Saturday, September 6, 2014

दिमाग नहीं दिल की गायकी ठुमरी

ठुमरी सुरों की सुरम्य दीठ है। छोटी-छोटी सपाट तानें, पर कहन के अंदाज में मौलिकता। कहें यह ठुमरी ही है जिसमें स्वरों की अनूठी सूझ से ही कलाकार सुनने वालों को चमत्कृत करता है। मौलिकता रचते। कोई कह रहा था, ठुमरी का क्या? विशेष बोलों का बारम्बार दोहराव ती तो है यह। सही है। वहां, शब्दांे की आवृति होती है पर उसे बरतते कलाकार जीवनानुभूतियों से औचक ही साक्षात् भी कराता है। दिमाग नहीं, दिल की गायकी जो है यह! मुझे लगता है, जीवन के तमाम रसों की व्यंजना किसी गान में है तो वह ठुमरी में ही है। 
बहरहाल, अभी बहुत दिन नहीं हुए। ठुमरी की प्रख्यात गायिका, बल्कि बहुत से स्तरों पर ठुमरी को गरिमायम लोकप्रियता दिलाने वाली गिरिजा देवी जयपुर में एक कार्यक्रम मंे आयी थी। बचपन से ही उनकी ठुमरी सुनता आ रहा हूं। सरस रागों में छोटी-छोटी बंदिशों की उनकी लयदार अदायगी मन को सदा ही भाती रही है। याद है, गिरिजादेवी की स्वरचित ‘घिर आई है कारी बदरिया...’ और ‘बैरिन रे कोयलिया तोरी बोली न सुहाय...’, सुनते मन अवर्णनीय आंनद में डूब-डूब जाता। उनकी शब्द व्यंजना ऐसी है कि मन विभोर हो जाता है। बोल-बनाव और आवृत्ति में अद्भुत समय प्रवाह! लोकमानस को छूती उनकी आवाज इस कदर साफ सूथरी और स्वर-सधी, सहज कि मन सुनते औचक गुनता-गुनगुनाता भी है। पर इधर जब मंच पर उन्हें सुना तो आयोजक संस्थाओं पर तरश आया, कुछ गुस्सा भी। लगा, मूर्धन्य कलाकारों के गान को लज्जित करने के ऐसे आयोजकीय उपक्रम नहीं ही होने चाहिए। जिन गिरिजादेवी के रिकाॅर्ड देशभर के रसिक श्रोता सुनते रहे हैं, वह उन्हें इस उम्र में जब गाते सुनते हांेगे तो क्या सोचते होंगे? उम्र के 90 वें दशक में चल रही गिरिजादेवी के गान पर क्या वय का असर न दिखेगा!
यह सही है, गिरिजादेवी या ऐसे ही देश के लब्धप्रतिष्ठि गायक-गायिकाओं के प्रति आज भी श्रोताओं में अथाह उत्साह है। यह भी सही है, कलाकार की कला कालजयी होती है। पर यह भी सही है, समय का प्रवाह स्वर, नृत्य को बाधित करते उम्र की अनुभूति कराता ही है। क्या ही अच्छा हो, हम गिरिजादेवी जैसे कलाकारों को बुलाएं और मंच पर उनके पूर्ववर्ती गाए बेहतरीन के रिकाॅर्ड के साथ उनके अनुभवों को सुनें। उनकी तान के नजारों का आस्वाद करें, उन्हें आलाप करते देखें और हां, वह अपनी पंसद के अपने गाए बेहतरीन रिकाॅर्ड मंच पर हमें सुनाए और फिर अपने गान से जुड़ी विलक्षणता की हमारी शंकाओं का समाधान करें। इससे बड़ी बात और क्या होगी कि जिनने हमें सुनने के संस्कार दिए, स्वरों का माधुर्य दिया-आयोजक संस्थाएं उन्हें आम श्रोताओं से साक्षात् कराएं। 
शंकित मन कह रहा है, क्या यह अच्छा लगेगा कि गिरिजादेवी जैसे किसी मूर्धन्य कलाकार को युवा पीढ़ी सुनने आए और उम्र के असर को उनकी गायकी से जोड़ते उनके संपूर्ण गायन को खारिज करते शास्त्रीय संगीत से ही तौबा करने की सोच ले! 


Friday, August 29, 2014

लोक नृत्य के शाश्वत स्वर

लोक-संगीत माने कहन-कथन का माधुर्य। कहां से आया यह संगीत, कहां से फूटे बोल? कोई नहीं जानता। पर संवेदनाओं का अद्भुत राग है इनमंे। परम्पराओं और संस्कृति को जीवंत देखना, सुनना और गुनना आखिर लोकनृत्यों की पाण ही तो संभव है। अभी कल की ही तो बात है। रवीन्द्र रंगमंच स्वर्णजयन्ती समारोह की समापन सांझ की नूंत मिली। विलम्ब से पहुंचा पर पलक पावड़े बिछाए जैसे लोक संगीत की स्वरलहरियां स्वागत कर रही थी। घेरदार घाघरे में हो रहा था, ‘घूमर’। ताल-लय का सुछन्द! मन उसमें रमा ही था कि भवई के साथ रूपसिंह शेखावत प्रकट हुए। पाश्र्व में ध्वनित लोक स्वर ‘कुण रै खुदाया कुंआ, बाग...’, ‘उडियो रै उडियो...’, ‘पल्लो लटके’, ‘जळ भरियौ हबोळा खाय..’ के बोल नृत्य मुद्राओं से जैसे जीवंत हो उठे। 
लोकनृत्य सम्राट रूपसिंह शेखावत
छायांकन : श्याम शर्मा 
तलवार की धार, परात पर सात मटकों को सिर पर साधे वह जब थिरक रहे थे, लगा राजस्थान का नृत्य और संगीत उनमें ही रूपान्तरित हो रहा है। वह जैसे बंचा रहे थे-कर, पाद और मुख-मुद्राओं से राजस्थान की संस्कृति और सभ्यता के पाठ दर पाठ। व्यक्त में संस्कृति का बहुतेरा अव्यक्त भी रच रहे थे। मुझे यूं नृत्य में रमते देख, पास बैठे संस्कृतिकर्मी मित्र ईश्वरदत्त माथुर ने धीरे से कान में कहा, ‘यह तो इनकी कला का चैथाई ही है।’ अचरज! चैथाई ही यह है तो सर्वांग कैसा होगा? 
सोचता हूं, संगीत, नृत्य के घरानों की तरह लोकनृत्यों में वैसा कुछ नहीं है पर जो कुछ वहां संचित है, उसे यदि अपने तई अंवेरते, नया उसमें कुछ जोड़ते लोक को आधुनिकता में भी जिन्दा रखने वाले कलाकार भी क्या वैसे ही सम्मान के हकदार नहीं है! कोई, उनकी पहचान भी तो करे। आखिर तमाम हमारा नृत्य-संगीत लोक से ही तो है। विडम्बना ही है, रूपसिंह शेखावत जैसे लोक कलाकारों की कूंत हम नहीं कर रहे। 
हां, रवीन्द्र मंच लोक रंजन से जुड़ी ऐसी प्रस्तुतियों का आरंभ से ही साक्षी रहा है। सुखद है, स्वर्णजयन्ती पर रवीन्द्रमंच सोसायटी, सांस्कृतिक संस्थाओं और संस्कृतिकर्मियों की सहभागिता से वर्षपर्यन्त संगीत, नृत्य, नाट्य के आयोजन हुए। बहुधा ऐसे आयोजनों में प्रशासकीय भूमिका कत्र्तव्य निर्वहन के दायरे में ही दिखती है पर आयोजनों में प्रबंधक नीतू राजेश्वर ने जिस रूचि से बारम्बार नूंत दी, कलाकारों के संग कलाकार होते जो सहभागिता निभाई वह सांस्कृतिक आयोजनों के लिए सुखद संकेत तो है ही।
घूमर
छायांकन : श्याम शर्मा 
बहरहाल, लोक चिर-पुरातन है, पर चिर नूतन भी। शाश्वत जो हैं इसके स्वर! नृत्य कला में रमते, उसमें बसते मन नृत्य सम्राट उदयशंकर की नृत्य मुद्राओं को याद कर रहा था। लगा, जिस तरह से उन्होंने नृत्य की शास्त्रीयता को अपने तई गुंजरित किया, ठीक वैसे ही तो रूपसिंह शेखावत राजस्थान की लोक संस्कृति को अपनी नृत्य मुद्राओं से ध्वनित और जीवंत करते हैं। राजस्थानी लोकनृत्य सम्राट ही तो हैं वह! उम्र के सत्तर दशक बाद भी जिस चपलता से वह नृत्य करते हैं, लगता है लोक थिरकन ही है, उनका यह जीवन। 


