Friday, October 7, 2011

कलाओं से रचा ‘संगना’ छंद

कहीं पढ़ा जेहन में कौंध रहा है, ‘ज्योतिरूपो रसः स्मृतः।’ केवल रस रूप नहीं। ज्योतिरूप रस। ज्योति का संवाहक रस। संगीत, नृत्य, नाट्य कलाओं के आस्वाद की अनुभूति। कलाओं से खाली रस ही थोड़े ना मिलता है। सोचिए! संगीत सुनते हम उसे गुनते हैं। नृत्य-नाट्य कलाओं का आस्वाद करते बहुतेरी बार हम खुद ही उनमें रमने लगते हैं। वहां जो रस मिलता है, वह देखने-सुनने के समय ही नहीं बल्कि उसके बाद भी सजीव रूप में बचा रहता है। कईं बार पूरा जीवन ही उस रस से ओत-प्रोत हो जाता है। कलाओं के आस्वाद की स्मृति छायाएं ही तो नहीं है कहीं यह ज्योति रस!
 ख्यात कला समीक्षक, कवि प्रयाग शुक्ल ने कुछ दिन पहले स्नेहवष ‘संगना’ भेजी। संगीत नाटक अकादमी ने इसे उनके संपादन में प्रकाषित किया है। ‘संगना’ शब्द ‘संगीत नाटक’ में प्रयुक्त अक्षरों से निर्मित किया गया है। संगीत से संग और नाटक से ना लिया गया है। ‘संगना’ माने जो संग हो। ‘संगना’ में ध्वनित ‘हमारे संग हो ना’ की उनकी सम्पादकीय व्याख्या लुभाती है।
बहरहाल, संगीत, नाटक और नृत्य कलाओं पर  216 पृष्ठीय सामग्री का आगाज सुखद है। मसलन मुकुन्द लाठ का विषेष आलेख ही लें जिसमें संगीत की शास्त्रीयता के साथ ही जन सरोकारों पर रोषनी डाली गयी है। लाठ संगीत को स्वर-पद-ताल का समवाय कहते हैं। लिखते हैं, ‘लय को काल का ऐसा प्रवाह कह सकते हैं जिसका हमारे भावबोध से अंतरंग संबंध होता है...हम कुछ भी गाए या बजाएं तो स्वर का प्रवाह लय मंे छन्द के गुच्छे उभारता चलता है...।’ रमेषचन्द्र शाह द्वारा संगीत और अन्य कलाओं पर समय-समय पर लिखी ‘डायरी’ भी गजब की है। ‘जब जो सुना सुनकर गुना’ में वह संगीत और नृत्य में शरीर और साहित्य में शब्द माध्यम पर विचारते आधुनिक जीवन की लय को ही जैसे व्याख्यायित करते हैं। ऐसे ही रवीन्द्र संगीत की लय को जीवन से जोड़ती नवनीता देवसेन का शब्द माधुर्य भी लुभाता है। गीतों के झरने तले’ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों से गुंफित जीवनानुभवों में नवनीता के कथाकार, कवि मन को भी गहरे से समझा जा सकता है।
अषोक वाजपेयी के कहन में सदा ही शब्दों की संस्कार परिणति देखी है। और स्पष्ट करूं तो कला संस्कार परिणति।  मल्लिकार्जुन मंसूर पर लिखी कविताएं और उनके गान, व्यक्तित्व पर उनके लिखे संस्मरण की पंक्तियां देखें, ‘मल्लिकार्जुन मंसूर का संगीत जीवन की सुरों से आरती उतारते हुए संसार का गुणगान  था: उसमें गहरी आसक्ति, उच्छल मोह, अदम्य आवेग और निपट एकान्त सब थे जैसे कि संसार में होते हैं।...’
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के शहनाई गान और उनके व्यक्तित्व पर ‘संगना’ में व्योमेष शुक्ल का रचा शब्द रूपक और पंडित भीमसेन जोषी के गान पर यतीन्द्र मिश्र का आलेख गायन-वादन को समझने की नयी दीठ देता है। हबीर तनवीर की रंग दृष्टि के बहाने रंगकर्म में लोक एवं शास्त्र की सूक्ष्म आवाजाही को संगीता गुंदेचा ने आलेख में गहरे से उद्घाटित किया है। बाल रंगमंच की पुरोधा रेखा जैन के व्यक्तित्व और उनके रंग सरोकारों पर ज्योतिष जोषी का संस्मरण भी पठनीय है। असमिया सिनेमा के अंतर्गत श्रीमंत शंकर देव पर बनी फीचर फिल्म पर लिखा रत्नेष कुमार का आलेख भी अलग से ध्यान खींचता है।
उदयन वाजपेयी के लिखे की चर्चा भी मुझे जरूरी लगती है। लिखे में दृष्य आस्वाद कराते वह पणिक्कर के साथ नाटक पर काम करते की जो याद करते हैं, उसमें उनकी प्रकृति संवेदना से भी साक्षात् होता है। लिखते हैं, ‘कावालम में पणिक्कर का घर खूबसूरत पम्पा नदी के तट पर था। मेरी सोच में यह नदी रामायण से निकलकर इस गांव तक बहती चली आई थी।...बहती हुई नदी चित्र-लिखित-सी...’
सामग्री और भी है, महत्वपूर्ण भी। लिखूंगा तो न जाने और कितने पन्ने भर जाए। हां, यह जरूर है कि प्रयाग शुक्ल ने अपनी गहरी सम्पादकीय सूझ से ‘संगना’ के जरिये संगीत, नृत्य और नाट्य पर सोचने, विचारने का नया वातायन दिया है। आखिर यह कलाएं ही तो हैं जिनमें जीवन का उजास है। विद्यानिवास मिश्र के शब्द उधार लूं तो कहूं कला सन्निविष्ट है हमारा जीवन। कलाओं के बिना जीवन अपना सहज छंद क्या पहचान पाएगा! लिख रहा हूं तो ‘संगना’ साथ है। आप भी तो हैं!
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Friday, September 30, 2011

संस्कृति के सिनेमाई सरोकार

तमाम कलाओं का सामूहिक मेल सिनेमा है। वहां संगीत है। नृत्य है। नाट्य है, तो चित्रकला भी है। ऋत्विक घटक ने इसीलिये कभी कहा था कि दूसरे माध्यमों की अपेक्षा सिनेमा दर्षकों को त्वरित गति से चपेट में लेता है।...एक ही समय में यह लाखों को उकसाता और उत्तेजित करता है।

बहरहाल, जवाहर कला केन्द्र में राजस्थानी फिल्म महोत्सव में भाग लेते मायड़ भाषा और उसके सिनेमा सरोकारों को भी जैसे गहरे से जिया। सदा हिन्दी में बोलने वाले सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के शासन सचिव कुंजीलाल मीणा राजस्थानी में बोल रहे थे और सिनेमा से जुड़े गंभीर सरोकारों पर बखूबी बतिया भी रहे थे। अचरज यह भी हुआ, 1942 में जिस भाषा में महिपाल, सुनयना जैसे ख्यात कलाकारों को लेकर पहली फिल्म ‘निजराणो’ का आगाज हो गया था, वह सिनेमा विकास की बाट जो रहा है। जिस सिनेमा में कभी रफी ने ‘आ बाबा सा री लाडली...’ जैसा मधुर गीत गाया, जहां ‘जय संतोषी मां’ समान ही ‘सुपातर बिनणी’ जैसी सर्वाधिक व्यवसाय करने वाली फिल्म बनी, वह 69 वर्षों के सफर में भी पहचान की राह तक रहा है। भले इसकी बड़ी वजह दर्षकों का न होना कहा जाये परन्तु तमाम हिट-फ्लॉप फिल्मों से रू-ब-रू होते इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि तकनीक की दीठ से अभी भी यह सिनेमा बहुत अधिक समृद्ध नहीं है। सच यह भी है कि सिनेमा जैसे बड़े और फैले हुए माध्यम की समझ का भी मायड़ भाषा में टोटा सा ही रहा है। राजस्थान की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और कलाओं को बखूबी परोटते हिन्दी सिनेमा ने निरंतर दर्षक जोड़े हैं जबकि राजस्थानी सिनेमा कैनवस इससे कभी बड़ा नहीं हुआ।
पचास से भी अधिक वर्ष हो गये हैं, हिन्दी फिल्म ‘वीर दुर्गादास’ में भरत व्यास रचित मुकेष-लता का गाया पूरा का पूरा राजस्थानी गीत ‘थाने काजळियो बणा लूं...’ था। तब भी और आज भी यह लोकप्रिय है परन्तु राजस्थानी सिनेमा ‘बाबा रामदेव’, ‘लाज राखो राणी सती’ करमा बाई’ ‘वीर तेताजी’, ‘नानी बाई को मायरो’ जैसी धार्मिक फिल्मांे और ‘बाई चाली सासरिये’, ‘ढोला-मरवण, ‘म्हारी प्यारी चनणा’, ‘दादो सा री लाडली’ और इधर बनी ‘पंछिड़ो’ ‘भोभर’ जैसी कुछेक गिनाने लायक फिल्मों से आगे नहीं बढ़ सका है। जो फिल्में बनी हैं, उनमें अधिकतर ऐसी हैं जो हिन्दी सिनेमा की तड़क-भड़क का बगैर सोचे अनुकरण करती भद्दे, विकृत और हीन वृत्त्तियों को उत्तेजन देने वाले तरीकों पर ही केन्द्रित रही है। हल्केपन की इस नींव में कितने ही खूबसूरत कंगूरे लगा दें, इमारत के भरभराकर गिरने से रोकने की गारंटी क्या कोई दे सकता है!

