने हमारी धरोहर। हमारी सांस्कृतिक विरासत। इसलिए शिक्षण में आज इसीकी सबसे बडी आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक इसीलिए है कि वहां मानव मूल्यों पर जोर है। पर शिक्षण में अभी यह गौण है। शिक्षण में संस्कृति हो पर वह पूर्ववर्ती कलाकारों, कला सिद्धान्तों ही केन्द्रित नहीं हो। वह संस्कृति से जुड़े विषयों पर छात्रवृत्ति प्रदान करने वाली नहीं हो। पर सांस्कृतिक संस्थानों का इस समय का सच यही है। सीसीआरटी से या संस्कृति मंत्रालय से कोई पूछेगा तो तपाक से जवाब मिलेगा फलां वर्ष में सांस्कृतिक जागरूकता के लिए हमने इतनों को स्काॅलरशिप दी, इतनों को अनुदान दिया। इससे संस्कृति के कौनसे संस्कार मिलने वाले हैं या कहें अब तक मिले हैं।
कला या संस्कृति शिक्षा की व्यापकता इस बात में नही ंहै कि विद्यार्थी पूर्ववर्ती कलाकारों, सांस्कृतिक धरोहर के बारे में अध्ययन करे। इसमें ंहै कि शिक्षण संस्थान में  मौलिक दृष्टि का विकास हो। यह विद्यार्थी में अपने देश, संस्कृति के इतिहास के प्रति गौरव भाव जगाने से संभव है। अनुभवों की सीर इसमें मदद कर सकती है। संस्कृति की सोच से जुड़े लेखकों, कला मर्मज्ञों के अनुभव आधारित ज्ञान का प्रसार यह संभव कर सकता है। यह कठिन नहीं है। सीसीआरटी  जैसे संस्थान इसकी पहल सकते हैं। पहली बार पूर्ण बहुमत से किसी दल की सरकार बनी है। ‘चित्त शिक्षित हो, मन सर्जक’ की उम्मीद तो उससे की ही जा सकती है।

Friday, May 23, 2014

नाटक कला है, मनोरंजन नहीं



नाट्यकला में इस दौर की विडम्बना यह है कि उसे कला की बजाय मनोरंजन मान लिया गया है। इसीलिए सिनेमा और टीवी चैनलों के निर्थक कहन के धारावाहिकों को उसकी चुनौती मान लिया गया है। नाटक संवेदनाओं का जीवन राग है। वह तकनीक नहीं है। सोचिए! सिन्थेसाईजर तमाम दूसरे वाद्यों की ध्वनि निकाल देता है तो क्या इसका अर्थ यह मानें कि तबला, हारमोनियम, सारंगी वादन कला की अब जरूरत नहीं रही? नाटक कहानी भी नहीं है। जो कुछ हो चुका है उसी का मंचन होना है तो फिर कला कहां है? यह तो एक विधा का दूसरी विधा में अनुवाद ही हुआ ना? 

बहरहाल, नंदकिशोर आचार्य के नाटकों पर जाएंगे तो पाएंगे उन्होंने अपने नाट्य लेखन में मानवीय संवेदनाओं को असरदार अभिव्यक्ति दी है। यह सही है कि उनकी पहचान नाटककार से अधिक कवि, आलोचक रूप में है परन्तु ‘देहान्तर’ ‘पागलघर’, ‘गुलाम बादशाह’, ‘जिले सुब्बानी’, ‘हस्तिनापुर’, ‘जूते’ जैसे उनके नाटकों में कथ्य के साथ नाट्यकला का  जैसे मूल हैं। अतीत, पुराणों से जुड़ा संदर्भ और इतिहास भले वहां है पर चरित्रों की विचार व्यंजना सर्वथा मौलिक है। देहान्तर’ को ही लें। महाभारत की कथा का वैचारिक उन्मेष वहां है। ययाति, शर्मिष्ठा, पुरू के चरित्रों को नाटककार ने कथा में लिया जरूर है पर उन्हें  अपने तई नाट्य में फिर से जिया है। इसीलिए वह कहानी ही यहां नाट्य रूप लिए नहंी है। इसमें पात्रों का मार्मिक अन्र्तद्वन्द है। एक मां की अन्र्तवेदना है तो वह पौरूष भी है जिसके होते उसकी पत्नी किसी और को मन में पाले हुए है। उस बेटे की व्यथा है जो अपने पिता को यौवन उधार तो दे देता है परन्तु वापस उसे प्राप्त इसलिए नहीं करना चाहता कि उसका भोग मां के साथ हुआ है। माने किसी एक नहीं तमाम पात्रों के द्वन्द में आगे बढता नाटक इस कदर सधा हुआ और मार्मिक है कि पढ़ने के बाद भी उसमें निहित विचार गहरे से मन में पैठ जाता है। 

रंगमंच दरअसल मंचीय कला है। जयशंकर प्रसाद ने बहुत से नाटक लिखे परन्तु उनके नाटक मंच पर अधिक खेले नहीं गए लेकिन ‘स्कन्दगुप्त’ को जब ब.व. कारन्त जैसा निर्देशक मिला तो वह बेहद लोकप्रिय हुआ। नाट्यालेख बढि़या हो, यह तो जरूरी है ही परन्तु उसके साथ मंचन की कला दीठ भी वैसी हो तो नाट्य जनप्रिय हो सकता है। इस समय की बड़ी विडम्बना यह भी है कि नाट्यकर्म सामुहिक चेतना की बजाय वैयक्तिक हो गया है। कभी बीकानेर का रंगकर्म सर्वाधिक सक्रिय था। नाचीज ने एक दशक से अधिक की अवधि में वहां निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएं की। अंततः यही समझ आया कि नाट्य संस्थाओं के अपने नाटककार हैं, अपने प्रशंसक हैं। इसी से शायद आचार्यजी जैसे नाटककार रंगफलक से कटते चले गए। कला की दृष्टि से हिन्दी रंगकर्म का बड़ा संकट क्या आज यह नहीं  है?