Friday, August 22, 2014

प्रकृति के सौन्दर्य चितराम


कलाकृति : अन्नपूर्णा शुक्ला 

पेड़, पहाड़, पक्षी, नदी और घाटियों  से ही तो है प्रकृति का सुरम्य रूप।  कहें, यह जीवन का वह सुमधुर राग है जिसे देखा, सुना और छुआ भी जा सकता है।
सोचिए!  पक्षी चहचहाते हैं, पेड़ लहलहाते हैं,  उमड़-घुमड़ बादल बरसते हैं तभी ना ओढ़ती है-धरित्री हरियाली का आंचल।  प्रकृति के इन भांत-भांत के रंगों की पाण ही मन पाखी भरता है, सृजन की उड़ान। 
बहरहाल, आधुनिकता में गांव जब तेजी से शहर बन रहे हों। हवा-पानी में प्रदूषण का जहर घुल रहा हो, प्रकृति के सौन्दर्य को अनुभूत करने की संवेदना भी जैसे कहीं गुम हुई जा रही है। पर पिछले दिनों जवाहर कला केन्द्र में अन्नपूर्णा शुक्ला सृजित प्रकृति दृश्यावलियों से साक्षात् होते लगा, जीवन के सुमधुर राग को कला ही सांगोपांग ढंग से जीवन्त करती है। उनका कैनवस रंग-रेखाओं की लूंठी लय अंवेरता प्रकृति दृश्यावलियों का न भूलने वाला पाठ जैसे हमें बंचाता है।  हरी घास, काले-भूरे बादल, नीला आकाश, धूप में नहाते पेड़, चांद और उसकी चांदनी के साथ हवा-पानी तक को अन्नपूर्णा ने सौन्दर्य की अर्थ अभिव्यंजना में गुनते गहरे से कैनवस पर बुना है। एक चित्र में पहाड़ों के बीच बहती नदी का सौन्दर्य चितराम है। नदी केन्द्र में है पर पहाड़, पेड़, झााडि़यां और तमाम परिवेश की सूक्ष्म व्यंजना में भावों की अनूठी ओप वहां है। ऐसे ही एक में बादलों के उमड़ने-घुमड़ने को जिया गया है तो एक में पक्षी के कीट भक्षण की गूढ़ व्यंजना है। चित्र और भी है। जिनमें ठौड़-ठौड़ प्रकृति से जुड़ी समय संवेदनाओं को उकेरा गया है। पहाड़, पेड़ और नदी से जुड़े छाया-प्रकाश संबंधों की गतिशील लय वहां है। मुझे लगता है, अन्नपूर्णा रंग-रेखाओं में प्रकृति से जुड़ी सौन्दर्य संवेदना के गूढ संकेत रचती है। उनके चित्र उस रहस्यमय फंतासीलोक की सैर कराते हैं जहां प्रकृति के असीम छोर को पकड़ने का जतन है। इसीलिए कि पेड़ है तो उसका सौन्दर्य से जुड़ा कोई संदर्भ वहां है, चिडि़या है तो उसके गान में गुंजरित भाव है, नदी है तो उसके बहाव का मर्म है, पहाड़ है तो उस पर छाए कोहरे और धूप को भी गुना-बुना गया है और फूल-पत्तियां, घास, वनस्पति भी यदि है तो उनमें निहित लय की सौन्दर्य संवेदना वहां ध्वनित होती है।   
कलाकृति : अन्नपूर्णा शुक्ला 
अन्नपूर्णा शुक्ला के प्रकृति चित्रों का आस्वाद करते औचक सुमित्रानंदन पंत की बांसो के झुरमुट पर लिखी पंक्तियां जेहन में कौंधने लगी है,  ‘बांसो का झरुमुट संध्या का झुटपुट है चहक रही चिडि़या टी-वी-टी-टूट्-टूट्।’ बांस, संध्या, झरुमुट और चिडि़या के चहचहाने की इस व्यंजना में दृश्य का सघन संप्रेषण ही तो है। अन्नपूर्ण शुक्ला के चित्र यही करते हैं। मन करता है, पेड़, पहाड़, नदी और उससे जुड़े संवेदना में रमें। उनमें बसें। प्रकृति की उकेरी दृश्य गंध को अनुभूत करें। आखिर, अन्नपूर्णा शुक्ला के चित्र हमें प्रकृति के रहस्यमयी फंतासी लोक में ही तो ले जाते हैं। अनुभूति के खरेपन में सौन्दर्य संदर्भों की सर्जना कोई कलाकार आखिर ऐसे ही तो करता है!

