Saturday, July 31, 2010

पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति

सभी कलाओं का मूल उद्गम लोक है। भारतीय कलाओं में लोक की अनुगूंज हर ओर, हर छोर है। लोक दृश्यों का वहां अक्षय भंडार जो है। दरअसल यह लोक ही है जो आधुनिक और पारम्परिक कलाओं में आनुष्ठानिक उद्देश्यों और चिन्तन के व्यापक अर्थ समाहित करता है।

बहरहाल, हमारी लोक संस्कृति की जड़े आज भी इतनी हरी है कि यही पूरे देश को एकता के सूत्र मंे बांधे भी रखती है। लोक कलाओं के प्रतीक, बिम्ब और संस्कारों में ही जीवन मूल्यों के हमारे आदर्श निहित हैं। लोक संस्कृति पर लेखन से जुड़ी कमलेश माथुर ने पिछले दिनों अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ जब भेजी तो उसका आस्वाद करते लगा, आधुनिक कलाओं में भी यदि लोक का दर्शन नहीं हो तो वे रूखी-रूखी सी बेस्वादी ही लगेगी। मुझे लगता है, जिन आधुनिक कलाकारो ने लोक संस्कृति की परम्पराआंे को अपने सृजन में परोटा हैं, वे ही अधिक चर्चित हुई हैं। यह सही है कि भौतिकता की भागम-भाग के इस दौर में बहुत से स्तरों पर हमारी इन कलाओं का क्षय भी हुआ है परन्तु स्थान-विशेष के संदर्भ में उनकी महक अभी भी बरकरार है।

बहरहाल, लेखिका कमलेश माथुर लोक संस्कृति के गहरे सरोकारों से जुड़ी रही हैं। लोक कलाओं और परम्पराओं पर बहुविध उनके लेखन में मिट्टी की सौंधी महक को सहज अनुभूत किया जा सकता है। ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ पुस्तक में हालंाकि बहुत सी सामग्री पहले भी आयी हुई है परन्तु ग्रामीण अंचलांे में महिलाओं द्वारा घरों में बनायी जाने वाली मिट्टी की महलनुमा कलाकृतियां विषयक ‘वील’, काष्ठ के चित्ताकर्षक चलते-फिरते देवघर ‘कावड़’, भित्ति चित्रण की ‘पड़’, पारम्परिक ‘थेवा’ आदि कलाओं के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रांे मंे बहुप्रचलित ‘घूरा पूजन’, आदिवासियों से संबद्ध ‘भगोरिया प्रणय पर्व’, ‘गवरी’, आदि की परम्पराओं पर उनके मौलिक लेखन की दीठ भी सहज लुभाती है। उनकी इस पुस्तक में लोक कलाओं के विभिन्न अनछुए पक्ष भी अनायास ही उद्घाटित हुए हैं हालांकि उनकी संक्षिप्तता खटकती भी है। ऐेसे में मन मंे कहीं यह भाव भी अनायास ही आता है कि ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों में लोक से जुड़ी परम्पराओं को सहेजते हुए उनको व्यापक अर्थों में उद्घाटित करने के व्यापक प्रयास हों तो लोक कलाओं, बेषकीमती धरोहर और उससे जुड़ी हमारी संस्कृति का सही मायने में संरक्षण हो सकता है। ‘पारम्परिक कला एवं लोक संस्कृति’ इस संदर्भ में गहरी आष जगाती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 30-07-2010

Friday, July 23, 2010

स्वर, राग और ताल का अनूठा आस्वाद

वाद्य संगीत में स्वर, राग और ताल का कहीं परिपूर्ण मेल है तो वह है बीन में। बीन माने वीणा। तार वाद्यों के सम्पूर्ण संकुल की द्योतक। अव्यवहित आकर्षण में संगीत का समग्रता में सृजन करती हुई। यह वीणा ही है जो शब्दों से परे नाद सौन्दर्य में व्यक्ति और वस्तु के बीच की विसंधि को वीलिन करती है। इसलिए कि प्रकट संगीतीय अभिव्यक्ति कंठ माध्यम की अपेक्षा वीणा अधिक प्रांजल जो है।

बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों जब अखिल भारतीय रूद्र वीणा समारोह का आयोजन हुआ तो कर्नाटक से आयी देश की पहली महिला रूद्र वीणा वादक ज्योति हेगड़े को सुनते नाद सौन्दर्य को जैसे गहरे से जिया। रूद्र वीणा वादन में वह ध्वनि में अन्र्तनिहित सौन्दर्य की जैसे बढ़त करती है। वह वीणा बजा रही थी परन्तु लग ऐसे रहा था जैसे वह गा रही है। वाद्य संगीत को कंठ संगीत की प्रतिकृति करते वह स्वरों के पूर्ण प्रलंबों और सूक्ष्म गमक में मन को भीतर तक झंकृत करती है। अपनेपन से भरते। राग मीया मल्हार का उनका रूद्र वीणा वादन सुना तो लगा स्वरों की बढ़त में जैसे वह हर बार अपने आपको ही रचती हैं। उनका यह रचना ऐसा है जिसमें संगीतीय अन्तरावधियों की समग्रता को सहज अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, यह रूद्र वीणा ही है जिसमें संगीतीय मुहावरे के साथ-साथ उसकी गति को सुनने वाला अनुभूत कर सकता है। उस पर नजर रख सकता है।

ज्योति हेगड़े ने रूद्र वीणा में अपने आपको पूर्णतः साधा है। गत में लय को क्रमशः बढ़ाते हुए रूद्र वीणा पर चलती उनकी अंगुलियां राग और ताल को एकमेक करती अनूठा रस प्रदान करती है। राग मीया मल्हार में वर्षा की गिरती टप-टप बूंदों को उसने इस करीने से रूद्र वीणा में साधा कि बंद प्रेक्षागृह में भी झमा-झम का अहसास होने लगा। रूद्र वीणा के तारों में जब वह बढ़त कर उसे क्लाइमेक्स पर ले जाती है तो उत्तेजना के विपरीत प्रशांति पर बल देती है। वादन का उनका यह संगीतीय मुहावरा ही उन्हें ओरों से जुदा करता है।