Sunday, May 18, 2014


  "जनसत्ता" के 18 मई, 2014 में प्रकाशित "रंग नाद" की समीक्षा 

Friday, May 16, 2014

संस्थापन का ‘अतीत राग’


तमाम हमारी कलाएं समय, समाज और परिवेश की व्यंजना है। सृजन-स्त्रोतों पर जाएंगे तो संस्कृति, परम्परा, इतिहास को वहां ध्वनित पाएंगे। कलाएं वैचारिक कोलाहलों की ध्वनियां ही तो है! अतीत और वर्तमान वहां साथ-साथ झिलमिलाता है। और हां, बहुत से स्तरों पर कलाएं अतीत के जरिए ही भविष्य का दरवाजा खोलती हैं।

बहरहाल, भारतीय कलाए बाहर से भीतर की यात्रा कराती हैं। अतीत से जुड़ी स्मृतियां जो वहां होती है! यूरोपीय कला में भीतर से बाहर की यात्रा मिलेगी। इसीलिए वहां यात्रिकता है, हमारे यहां जीवंतता। अतीत को बिसराकर भविष्य की नींव रखी भी कैसे जा सकती है! कलाकार विनय शर्मा की कला पूरी तरह अतीत से ही संपन्न हुई है। 

पुरानी बहियां, जन्मपत्रियां, स्टाम्प पेपर जैसी चीजों से कैनवस को समृद्ध करने के साथ इधर उन्होंने अतीत से जुड़ी चीजों के संग्रह का अपने यहां संस्थापन किया है। अभी बहुत दिन नहीं हुए। भारतीय मूल के जर्मनी कलाकार एम. मुमतानी के  साथ विनय के घर बने स्टूडियो में अतीत से जुड़ी चीजों के संग्रह संस्थापन का आस्वाद किया। लगा, अतीत जैसे हमसे वहां बतिया रहा है। स्टूडियों की धरोहर हैं पुराने जमाने की रोजमर्रा से जुड़ी भांत-भांत की चीजें। ग्रामोफोन, पुराना टाईपराईटर, बड़ी सी दवात, झूले, झाड़ फानुस, ईरानी आईना, सूत कातते चरखे और गुजरे जमाने की याद दिलाते ढेर सारे रेडियो। रेडियो का संग्रह देख जतीन दास के किए पंखों के संग्रह की याद आती है। वहां पंखे हें, यहां रेडियो है। 

बहरहाल, कबाड़ को धो पूंछकर और पुरानी चीजें मांग-मांग कर विनय से दोस्तों से भी संग्रह की है। संस्थापन की लय भी अद्भुत है। एक जगह चरखे से उभरी छवियां-दीवार पर दृश्यमान की गई है। परछाई में चरखा चलता है तो उसके अंदर लगे लाल पीले कांच झिलमिलाते दीवार पर दृश्य सौन्दर्य की सर्वथा नयी दीठ देते हैं। पुराने जमाने के किवाड़ दीवार पर टंगे हुए। देखते हुए लगेगा, अभी चर्र की आवाज के साथ खुलेंगे। एक कोने में छोटा सा पुराना टाईपराईटर पड़ा है, कागज डला हुआ। औचक खट, खट की आवाज जैसे ध्वनित होने लगती है। भांत भांत के रेडियो बजते हुए। तबके भी जब शायद रेडियो की शुरूआत हुई थी। एक तरफ बड़ा सा ग्रामोफोन और उसमें पुराने रिकाॅर्ड बज रहे हैं। पुराने टेलीफोन यंत्र। पुरानी फिल्मों के पोस्टर! अतीत से जुड़े ढेरों दस्तावेज। हर ओर, हर छोर।

अतीत का यही तो है अपनापा। संग्रह संस्थापन में भले चीजें स्थिर हैं परन्तु उनमें लययुक्त गतियां हैं। गुम हुई आवाजें हैं और हैं स्मृतियां। चीजें स्थिर रहें, मौन रहें तो उदासी, सन्नाटा पसरता है पर कलाकर्म से उनमें ध्वनित होने की अनुभूतियां पैदा की जाए वह राग बन जाता है। ‘अतीत राग’ ही तो है विनय शर्मा का यह संस्थापन।


Friday, May 9, 2014

दृश्य की अनंत संभावनाओं का भित्तिशिल्प

डेली न्यूज़ में प्रति शक्रवार प्रकाशित कोलम " कलातट"
हिम्मत शाह की कला दृश्य की अनंत संभावनाओं का आख्यान सरीखी है। आॅक्तिवो पाज ने कभी उनकी कला के बारे में लिखा है, ‘हिन्दुस्तान के वह सर्वाधिक क्रिएटिव आर्टिस्ट है।’ इस समय में भी उनके शिल्प, रेखांकन और संस्थापन में इसे गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।
बहरहाल, कला के अपने आरंभिक दिनों में हिम्मतशाह ने अहमदाबाद के संेट जेवियर स्कूल में तीन बड़े रिलिफ किए थे। यह 1968-69 की बात है। अति सूक्ष्म, हल्के, और दीवार की धरातल के अंदर और बाहर भित्तिशिल्प की यह देश की विरल सौन्दर्य व्यंजना है। साठ के दशक में कैमरा जब बहुत कम लोगों के पास था और बहुत सारी ऐतिहासिक धरोहरें काल कवलित हो रही थी, उनसे जुड़ा इतिहास भी जैसे लोप हो रहा था। ऐसे में हिम्मतशाह के मित्र सुरेन्द्र पटेल ने जेवियर में उनकी इस अनूठी कला को देखा और कैमरे से क्लिक दर क्लिक उसे संजो लिया। दीवार पर इंटों, सीमेंट के जोड़ के साथ शिल्प का अनुठा सौंदर्य संयोग! छायांकन में यह धरोहर बरसों तक हिम्मतशाह अपने पास सहेजे रहे। भित्तिशिलप का वही खजाना अब ‘हाई रिलिफ वर्क बाई हिम्मतशाह’ छायांकन-शब्दांकन एलबम के जरिए सामने आया है। इसमें हिम्मतशाह के भित्ति शिल्प से संबंधित विचार हैं, उससे जुड़ी संकल्पना है और है वह निर्माण प्रक्रिया भी जिसमें हिम्मतशाह जैसे कलाकार के शिल्प को गहरे से जाना जा सकता है।
हिम्मतशाह 
हिम्मतशाह की कला ही बोलती रही है, वह स्वयं सदा इस बारे में मौन रहे हैं। इस दीठ से ‘हाई रिलिफ वर्क बाई हिम्मतशाह’ और भी महत्वपूर्ण है। इसमें उनका मौन मुखर हुआ है। ठोड़-ठौड़ उनका कहन कला के मर्म में जैसे ले जाता अंदर से मथता है, ‘कलाकार की आंख हृदय से हाथ और फिर निर्माण सामग्री की ओर देखती है।’, ‘सूर्य की किरणों के साथ छाया-प्रकाश को अनुभूत करते लगता दीवार उस आत्मा स्वरूप हो गई है जिसमें केवल पानी प्रतिबिम्बित होता है।’,‘जब कल्पनाएं मुस्कुराती है तो कला जन्म लेती है।’, ‘कलाकार पहेली सिरजता है, स्वयं भी पहेली बन जाता है।’, ‘एक बार जो सृजित हो जाता है फिर दुबारा वैसा सृजित नहीं हो सकता। क्षण एक बार ही आता है।’
सच भी है! हिम्मतशाह ने जो सिरजा, वह दुबारा कैसे सृजित हो सकता है। भारतीय कला में उनका यह भित्ति शिल्प इतिहास की अनमोल धरोहर ही तो है!  इससे जुड़े छायाचित्र, रेखांकन, वृत्त, छाया-प्रकाश प्रभाव और शब्द उजास ‘हाई रिलिफ वर्क बाई हिम्मतशाह’ में बंया है। और हां, हिम्मतशाह इसमें उन कारीगरों, मित्रों का भी जिक्र करते हैं जो इस कार्य के लिए उनके साथ परोक्ष-अपरोक्ष साथ थे। हिम्मतशाह ने अब तक अपनी कला पर कभी कुछ नहीं कहा परन्तु भित्ति शिल्प सौन्दर्य की सर्जना के बहाने उनके मौन को सुना जा सकता है।