Friday, August 8, 2014

कार्टून कला के प्राण का जाना


गागर में सागर भरती हास्य-व्यंग्य में सराबोर कोई कला है, तो वह-कार्टून कला है। संस्कृति, साहित्य और तमाम दूसरी कलाओं का स्थान भले समाचार पत्रों में निरंतर कम होता चला गया है परन्तु आज भी मुखपृष्ठ को समृद्ध करती कोई कला नजर आती है तो वह भी कार्टून कला ही है। कहें, इस समय कला ही नहीं पत्रकारिता की भी यह वह विधा हैं जिसमें रेखाएं किसी स्तर पर संपादित  नहीं होती।
बहरहाल, आर.के.लक्ष्मण के कार्टून ‘आम आदमी’ ने देश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। चेक वाला बंद गले का कोट, सिर पर सफेद बालों का एक-आध गुच्छा बचाए और नाक के ऊपर भारी सा चश्मा पहनता हैरान-परेशान ‘आम आदमी’ जीवन में कुछ इस कदर घुला-मिला नजर आता है कि चाहकर भी हम उसे बिसरा नहीं सकते।
ठीक वैसे ही जैसे प्राण कुमार शर्मा सिरजे पगड़ी पहने चाचा चैधरी को हम शायद ही कभी भुला पाएं। भारतीय काॅमिक जगत के उस पुरोधा का काल कवलित होना, जैसे एक युग की विदाई है। प्राण ने उस समय में अपने उस बेहद चतुर कार्टून चरित्र को गढ़ा था जब कम्प्यूटर का बोलबाला नहीं था।



पर यह चरित्र जब चुटकियों में समस्या का हल करता तो, काॅमिक में लिखा आता, ‘चाचा चैधरी का दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता है।’ काॅमिक का यह कहन भारतीय जीवन में मुहावरे की मानिंद रच-बस गया। और यही क्यों, उनके कार्टून चरित्र ‘चन्नी चाची’, ‘बिल्लू’, ‘पिंकी’, ‘रमन‘, ‘साबू’, ‘राका’, ‘गोबर सिंह’ भी जैसे हममें घुल मिल गए हैं। 

याद पड़ता है, स्कूल के दिनों में छुपाकर प्राण रचित चाचा चैधरी श्रृंखला की काॅमिक्स ले जाते। कक्षा मंे अध्यापक पढ़ा रहे होते और मुंह नीचे किए एक दिन में दस-दस काॅमिक्स पढ़ डालते। मन तब भी भरता कहां था! सोचता हूं कार्टून चरित्रों से लगाव तभी हुआ जो अभी तक बरकरार है।
बहरहाल, कार्टून कला भर ही नहीं है, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की जिम्मेदार समीक्षक भी हैं। कभी पंडित नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व काल में सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर ने एक कार्टून बनाया था। नेहरूजी माईक पर जनता को संबोधित कर रहे हैं, ‘हमें आगे बढ़ना है।’ लोग इधर-उधर तेजी से भाग रहे हैं। नीचे छोटा सा वाक्य है, ‘व्हेअर?’ कार्टून कला परिवेश के सच को ऐसे ही उघाड़ती है। कभी अबू अब्राहम का कार्टून संकलन ‘द बुक रिव्यू’ खरीदकर लाया था। मुखपृष्ठ ही संकलन के अंदर के पन्नों को जैसे बंया कर देता है। कुछ नहीं, अबू का चिर-परिचित चतुर कौआ वहां है। चश्मे से झांकती पैनी नजर, सभ्रांत कौआ। कार्टूनिस्ट के लिए शब्द जरूरी कहां है! उसकी रेखाएं ही इस कदर बोलती है कि दृश्य जेहन में हमेशा के लिए जैसे बस जाता है।
प्राण की सधी कार्टून रेखाएं ऐसी ही हैं। वह नहीं रहे! इस एक समाचार ने अंदर से हम जैसे बहुतों को शायद हिला दिया है। बंद आंखों में भी जैसे बहुत कुछ दिखने लगा है। चाचा चैधरी, साबू और चन्नी चाची ही नहीं विलेन चरित्र गोबर सिंह और राका भी जार जार रो रहे हैं। आखिर उन्हें जन्म देने वाला वह शख्स जो चला गया है! प्राण जा नहीं सकते। वह हममें विलीन हैं।


Sunday, August 3, 2014

शास्त्रीय रागों का दृश्य कहन

रामकुमार के रेखांकनों की एक महत्ती कला प्रदर्शनी को कोलकता में आकृति आर्ट गैलेरी के लिए प्रयाग शुक्ल क्यूरेट कर रहे हैं। निमंत्रण का उनका मेल आया तो रामकुमार की कलाओं में ही मन जैसे रम गया।...
रामकुमार शब्द कहन में ही नहीं, अपने चित्रों से भी स्मृतियों और अनुभूतियों का आकाश रचते हैं। कैनवस पर दृश्य के वह मोहक पर विरल पाठ जैसे बंचाते हैं। ऐसे दौर में जब यह तय कर पाना मुश्किल है कि कौनसी कलाकृति किस कलाकार ने सिरजी है, यह सुखद है कि रामकुमार के चित्र अभी भी अपनी शैली, रंग-रेखाओं की विशिष्ट व्यंजना में अलग से पहचान में आते हैं। कोई सालेक पहले केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के निमंत्रण पर अगरतला जाना हुआ था। राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में आई प्रविष्टियों का आस्वाद करते एक जगह रामकुमार जी की कलाकृति देख ठिठक गया। यह यहां कैसे?’ पता चला किसी ने रामकुमार जी के कार्य की काॅपी भेज दी, और मजे की बात यह कि उसे राष्ट्रीय प्रविष्टि में चयनकर्ताओं ने शुमार भी कर लिया था। मन खट्टा हो गया। रामकुमार की कलाकृतियां को कोई जूरी सदस्य कैसे भूल किसी और की मान सकता है! 