बहरहाल, राजस्थानी फिल्म महोत्सव सार्थक पहल है। इसलिये कि इसके अंतर्गत दिखाई फिल्मों और आयोजित विभिन्न विचार सत्रों से चिंतन और समझ के नये वातायन खुले हैं। सिनेमा की गहरी समझ रखने वाले मित्र संजय कुलश्रेष्ठ से संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘फिल्म समारोह से निर्माता जगेंगे। दूसरे पक्षों में भी कुछ चेतना तो आएगी ही।’ सवाल यहां यह उठता है कि फिल्म निर्माण की कला को राजस्थानी में क्या वाकई सुनियोजित रूप से लिया गया है? जब राजस्थानी लोकगीतों का संस्कृति के मूल सरोकारों के साथ तकनीकी दीठ से के.सी. मालू जैसे शख्स अपने तई पुनराविष्कार कर उसका सुदूर देषों तक व्यापक प्रसार कर सकते हैं तो इस बात से तो इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि राजस्थान की संस्कृति यहां की भाषा का सिनेमा सषक्त संप्रेषण माध्यम हो सकता है। दक्षिण का ही उदाहरण लें। बदलते हुए समय में भी वहां सिनेमा ने समाज को संस्कृति की जड़ों से जोड़े रखा है। किसी भी भाषा में यह जरूरी नहीं है कि जो फिल्में बने वह सबकी सब महान या कालजयी हों ही परन्तु जो फिल्में बनें उनमें कला की दीठ तो हो। तकनीक की समझ तो हो। यह सिनेमा ही है जो अपनी बात कान, वेनिस, कार्लोवी, वारी से लेकर सुदूर गांवों तक पहुंचा सकता है। फिल्म प्रदर्षन की सीमाओं के चलते एक आस जवाहर कला केन्द्र के महानिदेषक हरसहाय मीणा ने भी दी है। राजस्थानी सिनेमा के लिये तमाम पक्षों की ओर से सार्थक पहल यदि इस फिल्म महोत्सव के बहाने ही होती है तो इसमें बुरा ही क्या है!

Friday, September 23, 2011

कैनवस और संस्थापन की नयी दीठ

इन्स्टालेशन माने संस्थापन। कला में विज्ञान, तकनीक और दर्शन  का एक प्रकार से मेल। तमाम तरह की वस्तुओं के विन्यास के साथ ही इर्द-गिर्द फैलायी चीजों से एक नया वातावरण पैदा करने का प्रयास। कला का यह आज ‘न्यू मीडिया’ है। कुछ और स्पष्ट कहूं तो कला का लोकतंत्र। ऐसा जिसमें माध्यमों-संसाधनों का किसी भी तरह से उपयोग करने के लिये कलाकार स्वतंत्र होता है। दर्शक  यहां दृष्टा भर नहीं होता, बल्कि बहुतेरी बार इन्स्टालेशन का हिस्सा भी हो जाता है।
जवाहर कला केन्द्र में भारत एवं कोरिया की समकालीन कला प्रदर्शनी ‘पिंक सिटी आर्ट प्रोजेक्ट 2011’ में कैनवस के साथ ही संस्थापन की भी बहुलता दिखाई दी। विडियो इन्स्टालेशन के साथ ही फाईबर ग्लास, पेपर, झाड़फानुस, पुराने दरवाजे और भी बहुत सारी चीजों से उभारी नये दौर की यह कला अपनी ओर जैसे बुला रही थी। भले वहां माध्यमों का अतिरेक था फिर भी संप्रेषण की दीठ का नयापन भी था। मसलन जयपुर की सड़कों पर चलने वाले रिक्साचालक का विडियो इन्स्टालेशन। पैडल पर पड़ते पैरों से उत्पन्न गति और ध्वनि दृष्य जेहन में तो बसता है परन्तु उसमें मोनोटोनी है। ली जून जीन द्वारा पर्दे पर प्रोजेक्टर के जरिये उभारे अर्थहीन बिम्बों को कहने भर को कला कहा जा सकता है। मुझे लगता है, संस्थापन के अंतर्गत कोरियाई कलाकारों में तकनीक का आग्रह अधिक है। इन्स्टालेशन की यही बड़ी सीमा है। तकनीक कला के संप्रेषण का हेतु तो हो सकती है परन्तु वह कला कैसे हो सकती है! नयेपन के नाम पर संस्थापन मे यह मनमानी सही नहीं है।
बहरहाल, विनय शर्मा का संस्थापन अर्थ गांभीर्य लिये संवेदना को झकझोरता है। रचनात्मक और विजुअल इन्स्टिंक्ट में पुरानी चीजों के अस्तित्व से भूत, भविष्य और वर्तमान के मायने जैसे रखे गये। पुरानी बहियों के पन्ने, नगाड़ों, लालटेन, कलम और दवात के ऊपर टंगे झाड़फानुस को रोशनी रंग देता आधुनिक प्रोजेक्टर और अंधेरे कमरे में आस-पास फैलायी ताजी दूब की गंध से सोच को जैसे पंख लगते है। ऐसे ही सुरेन्द्रपाल जोषी का संस्थापन भी संवेदना को नये आयाम देता है। फाइबर ग्लास, सूत की डोरियों में में झांकती रोषनी की परतों से उभरती जीवाश्म   सरीखी आकृतियां और कैप में उभरे नाखुनों के अंतर्गत वहां सृजन के सरोकारों की गहरी तलाष की जा सकती है। हां, कोरियाई कलाकार ली सेंग ह्यून का और ना सू यीओन का इन्स्टालेशन शहरों से जुड़ी स्मृतियों के जीवंत बिम्ब भी अलग से ध्यान खींचते लगे।
प्रदर्शनी में भारतीय-कोरियाई कैनवस में बहुत से स्तरों पर साम्यता की अनुभूति होती है। रंग और संवेदना के स्तर पर देखें तो कोरियाई कलाकार कोह अ बीन की जल रंगों में झांकती ‘अ टेल आॅफ चियोंग’, किम योंग क्वान की ज्यामीतिय संरचना, किम येंग ही के रंग कोलाज, किम क्योंग ए की ‘नेस्ट ऑफ  फोनिक्स’, किम यून जिन का स्त्रीआकृति के साथ ही सुधांशु  सूथार, कालीचरण गुप्ता, आलोक बल, मनीष शर्मा और बोस कृष्णमाचारी की कैनवस कलाकृतियां में निहित संवेदना के चक्षु देशों  की दूरियां जैसे पाटते हैं।
कला में इन्स्टालेशन  कोई नई बात नहीं है। भारतीय परम्पराओं में  तो संस्थापन की भरमार है। मेले, पर्व, अनुष्ठान, जन्माष्टमी सजाई और दुर्गा विसर्जन सब संस्थापन ही तो है। चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी में पश्चमी  कला जगत में दृक अनुभवों के अंतर्गत अलग-अलग चीजों, तत्वों को किसी एक अवकाश या स्पेश  में ले जाने की कला शैली कुछ-कुछ संस्थापन जैसी ही तो रही है। कभी मार्षल दूषां ने ‘युरिनल पोट" को प्रदर्शनी में बतौर ‘फाउण्टेन’ शीर्षक से शिल्प  करार देते परम्परागत मर्यादाओं को तोड़ते संस्थापन ही तो किया था।
दृश्य, ध्वनि, स्पर्श और शब्द के इन्स्टालेशन में विषय-वस्तु और फोरम  के कारण तताम तत्वो ंका संयोजन किसी एक संबंध में रूपान्तरित होता नये अनुभव का संवाहक होता है। यह जब लिख रहा हूं, भारतीय-कोरियाई कलाकारों की प्रदर्शनी  के अंतर्गत कैनवस और इन्स्टालेशन आर्ट में कला के वैश्वीकरण  को भी जी रहा हूं। आप क्या कहेंगे!

Saturday, September 17, 2011

अंतर्मन संवेदनाओं के चित्राख्यान

सावित्री पाल की अंतर्मन संवेदनाओं को उनकी रेखाओं में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। बारीक रेखाओं के अंतर्गत स्त्री-पुरूष की देह से लिपटे-फूलों, बेलपत्तियांे के बहाने वह जीवन की अपने तई कला व्याख्या करती है। तकनीक की दृष्टि से ही नहीं बल्कि संवेदनाओं के भव की दीठ से भी। स्त्री-पुरूष संबंधों, देह से जुड़े सवालों से उनकी कलाकृतियां जूझती लगती है तो ठीक इसके उलट बहुत से स्तरों पर उनका कलाकर्म निर्वाण के मौन की भी पुनर्व्याख्या करता प्रतीत होता है। कह सकते हैं दर्षन की गहराईयों में वह जो उकेरती रही है, उसमें जीवन का सांगोपांग चितराम है। भले वह जो बनाती हैं, वह आकृतिमूलक है परन्तु उसके अर्न्तनिहित अमूर्तन का वह कैनवस भी है जिसमें देखने वाले को विचार का सर्वथा नया आलोक भी मिलता है। मसलन बुद्ध से संबद्ध उनकी कलाकृतियों को ही लें। मौन बुद्ध की शांत आकृतियों को सावित्री पाल ने अपनी दीठ से विस्तार दिया है। निर्वाण का अर्थ जग से पलायन नहीं है, जग से भागना नहीं है बल्कि जगत को ज्ञान से दीक्षित करना है। बुद्ध ने यही तो किया था। ऐसे वक्त में जब तमाम समाज कर्मकाण्डों के जाल में उलझा हुआ था, यह बुद्ध ही तो थे जिन्होंने व्यक्ति को अपने भीतर झांकते हुए पूर्वाग्रहों से मुक्ति की राह दिखाई थी। कर्मकाण्डों से परे ऐसे धर्म पर चलने की राह सुझाई जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता को बरकरार रखते हुए भीतर के अपने आलोक को बाहर ला सके।

