Friday, June 28, 2013

रंगकर्म अनुभूतियों के दृष्यालेख

प्रदर्शनकारी कलाओं में रंगकर्म आरंभ से ही हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। इसीलिए अथर्ववेद, सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद के साथ ही पांचवा वेद नाट्यषास्त्र कहा गया है। 
संस्कृत ने नाट्य की हमारी परम्परा को निरंतर समृद्ध किया परन्तु अब जब इस भाषा के संस्कार ही हम भुलाते जा रहे हैं, संस्कृत नाटकों का मंचन कहां से हो! हां, केरल में कूडिआट्टम से़ संस्कृत नाटकों की परम्परा जरूर कुछ आगे बढ़ी। कावलम नारायण पणिक्कर इधर संस्कृत की समृद्ध नाट्य परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। रवीन्द्र मंच पर पिछले दिनों ‘रंग पणिक्कर’ समारोह के तहत पणिक्कर के रंगकर्म अवदान को गहरे से अनुभूत किया। इससे पहले उनके बारे में पढ़-सुन भर रखा था परन्तु जब उनके निर्देषन में नाटकों का आस्वाद किया तो लगा भारतीय रंगकर्म की वह अपने तई पुनःसृष्टि करते हैं। अपने अद्भुत रंग प्रयोगों के जरिए। इन प्रयोगों में परम्परा है परन्तु उसमें लोकधर्मिता की सहज छोंक भी है। इसीलिए रंगकर्म की उनकी दृष्टि में रस की अपूर्व व्यंजना हैं। संस्कृत नाट्य रचनाओं ‘मालविकाग्निमित्र’, ‘मध्यमव्यायोग’, ‘कर्णभारम्’ और ‘उत्तररामचरितम्’ की उनकी मंच प्रस्तुतियां विरल है। रंग परिकल्पना के अंतर्गत दृष्य के साथ अदृष्य की सत्ता से वह अनायास ही साक्षात् कराते हैं। अपने नाटकों में वह दर्षकों को स्मृतियों के दृष्यालेख बंचवाते हैं। भवभूति रचित ‘उत्तररामचरितम्’ की उनकी नाट्य प्रस्तुति को ही लें। यह राम के राज्याभिषेक के बाद सीता निर्वसन और फिर से मिलन की कथा है। रामायण की मूल कथा दुखान्त है परन्तु भवभूति की सुखान्त। पणिक्कर के रंग निर्देषन में नाटक और नाटक के भीतर एक और नाटक जीवंत हो जैसे देखने वालों से संवाद करता है।
संयोग देखिए! भवभूति के इस नाटक का 1913 में सत्यनारायण कविरत्न का किया अनुवाद मिलता है। इस वर्ष जब उनके किए इस कार्य के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं कवि, कथाकार उदयन वाजपेयी के लिखे आलेख में इसे मंच पर देखने का सुयोग हुआ। वाजपेयी ने संप्रेषण की दीठ से भवभूति के कथ्य को अपने तई गुना और बुना है। अभिव्यक्ति की पारम्परिक परन्तु जीवंत परम्परा के साथ।
बहरहाल, मलयालम कलाकारों की संवाद भाषा से नाटक भले ही मुक्त नहीं हो पाया परन्तु यह खलता नहीं बल्कि नाटक को और अधिक रमणीय कर देता है। पणिक्कर की रंग दृष्टि भाषीय जड़ताओं से मुक्त जो है! कहें वह रस के रंगकर्म सर्जक हैं। नाट्य चरित्रों के भावाभिनय के साथ उनकी स्थिति, गति और प्रयुक्त पाष्र्व ध्वनियोें में वह दृष्य के अद्भुत अर्थ संकेत देते हैं। ‘उत्तररामचरितम्’ अनुभवातीत भव्यता लिए है। रंग षिल्प ऐसा जिसमें कलाकार दृष्यमय होता अदृष्य को भी बहुतेरी बार जीने लगता है तो अदृष्य होता दृष्य का अहसास कराता है। अपने आंतरिक समय को जीते हुए। 
नाटक के एक दृष्य में वन देवी वासंती राम के ठीक पीछे आती कहती है, ‘मैं तुम्हारा पीछा करता प्रष्न हूं।’ भले वह यहां दर्षकों को सदेह दिखाई देती है परन्तु प्रष्न रूप में उसका अदृष्य ही अनुभूति में बसता है। पणिक्कर रंगकर्म के अंतर्गत नाटक के कथ्य के साथ उसके परिवेष को भी गहरे से जीते हैं। इसीलिए तो पात्रों की वेषभूषा, अंग संचालन और संवाद के समानान्तर वह परिवेष के अर्थ संकेत गहराई से रचते हैं। पाष्र्व ध्वनियां के साथ पात्रों का मंद गति से तैरते हुए से प्रवेष। बहुत अधिक ताम-झाम नहीं। मंच से जुड़ी मोहक कल्पनाएं दृष्य अनुभव का अद्भुत सौन्दर्य से साक्षात् कराती। काव्य, संगीत और चित्रकला का भी वह अपने रंगकर्म में भरपूर उपयोग करते हैं। सच! उनके नाट्यकर्म का आस्वाद संवेदना के मर्म में उतरते हुए दृष्य से जुड़ी अनगिनत रंग अनुभूतियों से साक्षात् होना ही तो है।

"डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" दिनांक 28-6-2013, आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं-

Friday, June 21, 2013

कला प्रदर्शनियों के सरोकार


कला का सौन्दर्य सत्य का स्वरूप है। वहां सौन्दर्य की हरेक में अलग-अलग प्रतीती होती है। मुझे लगता है, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकलाएं देखने के समय से ही जुड़ी हुई नहीं है, उनका सत्य हमारी स्मृतियों से भी जुड़ा है। कहें, यह कलाएं ही हैं जिनका सौन्दर्य देख-सुन कर ही महसूस नहीं किया जाता बल्कि स्मृतियों में भी सदा स्पन्दित करता है।
बहरहाल, अभी बहुत समय नहीं हुआ ख्यात कला क्यूरेटर अलका रघुवंशी से साक्षात् हुआ था। कला प्रदर्शन में अलका ने कुछ नए प्रयोग किए है। ख्यात कलाकारों की कलाकृतियों को क्यूरेट करते वह उनमें रमती है, बसती है। परम्परा के साथ आधुनिकता के नए कला संदर्भ जोड़ते हुए। इसलिए भी कि समकालीन कला जीवन से गहरे से जुड़े। आधुनिक कला को दैनिन्दिनी जीवन से जोड़ने के तहत आयोजित ‘अहसास’ प्रदर्शनी का आस्वदा करते कलाओं के अन्र्तसंबंधों को भी जैसे गहरे से जिया। संवाद हुआ तो कहने लगी, ‘यह सही है कि क्राफ्ट ने जिन्दगी को खूबसूरत किया है परन्तु सामयिक कला भी जिन्दगी को हसीन कर सकती है। इसीलिए मैंने ‘एहसास’ के तहत आधुनिक कला को दैनिन्दिनी जीवन से जुड़े परिधानों से जोड़ने का उपक्रम किया। यह जो प्रयोग था उसमें नर्तक, संगीतकार, कलाकार सभी जुड़े और इसी से यह सार्थक हुआ।’ अलका जब यह कहती है तो कलाओ के उनके बहुआयामी सरोकारों पर सहज ही मन जाता हैं। लोक कलाओं से लेकर शास्त्रीय कलाओं में उनकी गहरी पैठ हो है!
अलका की उपस्थिति कलाकृतियों के प्रदर्शन के बहाने बढ़ते क्यूरेटरों की भूमिका पर भी सवाल उठाती है। सवाल यह भी उठता है कि कलाकारों की कलाकृतियां कलादीर्घाओं में निंरतर प्रदर्शित हो रही है परन्तु स्मृतियों में इनमें से बहुत थोड़ी ही क्यों बसती है? शायद इसलिए कि वहां क्यूरेटर कलाओं के प्रदर्शन की व्यावहारिक सोच से नहीं जुड़ा होता।  अलका की भूमिका इस संबंध में महत्वपूर्ण है। वह देश की पहली प्रशिक्षित महिला कला क्यूरेटर है। गोल्डस्मिथ काॅलेज, लंदन और आॅक्सफोर्ड के म्यूजियम आॅफ मोर्डन आर्ट से दक्ष अलका ने इसीलिए भारतीय कलाओं को भिन्न आयामों में प्रदर्शित करने की भी अपने तई पहल की है। स्वयं भी वह कलाकार है। रंगो और रेखाओं की अद्भुत लय अवंेरती कलाकार। इसीलिए क्यूरेटर के रूप में उनके किए कार्य को खासतौर से याद किया जाता है। कलादीर्घाओं में कलाकृतियों के  प्रदर्शन को वह चुनौतीपूर्ण कार्य मानती है। कहती है, ‘कला प्रदर्शनी में क्यूरेटर की भूमिका का अर्थ यही थोड़े ना है कि आप कलाकार से कलाकृतियां ले लें और उनका प्रदर्शन कर दें। क्यूरेट करने का अर्थ है दृश्यात्मकता को क्रिएट करना। कलाकृतियों में ंजो दिख रहा है, उसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए कलाकृतियां का मेल करना। उनकी संबद्धता करना। इसी से शो में नूतनता आती है। यह जरूरी नहीं है कि एस्थेटिक सेंस हर लेखक में हो ही। है भी तो यह जरूरी नहीं है कि आप दृश्य को देखने वालों के अनुरूप नूतन करते हुए कलाकृतियां को हर आम और खास से साझा कर सकें। करना और सोचना अलग है।’ 
अलका के इस कहे में जाते हुए ही याद करता हूं, कलादीर्घाओं में प्रदर्शित वह कला प्रदर्शनियां भी जिनमें असंबद्ध दृश्यों की कलाकृतियां एक साथ मिली बहुत से सवाल पैदा करती है। सच ही है! किसी कलाकार की कला प्रदर्शनी क्यूरेट करने का अर्थ है, कलाकृतियों की प्रासंगिकता में जाना। उनकी परस्पर संबद्धता और कलाकार के समय सरोकारों से देखने वालों का नाता कराना। विरोधाभाषी चीजें भी साथ रहकर कैसे अलग होती है-इस चुनौती से कोई कला क्यूरेटर जूझता है और फिर कलाओं के सौन्दर्य की दर्शकीय दीठ पर जाता है-तभी ना उसकी सार्थकता है! आखिर कला मात्र दीवार पर टांगने की चीज ही तो नहीं है, जिदंगी का अहम हिस्सा है। 