बहरहाल, प्राचीन एवं मध्यकालीन संगीत शास्त्रीय ग्रंथों में अलापिनी, घोष, चित्रा, किन्नरी, सरस्वती वीणा, त्रितंत्री, सार वीणा, नारद वीणा, विपंची और रूद्र वीणा का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है। शिव के एक नाम से व्युत्पन्न और शिव द्वारा सृजित होने के कारण रूद्र वीणा बाहर और भीतर से सौन्दर्य की प्रतीक है। इसे सुनते लगता है, वाद्य संगीत अनायास ही शब्दों से परे नाद के शुद्धतर विश्व से साक्षात् कराता है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 23-7-2010

Friday, July 16, 2010

अर्थपूर्ण स्पष्टता में भावों का सघन संचरण

चित्रकला में रंग, रेखाएं, टैक्सचर और स्थापत्य मिलकर बिंबो और रूपकों को रचते है। इस दृष्टि से युवा चित्रकार सुरेन्द्र सिंह के चित्रों का कला आकाश विशेष रूप से लुभाता है। उसके चित्रों में रूपकों की तलाश में दृष्टियों की बहुलता है। किसी एक थीम की बजाय एक साथ बहुत से विषयों को कैनवस पर निरूपित करते उसके चित्रों की बड़ी विशेषता यह है कि आकृतिमूलकता में अमूर्तन का रोचक अध्याय है। सद्य बनायी उसकी ‘प्रकृति’ श्रृंखला चित्रों को देखते मुझे लगता है, माध्यम से अधिक आशय की अर्थवत्ता में वह कला की बारीकियों में गया है।

बहरहाल, उसके चित्रों से रू-ब-रू होते यह अहसास स्पष्ट ही होता है कि वह किसी खास संकल्पना और विचार को लेकर कार्य प्रारंभ नहीं करता। जो कुछ हो रहा है, वह उसके कैनवस पर भी वैसे ही घटित होता है। हां, महत्वपूर्ण यह जरूर है कि प्रतिकात्मकता मंे कैनवस पर फूल और पत्तियों के जरिए ही वह संवाद करता है। पार्श्व में हल्के काले रंग को धूसरित करते वह औचक कहीं लाल और कहीं हरे रंगों में अनूठे बिम्बों की सर्जना करता है। एक्रेलिक, ऑयल और जल रंगो के उसके चित्रों में त्रिआयामी प्रभाव भी है। यह ऐसा है जिसमें लोक चित्रो में प्रयुक्त अलंकरण, फूल-पत्तियों की सौरभ तो है ही समकालीन बोध की विशिष्ट अर्थ छवियां भी है। खास बात यह जरूर है कि अमूर्तन होते हुए भी उसके ऐसे चित्रों मे आधुनिकता द्वारा पैदा विभ्रम नहीं है। मुझे लगता है समकालीन सरोकारों के अपने कला बोध में वह अपने चित्रों में प्रकृति और जीवन को सर्वथा नये ढंग से रूपायित करता है। यही उसके चित्रों की वह विशेषता है जो उसे अपने समकालीनों में भी सर्वथा अलग पहचान देता है।

प्रकृति के पंचभुत तत्वों में अग्नि, जल, वायु को अपने चित्रों में केन्द्र में रखते वह कला के गतिशील प्रवाह की सृष्टि भी करता है। कैनवस पर चित्रों का उसका लोक इसलिए भी लुभाता है कि उसमें स्वयंमेव प्रतिष्ठित होने का आग्रह नहीं है। मैटेलिक कलर के पार्श्व में उसके बहुतेरे चित्रों में गहरे से हल्के होते रंगों के बीच उभरते मोर पंख, रंग बिरंगे फूूल और परम्परा बोध के तहत उकेरी गयी पत्तियां में अनुभव का अनूठा भव है। विषय वस्तु में चित्र यहां आकारनिष्ठ हुए भी यहां रूपों को नैसर्गिकता प्रदान करते हैं। ग्राफिक में मटमेले होते रंगों में सुरेन्द्र सिंह के चित्रों में अर्थपूर्ण स्पष्टता और भावों का सघन संचरण है। किसी भी कला का वैशिष्ट्य और उसकी सफलता व्यक्तिगत आनंद की यह समाजगत अनुभूति करा देना ही क्या नहीं है!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 16-07-2010

Friday, July 9, 2010

अविगत गति कछु कहति न आवै...

बारिश की बूंदे मन को गढ़ती है, कुछ रचने के लिए। आसमान से टप-टप गिरती बूंदे जैसे हमें जगाती है-कुछ करने के लिए। इस बार जब बारिश हों तो आप उसे देखें नहीं, उसे सुनें और गुनें। आपको लगेगा प्रकृति गा रही है। प्रकृति के इस मधुर गान में, लगेगा आपके भीतर का कलाकार भी गा रहा है। मन तब जो गाता है, वही अनाहत नाद है। साहित्य, संगीत और कलाओं का अग्रज यह भीतर का हमारा अनाहत नाद। अंर्तध्वनि का प्रतीक यह सधे हुए वाद्य वृन्द की भांति बजता है। यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद के रूप में बज पड़ता है। अनाहद नाद का मूल स्त्रोत हमारी अनुभूति है। प्रकृति को महसूस करने की हमारी दृष्टि है। भावात्मक होने से अव्यक्त यानी अविगत है यह। इसीलिए अनाहत नाद भी अव्यक्त है। कहा भी तो गया है, ‘अविगत गति कछु कहति न आवै।...’

संगीत के इतिहास लेखक सांबमूर्ति कहते हैं, ‘अनाहत नाद को हमे महत्व देना चाहिए। नाद से ही यह समस्त विश्व निनादित जो है।’ सच ही तो कहते हैं सांब! बारिश जब होती है तो मोर बोलते हैं। कोयल गाती है। चिड़ियाएं चहचहाती हैं। प्रकृति मौन में भी अनूठे संगीत का आस्वाद कराने लगती है। कलाकृति प्रकृति के इन गुणों से ही क्या नहीं निकलती!