बहरहाल,  रामकुमार के रेखांकनों की एक महत्ती कला प्रदर्शनी को कोलकता में प्रयाग शुक्ल क्यूरेट कर रहे हैं। निमंत्रण का उनका मेल आया तो रामकुमार की कलाओं में ही मन जैसे रम गया। लगा, दृश्य संवेदना या फिर अंतर्मन अनुभूतियों को रंग-रेखाओं में वह इस सुघड़ता से बरतते हैं कि औचक ही किसी कहानी, घटना या फिर स्थान विशेष से जुड़ी स्मृति का कोई छोर वहां खुलता नजर आने लगता है। उनकी कलाकृतियां दृश्यालेख सरीखी ही हैं। जमीं के किसी टूकड़े में समाया किसी स्थान की विशेषता को रेखांकित करता कोई प्रतीक वहां है तो कहीं रंगो से मन में औचक किसी संवेदना का गान वहां है। चिंतन के आलोक में मन मथती कहन का विरल छन्द लिए ही तो है उनकी कलाकृतिया।

 उनके चित्रों में रंगो की उर्वर भूमि परिवेश के अनगिनत सच बंया करती है। मन करेगा, चित्र देखें और ठहर-ठहर फिर से वहां जाएं। उनके कैनवस में स्थानों की बहुलता पर भी बहुत कुछ कहा गया है पर मुझे लगता है, प्रकृति से जुड़ी संवेदना और रंगो को ही उन्होंने अपने कैनवस पर गहरे से जिया है। प्रकृति के नित नए बदलते रूपों की मानिंद रंग वहां है। कहीं कोई ठहराव नहीं। रंग-रेखाओं में मौन की भी शास्त्रीय राग सरीखी व्यंजना। कुछ दिन पहले ही मुकुन्द लाठ जी ने अपनी सद्य प्रकाशित कृति ‘संगीत और संस्कृति’ भेंट की थी। पुस्तक का आवरण रामकुमार का है। इसे देखते मन में खयाल आ रहे हैं, रेखाओं सिरजी अनुभूतियों में वह रंगो को घोलते दृश्य की अद्भूत निर्मिती ही तो करते हैं! भले उनकी कलाकृतियों में, रेखाकंनो में स्पष्ट रूप नहीं है परन्तु दृश्यों का अपनापा है। कलाकृति देखते औचक मन करेगा, कैनवस में रमें। उसमें बसे। कला का असल सच यही तो है!


Friday, July 25, 2014

छायांकन के कला रूप

छाया : महेश स्वामी 
पेड़ जीवन है। पत्तों की सरसराहट, कोयल की कूक से जुड़ी संवेदनाओं का गान पेड़ों से ही तो है। और फिर यह तो श्रावण मास है। बरखा बूंदों से नहाई धरा की गंध का आस्वाद करते मन करता है, इसे गुने। कला के किसी रूप में इसे बुनें। मेघाच्छादित आकाश मेें श्रावण में ही तो मन पेड़ों का गान करता उनमें बसता है। 
यह लिख रहा हूं और मन पेड़ों की सिरजी छाया-छवियों में जा रहा है। पेड़ों के भांत भांत के रूप मन को स्पन्दित करने लगे हैं। छायाकार महेश स्वामी ने इस दीठ से अनुपम छायाछवियां सिरजी हैं। पेड़ों की छवियों में दृष्य संवेदनाओं के मर्म को उसने इधर अपने छायांकन में गहरे से जिया है। भिन्न आयामों में छायांकन में पेड़ और उससे जुड़ी दृष्य संवेदना के एकाधिक छायाचित्र पहली बार जब महेष ने दिखाए तो, मन हुआ एक साथ इस श्रृंखला के चित्रों का आस्वाद करूं। महेश ने इसे सहज शुलभ कर दिया। छवियों का आस्वाद करते, औचक ही श्रृंखला का नाम ‘रूंख’ सूझ गया। छायाचित्रों में वृक्ष केन्द्र में है परन्तु वहां सूर्य है, उसका उजास है और परछाई में घूले पेड़ों के झिलमिलाते रंगों की आभा भी है। पेड़ और उसकी टहनियांे, झाडि़यों से झांकती प्रकाश  किरणें और हरियाली में घूली दूसरे रंगों की अनंत छवियां! छाया-प्रकाश  की सौन्दर्य दीठ है रूंख श्रृंखला के छायाचित्र। 
छाया : महेश स्वामी 
बहरहाल, एक छायाचित्र है जिसमें कोहरे घूले दिन में पेड़ का बचा हरापन अंधेरे, धूंध को परे करता जीवन का जैसे संदेश  दे रहा है। सघन टैक्सचर में अगेन्स्ट लाईट के साथ धीरे से उदित होते सूर्य की सुनहरी धूप! कींकर की छांव से सिरजा सघन परिवेश!  ऐसे ही एक छायाचित्र में उगते सूर्य की सुनहरी धूप के अंश  से दीप्त टहनी और पत्तियां मोहक दृश्य  रच रही है।...और वह दृश्य  तो विरल है जिसमें पानी में (मिट्टी के पालषिए में) आसमान, पेड़ और बादल झांक रहे हैं। यह अक्श  का सौन्दर्य है। बिम्ब में प्रतिबिम्ब! छायाचित्रों में रूंख का यही तो है श्रावण में लुभाता दृश्य  लोक। दृश्य   में रूंख के रूपायित बिम्ब दर बिम्ब ऐसे ही हैं। टैक्सचर बना रूंख और प्रकाश  के विपरीत से उपजा अंधेरा पेड़ की झाड़ को और मथता सौन्दर्य के अविराम पाठ जैसे हमसे बंचाता है। छायाकला देखने की कला सूझ को व्यंजित करती है।
श्रावण भी तो मन की व्यंजना ही है।  दूसरी ऋतुओं में पानी बरसे तो मन न हर्षे पर श्रावण न बरसे तो मन तरसे। लहराते पेड़ों की हरियाली इसी मास में भाती है। आनन्द कुमार स्वामी ने कला को रूपान्तरण की संज्ञा दी है। क्यों? क्योंकि वहां नकल नहीं होती। पुर्नसर्जन होता है।  महेश  ने रूंख श्रृंखला के अपने छायाचित्रांे में यही किया है। यही है छायांकन का कला रूपान्तरण