Friday, June 14, 2013

ग्राम्य संस्कृति की दृश्य लय


छायाचित्र क्षण को पकड़ने की अद्भुत कला है। कैमरेनुमा यंत्र को बरतने वाले में यदि कलात्मक बोध हो तो वह क्षण को अपने तई सौन्दर्य में रूपान्तरित कर सदा के लिए उसे जीवंत कर सकता है। किसी घटना, अवसर के छायाचित्रों की कलानिहितता इस बात में ही तो है कि वहां किसी खास क्षण में निहित संवेदना के मर्म को छुआ जाता है।
अभी बहुत समय नहीं हुआ। छायाकार ओम मिश्रा के छायाचित्रों की प्रदर्षनी का आस्वाद किया था। लगा, ग्राम्य जीवन, प्रकृति, घटनाओं और बीते अतीत को कैमरे से जीवंत करते वह रेत, रेत से जुड़े सरोकार और ग्रामीण परिवेश का सच उद्घाटित करते। यह ऐसा है जिसे देखकर भी प्रायः हम अनदेखा कर देते हैं। वही दृश्य जो पहले देखा हुआ है परन्तु उसे कैमरे से बरतते ओम औचक ही विशिष्ट बना देते हैं। मुझे लगता है, इधर के छायाकारों में वह ऐसे हैं जिन्होंने राजस्थान के ग्राम्य जीवन को गहराई से अपने कैमरे और संवेदना की समझ से उकेरा है। इसलिए कि उनके ग्राम्य छायाचित्रां में उभरे दृश्य कला का सर्वथा नव्य सौन्दर्यबोध हमें देते हैं।
उनका एक छायाचित्र है गांव के गोबर लीपे घर का। घर का आंगन और गोबर लीपी सीढि़यों पर बच्चे बैठे हुए हैं। सहज मुस्कान के साथ। इन बच्चों को छायाचित्र के लिए बाकायदा तैयार कर बिठाया गया है परन्तु इसमें ग्रामीण परिवेश को जिस खूबसूरती से बंया किया गया है, वह चाहकर भी कोई भुला नहीं सकता। बावजूद बहुत से दृश्यों की निर्मिती में संलग्नता के ओम मिश्रा के छायाचित्रों की कलात्मकता इस बात से है कि उनमें दृश्य की बजाय उसमें निहित परिवेश की संवेदना को गहरे से जिया गया है। वह दृश्य को अपने तई बहुतेतरी बार अपने चित्रों में निर्मित कराते मिलते हैं परन्तु वहां तब विषय में बच्चे, स्त्रियां गौण होकर उनके पाश्र्व का परिवेश होता है। एक छायाचित्र में दूर तक पसरी रेत पर एक युवती पारम्परिक राजस्थानी लंहगे-चुनी में नृत्य कर रही है। नृत्य करते उसके पैर रेत के धोरों में धंस रहे हैं। ओम मिश्रा ने धोरों में धंसते उसके पैरों के बहाने रेत पर उभरी स्वयं रेत की नृत्य भंगिमाओं को बेहद खूबसूरती से कैद किया है। लगता है युवती के साथ रेत भी थिरक रही है। होले-होले। पवन के झोंको के साथ रेत मंडे पगलिए। छायाचित्र को देखते मन उसी में अटक जाता है। एक छायाचित्र देखते कबीर की साखी जेहन में कौंधने लगी है, ‘माटी एक रूप धरी नाना’। चाक पर घड़ा घड़ते कुम्हार के मिट्टी सने हाथ दिखाई दे रहे हैं। पोर-पोर अंगुलियां। माटी सनी। माटी मूरत उकेरती। ओम सर्जन के इस दृश्य की बारीकी में गए हैं। कैमरे से दृश्य मंे निहित संवेदन को गहरे से छुआ है और उसे छवि में सदा के लिए अंकित कर दिया है।  
ओम मिश्रा दृश्य नहीं दृश्य की अंतरंगता को पकड़ते उसे हमारे समक्ष खास ढंग से उद्घाटित करते हैं। छायाकला की समझ के साथ प्रयोगधर्मिता का कलात्मक संयोजन अपने छायाचित्रों में वह करते हैं। ग्रामीण जीवन के उनके छायाचित्रों में रोशनी के साथ अपरचर तथा स्पीड संयोजन की विशेषता भी आकृष्ट करती है। उनकी छाया-छवियों में दृश्य बहुतेरी बार चलायमान होता प्रतीत होता है तो कईं बार अंधेरे से उभरती रोशनी संवेदना की नई आंख देती है। छायाचित्रों में यथार्थ के साथ दृश्य प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है। दृश्य तो वही होते हैं जिनसे बहुतेरी बार हमारा सामाना हुआ होता है परन्तु उस दृश्य में निहित वह महत्वूर्ण ही तो छायाकार तलाशता है जिसमें स्वयं उसकी कलात्मक सोच छुपी होती है। ओम मिश्रा यही करते हैं। वह छायांकन की अपनी कला में संवेदना की सीर के छायाचित्रकार हैं।

Friday, June 7, 2013

भोपाल में जनजातीय संग्रहालय


इतिहास, परम्पराओं और संस्कृति की जड़ोें से जुड़ी है तमाम हमारी कलाएं। इनके मूल में ही सभ्यताओं का नाद है। इधर आधुनिकता में पनप रही एकीकृत विष्व-संस्कृति की विडम्बना यह है कि विरासत से जुड़ी जनजातीय कलाओं की हमारी थाती से हम निरंतर दूर भी होते जा रहे हैं। इसी से समूहों की सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्ध जनजातीय परम्पराओं में निहित कलाओं का लोक निरंतर क्षीण भी होता जा रहा है। जरा सोचें, कलाओं का उद्भव लोक भावनाओं से ही तो हुआ है। चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि तमाम कला-रूपों में जनजातीय समुदाय की सहभागिता का जो योगदान है, उससे क्या हम मुंह मोड़ सकते हैं! रूपंकर कलाएं आखिर व्यक्ति विषेष की रचना नहीं होकर अनेक अर्थों में सामुहिक ही तो रही है। इस दीठ से परम्पराओं की हमारी समृद्ध धरोहर को सहेजना ही आज सबसे बड़ी जरूरत है। यह सच है कि देश में स्थापित संग्रहालयों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी भी है परन्तु बेशकीमती कलाओं को संजोने वाले यह आलय भी आज पुरा वस्तुओं के आगार भर बन कर रह गए हैं। ऐसे में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में श्यामला हिल्स पर स्थापित जनजातीय संग्रहालय से कुछ आश जरूर जगती है। इसलिए कि वहां वस्तुओं की बजाय मानवीय अस्मिता को रेखांकित करने पर अधिक ध्यान दिया गया है।
इसलिए भी कि संग्रहालय की स्थापना के साथ उससे संस्कृतिकर्मियों, लेखकों को भी जोड़ा जा रहा है। संग्रहालय सांस्कृतिक चेतना के संवाहक है परन्तु संस्कृति बिगसाव के संदर्भ भी यदि उनसे जुड़ते हैं तो उनकी और अधिक सार्थकता है। संग्रहालय स्थापना आयोजन से जुड़े अषोक मिश्र बताते हैं, ‘दो वर्षों के सृजनात्मक परिश्रम से स्थापित संग्रहालय में आंचलिकता की जगह मानवीय अस्मिता को केन्द्र में रखा गया है।’ संग्रहालय की बड़ी विषेषता यह भी है कि इसमें आदिवासी कलाओं से जुड़े कलाकारों ने काम किया है। बाकायदा आदिवासी सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक जीवन्त माॅडल यहां प्रदर्षित किए गए हैं। देष के ख्यात कलाकार अनिलकुमार से संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘जनजातीय संस्कृति के साथ समृद्ध कलाओं का यह देषभर का अनूठा संग्रहालय है।’ वह जब यह कहते हैं तो औचक संग्रहालयों की उस भूमिका पर भी मन जाता है जिसमें संस्कृति संपन्न समाज की नींव निहित होती है। जनजातीय संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं को जीवंत किए जाने की ही तो आज अधिक जरूरत है। बाकायदा इसके लिए कलाधर्मिता के आयोजनों की भी वहां दरकार है। इतिहास, अतीत और वर्तमान की दूरियों को कम करने का बड़ा कार्य जब संग्रहालय करते हैं तो क्यों नहीं उनके जरिए वर्तमान पीढ़ी में सांस्कृतिक बोध का भी संचार हो। 
बहरहाल, जनजातीय परम्पराओं, उनकी संस्कृति और विरासत पर देष में ब्रिटिष उपनिवेष और राजा-रजवाड़ों के दौर में तो फिर भी कुछ काम हुआ था परन्तु आदिवासियों के समूह पर समग्रता से विस्तारपूर्वक कहीं कोई विष्लेषण, विवरण अभी भी नहीं मिलता। इस दृष्टि से समाज की जीवन शैली, परंपरा और विरासत को व्यष्टि और समष्टि रूप से समझने और अध्ययन करने में जनजातीय संग्रहालय की विशिष्ट भूमिका आने वाले समय में रहेगी। इसलिए कि उसके प्रकल्प में देश के जनजातीय इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं पर प्रकाशन के साथ ही वृत्तचित्रों के निर्माण आदि के उद्देश्य भी रखे गए हैं। इसी से सांस्कृतिक बोध को हम बचाए रख पाएंगें। संस्कृतिमूलक बीज प्रष्नों का समाधान भी आदिवासी और लोक कलाओं, परम्पराओ ंको सहेजने में ही निहित है। इसी से हमारी समृद्ध संस्कृति में जनजातीय कला की पहुंच सुनिष्चित होगी और संस्कृति का सृजन और उपयोग मानवीय अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित होगा। आधुनिकता जरूरी है परन्तु इतनी ही जरूरत इस बात की भी है कि हम हमारी जातीय स्मृतियों से वंचित नहीं रहें। सांस्कृतिक चेतना परम्परा को विस्मृत नहीं होने दें। 