इस बार की बारिश में मन के भीतर के इस नाद को सुनें। आपको लगेगा आप वह नहीं है जो हैं। आप अपने भीतर के कलाकार को पहचानने लग जाएंगे। आपको लगेगा, आप भी कुछ रच सकते हैं। संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं का जन्म आपके भीतर के कलाकार से ही तो होता है। वह प्रकृति से ही तो प्रेरणा ग्रहण करता है। इसीलिए तो हमारे यहां कहा गया है, कलाएं केवल शरण्य ही नहीं हैं। आश्रय भी हैं। जिनमें अपने आपको अभिव्यक्त करते बहा जा सकता है। तैरा जा सकता है। सच्ची कला आपको वहां ले जाती है जहां आप पहले कभी न गए हों।...भले कईं बार वह जानी-पहचानी जगह पर भी ले जाती है परन्तु तब उस स्थान को अप्रत्याशित ढंग से देखने के लिए वह आपको विचलित भी करती है। यह प्रकृति है, बारिश की बूंदे हैं जो परम्पराओं के भान में स्मृतियों का गान कराती है।

आईए, इस बार बारिश को देखें नहीं उसे सुनें भी। इस सुनने मंे जो सुकून है, उसे अनुभूत करें। प्रकृति के अनाहत नाद में बचेगा वही जो रचेगा।...तो आईए, बारिश की बूंदों को रचें। कैनवस पर उकेरे सृष्टि के इस अनुभव के भव को। प्रकृति कितना दे रही है। हम क्या उससे उतना ले रहे हैं!

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित
डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 9-7-210

Friday, July 2, 2010

कबीर का अनहत नाद, कुमार गंधर्व का गान

चौंसठ  कलाओं में सर्वश्रेष्ठ और पहली कला संगीत है। इसलिए कि यह संगीत ही है जो बगैर किसी मध्यस्थ के सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करता है। संगीत के हर अलाप में ध्वनि से भावों की व्यंजना की जाती है। कुमार गंधर्व को जब भी सुनता हूं, संगीत के इन गुणों को जीने लगता हूं। मुझे लगता है संगीत के जरिए वह मन के भीतर झांकने का अवसर देते हैं। अशोक वाजपेयी के शब्दों मे कहूं तो वह जब गाते हैं तो समय ही नहीं बल्कि समयातीत भी बोलता है। मित्र सुनीत मुखर्जी के बहाने उनकी गायी कबीर की वाणी ‘उड़ जायगा हंस अकेला...’ फिर से सुनी तो लगा संगीत श्रव्य सुख ही प्रदान नहीं करता मन की आंखों को जगाने का कार्य भी करता है। यह कुमार गंधर्व ही हैं जो श्रव्य में मनःदृश्य का ऐसा आस्वाद कराते हैं।

बहरहाल, कबीर की वाणी अनहत नाद है। अलायदा फक्कड़पन लिए वह जब कहते हैं, ‘गुरू की करनी गुरू जायेगा, चेले की करनी चेला...’ तो जीवन का मर्म गहरे से समझ आने लगता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। शब्दों का व्यर्थ आडम्बर नहीं। सीधे सपाट जो कहना है, कहा है..और कबीर के शब्दों में कुमार गंधर्व ‘ज्यों की त्यों धर दीनी...’ की तरह संगीत में उसे वैसे ही सुनने वालों के सामने रख देते हैं। शास्त्रीय गान में अमूर्तन से परे कुमार गंधर्व अनूठी वाचिकता प्रदान करते हैं। ऐसी जिसमें मन की आंखे खुल जाती है। तब असार जीवन का जो चित्र उभरता है, उसमें लगता है सारे पड़पंच व्यर्थ है। कर्म गति का गंधर्व गान अलभ्य कलात्मकता से मन के भीतर अनूठा आलोक देता है।

सच! यह कुमार गंधर्व ही हैं जिन्होंने  कबीर की रचनाओं को शास्त्रीय रागरूप प्रदान करते उसके भीतर के मर्म को इस गहराई से छुआ है। सुनने वाला उनके गान में कबीर के फक्कड़पन, दिगंबरत्व को सहज अनुभूत कर सकता है।

कबीर तो लोकोन्मुखी ही थे परन्तु उनकी वाणी का शास्त्रीय संगीत में लोकोन्मुखीकरण करने का कार्य कुमार गंधर्व ने ही किया। अलंकार रहित उनके गान में साजों पर ध्यान नहीं जाता, इसलिए कि वहां उनका गायन प्रमुख है। आरोह-अवरोह के उनके भाव महत्वपूर्ण है। वह कबीर को अपने गान में हृदय की अंतरतम गहराईयों से जीते हैं। कबीर के सीधे सपाट शब्द वहां हैं परन्तु उनके अचूक अर्थों की अनुभूति संगीत स्वतः कराता है। कबीर की वाणी का अनहत नाद ही क्या सृष्टि के संगीत का सच नहीं है!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट"
दिनांक 2-07-2010

Friday, June 25, 2010

कैनवस पर प्रकृति का गान

अदिति चक्रवर्ती के चित्रों में अमूर्तन की सर्वथा नयी व्यंजना है। प्रकृति को सम्पूर्ण फलक पर अपने तई आधुनिकता में परोटते वह रंगों और रूप के सर्वथा नये बिम्ब रचती है। उसके कैनवस पर एक दूसरे से जुड़ते-विलग होते अनेक रंगों के थक्के हैं। अमूर्तन में वह अलंकारों का अधिक रचाव नहीं करते हुए भी सूक्ष्म दृष्टि में अद्भूत लैण्डस्केप की निर्मिती करती है। यह ऐसा है जिसमें दूर तक के पहाड़, चट्टानें, नदियां, कल-कल बहता झरना, धरित्री पर दूर तक पसरी हरितिमा और पक्षियों के कलरव को साफ सुना जा सकता है।...रंगों के आलोक में वह दूरी और नैकट्य का, सन्निधि का कैनवस पर बेहद खूबसूरत संयोजन करती है।

कैनवस पर एक्रेलिक रंगों में ‘वेली आॅफ जॉय’, ‘वाईल्ड फ्लोवर’, ‘स्प्रेडिंग लाईट’ जैसे अपने चित्रोें में अदिति कैनवस प्रकृति का एक प्रकार से पुनराविष्कार करती है। उसका एक बेहद खूबसूरत सा चित्र है, ‘ग्रीन पॉयम’। पर्वतों पर उमड़ते-घुमड़ते काले, भूरे बादल, हरियाली से लदे पहाड़, उनमें बहते झरने, धरती पर कल-कल बहती नदी और पक्षियों की उड़ान और इन सबके साथ प्रकृति के संगीत को कैनवस पर यहां कुची से जैसे साधा गया है। कैनवस पर रंग उड़ेलते इस कलाकृति में सृष्टि के सौन्दर्य को इस कदर जीवन्त किया गया है कि मन करता है, निहारते रहें कलाकृति।