Friday, May 2, 2014

मिथकों का शिल्प छन्द


अमरेश कुमार का संस्थापन 
कलाएं अज्ञात को ज्ञात की राह पर ले जाती है। शिल्प कला को ही लें। कहीं कोई शिल्प देखते स्मृतियां, आस्थाएं और जीवनानुभूतियां का स्पन्दन होता है, समझिए कला के परम सत्य के आप नजदीक हैं। अमरेश कुमार की शिल्प सर्जना का आस्वाद करते मन में कुछ इसी तरह का घट रहा है। मिट्टी, काष्ठ, पत्थर और तमाम दूसरी धातुओं से निर्मित उनके स्कल्पचर देखते औचक यह भी अनुभूत होता है कि उनका सर्जन चित्त की अनंत यात्रा है। भारतीय दर्शन के गूढ़ को प्रत्यक्ष और सर्वजन ग्राह्य बनाते।
कुछ दिन पहले पटना में राष्ट्रीय कला शिविर में व्याख्यान के लिए जब जाना हुआ तो वहीं अमरेश की कला से साक्षात् का सुयोग हुआ। लगा, शिल्प में वह जो कुछ निर्मित करते हैं उसमें दृष्टा एवं दृश्य का भेद मिट जाता है। मूर्तिशिल्प ही नहीं संस्थापन में भी वह परम्पराओं के साथ लोक से जुड़ी संवेदना में माटी की सौंधी महक का सुवास कराते हैं। एक शिल्प श्रृंखला है, ‘गर्भगृह’। देखते मन में विचार आने लगे हैं, मंदिर के बाहरी मंडप में एक नहीं अनेक दीप जलते हैं परन्तु गर्भगृह में तो एक नन्हा दीप ही उजास का संवाहक होता है। अमरेश कुमार की ‘गर्भगृह’ शिल्प संरचनाएं ऐसी ही हैं। इनमें भक्ति, ज्ञान और लोक से जुड़ी संवेदना का त्रिक है। इनमें अतीत को जैसे गुना और फिर गहरे से बुना गया है। टेराकोटा में मिट्टी को मथते, उसमें रमते लोक संस्कृति के जीवंत चितरामों में ही नहीं काष्ठ, धातु और पाषाण की उनकी संरचनाएं सोए मन को जैसे जगाती है। राग-विराग के अनगिनत संदर्भ और ‘चरैवेति’ चरैवेति’ का हमारा जीवन गान लिए। मुझे लगता है वह आकृतियांें में अमूर्त की अनंत संभावनाओं की दीठ को प्रेरित करने वाले कलाकार हैं। 
बहरहाल, धातु का उनका एक शिल्प है ‘काल’। समय की अद्भुत व्यंजना! अंधकार हरती दीपक ज्योति! चहुंओर अंधेरे का परिवेश और उसके बीच स्थित जलती सौम्य जोत। जड़ का जीवंत आभास। बहुत कुछ स्पष्ट और थोड़ा अस्पष्ट। निकट भी पर उतना ही दूर भी। ‘खड़ाउ’ का संस्थापन भी कुछ इसी तरह का है। काष्ठ शिल्प की पुस्तक पीठियां और पास बना लकड़ी का प्रवेश आवरण या कहें द्वार। इसमें चहुं दिश अलंकृत खड़ाउ हैं। उड़ती सरीखी। मोक्ष की कामना, उसका मार्ग और अध्यात्म, दर्शन का विरल संस्थापन। संस्थापन और भी है, तीरों पर लेटे भीष्म नहीं, उनसे जुड़ी वेदना के मर्म का, गांधी का, तुशिता स्वर्ग का और हनुमान की उड़ान आदि। कहीं कोई यांत्रिकता नहीं। शायद इसलिए कि अमरेश इनमें अमूर्त को इस सुझावात्मक रीति से मूर्त करते हैं कि अमूर्त की खोज हो सके। मिथकों का अद्भुत छन्द ही तो वह रचते है! शिल्प में युगों से निनादित हमारी सोच, हमारी आस्था और हां, हमारे जीवन से जुड़े चिन्तन का प्रवाह जो उनकी कलाकृतियों में बसता है!