Friday, May 31, 2013

शब्द संवेदना का दृश्य रूपान्तरण

कालिदास हमारे सांस्कृतिक वैभव के अनूठे चितेरे हैं। उनके लिखे में कलाओं के सौन्दर्यबोध की अन्तःसलिला सहज अभिव्यंजित हुई है। वन, प्रकृति के साथ नगर, प्रासादों के षिल्प-स्थापत्य का कालिदास ने अपने लिखे में अद्भुत चितराम ही तो किया है। लिखे में कला सौन्दर्य के उल्लसित भाव वह कुछ इस कदर उडेलते हैं कि बांचते हुए सब कुछ अनायास जैसे दृष्यमय हो जाता है। ‘मेघदूत’ को ही लें। प्रकृति प्रत्यय मेघ के जरिए प्रेम संदेष के साथ ही विरह वेदना की जो अभिव्यक्ति कालिदास ने इसमें की है, वह अनुपम है। संस्कृत छन्दों का अद्भुत लय-लालित्य। विरह वेदना का सांगीतिक आस्वाद। मुझे लगता है, कला और काव्य की समग्र पूर्णता कहीं है तो वह ‘मेघदूत’ में ही है। 
 ख्यात कलाकार कन्हैयालाल वर्मा ने इधर ‘मेघदूत’ को अपने उकेरे चित्रों में गहरे से जिया है। कालिदास रचित श्लोकों के सौन्दर्य में निहित भावों में जाते उन्होंने यक्ष की विरह वेदना, अलकापुरी के स्थापत्य को रंगो और रेखाओं से जीवंत किया है। रेखाआंे के गत्यात्मक प्रवाह में उन्होंने रंगो को घोलते श्रृंगार रस को जो चित्रात्मकता प्रदान की है वह अपूर्व है। 
‘मेघदूत’ का रम्य काव्य यूं भी आरंभ से ही कलाओं की प्रेरणा स्त्रोत रहा है। मेघदूत की कथा अलकापुरी के महाराज कुबेर की सेवा में रहने वाले यक्ष से जुड़ी है। कार्य दोष के कारण एक वर्ष के लिए उसे अपनी प्रियतमा से अलग रहना पड़ता है। रामगिरी पर्वत पर बिछोह काटते यक्ष की आषाढ़ माह में घुमड़ने वाले बादलों से विरह वेदना औचक बढ़ जाती है। वह मेघ से अपनी प्रियतमा को संदेश भिजवाता है। मेघ को दिया संदेश ही ‘मेघदूत’ की कथा का मूल है। कथा में आए अलकापुरी के महलों के स्थापत्य सौन्दर्य, भगवान शिव के भालचन्द्र की चांदनी, उमड़ते-घुमड़ते बादलों, हवाओं की उड़ान, पपीहे के गान के साथ ही कालिदास अभिव्यंजित तमाम प्रसंगों को कन्हैयालाल वर्मा ने अपने चित्रों में सांगोपांग स्वर दिया है। इस महाकाव्य को यू ंतो उन्होंने पूरा का पूरा ही अपने चित्रों में उकेरा है परन्तु उनके उकेरे कुछेक चित्र आंखों में बसते हैं। मसलन एक चित्र है जिसमें मेघ से की गयी यक्ष की अनुनय-विनय में कृषिक बालाओं के उनके सत्कार और खेतों में वर्षा करके प्रियतमा की ओर बढ़ जाने का आह्वान है। अलंकृत मेघों के वृत्त के पाश्र्व का नीला-काला रंग और उसके अंदर कृषक बालाओं का मनोहारी चितराम।  उड़ते पखेरू और बरसते जलज! धरित्री का क्रोड। ऐसा ही एक और चित्र है जिसमें चातक पक्षी के चांेच ऊपर करके पानी की लेती बूंदों और मेघों की गर्जना से डकर सहचरियों से आंलिगनबद्ध होते पुरूषों को अभिव्यंजित किया गया है। चित्र नहीं चित्र कोलाज। रंग-रेखाओं की रूप गोठ। चित्र और भी हैं। प्रदोषकाल में भगवान आशुतोष की भव्य आरती, घनघोर अंधेरे में बिजली रूपी रेखा की चमक, पुष्प बरसाते मेघ, नटेश के अट्टहास की रूप व्यंजना, शिव-पार्वती विचरण, यक्ष के वियोग में उनींदी पृथ्वी पर लेटी उसकी प्रियतमा। इन सबमें कन्हैयाल वर्मा ने कालिदास के श्लोकों के सौन्दर्य का अद्भुत चित्र रूपान्तरण किया है। ऐसा करते वह यक्ष की विरह वेदना में निहित संवेदना के मर्म को भी गहरे से छुआते हैं। 
सच! वर्मा कालिदास लिखित सौन्दर्य के सत्यान्वेषक हैं। चित्रांे में उन्होंने कालिदास लिखित सांस्कृतिक वैभव को ठौर-ठौर उद्घाटित ही नहीं किया है बल्कि रंगीय योजना, आकार संयोजन, प्रकाश पुंजों, छाया प्रभाव और कोण सज्जा में गहरे से जिया है। कालिदास कला अंर्तसंबंधों के संवाहक है। उनके लिखे शब्द दर शब्द को चित्रों में उभारते कन्हैयाला वर्मा ने इसीलिए तो रंग-रेखाओं में संगीत के सुरों की अनुभूति करायी है। भाव-भंगिमों नृत्य रस को भी जीवंत किया है। मुझे लगता है, कालिदास ने शब्द सौन्दर्य की अद्भुत कला सर्जना की है तो कन्हैयालाल वर्मा ने उस सौन्दर्य को अपने चित्रों से संस्कारित किया है।