दरअसल, रंगों को बरतने का अदिति का अपना अंदाज है। इस अंदाज में वह कैनवस पर रंग बहाती है। इन बहते हुए रंगों में ही वह कैनवस पर माप व आकारों को विकसित करती है। उसके चित्रों पर गौर करें तो पाएंगे कि वहां प्रकृति का पूरा एक नाट्यवृत्त तैयार होता है। समृद्ध और गैर पारम्परिक रंगों के अंतर्गत वह विभिन्न रंगों का एक साथ प्रतिरोधी रूप भी तैयार करती है, ठीक वैसे ही जैसे प्रकृति पल-पल में अपना रंग और रूप बदती कभी विकराल होती है तो कभी सौन्दर्य की अद्भुत सृष्टि करती है। काले रंग में भी वह प्रकृति का रूपान्तरण बेहद खूबसूरती से करती है तो हरे, नीले, लाल, पीले रंगों का उसका प्रयोग भी सर्वथा नयापन लिए है। उसके कैनवस पर जंगल की हरियाली, बहती नदी, फूल, पत्तियां, झरनों और सूर्य की रोशनी के अद्भुत बिम्ब हैं। इन बिम्बों की खास बात है-आकारों की असीमितता, स्वच्छन्द संयोजन और विषय वस्तु की स्वतंत्रता। मूर्त-अमूर्त के बीच संघर्ष का नाद यहां है तो विषय की समग्रता में व्याप्ति भी है। हॉं, बिम्बों की पुनरावृति भी अदिति के चित्रों में है परन्तु नयेपन की व्यंजना के कारण उसकी पुनरावृति खलती नहीं है बल्कि हर बार अनूठा भावबोध देती है। मुझे लगता है, एक्रेलिक रंगों में चित्रों की उसकी अमूर्तता चित्त और चेतस् को हरने वाली है। सच! सौन्दर्य के प्रतीकों की सृष्टि में अदिती अपने चित्रों में सांगीतिक आस्वाद कराती है। मन करता है, कैनवस पर प्रकृति के उसके इस कला गान को सुनें और फिर निरंतर गुनें।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 25-6-2010

Friday, June 18, 2010

कला चिन्तन की समृद्ध परम्परा का आलोक

 हमारे यहां ललितकलाओं, उनकी परम्परा और पद्धतियों पर प्रेमचन्द, जयशंकरप्रसाद, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, विद्यानिवास मिश्र, गुलेरी, भदन्तआनंद कौसल्यायन, दिनकर, राय कृष्णदास, गुलाम मोहम्मद शेख, वासुदेवशरण अग्रवाल, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल आदि ने निरंतर लिखा है। कला के प्रतिमानों, उसके मूल्यों, उपयोगिता और कला पद्धतियों के विश्लेषण की दीठ से यह लिखा बेहद महत्वपूर्ण है परन्तु विडम्बना यह भी रही है कि अंग्रेजी और अंग्रेजीदां लोगों द्वारा निरंतर हिन्दी कला आलोचना की भाषा को दरिद्र और व्यवस्थित नहीं कहकर एक साजिश के तहत उसे हासिये पर रखा जाता रहा है। इसका बड़ा कारण शायद यह भी है कि हिन्दी में कला आलोचना कर्म का व्यवस्थित संग्रहण नहीं हुआ है।

‘समकालीन कला’ के संपादक और आलोचक ज्योतिश जोशी कहते हैं, ‘...हिन्दी और दूसरी भाषाओं में लिखने वालों ने पूरे मनोयोग से कला समीक्षा की भाषा स्थिर की, उसके मूल्यांकन के नए प्रतिमान बनाए और पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर कला समीक्षा को विकसित करने की चेष्टा की। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हिन्दी की अपनी सहज शैली में विवरण, विश्लेषण, संवाद और अध्ययन की तार्किकता के साथ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सामाने लाकर वर्तमान संदर्भ में कला परम्पराओं, पद्धतियों और उसका समेकित आशय करने वाली यह परम्परा हाशिए पर चली गई।’

जोशी ने इधर इस दृष्टि से बेहद महत्वूर्ण कार्य किया है। भारतीय कला चिन्तन के अंतर्गत हिन्दी मंे गत सौ वर्षों में लगभग पांच सौ निबंधों के पांच हजार पृष्टों में से कोई बारह सौ पृष्ठों का ‘कला विचार’, ‘कला परम्परा’ और ‘कला पद्धति’ शीर्षक से तीन खंडों में जोशी ने जो संपादन कार्य किया है, वह सर्वथा अनूठा है। इस दृष्टि से भी कि इसमें उन्होंने देशभर की साहित्य, संस्कृति अकादमियों, संस्थानों के साथ ही साथ विभिन्न नगरों मे रह रहे कलाविदों और कलाप्रेेमियों के निजी संग्रहों से भी व्यक्तिगत प्रयास कर सामग्री जुटायी है।

मुझे लगता है, भारत में कला के चिन्तन, कला परख की भाषा और उसकी परम्परा पर जोशी का यह कार्य हिन्दी में कला आलोचना का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जो लोग हिन्दी में कला आलोचना की अपनी भाषा और परम्परा नहीं होने का रोना रोते है, उनको भी जोशी का यह संपादित कार्य एक बेहतरीन जवाब है।

 "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 18-6-2010

Friday, June 11, 2010

श्रीनाथजी के चित्रों में परम्परा का पुनराविष्कार

श्रीनाथजी के चित्रों से रंग एवं रंगतों के निरूपण को नये आयाम देते डॉ. सुभाष मेहता ने परम्परा का जैसे इधर पुनराविष्कार किया है। उनके ऐसे चित्रों को देखने का पिछले दिनो जब सुयोग हुआ तो लगा, रंगों की सघनता के साथ ही रूपाकारों एवं भावनाओं की यथार्थवादी परिकल्पना में उनके चित्रों के एक-एक संघात में जैसे विशेष अर्थ छुपा हुआ है।