Friday, July 18, 2014

रेखाओं में सौंदर्य सर्जना

चित्रकला का आधार रेखांकन है। रेखाओं के जरिए दृश्य का सहज, सरल कहन। इस दीठ से हेब्बार की रेखाओं पर जब भी जाता हूं, पाता हूं चंद रेखाओं, गति का सुरमय व्यंजन वहां है। इधर नाथूलाल वर्मा के रेखांकनों में भी सांगीतिक आस्वाद में रेखाओं की गति को विरल रूप मंे अनुभूत किया है। उनके रेखांकनों से साक्षात् होते लगेगा, रेखाओं में वह अनूठी सौंदर्य सर्जना करते हैं। मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, जगहों और वहां के परिवेश, लोकाख्यानों और प्रकृति के अनगिनत रेखांकनों में वर्मा ने स्मृतियों को बुनते उन्हें अपने तईं गहरी सूझ से अंवेरा है। माने एलोरा की गुहा मूर्तियों का अंकन भी है तो उसमें मूल रूप से छेड़छाड़ नहीं करते हुए भी रेखाओं से उन्हें जैसे फिर से जिया गया है। एक रेखांकन में नायिका, चिडि़या और आंख की विरल व्यंजना है। रेखांकन नहीं रूपक। आप चंदेक रेखाओं में पूरी की पूरी कहानी जैसे बांच सकते हैं। और यही क्यों, शिव मूर्तियों का अंकन भी अनूठा है। रेखांकन में शिव के नृत्य को निहारते आप गति का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे ही लोक परिवेश, शांति निकेतन के संथाल जीवन और तमाम दूसरी प्रकृति अनुभूतियों की जो लय रेखाओं में उन्हेांने रची है, वह अंतर्मन संवेदनाओं को जैसे आलोकित करती है।
रेखांकन : नाथुलाल वर्मा 
मुझे लगता है, नाथूलाल वर्मा के रेखांकन परिवेश का  रेखीय संतुलन लिए है। वह अपने रेखांकनों में रूप के प्रत्येक अवयव को घोलते गति का अनूठा संतुलन रचते हैं। इस संतुलन से ही असल में रूप का वह पोषण करते हैं। उनकी स्केच बुक के रेखांकनों के विविध आयाामें में से एक एलोरा के शिव तांडव का है। रेखाओं की विरल दीठ। मगन हो शिव नृत्य कर रहे हैं। हल्की पर गत्यात्मक रेखाओं में ताण्डव का समग्र परिवेश। वह रेखाओं से नृत्य का तेजोमय रूप प्रकट करते हैं। पार्श्व से आते प्रकाश को रेखा दर रेखा से जीवंत करते उन्होंने तिमिर हरती रोशनी का अद्भुत रूप रचा है। छाया-प्रकाश की सर्जना। यह है तभी तो तांडव का उनका उकेरा रेखीय परिवेश मन में घर करता है। ऐसे ही त्रिपुरातंक, बिजोलिया, भोजपुर की शिव प्रतिमा के रेखांकन है। मुझे लगता है, प्रतिमा का रेखीय अंकन उन्होंने  किया है तो मूर्ति की स्थिति के साथ भावों की गति को भी वहां गहरे से छूआ गया है।  नाथूलाल वर्मा के रेखांकनो में गत्यात्मक प्रवाह है। सांगीतिक आस्वाद देता। हिमाचल के प्रकृति दृश्य, शांति निकेतन में संथालों के जीवन से जुड़े चितराम और स्थानों, पशु-पक्षियों के अंकन की उनकी बड़ी विशेषता यही तो है कि उनमें रेखाओं का लयात्मक संयोजन है। लय का मतलब ही है, समाना। एक का दूसरे में। लय गति है, स्थिति नहीं। इसीलिए कहूं, नाथूलालजी की रेखाएं एक दूसरे में समाती गति की संवाहक ही तो है! 

Sunday, July 13, 2014

संगीत इतिहास का शिल्प संधान


कलाकृति : नवल सिंह चौहान 
मन को रंजित करती अवर्णनीय आनंद की अनुभूति कराने वाली कलाएं हैं-संगीत, नृत्य और नाट्य। इनके आस्वादक तो हम होते हैं परन्तु बैठकर इन पर चिन्तन की परम्परा हमारे यहां कम ही रही है। इससे बड़ा इसका उदाहरण क्या होगा कि संगीत के इतिहास की उलझन ही अभी तक सुलझी नहीं है। 
संगीत में रागों का इतिहास वेदों से जुड़ा मान लिया गया है। पर क्या यह सच है? हकीकत यह है कि वेदों के समय राग-संगीत था ही नहीं। वह बहुत पीछे आया। साम तो मंत्र था-स्वर-रूप-श्रुति। जबकि राग का मर्म ही आलाप है। कुछ दिन पहले संगीत, नृत्त और नाट्य के देश  मर्मज्ञ मुकुन्द लाठ की पुस्तक ‘संगीत और संस्कृति’ पढ़ रहा था। लगा, कलाओं से जुड़े बहुत से पढ़े और गुने पूर्वाग्रहों से मुक्त हो रहा हूं। मुकुन्दजी का संगीत चिन्तन इतिहास के संदर्भों के साथ शब्द व्यावहारिकी की मौलिकता लिए है। वह बताते हैं, ‘साम और राग की रूप कल्पना में मूलगत भेद है। साम बंधा हुआ रूप था, राग की तरह खुला नहीं। राग का मर्म ही आलाप है। राग सनातन है और सनातन का इतिहास क्या?’ इसीलिए वह राग को संभावना मात्र बताते उससे जुड़ी हमारी बहुतेरी भ्रांतियों का निवारण भी करते हैं।
बहरहाल, हमारे यहां संगीत का इतिहास नहीं है। पश्चिम में संगीत इतिहास इसलिए है कि वह रचना के आधार पर है। विगत की कृतियों की स्वर-लिपि वहां जो उपलब्ध है। स्वर-लिपि हमारे यहां भी मिलती है पर हमारे संगीत का रचना प्रकार ही ऐसा है कि उसके नियत रूपों को स्वर-लिपि में सहेजा नहीं जा सकता। मुझे लगता है संगीत के इतिहास के व्यवस्थित रूप पर किसी ने मौलिकता से विचारा है तो वह मुकुन्द लाठ ही हैं। संगीत की उनकी सूझ विस्मयकारी है। देश के वह पहले ऐसे संगीत मर्मज्ञ हैं जिन्होंने संगीत से जुड़ी हमारी परम्पराओं को गहरे से खंगालते उसके रूप पर मौलिक चिन्तन हमें दिया है। पर हमारे यहां की बड़ी विडम्बना यह भी है कि संगीत, नृत्त, नाट्य पर हिन्दी में मौलिक चिन्तन की पुस्तकें न के बराबर हैं। ‘संगीत और संस्कृति’ इस दीठ से अनूठी है। इसमें मुकुन्दजी की यह स्थापना मन को गहरे से मथती है, ‘संगीत और नृत्य के इतिहास में किसी गहराई से उतरे बिना हमारा कला के इतिहास का बोध ही नहीं हमारा संस्कृति-बोध भी अधूरा रहेगा।’ वह संगीत के इतिहास को आलाप का इतिहास बताते हैं। तानपुरे के इतिहास में हमें ले जाते हैं तो शिल्प के जरिए संगीत के इतिहास के संधान की राह भी दिखाते हैं। 
यह जब लिख रहा हूं, उनके चिन्तन में जैसे रम रहा हूं। संस्कृति से जुड़े संस्थानों को चाहिए, धु्रपद, ख्याल, ताल के साथ ही नृत्त और नाट्य की उनकी मौलिक दीठ को अवंेरने का कोई प्रभावी जतन करें। 