Saturday, May 25, 2013

नृत्य छवि का सार्वभौम


नद् धातु से निस्पन्न है नाद। माने अव्यक्त शब्द। उत्सवधर्मिता का नाद आखिर जीवन में संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं से ही तो है। कल की ही बात है। श्रुतिमंडल की ओर से आयेाजित आठवे रघु सिन्हा स्मृति समारोह में सोनल मानसिंह की नृत्य प्रस्तुति हुई। सुबह समाचार पत्रो के आस्वाद में नृत्यमय देवी रूपों की उनकी प्रस्तुति का ही गुणगान था। पर सच में क्या सोनल मानसिंह ने अपनी इस प्रस्तुति में नृत्य किया? कथासृत्रों में नृत्य सरीखा अहसास कराना और किसी कथा को नृत्य में जीना दोनों अलग-अलग है। इधर हो यही रहा है। भले उस प्रस्तुति को सोनल मानसिंह की नृत्य प्रस्तुति कहा जाए परन्तु नृत्य का सर्वांग वहां कहां है! हां, नृत्य के भीतर की भंगिमाएं वहां है। भाव है परन्तु देह की गति, लोच कहां से आए! और नृत्य तो है ही देह से देह की गत्यात्मक यात्रा। माने नृत्य करते नृत्यंागना या नर्तक खुद कहीं नहीं होता, उसके भीतर की तमाम सर्जना देह में रूपान्तरित हो जाती है। 
बहरहाल, एक वय के बाद देह की थिरकन मंद पड़ जाती है। नृत्य की मति होती है परन्तु गति कहां से आए! और गति के बगैर जोश नहीं होता। बगैर इसके नृत्य का होना न होना एक ही है। इधर हो यही रहा है। सोनलजी की ही तरह अधिक वय की अधिकांश नृत्यांगनाएं नृत्य के नाम पर कथाओं की नाट्य प्रस्तुतियां कर रहीं है। कोई कहे हमने वहां भरपुर रस पाया तो रस तो नाट्य में भी होता ही है ना! नृत्य क्या है? मानवीय अभिव्यक्तियों का गत्यात्मक रसमय प्रदर्शन। सार्वभौम कला है यह। ऐसी जिसे देखते हुए भी अंग प्रत्यंग औचक थिरकने लगते हैं। देह की सुंदरतम अभिव्यक्ति। एक प्रकार का उत्सव। देह से देह की यात्रा का उत्सव। भले नृत्य में कथा का रूपक कुछ भी बने परन्तु भीतर का अरूप भी सज-धज कर इसमें देह से प्रकट हो ही जाता है। 
सोचता हू, देह से परे क्या नृत्य हो सकता है! फिर क्यों कर हो ऐसा प्रयास। सोनल मानसिंह के नृत्य का आरंभ से ही कायल रहा हूं। वह नृत्य में अंग-प्रत्यंग के साथ सदा ही भावों का अनूठा रस बिखेरती रही है परन्तु इधर बतौर नृत्य जो सामुहिक प्रस्तुति वह करती हैं, उसमें कथा का ही उत्स होता है, नृत्य का नहीं। प्रस्तुति का मोह ही है उनसे यह सब करवाता होगा परन्तु नृत्य आस्वादक मन उनकी इस सर्जना से कहां संतुष्ट हो पाता है। नृत्य का मायना आखिर भाव भंगिमाओं का प्रदर्शन ही तो नहीं है, देह से उनको जीना भी है।  
बहरहाल, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला, छायांकन को मैं ‘रंग नाद’ प्रस्तावित करता हूं। रंग के साथ नाद जरूरी है। नृत्य में देह साथ नहीं दे तो फिर वहां नाद तो होगा परन्तु रंग गायब होगा। और नाद तभी अंतर्मन को भाता है जब उसमें रंग माने उत्सवधर्मिता का उजास हो। बाहर का ही नहीं अंदर का नाद भी उससे ही बजता है। वही तो है रंग-नाद।  अंर्तध्वनि का प्रतीक। यह बजाया नहीं जाता फिर भी परमानंद रूप में बज पड़ता है। सधे हुए वाद्य वृंद की भांति। ...तो नृत्य में गत्यात्मकता होगी और देह का गान होता तभी ना वह बजेगा! रंग-नाद का मूल स्त्रोत आखिर भीतर की हमारी कला आस्वादक चेतना ही तो है! यह चेतना ही अंतर के आनंद की अनुभूति कराती है। शब्द और अर्थ भी कलाओं की हमारी इस रसानुभूति के ही अधीन हैं। इसी से पूर्व का विसृजन हो नवीन का निर्माण होता है। नृत्य कला में नवीन का निर्माण नए कलाकारों से होगा। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों से होगा। कथाओं की भाव भंगिमाओं से नहीं। सोनलजी नृत्य कला की देश की विरल प्रतिभा है। क्या ही अच्छा हो, अपने जैसी ही विरल नृत्य प्रतिभाओं का वह संभावनाओं का खुला आकाश रचे। 

Friday, May 17, 2013

नाट्यकला में समय संवेदना


नाट्य वेदों से उपजी कला है। ऋग्वेद के सूत्रों में आए उर्वशी और पुरूरवा के संवाद इसी के तो गवाह है! भरतमुनि रचित नाट्यशास्त्र में आया भी तो है,  ऋग्वेद से कथोपकथन, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर ही नाटक का निर्माण हुआ। संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि तमाम कलाओं का कहीं मेल है तो वह नाट्यकला में ही है।
बहरहाल, देश में नाट्य की परम्परा निरंतर विकसित होती रही है परन्तु एक दौर के बाद हिन्दी रंगमंच जड़ता का शिकार भी हुआ है। कहीं किसी एक नाटक का सफलतम प्रदर्शन हो जाता है तो नाट्य निर्देशक उसी नाटक की प्रस्तुतियों के लिए टूट पड़ते हैं। ‘अंधायुग’, ‘अंधेर नगरी’, ‘आषाढ का एक दिन’, ‘खामोश अदालत जारी है’ से आगे अभी भी हिन्दी रंगमंच कहां बढ़ पाया है। हालांकि जयपुर में नाट्य मंचन की परम्परा खासी समृद्ध है परन्तु जब कभी नाटक देखने जाता हूं, नाटक देखने आने वाले वही चिर-परिचित चेहरे दिखाई पड़ते हैं। माने एक विशेष वर्ग से इतर जयपुर का नाटक भी दर्शक जुटा नहीं पाया है।  ऐसे में रवीन्द्र रंगमंच पर नाटककार अर्जुनदेव चारण के नाटक ‘जमलीला’ के मंचन ने इधर मन में कुछ आश जरूर जगायी है। रंगमंच के बिगसाव की बहुतेरी संभावनाओं को उनके नाटक देखते महसूस किया। लगा, दर्शकीय लिहाज से कुछ नया चाहें तो हो सकता है।
अर्जुनदेव चारण मूलतः कवि हैं। पर नाटककार के साथ वह गहरी सूझ के नाट्य निर्देशक भी हैं।  ‘जमलीला’ मंचन वाले दिन दूरभाष पर उन्होंने आग्रह कर उसे देखने का न्योता दिया। नाटक की रिहर्सल के दौरान उनके साथ ही बैठकर नाटक के कुछ अंश देखे तो लगा, रंगकर्म को वह गहरे से जीते हैं। ‘जमलीला’ में उन्होंनंे दर्शकीय लिहाज से नाट्य संप्रेषण के सधे प्रयोग किए हैं। मसलन इसमें कथा में यमलोक का रूपक रचते वह आधुनिक समय की विद्रुपताओं, विषमताओं पर हास्य मिश्रित करारा व्यंग्य करते है। नाटक के दृश्य देखते जेहन में सवाल उभरते हैं, लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही जनता की है तो फिर गलत चुनाव के लिए दोष तंत्र को क्यों? पर सवाल यह भी है कि प्रजातंत्र में सही चुनाव के लिए क्या आम जन की सोच स्वतंत्र है? प्रश्न और भी हैं। उनके पार्श्व में बुने घटनाक्रम में दृश्य दर दृश्य नाटक बहुतेरे स्तरों पर उत्तेजित करता बहुत कुछ सोचने को विवश करता है। बकौल अर्जुनदेव उनका यह नाटक ‘भूतों के द्वारा कही गयी मानवीय कथा है।’ अर्जुनदेवजी ने इसमें भूतों के सरदार, यमराज, चित्रगुप्त, विष्णु, नारद आदि पात्रों के जरिए वर्तमान विद्रुपताओं,  व्यवस्था प्रसूत भ्रष्टाचार, बेईमानियों का सांगोपांग चितराम किया है। 
नाट्य के दृश्य आस्वाद करते अनुभूत करता हूं, नाट्य चिंतन और नाट्य प्रदर्शन में अर्जुनजी का गहरा हस्तक्षेप है। ‘जमलीला’ की कथा बतियाते वह पात्रों की संवाद अदायगी और भावाभिनय को भी बारीकी से जैसे खंगाल रहे थे। नाटक में दर्शकीय संप्रेषण के उन्होंने महत्वपूर्ण सूत्र तलाशे हैं। ऐसे जिनमें मिट्टी की सौंधी महक हैं। इस महक को नाट्य के दृश्यों, पात्रों द्वारा बोले गये राजस्थानी-हिन्दी संवादों में गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। नाट्य आस्वाद करते लगता यह भी है कि हम अपने परिवेश से कहीं जुदा नहीं है। नाटक नहीं, बल्कि आस-पास के किसी दैनिन्दिनी घटनाक्रम से हम रू-ब-रू हो रहे हैं। अर्जुनदेवजी को मंचीय व्याकरण की भी गहरी समझ है। इसीलिए यमलोक के रूपक में वह नाटक की कलात्मकता के साथ वैचारिक भाष्य के साथ आधुनिकता के सरोकारों का सहज रूपान्तरण करते हैं। 
बहरहाल, ‘जमलीला’ के मंचीय दृश्यों का आस्वाद करते ब.व. कारन्त का कहा औचक ही याद आता है, ‘नाटक सच्चाई की खोज है। उसका अनुसंधान है।’ सच ही तो है! ‘जमलीला’ के बहाने अर्जुनदेवजी ने लोकतंत्र, जनता, चुनाव के बहाने जीवनमूल्यों मंे तेजी से आ रहे बदलावों का अपने तई अनुसंधान किया है। किसी नाटककार की सांस्कृतिक रचना प्रक्रिया आखिर यही तो है! 