मुझे लगता है, श्रीनाथजी के उनके चित्रों में लयबद्ध गति के साथ लौकिक स्पन्दन है। कैनवस पर फ्रेस्को तकनीक की अनुगूंज, किसनगढ़ और दूसरी राजस्थानी चित्र शैलियों का सांगोपांग मेल और इन सबके साथ चटकिले रंगों का उन्मुक्त और स्वछन्द प्रयोग करते उन्होंने परम्परा के साथ आधुनिकता को भी जैसे निरंतर जिया है। विशेष रूप से उनके चित्रों की कैलीग्राफी में मधुराष्टकम्, यमुनाष्टकम के साथ ही वेद मंत्रों, ऋचाओं, प्राचीन लिपियों के रचनात्मक आधार में श्रीनाथजी, उनकी गायों और भक्तों का जो रूप अंकन हुआ है वह कला की दीठ से सर्वथा नया है। श्रीनाथजी का रूपांकन करते उन्होंने उनकी मुखाकृतियों को स्वीकृत परम्परागत लक्षणों एवं प्रमाणों के घेरे से भले दूर नहीं जाने दिया है परन्तु आधुनिक एवं कला की नव प्रवृत्तियों का लयबद्ध एवं स्वच्छन्द प्रयोग करते उन्होंने इनमें रचनात्मक सौन्दर्य के जो भाव संजोए हैं वे कला की आधुनिक संवेदना लिए अलग से आकृष्ट करते हैं। उन्होंने अपनी ऐसी कलाकृतियों में स्पेस को विभक्त करती रेखाएं अलग से खींची है। रस्सी सी ये रेखाएं कहीं चित्र के ठीक बीच में से गुजरती है तो कहीं ऊपर और कहीं नीचे चित्र के स्पेश को विभाजित करती छवि और उसे देखने वाले के बीच महीन भेद करती बहुत कुछ कहती है। ऐसे चित्रो को बगैर रेखा देखने की जब कल्पना करता हूं तो लगता है उनमें सहज सौन्दर्य जैसे औचक लोप हो गया है। मुझे लगता है, स्पेश विभाजन की यह रेखाएं ही हैं जो उनके चित्रों में आधुनिकता का गहरा सौन्दर्यबोध जगाती है।

श्रीनाथजी की विभिन्न झांकियों के उनके चित्रों में एक चित्र में बालकृष्ण के समक्ष सुरदास तानपुरा लिए गा रहे हैं। मंद मुस्काते बालकृष्ण उनके गान में इस कदर खो गए हैं कि मुरली वाला उनका हाथ अपने आप ही नीचे चला गया है...श्रीनाथजी के विराट का ऐसा मोहक रूप देखने वाले से जैसे संवाद करता है। मिनिएचर से प्रेरणा लेते उनके लगभग सभी ऐसे चित्र कला के उस आधुनिकबोध की ओर प्रवृत हुए हैं जिसमें रंग और रेखाएं देखने वाले की दृष्टि में कला की नयी सृष्टि करती है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमर व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 11-6-2010

Friday, June 4, 2010

कला, कलाकार और रूप


भारतीय चित्रकला की परम्परा में रूप के स्पष्टीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। मूर्त ही नहीं अमूर्त भी यदि कुछ बनाया गया है तो उसके पीछे एक सोच, एक दृष्टि और उसकी स्पष्टता जरूरी है। शायद इसीलिए हमारे यहां कलाकार अपने अनुभवों, स्मृतियों को आकार देते हुए रूप को निरंतर सरलीकृत करते रहे हैं। रेखाचित्रों में तो यह बात विशेष रूप से रही है। सहज, सरल रेखाओं की ऐसी कलाकृतियां सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की संवाहक बनती मानव मन को झकझोरती है। व्यक्ति चित्र और जो कुछ दिखायी देता है, उस यथार्थ के अंकन में भी वहां कलाकार की कला की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता स्प्ष्ट नजर आती है। अनुभव और संवेदनाओं के अमूर्तन में भी कलाकार का अपना निजत्व वहां बरकरार मिलेगा।

बहरहाल, इधर नये कलाकारों का लाईन वर्क में जरा भी रूझान नहीं दिखायी देता। लगता है, मस्तिष्क और हाथ के अनुशासन में उनकी कोई रूचि ही नहीं है। यही कारण है कि आधुनिक कलाकृतियों के नाम पर जो कुछ बन रहा है, उनमें लय नहीं है। रूप की जटिलता पर वहां ज्यादा जोर है। कुछ ऐसा बने जो समझ से परे हो। अमूर्तन के नाम पर स्पष्टता को जैसे निरंतर बिसराया जा रहा है। कैनवस पर अनुभव और संवेदनाओं के बिम्ब प्रकट में भले सूक्ष्म और अमूर्त लगे परन्तु वास्तव में इनका एक आकार और एक निश्चित स्वरूप होता है। देखने वाले को यह स्पष्ट नजर आना चाहिए। यदि इसमंे अस्पस्टता है तो फिर आकृतियों मे चाहे जैसे रंगो का सुन्दर प्रयोग कर दिया जाए, रंगों के थक्कों के अतिरिक्त देखने वाला वहां कुछ अनुभूत नहीं करेगा। अमूर्त यदि स्प्ष्ट है तो देखने वाला रंग नहीं होते हुए भी किसी कलाकृति में कलाकार के संवेदना बिम्बों के जरिए रेखाओं में रंगों की लय का सांगीतिक आस्वाद कर सकता है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ, के.के. हेब्बार की एक पुस्तक आयी थी, ‘द सिंगिंग लाईन’। अभी भी यह मस्तिष्क पर जैसे छायी हुई है। पुस्तक में हेब्बार के कम से कम रेखाओं द्वारा अधिकतम प्रभाव के ऐसे रेखांकन हैं जिनमें संगीत और नृत्य को अनुभूत किया जा सकता है। वहां रूप की जटिलता नहीं है। फार्म को सर्वथा सरलीकृत करते हेब्बार ने जो चित्र बनाए हैं, उनमें रेखाओं का अनूठा प्रवाह है, आकृतियों की सुस्पष्टता है। संवेदना, अनुभूतियां और स्मृतियों के अनेक बिम्ब वहां हैं परन्तु सब कुछ स्पष्ट है। अस्पष्ट नहीं। अमूर्तन में भी सहजता ऐसी कि हर कोई देखकर सुकून महसूस करे। कला का परम सत्य क्या यही नहीं है? जो कुछ कलाकार बनाए, उसमें अर्थ गांभीर्य तो हो परन्तु अस्पष्टता की संपे्रषणीय बाधा नहीं हो।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ.राजेश  कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 4-6-2010