Friday, July 4, 2014

रेत का हेत


कलाकृति : सुदर्शन पटनायक 
कलाओं का आधार रस है। चेतना का मूल यह रस ही तो है! तमाम कलाएं इसे ही अपने तई उद्घाटित करती हैं। ओडिसा के सुदर्शन पटनायक रेत से कला की विरल रसानुभूति कराते है। समुद्र तट की रेत से संवेदनाओं का आकाश रचते वह जैसे रेत का हेत बंचाते हैं।

बहुत समय नहीं हुआ, अटलांटिक में विश्व रेत कलाकृति प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। सुदर्शन पटनायक की ताजमहल से संबद्ध कलाकृति को इसमें सर्वश्रेष्ठ कलाकृति का सम्मान मिला। इन दिनों विश्व मीडिया में उनकी वह कलाकृति ही छाई हुई है। अमेरीकी सहयोगी कलाकार मैथ्यू डीबर्थास के साथ 10 टन रेत से इसे उन्होंने सृजित किया। मूलाधार में दिल के आकार के आवरण में शाहजहां और मुमताज और इस संरचना पर कैमरे की रूपाकृति और छायांकन लैंस से झांकता ताज! रूप की विरल दीठ। रेत से भावों की इस व्यंजना में इतिहास की निधि अंवेरती छायांकन कला के सरोकार हैं तो वह कला दृष्टि भी है जिसमें यथार्थ से बगैर किसी प्रकार की छेड़छाड़ किए दृश्य सौन्दर्य का सर्वथा मौलिक भव रचा जाता है। सुदर्शन की रेत कला की यही विशेषता है। 

पुरी के समुद्र तट पर सुदर्शन कलाकृति सिरजते 
बालू से कलाकृतियां सिरजने वाले सुदर्शन पटनायक इस विधा के देश के पहले कलाकार हैं। मूर्ति के लिए बालू की अस्थाई सरंचना आसान नहीं है। अपने रचे सौन्दर्य की क्षणभंगुरता को जानते हुए भी उन्होंने इसमें अपने को साधा। इसमें रचे और बसे। छायांकन कला की पाण उनकी कलाकृतियां से साझा होते अनुभूत होता है, रेत में जीवनानुभूतियों की व्यापक व्यंजना है उनकी कला। उनके  कलात्मक सौन्दर्य का स्वरूप और उसका सच यही है। दुर्गा का मोहक रूप, गणेश, जगन्नाथ और भी देवी-देवताओं को पुरी के समुद्र तट पर रचते उन्हें बहुतों ने देखा है। पर इधर उनके रूपांकन में प्रकृति के साथ पर्यावरण से जुड़े मुद्दे भी जुड़ गए हैं। 

बहरहाल, सुदर्शन पटनायक रेत रमे कलाकार हैं। पुरी में जन्में। समन्दर ने ही उन्हें रचने की प्रेरणा दी। वह बताते हैं, ‘सात वर्ष का था, तभी अलसुबह उठ समुद्र तट पहुंच जाता। देखता, समन्दर की लहरें आती, बालू बहाकर ले जाती और रेत अपने रूप पल-पल बदलती। मुझे मिट्टी रूप गढ़ने बुला रही है।’ बस फिर क्या था! समुद्र तट उनका कैनवस बन गया, उंगलियां ब्रश। अभी कुछ दिन पहले ही फ्रंास के कान फिल्म फेस्टिवल में सत्यजीत रे की रेत मूरत सिरजी। रे और साथ में मूवी रोल। अंतर्मन संवेदनाओं से एक कलाकार का दूसरी कला के कलाकार को नमन! सुदर्शन ऐसा ही करते हैं, जब कभी कहीं कोई घटना होती है या फिर उनका मन किसी प्रसंग, संदर्भ के लिए व्याकुल होता है-समुद्र तट पर उनकी उंगलियां हरकत करती रेत को गुनती है, इसी में फिर वह अपने को या कहें कलाकृतियों को बुनते है। 

Friday, June 27, 2014

प्रकृति बिम्बों का स्मृति राग


प्रेम सिंह चारण की कलाकृति 
कला देखे या सीखे की नकल भर नहीं होती। कलाकार जो कुछ देखता है, अनुभूत करता है उसे कला में अपने तई मौलिक दीठ से अंवेरता है। इसीलिए कहें, कला पुनर्सजन है। रूपान्तरण। कैनवस पर स्वानुभूति को रूपायित करते कलाकार दृश्य को अदृश्य, अदृश्य को दृश्य में रूपान्तरित ही तो करता है! इसीलिए कहें, कला स्व का विस्तार है। कला का सच है, ‘क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः।’ माने क्षण क्षण में जो नूतन जान पड़े, वही रमणीय है। कोई कलाकृति आप देखते हैं। मन करता है, फिर से देखें। कोई एक दृश्य उसका औचक याद आता है। यही नूतनता है। कलाकृति की श्रेष्ठता का पैमाना भी। 
अभी बहुत दिन नहीं हुए, कैलिफोर्निया में विश्व के 13 प्रकृति चित्र चितेरों की कला प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। भारतीय चितेरों में वहां जयपुर के प्रेमसिंह चारण के चित्र भी थे। उसके चित्र देखे पहले भी हैं परन्तु इस बार जब फिर से देखा तो उनमें व्याप्त नूतनता ने मन को गहरे से मथा भी। लगा अंतर्जगत अमूर्त में प्रकृति से वह गहरे से अपनापा कराता है।  स्मृतियों का अनूठा लोक जो वहां लहराता है! तमाम उसके चित्रों के केन्द्र का रंग नीला है। नीला आकाश, समुद्र और निलेपन में बसा धरती का हरापन। रेखाओं के गत्यात्मक प्रवाह में वह स्थानों की भौगोलिकता को प्रकृति से जुड़े बिम्बों में अनूठी सौन्दर्य लय देता है। कलाकृतियों में रंग है तो वह पोते हुए नहीं उड़ेले हुए से। 