"डेली न्यूज़" में प्रति सप्ताह प्रकाशित  लेखक के स्तम्भ "कला तट" में इसे आप यहाँ देखें-
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/1093001

Friday, May 10, 2013

संस्कारित सुरों के गान का बिछोह



संगीत माने वह ध्वनि जो रस की सृष्टि करे। स्वर और लय की कला ही तो है संगीत। नाद के चार भाग हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। ध्वनि की तरंग ही तो है नाद। सुनते हैं तो मन करता है इसी से जुड़ें।... और धु्रवपद तो नाद ब्रह्म है। आध्यात्मिकता का गान। सुनते हुए असार संसार का रहस्य जैसे समझ आने लगता है। कल की ही बात लगती है, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर को साक्षात् गाते हुए जब सुना था तो लगा संगीत के उजास को गहरे से अनुभूत कर रहा हूं। अब जब वह नहीं है, नाद ब्रह्म के उस महान उपासक के गान की यादें ही मन में घर कर रही है। मन में गहरा अवसाद भी है। इस बात का कि पहले रूद्रवीणा वादक असद अली खां साहब, उसके बाद रहीम फहीमुद्दीन डागर और अब उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर... धु्रवपद का जैसे पूरा एक युग देखते ही देखते हमारी आंखों से ओझल हो रहा है। 
सोचता हूं, यह डागर घराना ही है जिसने धु्रवपद की परम्परा का बिगसाव ही नहीं किया बल्कि उसे अपने तई सहेजा और निरंतर संरक्षण भी किया। कहीं पढ़ा हुआ मन में कौंध रहा है। डागर माने पथ। और डागर वाणी यानी पथ को प्रदर्शित करने वाली वाणी।...तो इस अर्थ में डागर घराने ने धु्रवपद का देश में पथ ही तो प्रदर्शित किया है। नाद की रहस्यमयी महिमा धु्रवपद में ही है। उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर की तीनों सप्तकों से युक्त लयकारी का गान विभोर करता था। वह गाते तो लगता संगीत जैसे बज नहीं रहा, जैसे रचा जा रहा है। शब्दों के मौन में वह जैसे किसी और को नहीं अपने आपको ही संबोधित करते। इसीलिए उनका गान किसी और के लिए नहीं स्वयं अपने लिए ही होता था। मुझे लगता है, उनका गान संगीत की आध्यात्मिकता का गान है। कभी रूसी कवि अलेक्जेंडर ब्लोक ने कहा था, ‘संगीत ने संसार को रचा है।’ सोचें जरा कि संगीत के स्वर और लय यदि जीवन में नहीं हो तो क्या इस संसार की कल्पना की जा सकती है!
बहरहाल, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन का धु्रवपद गान सुरों का भव्य लोक निर्मित करता था। ऐसा स्थापत्य जिसमें सौन्दर्य ध्वनित होता था। मौन जहां गुंजरित होता था। शब्दों का उजास जहां अनुठा भावलोक निर्मित करता था। सच! उनका गान गंभीर, उज्ज्वल गान था। समय को अतिक्रमित करता। निस्संग। विराट स्पेस रचता। घराने में आबद्ध परन्तु उसकी बढ़त करता। सुरों को संस्कारित करता। गमक का तो उनका कोई जवाब ही नहीं था, भले वह कम गाते थे परन्तु स्वरों का विशिस्ट निभाव और शब्दों का  गंभीरता से उचारण अद्भुत था! गान  की हमारी परम्परा का पोषण करता हुआ। उसे आगे बढ़ाता हुआ। अनन्त का रूपक। नाद ब्रहम का गान। एकान्त का आलाप। उनका धु्रवपद संगीत भर नहीं था बल्कि ज्ञान का संग्रह है। वह जो गाते जीवन की अद्भुत सुर साधना ही तो थी। 
देश में युवापीढ़ी को शास्त्रीय संगीत की हमारी जड़ों से जोड़ने का बड़ा कार्य इस समय स्पीक मैके संस्था द्वारा किया जा रहा है। बहुतों को यह जानकर हैरत हो सकती है कि इस संस्था के संस्थापक प्रोफेसर किरण सेठ नें कभी न्यूयार्क में उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का गान सुनकर ही इस संस्था को स्थापित करने का निर्णय अपने मन में लिया था। यह तब की बात है जब सेठ आईआईटी खड़कपुर से शिक्षा प्राप्त कर आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए थे। न्यूयार्क में उन्होंने उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का गान सुना और बस वहीं से वह शास्त्रीय संगीत में इस कदर रमे कि 1979 में बाकायदा युवाओं को अपनी ही तरह शास्त्रीय संगीत से जोड़ने के लिए ‘सोसायटी फॉर द प्रमोशन ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूजिक एंड क्ल्चर अमगस्ट यूथ (स्पीक मैके) की स्थापना कर डाली थी। आज यह संस्था देश-विदेश में शास्त्रीय संगीत की हमारी जड़ों को सींचने का महत्ती कार्य ही तो कर रही है।
बहरहाल, उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने संगीत की शिक्षा अपने पिता उस्ताद जियाउद्दीन खां साहब से प्राप्त की थी। पिता से धु्रवपद और वीणा वादन में प्रवीण होने के बाद उन्होंने धु्रवपद की अपनी विरासत का विस्तार करते बेहतरीन शिष्य तैयार किए। गुंदेचा बंधु, ऋत्विक सान्याल, उदय भावलकर उन्हीें के शिष्य हैं।

Friday, May 3, 2013

सौन्दर्यान्वेषण करती कलाकृतियां


कालिदास कला सौन्दर्य के महाकवि हैं। उनकी काव्य उपमाओं पर जाएं तो लगेगा वहां प्रकृति और जीवन के विविध रूपो की एकरूपता है। सौन्दर्य और प्रेम का गहरा द्वन्द उनके लिखे में है परन्तु यह ऐसा है जिसे भाषा भर से ही नहीं बांचा जा सकता। संवेदना के गहन आकाश में उसे देखा जा सकता है। शब्द-शब्द चित्र जो वहां है!  महाकवि का तमाम लिखा दृश्यमय है। इसीलिए तो उनके काव्य से प्रेरणा पा चित्रकारों ने सदा ही अपने को सिरजा है। जवाहर कला केन्द्र में  पिछले दिनों कवि, चित्रकार पूर्ण चन्द्र किशन के चित्रों का जब आस्वाद किया तो लगा कालिदास की काव्य कहन कला को वह कैनवस पर रूपान्तरित करते हैं। प्रेम और सौन्दर्य को उनके रंग और रेखाओ में गंहरे से अनुभूत किया जा सकता है। यह बात अलग है कि इधर उन्होंने सामयिक संदर्भों को सहेजते बहुत कुछ अलग भी बनाया है। इन सामयिक संदर्भों में गोधरा कांड है, नारी उत्पीड़न है और तमाम वह सब है जिनसे उनका कला मन उद्वेलित होता रहा है परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि तमाम इन सबमें भी भावात्मकता और रंग-रेखाओं की मूर्त-अमूर्त शास्त्रीयता है। 
बहरहाल, पूर्णचन्द्र किषन के चित्रों, उनके बनाए स्कल्पचर देखते यह अहसास भी होता है कि उनकी कला निर्मितियां में सांगीतिकता के साथ काव्य संवेदना के गहरे मर्म है। इसीलिए कईं चित्रों में रंगो की बरती उनकी भाषा सहज बांची जा सकती है। माने वहां रेखाओं से सृजित आकृतियां है परन्तु यह नहीं भी होती तो चित्रों का अर्थ स्पष्ट समझ आता है। धूसरित रंगों में रेखाओं की वह अद्भुत लय जो अंवेरते हैं! लाल, पीले रंगों के धब्बे आकृतियों में हैं परन्तु  वहां अनुभूतियों, स्वपन्न और यथार्थ का गजब का मेल है। उनकी कलाकृतियों का अजन्ता की कला के साथ ही समृद्ध भारतीय षिल्प और मूर्तिकला के साथ ही लोक कलाओं से गजब का नाता लगता है।  कालिदास, भवभूति सरीखे संस्कृत महाकवियों की अनुगूंज तो हर ओर, हर छोर उनकी कलाकृतियो ंमें है ही। इसीलिए मेघदूत, रघुवंश के कथा प्रसंगों से प्रेरणा ले उनका कैनवस बहुतेरे दृश्यों में जीवंत होता हमसे जैसे संवाद भी करता है। कहूं, संस्कृत महाकाव्यों के छंदों की स्मृतियां उनकी कलाकृतियों में रची-बसी हैं तो सौन्दर्य और उदात्त प्रेम की मधुर अर्थध्वनियां भी वहां है। पूर्णचन्द्र किषन के चित्रों का आस्वाद करते परम्परा पोषण के अंतर्गत राजा रवि वर्मा याद आते हैं, महादेवी का स्मरण होता है और पौराणिक, सांस्कृतिक आख्यान भी आंखों के समक्ष औचक ही तैरते हैं परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि इनसबमें स्वयं उनकी आधुनिक दीठ और मौलिकता है। माने वह हमारी संस्कृति और परम्पराओं को कला में जीते तो हैं परन्तु उन्हें अपने तई समय के साथ रंग-रेखाओं से संस्कारित भी करते हैं। सौन्दयात्मक गुणों से लबरेज उनके चित्रों में लयबद्ध रेखाओं का गत्यात्मक प्रवाह है। रंगाकंन के साथ रेखांकन भी भावदर्षी, सजीव है। कहें, उनकी कलाकृतियों में स्वयं उनके प्रकट हुए आंतरिक विचारों को पढ़ा जा सकता है।
दृष्य कला का आधार क्या है? रंग-रेखा, सतह ही तो है! इनका तादात्म्य यदि सजग, सचेत रहकर कलाकार करे तो भावपूर्ण चित्रसृष्टि स्वयमेव ही हो जाती है। पूर्णचन्द्र किषन यही करते हैं। बहुरंगी कला दृष्टि मंे वह बीते हुए सौन्दर्य के प्रति अपार आस्था जताते कलाकृतियों में अपने को ही रचते हैं। हर बार। बार-बार। पूर्वगामी कलाकारों का उन्होंने अपनी कलाकृतियांे में शास्त्रबद्ध अनुकरण आधुनिता के आग्रह के साथ किया है। उनकी कला बहुपढि़त भावना से उपजी चैतन्य की कला है। इसीलिए वह जो बनाते हैं वह भावस्पर्षी है। उनकी कलाकृतियां को देखते गौर करेंगे तो पाएंगे-आकृतियां हैं तो वह मन को सुकून देती हुई है और अर्धमूर्ताकार भी है तो उनमें कहीं कोई कथा, सामयिक संदर्भ, आख्यान ध्वनित हो रहा है। कलाकृतियों से रू-ब-रू होते औचक यह भी लगता है, उनकी कला सौन्दर्य का गहन अन्वेषण है।