सावित्री पाल की कला में बुद्ध के निर्वाण के साथ ही उनके इस दर्षन से गहरे से साक्षात् हुआ जा सकता है। उनके बुद्ध हमारी चेतना को जगाते हैं। बुद्ध का अर्थ भगवान बुद्ध ही थोड़े ना है, बुद्ध का अर्थ है ज्ञान जो हमारे भीतर है। रेखाओं के अद्भुत न्यास में सावित्री पाल के चित्रों के खुलते अर्थ गवाक्षों में भले ही स्त्री-पुरूष आकृतियों के कोलाज सरलतम रूप मंे हमारे समक्ष आते हैं परन्तु उनमें निहित बुद्धत्व के भाव अलग से ध्यान खींचते है।

स्त्री-पुरूष संबंधों और उनकी अंतर्मन संवेदनाओं को रेखाओं के रूपाकार में वह देखने वाले की दृष्टि और उसके अनुभवों का विस्तार करती है। मुुझे लगता है, आपाधापी मंे तेजी से छूटते जीवन मूल्यों, भावनाओं के ज्वार और देह के भुगोल में सिमटते जा रहे रिष्तों की उनकी कलाकृतियां एक तरह से गवाही देती है। जो जीवन हम जी रहे हैं, उसके द्वन्दों को सावित्री पाल की कला गहरे से रेखाओं में व्याख्यायित करती है। प्रतिदिन के जीवन से रू-ब-रू होने के बावजूद हम कहां उसको समझ पाते हैं। बहुतेरी बार जब तक समझते हैं, तब तक अनुभूति बदल जाती है। जीवन में जो कुछ छूट जाता है, उस छूटे हुए को सुक्ष्म संवेदना, दृष्टि में सावित्री पाल अपने चित्रों में जताती हुई भी लगती है। सहज, सरल मानवाकृतियों के साथ ही पार्ष्व के परिवेष, बेल-बूटे, लताओं, फूलों और तमाम चित्र के दूसरे परिदृष्य में उनका कलाकर्म आमंत्रित करता है, बहुतेरी बार देखने वाले पर हावी होता है, कुछ कहने के लिए मजबूर करता हुआ।

ब्हरहाल, सावित्री पाल के चित्र संवेदना के जरिए गतिमान होते हैं। उनमें भावों की लय है। वहां उत्सवधर्मिता, विषाद, हर्ष की अनुभुतियां भी है तो आकृतिमूलक कला का वह माहौल भी है जिसमें अनुभव और मन के भावों से बनती नारी-पुरूष देह यष्टि के हाव-भाव आपको भीतर से झकझोरते हैं, कुछ सोचने को विवष करते हुए। परम्परा का निर्वहन तो वहां है परन्तु आधुनिकता की वह संवेदनषीलता भी है, जिसमें उभरे प्रतीक, बिम्ब देखने वाले से संवाद करते हैं।

कांट का कहा याद आ रहा है ‘प्रकृति सुन्दर है क्योंकि वह कलाकृति जैसी दिखती है और कलाकृति को तभी सुदंर माना जा सकता है जब उसका कलाकृति जैसा बोध होते हुए वह प्रकृति जैसी प्रतीत होती है।’ स्त्री-पुरूष से ही तो यह प्रकृति है। सोचिए! प्रकृति की लय यदि गायब हो जाय तो क्या फिर हम सौन्दर्य का आस्वाद कर सकते हैं!

Friday, September 9, 2011

रेखाओं और रंगो का काव्य कहन


यह जून 2010 की बात है। जहांगीर सबावाला ने तब नया विष्व रिकॉर्ड बनाया था। उनकी एक कलाकृति ‘द कसअरीना लाइन आई’ सैफ्रोनार्ट की ऑनलाइन नीलामी में 1.7 करोड़ में बिकी थी। अखबारों की सुर्खियों में औचक वह छा गये थे परन्तु पिछले शुक्रवार को जब इस कलाकार का देहान्त हुआ तो समाचार जगत मौन था। मन में विचार कौंधा, कला और कलाकार की समाचार गत क्या यही है?

बहरहाल, जहांगीर सबावाला अपनी धुन के ऐसे कलाकार थे जो कैनवस पर ही बोलते थे। असल जीवन में एकान्तिक। एकाधिक बार संवाद हुआ तो अपने बारे में बताने से भी बचते ही रहे। लगातार उन्होंने काम किया और कुछ समय तक प्रभाव वाद, घनवाद के करीब रहने के बावजूद भारतीय परिवेष, रंग और सोच से उन्होंने अपने तई कला की नयी भाषा भी रची। यह ऐसी थी जिसमें पिकासो की कला शास्त्रीयता को आगे बढ़ाते भारतीय दृष्टि के अंतर्गत जीवन से परे स्वर्गिक सौन्दर्य सृष्टि के चितराम उन्हांेने उकेरे। पूर्व-पष्चिम के मेल की कला शैली। भारतीय दर्षन में पष्चिम की दृष्टि। उनके लैण्डस्केप और मानवाकृतियां इसी की संवाहक है। सौन्दर्य की तमाम संभावनाओं का उजास वहां है। नदी, समुद्र, पक्षी, आकाष, भोर, सांझ के कैनवस पर उभरते उनके दृष्य परत दर परत घुले रंगों में देखने के हमारे ढंग को भी जैसे नयी दीठ देते हैं।

सबावाला के प्रकृति चित्र सांगीतिक आस्वाद कराते हैं। दृष्यों में वहां समय का मधुर गान है। लैण्डस्केप में उभरी भोर की लाली, दोपहर, सांझ और धूप की परछाई समय की गति को ध्वनित करती हमें ‘अरे! यह सूर्योदय, यह सांझ!’ जैसा ही कुछ कहने के लिये उकसाती है। दैनिन्दिन जो दिखता है, वैसा ही परन्तु दृष्य रूपान्तरण में अलग मोहकता। वायवीयता। भारतीय रंग और परिवेष परन्तु पष्चिम से सीखी कला की शास्त्रीयता। आकृतियों जैसे वातावरण में घुल रही है। देखने का हमारा अनुभव बदल जाता है। मुझे लगता है, उनकी प्रकृति दृष्यावलियां मैंटल लैण्डस्केप हैं। दृष्यों के मनःदृष्य।

याद पड़ता है, संवाद में एक बार उन्होंने कहा था, ‘चित्र बनाने से पहले मैं अपनी डायरियंा टटोलता हूं। मैं प्रकृति, चीजों को देखकर नोट लेता हूं। देखे हुए अनुभवों के साथ ही सुबह, दोपहर, सांझ के रंगों की डिटेल भी कईं बार लिख लेता हूं। बाद में कैनवस पर काम करता हूं तो यह सब काम आता है।’ सच ही तो कहा था सबावाला ने। वह जब कुछ बनाते तो दृष्य मन के उनके सौन्दर्य का संवाहक बन जाते। ऐसा लगता है, रंग और रेखाओं के साथ बहती हवा को भी वह जैसे घोल देते। हवा का संगीत भू दृष्यों पर, आकृतियांे पर तैरता है। अजीब सा सुकून देता हुआ। परत दर परत घुले हुए रंग। जल, थल और नभ के अनगिनत बिम्ब। वहां पक्षी है, रात है, सांझ की लालिमा है परन्तु यह सब हमारे पृथ्वीलोक के नहीं होकर किसी ओर लोक के लगते हैं। यह दृष्य की काव्य भाषा है। फंतासी। परिचित वस्तुओं, मानवाकृतियों का अपनी दीठ से वह अद्भुत रंग संयोजन कर दृष्यांकन का जैसे नया मुहावरा बनाते। शरीरचना शास्त्र के बाह्य बंधनों से परे मानव निर्मित ज्यामीतियता प्रधान वस्तुओं के दृष्य प्रभावों का अनंत आकाष उनके चित्रों में है। कला सौन्दर्य की अपूर्वता वहां हैं। रंग और रेखाओं में भावों का अनूठा स्पन्दन। सौन्दर्य का उनका चित्रकहन कला की वैष्विक भाषा है। ऐसी भाषा जिसमें भारत के साथ ही तमाम दूसरे देषों की रेखाओं, रंगो, परिवेष और विचारों को जैसे गूंथा गया है। देष काल की सीमा से परे सौन्दर्य की उनकी कला अभिव्यंजना में सम्मोहन है। यह उनका कला सम्मोहन ही है जो जो हमें उनकी कलाकृति के आस्वाद के बाद भी उसके अनुभव से मुक्त नहीं होने देता है। कला की यही उनकी निजता है।

Monday, September 5, 2011

मूल के साथ कला का यह प्रतिकृति बाजार


मौलिक सर्जन को बहुत से स्तरों पर प्रसव वेदना के बाद के सुख से अभिहित किया गया है। सोचिए! इस अंतःप्रक्रिया के बाद कोई कलाकार अपनी निर्मिती की ही कहीं नकल पाता है तो उस पर क्या गुजरती होगी। आज के कलाबाजार का यही कड़वा सच है। असली के साथ ही 20 से 25 प्रतिषत कलाकृतियां आज बाजार में नकली बेची जा रही है। पिकासो, वॉन गॉग, सलवाडोर डाली, मार्क चगाल से लेकर रजा, हुसैन, मनजीत बावा, जे. स्वामीनाथन, सुबोध गुप्ता, अतुल डोडिया, अंजली इला मेनन की कलाकृतियों की बिक्री में जैसे असल-नकल का कोई भेद ही नहीं रह गया है।