Friday, May 28, 2010

कला, कलाकार और बाज़ार


हाल में हुसैन की एक कलाकृति भारतीय दामों मे करोड़ों  में बिकी है। कला बाजार में मंदी के बावजूद उनकी इस कलाकृति के इतने दामों को लेकर कलाजगत में खासी चर्चा रही। दरअसल ख्यात-विख्यात कलाकारों की कलाकृतियां लाखों-करोड़ों में बिकने का यह ऐसा दौर है जिसमें कला की बजाय कलाकार की खाति बिकने लगी है। कलादीर्घाएं इसी आधार पर कलाकृतियांे का मूल्यांकन करने लगी है कि यदि किसी बड़े कलाकार ने कलाकृति बनायी है तो वह बहुत अच्छी ही होगी...स्वाभाविक ही है उसके दाम भी बाजार में अच्छे निर्धारित होंगे। यानी कलाकार प्रमुख हो गया है, कला पीछे चली गयी है। बड़े-बड़े होटल, घराने, संस्थान भी उन्हीं कलाकृतियों को अपने यहां लगाना चाहते हैं, जो किसी विशिष्ट कलाकार ने बनायी हो, भले वह कलाकृति कैसी भी हो।

कला का यह भारतीय दृष्टिकोण कभी नहीं रहा है। हमारे यह आरंभ से ही कला महत्वपूर्ण रही है, उसे बनाने वाला नहीं। अजन्ता, एलोरा के गुफा चित्र हों या फिर विभिन्न शैलियो के अन्य लोकप्रिय चित्र, उनको बनाने वाला कौन है, कोई नहीं जानता परन्तु अनमोल कला धरोहर के रूप में इन्हें सभी जानते हैं। वैसे भी हर युग की कला में अपने समय की अनुगूंज होती है। युग के तमाम विश्वासों से, तमाम उत्सवों, संघर्षों, जीवन की तमाम आपदाओं-विपदाओं से अनेक प्रकार के संचारियों से, अनेक प्रकार के रचे मिथकों से वह जुड़ी होती है। इसी से फिर कला में नूतनता का आर्विभाव होता है परन्तु इधर जो कलाकृतियों करोड़ों, अरबों में बिकती है, उन्हें देखकर यह कहा नहीं जा सकता कि वे किस युग का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। बाजार केवल इसलिए उनका बड़ा दाम निर्धारित करता है कि उनको बनाने वाला अपने आपको चर्चित करने में माहिर हैं। आर्ट गैलरियां निंरतर खुल रही है, परन्तु वे मूलतः दुकानें हैं। कला व्यवसाय निरंतर बढ़ रहा है परन्तु अच्छी कला के बावजूद अपनी मार्केटिंग नहीं कर सकने वाले कलाकार अभी भी हासिए पर हैं। जब कभी किसी बड़े कलाकार की कलाकृति के करोड़ों में बिकने की सूचना आती हैं, वे भी आस संजोते हैं। सरकारी कला दीर्घाओं में अपने पैसे व्यय कर प्रदर्शनियों का आयोजन करते हैं, कलाकृतियों की फ्रेमिंग करवाते हैं और फिर इन्तजार करते हैं कि उनकी कलाकृति के भी लाख नहीं तो कुछ हजार तो मिल ही जाएंगे परन्तु वे बाजार की कलाकारी नहीं जानते। वहां कलाकृति मंे निहित कला बारीकियां नहीं बल्कि ब्राण्ड जो बिकता है। जितना बड़ा ब्राण्ड उतना अधिक दाम। निःसंदेह कलाकृतियां लाखों-करोड़ों मे बिकने लगी है परन्तु उनकी ही जो अपने आपको बेचना जानते हैं। आम कलाकार तो आज भी वहीं खड़ा है।...आपको नहीं लगता?
डॉ.राजेश कुमार व्यास का प्रति शुक्रवार को "डेली न्यूज़" में प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक 28-5-2010

Friday, May 21, 2010

दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते चित्र

अमित कल्ला ने सम-सामयिक कला में इधर अपनी सर्वथा नयी पहचान बनायी है। अभिनव अंतर्दृष्टि और तकनीक की सुस्पष्टता के साथ ही सौम्य, संवेदी और अबाध रेखाओं के उसके चित्रों में परिकल्पित रंग संयोजन भी अलग से ध्यान खींचता है। लगभग सभी चित्रांे में हरे, नीले, काले, पीले, लाल आदि सभी रंग हल्के, ऐंद्रिक और नियंत्रित हैं। शास्त्रीय परिवेश में आधुनिकता को परोटते अमित अपने चित्रों के प्रतीक और बिम्बों के जरिए जैसे खुद के सर्जक मन की आकांक्षाओं की तीव्रता का उद्गार करते है।

कुछ साल पहले जयपुर में ही अमित के घर पर बने स्टूडियों में कवि, आलोचक नंदकिशोर आचार्य एवं प्रयाग शुक्ल के साथ जाना हुआ था। उसकी कलाकृतियों में अंतर्निहित शक्ति, एंेद्रिकता और वस्तुपरकता ने पहले पहल तभी प्रभावित किया था। बाद में तो कला प्रदर्शनियों और अन्य संदर्भों में निरंतर उसकी कलाकृतियों से साक्षात्कार हेाता रहा है। हर बार उसके चित्रों की तात्विकता और निजता ने आकर्षित किया है। अमित के चित्रो में स्वर लहरियों का उभरता अमूर्तन भी बेहद आकर्षक है। आरोह-अवरोहण के ऐसे ही उसके एक चित्र में काले, पीले, नीले और लाल रंग से उभरते रंगीय थक्कों में आकाश और पृथ्वी की ऊर्जा के प्रतीक के रूप में उभरते ग्रह, नक्षत्र, तारे, चांद और भिन्न आकृतियो के फूलों में सर्वथा नया अर्थोन्मेष हैं। यहां सफेद पिरामिड में उभरते बिन्दु कैनवस की अनंत ऊर्जा के  जैसे संवाहक बने हैं। उनका यह चित्र ऐसा है जिसमें प्रकृति और जीवन का संगीत है। रंगों के प्रवाह में जीवन को गहरे अर्थों में व्याख्यायित करते ऐसे ही उसके दूसरे चित्रों में मोरपंख, प्रवाल भित्तियां, शंख, सीपी और आदिवासी कला की मांडनाकृतियां सरीखे बिम्ब और प्रतीक दृश्य यथार्थ का नया मुहावरा बनाते हैं।