Friday, April 26, 2013

सौन्दर्य की अर्थ अभिव्यंजना


छायांकन वह कला है जिसमें प्रकृति प्रदत्त चीजों को ज्यों का त्यों ही प्रस्तुत ही नहीं किया जाता बल्कि प्रकृति के प्रस्तुत गुणों में से उकेरे जाने वाली विषय-वस्तु की एक प्रकार से अन्विति की जाती है। कहूं, विषय में निहित आंतरिक सौन्दर्य, सौन्दर्य के किसी अंश को अनुभूत करते कैमरे की तीसरी आंख से उसे छायाकार परोटता है।  ऐसा करते वह क्षण में परिवर्तित घटना की गति को पकड़ते यथार्थ का अर्थान्वेषण ही तो करता है!  
बहरहाल, बतौर अतिथि सम्पादक ललित कला अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन कला’ के लिए जब देष के ख्यातनाम कलाकारों की कलाकृतियों के छायांकन की तलाष कर रहा था, दिनेषकुमार ने छायाचित्रों के चयन में बेहद मदद भी की। तभी आग्रहवष उनके छायाचित्रों के भव में भी गया। लगा, उनके छायाचित्रों में रंगों और प्रकाश का सधा प्रयोग आकृतियों का अनूठा टैक्सचर निर्मित करता है। किसी कलाकृति की मानिंद। ऐसे में कैमरा जो दृश्य लेता है, एक प्रकार से संवेदना की उनकी आंख उसे फिर से गढती है। दृश्य की अनंत संभावनाओं में जाते वह उसके किसी एक हिस्से को पकड़ते उस पर कैमरे को फोकश करते हैं। ऐसा करते वह वहां उभरी छाया और प्रकाश की अपने तई कैमरे से अनूठी अर्थ अभिव्यंजना भी करते हैं। चट्टानों, शिलाओं और पत्थरों की प्रकृतिप्रदत्त संरचनाओं के शिल्पायन पर जाते वह वहां फैले प्रकाश और छाया को अपने कैमरे से पकड़ यथार्थ मंे जो दिख रहा है उससे भिन्न कलात्मक सौन्दर्य दिखाते हैं। ऐसा करते बहुतेरी बार चट्टान या पहाड़ के किसी कोने, पत्थर में छाया-प्रकाश से जो टैक्सचर निर्मित होता है-उसकी सूक्ष्म सौन्दर्य व्यंजना से वह देखने वालों को रू-ब-रू कराते हैं। दिनेश के ऐसे ही छाया-चित्रों से गुजरते यह अहसास भी बार-बार होता है कि हम अतीत के किसी कला काल मंे प्रवेश कर गए हैं। इस काल में गुफा और शैल चित्रों के अनूठे दृश्य चितराम अनायास उभरते प्रतीत होते सभ्यता और संस्कृति की हमारी संवेदना को जैसे स्पर्श करते हैं। अंधेरी गुफा, गुफा में कहीं से छनता आता प्रकाश और झिल्लीनुमा उभरती संरचना में रेत के रेगिस्तान के पद्चिन्हों की आहट सरीखी भी कुछ होती है। माने वहां जो दृश्य है, उससे बहुतेरे दूसरे दृश्यों की स्मृतियों से भी औचक अपनापा होता है।
दिनेश दृश्य में भी किसी एक आयाम को केन्द्र में रखते उसके संपूर्ण रहस्य को आंखों के समक्ष जैसे खोलते हैं। मसलन उनके एक छाया-चित्र में स्त्री-पुरूष आकृतियों की छाया है। विपरीत प्रकाश में लिए इस छायाचित्र में स्त्री-पुरूष साथ-साथ जा रहे हैं। आप उनके पीछे हैं, अंधेरे में परछाई भर उभरती है, बाकी सब में प्रकाश है। यहां आकृतियों पर पड़ते प्रकाश के बिम्ब में धुंधलाती देहों के साये कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहते हैं। छायाचित्र में अब जबकि डिजिटल कैमरे में सब कुछ आॅटोमेटिक होता है, यू देखा जाए तो करने को कुछ नहीं होता। दृश्य को कैमरा जैसा चाहे आपके समक्ष रख सकता है परन्तु व्यक्तियों, प्रकृति, चीजों में प्रकाश के साथ होते परिवर्तनों को आप कैसे लेते हैं, कैसे किसी दृश्य में संवेदना की तलाश करते हैं-यह तो आपके पास की कला दीठ से ही आपको मिल सकती है। दिनेश के पास इस कला दीठ की कोई कमी नहीं है, इसीलिए वह यथार्थ में जो दिख रहा है, उसके भीतर निहित कला आयामों को गहरे से अपने कैमरे से छूते है। 
मुझे लगता है, प्रकृति और चीजों को उसके सर्वोत्तम रूप में पकड़ भीतर के अपने कलाकार से उसे जीवंत करते हैं दिनेश के छायाचित्र। उनके चित्रों का आस्वाद करते ही बहुत कुछ लिख गया हूं परन्तु छायाकार जो अभिव्यक्ति करता उसे सच में क्या व्यक्त किया जा सकता है! 