कभी अंजली इला मेनन की ‘फीमेल हेड’ पेंटिंग की नकल के चर्चे खूब रहे थे और एस.एच. रजा उस दिन को शायद ही कभी भूल पाये होंगे जब उन्हें अपनी ही नकल की हुई कलाकृतियों के उद्घाटन अवसर पर याद किया गया था। अमेरिका की प्रतिष्ठित क्रिस्टीज और सोथबीज कलादीर्घाओं में भारतीय मूल के चौदह प्रख्यात कलाकारों की कलाकृतियों नकली होने के संदेह में उन्हें नीलामी सूची से हटाया गया तो ख्यात कलाकार अजय घोष की कलाकृतियों को नंदलाल बोस की कलाकृतियों बता कर बेचे जाने का मामला भी खासा चर्चित रहा है। गणेष पाईन के रेखाचित्रों की रंगीन फोटोप्रतियां को असली बताकर बेचे जाने ने तो कला मे नैतिकता के तमाम मूल्य जैसे बदलकर रख दिये हैं। नकल के इस गोरखधंधे में बारीकी इस कदर है कि बड़े से बड़ा कला पारखी ही नहीं बल्कि स्वयं कलाकार भी धोखा खा जाये।

याद पड़ता है, कभी हुसैन की राज श्रृंखला की पेंटिग ‘राजा और रानी’ को उनके बेटे ने चैन्ने की एक मषहूर कलादीर्घा में देखा तो पाया कि वह नकली थी। बाकायदा हुसैन ने तब समाचार पत्रों में अपील जारी की कि कला संग्राहक उनकी कलाकृतियों के असली होने की पुष्टि के लिये उनके रंगीन फोटोग्राफ भेजे परन्तु खुद हुसैन अपनी पेंटिंग की नकल की बारीकी को पकड़ नहीं पाये और धोखा खा गये।

बहरहाल, कला में नकल की इस प्रवृति का बड़ा कारण है तेजी से पनपता कला बाजार। यह ऐसा है जिसमें हैसियत के हिसाब से कलाकृतियां खरीदी और बेची जाती है। मषहूर कलाकारों के सहायकों और प्रषंसक कलाकारों ने भी इसे कम बढ़ावा नहीं दिया है। मसलन अंजलि इला मेनन के सहयोगी हामीद ने ही उनकी कलाकृतियों की नकल बाजार में पहुंचायी तो मनजीत बावा के सहायक महेन्द्र सोनी ने बावा की कलाकृतियां की नकल जमकर बेची। जे. स्वामीनाथन के चित्र बहुत कम लोगों के पास है परन्तु उनकी चिड़िया और पहाड़ श्रृंखला की नकल अमेरिका की प्रमुख आर्ट गैलरी बेचती पायी गयी। स्वामीनाथन के पुत्र संस्कृति समीक्षक कालीदास को इस बात का पता लगा तो उन्होंने नकली कलाकृति की निलामी रूकवाई। मजे की बात यह रही कि कलादीर्घा स्वामीनाथन की जिस चित्र शैली को 1966 का बता रही थी वह शैली असल में सत्तर के दशक में आयी थी।

मुझे लगता है, कला के इस गोरखधंधे के प्रति हमारे यहां अभी भी खास कोई सजगता नहीं है। यही कारण है कि असल के साथ नकल की प्रवृति निरंतर बढ़ती जा रही है। क्यों नहीं कला षिक्षा के अंतर्गत कला की असल-नकल पर भी चर्चा की जाये। तकनीकी तौर पर कलाकृति निर्माण में कलाकारों द्वारा ऐसा कुछ जरूर किये जाने की पहल की जाये जिससे वह स्वयं वह अपनी कलाकृति की असल-नकल को पहचान सके। क्यों नहीं कलाकृतियों की नकल संबंधी कॉपीराइट कानूनों की भी षिक्षा कला षिक्षण संस्थान अपने यहां दें। कभी रवीन्द्रनाथ टैगोर और अमृता शेरगिल की कलाकृतियों को राष्ट्रीय धरोहर मानते हुए इनके निर्यात पर धरोहर और कलानिधि कानून 1972 के तहत रोक लगायी गयी थी परन्तु यह कानून भी अब इतना पुराना हो चुका है कि अपनी प्रासंगिता ही जैसे खो चुका है। आपको नहीं लगता, धड़ल्ले से हमारी राष्ट्रीय कलानिधियां अब विदेषों की कलादीर्घाओं की शोभा बनती जा रही है!

Friday, August 26, 2011

नाचती-गाती रेखाओ में जीवन की लय


कंटिगेरी कृष्ण हेब्बार ने भारतीय संस्कृति और यहां के जीवन को अपनी कलाकृतियों में देषज आधुनिकता के साथ जीवंत किया है। यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है। स्मृति से कलाकृतियों के उनके गलियारे में प्रवेष करता हूं तो पाता हूं, कैनवस पर उनकी रेखाएं अद्भुत लय अवंेरती सांगीतिक आस्वाद कराती है। संस्कृति और सभ्यता का वहां मधुर गान है। मानव मन से जुड़ी कथाएं हैं, व्यथाएं हैं तो उत्सवधर्मिता का उल्लास भी है।
यह हेब्बार ही हैं जो प्रकृति और रोजमर्रा के जीवन को पारम्परिक भारतीय चित्रकला शैली की लयबद्ध रेखाओं, रंगों के साथ ही यथार्थवाद और पाष्चात्य आधुनिक कला के सांगोपांग मेल से रूपायित करते रहे है। उनके चित्रों में रेखाओं के गतित्व और लय के साथ ही मानव शरीर के गहन अध्ययन का प्रभाव भी है।
स्वयं उन्होंने कभी गुरू सुन्दर प्रसाद से जो कथक सीखा था, उससे जुड़ी स्मृतियों और अनुभव संवेदनाओं का सांगोपांग रूपान्तरण भी वहां है। इसे उनकी नृत्य, संगीत के साथ ही मानव शरीर के गहन अध्ययन की परिणति ही कहें कि उनके चित्रों में बरते रंग और रेखाएं सहज सांगीतिक आस्वाद करती अनायास भारतीय संस्कृति के अपनापे से साक्षात् कराती है। तमाम उनकी चित्रकृतियों में सहजता है, जिस परिवेष में हम रहते हैं उससे जुड़े संदर्भ हैं और ऐसा करते वह अपनी कलाकृतियों में विषय के महत्व के अलावा सतह की बुनावट पर भी गये हैं और आवष्यकता अनुसार उन्होंने अपने चित्रों में घनवादी विभाजन भी किया है। मुझे लगता है, उनकी कला अभिव्यंजनावाद से भी अधिक यथार्थवाद के निकट है।
बहरहाल, के.के. हेब्बार के चित्रों में दृष्यों की जीवंतता है। कैनवस पर वह रेखाओं की बढ़त करते हुए दृष्य नहीं बल्कि उसमें निहित संवेदना की बारीकियों में जाते हैं। समय के अवकाष को पकड़ते हुए। मसलन ‘मछुआरों की बस्ती’ चित्र। इसमें उभरे दृष्य कोलाज संवेदनाओं का दृष्य-आस्वाद कराते हैं तो ‘मुर्गा युद्ध’ के उनके चित्र में उभरी रेखाओं की गति में पार्ष्व में उभरे व्यक्ति समूह और रंग संगति की आकर्षक योजना देखे हुए के अनुभव की जबरदस्त अभिव्यंजना है। ऐसे ही ‘जंगल’ चित्र का दृष्य आस्वाद चाह कर भी हम बिसरा नहीं सकते।
थोड़े स्पेस में मध्य में दो रेखाओं को परस्पर उभारते उन्होंने रेखा-तान में कुछ नहीं कहते हुए भी जंगल को समग्रता में रूपायित कर दिया है। भूरेपन के पार्ष्व में जंगल के हरेपन का अद्भुत रंग संयोजन। सहज रेखाओं में उभरते पेड़, हरियाली से वह चित्रकला का नया मुहावरा जैसे दे रहे हैं। ‘धान कुटाई’ चित्र में विषय के महत्व के अलावा वह जीवन से जुड़े तमाम संदर्भों मंे गये है। एक चित्र में पूरे जीवन की कथा जैसे कही गयी है। आकृतिमूलक इन चित्रों के साथ ही अमूर्तन के उनके जो चित्र हैं, उनमें भी रंगो के थक्कों, ज्यामीतिय संरचनाओं और अलग-अलग परतों के जरिये उन्होंने रेखाओं की लय का अद्भुत उजास दिया है।
बांग्लादेष की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का एक ऐसा ही खूबसूरत चित्र जेहन में कौंध रहा है जिसमें लाल, पीले, हरे, सफेद रंगों की हल्की, गहरी परतों में उन्होंने विषय को सांगोपांग रूपायित किया है। गहरी, हल्की रंग परतों के विभाजन में उन्होंने रेखाओं की गति में जन-मानस के स्वतंत्र प्रवाह को रूपायित किया है।
हेब्बार की कलाकृतियो से नयेपन की लीक को तोड़ती हमें ऐसे जीवनानुभव अनायास ही देती है जिनमे देखने की हमारी चेतना अतीत को खंगालती, परम्परा के बहाने वर्तमान को टटोलती है। इससे भी आगे वह भविष्य को देखने की नयी दीठ भी हमंे देती है। मूर्त-अमूर्त कला में वहां परम्परा का गहन अन्वेषण है तो आधुनिकता की दुरूहता की बजाय उसके सहज समय संदर्भ हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारतीय रंग और रूपाकार लिये हेब्बार की चित्रकृतियां मानव सभ्यता और संस्कृति का अनहद नाद है। यह जब लिख रहा हूं, नाचती-गाती उनकी रेखाओं में बरते उत्सवधर्मी रंगों में सूर्योदय के उनके विष्वप्रसिद्ध चित्र का आस्वाद कर रहा हूं। आप भी करें!