प्रेम सिंह चारण की कलाकृति 
स्मृतियों के भव में कहीं शहर है तो कहीं छवियों के अपनापे में रंग-रेखाओं की सांगीतिक लय। तमाम उसके चित्रों में वृहद विषयों को प्राकृतिक संरचनाआंे में रूपान्तरित करते थोड़े में जैसे बहुत कुछ ध्वनित किया गया है। यही उसके चित्रों सौन्दर्य की सीर है। क्षण-क्षण में रमणीय प्रतीत होती। मुझे लगता है, रेत के समन्दर का यह वासी समुद्र जल की लहरों के हेत से गहरे से जुड़ा है। इसीलिए तो आसमान की परछाई से नीली हुई लहरों का हेत उसके लगभग सभी चित्रो में ठौड़-ठौड़ बसा है। आकृतियां चित्रो में है तो स्मृतियों का राग सुनाती हुई। एक चित्र में लड़की की मुखाकृति का आभास है पर वहां चिडि़या, उड़ान और रंगो की सौरम में संवेदन मन भी जैसे ध्वनित हो रहा है। पाॅल गौगाॅं याद आते है, ‘मैं आंखे बंद  कर लेता हूं ताकि देख सकूं।’ 
बहरहाल प्रेमसिंह के चित्र रंगाच्छादन की नई दीठ लिए है। बहते हुए रंगों में वह अतीत को इनमें बुनते हैं। धवल, धूसर में समृद्ध उसका कैनवस यादों को इस फुटरापे में उकेरता है कि मन करता है, उसके चित्रों में बसे। उनमें रमें। यह लिख रहा हूं और उसका कैनवस मन को मथने लगा है। सागर की लहरों मानिंद बहते आ रहे पानी के दृश्य बिम्ब। पेड़, पहाड़, घर, सीढि़यां, उगी हुई घास और दृश्य विभाजन की कंटीली बाड़। प्रकृति बिम्बों की यह भाषा बंचाता प्रेमसिंह का कैनवस स्मृतियों का राग ही तो है!

Friday, June 20, 2014

शिव का नृत्यधाम कैलाश-मानसरोवर


यह समय कैलाश-मानसरोवर यात्रा का है। सृष्टि विधान रूप में संगीत और नृत्य के आदिदेव भगवान शिव का नृत्य स्थल। कहते हैं, पहली बार शिव का महानृत्य कैलाश पर्वत पर ही हुआ। और तब से जगत रक्षा के लिए हर सांझ इस पर्वत पर ही होता है शिव का नृत्य। 

कम प्रकाश में नृत्य की कल्पना नहीं की जा सकती फिर भी शिव ने नृत्य के लिए अंधेरे की ओर गमन करती संध्या को ही चुना। पर अंधेरा प्रकाशित किससे होता है? शिव से ही तो! कल्पना करता हूं, कैलास पर रत्नजडि़त सिंहासन पर जगज्जननी उमा विराज रही है। वाग्देवी की वीणा झंकृत हो उठी है। और लो, इंद्र ने मुरली भी बजा दी। विष्णु मृदंग और ब्रह्मा करतल से दे रहे हैं ताल। भगवती रमा गा रही है। चन्द्रमा धारण किए डमरू बजाते शिव का नृत्य प्रारंभ हो गया। चहुं ओर भ्रमण करते तारों के साथ घूमने लगा आकाश।  यही तो है, शिव का तेजोमय कला रूप! तो बताईए, उनके नृत्य में और प्रकाश की क्या दरकार! यूं शिव रोद्र रूप है पर सांध्यनृत्य सौम्य और मनोरम। शिव ताण्डव स्त्रोत में रावण की व्यंजना है, ‘धिमि-धिमि बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल घोष के क्रमानुसार जिनका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान शंकर की जय हो!’ सोचता हूं, नृत्यनाट्य के मूल स्तम्भ ही तो हैं भगवान शिव। नटराज प्रतिमाओं का बाहुल्य दक्षिण में है। शायद इसीलिए नटराज की परिकल्पना वहां से मानी जाती है। पर शिव नृत्य के इस रूप का प्रथम स्थल तो कैलाश ही है। 

कन्हैयालाल वर्मा की कलाकृति 
यह विडम्बना नहीं तो और क्या है? जिस नटराज रूप का उद्गम कैलाश से है, वह हमारे देश में नहीं परदेश में है। यह सही है, राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा। परम्पराओं और संस्कृति में तिब्बत भारत से जुड़ा रहा है। नई दिल्ली में 1947 में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर ही आया था। नेहरूजी की भयंकर भूल की परिणति अभी तक देश भोग रहा है। लोहियाजी तो कहते भी रहे, ‘तिब्बत आजाद रहता तो हम अपने कैलाश-मानसरोवर इलाके को, जो कभी हिंदुस्तान का राजकीय हिस्सा था, उसे तिब्बत की रखवाली में रख सकते थे।’ चीन ने दुनिया की छत तिब्बत को तो हड़पा ही, हमारी आस्था पर भी प्रहार करते 1962 में कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर रोक भी लगा दी। पर 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो विदेश मंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने यात्रा खोलने के लिए पहल की। यात्रा तो खुल गई पर संकटो से सदा ही घिरी भी रही। उम्मीद कर सकते हैं, नई सरकार भगवान शिव के सांध्य नृत्य स्थल कैलाश-मानसरोवर की यात्रा बाधाएं दूर कर इसे हर आम और खास के लिए सुगम करेगी। आखिर हमारी आस्था और संस्कृति की जड़ें कैलाश-मानसरोवर में ही तो है। यह यात्रा नहीं अर्न्‍तयात्रा है। शास्वत। अनवरत! 

Tuesday, June 17, 2014

कविताएं







मोक्ष पर्व

पहाड से बिछुड़
रो रहा जल,
अजस्त्र स्त्रोतों से
बहाती नीर
नदी मिल रही
सागर में।
समुद्र ही तो है
बहते पानी के
बंधन का-
मोक्ष पर्व!

ममेतर
तुम थे,
तो था
मैं,
और-
मेरा यह ममेतर!

भोर की नींद

उंघता सन्नाटा
बुन रहा-
उनके होने की ठौड़।
चुपचाप
बर्तन में उड़ेलकर दूध
चला गया दूधिया
कराते हुए
उनके न होने का अहसास।
पिता होते तो
रोबदार आवाज
करती नींद में खलल।
भले सामने कुछ नहीं कह पाते
पर
मन में पलता जल्दी उठा देने का रोश।
अब जबकि-
नहीं है पिता
लापता है,

भोर की वह नींद।

Friday, June 13, 2014

कला मर्मज्ञ केशव मलिक का यह बिछोह


डेली न्यूज़ , 13 जून 2014  
कलाएं मन को रंजित करती है। पर कलाकृति के विश्लेषण का आधार मन का रंजित होना ही नहीं है। विश्लेषण में यह देखना भी होता है कि उसके यथार्थ के निहितार्थ क्या हैं? यह भी कि प्रामाणिकता के साथ उसके समय संदर्भ क्या है और यह भी कि कलाकार के आत्मगत तरीके के सौन्दर्य प्रतिमान वहां किस तरह के हैं। कहें, यह कला समीक्षक ही है जो दिख रहे के परे के संसार को भी अपनी दीठ देता है। अपने तई कलाकृति में रमता है-बसता है और फिर उसकी वस्तुपरकता में अपने को व्यंजित करता है। शायद इसीलिए समीक्षा को रचना के समानान्तर और बहुत से स्तरों पर तो रचना से भी बड़ा माना गया है। पर मुझे लगता है, भारतीय परिप्रेक्ष्य में कलाकृतियों के मूल्यांकन का रिवाज सही ढंग से अभी हमारे यहां बना ही नहीं है। समीक्षा के विश्लेषण मानदंड पश्चिम प्रेरित जो हैं! 