Friday, April 19, 2013

संवेदना संचार की संवाहक कलाएं


कलाओं पर काल का वश नहीं है। कहने में यह बात कुछ विरोधाभाश  लिए हो सकती है कि आज जो समकालीन है कल वह क्या इतिहास  नहीं होना है! परन्तु यहां गौर करने की बात यह है कि कलाओं की अन्तर्निहित शक्ति उसका काल नहीं बल्कि उसके सर्जन का दृष्टिकोण तथा चीजों और विचारों के पीछे की मौलिक दृष्टि होती है।भले ही काल विशेष  के बाद किसी कलाकृति का संदर्भ बदल जाए परन्तु उसमें निहित विचार और दृष्टिकोण की स्थापना सदा अपना अस्तित्व बचाए रखती है।
कहूं, व्यक्ति में संवेदनाओं का संचार कलाएं ही कराती हैं। संवेदनाएं यदि छीजती है तो इसका एक अर्थ यह भी है कि हमारा कला-बोध शून्य है। 
भारतीय दृष्टि जीवन में  सृजन से ही तो जुड़ रही है। वहां जीवन की समग्रता पर वहां विचारा गया है। जाहिर सी बात है, कला के परिप्रेक्ष्य में उसमे संगीत है, नृत्य है, चित्रकला है और तमाम प्रकार की दूसरी कलाएं भी सम्मिलित हैं। भरत मुनि के नाट्यषास्त्र का नाम भले नाटक से संबद्ध हो परन्तु उसमें सभी कलाओं के अर्न्तसंबंधों की परिणति में हर कला की अपनी स्वायत्ता है। और यह कलाएं ही हैं जो जीवन के अव्यक्त को व्यक्त करती हैं। जो व्यक्ति में संवेदना को जीवित रखती है। इसीलिए मानव मूल्यों के लिए जीवन में कलाओं का होना जरूरी समझा गया है। शास्त्रों में तो इसीलिए बगैर कलाओ ंके मनुष्य को पषुतुल्य समझा गया है।
बहरहाल, संगीत को ही लें। आलाप के अंतर्गत राग का हल्के हल्के विस्तार होता है। इस विस्तार में ही पूरा एक भाव लोक तैयार होता है। ठीक ऐसे ही रंगमंच के साथ है। वहां किसी पात्र सें संबंधित दृष्य में विस्तार होने के बाद ही अगला दृष्य मंचित होता है। नृत्य में दृष्टि, हाव-भाव आदि की भंगिमाएं ही उसका विस्तार करती है। यही बात चित्रकला के साथ भी है। रंग और रेखाएं बढ़त करती है। इसमें ही कैनवस पर मूर्त और अमूर्त चित्र की परिणति होती है। हर कला अपने रूप में सौन्दर्य और श्रेष्ठता का वरण दूसरी कला के मेल से करती है। सुखद जीवन का मंत्र भी तो यही है। सबके साथ तालमेल। 
...और कलाएं संवाद और सहकार का ही तो नाद करती है। विडम्बना यह है कि इधर कलाएं कलाकारों से ही नहीं आम जन से भी निरंतर दूर होती जा रही है। भूमंडलीकरण ने बाजार को अंतिम मंजिल जो बना दिया है! संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्रकलाएं जब बाजार की वस्तु बनेगी तो फिर जीवन में संवेदषीलता भी कहां बची रह जाएगी! सोचने की बात यह है कि आप-हम कलाओं के लिए क्या कर रहे हैं। हमारा कलाओं के बिगसाव में क्या योगदान है। कला प्रस्तुतियों में क्या हम पहुंचते हैं! कलाओं के संरक्षण में क्या किसी स्तर पर हम योगदान देते हैं! मूलभूत प्रष्न यही तो हैं। 
कला बोध के लिए जरूरी यह भी है कि शिक्षण संस्थाओं में आरंभ से ही बच्चों में सांस्कृतिक कलाओं के संस्कार दिए जाएं। समाज की नींव वहीं से तो तैयार होती है। घरों में इन संस्कारों पर ध्यान दिया जाए। स्वैच्छिक संस्थाएं इसके लिए अधिक से अधिक आगे आए। बहुतों को यह जानकार अचरज हो सकता है कि स्पिकमैके की स्थापना कभी आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर किरण सेठ ने की थी। सरकार व कॉरपोरेट जगत के अर्थ सहयोग से यह संस्था आज देषभर में शास्त्रीय संगीत व कलाओं के आयोजन करती है। स्पिकमैके ने वह काम किया है जो प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये, बहुतेरी संस्थाएं स्थापित करके सरकार नहीं कर सकती। इस तरह के व्यापक प्रयास सभी स्तरों पर होने जरूरी है। इसी से कलाएं बची रह सकती है। संवेदनाएं बची रह सकती है।


Friday, April 12, 2013

रंग-रेखाओं में शिव


सुखद अनुभूति माने सुंदर। सुन्दरता का अर्थ भद्र और कल्याण का भाव ही तो है। सौंदर्य की अवधारणा आनंदानुभूति में है। सौन्दर्य में  शुचि, शुभ और भद्र की समन्विति है। मंगल की भावना है। कलाओं का हेतु सौन्दर्य के यह भाव ही तो है। सृष्टि के पहले जब कुछ भी नहीं था। तब केवल शिव  था। सौन्दर्य था। कहा भी तो है, ‘न सन्नासच्छिव एव केवलः।’ माने सृष्टि के आदिकाल में जब केवल अंधकार ही अंधकार था, न दिन था न रात्रि, न सत् यानी कारण था न असत् यानी कार्य। तब केवल निर्विकार शिव  ही विद्यमान थे। शिव सोंदर्य   के संवाहक हैं। तमाम कलाओं के प्रेरक। संगीत-गीत, वाद्य एवं नृत्य के आदि देव। आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक अभिनयों के साथ-साथ गायन-वादन-नर्तन आदि सभी कलाओं के प्रयोक्ता भगवान शिव  ही तो हैं। इसलिए उन्हें ‘विद्यातीर्थं महेष्वरम्’ से भी अभिहित किया गया है।
बहरहाल, शिव  शक्ति  का घर बिन्दुनाद है। बिन्दुनाद से ही तो तमाम कलाएं बढत करती है। जवाहर कला केन्द्र में पिछले दिनों सिल्वी माहेष्वरी की भगवान शिव   कन्द्रित कला प्रदर्षनी का आस्वाद किया। लगा, रंगो और रेखाओं के अंतर्गत मूर्त-अमूर्त में भगवान षिव को कला में गहरे से जिया गया है। सिल्वी की कला की बड़ी विषेषता यह है कि वह कल्पनाओ के साथ भावनाओं के भव में रंग और रेखाओं को वीलीन करती है। ऐसा है तभी तो उसकी उकेरी आकृतियों में अंतर्मन संवेदनाओं का सूक्ष्म अंकन है। रंग है तो वह संवेदना से उपजे भीतर के निनाद का संवाहक है। रेखाएं हैं तो उनमें मन के सौन्दर्य की लय है।
सिल्वी के चित्र अध्यात्म भावों से लबरेज हैं। स्तुत्य देव की आराधना की राग वहां है परन्तु बहुत कुछ ऐसा भी है जो लगता है बगैर किसी प्रयास के स्वतःस्फुर्त है। वहां जो उकेरा गया है उसमें रंग-रेखाएं माध्यम जरूर है परन्तु उनका मूल आत्म की अभिव्यंजना है। चित्र है तो वहां संगीत है। भीतर का नृत्य है। नाट्य है और है जीवनानुराग। सिल्वी ने भोले भंडारी के कल्याण भावों को मन में बसाते। उनमें रमते-बसते किया है प्रदर्षनी में प्रदर्षित तमाम चित्रों का सर्जन। इसीलिए उसके चित्रों में रंग और रेखाएं होते हुए भी वें गौण हैं। उनमें निहित भाव वहां प्रधान है। सिल्वी का एक चित्र है जिसमें रंगों के बीच घंटी का प्रवाह है। नाद है और है रंगों की उत्सवधर्मिता। शिव  की यह सूक्ष्म सौन्दर्याभिव्यक्ति है। घंटी से निकलती ओंकार ध्वनि यहां जैसे रंग सजी सृष्टि नाद की संवाहक है। ऐसे ही एक और चित्र है जिसमें वृक्ष के नीचे ध्यान को संजोया गया है। चित्र और भी हैं जिनमें शिवलिंग, शिव  मंदिरों और शिव के  ध्यान-योग के बहाने भीतर उपजते भावों की अभिव्यंजना की गयी है। महत्वपूर्ण यह भी है कि अन्र्तनिहित सोच को रंगो से कैनवस पर जैसे पंख लगे हैं। इसीलिए तो सिल्वी के अध्यात्म प्रेरित इन चित्रों में औचक ही अनहद नाद का आभाष होता है।
सोचता हूं। यह भगवान शिव  ही हैं जो रावण रचित तांडवस्त्रोत पर नाच उठे थे। शिव  ने चैदह बार डमरू बजाया। पाणिनी ने इसी से तो व्याकरण की रचना की। तमाम हमारी कलाएं शिव  के रूप का ही तो विस्तार है।  शिव अनन्त है। नटराज काल-संहारशिव केवल अपने वैभव, शक्ति, शांति, संयम और ऐष्वर्य में ही सर्वोत्तम नहीं है, वे समय और स्थिति के आध्यात्मिक अतिक्रमण के भी प्रतीक हैं। इसीलिए तो वह महादेव हैं। जहां कहीं भी ‘ईष्वर’ अथवा ‘ईष’ शब्द बगैर किसी विषेषण के आया है उसका अर्थ शंकर ही तो है।...संसार में व्याप्त कला सौन्दर्य के स्त्रोत। शिव शंकर!

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के एडिट पेज पर भी आप इसे पढ़ सकते है। लिंक है-