Friday, April 25, 2014

पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं के चिंतन का चितेरा


चिंतक-चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन आज ही के दिन हमसे विदा हुए थे। उनसे साक्षात् का सुयोग कभी नहीं हुआ पर अपने से दूर भी वह कभी नहीं लगे। पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं की कला दीठ स्वामीनाथन की पाण ही है। सोचता हूं, यह सब तो कैनवस पर बहुत से और कलाकारों ने भी बनाए हैं फिर स्वामीनाथन से ही इनकी पहचान क्यों? शायद इसलिए कि रंग, रूप और विन्यस्त भावों की उनकी अंवेरी कैनवस लय विरल है। अनुभूति की सहज साधना लिए। वह कहते भी थे, ‘समूची कला ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्घाटन है।’ और स्वयं उन्होंने ऐसा करते जीवन से जुड़ी संवेदनाओं को अपनी कला में जैसे गहरे से बुना। यह है तभी तो आदिवासी कलाओं की तुतलाहट को भी पहचानते बखूबी उसे आधुनिक कलाओं के समानान्तरण उन्होंने विश्लेषित भी किया।
बहरहाल, सप्ताह भर पहले की ही बात है। एक भोर जलमहल की पाल पर प्रयाग शुक्ल के साथ था। औचक वहां की पहाड़ी, पेड़ और पक्षियों को निहारते प्रयागजी ने स्वामीनाथन के शब्द याद किए, ‘तमाम कलाएं मनुष्य को संबोधित है’। औचक जहन में कौंधा, यह शायद संभव ही नहीं है कि पहाड़, पेड़ और चिडि़या को एक साथ अनुभूत करते कोई स्वामीनाथन को याद न करे। उनका कला चिंतन, कैनवस पर उकेरी आकृतियां और हां, पहाड़ पर लिखी कविताएं भी-इसीलिए हम चाहकर भी बिसरा नहीं सकते। कैनवस पर वह जो बनाते उनमें दृश्य नहीं देखने के अनुभवों की अनवरत श्रृंखला जो है! लोक से जुड़ी अद्भुत व्यंजना भी। स्मृतियां के चाक्षुष रूप वहां हैं तो वह ब्रश, रंग और रेखाओं की कलाकारी भर नहीं है, अनुभव से सिंचिंत सुनहरी दीठ रूप में हैं। देखने के बाद यह आप-हम-सबकी बन जाती है। 
मुझे लगता है, जगदीश स्वामीनाथन प्रकृति की गुम हुई कला लय की तलाश के चितेरे है। और फिर यह उनका ही चिंतन हैं जिसमें आदिवासी कला को वह ‘जादुई लिपि’ से अभिहित करते उसे हमसे बंचवाते हैं। याद करें, आदिवासी अंचलों की अपनी यात्रा को कला अनुभूतियों में ‘द परसीविंग फिंगर्स’ पुस्तक में उन्होंने जिया तो भारत भवन में ‘रूपंकर’ के जरिए आदिवासी कला को आधुनिक कला के बरक्स विश्लेषण का समकाल भी रचा। उनका कला चिन्तन देखने के अनुभवों की विरल कथा है। ‘पहाड़’ कविता की उनकी पंक्तियां देखें, ‘कभी कभी जैसे यह पहाड़/धुंध मे दुबक जाता है/और फिर चुपके से/अपनी जगह लौटकर ऐसे थिर हो जाता है/मानो कहीं गया ही न हो।‘ देखने का यह विरल अनुभव उनकी कविता में ही नहीं कैनवस पर मांडी पहाड़, पेड़ और चिडि़याओं में सदा के लिए जैसे बस गया है। भले वह इस समय सदेह हमारे साथ नहीं है पर कैनवस के अपने इन पात्रों के जरिए हमसे कभी दूर भी तो कहां हुए हैं!


Monday, April 21, 2014

जो रचेगा वही बचेगा

कलाकृति : सुनीत घिल्डियाल 

कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा शिल्प है। शिल्प का अर्थ आज का शिल्प नहीं। उसमें नृत्य, गायन, वादन, चित्र, मूर्ति, वास्तु सहित सभी हस्तककलाएं सम्मिलित है। शिल्प यानी कलाएं कारू (उपयोगी) भी है और चारू (कलात्मक) भी हैं। 

चित्रकला या मूर्तिकला में सादृश का अर्थ यथार्थ का अनुकरण है, वास्तव का बिंब। परन्तु अनुकरण कैसा? लौकिक नहीं। अनुकरण वह जिसमें अमूर्त को मूर्त करने के संदर्भ निहित होते हैं। एक कला का दूसरी कला से अंतःसंबंध। संगीत को चित्र में कैसे परिवर्तित करेंगे? वह तो अमूर्त है।...तो इस अमूर्त को बिंदु, वृत्त-उध्र्व-अधोमुखी रेखाओं और वृत्त चतुस्त्र परिमंडल के हर छोटे से छोटे भाग में, अंश में उसके स्वभाव को जब सांगीतिक रूप में खोजा जाएगा तो वह संगीत का चित्रण होगा। हेब्बार की रेखाओं को लें। घूंघरू बंधा पैर है पर वह नृत्य की पूरी संरचना का आभास करा देता है। देखने के हमारे अनुभव में उनकी रेखाएं आत्मरूप हो जाती हैं। और यह ऐसे ही नहीं होता है। इसके लिए कलाकार अपने को विसर्जित करता है। बगैर अपना विसर्जन किए किसी भी कला में पूर्णता संभव ही नहीं है। पूर्णता का अर्थ ही है-सृजन का विसर्जन। दर्शन की अभिव्यक्ति, रूप-प्रतिरूप और परारूप का चिरंतन ही तो है कला।

सुनीत घिल्डियाल काष्ठ पट्टिकाओं में अद्भुत कला रूप रचते हैं। इधर उन्होंने समय और जीवन को केन्द्र में रखते मोहक सर्जना की है। सूर्य और उसकी रश्मियों के साथ जीवन स्पन्दन से जुड़ा उनका एक चित्र विरल है। गाढे रंगों की उजास लय उसमें है। रंग संवेदना की भिन्न भंगिमाएं पर एक दूसरे में ओत-प्रोत।  यह विषय का एक तरह से निविषयीकरण है। सुनीत के कलाकर्म की यही बड़ी विशेषता है, वह रंगो की भाषा बंचाते हममें गहरे से बसते हैं। 
कलाकृति : सुनीत घिल्डियाल 

बहरहाल, कोई भी कला आकर्षित तभी करेगी जब उसमें कलाकार स्वयं कहीं नहीं रहेगा। वह अपना विसर्जन करेगा, तभी कुछ गढ पाएगा। रच पाएगा। सुनीत के कलाकर्म में यही है, वह स्वयं वहां कहीं नहीं है। इसी से शायद कला के वह इस तरह के विरल रूप गढ़ पाते होंगें। सर्जन और फिर विसर्जन हमारे ऐसे ही तो परम्परागत नहीं है। उसके गहरे निहितार्थ हैं। दूर्गा पूजा, गणेश पूजा के बारे में विचारें। मिट्टी की मूरत बनती है। उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है। श्रृंगार करके जब उसकी पूजा की जाती है तो उसमें शक्ति का वास हो जाता है। और फिर ऐसे वह जब ऊर्जा प्रदान करने लगती है, वंदन करते मन विभोर हो नाच उठता है। यह प्रतिमा के जीवन्त होने का क्षण होता है। जड़ के चेतन में परिवर्तित होने का क्षण। अनुष्ठान समाप्त होने के बाद ही यह अनिवार्य हो जाता है कि सजी-संवरी, प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा फिर से अमूर्त भूमंडल में विलीन हो जाए। इसीलिए विसर्जन होता है। फिर से सर्जन के लिए। तो कहें, बचेगा वही जो रचेगा।