Friday, August 19, 2011

थिरकती देह में घुंघरूओं का गान

नृत्त, नृत्य और नाट्य का संयोग कहीं है तो वह कथक में है। नृत्त माने अभिनय रहित नर्तन। नृत्य यानी नाट्य के साथ नृत्त और नाट्य वह है जिसमें किसी निष्चित पात्र का उसके वेष-चाल-रंग-रूप और बोली की हू-ब-हू नकल की जाती है। कथक में देह की लयबद्ध थिरकन के साथ ही ताल के जटिल रूपों को पैरों में बंधे घूंघरू अभिव्यक्ति देते हैं।

बहरहाल, रवीन्द्र मंच पर अर्से बाद प्रेरणा श्रीमाली के कथक का आस्वाद करते यही सब जेहन में कौंध रहा है। कथक में वह बढ़त करती है। गुरू से सीखे में परम्परा को सहेजते हुए भी अपने तई नई-नई परनों और नये-नये टूकड़ों का अद्भुत रचाव करते। लय के दूसरे दर्जे में भी थिरकते पैरों के उनके घंूंघरू ताल को जैसे गहरे से जीते हैं। विलक्षण चमत्कार दिखाते। भावों के साथ लय की अद्भुत सूक्ष्मता वहां है।

भगवान षिव की स्तुति से होता है प्रेरणा के नृत्य का शुभारंभ। षिव के ताण्डव रूपों को साकार करते वह नृत्य की मोहक छटा बिखेरती है। नृत्य की सहजता वहां है परन्तु स्वयं की मौलिकता भी है। इस मौलिकता में लयकारियों को उनके पैरों में बंधे घुंघरूओं की खनक से बखूबी अनुभूत किया जा सकता है। तबले और सारंगी के साथ दाहिने और बांये पैर की एक सी बोल निकासी में ध्वनित हो रहा है ‘ता थेई थेई तत...आ थेई थेई तत’। चमत्कारिक पद संचालन। अंग-प्रत्यंग-उपांगो से भावों की प्रस्तुति में नृत्य रस की समग्रता। देह की थिरकन भर नहीं, भावों का कहन भी इस नृत्य में है। मैं नृत्य देख रहा हूं और अनुभूत करता रहा हूं कि यह कथक ही है जिसमें विलम्बित, मध्य तथा द्रुत लय में ततकार रूपी पद संचालन होता है।

औचक पं. राजाराम द्विवेदी का लिखा जेहन में कौंधने लगा है। ततकार का मूल वर्ण है त थ ई। इसे व्याख्यायित करें तो अर्थ आता है त से तन। थ से थल और ई से ईष्वर। यानी ईष्वर प्रदत्त तन द्वारा धरती पर जो भी कार्य हो वह उन्हें ही समर्पित हो। प्रेरणा अपने नृत्य में इसे जीवंत करती है। वह नृत्य करती है परन्तु अपनी इस साधना को ईष्वर को समर्पित करती उर में आनंद के भाव जगाती है। वहां ताल को सुना भर नहीं जा सकता बल्कि सहज देखा भी जा सकता है। नृत्य में पैर के उसके घूंघरू जैसे देखने वाले से संवाद करते हैं। एक तिहाई ताल पर पर पैरों का गान।

नृत्य की शास्त्रीयता में अचल, चल थाट को कुषलता से बरतती यह प्रेरणा ही है जो दर्षकों को अपनी प्रस्तुति से बांधती है। थाट के उपरान्त आमद। चक्रदार परन। चरम पर है नाच का रस। विभिन्न तोड़े-टुकड़े उठाती वह विलम्बित में छेड़छाड़ की गत की मोहक छटा भी औचक बिखेरती है। थाट बांधने के बाद आमद, टूकड़े, चक्रदार, परन् आदि नृत्त पक्ष में बढ़त। इस विस्तार में पैरों के स्पन्दन के अलावा भाव पक्ष की भी गहराई है। प्रेरणा की यही नृत्य मौलिकता है। इसमें परम्परा है परन्तु उसका जड़त्व नहीं। शास्त्रीयता है परन्तु उसकी दुरूहता नही है। सहज आनंदानुभूति कराता नृत्य। मसलन श्रृगार रस में गुरू की रची उनकी ठुमरी प्रस्तुति को ही लें। विलम्बित में वह नायिका की गत, बंदिष, तिहाईयां, कवित्त के अलावा तबले की गत में लड़ी को पिरोकर कलात्मकता का सर्वथा नया मुहावरा बनाती है। नृत्य के अंतर्गत हर अंग में यहां उपज है। कठिन तालों में घेरदार घुमाव है और है द्रुतगामी पदाघात।

ठुमरी में कथा नहीं होती। किसी एक क्षण की बात होती है। इस क्षण को ही तो नर्तक अपनी कला से जीवंत कर कथा की समग्रता का अहसास देखने वाले को कराता है। कहीं पढ़ा हुआ याद आने लगा है। कथा कहने वाले ही कभी कथक कहाया करते थे। पौराणिक कथाओं को कुछ गाकर और कुछ अभिनय द्वारा बताने वाले। धीरे-धीरे कथक का परिमार्जन हुआ। शास्त्रीयता में निबद्ध होते यह सम्पूर्ण भारतीय नृत्य हो गया। मुझे लगता है, प्रेरणा कथक की संपूर्णता को भीतर की अपनी कला से संवारती और अंवेरती है। तबले की गूंज पर थिरकती देह में पैरों में बंधे उसके घूंघरूओं की अमृत रस वर्षा का पान करते इसीलिये मन कहने लगा है, नमन प्रेरणा। नमन!

Friday, August 12, 2011

समकालीन रंगकर्म में नाट्यशास्त्र


पौराणिक काल से ही हमारे यहां नाट्यवृत्ति अनुष्ठानमूलक नृत्य, गायन, कार्यकलाप के रूप में जीवन से अभिन्न जुड़ी रही है। विष्णुधर्माेत्तर पुराण को ही लें। इसके तीसरे खंड के नृत्तसूत्र अध्याय में नृत्यकला, रस और भावानुभवों के साथ ही ललित कलाओं के परस्पर अर्न्तसंबंधों का सांगोपांग विवेचन है। वेदव्यास रचित महाभारत में सूत और मागध, नृत्य और नाटक का उल्लेख है। हरिवंषपुराण में रामायण के नाट्यान्तर की, भागवत और मार्कण्डेय पुराणों में नट, नर्तक का, पांतजल महाभाष्य में कंसवध और बलिबंधन नाटकों का और भरतमुनि के नाट्यषास्त्र की नाट्योत्पति कथा में देवासुर संग्राम, अमृत मंथन नाटकों पर जाएं तो नाट्य विधा की हमारी समृद्धता का सहज ही अनुमान लग जाता है।

यह नाट्यवृत्ति ही है जिसमें देष-काल का कोई बंधन नहीं है। वहां धरती-आकाष-पाताल, भुत-भविष्यत्-वर्तमान सहज अनायास सिमट आते हैं। कभी लोकानुरंजन का मूल नाट्य की हमारी यह शास्त्रीय परम्परा ही थी। लोग प्रेक्षागृह में नाटक देखने जाया करते थे। पारसी रंगमंच के साथ ही अधुनातन सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के दौर पर जाता हूं तो पाता हूं सेटेलाईट चैनलों के धारावाहिकों में भी तो आखिर नाट्य की हमारी पारम्परिक वृत्ति ही तो है। माने नाटक जारी आहे!