अमित ने कभी एनर्जी चित्र श्रृंखला बनायी थी। इसमें आकृतियों की जकड़न है परन्तु तकनीकी की जटिलता नही है। गहरे नीले रंग की एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होती आकृतियों की ज्यामितीय संरचना में मौलिकता में अनूठी कल्पनाशीलता है। ऐसे उसके चित्रों की जटिल संरचनाओं में भी रेखाएं सौम्य, संवेदी और अबाध रूप में प्रवाहपूर्ण है। व्यक्तिगत मुझे लगता है, अमूर्तन में स्पष्टता लिए उसके चित्रों में अनूठी गीतात्मकता है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को एडिट पेज पर प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक २१-५-2010

Friday, May 14, 2010

अमूर्तोन्मुख आकृतियां का कला दस्तावेज

कला रूप और अंतर्वस्तु का सम्मिश्रण है। कोई कलाकृति जब हमें अपने रूप सौन्दर्य से आकृष्ट करती है तो सहज ही मन में अवर्णनीय उल्लास, उमंग की अनुभूति होती है।...कलादीर्घाओं में प्रदर्शित कुछ कलाकृतियां अन्तर्मन में बस जाती है परन्तु समय के अन्तराल के बाद कला और उससे संबंधित कलाकार हमसे दूर होते चले जाते हैं। इस दूरी को कम करने की दृष्टि से ही ललित कला अकादमियां द्वारा महत्वपूर्ण कलाकारों पर मोनोग्राफ प्रकाशित करने की परम्परा रही है। इधर इस प्रवृति में लगभग सभी स्तरों पर शिथिलता सी आ गयी है।

राज्य ललित कला अकादमी, उत्तरप्रदेश ने पिछले दिनों जब देश के चर्चित कलाकार, कला आलोचक अवधेश मिश्र लिखित मो. सलीम का मोनोग्राफ प्रेषित किया तो औचक ही अकामियों द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ परम्परा पर फिर से जैसे ध्यान गया।

समकालीन कला के देश के महत्वपूर्ण सैरां (दृश्य) चित्रकार मो. सलीम का मोनोग्राफ देखता हूं। नजर मोनोग्राफ मंे प्रकाशित उनके बनाए प्रकृति लैण्डस्केपों पर जाती है। रंगों का सुगठित संयोजन। रेखाओं की बारीकियां। पहाड़, पहाड़ी जीवन को आत्मसात करती अमूर्तोन्मुख आकृतियां। प्रकृति दृश्यावलियों के अंतर्गत बिम्बों में उन्होंने रंगों का अनूठा लोक रचा है। ऐसा, जिसमें खुद उनकी स्मृतियां जैसे झांक रही है। अवधेश ने उनके जिन चित्रों का चयन मोनोग्राफ में किया हैं, वे उनकी सात दशकों की कला यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव लगते हैं। नीले, हरे, लाल, पीले रंगों की अप्रत्याशित, स्तब्धकारी छटाएं सलीम के इन चित्रों में हर ओर, हर छोर है। जल रंगों में उनके लैण्डस्केप अवधेश मिश्र के शब्दों में अनुभवातीत रागात्मकता लिए पहाड़ी जीवन को वृहद, भव्य और सर्वथा नया अर्थ देते हैं।

मो. सलीम के रेखाचित्रों, उनके तैल, जल एवं एक्रेलिक रंगों की कलाकृतियों और समग्र कलाकर्म पर अवधेश मिश्र ने बेहद संजिदगी से लेखन किया है। वह सलीम के कलाकर्म की गहराईयों में गए हैं। रंगों की उनकी तानों और संयोजन की संवेदना को मोनोग्राफ में एक तरह से जीते अवधेश ने हिन्दी में जो लिखा है, उसका उसी गंभीरता से मोनोग्राफ में डॉ. लीना मिश्र ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। सरकारी प्रकाशनों की लीक से अलग बहुरंगी इस मोनोग्राफ का सधा हुआ ले आउट भी अलग से आकर्षित करता है। ऐसे दौर में जब कला अकादमियां में प्रकाशन की प्रवृतियां धीरे-धीरे समाप्त सी होती जा रही है, क्या यह सुखद नहीं है कि कोई अकादमी कलाकार के जीवन को उसके रचनाकर्म से यूं उजागर करे!
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक १४-५-१०

Friday, May 7, 2010

तपःपूत जीवन का सांगीतिक आस्वाद

संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र आदि समस्त कलाओं के बारे में जब भी मन में विचार आता है, मुझे लगता है सभी एक दूसरे मिली हुई है। एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चल सकता। कलाओं के आपसी रिश्तों को निश्चित किसी प्रकार की व्याख्या भले ही नहीं दी जा सकती हो परन्तु संगीत, नृत्य, अभिनय और चित्रों में परस्पर अनूठा सहकार होता है। कलाओं के अन्तर्सम्बन्धों पर इस प्रकार से जब भी विचार होता है, रवीन्द्रनाथ टैगोर का व्यक्तित्व जेहन में कौंधने लगता है। मुझे लगता है, कला और संगीत के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात करते रवीन्द्रनाथ ने जो किया वह कोई और नहीं कर सकता।

बहरहाल, रवीन्द्र ने कविताएं लिखी, नाटक और उपन्यास लिखे, हजारों हजार गानों की रचना की, चित्र बनाए और अपने तपःपूत जीवन के अनुभवों को निरंतर सांगीतिक आस्वाद दिया। किशोरी चटर्जी से सीखे गीतों को उन्होंने अपने मधुर कंठ से साधा और सबसे बड़ी बात यह कि कीर्तन, सारिगान, बाउल में तो उन्होंने जो किया, वह कला जगत कभी भुला नहीं पाएगा।