Friday, April 11, 2014

शिक्षण से जुड़े कलाओं के संस्कार

कलाएं शिक्षण में बोझिलता को दूर करती है। संस्कारों की सूझ देती हुई। यह है तभी तो राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में कुछ समय पहले शिक्षण में कलाओं को जोड़े जाने की बात कही गई थी। पर कुछेक संस्थानों को छोड़ अधिकांश  में अभी भी यह दूर की कौड़ी है। प्रतिवर्ष शिक्षण संस्थाओं से युवाओं की जो खेप निकलती है, उसका अंतिम लक्ष्य नौकरी प्राप्त करना भर होता है। पढ़ाई शायद इसीलिए व्यक्तित्व निर्माण, संस्कारों की खेती नहीं कर पाती और जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे युवा भटक भी जाते हैं। पढ़ाई नौकरी की विवशता नहीं, संस्कारों की संवाहक बने। स्वाभाविक ही है, कलाओं से जुड़ाव इसमें मदद कर सकता है। 

उच्च शिक्षण संस्थानों में अतिथि अध्यापन के अंतर्गत निरंतर जाना रहता है और पाता हूं, बोझिल पढ़ाई की यंत्रणा जैसे वहां चेहरों पर झांक रही है। पर देखता हूं, कला संस्कृति से जुड़ा कोई आयोजन वहां होता है तो विद्यार्थी खिल-खिल जाते हैं।सोचता हूं, क्या ही अच्छा हो इस तरह का उल्लास शिक्षण के दौरान भी रहे। यह कठिन  नहीं है, बशर्ते  तकनीक में कलाओं का छोंक भर लगा दिया जाए। मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में छायांकन के कला सरोकारों पर विद्यार्थियों को व्याख्यान देने के लिए इस बार जाना हुआ तो इसे गहरे से महसूस किया। कक्षा में दाखिल हुआ था तब चेहरे बुझे-बुझे साफ दिखाई दे रहे थे। जैसे कह रहें हो, ‘लो...झेलो, फिर एक पाठ! सच भी है, सुनने की विवशता उदासी ओढाती है। पर जब किस्से-कहानियों में उनसे बतियाया, कला-संस्कृति के उनके भीतर बसे संसार को बाहर निकाला तो पता ही नहीं चला कब मिनट घंटो में तब्दील हो गए। दो घंटे बीते तो, सुकून इस बात का नहीं था कि संप्रेषित हुआ हूं, यह था कि बूझे चेहरे खिले हुए थे। सोचता हूं, पढाई में कला संस्कृति सरोकार जुड़ेंगे तभी ना यह सुनना यंत्रणा भरा न होगा। छायांकन तकनीकी शिक्षा का अंग है पर उसका अध्ययन कैमरे रूपी यंत्र की समझाईश  भरा ही होगा तो उसके कला सरोकार गौण नहीं हो जाएंगे!

बहरहाल, यह सुखद है कि एम.एन.आई.टी. फोटोग्राफी क्लब के सलाहकार छायाकार महेश  स्वामी छायांकन को कला स्थापित करने के आंदोलन में पिछले कईं वर्षों से लगन से जुड़े हैं। उनकी पहल ही इस तकनीकी संस्थान में छायांकन कला को जिन्दा रखते विद्यार्थियों में उल्लास का वास करती रही है। इस बार फोटो प्रतिस्पद्र्धा में निर्णायकों के चयन से बड़ा इसका और उदाहरण क्या होगा। उसमें फोटो जर्नलिस्ट हिमांशु व्यास थे, इन्दौर के सुप्रसिद्ध छायाकार हेमशंकर  पाठक थे और कलाकार नवल सिंह चौहान  थे। माने फोटो पत्रकारिता नजर थी और कलात्मक सौन्दर्य दीठ भी थी। यह महत्वपूर्ण तो है ही कि कोई शिक्षण संस्थान छायांकन के इन सरोकारों से भविष्य के छायाकारों की नींव तैयार कर रहा है।


Friday, April 4, 2014

लीक तोड़ मौलिकता रचते कलाकार

राष्ट्रीय कला कार्यशाला, पटना 

कलाएं विचार परिष्करण की संवाहक है। सोचता हूं, कलाओं की पाण ही तो घुम्मकड़ी परवान चढ़ी है। और हर बार इससे ही नव्यतम कुछ पाने के अनुभव भी पुनर्नवा हुए ही हैं। पिछले सप्ताह एक दिन के लिए पटना में था। संस्कृति विभाग और बिहार ललित कला अकादमी ने वहां राष्ट्रीय कला कार्यशाला आयोजित की थी। महत्वपूर्ण पहल यह भी थी कि देश के तीन कला समीक्षकों को भी आमंत्रण था। कोलकता से अनिरूद्ध चारी थे, लखनऊ से अवधेश मिश्र और जयपुर से यह नाचीज़ था। कलाओं के अन्र्तसंबंधों पर बोलते लगा, कलाकारों में अपने काम के साथ दूसरों के सर्जन की अन्तःप्रक्रियाओं को जानने की गहन जिज्ञासा है। सो चित्रकला के संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु और मूर्तिकला से जुड़े संबंधों पर संवाद करते जैसे खुद भी उनमें रमा। 


कला कार्यशाला पूर्वाग्रहों से मुक्त करने वाली थी। पहले लगता था, इस तरह के आयोजन सर्जन स्वतंत्रता को बांधते हैं। पर जब कैनवस पर कलाकारों को कुछ करते हुए उसीमें खोया पाया तो यह भी लगा कि बहुतेरी बार चाहकर भी जो स्वतंत्र रूप में कलाकार नहीं कर पाता, इस प्रकार के आयोजन अनुशासन में हो जाता है। अनुशासन अंतर्मन विचारों, संवेदनाओं को पंख ही तो लगाता हैं! यह सही है, इस तरह की कला कार्यशालाओं में बंधन होता है-नियत समय में कलाकृति बनाकर देने का। पर सोचता हूं, समय पर कुछ कर देने की विवशता नहीं हो तो क्या स्वयं इतना लिख पाता! कलाकारों के साथ भी तो यही होता होगा ना कि समय पर कुछ देने की सीमा में वह बहुतेरी बार बहुत कुछ महत्वपूर्ण कर देते हैं। लीक तोड मौलिकता रचते। बल्कि कला कार्यशालाएं कईं बार कुछ नहीं कर पाने के रंज भी मिटाती ही है। 