बहरहाल, नाट्यकला पर लिखा भी निरन्तर गया है। भले परम्परा के जड़त्व ने नाट्य समीक्षा को पूर्ण विकसित नहीं होने दिया है परन्तु नाटक की समकालीनता को हमसे तिरोहित भी नहीं होने दिया है। कुछ दिन पहले संगीता गुन्देचा ने अपनी सद्य प्रकाषित कृति ‘समकालीन रंगकर्म में नाट्यषास्त्र की उपस्थिति’ भेजी। अकादमिक शीर्षक देखकर चौंका। लगा, नाट्य के उद्भव, विकास पर ही इसमंे पहले जो पढ़ा वही लिखा होगा परन्तु पाठकीय आस्वाद सुखद था।

संगीता गुन्देचा के चिन्तन का लोक बहुत से आयाम लिये पाठकों से संवाद करता है। पारम्परिक नाट्य आलोचना के स्थान पर संगीता स्मृतियों के वातायन में नाट्य की भारतीय परम्परा, उसके शास्त्र के साथ ही लोक में प्रचलित धारणाओं का अपने तई पुनराविष्कार करती है। इसमें वह स्वयं के अनुभवों के साथ ही तेजी ग्रोवर की कविता, मणीकौल के सिनेमा, कवि उदयन वाजपेयी के संवाद, रतन थियम के नाट्यषास्त्र चिन्तन, हबीब तनवीर के नाट्यकौषल, कावलम नारायण पणिक्कर की निर्देषकीय दीठ की साक्षी भी अनायास देती है। रंग सामग्री की ‘आहार्य प्रदर्षनी’ के आस्वाद के साथ ही यात्राओं की अपनी स्मृतियों को भी वह परम्परा और शास्त्र से जोड़ती समकालीन रंगकर्म की व्याख्या का अपने तई नया मुहावरा गढ़ती है।

रंगकर्म पर चिन्तन का उनका यह पाठ सहज लुभाता बहुत से स्तरों पर नवीनतम जानकारियों से भी पाठक को लबरेज करता है। मसलन कालिदास के मालविकाग्निमित्र को वह फईमुद्दीन डागर के संगीत विस्तार और उसूल, फिल्मकार मणीकौल के चिन्तन की समकालिनता से जोड़ती है। भरतमुनि के सूत्रों पर विचारते वह श्रीकान्त वर्मा को याद करती है और रंगकर्म के संभावित उत्कर्ष और सूक्ष्मातिसूक्ष्म अभिव्यक्ति को अपने तई व्याख्यायित करती है। ‘मृच्छकटिकम्’ मंे विट जैसे बौद्धिक को उन्होंने इजरायल के भौतिक शास्त्री डेनियल अमिट की उस सोच से जोड़ा है जिसमें अमेरिकन फिजिकल सोसायटी की पत्रिका ‘फिजिकल रिव्यू इ’ के लिये मध्यपूर्व एषिया में अमेरिकी कार्यवाही के चलते उन्होंने एक पाण्डुलिपि की समीक्षा करने से इन्कार कर दिया था। ऐसे ही भासकृत ‘स्वप्नवासवदत्तम्’, कालिदास के ‘अभिज्ञानषाकुन्तलम्’ श्री हर्षकृत ‘रत्नावली’ की काव्य रूढ़ियों को संगीत की भिन्न रागों से जोड़ती संगीता लेखक के आत्म के परम्परा में घुलने का गहन विष्लेषण भी करती है। नाट्यषास्त्र की समकालीनता में वह केरल की पारम्परिक रंग नृत्य शैली ‘कुडियाट्टम्’ और संस्कृत नाटकों के विलक्षण मंगलाचरणों पर जाती उनकी विषेषताओं से हमारा साक्षात्कार कराती है। दरअसल संगीता के लिखे में नाट्य की समकालीनता का पाठ है, उसकी बोझिलता नहीं। शास्त्र है परन्तु उसकी जटिलता नहीं। षिल्प, संगीत और अभिनय की सूक्ष्मता है परन्तु कहन की सहजता भी है। रंग परम्परा पर लालित्य का अनूठा आस्वाद लिये है उनकी यह कृति।


Friday, August 5, 2011

सुनने वाला लोक, गुनने वाला लोक


भारतीय संगीत में उदात्ता है। पूर्ण-संपूर्ण राग-स्थायी, अंतरा, बोल, तान के शास्त्रबद्ध नियम वहां है परन्तु प्रस्तुति की अपार स्वतंत्रता भी। समयानुकूल रंजक तत्वों को अपने मंे समाहित करने की अपार शक्ति लिये है संगीत। कवि रवीन्द्र कहते हैं, ‘साहित्य का जहां अंत होता है, संगीत वहीं से प्रारंभ होता है।’ यह भारतीय संगीत ही है जिसमें गायक और वादक सीखे हुए को ही नहीं गाते-बजाते बल्कि स्वयं अपने तई भी मौलिकता रचते हैं। लम्बे समय तक सांगीतिक परम्पराएं जीवित भी शायद इसीलिए रह पायी है कि वे जन जीवन के सतत प्रवाह से जुड़ी है। वहां परम्परा है उसके बंधन नहीं।

संगीत पर लिखे की ही बात करें। अव्वल तो संगीत पर लिखा ही कम गया है। और जो लिखा है, वह इस कदर शास्त्रीय है कि बजाय जोड़ने के संगीत के श्रोता उसने तोड़े ही है। गायक, वादक अपने तई सीखे हुए की बढ़त करते हैं परन्तु लिखे की कौन करे!

जयपुर गायकी के पुरोधा उस्ताद अल्लादिया खां धु्रपद घराने के थे परन्तु साधा उन्होंने अपने को ख्याल में। धीमी आलापचारी में उनके गान में धु्रपद अंग स्पष्ट दिखाई देता था। उन्हें सुनें तो लगेगा, धु्रपद अंग की विषिष्ट गमक तथा टप्पा वहां है। टप्पा माने छोटी-छोटी तानों की मलिका। तन धातु से निकला है तान। वह जिससे राग का विस्तार हो। खयाल मंे यही होता है। सिद्धान्ततः धु्रपद मंे तान नहीं होती परन्तु गमक अंग से की गई चौगुन की लयकारी नोम् तोम् पर जब भी जाता हूं, न जाने क्यों बोलतान का आस्वाद होता है। श्रोता मन तो माधुर्य का पान करता है। शास्त्रीय निबद्धता गान का आधार हो सकती है, उसकी श्रेष्ठता और माधुर्य का पैमाना नहीं। भाव अभिव्यक्ति के लिये ही तो संगीत बना है। उसका शास्त्र तो बाद में बना है। शास्त्र के नियमों को ही महत्व देते उसे सुना जायेगा तो क्या भावाभिव्यक्ति की सहजता को हम मार नहीं देंगे!

बहरहाल, पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का कहा याद आ रहा है, ‘संगीत की षिक्षा से कोई तानसेन नहीं बन सकता, कानसेन जरूर बन सकता है।’ उनके इस कहे पर जाएं तो लगेगा संगीत सच मंे सागर है। वहां शब्दों के अर्थ निष्चित होने पर भी भिन्न-भिन्न प्रकार से गाकर नये नये अर्थ उत्पन्न किये जाते हैं। काव्य से जो व्यक्त नहीं होता, संगीत उसे व्यक्त करता है। ध्वनि की अपरिमित गमक वहां है। गमक माने वाग्। और स्पष्ट करें तो शब्दोच्चार। तराने को ही लें। ‘तन देरे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम्’ आदि निरर्थक   शब्दों का प्रयोग वहां होता है। क्यों? क्या पद नहीं है जो गान की यह गत हुई! ऐसा नहीं है। कहते हैं, अमीर खुसरो जब भारत आए तो संस्कृत देखकर घबराए। उन्होंने फिर निरर्थक शब्द गढ़कर तरह-तरह के हिन्दुस्तानी राग गाए। यही तराने हुए। तराना माने राग, ताल और लय। हमारे संगीत की यही विराटता है। चरैवेति, चरैवेति। यानी चलते रहें, चलते रहें। सबको समाहित करते हुए। यही जीवन है। जहां रूक गए, वहीं मरण है।

कोयल की कूक से मन में हूक उठती है। मयूर  का नृत्य दिल में हिलोरें जगाता है। निर्झर-निनाद में, भंवरों के गान में और वर्षा की रिम-झिम में संगीत का आस्वाद है। आखिर हृदय के सूक्ष्म भावों की भाषा ही तो है संगीत। माधुर्य इसकी सहजता है। यह कहीं नियमों से आबद्ध हो सकता है! धु्रपद को ही लें। नाट्य शास्त्र के रचययिता भरतमुनि ने अपने गं्रथ में धु्रवा गीतों का उल्लेख किया। उनके ध्रुवगान मंे ऋक, पाणिक और गाथाएं अपने सात रूप और अंगो के साथ सम्मिलित है। धु्रवागीत धु्रवपद हुआ और लोक में धु्रपद। यही बढ़त है। सुनने वाला लोक, गुनने वाला लोक। संगीत की शब्दावली अलग है। सुनने और अनुभव की अलग। उसे संगीत के शास्त्रों से निबद्ध करेंगे तो संगीत श्रोता नहीं जुटेंगे। लिखा यदि सुनने की संवेदनषीलता जगा सके तो इससे बड़ा और उसका हेतु क्या होगा! तानसेन नहीं हमें कानसेन बनाने हैं।


Friday, July 29, 2011

ध्रुपद के उस अद्भुत गान की विदाई...


उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर के गान की लयकारी और सांसों पर नियंत्रण की उनकी साधना सुनने वालों को अचरज कराती थी। उन्हें सुनना संगीत को गुनना है। यह जब लिख रहा हूं, मन गान में आरोह-अवरोह में सांसो के उतार-चढाव की उनकी अद्भुत लयकारी में ही जा रहा है। याद पड़ता है, जयपुर में धु्रपद समारोह में ही उनसे पहले पहल साक्षात् हुआ था। उन्हें सुना तो लगा उम्र को पीछे धकेलते वह सांगीतिक सौन्दर्य का अद्भुत रचाव करते हैं।

मुझे लगता है, यह उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ही थे जिन्होंने धु्रपद की विरासत को न केवल सहेजा बल्कि उसकी बढ़त भी की। बढ़त माने विस्तार। आरोह में अवरोह और अवरोह में आरोह पर जाते वह सुनने वालों को चकित करते थे। नोम् तोम् की आलापकारी में प्रत्येक शब्द का उनका उच्चारण मन को उद्वेलित करता भीतर के खालीपन को जैसे भरता था। वह गाते थे लय बद्ध और नपा तुला। स्वरावलियों का अद्भुत अलंकरण वहां होता था। मन्द्रस्वर से मध्य और तार सप्तकों की खेंच में उनका गान परवान चढ़ता। याद पड़ता है, मन को झंकृत करता कभी उनके गाये राग सोहनी में नाद षिवभक्ति का रिकॉर्ड सुना था। शब्दों में स्वरों का उजास जैसे उन्होंने वहां रचा। उनका सुना और भी बहुत कुछ याद आ रहा है...चार ताल पर गत की उनकी बंदिषे। सच! यह डागर ही थे जिनका तीनों सप्तकों पर स्वर नियंत्रण का समान अधिकार था। स्वरावली को अलंकारित करते वह गायकी की निरंतरता को गहरे से अनुभूत कराते थे। बहुतेरी बार गान में वह अवरोहात्मक को भी अनपेक्षित आरोहात्मक बना देते थे। गान का यह चरम आवेग ही उनकी गायकी की विषेषता थी। ढ़लती उम्र में भी अपनी कसी हुई, गमकयुक्त शानदार तान को वह साधे हुए थे।

बहरहाल, भरतमुनि के नाट्यषास्त्र में धुवा-गीत का वर्णन आता है। कहते हैं यही बाद में ध्रुपद से जाना जाने लगा। कहा यह भी जाता है कि मध्यकाल मंे ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर ने सन् 1486 से 1516 तक के अपने शासन काल में ध्रुपद गायन परम्परा को पहले पहल विकसित किया। उनके प्रयासों से धु्रपद संवरा और निखरा। अबुल फजल की ‘आईने अकबरी’ में लिखे को मानें तो राजा मानसिंह ने धु्रपद शैली का विस्तार खुद नहीं करके अपने दरबारी गायक नायक बख्शू, मझू, भानु आदि की सहायता लेकर किया। जो हो इस बात से तो इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि यह राजा मानसिंह तोमर ही थे जिन्होंने धु्रपद को बढ़ावा दिया।

अकबर के जमाने में स्वामी हरिदास के षिष्य तानसेन ने धु्रपद को परवान चढ़ाया। उनके समय में ही बानियों का विकास हुआ। बानियां अपने प्रतिष्ठाता के नाम और स्थान से जानी गयी। मसलन तानसेन गौड़ ब्राह्मण थे इसलिये उनकी शैली गौड़ी हुई। दिल्ली के निकट स्थित डागुर निवासी ब्रजचंद से डागर वाणी, खंडार निवासी राजा समोखन सिंह से खंडार वाणी और नोहर निवासी श्रीचंद राजपूत से नोहर वाणी। तानसेन रचित धु्रपद मंे आता भी है ,‘बानी चारों के भेद सुन लीजै गुनीजन तब पावै यह विद्यासार/राजा गुबरहार, फौजदार खंडार, डागुर दीवान, बकसी नौहार।’ गौड़हार यानी शांत रस, डागुर माने मधुर और करूण रस, खंडार का मतलब वीर रस और नौहार से आषय प्रबंधों में अद्भुत रस।

खैर...यह पुरानी बातें हैं। अब तो धु्रपद के नये-नये और भी घराने विकसित हो गये हैं। राजस्थान मंे डागर घराने का आरंभ से ही बोलबाला रहा है। इमाम खां के पुत्र बाबा बहराम खां इस घराने के जन्मदाता माने जाते हैं। उनकी धु्रपद परम्परा को ही उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन डागर ने न केवल संजोया बल्कि अपने तई निरंतर उसका विस्तार भी किया। वह नहीं है परन्तु ध्रुपद के उनके अद्भुत गान को क्या कभी हम भुला पाएंगे!

Friday, July 22, 2011

कला का अनूठा शब्द आस्वाद

मनीष पुष्कले मूलतः चित्रकार हैं परन्तु रचना प्रक्रिया को बयां करते वह अंतर्मन संवेदनाओं के अछूते, अनूठे लोक में ले जाते हैं। कला मर्मज्ञ मित्र पीयूष दईया ने कुछ समय पहले उनसे लम्बा संवाद किया था। उसकी परिणति ही है सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘सफ़ेद स(ा)खी’। पिछले दिनों मनीष ने जब यह भेजी तो सुखद अचरज हुआ। हिन्दी में कला पुस्तकों की बंधी-बंधायी लीक को तोड़ती, गद्य की अद्भुत लय अवंेरती है यह। संवाद में भले पीयूष ने इसमें अपने शब्दों को मौन कर केवल मनीष के कहे को ही धरा है परन्तु सृजन की उनकी गहरी दीठ को मनीष की रचना प्रक्रिया को खंगालने में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है।

बहरहाल, कला में संवाद की प्रचलित अवधारणाओं के जड़त्व को तोड़ती पुस्तक मनीष के चित्रों, उनकी शैली के साथ ही कैनवस को परोटते रंग, रूपाकारों के व्यक्त, अव्यक्त का सर्वथा नया अर्थ विस्तार करती है। कला की शास्त्रीय अवधारणाओं से इतर मनीष का कैनवस चिन्तन वर्तमान संदर्भो के साथ ही अंतर्मन संवेदनाओं के बहुत से अनुभवों से संपृक्त होकर नई अर्थवत्ता लिये पुस्तक में हमारे सामने आता है। कला चिन्तन की समृद्ध परम्परा के साथ ही इतिहास, मिथक, आख्यान, किस्से-कहानियांे का सम्यक उपयोग करते मनीष ने पुस्तक के जरिये कला समझ की एक प्रकार से नई दीठ भी हमें दी है। इस दीठ में चित्रोद्भव की मनीष की तमाम संभावनाओं में कैनवस के निर्विकार सफेद की निर्गुणी स्मृतियां है। ‘रंग अदृश्य को ओढ़ने की चादर’ जैसी खूबसूरत अभिव्यंजना है तो गोगां की सकल चित्र-यात्रा में संश्लिष्ट रूपधर्मिता के एहसास की उनकी अलहदा अनुभूतियां भी है। मनीष इसमें नैन्सी हॉल्ट, रिचर्ड सेरां, लैग के साथ ही अनीष कपूर, डेमियन हर्स्ट, रोथको, रूसो, रोदां, मूर आदि की कला भाषा पर जाते हैं तो प्रभाकर कोलते, राजेन्द्र धवन नसरीन मोहमदी, रजा, जे.राम पटेल, अम्बादास, रामकुमार, गणेश हलोई के कला उत्स की बारीकियों से भी अनायास साक्षात्कार कराते हैं। स्वयं अपने चित्रों के बारे में वह कहते हैं, ‘मेरे चित्र होने के चित्र नहीं, न होने के चित्र हैं।’

गायतोण्डे से मनीष गहरे से प्रभावित रहे हैं। उनके पहले और अंतिम दर्शन, स्पर्श की अनुभूति की मनीष की अभिव्यंजना ‘सफ़ेद स(ा)खी’ में मर्म को गहरे से छूती है तो प्रियम्वदा और देवव्रत की कथा के जरिये वह अपने चित्रों की अनूठी साख भरते हैं। रेखाचित्रों पर उनका कहा जरा देखें, ‘...रेखा कागज के निरंजन सफेद को आविष्ट करती है, विचलित भी। यह सफेद को संहित करती है। और उसके असीम का अपने एक नन्हें से बिन्दु-रूप से सन्धान करती है। यही रेखा की विभूति है। मुझे रेखाचित्र इसीलिए भाता है कि यह सीधे-सीधे सफेद और काले का मेल है-मानो अपने विपर्याय की सन्धि।’ जल रंगों की उनकी व्याख्या भी अलग से लुभाती है, ‘जलरंग प्रभावी व अचूक है। जो चूके तो चित्र चातुर्य धरा रह जाय...जल-रंग शुरू से आखिर तक चैतन्य को एकाग्र रहने के लिए बाध्य करता है।..’ डेविड हॉकन, अज्ञेय, अशोक वाजपेयी, बर्वे, बावा, फ्रांसिस बेकन आदि के उद्धरणों से मनीष का कहन भी अलग से ध्यान खींचता है।

सच! ‘सफ़ेद स(ा)खी’ कला का अनूठा शब्द आस्वाद है। ऐसा कला वातायन भी जिससे छनकर आता है किसी कलाकार की अनुभूतियों, संवेदनाओं और विचारों का अनपेक्षित आलोक। मनीष के विचारों को शब्दों का गजब आकाश भी पीयूष ने इसमें बहुत से स्तरों पर दिया है। ऐसा करते वह कलाकार के मनोलोक के साथ ही स्वयं अपने चिन्तन में झांकने का स्पेस भी हमें देते हैं। हिन्दी में कला पर इस तरह की पुस्तक का आना एक नयी शुरूआत है। सुखद। इसलिये कि यह कला संवाद, चिन्तन और समझ के हमारे बहुत से पूर्वाग्रहों को तोड़ती है। अज्ञेय ने कभी अपने डायरी लेखन को ‘अंतः प्रक्रियाएं’ की संज्ञा दी थी। ‘सफ़ेद स(ा)खी’ पढ़ते अज्ञेय की यह संज्ञा गहरे से मन में घर करती है।