Friday, April 5, 2013

लोक कलाओं से अपानापा


कलाओं का सूक्ष्म और बहुत से स्तरों पर मार्मिक विवेचन कहीं है तो वह हमारी लोक संस्कृति में है। इसलिए कि सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ उसका बिगसाव हुआ है। राजस्थान की ही बात करें। हमारे गांव आंज भी लोक के उजास में ही रचे-बसे हैं। कभी लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी ने लोक से जुड़ी कलाओं के अनमोल खजाने की तह में जाते उसका आस्वाद हमें भी कराया था। न जाने तब कहां-कहां से वह कलाओं और कलाकारों को ढूंढ कर लाए और उनसे हमारा नाता कराया। 
इधर उनकी इसी परम्परा को बीकानेर के डाॅ. श्रीलाल मोहता आगे बढ़ा रहे हैं। कुछ दिन पहले जब बीकानेर जाना हुआ तो लोक कलाओं को सहेजने, लुप्तप्रायः होती जा रही कलाओं और उनसे संबंधित कलाकारों की तलाश कर उन्हें आगे बढ़ाने के उनके कार्य को गहरे से जाना। लगा, अपनी ही धुन में संलग्न मोहता ने लोक की हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भावी पीढि़यों के लिए संजोने का महत्ती कार्य किया है। लोक संस्कृति का वास्तविक स्वरूप लोक के इतिहास बगैर संभव भी कहां है! सो मोहता ने बड़ा काम यह भी किया है कि लोप होती कलाओं  पर विमर्श की राहें खोली और ‘मरू-परम्परा’ संस्थान के जरिए राजस्थान के सुदूर क्षेत्रों में स्वयं पहुचकर लोक कलाओं को संजोया। लोक कलाकारों के रूप में विरासत के अनमोल मोती ही तो उन्होंने सहेजे हैं!
डा श्रीलाल मोहता ने कभी ‘मरू लोक संस्कृति कोष’ लेखन का महत्ती कार्य भी किया। इस कोश में व्यक्ति है तो व्यक्ति से जुड़े संस्कारों की सौरम भी है। संस्कृति के तमाम उपादान भी हैं। बड़ी बात यह भी है कि जो कुछ उन्होंने इस कोष में संजोया है वह केवल वर्णात्मक ही नहीं है, उसमें मोहता का लोक में बसा मन भी है। कहें, उन्होंने लोक को इतिहास नहीं रखते उसे आधुनिक समय संवेदना से भी जोड़ा है। इस कोश के साथ ही उन्होंने बीकानेर परिक्षेत्र में विकसित भारतीय चित्रकला परम्परा की विशिष्ट शैली मथेरण कलम से भी नई पीढ़ी को रू-ब-रू कराने का महत्ती कार्य भी किया है। बीकानेर चित्रशैली के रूप में अब तक मुगल चित्रकला की ही पहचान होती रही है जबकि मरूभूमि की संवेदना, परिवेश और स्थानीय रंगो के साथ लोक जीवन से जुड़ी बीकानेर की मूल शैली मथेरण कलम ही है। ‘मथेरण कलम’ से जुड़े चंद बचे कलाकारों से उन्हांेने स्वयं संवाद किया और एक तरह से लोप हो चुकी इस चित्रशैली को प्रकाश में लेकर आए। डाॅ. मोहता के साथ कुछ दिन पहले ‘मरू-परम्परा’ संस्थान में जाना हुआ तो उनके द्वारा किए लोक संस्कृति संरक्षण के उन कार्यों को भी जाना जो बगैर किसी को बताए वह अपने तई चुपके से करते रहे है। मसलन गांवों में विवाह, उत्सव पर बनने वाले लोक चित्र, संस्कारों से जुड़े मांडणे और अब केवल कुछ ही गांवों में बचे ख्याल, रम्मतों आदि के कलाकारों से संजोयी विशिष्ट बातों का इतिहास भी उनके पास एकत्र है।  
मुझे लगता है, लोक संस्कृति का उनका कर्म लोक साक्ष्यों का आधार तो लेता है परन्तु उसमें चिन्तन की संवेदना का राग भी है। लोक संस्कृति, लोक मुहावरों, लोक साहित्य को इतिहास के नवीन स्त्रोत के रूप में विकसित करने के उपक्रम के तहत उन्होंने ऐसे ऐसे कलाकारो को ढूंढ निकाला जो अन्यथा बिसरा दिए गए थे। जमाली बाई की मांड को परखा। उसे मंच दिया। हेला, ख्याल, हरजस, वाणी के सुदूर गांवो में बसने वाले कलाकारों के बीच गए और उन्हें ढूंढ निकाल उनके लिए कला प्रस्तुति के अवसर तलाशे। वह लोक के मौखिक और लिखित दोनों ही स्त्रोतों पर जाते हैं तो लोक संस्कृति के ऐसे मर्मज्ञ भी हैं जो लोक की बौद्धिक प्रक्रिया को संस्कृति के चिन्तन में रूपान्तरित करते हैं। कहें, मोहता व्यक्तित्व की अपनी अंतःप्रक्रिया में निरंन्तर सौन्दर्य की सर्जना करते लोक का आलोक लिए हैं।

राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" में प्रति शुक्रवार  एडिट पेज पर प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" में 5 अप्रैल को प्रकाशित
आप इसे इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं -
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/950551

Tuesday, April 2, 2013

सांस्कृतिक परम्पराओं का कला उजास


म्यूरल माने भित्ति चित्र। दीवार पर उभरे रूपाकार। फ्रेस्को पंेटिंग। पारम्परिक भारतीय शब्दावली में इन्हें आलागीला, मोराकषी भी कहा जाता है। भारत में म्यूरल की समृद्ध परम्परा आरंभ से ही रही है। किले-महलों में राग-रागिनियों के चित्र और मूगल पेंटिंग के अंतर्गत भांत-भांत के चितराम म्यूरल के जरिए ही तो बहुत से स्तरों पर बचे हुए हैं। लोक संस्कृति तो समृद्ध ही भित्तिचित्रों से ही हुई है। मुझे लगता है, सांस्कृतिकपरम्पराओं, पौराणिक, सामाजिक इतिहास का वातायन भित्तिचित्रण से ही तो खुलता नजर आता है।केन्द्रीय ललित कला अकादेमी ने अपनी पत्रिका ‘समकालीन कला’ के एक अंक का अतिथि सम्पादक इस नाचीज को बनाया। अंक में लीक से हटकर कुछ सामग्री देने के प्रयास के अंतर्गत प्रख्यात चित्रकार शांति दवे से संवाद के लिए ग्रेटर कैलास स्थित उनके निवास स्थान पर जाना हुआ। उनके निवास पर लगी कलाकृतियों में रंग पट्टियों में उभरता षिल्प और म्यूरल्स में उभरती मिनिएचर पेंटिंग सदा के लिए जैसे ज़हन में बस गई। इसलिए कि म्यूरल्स में वह अक्षरों को काठ में डाल चिपकाते है। उनके म्यूरल्स में लिपि के टूकड़े सरीखे अलग से देखने वालों का ध्यान खींचते हैं। वहां रंग और रेखाएं हैं तो षिल्प का अहसास भी होता है। परम्परा में आधुनिकता की उनकी इस दीठ से ही म्यूरल को नई पहचान भी मिली। मुम्बई, दिल्ली हवाई अड्डों पर बनाए उनके म्यूरल इसीलिए आज भी देखने वालों को लुभाते हैं।
बहरहाल, कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना नागपुर के समीप स्थत रामटेक नामक स्थल पर की थी। रामटेक स्थित कालिदास स्मारक जाना हुआ तो वहां की दीवारों पर उनके महाकाव्य ‘मेघदूत’ आधारित चित्रों से भी साक्षात् हुआ। लगा, महाकवि का गीतिकाव्य आंखो के सामने जीवंत हो उठा है। भित्तिचित्रों की यही विषेषता है।श्बहुतेरी बार चलायमान होते दृष्य संस्कृति से जैसे हमारा संवाद कराते हैं। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भी प्रवेष करते हैं तो  प्रवेष कक्ष की चारों दीवारों पर बने म्यूरल औचक देखने वालों का ध्यान खींचते हैं। सतीष गुजराल, के.के. हेब्बार, ज्योति भट्ट और ष्यामबक्स चावड़ा जैसे मषहूर चित्रकारों द्वारा बनाए भित्तिचित्रों का अनूठा लोक विज्ञान भवन की अनुपम धरोहर है। अकबर द्वारा चलाए गए नवीन धर्म दीन-ए-इलाही, ह्वनेसांग की भारत यात्रा, फूलवालों की सैर और होली विषयों के म्यूरल देखते लगता है कला के सर्वथा नये लोक में हम प्रवेष कर गए हैं।
देष के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी राजकीय इमारतों पर म्यूरल की शुरूआत की थी। इस सोच के साथ कि इतिहास में हमारी इमारतें कला की दृष्टि से शून्य और नगण्य मानी जाएगी, यदि वहां सांस्कृतिक परम्पराओं  का उजास नहीं होगा। भित्ति चित्रण को प्रोत्साहन के पीछे पंडित नेहरू का उद्देष्य यह भी था कि आम आदमी जिसका कला से सीधे कोई नाता नहीं हो, वह भी कला के संपर्क में आकर कला में रूचि ले सके। तब निर्णय यह भी लिया गया था कि प्रत्येक सरकारी इमारत के खर्च का दो प्रतिषत इमारत में कला समावेष पर रखा जाए। सरकार द्वारा तब एक अलंकरण समिति की भी स्थापना की गयी थी। समिति ने सर्वप्रथम सज्जा कार्य के लिए विज्ञान भवन को चुना और और इसके प्रवेष द्वार की चारों दीवारों के लिए अलग-अलग षीर्षक चुने गए। देषभर के प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर भी इसी संदर्भ में म्यूरल के जरिए हमारी परम्पराओं को संजोया गया। जयपुर रेलवे स्टेषन पर देवकीनंदन शर्मा का ढोला-मारू म्यूरल बरसों तक यात्रियों को लुभाता रहा है। वनस्थली कला मंदिर की दीवारों पर भी राजा पुलकेषी दरबार, बोधिसत्व, पदमपाणी और अन्य जातक कथाओं पर बनाये उनके आरायष अपनी मौलिकता में भित्ति चित्रों की हमारी समृद्ध परम्परा के संवाहक हैं।
क्या ही अच्छा हो, सरकारी इमारतों में म्यूरल के जरिए सांस्कृतिक परम्पराओ ंके उजास की पंडित नेहरू की पहल पर फिर से सरकारें विचार करे। इसी से हम हमारी संस्कृति को सदा के लिए बचा रख पाएंगे।