बहरहाल, कार्यशाला में हैदराबाद की अंजनी रेड्डी ने आकृतिमूलकता में अपनापे को बुना, रंग पट्टिकाओं में युसूफ ने जीवन संदर्भ दिए, विनय शर्मा ने अतीत राग सुनाया, खबरों की कैलीग्राफी में मेघाली गोस्वामी ने रंगों की उत्सवधर्मिता को जिया। मिलनदास, अजीत शील, रहीम मिर्जा, मनोज बच्चन, अमरेश कुमार, शैलेन्द्र कुमार, अर्चना,  रजत घोष आदि सभी के कलाकर्म से रू-ब-रू होते लगा, कैनवस सुहानी दीठ ही तो है! तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि कला परख में क्या सहेजूं, क्या छोड़ दूं। प्रेक्षागृह में जब बोल रहा था तो पता ही नहीं चला, क्या और कैसे बहुत कुछ बोल गया। बाद में मेघाली गोस्वामी ने रागमाला चित्र श्रृंखला के शोध मुजब कुछ पूछा तो समालोचक अवधेश अमन ने भारतीय रागमाला चित्रों की सूक्ष्म सूझ दी। वेदप्रकाश की कला सामयिकता अकुलाहट और अकादमी अध्यक्ष आनंदीप्रसाद बादल की धीर गंभीरता मन में अभी भी बस रही है। पटना से लौट आया हूं, पर मन अभी भी वहां के कलाकारों, कला में ही अटका है।


Friday, March 28, 2014

चाक्षुष यज्ञ में वैचारिक भाष्य



कल विश्व रंगमंच दिवस था। संचार माध्यमों में सामयिक रंगचर्या पर बहुत कुछ था पर रंगमंच की वैचारिकी कहीं नहीं थी। माने चर्चाओ में मंचीय प्रस्तुतियों तो रहती है परन्तु विचार संप्रेषण गौण होता है। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि जो कला कभी वैचारिक उन्मेष का सशक्त माध्यम रही है, उसी में विचार को दरकिनार कर दिया गया है।
बहरहाल, रंगकर्म चाक्षुषयज्ञ है। माने आंखो का अनुष्ठान। आंखे जो दिखाती है, वहां दृश्य के साथ विचार भी दीपदीपाता है। पर विचारें, इधर मंच प्रस्तुति के ताम-झाम से आगे क्या हिन्दी नाटक आगे बढ़ पाया है? बाकी की तो पता नहीं पर हिन्दी रंगकर्म की तो असल विडम्बना यही है। प्रस्तुति की कलात्मकता पर तो फिर भी बहुत से स्तरों पर यहां जोर है परन्तु वैचारिकता गौण है। नाट्य प्रशिक्षण का भी तो मूल संकट यही है। वहां प्रस्तुति विधान की ही सैद्धान्तिकी अधिक है। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है पर उसकी व्यावहारिकी नदारद है। माने वैचारिक लोक संकेतों को हमने वहां से भी बिसरा दिया। और भारतेन्दु का ‘अंधेर नगरी’ हिन्दी का आरंभिक नाटक है पर वहां लोक की व्यावहारिकी है। याद करें, नाटक में इंदर सभा बंदर सभा में बदलती है तो शब्द में अक्षरों का उलट-पुलट करते मनोरंजन का जबरदस्त तड़का है। इसलिए कि भारतेन्दु का लेखन रंगकर्म से जुड़ा रहा है। प्रसाद का नहीं जुड़ा रहा, इसलिए उनके नाटक जन से नहीं जुड़ पाए। 
डेली न्यूज़ में प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" 
रंगकर्म में आनंद के साथ विचार जरूरी है। निर्देशन और अभिनय में भी। ब्रेख्त ने रंगकर्म में अलग-अलग समय में आनंद का स्वरूप उस समय की समाज व्यवस्था के अनुरूप होने पर जोर दिया था। अब उलट हो रहा है। नाटक हो रहे हैं पर सभी कथ्य के जीवंत प्रदर्शन में अपनी ताकत झोंके हुए हैं। इसीलिए नाटक देखने के बाद कथा तो याद रहती है परन्तु उसमें निहित विचार कहीं नहीं ठहरता। मंचन के लिए भी वही नाटक चुने जाते हैं जिनमें विचार की अधिक माथापच्ची नहीं हो। नंदकिशोर आचार्य का ‘देहांतर’ इस दृष्टि से विरल है। पुत्र से प्राप्त यौवन ले उसका भोग जब शर्मिष्ठा के साथ होता है तो वह जिस मनःस्थिति से गुजरती है, उस नाट्य विचार को क्या कोई भुला सकता है! नाटक उपन्यास या कहानी नहीं हैं। स्वाभाविक ही है कि नाट्य लेखक का रंगमंच चिन्तन जरूरी है। ऐसे ही नाटक से जुड़े लोगों का साहित्य की संवेदना से जुड़ाव जरूरी है। आखिर नाट्य केवल अभिनय भर ही तो नहीं है। वहां कथन के साथ वैचारिक उन्मेष जुड़ा होगा तभी दर्शक उससे जुड़ सकंेगें। और यह तभी होगा जब रंगकर्म मजबूरी या शौकिया ही नहीं हो। इसलिए नहीं हो कि वह रोजगार देने वाला है बल्कि इसलिए हो कि उसमें स्वयं रंगकर्मी आनंद लेता हो। कलाकार, लेखक स्वयं आनंद का विचार करेगा तभी ना दूसरों को आनंद के साथ उसकी अनुभूति करा पाएगा!