Friday, July 15, 2011

अभिनय शास्त्र में भाव लिपियों की सर्जना


संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला आदि तमाम भारतीय कलाओं में सृष्टि का अनुकरण है। वहां सृष्टि के संदर्भ में विषेष दृष्टि है। कलाओं का तमाम हेतु यह विषिष्ट दृष्टि ही तो आखिर है। कभी ब्रांकुषी ने कहा था, ‘भारतीय कला संयम से निकलती है। वहां धारा का आवेग और तटों का सयंम है।’ सच भी यही है। कठिन होने के बावजूद यह प्रक्रिया हमारी कलाआंे में साध्य होती है। नाट्य को ही लीजिये। विषालता का वहां कोई छोर नहीं है। नाट्य के तीनों ही उपादानों वस्तु, पात्र और रस में नव उन्मेष की अनंत संभावनाएं हैं। हम नाटक देखते हैं तो आनंद, रूप रस और विराट का अवर्णनीय अनुभव ही तो होता है। कालिदास ने इसीलिए कहा भी कि भिन्न रूचि वाले लोगों के लिये नाट्य अनूठा समराधन है। माने जरूरी नहीं है कि आपमें नाट्य कौषल हो, जरूरी नहीं है कि आपमें नाट्यानुराग है, जरूरी नहीं है कि नाटक की आपको पूरी समझ हो फिर भी नाट्य का रस आप प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये कि वहां उदात्तता है। देष, काल और अन्विति पर वहां बल जो नहीं है। यह जब लिख रहा हूं भरत मुनि की याद औचक ही जहन में कौंध रही है। नाट्य शास्त्र की बात हो और उनका स्मरण न हो यह हो भी कैसे सकता है! भरतमुनि रचित नाट्य शास्त्र एक व्यक्ति का नहीं, पीढ़ियों के संचित अनुभव, चिंतन और ज्ञान को समाहित किये हुए है। इसमंे नाट्य की उत्पति की मिथक कथा में सृष्टा स्वंय ब्रह्मा कहते हैं, ‘नाट्यवेद में कहीं धर्म है, कहीं अर्थ है, कहीं क्रिडा, कहीं शाति अथवा श्रम, कहीं हंसी, कहीं युद्ध, कहीं काम और कहीं वध का अनुकरण है।...न कोई ऐसा ज्ञान है, न षिल्प है, न विद्या है, न कोई ऐसी कला है, न योग है और न ही कोई कार्य ही है, जो इस नाट्य में न प्रदर्षित किया जाता हो।’ सोचिए! रंगकर्म से समाज को संस्कारित करने की ऐस अपेक्षा क्या कहीं और किसी कला में मिल सकती है!

मुझे लगता है, यह नाट्य शास्त्र के रचियता भरतमुनि की उदात्त दीठ ही है जिसमें नाट्यकर्म मनोरंजन मात्र नहीं होकर संस्कार की एक अनूठी कला के रूप मंे हमारे समक्ष है।

बहरहाल, भरतमुनि के नाट्यषास्त्र की आलोचनात्मक विवेचना तो बहुत से स्तरों पर हुई है परन्तु कला समीक्षक और रंगकर्म से गहरे से जुड़े मित्र गौतम चटर्जी ने नाट्यषास्त्र के देषकाल की खोज कर इधर अनुठा शोध कार्य किया है। बनारस से पिछले दिनों जब वह जयपुर आये तो निवास पर भी आये। रंगकर्म भी खुब बतियाये भी। कहने लगे, भरतमुनि का ईसा पूर्व 463 में काषी मंे जन्म हुआ और वहीं उन्होंने नाट्यषास्त्र की रचना की थी। संगीत विमर्ष की तर्ज पर गौतम चटर्जी इधर अभिनय शास्त्र की भी रचना कर रहे हैं। नाट्य शास्त्र को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कैसे इस्तेमाल किया जाये, इसे ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने इससे 36 अभिनय सूत्र निकाले हैं। संगीत में जिस प्रकार स्वरलिपियां है, उसी तरह अभिनय के लिये भी वह भाव लिपियों के सर्जन का कार्य कर रहे हैं। विज्ञान और भाव प्रवणता के साथ गायन, नृत्य को जोड़ते वह अभिनय शास्त्र का जो नया आयाम बना रहे हैं, उसमें स्वयं उनके अनुभवों का विराट भव है। वहां अभिनय की बारीकियों के साथ ही परम्परा और आधुनिकता का सांगोपांग मेल भी है। अभिनय शास्त्र के अंतर्गत भाव लिपियों के आविष्कार का उनका यह कार्य रंग विचार को नया आलोक तो देगा ही, रंगकर्म की बुनियादी उलझनों के सुलझाव का भी मार्ग प्रषस्त करेगा। मुझे लगता है, रंग परम्परा का एक अनिवार्य संदर्भ भी इससे हमे मिल सकेगा। आप क्या कहेंगे!


Friday, July 8, 2011

सिनेमा की कला दीठ


तमाम कलाओं का हेतु संवेदना है। चित्रकला, काव्य, नृत्य, नाट्य और संगीत के साथ ही सिनेमा को आपस में जोड़ने का कार्य संवेदना ही करती है। मणी कौल ने तमाम अपनी फिल्मांे मंे यही किया है। कैमरे के जरिये दृष्य संवेदनाओं और अनुभूतियों का वह जो अनंत आकाष रचते रहे हैं, उनमें तमाम भारतीय कलाओं का सम्मिलन देखा जा सकता है। सिनेमा में स्थापत्य, संगीत, चित्रकला और भावों की बारीकियों में जाते उन्होंने चाक्षुष सौन्दर्य का सर्वथा नया मुहावरा हमारे समक्ष रखा है।

बहरहाल, पहले पहल बिज्जी की लोककथा आधारित कहानी ‘दुविधा’ के जरिये उनके सिनेमाई नजरिये से रू-ब-रू हुआ तो दृष्यों की गति की उनकी दीठ को लेकर बेहद खीझ भी हुई थी। संयोग देखिये! इसी फिल्म को जब दुबारा देखा तो लगा, चाक्षुष के अंतर्गत कहन की तमाम संभावनाओं को मणी कौल जिस षिद्दत से संयोजित करते हैं, वैसा पहले कभी अनुभूत ही नहीं किया। मसलन मौन दृष्य में अचानक ध्वनि उभरती है और तमाम खालीपन को भर देती है तो कहीं षिल्प, स्थापत्य में समय के अवकाष को पकड दिक्-काल के भेद को समाप्त किया जा रहा है। दूर तक भूखंड...दृष्य अनंतता। कैमरा बस मूव कर रहा है, औचक किसी पात्र की भंगिमा कहानी को आगे बढ़ा देती है। दृष्य कहन की यह बारिकी ही उनके सिनेमा संवेदना का मूल रही है।

‘दुविधा’ को ही लीजिए। दृष्य संवेदनाओं का अनंत आकाष वहां है। पात्र हैं और मौन में भी वह अपनी भूमिका निभा रहे है। कुछेक देर के लिए होंठ खुलते हैं फिर कैमरा किसी दृष्य पर केन्द्रित हो जाता है। दृष्यों, भंगिमाओं के जरिये संवेदनाओं को उभारता कैमरा कहानी को आगे बढ़ाता है...खाली दीवारें, उनकी छाया, पूते हुए रंग, पेड़ और उसकी परछाई में ही आप राजस्थान को, यहां की बनियावृत्ति को और राजा-महाराजाओं की संस्कृति को अनायास गहरे से अनुभूत कर लेते हैं। बिज्जी की ‘दुविधा’ पर अमोल पालेकर ने बाद में शाहरूख खान को लेकर ‘पहेली’ भी बनायी। ताम-झाम के बावजूद ‘पहेली’ नाटकीयता की अति में अंतर्मन संवेदनाओं को कहीं से जगाती नहीं लगती जबकि मणी कौल की ‘दुविधा’ में स्त्री की पीड़ा, उसके सौन्दर्य की भयावह परिणति और अर्थ लोलुपता की मार्मिक अभिव्यंजना मंे तिरोहित होते मूल्यों को दर्षक गहरे से अनुभूत कर लेता है। सांकेतिक दृष्य और बिम्ब का ऐसा रचाव ही मणी कौल की फिल्मों की विषेषता रही है। ठुमरी गायिका सिद्धेष्वरी देवी पर बनायी डाक्यूमेंट्री ‘सिद्धेष्वरी’ में उन्होंने श्रृव्य का गजब दृष्य रूपान्तरण किया तो  मोहन राकेष के नाटक ‘असाढ का एक दिन’ पर इसी शीर्षक से बनायी उनकी फिल्म में भी दृष्य संयोजन की प्रयोगधर्मिता का जो ताना-बाना है, उसे कभी बिसराया नहीं जा सकता।

चाक्षुष संदर्भों की भरमार में दृष्यों को संयोजित करते कौल कहन की तमाम संभावनाओं को कैमरे के जरिए इस खूबसूरती से संप्रेषित करते रहे हैं कि देखने के बाद भी आप उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाते हैं। ‘इडियट’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘ध्रुपद’, ‘नौकर की कमीज’, ‘ए मंकीज रेनकोट’ जैसी फिल्मों में उनका कैमरा गैर संवेगात्मक दृष्यों में मूव करता तमाम दूसरी कलाओं के अव्यक्त से भी साक्षात् कराता है। यह जताते कि तमाम कलाओ की आवाजाही के रूप विधान के बावजूद सिनेमा अद्वितीय विधा है।

बहरहाल, मोबाईल पर  पीयूष दईया ने जब मणी कौल के नहीं रहने की सूचना दी तो मन उनकी देखी फिल्मों में जाने के साथ ही हिन्दी सिनेमा के सामाजिक प्रभावों के अध्येता और जर्मन विद्वान डॉ. लोठार लुत्से के कहे उस कथन पर भी औचक चला गया जिसमें कभी उन्होंने हिन्दी सिनेमा को पांचवे वेद की संज्ञा दी थी। उनके कहे से गुरेज न करें तो क्या मणी कौल का जाना पंचम वेद के एक प्रमुख आधार स्तम्भ का जाना ही नहीं है!