केशव मलिक ( 1924 -2014 )
भारतीय दीठ से कला समीक्षा के नए मानदंड स्थापित करने वालों में से एक कला मर्मज्ञ केशव मलिक बुधवार को काल कवलित हो गए। दिल्ली से लेखक मित्रों ने दूरभाष पर यह जानकारी दी। लगा, कोई अपना चला गया। आखिर हूं तो उनकी बिरादरी का ही!  गुरूवार को अखबार टटोले। सोचा, जिसने सदा ही दूसरों पर लिखा, कुछ उन पर भी लिखा मिलेगा पर निराशा ही हुई। हिन्दी अखबारों में उनके नहीं होने का समाचार ही नहीं था। समय का यही सच है। यहां हाजिर की हांती है। आप जब तक परिदृश्य में है, तभी तक खैर-खबर की कुछ गुंजाईश है!

केशव मलिक कलाकार की आत्मवृद्धि के जबरदस्त हिमायती थे। कलाकार कैसे कलाकृति में अपने को संबोधित करता है, इसके लिए कौनसे मानदंड अपनाता है और भीतर का उसका सौन्दर्यबोध क्या है? इनको अंवेरते हुए ही उन्होंने सदा कला समीक्षाएं लिखी। बाजार की अंधी प्रतिस्पद्र्धा को लेकर जब-तब वह अपने लिखे में मुखर भी रहे। याद पड़ता है, कभी बीकानेर के किले और हवेलियों में चित्रित कलाकृतियों पर उन्होंने सधा हुआ लिखा था। और, यह उनके लिखे की विशेषता ही थी कि उसमें कला का सौन्दर्यशास्त्रीय पक्ष ही नहीं बल्कि काल विशेष के जीवन यथार्थ पहलुओं का भी सांगोपांग विवेचन मिलेगा।

बहरहाल, कवि, कला समीक्षक केशव मलिक 5 नवम्बर 1924 को पंजाब के मियानी गांव में (अब पाकिस्तान) जन्में। कला विदूषी कपिला वात्स्यायन उनकी बहन है। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री और ललित कला अकादेमी ने अकादमी का आजीवन फैलो मनोनीत किया था। संगीता गुप्ता ने उन पर एक फिल्म ‘केशव मलिक: द ट्रूथ आॅफ आर्ट’ भी बनायी। पर कलाकारों पर हजारों पन्ने लिखने वाली उस सख्शियत की कूंत यह है कि कलाकारों ने उनके जाने पर कोई नोटिस ही नहीं लिया। कवि नंद चतुर्वेदी का लिखा याद आ रहा है, ‘यह समय मामूली नहीं।’ 

Friday, June 6, 2014

अनुभूतियों का सौन्दर्यान्वेषण


अंजनी रेड्डी की कलाकृति 
चित्रकला मन की भाषा है। संवेदनाओं से रचा आकाश! अनुभूतियों के गान में वहां स्मृतियां झिलमिलाती है। राजा वर्मा ने पौराणिक, ऐतिहासिक चरित्रों को कभी मन की आंख से अनुभूत किया था। शिव, पार्वती, राम, कृष्ण और दूसरे देवी-देवताओं को जैसा उन्होंने दिखलाया, वही बाद में हमारा सच बन गया। उनसे इतर यदि कहीं कुछ बनता है तो मन विश्वास नहीं करता। तो क्या यह मानें, रवि वर्मा ने देवी-देवताओं को साक्षात् देखा था!
बहरहाल, कलाकार सर्जक है। वह छवियों का संसार ही तो रचता है। यह जब लिख रहा हूं, देश की ख्यातनाम कलाकार अंजनी रेड्डी के चित्र ज़हन में कौंध रहे हैं। नारी संसार का जिस संवेदना से उन्होंने अंकन किया है, वह इधर दुर्लभ प्रायः है। स्मृतियों का भव रचते वह कैनवस पर नारी जीवन को सांगोपांग रूप मंे व्यंजित करती है। वहां स्वप्न है, यथार्थ है, प्रकृति है और है सौन्दर्यनुभूतियों की अनुठी लय। गहरे हरे, काले, पीले, नीले, लाल रंगो में रेखाओं की लय में वह रंगो का छंद रचती है। एक चित्र है जिसमें महिलाएं चैसर खेल रही है, और एक है जिसमें  लड़की तन्मय होकर हारमोनियम बजा रही है। ऐसे ही कुछ और चित्र नहीं, चित्र कोलाज हैं। सौन्दर्य से जुड़ी संवेदना को इनमें वह रंग रेखाओं में जैसे चलायमान करती है। जीवंत! दिन-प्रतिदिन के जीवन के यह एक तरह से दृश्यालेख हैं। कहीं कोई औरत एकान्त में अपने में खोई है तो कहीं कोई सोई हुई भी स्वपन्न में जैसे जीवन को बुन रही है। पर मूल बात है, उनकी दृश्य लय। तमाम नारी पात्रों के चेहरे ऐसे हैं, जैसे हमारे आस-पास से ही चेहरे लिए हुए हैं। ऐसे जिनमें अपनापे की मिठास है। 
रेखाओं में कोमलता के साथ ही गत्यात्मकता का प्रवाह है। रंग जैसे रेखाओं में गहरे से घुले हुए स्मृतियों का राग रच रहे हैं। इसीलिए अंजनीजी के तमाम चित्र भाव भंगिमाओ और दृश्य रूपों का एक तरह से सौन्दर्यान्वेषण है। खास बात यह कि वहां भारतीय लघु चित्रकला है, लोक और आदिवासी कला की छोंक है तो राजस्थानी परिवेश का अपनापा भी है। राजा रवि वर्मा की मानिंद आकृतियों का सुगठित संयोजन वहां है। रूपकों के जरिए वह दृश्य से जुड़ा तमाम परिवेश उद्घाटित करती है। माने कोई चित्र है तो वहां जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं बल्कि उसमें निहित पर भी मन जाता है। इसीलिए कहें, चित्र नहीं रंग और रेखाओं में वहां कहानियां, वृतान्त सुने और बांचे जा सकते है। बस ठहरकर देखने भर की देर है। स्मृतियों और अनुभूतियांे की राग का आलाप सुनाई देने लगेगा। कुछ देर और ठहरेंगे तो रंग रेखाओं की लय हममें बसने लगेगी। कहें, अंजनीजी के चित्र रंग और रेखाओं में नारी जीवन का मधुर गान है।