Friday, March 21, 2014

रंगों की भाषा में उत्सवधर्मिता गान

वैश्वीकरण से कलाओं में आदान-प्रदान की सूझ तो बढ़ी है, पर वैविध्यता का लोप भी हुआ है। चित्रकला को ही लें। निरंतर एक जैसे ही विषय, रूपाकारों में रंगाच्छादन देखते बहुतेरी बार ऊब सी होती है। ऐसे में युवा कलाकार सुरेन्द्र सिंह के कैनवस पर बरते रंग, रेखाओं का उजास और बिम्बों में बसी स्मृतियां मन में औचक ही घर करती है। इसलिए कि एकरसता से परे भिन्न छटाओं में प्रकृति से जुड़े अनुभवों की अनथक यात्रा सरीखे हैं, उसके चित्र। कुछ दिन पहले सद्य बनाए उसके चित्रों और छाया-छवियों का आस्वाद करते यह भी लगा कि आंतरिक सौन्दर्यानुभति में वह स्मृतियों को कैनवस पर जीवंत करता है। लोक राग घोलते। इसलिए भी कि वहां मौलिक दृष्य प्रभाव भी है और रूप तत्वों का सांगीतिक आस्वाद भी।
बहरहाल, सुरेन्द्र के सद्य बनाए चित्रों की कला प्रदर्शनी ‘बियोन्ड टेक्सचर’ कलानेरी कलादीर्घा में प्रारंभ हुई है। कला पेटे इधर कैनवस पर जो कुछ सिरजा जा रहा है, उसमें सुरेन्द्र सिंह के चित्र अपनी मौलिक दीठ से भविष्य की उम्मीद जगाते हैं। हो सकता है, कोई इन्हें एब्सट्रेक्ट कहेे पर वहां रूप का सौन्दर्य है। यथार्थ के गहरे सौन्दर्य संकेत जो वहां है! वास्तविक रूप भले न हो पर चित्रित क्षेत्र के आकार व रंग में जीवन से जुड़े अनवरत संदर्भों की कहानियां दृष्य कहन सरीखी ही हैं। चित्रों में उभरे रंगालेपों में कहीं मंदिर में हो रही प्रार्थना की ध्वनियां हैं, मांडणा सज्जित घर और उससे जुड़ी यादों के संदर्भ हैं तो ठौड़-ठौड़ अंवेरा रेत का हेत भी है। कैनवस पर समतल पर विभाजित रंग आकारों और उनके आभास में आधुनिकता की लय के बावजूद सुरेन्द्र के चित्रों में पारम्परिक भारतीय चित्र शैलियों की दीठ है। और हां, लोक कलाओं के जो अलंकरण वहां है, उनमें मिट्टी की सौंधी महक भी है। कुछेक चित्रों में फूल और पंखुडि़यों के साथ लहराती पत्तियों में प्रकृति के अपनापे को जैसे बुना गया है तो कुछेक में लहरों की वक्रता के साथ गतित्व की सुनहरी आभा मन को सुकून देती है। पर कुछेक चित्रों में आकृतियों  के साथ उभरे आधुनिक जीवन बिम्ब अखरते भी हैं। सहज सौन्दर्य की लय तोड़ते।
बहरहाल, इधर बनाए सुरेन्द्र के चित्रों की बड़ी विशेषता  यह तो है ही कि उनमें किसी शैली विशेष या कलाकार का कहीं कोई अनुकरण नहीं है। अंतर की प्रेरणा में भारतीय जीवन दर्शन के साथ वह लोक कला की सहजता में अपने तई बढ़त करता है। चित्र देखते वान गो के चित्रों की भी याद हो आती है।...शायद इसलिए कि रंगों का वहां प्रतिकात्मक महत्व है। माने बचपन की यादों के साथ वर्तमान जीवन से जुड़ी आपा-धापी भी रंगों से ध्वनित होती है। तमाम उसके चित्र रंग भाषा में स्मृतियों और अनुभूतियों की एक तरह से व्यंजना है। सोचता हूं, वान गो ने ही तो कभी चित्रकला में रंगों की भाषा समझाई थी। इस दीठ से सुरेन्द्र के चित्र अंतर्मन संवेदनाओं की अनुकूल रंग संगति तो है ही, हमारी सांस्कृतिक कला विरासत में स्मृतियों के जीवंत दस्तावेज सरीखे भी हैं।सेजान की मानींद सुरेन्द्र के चित्रों में प्रचलित का अध्ययन तो है पर रूप परिवर्तन की मौलिक दीठ भी है। माने जो कुछ कला में दिख रहा है, उसकी एकरसता तोड़ते वह बाह्य प्रभावों से परे कैनवस पर सौन्दर्य को एक तरह से सिरजता हैं। 
‘बियोन्ड टेक्सचर’ श्रृंखला के सुरेन्द्र सिंह के चित्र लोक राग लिए प्रकृति घुले रंगों से अपनापा कराते हैं। इसीलिए मन को मोहते हैं।  कैनवस पर सधे-संयोजित रंग देख मन में काव्य की पंक्तियां हिलोरे ले रही है। स्मृतियों और अनुभूतियों के दृष्यालेखों में ऐसे ही होता होगा-उत्सवधर्मिता का गान। 

Friday, March 14, 2014

गळियां में आवै गौरा झूमती

जब-जब होली का त्योंहार नजदीक आता है, मन अवर्णनीय उमंग, उल्लास से भर उठता है। यह उमंग होली के रंग खेलने से कहीं अधिक उन 15 दिनों को जीने की होती है, जिसमें आस-पड़ौस कभी गवर पूजे जाने के दिनों की याद जुड़ी हुई है। इधर होलीका दहन हुआ, उधर गवर पूजन शुरू। सामुहिक स्वर माधुर्य, ‘पातळिया ईसर, गळियां में आवै गौरा झूमती’ और ऐसे ही दूसरे गवर गीतों से ही भोर की आंख खुलती। संगीत स्वरों की वह सुबह इस कदर सुहानी होती कि मन चाहकर भी उसे कहां बिसरा पाया है! पर उत्सवधर्मिता के दिन पंख लगाकर उड़ जाते। पखवाड़े बाद गणगौर मेले में गवर विसर्जन के साथ ही जैसे उमंग-उत्साह के दिन बीत जाते। 
गणगौर ऐसा ही लोक पर्व है। संस्कृति की लय अंवेरता। मां से पूछता हूं, अभी भी बीकानेर में गवर पूजते लड़कियां 15 दिन सुबह उठकर वैसे ही सामुहिक गीत गाती है? मां का जवाब हां भी होता है और ना भी। भाव यह है कि गणगौर पर्व पखवाड़ा होता तो अभी भी है परन्तु उसमें वह उमंग, उत्साह और लड़कियों के गान के दिन अब नहीं रहे। 
बहरहाल, गणगौर में दो शब्द है। गण और गौर। ‘गण’ माने शिव और ‘गौर’ यानी पार्वती। कन्याएं शिव समान अच्छे वर के लिए गवर पूजती है। पर इस पूजन भाव में भक्ति वाला गांभीर्य नहीं है, यहां सखी-भाव प्रधान हैै और पूजने की बजाय ‘खेलने’ पर अधिक जोर है। मौहल्ले-गली की लड़कियांे एकत्र होकर सामुहिक रूप में गवर पूजने के बहाने जैसे आपस में घुल-मिल खेलती है। याद पड़ता है, होली के बाद जब सोते तो आंख घर के पास से आते सामुहिक गीतों के मधुर स्वरों से ही खुलती थी। पता चल जाता, बहन पहले ही उठ गणगौर पूजने चली गई है। पूरे पखवाड़े तक सुबह गवर गीतों से ही सुहानी होती। सामुहिक सोल्लास भोर भर ही नहीं बल्कि पूरे 15 दिन तक अनुभूत होता। महिलाएं-कन्याएं गीत गाती हुई दूब लाने जाती और गणगौर का श्रृंगार करती। होली की राख के पींडे बनाए जाते और उन्हें पूजन के बहाने सजाय संवारा जाता। लड़कियां गीत गाती जाती और गान के साथ-साथ ही गुलाल के विभिन्न रंगों के मांडणे धरा पर मांडती। 
बीकानेर पाटों का शहर है सो गली-मौहल्ले में पाटों पर ‘ईसर-गणगौर’ की लकड़ी की गहनों, कपड़ों से सजी सुन्दर प्रतिमाएं सजती। रंग-बिरंगे वस्त्र, गहने, साज-श्रृंगार से सजी एक से बढकर एक सुन्दर गवरें। पूरे 15 दिन बहने गवर पूजती और उनके साथ हम भी जैसे उनके उमंग और उत्साह के साथी होते। कहें तब मन में अवर्णनीय उत्साह, उमंग गवर को लेकर रहता और गणगौर मेले में यह उत्साह चरम पर पहुंच जाता परन्तु यह गवर विदा का समय होता। अलसुबह ही कुआंरी कन्याएं, महिलाएं, बूढी दादियां एकत्र हो जाती। मिट्टी के पालसिए में उगाए ज्वारे और गुलाल लिए गवर का विसर्जन करने पास के कुओं, तालाबों में मेला सा भरता।
डेली न्यूज़, 14 मार्च, 2014 
मुझे लगता है, गणगौर समुह भावना को जीवंत करता पर्व है। एक दिन नहीं पूरे 15 दिन तक के लिए। इसमें संगीत है, नृत्य है और है लोकानुरंजन। और हां, जीवन से जुड़ा अनुराग भी। जयपुर में आए एक दशक से अधिक का समय हो गया है। मित्र कहते हैं, अब तो मूल निवास प्रमाण पत्र भी चाहो तो यहां का बन सकता है। पर कोई बताये, महानगर होते जयपुर में परम्परा की वह सोंधी महक कहाँ से मिले!  सोचता हूँ, अब जबकि होली नजदीक है, गणगौर गान के सामंुहिक स्वरों से जुड़ी उन यादों का क्या करूं। कोई बताए कहां से पाऊ माधुर्य का वह राग और उससे जुड़ा अनुराग! आप ही बताईए, भौतिकता की अंधी दौड़ में क्या हम अपने से ही लगातार ऐसे ही दूर नहीं हुए जा रहे हैं! 