रवीन्द्र कहते थे, ‘मैं गान के सब्दों को सुर पर प्रतिष्ठित करना चाहता हूं।...मैं शब्द की अभिव्यंजना के लिए सुर संयोजित करना चाहता हूं।...संगीतवेत्ताओं से मेरा निवेदन है कि किस-किस सुर के किस प्रकार विन्यास से कौन-कौन से भाव प्रकट होते हैं और उनकी अभिव्यक्ति क्यों होती है-उसके विज्ञान का अनुसंधान करे।’ रवीन्द्र जब यह कहते हैं तो अनायास ही ध्यान उनके बनाए गीतों और उन चित्रों पर जाता है जिनमें सहज सांगीतिक आस्वाद है। बहुत बाद में उन्हांेने चित्र बनाने प्रारंभ किए थे परन्तु उन्होंने चित्रों की अपनी संवेदना में जीवन और प्रकृति के जो रूपाकार बनाए वे मन को उल्लसित करते प्रकृति और जीवन के रिष्तों को ही जैसें बंया करते हैं। उनके चित्रों की नारी आकृतियों में प्रकृति का अनूठा लोक है। रंगों का उत्सव है। कोमल रेखाएं और उनका गतिषील प्रवाह उनके चित्रों की बड़ी विषेषता है। मन के भीतर की उमंग, उल्लास और उमंग को प्रकृति से जोड़ते उन्होंने जो नारी आकृतिया बनायी वे देखने वाले से जैसे संवाद करती है।

अपने चित्रों के बारे में वे कहते भी थे, ‘मैं अपनी धुन के अनुसार ही चित्र बनाता हूं। बस हाथ में रंग या कागज हो और मन में उमंग, फिर क्या कहने हैं। मन तूलिका और रंगो से खेलने लगता है और इसी तरह मेरे चित्र बनते हैं।’ सच ही तो कहते हैं रवीन्द्र। पूर्व निश्चित कुछ सोच कर उन्होंने कभी चित्रों का निर्माण नहीं किया। अक्सर लकीरें गोदते हुए ही वे बहुत कुछ महत्वपूर्ण बना देते। ऐसा ही उनके संगीत के साथ था। वे संगीत सुनते, उसे गुनते और ऐसे ही बहुत सी संगीत रचनाओं का उनसे अनायास ही जन्म हो गया।...और यह भी क्या महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी संगीतकार के नाम पर कहीं पर भी संगीत नहीे मिलता जबकि रवीन्द्र ऐसे हैं जिनके नाम पर रवीन्द्र संगीत का गान होता है। उनके भीतर के कलाकार का इससे बड़ा परिचय और क्या हो सकता है!

‘डेली न्यूज में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश  कुमार व्यास का कॉलम ‘कला तट’ दिनांक 7.5.2010

Saturday, May 1, 2010

रंग संवेदना में उभरती अर्थ छवियां




कैनवस पर रंगों का जैसे मेला लगा हुआ है। हरा, नीला, लाल, काला, पीला और इन सबसे निकले दूसरे भी बहुतेरे रंग। उत्सवधर्मिता जताते। हर ओर, हर छोर। रंगों का सांगीतिक आस्वाद।... सब कुछ तरतीब से और थोड़ा साब बेतरतीब भी।... यह बेतरतीब क्यों? दीपक शिंदे कहते हैं, ‘यह कैनवस की सहजता है। आसमान में नजर दौड़ाएं, वहां भी कहीं कोई स्पेस अलग दिखायी देगा ही।...मेरे कैनवस का सच भी यही है। यह जो बेतरीब उभरा है, उसे चाहकर भी मैं तरतीब से नहीं कर सकता।...मुझे नहीं लगता यहां, ब्रश से कुछ किया जा सकता है।’

बहरहाल, समकालीन कला परिदृश्य में दीपक शिंदे ने इधर शेर, बंदर और दूसरे बहुतेरे पशु-पक्षियों की आकृतियों और उनके व्यवहारों को कैनवस पर सर्वथा अलग अंदाज में रूपायित किया है। उनके इधर बनाए काम को देखने व्योम आर्ट गैलरी में लगे अखिल भारतीय कला शिविर में पहंुचता हूं। वह कैनवस पर मनोयोग से लगे हुए हैं। कैनवस पर हरे, नीले, सफेद और काले रंगों के मेल से जो आकृति उभरी है, वह बाघ की है, इस आकृति के साथ ही उड़ती हुई एक चिड़िया भी अनायास ध्यान खींचती है। दृष्टियों की बहुलता में पृष्ठभूमि में बिखरे रंग भी जैसे बहुत कुछ कह रहे हैं। पेड़-पौधे, जंगल की नीरवता, वहां का एकांत और प्रकृति की सुरम्यता-अमूर्तन में यहा बहुत कुछ है। उनके अमूर्तन मंे विशिष्ट अर्थ छवियां हैं। ये ऐसी हैं जिनमंे रंग अपने होने को सार्थक करते जैसे देखने वाले से संवाद करते हैं। मुझे लगता है, अन्तर्मन अनुभूतियों को वे रंगों से जताते खुद भी उनमंे खो से जाते हैं। चटख होने के बावजूद उनके बरते रंगों में गजब का संतुलन है। लगता है, रंगों के साथ उभरती पशु-पक्षी आकृतियों मंे आकारों के तुमुल के बाद वह उनकी सादगी पर गए हैं।

शिंदे पहले से यह तय नहीं करते कि कैनवस पर क्या कुछ बनाया जाना है। जो कुछ घटित होता है वह कैनवस पर ही होता है। ऐसे मे ऐन्द्रिकता को रूपायित करते शिंदे उस अव्याख्यायित सौन्दर्य का भी सर्जन करते हैं जिसमें माध्यम से अधिक आशय की अर्थवत्ता होती है। गहन आशयों से उत्प्रेरित रंग मूर्त और अमूर्तन में जैसे यहां जीवन को नया अर्थ देते हैं। बौद्धिक रचनात्मकता में दीपक कैनवस पर नये नये रंग प्रभावों को आजमाते हैं, उनकी प्रभावशीलता में जाते हैं। ऐसा जब वह करते हैं तो रंग उत्सवधर्मिता के संवाहक बनते देखने वालों को सुकून प्रदान करने लगते हैं। और सबसे बड़ी बात यह भी है कि अमूर्तन में रंग संवेदना का सर्वथा नया मुहावरा गढ़ती उनकी कला में आधुनिकता है परन्तु उससे पैदा विभम्र नहीं है। मुझे लगता है, यही उनके चित्रों की वह विशेषता है जो उन्हे ओरों से जुदा करती है।
"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित डॉ. राजेश कुमार व्यास का स्तम्भ "कला तट" दिनांक 30 अप्रैल 2010