Friday, March 7, 2014

नीरवता में रोशनी की आहट


Photo : Anurag Sharma
छायांकन में छवि का अंकन भर ही यदि होता है तो इसमें सृजनात्मक कुछ भी नहीं है। छायांकन कला का मूलाधार छवि अंकन में निहित वह दृष्टि है जिसमें दिख  रहे दृश्य को कला की दीठ से जिया जाता है। कैमरा छाया प्रकाश संतुलन के साथ छवि का सौन्दर्यांकन कर सकता है। यथार्थ-प्रकृति रंगों को मनोनुकूल भी उसमें किया ही जा सकता है पर उससे कलाकृति नहीं सिरजी जा सकती। कैमरा यदि कलाकृति निर्मित करता है तो यह वह आंख और उससे देखना, अनुभूत करना है जिसमें दृश्य के समानान्तर संवेदनाओं का सृजन किया जाता है। 
बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में कुछ दिनों पहले अनुराग शर्मा के जयपुर केन्द्रित छाया-चित्रों का आस्वाद करते लगा, छायाचित्र वैसे नहीं थे, जैसे आमतौर पर कैमरे से लिए जाते हैं। धरती नहीं, आसमान से निहारी छवियां। साफ-सुथरी। पुराना जयपुर, नया जयपुर और तेजी से पैर पसारती महानगरीय संस्कृति। महत्वपूर्ण यह कि जो कुछ उन्होंने कैमरे से सिरजा उसमें दूरलघुदृश्यता में सौन्दर्य को ठौड़-ठौड़ जैसे अंवेरा गया है। 
छायाचित्र प्रदर्शनी में तमाम चित्रों के कोण, प्रकाश-छाया अंकन, संयोजन के साथ ही स्थापत्य में निहित बारीकी को अनुराग ने गहरे से जिया है। माने हवामहल, जलमहल, बिड़ला मंदिर, मोतीडूंगरी ही नहीं वल्र्ड ट्रेड पार्क और फ्लाईओवरों की निर्मिती के मर्म को उनके कैमरे ने गहरे से छूआ है। यह सब छायाचित्र तो खैर सौन्दर्य की सीर लिए है ही परन्तु मोतीडूंगरी के परकोटे की दिवारों, बुर्ज का जो अंकन अनुराग ने किया है, वह तो अद्भुत है। छायाचित्र आस्वाद करते लगता है, कैमरे ने पाषाण रेखाओं की लय को पकड़ते अतीत के मौन को सुनते उसे अपनी कला दृष्टि से कैमरे में से बुना है। यह है तभी तो परकोटे का लाईन वर्क और बारिश से भीग-भीग कर पत्थरों में भरी काई का भूरभूरापन मन को जैसे आंदोलित करने लगा। लगा, स्थापत्य में जो कुछ दिखता है उससे परे सधी रेखाएं भी मंडती है और प्रकृति इन रेखाओं में जो रंग घोलती है, उसे कोई कला ही संजो सकती है। सच!  कैमरे से जुड़ी कला ही यह कर सकती है।  मन में औचक खयाल आता है, छायांकन कला अतीत और उसमें घूले प्रकृति रंगों के मौन को एक तरह से रिकाॅर्ड कर फिर से हमें सुना सकती है। माने अतीत को वहां देखा ही नहीं, सुना भी जा सकता है। क्यों नहीं कला विमर्श में छायांकन कला की इस विशिष्टता पेटे ही कहीं कोई बात आगे बढ़े। 
Photo : Anurag Sharma 
बहरहाल, अनुराग की छाया-कला दृष्टि इस रूप में भी मन को लुभाती है कि वहां रात्रि में पसरे सन्नाटे के साथ ही पेड़ों पर पड़ती रोशनी की हरितिमा और दूर तक जाती काली नागिन सी सड़क का खालीपन भी हमसे संवाद करता है। अंधेरे की नीरवता में रोशनी की आहट और सड़क का दूर तक का खालीपन। चैराहों की धातु मूर्तियों की नृत्य छवियांे का मौन सौन्दर्य भी। मुझे लगता है, अनुराग शहरी स्थापत्य की भागती-दौड़ती जिन्दगी के नहीं, मौन और दूर तक पसरे खालीपन के छायाचित्र सौन्दर्य संवाहक हैं। और हां, अपने छायाचित्रों में वह आसमान से पकड़ी दृश्य की अनूठी सौन्दर्य लय तो अंवेरते  ही है साथ ही जो कुछ दिख रहा है, उसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े भावों को भी जैसे हमसे साझा करते हैं। हवामहल, मोतीडूंगरी के अतीत के साथ ही वर्तमान विकास से जुड़े दृश्य चित्रों के साथ वह बड़ी इमारतों, माॅल्स की निर्माण लय में जैसे भविष्य की आहट बुनते हैं। छायाचित्रों की उनकी सूझ में दिख रही चलचित्र के दृश्यों की मानिंद मन में हलचल करती हममें जैसे बसती है।